सोपान-प्रवेश: ‘भक्ति का जन्म’ और ‘सगुण-साकार के सौंदर्य में चित्त-स्थापन’। बालकाण्ड मन को कथा-श्रवण योग्य बनाता है—नाम, रूप, गुण, लीला के माध्यम से चित्त की मलिनता घटाकर उसे मंगल-लग्न (अनुकूल काल) की तरह ‘अनुकूल-भाव’ में स्थिर करता है। प्रस्तुत खंड में विवाह-उत्सव का सामुदायिक आनंद ‘सत्संग’ का रूप लेता है: राम-रूप-दर्शन ही मोक्ष-सीढ़ी का प्रथम दृढ़ पायदान है।
यह खंड ‘भक्ति का जन्म’ को सामाजिक उत्सव के माध्यम से दिखाता है: विवाह-बरात का बाह्य शृंगार अंततः अंतःकरण के ‘भक्ति-आनंद’ में रूपांतरित होता है। ‘जनक सुकृत मूरति बैदेही’—सीता को पुण्य का साकार फल बताकर तुलसी यह संकेत देते हैं कि ईश्वर-समागम केवल भाग्य नहीं, दीर्घकालीन सुकृत और शुद्ध चित्त की परिपक्वता है। ‘दसरथ सुकृत रामु धरें देही’—राम का देह-धारण भी भक्त-समाज के पुण्य-संचय से जुड़ा दिखता है: ईश्वर की लीला लोक-कल्याण हेतु ‘अनुकूल-काल’ में प्रकट होती है। नारियों का ‘लोचन-लाभ’ प्रतीक है कि दर्शन ही मोक्ष-सीढ़ी का प्रथम दृढ़ पायदान है—रूप का ध्यान चित्त को एकाग्र करता है और वही एकाग्रता नाम-स्मरण की भूमि बनती है (निर्गुण-सगुण-संयोग: रूप-ध्यान से नाम-ध्यान तक)। देव-समाज का विस्मय इस सौंदर्य को ‘अलौकिक’ ठहराता है—यह केवल राजसी विवाह नहीं, सगुण ब्रह्म का मंगल-प्राकट्य है।
चौपाई 310.1-4
जनक सुकृत मूरति बैदेही।दसरथ सुकृत रामु धरें देही।।
इन्ह सम काँहु न सिव अवराधे।काहिं न इन्ह समान फल लाधे।।
इन्ह सम कोउ न भयउ जग माहीं।है नहिं कतहूँ होनेउ नाहीं।।
हम सब सकल सुकृत कै रासी।भए जग जनमि जनकपुर बासी।।
जिन्ह जानकी राम छबि देखी।को सुकृती हम सरिस बिसेषी।।
पुनि देखब रघुबीर बिआहू।लेब भली बिधि लोचन लाहू।।
कहहिं परसपर कोकिलबयनीं।एहि बिआहँ बड़ लाभु सुनयनीं।।
बड़ें भाग बिधि बात बनाई।नयन अतिथि होइहहिं दोउ भाई।।
janaka sukṛta mūrati baidehī |dasaratha sukṛta rāmu dhareṁ dehī ||
inha sama kā̃hu na siva avarādhe |kāhiṁ na inha samāna phala lādhe ||
inha sama kou na bhayau jaga māhīṁ |hai nahiṁ katahū̃ honeu nāhīṁ ||
hama saba sakala sukṛta kai rāsī |bhae jaga janami janakapura bāsī ||
jinha jānakī rāma chabi dekhī |ko sukṛtī hama sarisa biseṣī ||
puni dekhaba raghubīra biāhū |leba bhalī bidhi locana lāhū ||
kahahiṁ parasapara kokilabayanīṁ |ehi biāhã baṛa lābhu sunayanīṁ ||
baṛeṁ bhāga bidhi bāta banāī |nayana atithi hoihahiṁ dou bhāī ||
सीता ही तो जनक के सारे पुण्य की रूप में है, और राम ही दशरथ के पुण्य की रूप में है जो शरीर लेके आए हैं। इन दोनों जैसा शिव की पूजा किसी ने नहीं की, और इन जैसा फल किसी ने नहीं पाया। इनके जैसा कोई इस दुनिया में पैदा नहीं हुआ, अभी कहीं नहीं है, और आगे भी कभी नहीं होगा। हम सब लोग बहुत पुण्य वाले हैं, क्योंकि हम जनकपुर में पैदा होके रहने वाले बन गए। जानकी और राम की सुंदरता हमने अपनी आँखों से देख ली, अब हमसे ज्यादा पुण्य वाला और कोई नहीं मिल सकता। अब हम रघुबीर की शादी भी देखेंगे, और अपनी आँखों का पूरा पैसा वसूल लेंगे। कोयल जैसी मीठी आवाज वाली औरतें एक दूसरे से कह रही हैं, अरी सुंदर आँखों वाली, इस शादी में हमें बहुत बड़ा फायदा मिल रहा है। बहुत बड़े भाग्यों से ही विधाता ने ये बात बनायी है, और ये दोनों भाई हमारी आँखों के मेहमान बनेंगे।
दोहा 310
बारहिं बार सनेह बस जनक बोलाउब सीय।लेन आइहहिं बंधु दोउ कोटि काम कमनीय।।310।।
bārahiṁ bāra saneha basa janaka bolāuba sīya |lena āihahiṁ baṁdhu dou koṭi kāma kamanīya ||310||
जनक बार बार प्यार से सीता को बुलायेंगे, और दोनों भाई, जिमे से हर एक लाखों कामदेव जितना सुंदर है, उसे लेने आयेंगे।
चौपाई 311.1-4
बिबिध भाँति होइहि पहुनाई।प्रिय न काहि अस सासुर माई।।
