Opening the text
सोपान-प्रवेश: ‘भक्ति का जन्म’ और ‘सगुण-साकार के सौंदर्य में चित्त-स्थापन’। बालकाण्ड मन को कथा-श्रवण योग्य बनाता है—नाम, रूप, गुण, लीला के माध्यम से चित्त की मलिनता घटाकर उसे मंगल-लग्न (अनुकूल काल) की तरह ‘अनुकूल-भाव’ में स्थिर करता है। प्रस्तुत खंड में विवाह-उत्सव का सामुदायिक आनंद ‘सत्संग’ का रूप लेता है: राम-रूप-दर्शन ही मोक्ष-सीढ़ी का प्रथम दृढ़ पायदान है।
यह खंड ‘भक्ति का जन्म’ को सामाजिक उत्सव के माध्यम से दिखाता है: विवाह-बरात का बाह्य शृंगार अंततः अंतःकरण के ‘भक्ति-आनंद’ में रूपांतरित होता है। ‘जनक सुकृत मूरति बैदेही’—सीता को पुण्य का साकार फल बताकर तुलसी यह संकेत देते हैं कि ईश्वर-समागम केवल भाग्य नहीं, दीर्घकालीन सुकृत और शुद्ध चित्त की परिपक्वता है। ‘दसरथ सुकृत रामु धरें देही’—राम का देह-धारण भी भक्त-समाज के पुण्य-संचय से जुड़ा दिखता है: ईश्वर की लीला लोक-कल्याण हेतु ‘अनुकूल-काल’ में प्रकट होती है। नारियों का ‘लोचन-लाभ’ प्रतीक है कि दर्शन ही मोक्ष-सीढ़ी का प्रथम दृढ़ पायदान है—रूप का ध्यान चित्त को एकाग्र करता है और वही एकाग्रता नाम-स्मरण की भूमि बनती है (निर्गुण-सगुण-संयोग: रूप-ध्यान से नाम-ध्यान तक)। देव-समाज का विस्मय इस सौंदर्य को ‘अलौकिक’ ठहराता है—यह केवल राजसी विवाह नहीं, सगुण ब्रह्म का मंगल-प्राकट्य है।
Verse 642 (चौपाई)
जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही।। इन्ह सम काँहु न सिव अवराधे। काहिं न इन्ह समान फल लाधे।। इन्ह सम कोउ न भयउ जग माहीं। है नहिं कतहूँ होनेउ नाहीं।। हम सब सकल सुकृत कै रासी। भए जग जनमि जनकपुर बासी।। जिन्ह जानकी राम छबि देखी। को सुकृती हम सरिस बिसेषी।। पुनि देखब रघुबीर बिआहू। लेब भली बिधि लोचन लाहू।। कहहिं परसपर कोकिलबयनीं। एहि बिआहँ बड़ लाभु सुनयनीं।। बड़ें भाग बिधि बात बनाई। नयन अतिथि होइहहिं दोउ भाई।।
जनक में इतने अच्छे गुण हैं, सीता भी वैसी है। दशरथ भी वैसे ही अच्छे हैं, राम उनकी बॉडी में हैं। शिव भी इनके जैसा किसी को नहीं मानते। इतना अच्छा फल कहीं नहीं मिला। इतने अच्छे लोग दुनिया में कभी थे नहीं, अब नहीं, आगे भी नहीं होंगे। हम सब बहुत अच्छे करम करके जनम लिया है, इसलिए जनकपुर में रहते हैं। जिन्होंने राम और सीता को देखा है, वो हमसे ज़्यादा खुशनसीब कौन होगा? फिर से रघुवीर की शादी देखेंगे, आँखों को बहुत अच्छा लगेगा। औरतें एक दूसरे से बोलती हैं कि इस शादी में बहुत फायदा है। भगवान ने बहुत बड़ी बात बनाई है, आँखें दोनों भाइयों को देखेंगी।
Verse 643 (दोहा/सोरठा)
बारहिं बार सनेह बस जनक बोलाउब सीय। लेन आइहहिं बंधु दोउ कोटि काम कमनीय।।310।।
जनक ने प्यार में बारह बार सीता को बुलाया। दोनों भाई उसे लेने आएँगे, वो इतनी अच्छी है जैसे लाखों लोगों की ख्वाहिश पूरी हो।
Verse 644 (चौपाई)
