Bala KandaPrakarana 3120 Verses

Prakarana 31

सोपान-प्रवेश: ‘मंगल’ और ‘सगुन’ के द्वारा चित्त-शुद्धि। बालकाण्ड में भक्त-हृदय राम-लीला के सौंदर्य (माधुर्य) से आकृष्ट होकर श्रद्धा-पथ पर चढ़ता है; यहाँ बाह्य उत्सव (बरात, बाजा, साज) अंतःकरण के भीतर ‘सुमंगल’ बनकर विवेक-जागरण और ईश्वर-प्रसाद-बोध का द्वार खोलता है।

यह प्रकरण ‘सोपान-प्रवेश’ का मंगल-द्वार है: बाह्य उत्सव (बरात, बाजा, साज) अंतःकरण में ‘सुमंगल’ बनकर चित्त-शुद्धि कराता है। हाथी-घंटा, निसान, रथ-रव, नगाड़े, सहनाई—ये केवल शोर नहीं; ये मन की बिखरी वृत्तियों को एक लय में बाँधकर ‘अनाहत’ (भीतर की साधना-ध्वनि) के लिए भूमि बनाते हैं। नगर-उत्सव लोक-जीवन की समृद्धि को ‘ईश्वर-प्रसाद’ की तरह पढ़ने की दृष्टि देता है—भोग्य वस्तु नहीं, कृतज्ञता का कारण। शकुन-लक्षण यह बताते हैं कि प्रकृति और संकेत-व्यवस्था भी राम-कृपा के अधीन है; इसलिए साधक का भय घटता है और भरोसा बढ़ता है। समग्र अर्थ: माधुर्य/वैभव का रस अंततः ‘आश्रय’ में परिणत हो—आनंद का स्रोत लीला है, पर टिकने का स्थान राम-नाम/राम-स्वरूप।

Verses

चौपाई 300.1-4

कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं।कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं।।

चले मत्तगज घंट बिराजी।मनहुँ सुभग सावन घन राजी।।

बाहन अपर अनेक बिधाना।सिबिका सुभग सुखासन जाना।।

तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृन्दा।जनु तनु धरें सकल श्रुति छंदा।।

मागध सूत बंदि गुनगायक।चले जान चढ़ि जो जेहि लायक।।

बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती।चले बस्तु भरि अगनित भाँती।।