तब तब राम लखनहि निहारी।होइहहिं सब पुर लोग सुखारी।।
सखि जस राम लखनकर जोटा।तैसेइ भूप संग दुइ ढोटा।।
स्याम गौर सब अंग सुहाए।ते सब कहहिं देखि जे आए।।
कहा एक मैं आजु निहारे।जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे।।
भरतु रामही की अनुहारी।सहसा लखि न सकहिं नर नारी।।
लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा।नख सिख ते सब अंग अनूपा।।
मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं।उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं।।
bibidha bhā̃ti hoihi pahunāī |priya na kāhi asa sāsura māī ||
taba taba rāma lakhanahi nihārī |hoihahiṁ saba pura loga sukhārī ||
sakhi jasa rāma lakhanakara joṭā |taisei bhūpa saṁga dui ḍhoṭā ||
syāma gaura saba aṁga suhāe |te saba kahahiṁ dekhi je āe ||
kahā eka maiṁ āju nihāre |janu biraṁci nija hātha sãvāre ||
bharatu rāmahī kī anuhārī |sahasā lakhi na sakahiṁ nara nārī ||
lakhanu satrusūdanu ekarūpā |nakha sikha te saba aṁga anūpā ||
mana bhāvahiṁ mukha barani na jāhīṁ |upamā kahũ tribhuvana kou nāhīṁ ||
ससुराल में तरह तरह की मेहमान नवाजी होगी। ऐसे ससुराल को कौन नहीं चाहेगा, प्यारी माँ? फिर जब भी शहर के लोग राम और लक्ष्मन को देखेंगे, सब खुश हो जाएँगे। सहेली, जैसे राम और लक्ष्मन एक जोड़ी हैं, वैसे ही राजा के साथ वाले दो लड़के भी हैं। एक का रंग सांवला है और एक गोरा है, सब अंग सुंदर हैं। जो भी देखने आए हैं, सब यही कहते हैं। एक औरत बोली, मैंने आज उन्हें देखा। ऐसा लगा जैसे ब्रह्मा ने अपने हाथों से उन्हें बनाया हो। भरत बिलकुल राम जैसा है। आदमी और औरत पहली नज़र में दोनों को अलग नहीं पहचान सकते। लक्ष्मन और शत्रुघ्न भी एक जैसे हैं। नाखुन से सिर तक सब अंग सुंदर हैं, कोई दूसरा जैसा नहीं। मन खुश हो जाता है, उनकी सुंदरता लफज़ों में नहीं बताई जा सकती। तीन लोक में उनका कोई तक्कर नहीं।
छंद 311
उपमा न कोउ कह दास तुलसी कतहुँ कबि कोबिद कहैं।बल बिनय बिद्या सील सोभा सिंधु इन्ह से एइ अहैं।।
पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन सुनावहीं।ब्याहिअहुँ चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावहीं।।
upamā na kou kaha dāsa tulasī katahũ kabi kobida kahaiṁ |bala binaya bidyā sīla sobhā siṁdhu inha se ei ahaiṁ ||
pura nāri sakala pasāri aṁcala bidhihi bacana sunāvahīṁ |byāhiahũ cāriu bhāi ehiṁ pura hama sumaṁgala gāvahīṁ ||
तुलसीदास कहते हैं कि इन चारों की कोई तुलना कहीं नहीं मिलेगी, चाहे कवि और पंडित कितना भी ढूंढ ले। बल, विनय, विद्या, अच्छाई और खूबसूरती में ये चार सागर हैं, और इनके जैसा कोई और नहीं, सिर्फ ये खुद अपने बराबर हैं। शहर की सारी औरतें अपना आंचल फैला कर ब्रह्मा से ये कहती हैं: चारों भाइयों की शादी इसी शहर में हो, और हम मंगल गीत गाएं।
सोरठा 311
कहहिं परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक तन।सखि सबु करब पुरारि पुन्य पयोनिधि भूप दोउ।।311।।
kahahiṁ paraspara nāri bāri bilocana pulaka tana |sakhi sabu karaba purāri punya payonidhi bhūpa dou ||311||
औरत एक दूसरे से बात कर रही थी, उनकी आँखों में आँसू थे और बॉडी खुशी से सिहर रही थी। उन्होंने कहा, सहेलियो, दोनों राजा बहुत ज्यादा पुण्य के समंदर है, और उसी पुण्य से शिव जी यह सब कुछ पूरा करेंगे।
चौपाई 312.1-4
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं।आनँद उमगि उमगि उर भरहीं।।
जे नृप सीय स्वयंबर आए।देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए।।
कहत राम जसु बिसद बिसाला।निज निज भवन गए महिपाला।।
गए बीति कुछ दिन एहि भाँती।प्रमुदित पुरजन सकल बराती।।
मंगल मूल लगन दिनु आवा।हिम रितु अगहनु मासु सुहावा।।
ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू।लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू।।
पठै दीन्हि नारद सन सोई।गनी जनक के गनकन्ह जोई।।
सुनी सकल लोगन्ह यह बाता।कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता।।
ehi bidhi sakala manoratha karahīṁ |ānãda umagi umagi ura bharahīṁ ||
je nṛpa sīya svayaṁbara āe |dekhi baṁdhu saba tinha sukha pāe ||
kahata rāma jasu bisada bisālā |nija nija bhavana gae mahipālā ||
gae bīti kucha dina ehi bhā̃tī |pramudita purajana sakala barātī ||
maṁgala mūla lagana dinu āvā |hima ritu agahanu māsu suhāvā ||
graha tithi nakhatu jogu bara bārū |lagana sodhi bidhi kīnha bicārū ||
paṭhai dīnhi nārada sana soī |ganī janaka ke ganakanha joī ||
sunī sakala loganha yaha bātā |kahahiṁ jotiṣī āhiṁ bidhātā ||
सब अपने मन की इच्छा पूरी करते रहे, और खुशी बार बार उभर के दिल भर देती थी। जो राजा सीता के स्वयंवर में आए थे, उन सब ने भाइयों को देख खुश हो गए। राम की पाक और दूर तक फैली कीर्ति गाते हुए, सब राजा अपने अपने घर चले गए। कुछ दिन ऐसे ही बीत गए, शहर के लोग और सब बराती खुश थे। फिर शादी का दिन आया, जो सब मंगल का मूल है, सर्दी के मौसम में, अगहन महीने का सुहाना वक्त। ब्रह्मा ने ग्रह, तिथि, नक्षत्र, योग और दिन देख कर लगन तय की। उसी हिसाब को नारद के ज़रिए भेजा, और वही हिसाब जनक के ज्योतिशियों ने भी निकाला था। सब लोगों ने ये बात सुनी तो बोले, ये ज्योतिशी तो खुद ब्रह्मा हैं।
दोहा 312
धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल।बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकुल।।312।।
dhenudhūri belā bimala sakala sumaṁgala mūla |bipranha kaheu bideha sana jāni saguna anukula ||312||
जब गायीं घर आती हैं तोह धूल उड़ती है। वोह वक्त साफ़ था और हर अच्छी चीज़ का आधार था। रिशियों ने देखा कि सारे शगुन अच्छे हैं, तोह उन्होंने राजा जनक को बताया कि अब वक्त आ गया है।
चौपाई 313.1-4
उपरोहितहि कहेउ नरनाहा।अब बिलंब कर कारनु काहा।।
सतानंद तब सचिव बोलाए।मंगल सकल साजि सब ल्याए।।
संख निसान पनव बहु बाजे।मंगल कलस सगुन सुभ साजे।।
सुभग सुआसिनि गावहिं गीता।करहिं बेद धुनि बिप्र पुनीता।।
लेन चले सादर एहि भाँती।गए जहाँ जनवास बराती।।
कोसलपति कर देखि समाजू।अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू।।
भयउ समउ अब धारिअ पाऊ।यह सुनि परा निसानहिं घाऊ।।
गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा।चले संग मुनि साधु समाजा।।
uparohitahi kaheu naranāhā |aba bilaṁba kara kāranu kāhā ||
satānaṁda taba saciva bolāe |maṁgala sakala sāji saba lyāe ||
saṁkha nisāna panava bahu bāje |maṁgala kalasa saguna subha sāje ||
subhaga suāsini gāvahiṁ gītā |karahiṁ beda dhuni bipra punītā ||
lena cale sādara ehi bhā̃tī |gae jahā̃ janavāsa barātī ||
kosalapati kara dekhi samājū |ati laghu lāga tinhahi surarājū ||
bhayau samau aba dhāria pāū |yaha suni parā nisānahiṁ ghāū ||
gurahi pūchi kari kula bidhi rājā |cale saṁga muni sādhu samājā ||
राजा ने फैमिली पंडित से पूछा, अब देरी करने की क्या जरूरत है? फिर शतानंद ने मंत्रियों को बुलाया, और उन्होंने सारे मंगल सामग्री तैयार करके ले आए। शंख, ढोल, नगाड़े बहुत तरह के बजाए, और मंगल के कलश और शुभ सगुन सजाए गए। सुंदर सुहागन औरतें गीत गाने लगी, और पवित्र ब्राह्मणों ने वेद पढ़ने शुरू किए। इस तरह इज्जत के साथ स्वागत करने के लिए निकले, और वहां पहुंच गए जहां बराती रुके थे। कोसले के राजा के झगड़े को देख कर, उन्हें तोह देवताओं के राजा से भी छोटा लगने लगा। वक्त आ गया है, अब पैर आगे बढ़ाओ। यह सुनकर ढोल बजा दिए गए। गुरु से आज्ञा ले कर और कुल के रिवाज पूरे करके राजा चल दिए, रिशि और साधु उनके साथ थे।