बिबिध भाँति होइहि पहुनाई। प्रिय न काहि अस सासुर माई।। तब तब राम लखनहि निहारी। होइहहिं सब पुर लोग सुखारी।। सखि जस राम लखनकर जोटा। तैसेइ भूप संग दुइ ढोटा।। स्याम गौर सब अंग सुहाए। ते सब कहहिं देखि जे आए।। कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे।। भरतु रामही की अनुहारी। सहसा लखि न सकहिं नर नारी।। लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा। नख सिख ते सब अंग अनूपा।। मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं।।
उनका स्वागत बहुत तरीके से होगा। इतना अच्छा दामाद और बेटी किसी को कभी मिली है। लोग बार-बार राम और लक्ष्मण को देखते रहे, शहर के सब लोग खुश थे। राम और लक्ष्मण साथ थे, राजा भी दोनों युवा राजकुमार के साथ था। एक का रंग साँवला, एक का गोरा, दोनों बहुत अच्छे लग रहे थे। जो लोग आए और देखा, वो सब यही बोल रहे थे। किसी ने कहा कि आज मैंने क्या देखा, जैसे भगवान ने खुद अपने हाथ से बनाया हो। भरत बिल्कुल राम जैसा दिखता था, लोगों को पहले नहीं समझ आया कि कौन कौन है। लक्ष्मण और शत्रुघ्न भी एक जैसे थे, सिर से पाँव तक सब अच्छे थे। दिल खुश हो जाता है पर बातों में नहीं बता सकते, दुनिया में इनका कोई कम्पेरिज़न नहीं है।
Verse 645 (छंद)
उपमा न कोउ कह दास तुलसी कतहुँ कबि कोबिद कहैं। बल बिनय बिद्या सील सोभा सिंधु इन्ह से एइ अहैं।। पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन सुनावहीं।। ब्याहिअहुँ चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावहीं।।
तुलसीदास कहते हैं कि कोई कवि या पंडित इनका कम्पेरिज़न नहीं दे सकता। इनमें ताकत, विनम्रता, विद्या, अच्छा चरित्र और शान सब है। शहर की औरतें अपनी साड़ी फैला के भगवान से बोलती हैं कि चारों भाइयों की शादी इस शहर में करो, हम मंगल गाएँगे।
Verse 646 (दोहा/सोरठा)
कहहिं परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक तन। सखि सबु करब पुरारि पुन्य पयोनिधि भूप दोउ।।311।।
औरते आपस में बात कर रही थीं, उनकी आँखों में आँसू थे, दिल खुश हो रहा था। सारी सहेलियाँ बोली, "हम शहर को सुंदर बना देंगे। सागर और राजा दोनों के लिए यह अच्छा है।"
Verse 647 (चौपाई)
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनँद उमगि उमगि उर भरहीं।। जे नृप सीय स्वयंबर आए। देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए।। कहत राम जसु बिसद बिसाला। निज निज भवन गए महिपाला।। गए बीति कुछ दिन एहि भाँती। प्रमुदित पुरजन सकल बराती।। मंगल मूल लगन दिनु आवा। हिम रितु अगहनु मासु सुहावा।। ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू। लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू।। पठै दीन्हि नारद सन सोई। गनी जनक के गनकन्ह जोई।। सुनी सकल लोगन्ह यह बाता। कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता।।
