Opening the text
सोपान-प्रवेश: ‘मंगल-आरम्भ’ से ‘भक्ति-बीज’ तक। बालकाण्ड में राम-लीला का प्रथम दर्शन जीव के भीतर श्रद्धा (श्रवण-रुचि) जगाता है। यहाँ विवाह-उत्सव, अतिथि-सत्कार, गुरु-कृपा, दान और कुल-रीति—ये सब ‘धर्म-आचरण’ को भक्ति का आधार बनाते हैं। इस खण्ड का द्वार-भाव यह है कि मोक्ष-मार्ग का पहला पायदान सामाजिक-धर्म और प्रेम-सम्बन्धों की शुद्धि से खुलता है; लोक-मर्यादा के भीतर रहकर भी ईश्वर-प्रेम (सगुण-भक्ति) निरन्तर नूतन होता जाता है।
मुख्य प्रतीक-धारा ‘मंगल’ को ‘भक्ति-बीज’ में रूपान्तरित करती है। (क) ‘नित नूतन मंगल’ = ईश्वर-कृपा का नित्य-नवीन अनुभव; भक्ति कोई एक बार की घटना नहीं, सतत ताज़ा होने वाली चेतना है। (ख) अतिथि-सत्कार/गुरु-पूजन/विप्र-दान = गृहस्थ-धर्म का यज्ञ; सामाजिक मर्यादा को साधना बनाकर अहं-क्षय और शुद्धि। (ग) राज-वैभव = सेवा-केन्द्रित ऐश्वर्य; संपदा का सार ‘दान’ और ‘लोक-हित’ में प्रकट। (घ) विदाई/पालकी = जीवन-परिवर्तन का संस्कार; प्रेम का परिष्कार—स्नेह आसक्ति नहीं, मर्यादा में ढला समर्पण। (ङ) करुण-विरह = भक्ति का घनत्व; मिलन का रस विरह से गहरा होकर ‘अन्तःकरण-शुद्धि’ करता है।
Verse 695 (चौपाई)
नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं।। बड़े भोर भूपतिमनि जागे। जाचक गुन गन गावन लागे।। देखि कुअँर बर बधुन्ह समेता। किमि कहि जात मोदु मन जेता।। प्रातक्रिया करि गे गुरु पाहीं। महाप्रमोदु प्रेमु मन माहीं।। करि प्रनाम पूजा कर जोरी। बोले गिरा अमिअँ जनु बोरी।। तुम्हरी कृपाँ सुनहु मुनिराजा। भयउँ आजु मैं पूरनकाजा।। अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं। देहु धेनु सब भाँति बनाई।। सुनि गुर करि महिपाल बड़ाई। पुनि पठए मुनि बृंद बोलाई।।
शहर में रोज नया सेलिब्रेशन चल रहा था। दिन और रात पल में गुजर रहे थे। सुबह होते ही राजा और उसके लोग जाग गए। गानेवाले गाने गाने लगे। राजकुमार और दुल्हन को देख के दिल में जो खुशी थी वो बताना मुश्किल है। सुबह की पूजा करके वो गुरु के पास गए। दिल में बहुत खुशी और प्यार था। हाथ जोड़ के प्रणाम किया और पूजा की। उनकी बात ऐसी थी जैसे अमृत में डूबी हो। गुरुजी, आपकी कृपा से आज मेरा काम पूरा हो गया। अब सब ब्राह्मण बुलाओ और उनको गाय दो। गुरु की बात सुन के राजा ने उनकी बहुत बड़ाई की। फिर उन्होंने सब रिशियों को बुलवाया।
Verse 696 (दोहा/सोरठा)
बामदेउ अरु देवरिषि बालमीकि जाबालि। आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि।।330।।
वामदेव और रिशि देवर, वाल्मीकि और जाबलि सब आए। फिर बड़े-बड़े रिशियों का एक ग्रुप आया। कौसिक और बहुत सारे तपस्वी लोग भी साथ में थे।
Verse 697 (चौपाई)
दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे। पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे।। चारि लच्छ बर धेनु मगाई। कामसुरभि सम सील सुहाई।। सब बिधि सकल अलंकृत कीन्हीं। मुदित महिप महिदेवन्ह दीन्हीं।। करत बिनय बहु बिधि नरनाहू। लहेउँ आजु जग जीवन लाहू।। पाइ असीस महीसु अनंदा। लिए बोलि पुनि जाचक बृंदा।। कनक बसन मनि हय गय स्यंदन। दिए बूझि रुचि रबिकुलनंदन।। चले पढ़त गावत गुन गाथा। जय जय जय दिनकर कुल नाथा।। एहि बिधि राम बिआह उछाहू। सकइ न बरनि सहस मुख जाहू।।
राजा ने डंड पकड़ के सबको प्रणाम किया। सबको प्यार से अच्छी जगह पर बिठाया। चार लाख अच्छी गायें माँगी। वो सब बड़े अच्छे स्वभाव की थी, जैसे कामधेनु हो। राजा ने उनको हर तरह से सजाया और खुश होक्के राजा लोगों को दे दिया। राजा ने बहुत विनय किया कि आज मुझे इस दुनिया में रहने का असली फल मिल गया। आशीर्वाद पाकर राजा बहुत खुश हुआ। फिर वो सब लोग जो कुछ माँगने आए थे, वो अपना सामान लेकर चले गए। राजा ने सोना, कपड़े, घोड़े, रथ और नग देखा के जो सूर्यवंशी राजा को अच्छा लगे। वो सब चले गए, गाते हुए राम की कथा। जय जय जय सूर्यवंश के राजा की। ऐसे ही राम की शादी बहुत धूम से हुई। हज़ार मुँह से भी इसको बयान नहीं कर सकते।
Verse 698 (दोहा/सोरठा)
बार बार कौसिक चरन सीसु नाइ कह राउ। यह सबु सुखु मुनिराज तव कृपा कटाच्छ पसाउ।।331।।
कौसिक बार-बार रिशि के चरणों में सिर झुकाया। बोला कि रिशियों के राजा, यह सब खुशी आपकी कृपा से है। आपने बिना कोई शर्त के मुझे यह सब दिया है।
Verse 699 (चौपाई)
जनक सनेहु सीलु करतूती। नृपु सब भाँति सराह बिभूती।। दिन उठि बिदा अवधपति मागा। राखहिं जनकु सहित अनुरागा।। नित नूतन आदरु अधिकाई। दिन प्रति सहस भाँति पहुनाई।। नित नव नगर अनंद उछाहू। दसरथ गवनु सोहाइ न काहू।। बहुत दिवस बीते एहि भाँती। जनु सनेह रजु बँधे बराती।। कौसिक सतानंद तब जाई। कहा बिदेह नृपहि समुझाई।। अब दसरथ कहँ आयसु देहू। जद्यपि छाड़ि न सकहु सनेहू।। भलेहिं नाथ कहि सचिव बोलाए। कहि जय जीव सीस तिन्ह नाए।।
जनक का प्यार, उसका स्वभाव और उसका काम, राजा ने हर तरह से तारीफ की। जब दिन आया तो अयोध्या के राजा ने जाने की इजाज़त माँगी। पर जनक ने प्यार से रोक लिया। दिन भर इज़्ज़त बढ़ती गयी। हर दिन उसको मेहमान की तरह रखा गया। हर दिन शहर में नयी खुशी और सेलिब्रेशन थी। दसरथ का जाना किसी को अच्छा नहीं लग रहा था। बहुत दिन ऐसे ही बीत गए। जैसे शादी वाले लोग प्यार में ही बंध गए हो। फिर कौसिक और शतानंद गए। किंग विदेह को समझाया कि अब दसरथ को जाने दो। प्यार छोड़ नहीं सकते फिर भी। ठीक है प्रभु बोला और मंत्री बुलाए। जय और जीवन का पैग़ाम भेजा, और सब ने सिर झुकाया।
Verse 700 (दोहा/सोरठा)
अवधनाथु चाहत चलन भीतर करहु जनाउ। भए प्रेमबस सचिव सुनि बिप्र सभासद राउ।।332।।
अयोध्या के राजा अब जाना चाहते थे। अंदर पैलेस में हुक्म दिया। मंत्री लोगों ने पंडित और दरबार के लोगों की बात सुनी। वो सब प्यार में डूब गए।
Verse 701 (चौपाई)