दोहा 313
भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि।लगे सराहन सहस मुख जानि जनम निज बादि।।313।।
bhāgya bibhava avadhesa kara dekhi deva brahmādi |lage sarāhana sahasa mukha jāni janama nija bādi ||313||
देवता और ब्रह्मा आदि सब ने देखा कि अवध के राजा की किस्मत और चमक कितनी बड़ी है। फिर हजारों मुँह से उनकी तारीफ करने लगे, और सोचने लगे कि अपना जनम ही बेकार गुजर गया।
चौपाई 314.1-4
सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना।बरषहिं सुमन बजाइ निसाना।।
सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा।चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा।।
प्रेम पुलक तन हृदयँ उछाहू।चले बिलोकन राम बिआहू।।
देखि जनकपुरु सुर अनुरागे।निज निज लोक सबहिं लघु लागे।।
चितवहिं चकित बिचित्र बिताना।रचना सकल अलौकिक नाना।।
नगर नारि नर रूप निधाना।सुघर सुधरम सुसील सुजाना।।
तिन्हहि देखि सब सुर सुरनारीं।भए नखत जनु बिधु उजिआरीं।।
बिधिहि भयह आचरजु बिसेषी।निज करनी कछु कतहुँ न देखी।।
suranha sumaṁgala avasaru jānā |baraṣahiṁ sumana bajāi nisānā ||
siva brahmādika bibudha barūthā |caṛhe bimānanhi nānā jūthā ||
prema pulaka tana hṛdayã uchāhū |cale bilokana rāma biāhū ||
dekhi janakapuru sura anurāge |nija nija loka sabahiṁ laghu lāge ||
citavahiṁ cakita bicitra bitānā |racanā sakala alaukika nānā ||
nagara nāri nara rūpa nidhānā |sughara sudharama susīla sujānā ||
tinhahi dekhi saba sura suranārīṁ |bhae nakhata janu bidhu ujiārīṁ ||
bidhihi bhayaha ācaraju biseṣī |nija karanī kachu katahũ na dekhī ||
देवता समझ गए ये बहुत अच्छा वक्त है। तो ढोल बजाए और ऊपर से फूल बरसाए। शिव, ब्रह्मा और बाकी सब देवता अपनी अपनी उड़ान वाली गाड़िया में बैठ कर, कई ग्रुप में चल पड़े। बदन में प्रेम का झूम था और दिल खुश हो रहा था। राम की शादी देखने निकल पड़े। जनक की शहर देख कर देवता भावुक हो गए। अपने अपने लोक उन्हें छोटे लगने लगे। हैरत से वो देख रहे थे अजीब छत और सजाई चीज़ें। सब कुछ दुनिया से अलग था। शहर की औरत और मर्द सब रूप के खजाने थे। सुंदर, धरम वाले, अच्छे कैरेक्टर वाले और समझदार। उन्हें देख कर सब देवता और देवियां ऐसे हो गए जैसे चाँद निकलने पर तारे हो। ब्रह्मा सबसे ज्यादा हैरान था। उसने कहीं भी अपने बनाए हुए काम का निशान नही देखा।
दोहा 314
सिवँ समुझाए देव सब जनि आचरज भुलाहु।हृदयँ बिचारहु धीर धरि सिय रघुबीर बिआहु।।314।।
sivã samujhāe deva saba jani ācaraja bhulāhu |hṛdayã bicārahu dhīra dhari siya raghubīra biāhu ||314||
शिव ने सारे देवताओं को समझाया। हैरानी मत करो। हिम्मत रखो और दिल में सोचो कि यह सीता और रघु वंश के वीर राम की शादी है।
चौपाई 315.1-4
जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं।सकल अमंगल मूल नसाहीं।।
करतल होहिं पदारथ चारी।तेइ सिय रामु कहेउ कामारी।।
एहि बिधि संभु सुरन्ह समुझावा।पुनि आगें बर बसह चलावा।।
देवन्ह देखे दसरथु जाता।महामोद मन पुलकित गाता।।
साधु समाज संग महिदेवा।जनु तनु धरें करहिं सुख सेवा।।
सोहत साथ सुभग सुत चारी।जनु अपबरग सकल तनुधारी।।
मरकत कनक बरन बर जोरी।देखि सुरन्ह भै प्रीति न थोरी।।
पुनि रामहि बिलोकि हियँ हरषे।नृपहि सराहि सुमन तिन्ह बरषे।।
jinha kara nāmu leta jaga māhīṁ |sakala amaṁgala mūla nasāhīṁ ||
karatala hohiṁ padāratha cārī |tei siya rāmu kaheu kāmārī ||
ehi bidhi saṁbhu suranha samujhāvā |puni āgeṁ bara basaha calāvā ||
devanha dekhe dasarathu jātā |mahāmoda mana pulakita gātā ||
sādhu samāja saṁga mahidevā |janu tanu dhareṁ karahiṁ sukha sevā ||