सब लोगों के दिल की बात पूरी हो गई, सब खुश थे। जो राजा सीता के स्वयंवर आए थे, वो सब भाइयों को देख के खुश हो गए। सबने राम की तारीफ की और अपने-अपने घर चले गए। कुछ दिन ऐसे ही बीत गए, शहर के लोग और बारात वाले सब खुश थे। शादी का अच्छा दिन आ गया, मार्गशीर्ष महीना, सर्दियों का टाइम। ब्रह्मा ने ग्रह, तिथि, नक्षत्र सब देखे, अच्छा मुहूर्त चूज़ किया। जनक ने एस्ट्रोलॉजर्स से बात की, नारद को भेजा। सब लोगों ने यह सुना, एस्ट्रोलॉजर्स बोले, "ब्रह्मा खुद यहाँ है।"
Verse 648 (दोहा/सोरठा)
धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल। बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकुल।।312।।
गायें घूम रही थीं, वक्त साफ था, सब अच्छा लग रहा था। विदेह के राजा ने ब्राह्मिन्स से कहा, अब सब ठीक है, शुभ शुरू करो।
Verse 649 (चौपाई)
उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंब कर कारनु काहा।। सतानंद तब सचिव बोलाए। मंगल सकल साजि सब ल्याए।। संख निसान पनव बहु बाजे। मंगल कलस सगुन सुभ साजे।। सुभग सुआसिनि गावहिं गीता। करहिं बेद धुनि बिप्र पुनीता।। लेन चले सादर एहि भाँती। गए जहाँ जनवास बराती।। कोसलपति कर देखि समाजू। अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू।। भयउ समउ अब धारिअ पाऊ। यह सुनि परा निसानहिं घाऊ।। गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा। चले संग मुनि साधु समाजा।।
राजा ने पंडित से पूछा, अब क्यों वेट कर रहे हो? क्या प्रॉब्लम है? फिर उसने अपने मिनिस्टर सतानंद को बुलाया, सब शादी का सामान मंगवाया। शंख, ढोल, नगाड़े बजने लगे, अच्छे साइन्स रेडी किए। शादी-शुदा औरतें गाने गाने लगी, ब्राह्मिन्स वेद पढ़ने लगे। सब इज्जत के साथ निकले, वहीं गए जहाँ बारात रुकी थी। अयोध्या के राजा का सेटअप देख के, देवराज भी छोटा लगने लगा। अब निकलने का टाइम है, यह सुनते ही ढोल और शंख बजने लगे। गुरु से पूछा, कुल की रिवाज़ फॉलो किए, राजा निकला, सेजेस और साधु भी साथ थे।
Verse 650 (दोहा/सोरठा)
भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि। लगे सराहन सहस मुख जानि जनम निज बादि।।313।।
अयोध्या के राजा के भाग्य और शक्ति को देख के, ब्रह्मा और सारे देवता उसे तारीफ करने लगे। उन्हें पता था कि राम जनम के लिए ही आए थे।
Verse 651 (चौपाई)
सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजाइ निसाना।। सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा।। प्रेम पुलक तन हृदयँ उछाहू। चले बिलोकन राम बिआहू।। देखि जनकपुरु सुर अनुरागे। निज निज लोक सबहिं लघु लागे।। चितवहिं चकित बिचित्र बिताना। रचना सकल अलौकिक नाना।। नगर नारि नर रूप निधाना। सुघर सुधरम सुसील सुजाना।। तिन्हहि देखि सब सुर सुरनारीं। भए नखत जनु बिधु उजिआरीं।। बिधिहि भयह आचरजु बिसेषी। निज करनी कछु कतहुँ न देखी।।