पुरबासी सुनि चलिहि बराता। बूझत बिकल परस्पर बाता।। सत्य गवनु सुनि सब बिलखाने। मनहुँ साँझ सरसिज सकुचाने।। जहँ जहँ आवत बसे बराती। तहँ तहँ सिद्ध चला बहु भाँती।। बिबिध भाँति मेवा पकवाना। भोजन साजु न जाइ बखाना।। भरि भरि बसहँ अपार कहारा। पठई जनक अनेक सुसारा।। तुरग लाख रथ सहस पचीसा। सकल सँवारे नख अरु सीसा।। मत्त सहस दस सिंधुर साजे। जिन्हहि देखि दिसिकुंजर लाजे।। कनक बसन मनि भरि भरि जाना। महिषीं धेनु बस्तु बिधि नाना।।
जब शहर वालों को पता चला कि बारात निकलने वाली है, वो सब परेशान हो गए। आपस में पूछने लगे, क्या हो रहा है। ऐसा लगा जैसे शाम को कमल मुरझा रहा हो। जब सबको सुना कि सच में रुखसत हो रही है, सब रोये। जैसे शाम के कमल सूख रहे हों। जहाँ भी बारात के लोग रुके, वहाँ सिद्ध लोग भी आ गए। मेवा और पकवान हर तरह के बन गए। खाने का सामान इतना था, बताना मुश्किल है। जनक ने कितने सारे कुली भेजे। घर भर भर के सामान रखवाया। एक लाख घोड़े और पच्चीस हज़ार रथ थे। सबको हो से सर तक सजा दिया। दस हज़ार हाथी थे, मस्ती में। उन्हें देख के दिशाओं के हाथी भी शर्मा गए। सोने के कपड़े और हीरों से घर भरे गए। गायें, भैंसें और हर तरह का सामान दिया गया।
Verse 702 (दोहा/सोरठा)
दाइज अमित न सकिअ कहि दीन्ह बिदेहँ बहोरि। जो अवलोकत लोकपति लोक संपदा थोरि।।333।।
विदेह के राजा ने जो तोहफे दिए, वो गिनने के बाहर थे। इतने ज़्यादा थे कि बताना भी मुश्किल था। भगवान भी अगर उन्हें देखते, तो दुनिया की दौलत उन्हें कम लगती।
Verse 703 (चौपाई)
सबु समाजु एहि भाँति बनाई। जनक अवधपुर दीन्ह पठाई।। चलिहि बरात सुनत सब रानीं। बिकल मीनगन जनु लघु पानीं।। पुनि पुनि सीय गोद करि लेहीं। देइ असीस सिखावनु देहीं।। होएहु संतत पियहि पिआरी। चिरु अहिबात असीस हमारी।। सासु ससुर गुर सेवा करेहू। पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू।। अति सनेह बस सखीं सयानी। नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी।। सादर सकल कुअँरि समुझाई। रानिन्ह बार बार उर लाई।। बहुरि बहुरि भेटहिं महतारीं। कहहिं बिरंचि रचीं कत नारीं।।
सारी तैयारी करके जनक ने उन्हें अयोध्या भेज दिया। जब रानियों को पता चला कि बारात जा रही है, वो बहुत दुखी हुई। जैसे छोटे पानी में मछलियाँ तड़प रही हों। बार बार सीता को गोद में लिया। आशीर्वाद दिया और समझाया। कहा, तुम हमेशा अपने पति को प्यारी रहना। हमारा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ रहे। ससुर, सास और बड़े लोगों की सेवा करना। पति की मर्ज़ी के हिसाब से चलना। प्यार में डूबी हुई सहेलियों ने उन्हें पत्नी के धरम समझाए। नरम नरम बातों से। इज़्ज़त से सारी राजकुमारियों को समझाया। रानियों ने बार बार गले लगाया। फिर फिर माँ से मिले। कहा, ब्रह्मा ने ऐसी औरतें कैसी बना दी।
Verse 704 (दोहा/सोरठा)
तेहि अवसर भाइन्ह सहित रामु भानु कुल केतु। चले जनक मंदिर मुदित बिदा करावन हेतु।।334।।
उस वक़्त राम अपने भाइयों के साथ निकले। वो सूर्य वंश के थे। खुशी से जनक के मंदिर गए। विदाई करवाने के लिए।