sohata sātha subhaga suta cārī |janu apabaraga sakala tanudhārī ||
marakata kanaka barana bara jorī |dekhi suranha bhai prīti na thorī ||
puni rāmahi biloki hiyã haraṣe |nṛpahi sarāhi sumana tinha baraṣe ||
जिनके नाम जग में लिए जाते हैं, वो हर बुरी चीज की जड़ ही मिटा देते हैं। और जिनके हाथ में ज़िंदगी के चार बड़े मक़सद हैं। काम को नष्ट करने वाले शिव ने कहा, सीता और राम वैसे ही हैं। इस तरह शिव ने देवताओं को समझाया। फिर आगे अपने बैल को चलाया। देवताओं ने देखा दशरथ आ रहा है। उसके मन में बहुत खुशी थी और शरीर खुशी से झूम रहा था। उसके साथ साधुओं और ब्राह्मिनों का जत्था था। ऐसा लगता था जैसे खुशी से उसकी सेवा करने के लिए शरीर लिया हो। उसके पास उसके चार खूबसूरत बेटे चमक रहे थे। जैसे मुक्ति के चार रूप सब ने शरीर ले लिया हो। उस जोड़ी को देख कर, एक हरा और एक सुनहरा, देवताओं के दिल में बहुत प्यार आया। फिर राम को देख कर उनके दिल बहुत खुश हुए। उन्होंने राजा की तारीफ की और फूल बरसाए।
दोहा 315
राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि।पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि।।315।।
rāma rūpu nakha sikha subhaga bārahiṁ bāra nihāri |pulaka gāta locana sajala umā sameta purāri ||315||
शिव और पार्वती बार बार राम के रूप को देख रहे थे, उनके पैर के नखों से लेकर सिर के चोटे तक सब कुछ खूबसूरत था, शिव का शरीर खिलखिला उठा और उनकी आँखों में आँसू आ गए।
चौपाई 316.1-4
केकि कंठ दुति स्यामल अंगा।तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा।।
ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए।मंगल सब सब भाँति सुहाए।।
सरद बिमल बिधु बदनु सुहावन।नयन नवल राजीव लजावन।।
सकल अलौकिक सुंदरताई।कहि न जाइ मनहीं मन भाई।।
बंधु मनोहर सोहहिं संगा।जात नचावत चपल तुरंगा।।
राजकुअँर बर बाजि देखावहिं।बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं।।
जेहि तुरंग पर रामु बिराजे।गति बिलोकि खगनायकु लाजे।।
कहि न जाइ सब भाँति सुहावा।बाजि बेषु जनु काम बनावा।।
keki kaṁṭha duti syāmala aṁgā |taṛita biniṁdaka basana suraṁgā ||
byāha bibhūṣana bibidha banāe |maṁgala saba saba bhā̃ti suhāe ||
sarada bimala bidhu badanu suhāvana |nayana navala rājīva lajāvana ||
sakala alaukika suṁdaratāī |kahi na jāi manahīṁ mana bhāī ||
baṁdhu manohara sohahiṁ saṁgā |jāta nacāvata capala turaṁgā ||
rājakuãra bara bāji dekhāvahiṁ |baṁsa prasaṁsaka birida sunāvahiṁ ||
jehi turaṁga para rāmu birāje |gati biloki khaganāyaku lāje ||
kahi na jāi saba bhā̃ti suhāvā |bāji beṣu janu kāma banāvā ||
उसका काले बदन पर मोर की तरह चमक थी, और उसके खूबसूरत लाल कपड़े बिजली को भी पीछे छोड़ देते थे। उसने शादी के बहुत तरह के गहने पहने थे, सब शुभ थे और हर तरह से खूबसूरत लग रहे थे। उसका प्यारा चेहरा साफ मौसम के चाँद जैसा था, और उसके ताज़ा आँखों के सामने कमल भी शर्मिंदा हो जाए। उसकी खूबसूरती दुनिया से बाहर की थी, बयान नहीं हो सकती, और जो भी देखता उसके दिल को भा जाता। उसके प्यारे भाई उसके साथ चमक रहे थे, जब वो अपने चंचल घोड़े नचाते हुए जा रहे थे। राजकुमार अपने अच्छे घोड़ों की चाल दिखा रहे थे, और खानदान के गाने वाले उसकी तारीफ गाते जा रहे थे। जिस घोड़े पर राम बैठे थे, उसकी चाल देखकर खुद गरुड़ भी शर्मिंदा हो जाता। हर तरह से उसकी खूबसूरती बयान नहीं हो सकती, जैसे खुद काम देव घोड़ा बन गया हो।
छंद 316
जनु बाजि बेषु बनाइ मनसिजु राम हित अति सोहई।आपनें बय बल रूप गुन गति सकल भुवन बिमोहई।।
जगमगत जीनु जराव जोति सुमोति मनि मानिक लगे।किंकिनि ललाम लगामु ललित बिलोकि सुर नर मुनि ठगे।।
janu bāji beṣu banāi manasiju rāma hita ati sohaī |āpaneṁ baya bala rūpa guna gati sakala bhuvana bimohaī ||