कोटिन्ह काँवरि चले कहारा।बिबिध बस्तु को बरनै पारा।।

चले सकल सेवक समुदाई।निज निज साजु समाजु बनाई।।

kalita karibaranhi parīṁ ãbārīṁ |kahi na jāhiṁ jehi bhā̃ti sãvārīṁ ||

cale mattagaja ghaṁṭa birājī |manahũ subhaga sāvana ghana rājī ||

bāhana apara aneka bidhānā |sibikā subhaga sukhāsana jānā ||

tinha caṛhi cale biprabara bṛndā |janu tanu dhareṁ sakala śruti chaṁdā ||

māgadha sūta baṁdi gunagāyaka |cale jāna caṛhi jo jehi lāyaka ||

besara ū̃ṭa bṛṣabha bahu jātī |cale bastu bhari aganita bhā̃tī ||

koṭinha kā̃vari cale kahārā |bibidha bastu ko baranai pārā ||

cale sakala sevaka samudāī |nija nija sāju samāju banāī ||

खूबसूरत अम्बरियां सबसे अच्छे हाथियों पर लगाई गई, जिन्हें इतनी सजा दी गई कि बताया नहीं जा सकता। मस्त हाथी अपनी घंटियों के साथ चमकते हुए चले, जैसे सावन के खूबसूरत बादल की कतारें हों। और भी कई तरह की सवारियां थीं, खूबसूरत पालकियां, आराम की सवारियां और गाड़ियां। उन पर सबसे अच्छे ब्राह्मणों के जत्थे चढ़ के चले, जैसे वेद के सारे छंद और मंत्रों ने शरीर ले लिया हो। वंश लिखने वाले, कथा सुनाने वाले, गुण गाने वाले और स्तुति गाने वाले भी चले, हर एक अपने रुतबे के हिसाब से जो सवारी लायक थी उस पर चढ़ के। कई तरह के खच्चर, ऊंट और बैल चले, जिन पर तरह तरह का सामान लदा हुआ था, जिसकी गिनती नहीं। करोड़ों कुली अपने कंधों पर बोझ उठाते हुए चले, उनके सामान की तरह तरह को कौन बता सकता है। सारे नौकरों के झुंड चले, हर एक अपना सामान और अपनी कंपनी अपने हिसाब से बनाके।

दोहा 300

सब कें उर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर।कबहिं देखिबे नयन भरि रामु लखनू दोउ बीर।।⁠300।।

saba keṁ ura nirbhara haraṣu pūrita pulaka sarīra |kabahiṁ dekhibe nayana bhari rāmu lakhanū dou bīra ||⁠300||

सबके दिल में खुशी से भर आता था, बदन पर खुशी के रोंगटे आते थे। हर कोई सोच रहा था, कब हम अपनी आँखों भर राम और लक्ष्मण दोनों को देख पायेंगे।

चौपाई 301.1-4

गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा।रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा।।

निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना।निज पराइ कछु सुनिअ न काना।।

महा भीर भूपति के द्वारें।रज होइ जाइ पषान पबारें।।

चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारीं।लिंएँ आरती मंगल थारी।।

गावहिं गीत मनोहर नाना।अति आनंदु न जाइ बखाना।।

तब सुमंत्र दुइ स्पंदन साजी।जोते रबि हय निंदक बाजी।।

दोउ रथ रुचिर भूप पहिं आने।नहिं सारद पहिं जाहिं बखाने।।

राज समाजु एक रथ साजा।दूसर तेज पुंज अति भ्राजा।।

garajahiṁ gaja ghaṁṭā dhuni ghorā |ratha rava bāji hiṁsa cahu orā ||

nidari ghanahi ghurmmarahiṁ nisānā |nija parāi kachu sunia na kānā ||

mahā bhīra bhūpati ke dvāreṁ |raja hoi jāi paṣāna pabāreṁ ||

caṛhī aṭārinha dekhahiṁ nārīṁ |liṁẽ āratī maṁgala thārī ||

gāvahiṁ gīta manohara nānā |ati ānaṁdu na jāi bakhānā ||

taba sumaṁtra dui spaṁdana sājī |jote rabi haya niṁdaka bājī ||

dou ratha rucira bhūpa pahiṁ āne |nahiṁ sārada pahiṁ jāhiṁ bakhāne ||

rāja samāju eka ratha sājā |dūsara teja puṁja ati bhrājā ||

हाथी जोर से चिल्लाये और उनकी घंटी की आवाज बोहोत भयानक गूँजी। चारो तरफ रथ की गड़गड़ाहट और घोड़ों की हिनहिना सुनायी दी। नगाड़े बज्जे ऐसे कि बादल की गरज भी उनके आगे कुछ नहीं लगती। इतना शोर था कि किसी का अपना या दूसरे की कोई बात कान में नहीं पड़ती थी। राजा के दरवाजे पर इतनी भीड़ थी कि अगर पत्थर भी पेंक दो तो वोह पीस कर धूल बन जाये। औरते ऊपर बालकनी पर चढ़ी देख रही थी। उनके हाथ में आरती के लिये दिया और मंगल की थाली थी। वोह बहुत सारे प्यारे प्यारे गाने गा रही थी। उनका खुशी इतना ज्यादा था कि बता नहीं जा सकता। तब सुमंत्र ने दो रथ तैयार किये। उसमे ऐसे घोड़े जोड़े जो सूरज के घोड़ों को भी मात्रा दे। दोनों खूबसूरत रथ राजा के पास लाये। सरद जी भी उनका वर्णन नहीं कर सकते। एक रथ में राजा का सारा सामान सजाया। दूसरा रथ इतनी चमक धमक में चमक रहा था जैसे रोशनी का भंडार हो।