Verse 705 (चौपाई)
चारिअ भाइ सुभायँ सुहाए। नगर नारि नर देखन धाए।। कोउ कह चलन चहत हहिं आजू। कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू।। लेहु नयन भरि रूप निहारी। प्रिय पाहुने भूप सुत चारी।। को जानै केहि सुकृत सयानी। नयन अतिथि कीन्हे बिधि आनी।। मरनसीलु जिमि पाव पिऊषा। सुरतरु लहै जनम कर भूखा।। पाव नारकी हरिपदु जैसें। इन्ह कर दरसनु हम कहँ तैसे।। निरखि राम सोभा उर धरहू। निज मन फनि मूरति मनि करहू।। एहि बिधि सबहि नयन फलु देता। गए कुअँर सब राज निकेता।।
चारों भाई अच्छे स्वभाव वाले थे। शहर की औरतें और मर्द उन्हें देखने के लिए दौड़े। कुछ ने कहा, आज मैं भी इनके साथ चलना चाहता हूँ। विदेह के राजा ने विदाई की तैयारी कर दी। लोगों ने कहा, अपनी आँखों को भर लो इनके रूप देख के। यह चारों राजा के बेटे मेहमान बन के आए हैं। किसी को नहीं पता किस पुण्य से ऐसे लोग बने। आँखें मेहमान बन गई, भगवान ने भेजा। जैसे चाँद से अमृत मिलता है, वैसे ही दर्शन से शांति मिलती है। जैसे नरक से विष्णु के चरण मिलते हैं, वैसे ही इनका दर्शन हमें मिलता है। राम को देख के लोगों ने दिल में उसकी सोच रखी। मन में उसकी मूरति बना ली। ऐसे उसने सबको दर्शन का फल दिया। राजकुमार राजा के महल चले गए।
Verse 706 (दोहा/सोरठा)
रूप सिंधु सब बंधु लखि हरषि उठा रनिवासु। करहि निछावरि आरती महा मुदित मन सासु।।335।।
रानी ने अपने सारे रिश्तेदार देखे। वो खुशी से उठी क्योंकि उसका बेटा इतना सुंदर था। उसके मन में बहुत खुशी थी। सास ने पूरा दिल से आरती की।
Verse 707 (चौपाई)
देखि राम छबि अति अनुरागीं। प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं।। रही न लाज प्रीति उर छाई। सहज सनेहु बरनि किमि जाई।। भाइन्ह सहित उबटि अन्हवाए। छरस असन अति हेतु जेवाँए।। बोले रामु सुअवसरु जानी। सील सनेह सकुचमय बानी।। राउ अवधपुर चहत सिधाए। बिदा होन हम इहाँ पठाए।। मातु मुदित मन आयसु देहू। बालक जानि करब नित नेहू।। सुनत बचन बिलखेउ रनिवासू। बोलि न सकहिं प्रेमबस सासू।। हृदयँ लगाइ कुअँरि सब लीन्ही। पतिन्ह सौंपि बिनती अति कीन्ही।।
जब उन्होंने राम को देखा, उनका दिल भर गया। बार-बार उसके पाँव पकड़ने लगी। शरमाना सब भूल गई, प्यार ने उनका दिल भर दिया। यह नेचुरल प्यार है, इसको कैसे बताऊँ। अपने भाइयों के साथ घूम के देखा करती थी। खाना-पीना सब साथ में होता था। राम ने बोला, सही टाइम जान के। उसकी बातें में प्यार था, शर्म था, अच्छापन था। राजा अयोध्या जाना चाहते हैं। उन्होंने मुझे यहाँ भेजा है कि मैं विदाई करवाऊँ। माँ, खुशी से आदेश दो। मुझे बच्चा समझ के, मैं हमेशा प्यार करूँगा। यह सुन के रानी रोई। सास बोल नहीं पाई, प्यार में डूबी हुई थी। उसने सारी राजकुमारियों को गले लगाया। उनके पतियों को सौंप के बहुत विनती की।
Verse 708 (छंद)