jagamagata jīnu jarāva joti sumoti mani mānika lage |kiṁkini lalāma lagāmu lalita biloki sura nara muni ṭhage ||
लगता है जैसे प्यार के देवता ने राम के लिए घोड़ा बना लिया, और बहुत चमक रहा था। अपनी जवानी, ताकत, खूबसूरती, गुन और चाल से उसने सारी दुनिया को दीवाना कर दिया। नगीनों वाला ज़ाला चमक रहा था, जिसमें अच्छे मोती, हीरे और लाल पत्थर लगाए गए थे। छोटे घंटे, सुंदर लगाम और प्यारा साज देखकर देवता, इंसान और रिशि सब दीवाने हो गए।
दोहा 316
प्रभु मनसहिं लयलीन मनु चलत बाजि छबि पाव।भूषित उड़गन तड़ित घनु जनु बर बरहि नचाव।।316।।
prabhu manasahiṁ layalīna manu calata bāji chabi pāva |bhūṣita uṛagana taṛita ghanu janu bara barahi nacāva ||316||
घोड़े का दिमाग अपने मालिक के दिमाग में ही घुला हुआ था। वो चलते हुए इतना सुंदर लग रहा था, जैसे तारों और बिजली से सजा हुआ बादल किसी खूबसूरत मूर को नाचा रहा हो।
चौपाई 317.1-4
जेहिं बर बाजि रामु असवारा।तेहि सारदउ न बरनै पारा।।
संकरु राम रूप अनुरागे।नयन पंचदस अति प्रिय लागे।।
हरि हित सहित रामु जब जोहे।रमा समेत रमापति मोहे।।
निरखि राम छबि बिधि हरषाने।आठइ नयन जानि पछिताने।।
सुर सेनप उर बहुत उछाहू।बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू।।
रामहि चितव सुरेस सुजाना।गौतम श्रापु परम हित माना।।
देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं।आजु पुरंदर सम कोउ नाहीं।।
मुदित देवगन रामहि देखी।नृपसमाज दुहुँ हरषु बिसेषी।।
jehiṁ bara bāji rāmu asavārā |tehi sāradau na baranai pārā ||
saṁkaru rāma rūpa anurāge |nayana paṁcadasa ati priya lāge ||
hari hita sahita rāmu jaba johe |ramā sameta ramāpati mohe ||
nirakhi rāma chabi bidhi haraṣāne |āṭhai nayana jāni pachitāne ||
sura senapa ura bahuta uchāhū |bidhi te ḍevaṛha locana lāhū ||
rāmahi citava suresa sujānā |gautama śrāpu parama hita mānā ||
deva sakala surapatihi sihāhīṁ |āju puraṁdara sama kou nāhīṁ ||
mudita devagana rāmahi dekhī |nṛpasamāja duhũ haraṣu biseṣī ||
जिस घोड़े पर राम सवार थे, उसकी खूबसूरती सरस्वती भी बता नहीं सकती थी। शिव को राम के रूप में बड़ा प्यार हो गया, और उनके पंद्रह आँखें उन्हें बहुत प्यारी लगी। जब हरि ने राम को प्यार से देखा, तो लक्ष्मी के स्वामी विष्णु, लक्ष्मी के साथ, मगन हो गए। राम की खूबसूरती देखकर ब्रह्मा खुश हुए, पर जब उन्हें पता चला कि उनके सिर्फ आठ आँखें हैं, तो उन्हें पछतावा हुआ। देवताओं के सेनापति कार्तिकेय के दिल में बहुत खुशी हुई, क्योंकि उनकी आँखें ब्रह्मा से आधी ज़्यादा थी। समझदार इंद्र, देवताओं के राजा, ने राम को देखा और गौतम का श्राप उन्हें बहुत बड़ा वरदान लगा। सारे देवता इंद्र से जले, और बोले, आज पुरंदर जैसा कोई नहीं है। सारे देवता राम को देखकर खुश हुए, और राजाओं की सभा में दोनों तरफ खास खुशी रही।
छंद 317
अति हरषु राजसमाज दुहु दिसि दुंदुभीं बाजहिं घनी।बरषहिं सुमन सुर हरषि कहि जय जयति जय रघुकुलमनी।।
एहि भाँति जानि बरात आवत बाजने बहु बाजहीं।रानि सुआसिनि बोलि परिछनि हेतु मंगल साजहीं।।
ati haraṣu rājasamāja duhu disi duṁdubhīṁ bājahiṁ ghanī |baraṣahiṁ sumana sura haraṣi kahi jaya jayati jaya raghukulamanī ||
ehi bhā̃ti jāni barāta āvata bājane bahu bājahīṁ |rāni suāsini boli parichani hetu maṁgala sājahīṁ ||
दोनो तरफ के राजा लोग बहुत खुश थे, और ढेर सारे ढोल बाजे. देवता खुश होकर ऊपर से फूल बरसा रहे थे और बोल रहे थे, जय जय जय, रघु कुल के हीरे को जय हो. रानी ने जान लिया कि बारात आ रही है, तोह बहुत सारे बाजा बज रहे थे. रानी ने उन सुहागन औरतों को बुलाया जिनका पति ज़िंदा थे, और उन्होने स्वागत के लिए मंगल की सारी चीज़ें तैयार की.