दोहा 301

तेहिं रथ रुचिर बसिष्ठ कहुँ हरषि चढ़ाइ नरेसु।आपु चढ़ेउ स्पंदन सुमिरि हर गुर गौरि गनेसु।।⁠301।।

tehiṁ ratha rucira basiṣṭha kahũ haraṣi caṛhāi naresu |āpu caṛheu spaṁdana sumiri hara gura gauri ganesu ||⁠301||

राजा ने खुश होकर वसिष्ठ को उस सुंदर रथ पे चढ़वाया। फिर राजा खुद दूसरे रथ पे चढा, और शिव, अपने गुरु, गौरी और गणेश को याद किया।

चौपाई 302.1-4

सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें।सुर गुर संग पुरंदर जैसें।।

करि कुल रीति बेद बिधि राऊ।देखि सबहि सब भाँति बनाऊ।।

सुमिरि रामु गुर आयसु पाई।चले महीपति संख बजाई।।

हरषे बिबुध बिलोकि बराता।बरषहिं सुमन सुमंगल दाता।।

भयउ कोलाहल हय गय गाजे।ब्योम बरात बाजने बाजे।।

सुर नर नारि सुमंगल गाई।सरस राग बाजहिं सहनाई।।

घंट घंटि धुनि बरनि न जाहीं।सरव करहिं पाइक फहराहीं।।

करहिं बिदूषक कौतुक नाना।हास कुसल कल गान सुजाना।।

sahita basiṣṭha soha nṛpa kaiseṁ |sura gura saṁga puraṁdara jaiseṁ ||

kari kula rīti beda bidhi rāū |dekhi sabahi saba bhā̃ti banāū ||

sumiri rāmu gura āyasu pāī |cale mahīpati saṁkha bajāī ||

haraṣe bibudha biloki barātā |baraṣahiṁ sumana sumaṁgala dātā ||

bhayau kolāhala haya gaya gāje |byoma barāta bājane bāje ||

sura nara nāri sumaṁgala gāī |sarasa rāga bājahiṁ sahanāī ||

ghaṁṭa ghaṁṭi dhuni barani na jāhīṁ |sarava karahiṁ pāika phaharāhīṁ ||

karahiṁ bidūṣaka kautuka nānā |hāsa kusala kala gāna sujānā ||

राजा वशिष्ठ के साथ ऐसे चमक रहे थे जैसे देवताओं के गुरु बृहस्पति के साथ इंद्र चमकता है। राजा ने अपने खानदान की रियाजत की और वेदों में लिखे हुए विधि को पूरा किया। सब कुछ हर तरह से ठीक लगा देख कर वो खुश हो गए। राम का नाम याद करके अपने गुरु से आग्या ले ली, और पृथ्वी के राजा निकल पड़े और शंख बजने लगे। देवताओं ने बारात देख खुश होकर फूल बरसाए, वो सभी अच्छे नसीब देने वाले हैं। बहुत शोर मचा। घोड़े ने हिनहोरा भरा और हाथियो ने सिंघी मारी। आसमान में और बारात में साज बजा। देवता, आदमी और औरतों ने अच्छे गीत गाए और शहनाइयाँ मीठी धुन में बजने लगी। बड़े घंटे और छोटे घंटो की आवाज का जिक्र नहीं हो सकता। पैदल सिपाही ललकारे और झड़ें लहरा रहे थे। विदूषक ने तरह तरह के मजाक किए। वो हसाना अच्छे से जानते थे और मीठा गाना भी अच्छे से जानते थे।