करि बिनय सिय रामहि समरपी जोरि कर पुनि पुनि कहै। बलि जाँउ तात सुजान तुम्ह कहुँ बिदित गति सब की अहै।। परिवार पुरजन मोहि राजहि प्रानप्रिय सिय जानिबी। तुलसीस सीलु सनेहु लखि निज किंकरी करि मानिबी।।
सीता ने राम को अपना समर्पित किया। हाथ जोड़ के बार-बार बोली। मैं आपको अपना समर्पित करती हूँ, आप जो ज्ञानी हैं। आप सबकी हालत जानते हैं। मेरा परिवार और शहर के लोग, आप जानो कि सीता आपकी जान से भी प्यारी है। तुलसीदास कहते हैं, आपका अच्छापन और प्यार देख के, वो आपकी सेवक मान के चलेगी।
Verse 709 (दोहा/सोरठा)
तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय। जन गुन गाहक राम दोष दलन करुनायतन।।336।।
आप वो हैं जो सबकी इच्छा पूरी करते हैं। सबसे बड़े हैं और दिल को प्यारे हैं। राम अपने भक्तों के गुण गाता है, उनकी गलतियाँ मिटाता है, और दया का घर है।
Verse 710 (चौपाई)
अस कहि रही चरन गहि रानी। प्रेम पंक जनु गिरा समानी।। सुनि सनेहसानी बर बानी। बहुबिधि राम सासु सनमानी।। राम बिदा मागत कर जोरी। कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरी।। पाइ असीस बहुरि सिरु नाई। भाइन्ह सहित चले रघुराई।। मंजु मधुर मूरति उर आनी। भई सनेह सिथिल सब रानी।। पुनि धीरजु धरि कुअँरि हँकारी। बार बार भेटहिं महतारीं।। पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी। बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी।। पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई। बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई।।
ऐसे बोल के रानी उसके पाँव पकड़ के रही। ऐसा लगा जैसे प्यार के कीचड़ में डूब गई है। उसकी प्यारी बातें सुन के राम ने सास की बहुत इज्जत की। हाथ जोड़ के विदाई माँगी और बार-बार प्रणाम किया। आशीर्वाद ले के फिर से सर झुकाया। भाइयों के साथ निकल पड़े। रानी ने उसका चेहरा अपने दिल में रखा। प्यार के मारे बेहाल हो गई। फिर होश में आके राजकुमारी आगे बढ़ी। बार-बार अपनी माँ से मिली। उन्हें छोड़ने गई और फिर से मिली। दोनों का प्यार और बढ़ गया। बार-बार अपनी सहेलियों से मिली और बिछड़ गई। जैसे गाय अपने बच्चे के पास जाती है।
Verse 711 (दोहा/सोरठा)
प्रेमबिबस नर नारि सब सखिन्ह सहित रनिवासु। मानहुँ कीन्ह बिदेहपुर करुनाँ बिरहँ निवासु।।337।।
प्रेम में सब डूबे हुए थे। राजा महल के सब लोग, और उनकी सहेलियाँ भी। ऐसा लग रहा था जैसे पूरा शहर में सिर्फ प्यार और जुदाई भर गई है। सब लोग अलग होने के दर्द में डूबे हुए थे।
Verse 712 (चौपाई)
सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए।। ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुनि धीरजु परिहरइ न केही।। भए बिकल खग मृग एहि भाँति। मनुज दसा कैसें कहि जाती।। बंधु समेत जनकु तब आए। प्रेम उमगि लोचन जल छाए।। सीय बिलोकि धीरता भागी। रहे कहावत परम बिरागी।। लीन्हि राँय उर लाइ जानकी। मिटी महामरजाद ग्यान की।। समुझावत सब सचिव सयाने। कीन्ह बिचारु न अवसर जाने।। बारहिं बार सुता उर लाई। सजि सुंदर पालकीं मगाई।।