दोहा 317
सजि आरती अनेक बिधि मंगल सकल सँवारि।चलीं मुदित परिछनि करन गजगामिनि बर नारि।।317।।
saji āratī aneka bidhi maṁgala sakala sãvāri |calīṁ mudita parichani karana gajagāmini bara nāri ||317||
बहुत तरह से आरती की थाली सजाई, सब शुभ चीज़ें ठीक से लगाई। फिर अच्छी घर की औरतें, जिनका चलने का तरंग हाथी जैसा था, खुश होकर स्वागत की रसम करने के लिए निकल पड़ी।
चौपाई 318.1-4
बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि।सब निज तन छबि रति मदु मोचनि।।
पहिरें बरन बरन बर चीरा।सकल बिभूषन सजें सरीरा।।
सकल सुमंगल अंग बनाएँ।करहिं गान कलकंठि लजाएँ।।
कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं।चालि बिलोकि काम गज लाजहिं।।
बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा।नभ अरु नगर सुमंगलचारा।।
सची सारदा रमा भवानी।जे सुरतिय सुचि सहज सयानी।।
कपट नारि बर बेष बनाई।मिलीं सकल रनिवासहिं जाई।।
करहिं गान कल मंगल बानीं।हरष बिबस सब काहुँ न जानी।।
bidhubadanīṁ saba saba mṛgalocani |saba nija tana chabi rati madu mocani ||
pahireṁ barana barana bara cīrā |sakala bibhūṣana sajeṁ sarīrā ||
sakala sumaṁgala aṁga banāẽ |karahiṁ gāna kalakaṁṭhi lajāẽ ||
kaṁkana kiṁkini nūpura bājahiṁ |cāli biloki kāma gaja lājahiṁ ||
bājahiṁ bājane bibidha prakārā |nabha aru nagara sumaṁgalacārā ||
sacī sāradā ramā bhavānī |je suratiya suci sahaja sayānī ||
kapaṭa nāri bara beṣa banāī |milīṁ sakala ranivāsahiṁ jāī ||
karahiṁ gāna kala maṁgala bānīṁ |haraṣa bibasa saba kāhũ na jānī ||
सब के चेहरे चाँद जैसे थे और आँखें हिरन जैसी। अपने-अपने बदन की खूबसूरती से हर एक ने रति का गर्व तोड़ दिया। उन्होंने हर रंग के खूबसूरत कपड़े पहने, और उनके बदन पर हर तरह के गहने सजाए थे। उनके अंग-अंग मंगल सजावट से खूबसूरत बनाए गए, और उन्होंने ऐसी आवाज़ में गाना गाया कि कोयल भी शर्मा जाए। उनके कंगन, कमर की घुंगरू और पायल बज रहे थे, और उनकी चल देखकर काम के हाथी शर्मा गए। बहुत तरह के बाजा बज रहे थे, और आसमान और शहर में मंगल उत्सव हो रहा था। शची, सारदा, रमा और भवानी, देवों की ये सच्ची और सहज समझदार स्त्रियाँ, चलाकी से खूबसूरत नारी का भेस बना कर, सब रानी महल की औरतों में मिल गईं। उन्होंने मीठी मंगल गीत गाए, और खुशी में इतने मगन थे कि किसी ने उन्हें पहचाना नहीं।
छंद 318
को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली।कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली।।
आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकल हियँ हरषित भई।अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई।।
ko jāna kehi ānaṁda basa saba brahmu bara parichana calī |kala gāna madhura nisāna baraṣahiṁ sumana sura sobhā bhalī ||
ānaṁdakaṁdu biloki dūlahu sakala hiyã haraṣita bhaī |aṁbhoja aṁbaka aṁbu umagi suaṁga pulakāvali chaī ||
कोई नहीं बता सकता कौन कौन था, और किस खुशी में सब चले, दूल्हे को स्वागत करने के लिए, जो खुद भगवान हैं। मीठे गाने थे, ढोल बज रहे, देवता फूल बरसा रहे, और सब कुछ बहुत सुंदर था। दूल्हे को देख कर, जो खुद खुशी का रूप हैं, सब के दिल खुश हो गए। कमल जैसी आँखों से आँसू बह निकले, और उनके सुंदर बदन पर रोमांच की लड़ी आ गई।
दोहा 318
जो सुख भा सिय मातु मन देखि राम बर बेषु।सो न सकहिं कहि कलप सत सहस सारदा सेषु।।318।।
jo sukha bhā siya mātu mana dekhi rāma bara beṣu |so na sakahiṁ kahi kalapa sata sahasa sāradā seṣu ||318||
सीता की माँ के मन में राम को दूल्हे के भेस में देख कर जो खुशी आई, वो खुशी किसी से भी नहीं बताई जा सकती। लाखों शारदा और शेष भी कई युगों तक कोशिश करें तो भी उस खुशी को लफ्जों में नहीं बता सकते।
चौपाई 319.1-4