देवताओं को पता था कि यह बहुत अच्छा वक्त है। उन्होंने फूल बरसाए और ढोल बजाए। शिव, ब्रह्मा और रिशि लोग अलग-अलग ग्रुप में थे। सब अपनी अपनी उड़ान वाली गाड़ी में बैठे। उनका बदन प्रेम से काँप रहा था और दिल खुशी से भर गया था। सब राम की शादी देखने चले गए। जनकपुर को देख के देवताओं का दिल घुल गया। अपना-अपना लोक उन्हें छोटा लगने लगा। वो अजब अजब मंडप देख के हैरान हो गए। सब कुछ अलग तरह का था, जैसे किसी और दुनिया का काम हो। शहर की औरत और मर्द दोनों बहुत खूबसूरत थे। अच्छे, समझदार और सीधे दिल वाले लोग थे। उन सबको देख के देवता और उनकी पत्नियाँ चमक में डूब गई। जैसे चाँद निकले तो तारे धुंधले हो जाते हैं। ब्रह्मा भी हैरान हो गए। उन्होंने कहीं भी अपने हाथ का काम नहीं देखा।
Verse 652 (दोहा/सोरठा)
सिवँ समुझाए देव सब जनि आचरज भुलाहु। हृदयँ बिचारहु धीर धरि सिय रघुबीर बिआहु।।314।।
शिव ने सब देवताओं को समझाया। बोलो, हैरानी छोड़ दो। दिल को शांत रखो और सोचो। यह सीता और रघु कुल के स्वामी राम की शादी है।
Verse 653 (चौपाई)
जिन्ह कर नामु लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल नसाहीं।। करतल होहिं पदारथ चारी। तेइ सिय रामु कहेउ कामारी।। एहि बिधि संभु सुरन्ह समुझावा। पुनि आगें बर बसह चलावा।। देवन्ह देखे दसरथु जाता। महामोद मन पुलकित गाता।। साधु समाज संग महिदेवा। जनु तनु धरें करहिं सुख सेवा।। सोहत साथ सुभग सुत चारी। जनु अपबरग सकल तनुधारी।। मरकत कनक बरन बर जोरी। देखि सुरन्ह भै प्रीति न थोरी।। पुनि रामहि बिलोकि हियँ हरषे। नृपहि सराहि सुमन तिन्ह बरषे।।
जिनका नाम लोग दुनिया में लेते हैं, वो सब बुरी चीज़ों की जड़ ही काट देते हैं। चार चीज़ें जो इंसान चाहिए, वो हाथ के पास आ जाती हैं। इसलिए प्यार के भगवान ने सीता और राम को अपना कहा। शिव ने देवताओं को ऐसे समझाया। फिर आगे बारात को ले कर चले। देवताओं ने देखा कि दशरथ आ गए। उनका दिल बहुत खुशी से भरा था और बदन काँप रहा था। रिशि लोग और धरती के देवता उनके साथ थे। जैसे कोई इंसान बन कर उनकी सेवा कर रहे हो। उनके चार बेटे उनके साथ चमक रहे थे। जैसे चार चीज़ें इंसान की शकल में आ गई हो। हरा और सोना, काला और गोरा, सब मिलके चमक रहे थे। देवताओं ने देख के बहुत प्यार फील किया। फिर राम को फिर से देख के उनका दिल खुश हो गया। उन्होंने राजा की तारीफ की और फूल बरसाए।
Verse 654 (दोहा/सोरठा)
राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि। पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि।।315।।
राम के रूप को उन्होंने बार बार देखा। पाँव के नाखून से बाल तक सब खूबसूरत था। उनका बदन काँप रहा था और आँखों में पानी था। शिव और पार्वती दोनों यह देख के इमोशनल हो गए।
Verse 655 (चौपाई)
केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा।। ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए। मंगल सब सब भाँति सुहाए।। सरद बिमल बिधु बदनु सुहावन। नयन नवल राजीव लजावन।। सकल अलौकिक सुंदरताई। कहि न जाइ मनहीं मन भाई।। बंधु मनोहर सोहहिं संगा। जात नचावत चपल तुरंगा।। राजकुअँर बर बाजि देखावहिं। बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं।। जेहि तुरंग पर रामु बिराजे। गति बिलोकि खगनायकु लाजे।। कहि न जाइ सब भाँति सुहावा। बाजि बेषु जनु काम बनावा।।