जानकी ने तोता और मैना पाल के सिखाए थे। सोने के पिंजरे में रखे थे। वो अब चिल्ला रहे थे, कहाँ गई विदेह की बेटी? सुन के कोई भी शांत नहीं रह पाया। चिड़िया और हिरन भी परेशान थे। तो इंसान का हाल कैसा होगा? फिर जनक अपने रिश्तेदारों के साथ आया। आँखों में आँसू आ गए। सीता को देख के वो अपने आप को संभाल नहीं पाया। राजा ने जानकी को सीने से लगा लिया। राजा होने का सब भूल गया। सब समझाने वाले समझाते रहे, पर वो किसी की बात नहीं माना। बार-बार बेटी को सीने से लगाता रहा। फिर एक सुंदर डोली मंगवाई।
Verse 713 (दोहा/सोरठा)
प्रेमबिबस परिवारु सबु जानि सुलगन नरेस। कुँअरि चढ़ाई पालकिन्ह सुमिरे सिद्धि गनेस।।338।।
पूरा परिवार प्यार में डूबा हुआ था। राजा ने जान के भी बेटी को डोली में बिठाया। और गणेश जी को याद किया कि सब कुछ अच्छे से हो जाए।
Verse 714 (चौपाई)
बहुबिधि भूप सुता समुझाई। नारिधरमु कुलरीति सिखाई।। दासीं दास दिए बहुतेरे। सुचि सेवक जे प्रिय सिय केरे।। सीय चलत ब्याकुल पुरबासी। होहिं सगुन सुभ मंगल रासी।। भूसुर सचिव समेत समाजा। संग चले पहुँचावन राजा।। समय बिलोकि बाजने बाजे। रथ गज बाजि बरातिन्ह साजे।। दसरथ बिप्र बोलि सब लीन्हे। दान मान परिपूरन कीन्हे।। चरन सरोज धूरि धरि सीसा। मुदित महीपति पाइ असीसा।। सुमिरि गजाननु कीन्ह पयाना। मंगलमूल सगुन भए नाना।।
राजा ने बेटी को बहुत समझाया। और बताया कि ससुराल में कैसे रहना है। बहुत सारे नौकर और दासी दिए। जो सीता के काम आएँ। जब सीता निकली तो शहर के लोग भी उदास हो गए। अच्छे शगुन हुए। पंडित, मंत्री, और सब लोग राजा के साथ चले गए। ढोल बजाए गए। रथ, हाथी, घोड़े, सब सजाए गए। दशरथ ने सब पंडित को बुला के दान दिया। राजा ने पैर छू के आशीर्वाद लिया। गणेश जी को याद किया और निकले। बहुत अच्छे शगुन हुए।
Verse 715 (दोहा/सोरठा)
सुर प्रसून बरषहि हरषि करहिं अपछरा गान। चले अवधपति अवधपुर मुदित बजाइ निसान।।339।।
देवी-देवता खुशी में फूल बरसा रहे थे। अप्सरा गाना गा रही थीं। अयोध्या के राजा खुशी से अयोध्या के लिए निकले। ढोल बज रहे थे।
परम्परा में विवाहोत्तर मंगल-प्रसंग (दान, गुरु-पूजन, अतिथि-सत्कार, विदाई) का पाठ ‘गृहस्थ-धर्म की शुद्धि’, पारिवारिक सौहार्द, कन्या/विवाह-संबन्धी मंगल, तथा ‘विरह-भक्ति’ के संस्कार हेतु फलदायी माना जाता है—विशेषतः ‘नित नूतन मंगल’ भाव से मन में सात्त्विक आनन्द स्थिर होता है।
परम्परागत मानस-पाठ में इस प्रकार के मंगल-प्रसंगों पर अनेक पाठ-परम्पराएँ ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ अथवा ‘सियाराममय सब जग जानी’ जैसे जप-सम्पुट जोड़ती हैं; कुछ परम्पराएँ ‘राम नाम’ (एकाक्षरी/द्व्यक्षरी) को ही सार्वभौम सम्पुट मानती हैं।
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.
Read Ramcharitmanas in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.