दोहा 302

तुरग नचावहिं कुँअर बर अकनि मृदंग निसान।नागर नट चितवहिं चकित डगहिं न ताल बँधान।।⁠302।।

turaga nacāvahiṁ kũara bara akani mṛdaṁga nisāna |nāgara naṭa citavahiṁ cakita ḍagahiṁ na tāla bãdhāna ||⁠302||

अच्छे राजकुमार अपने घोड़े नचाते हैं, और मृदंग और ढोल की धुन सुनते हैं। नाचने वाले और नाटक करने वाले लोग हैरान होकर देखते हैं, क्योंकि घोड़े ताल से कभी बाहर नहीं होते।

चौपाई 303.1-4

बनइ न बरनत बनी बराता।होहिं सगुन सुंदर सुभदाता।।

चारा चाषु बाम दिसि लेई।मनहुँ सकल मंगल कहि देई।।

दाहिन काग सुखेत सुहावा।नकुल दरसु सब काहूँ पावा।।

सानुकूल बह त्रिबिध बयारी।सघट सवाल आव बर नारी।।

लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा।सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा।।

मृगमाला फिरि दाहिनि आई।मंगल गन जनु दीन्हि देखाई।।

छेमकरी कह छेम बिसेषी।स्यामा बाम सुतरु पर देखी।।

सनमुख आयउ दधि अरु मीना।कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना।।

banai na baranata banī barātā |hohiṁ saguna suṁdara subhadātā ||

cārā cāṣu bāma disi leī |manahũ sakala maṁgala kahi deī ||

dāhina kāga sukheta suhāvā |nakula darasu saba kāhū̃ pāvā ||

sānukūla baha tribidha bayārī |saghaṭa savāla āva bara nārī ||

lovā phiri phiri darasu dekhāvā |surabhī sanamukha sisuhi piāvā ||

mṛgamālā phiri dāhini āī |maṁgala gana janu dīnhi dekhāī ||

chemakarī kaha chema biseṣī |syāmā bāma sutaru para dekhī ||

sanamukha āyau dadhi aru mīnā |kara pustaka dui bipra prabīnā ||

बारात का वर्णन करना मुमकिन नहीं। सुंदर शुभ शगुन दिख रहे थे और सब कुशलता ले कर आए। नीलकंठ ने बायी तरफ से अपना खाना उठाया, जैसे सब तरह के मंगल की बात कर रहा हो। दायिन तरफ एक खेते में कगवा अच्छा लग रहा था, और सब लोगों को नकुल भी दिखायी दी। हवा अच्छी चल रही थी, ठंडी, नरम और खुशबू वाली, और एक अच्छी औरत भरो मटका ले कर अपने बच्चे के साथ आयी। लोमडी बार बार दिखायी दी, और गाय उनके सामने खडी हो कर अपने बच्चे को दूध पिलाने लगी। हिरनों का झुंड फिर दायिन तरफ आ गया, जैसे बहुत सारे मंगल दिखा रही हो। चील ने अपना खास मंगल की बात पुकारी, और श्यामा पक्षी बायी तरफ एक सुंदर पेड पर दिखायी दी। एक आदमी दही और मछली ले कर मिलने आया, और दो पंडित ब्राह्मण हाथ में किताब ले कर आए।

दोहा 303

मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार।जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार।।⁠303।।

maṁgalamaya kalyānamaya abhimata phala dātāra |janu saba sāce hona hita bhae saguna eka bāra ||⁠303||

सारे शुभ शगुन एक साथ दिख गए। ये सब बरकत वाले थे, जो इंसान जो चाहता है वही फल देते हैं। ऐसा लगा जैसे हर शगुन अपने को सच साबित करने आया था।

चौपाई 304.1-4

मंगल सगुन सुगम सब ताकें।सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें।।