मोर के गले की चमक और राम के काले बदन की चमक में मुकाबला हो रहा था। उनके कपड़े बिजली की तरह चमक रहे थे, अलग-अलग रंग के। शादी के लिए उन्होंने बहुत सारे गहने पहने थे। सब अच्छे लग रहे थे, हर तरह से। चेहरा साफ़ चाँद जैसा था। आँखें इतनी खूबसूरत थी कि कमल भी शर्मा जाए। इतनी खूबसूरती किसी और दुनिया की नहीं थी। कहना मुश्किल है, दिल ही समझ जाता है। भाई लोग साथ में घोड़े पर बैठे थे। तेज़ घोड़े चला रहे थे। राजकुमार लोग अपने अच्छे घोड़े दिखाते जा रहे थे। अपने वंश की बातें सुनाते जा रहे थे। जिस घोड़े पर राम बैठे थे, उसकी चाल देख के गरुड़ भी शर्मा गया। कैसे बताऊँ कितना खूबसूरत लग रहा था। घोड़ा और गहने सब प्यार के भगवान ने बनाए हो जैसे।
Verse 656 (छंद)
जनु बाजि बेषु बनाइ मनसिजु राम हित अति सोहई। आपनें बय बल रूप गुन गति सकल भुवन बिमोहई।। जगमगत जीनु जराव जोति सुमोति मनि मानिक लगे। किंकिनि ललाम लगामु ललित बिलोकि सुर नर मुनि ठगे।।
मनमोहन ने घोड़े की साजवट ऐसे बनाई जैसे राम के लिए ही बना दी हो। इतनी सुंदर थी कि सब लोग देखते रह गए। अपने ही रूप, ताकत और गुण इतने थे कि सारी दुनिया उसके जादू में आ गई। जीन चमक रही थी, लगाम भी चमक रही थी। उसमें मोती और लाल पत्थर लगे थे। घोड़े की घुंघरू और प्यारी लगाम देख के देवता, इंसान और रिशि सब खो गए।
Verse 657 (दोहा/सोरठा)
प्रभु मनसहिं लयलीन मनु चलत बाजि छबि पाव। भूषित उड़गन तड़ित घनु जनु बर बरहि नचाव।।316।।
प्रभु का मन पूरा सीता में डूबा हुआ था। घोड़े पर सवार होकर चल रहे थे, घोड़ा इतना सुंदर लग रहा था कि आँखें खुश हो रही थी। आसमान बादल और बिजली से सज गया था, जैसे कोई अच्छा घोड़ा नाच रहा हो।
Verse 658 (चौपाई)
जेहिं बर बाजि रामु असवारा। तेहि सारदउ न बरनै पारा।। संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे।। हरि हित सहित रामु जब जोहे। रमा समेत रमापति मोहे।। निरखि राम छबि बिधि हरषाने। आठइ नयन जानि पछिताने।। सुर सेनप उर बहुत उछाहू। बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू।। रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना।। देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं। आजु पुरंदर सम कोउ नाहीं।। मुदित देवगन रामहि देखी। नृपसमाज दुहुँ हरषु बिसेषी।।
जिस घोड़े पे राम सवार थे, उसकी तारीफ करना सारदा के लिए भी मुश्किल था। शंकर को राम का रूप इतना पसंद आया कि उनकी पाँच आँखों को भी अच्छा लगा। जब राम ने सीता के साथ हरि की तरफ प्यार से देखा, तो लक्ष्मी के पति भी लक्ष्मी के साथ खो गए। राम की सुंदरता देख के ब्रह्मा खुश हो गए। फिर उन्हें पता चला कि उनके पास तो सिर्फ आठ आँखें हैं, तो उन्हें पछतावा हुआ। देवता लोग बहुत खुश थे, ब्रह्मा से उन्होंने एक्स्ट्रा आँखों का फायदा उठाया। देवता लोग राम को देख रहे थे और उन्होंने सोचा कि गौतम की श्राप तो अच्छी ही पड़ी। सब देवता इंद्र से जल रहे थे, आज कोई इंद्र जैसा नहीं है। खुश देवता लोग राम को देख रहे थे, दोनों तरफ राजा लोग बहुत खुश थे।