नयन नीरु हटि मंगल जानी।परिछनि करहिं मुदित मन रानी।।
बेद बिहित अरु कुल आचारू।कीन्ह भली बिधि सब ब्यवहारू।।
पंच सबद धुनि मंगल गाना।पट पाँवड़े परहिं बिधि नाना।।
करि आरती अरघु तिन्ह दीन्हा।राम गमनु मंडप तब कीन्हा।।
दसरथु सहित समाज बिराजे।बिभव बिलोकि लोकपति लाजे।।
समयँ समयँ सुर बरषहिं फूला।सांति पढ़हिं महिसुर अनुकूला।।
नभ अरु नगर कोलाहल होई।आपनि पर कछु सुनइ न कोई।।
एहि बिधि रामु मंडपहिं आए।अरघु देइ आसन बैठाए।।
nayana nīru haṭi maṁgala jānī |parichani karahiṁ mudita mana rānī ||
beda bihita aru kula ācārū |kīnha bhalī bidhi saba byavahārū ||
paṁca sabada dhuni maṁgala gānā |paṭa pā̃vaṛe parahiṁ bidhi nānā ||
kari āratī araghu tinha dīnhā |rāma gamanu maṁḍapa taba kīnhā ||
dasarathu sahita samāja birāje |bibhava biloki lokapati lāje ||
samayã samayã sura baraṣahiṁ phūlā |sāṁti paṛhahiṁ mahisura anukūlā ||
nabha aru nagara kolāhala hoī |āpani para kachu sunai na koī ||
ehi bidhi rāmu maṁḍapahiṁ āe |araghu dei āsana baiṭhāe ||
रानियों ने आँख के आँसू रोक लिए, क्योंकि समय अच्हा था, और खुश मन से स्वागत की रसम परिच्छन की। वेदों ने जो बताया है और परिवार की जो रिवाज थी, सब कुछ ठीक तरह से किया। पाँच साज बज रहे थे, अच्हे गाने गा रहे थे, और रास्ते पर तरह तरह के कपड़े और दरी बिछाई। रानियों ने आरती की और स्वागत का पानी दिया, फिर राम मंडप की तरफ चले गए। दसरथ अपने लोगों के साथ शंदार तरह से बैठे थे, और दुनिया के रक्षक उनकी शंदारती देख कर शर्मा गए। वक्त वक्त पर देवता फूल बरसा रहे थे, और अच्हे ब्राह्मण शांति के पाठ पढ़ रहे थे। आसमान और शहर में इतना शोर था कि किसी को अपनी या दूसरे की आवाज सुनाई नहीं देती थी। इस तरह राम मंडप में आए, उन्हें स्वागत का पानी दिया और सिंहासन पर बिठाया।
छंद 319
बैठारि आसन आरती करि निरखि बरु सुखु पावहीं।मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं।।
ब्रह्मादि सुरबर बिप्र बेष बनाइ कौतुक देखहीं।अवलोकि रघुकुल कमल रबि छबि सुफल जीवन लेखहीं।।
baiṭhāri āsana āratī kari nirakhi baru sukhu pāvahīṁ |mani basana bhūṣana bhūri vārahiṁ nāri maṁgala gāvahīṁ ||
brahmādi surabara bipra beṣa banāi kautuka dekhahīṁ |avaloki raghukula kamala rabi chabi suphala jīvana lekhahīṁ ||
राम को आसन पे बिठा कर आरती की, फिर उन्हें देख कर सबको बहुत खुशी मिली। औरतों ने उन्हें कितने ही नग, कपड़े और गेहने बरसाए, और मंगल के गाने गाए। ब्रह्मा और बाकी सारे भगवान, ब्राह्मण का भेस बनकर, ये सब तमाशा देख रहे थे। और रघु कुल के कमल के लिए राम रूप के सूरज को देख कर, उन्हें अपना जीवन सफल समझ लिया।
दोहा 319
नाऊ बारी भाट नट राम निछावरि पाइ।मुदित असीसहिं नाइ सिर हरषु न हृदयँ समाइ।।319।।
nāū bārī bhāṭa naṭa rāma nichāvari pāi |mudita asīsahiṁ nāi sira haraṣu na hṛdayã samāi ||319||
नाई, मशाल उठाने वाले, गाने वाले और नाचने वाले सब को राम के सम्मान में उपहार बाँट के मिला। सब खुशी से सिर झुका के उसको आशीर्वाद देते रहे, क्योंकि उनके दिल की खुशी दब ही नहीं पायी।
परंपरानुसार यह ‘विवाह-उत्सव/बरात-दर्शन’ खंड पढ़ने-सुनने से मंगल-बुद्धि, गृह-कलह-शमन, और ‘राम-रूप-स्मृति’ दृढ़ होती है। ‘जिन्ह कर नामु लेत…’ जैसी पंक्तियाँ नाम-स्मरण का फल—अमंगल-नाश—प्रत्यक्ष करती हैं; अतः इसे शुभ-कार्य, विवाह, गृह-प्रवेश, और सत्संग में मंगल-पाठ हेतु विशेष मानते हैं।
मंगल-प्रसंगों में प्रचलित समपुट: (1) ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (नाम-जप-समपुट), या (2) ‘सियावर रामचंद्र की जय’ को प्रत्येक दोहे/खंड के अंत में। कुछ परंपराओं में ‘राम रामेति रामेति…’ (विष्णु-सहस्रनाम-प्रसिद्ध) को भी समपुट रूप में जोड़ा जाता है।
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.