Verse 659 (छंद)
अति हरषु राजसमाज दुहु दिसि दुंदुभीं बाजहिं घनी। बरषहिं सुमन सुर हरषि कहि जय जयति जय रघुकुलमनी।। एहि भाँति जानि बरात आवत बाजने बहु बाजहीं। रानि सुआसिनि बोलि परिछनि हेतु मंगल साजहीं।।
दोनों तरफ राजा लोगों में बहुत खुशी थी। हर तरफ ढोल बज रहे थे। देवता लोग खुश हो के फूल बरसा रहे थे और बोल रहे थे कि रघु कुल के रत्न की जय हो। ऐसे ही बारात आ रही थी, बहुत सारे बाजे बज रहे थे। रानियाँ और सुहागन लोगें मंगल के लिए तैयारी कर रही थिन और आशीर्वाद दे रही थिन।
Verse 660 (दोहा/सोरठा)
सजि आरती अनेक बिधि मंगल सकल सँवारि। चलीं मुदित परिछनि करन गजगामिनि बर नारि।।317।।
आरती तैयार करके और सारी मंगल की चीज़ें सजाके, महल की औरतें खुश हो के चली गईं। वो औरतें इतनी अच्छी चल रही थिन जैसे हाथी चलते हैं।
Verse 661 (चौपाई)
बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि।। पहिरें बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजें सरीरा।। सकल सुमंगल अंग बनाएँ। करहिं गान कलकंठि लजाएँ।। कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं।। बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा। नभ अरु नगर सुमंगलचारा।। सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सहज सयानी।। कपट नारि बर बेष बनाई। मिलीं सकल रनिवासहिं जाई।। करहिं गान कल मंगल बानीं। हरष बिबस सब काहुँ न जानी।।
सबके चेहरे चाँद जैसे थे और आँखें हिरन जैसी। हर किसी का बदन इतना सुंदर था कि प्यार की नशा निकल जाती थी। अलग-अलग रंग के कपड़े पहने थे और पूरा बदन गहने से भरा था। हर अंग पे अच्छी निशानी थी और आवाज़ इतनी अच्छी थी कि कोयल भी शर्मा जाए। कंगने, कमरबंद और पायल बज रहे थे। उनकी चाल देख के प्यार का हाथी भी शर्मा गया। कई तरह के बाजे बज रहे थे। आसमान और शहर अच्छी आवाज़ से भरा हुआ था। सची, शारदा, रमा और भवानी, यह सब देवियाँ, जो सुंदर और समझदार थीं। उन्होंने अच्छी औरतों का रूप डाला और रानियों में मिल गई। अच्छे गीत गा रही थीं और खुशी में इतनी डूब गई कि किसी और का ख्याल भी नहीं रहा।
Verse 662 (छंद)
को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली। कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली।। आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकल हियँ हरषित भई।। अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई।।
कोई नहीं जानता था कि कितनी खुशी में ब्रह्मा की यह सब औरतें निकली। अच्छे गीत और ढोल की आवाज़ थी, देवताओं ने फूल बरसाए और चमक दिख गई। दूल्हे को देख के, जो खुशी का सर था, सबके दिल खुशी से भरे। कमल जैसी आँखें, पानी और दिल सब उभर आए। खुशी से रोम-रोम में झिझकी सी हो गई।
Verse 663 (दोहा/सोरठा)
जो सुख भा सिय मातु मन देखि राम बर बेषु। सो न सकहिं कहि कलप सत सहस सारदा सेषु।।318।।
सीता की माँ ने जब राम को दूल्हे के कपड़े में देखा, जो खुशी उसके दिल में आई। वो खुशी शारदा और शेष भी एक लाख साल में नहीं बता सकते।
Verse 664 (चौपाई)
नयन नीरु हटि मंगल जानी। परिछनि करहिं मुदित मन रानी।। बेद बिहित अरु कुल आचारू। कीन्ह भली बिधि सब ब्यवहारू।। पंच सबद धुनि मंगल गाना। पट पाँवड़े परहिं बिधि नाना।। करि आरती अरघु तिन्ह दीन्हा। राम गमनु मंडप तब कीन्हा।। दसरथु सहित समाज बिराजे। बिभव बिलोकि लोकपति लाजे।। समयँ समयँ सुर बरषहिं फूला। सांति पढ़हिं महिसुर अनुकूला।। नभ अरु नगर कोलाहल होई। आपनि पर कछु सुनइ न कोई।। एहि बिधि रामु मंडपहिं आए। अरघु देइ आसन बैठाए।।
रानियों ने आँखों के आँसू देख के समझा कि यह अच्छा शगुन है। खुशी से उसका काम किया। वेदों का और खानदान का जो तरीका है, उससे सब अच्छे से किया। पाँच तरह की आवाज़ें और मंगल गीत थे। कपड़े और शामियाने बिछाए। आरती की और समर्पित किया। फिर राम मंडप की तरफ चले गए। दशरथ अपने लोगों के साथ बैठा था। इतना शानदार नज़ारा देख के दुनिया के मालिक भी शर्मा गए। सही वक़्त पे देवताओं ने फूल बरसाए। रिशियों ने शांति के श्लोक पढ़े। आसमान और शहर में शोर मच गया। अपना या दूसरों का कुछ सुनाई नहीं देता था। ऐसे ही राम मंडप में आए। समर्पित लिया और सिंहासन पे बैठ गए।
Verse 665 (छंद)
बैठारि आसन आरती करि निरखि बरु सुखु पावहीं।। मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं।। ब्रह्मादि सुरबर बिप्र बेष बनाइ कौतुक देखहीं। अवलोकि रघुकुल कमल रबि छबि सुफल जीवन लेखहीं।।
उन्हें बैठाया और आरती की। दूल्हे को देख के खुशी मिली। औरतें मंगल गीत गा रही थीं और बहुत सारे गहने, कपड़े और सामान चढ़ा रही थीं। ब्रह्मा और दूसरे देवता, पंडित बन के, तमाशा देख रहे थे। रघु कुल के कमल, राम को देख के, उन्होंने अपना जीवन सफल समझा।
Verse 666 (दोहा/सोरठा)
नाऊ बारी भाट नट राम निछावरि पाइ। मुदित असीसहिं नाइ सिर हरषु न हृदयँ समाइ।।319।।
नाई, माझी, भाट और नाचने वाले, सबको राम ने खुशी से तोहफे दिए। वो सब ने सार झुका के आशीर्वाद लिया। उनका दिल इतना खुश था कि कंट्रोल ही नहीं हो रहा था।
परंपरानुसार यह ‘विवाह-उत्सव/बरात-दर्शन’ खंड पढ़ने-सुनने से मंगल-बुद्धि, गृह-कलह-शमन, और ‘राम-रूप-स्मृति’ दृढ़ होती है। ‘जिन्ह कर नामु लेत…’ जैसी पंक्तियाँ नाम-स्मरण का फल—अमंगल-नाश—प्रत्यक्ष करती हैं; अतः इसे शुभ-कार्य, विवाह, गृह-प्रवेश, और सत्संग में मंगल-पाठ हेतु विशेष मानते हैं।
मंगल-प्रसंगों में प्रचलित समपुट: (1) ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (नाम-जप-समपुट), या (2) ‘सियावर रामचंद्र की जय’ को प्रत्येक दोहे/खंड के अंत में। कुछ परंपराओं में ‘राम रामेति रामेति…’ (विष्णु-सहस्रनाम-प्रसिद्ध) को भी समपुट रूप में जोड़ा जाता है।
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.
Read Ramcharitmanas in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.