राम सरिस बरु दुलहिनि सीता।समधी दसरथु जनकु पुनीता।।

सुनि अस ब्याहु सगुन सब नाचे।अब कीन्हे बिरंचि हम साँचे।।

एहि बिधि कीन्ह बरात पयाना।हय गय गाजहिं हने निसाना।।

आवत जानि भानुकुल केतू।सरितन्हि जनक बँधाए सेतू।।

बीच बीच बर बास बनाए।सुरपुर सरिस संपदा छाए।।

असन सयन बर बसन सुहाए।पावहिं सब निज निज मन भाए।।

नित नूतन सुख लखि अनुकूले।सकल बरातिन्ह मंदिर भूले।।

maṁgala saguna sugama saba tākeṁ |saguna brahma suṁdara suta jākeṁ ||

rāma sarisa baru dulahini sītā |samadhī dasarathu janaku punītā ||

suni asa byāhu saguna saba nāce |aba kīnhe biraṁci hama sā̃ce ||

ehi bidhi kīnha barāta payānā |haya gaya gājahiṁ hane nisānā ||

āvata jāni bhānukula ketū |saritanhi janaka bãdhāe setū ||

bīca bīca bara bāsa banāe |surapura sarisa saṁpadā chāe ||

asana sayana bara basana suhāe |pāvahiṁ saba nija nija mana bhāe ||

nita nūtana sukha lakhi anukūle |sakala barātinha maṁdira bhūle ||

जिसका सुंदर बेटा खुद भगवान है, उसके सारे अच्छे शगुन आराम से आ जाते हैं। दूल्हा राम है और दुल्हन सीता है। रिश्ते के दोनों बाप, दशरथ और जनक, पावन हैं। ऐसी शादी सुन कर सब शगुन नाच उठे, और बोले, अब तो ब्रह्मा ने हमें सचा कर दिया। इस तरह बारात निकली। घोड़े और हाथी आवाज कर रहे थे, ढोल बज रहे थे। सूर्य वंश का झंडा आ रहा है, ये जान कर जनक ने नदियों पर पुल बनवा दिए। रास्ते में बीच बीच में अच्छे रुकने के जगह बनवा दिए। वहां इतनी दौलत लगा दी कि देवताओं की शहर जैसा लगे। खाना, बिस्तर और अच्छे कपड़े, सब सुंदर था। हर किसी को वही मिला जो उसके दिल को पसंद आया। रोज नया सुख देख कर, सब कुछ उनके लिए अच्छा था, बारात वाले अपने घर भूल गए।

दोहा 304

आवत जानि बरात बर सुनि गहगहे निसान।सजि गज रथ पदचर तुरग लेन चले अगवान।।⁠304।।

āvata jāni barāta bara suni gahagahe nisāna |saji gaja ratha padacara turaga lena cale agavāna ||⁠304||

लोगों को पता चला कि बारात आ रही है। ढोल बज रहे हैं, आवाज़ आ रही है। स्वागत करने वाले लोग निकल पड़े। उनके पास हाथी, रथ, पैदल सिपाही और घोड़े थे, सब तैयार करके चले गए।

चौपाई 305.1-4

कनक कलस भरि कोपर थारा।भाजन ललित अनेक प्रकारा।।

भरे सुधासम सब पकवाने।नाना भाँति न जाहिं बखाने।।

फल अनेक बर बस्तु सुहाईं।हरषि भेंट हित भूप पठाईं।।

भूषन बसन महामनि नाना।खग मृग हय गय बहुबिधि जाना।।

मंगल सगुन सुगंध सुहाए।बहुत भाँति महिपाल पठाए।।

दधि चिउरा उपहार अपारा।भरि भरि काँवरि चले कहारा।।

अगवानन्ह जब दीखि बराता।उर आनंदु पुलक भर गाता।।

देखि बनाव सहित अगवाना।मुदित बरातिन्ह हने निसाना।।

kanaka kalasa bhari kopara thārā |bhājana lalita aneka prakārā ||

bhare sudhāsama saba pakavāne |nānā bhā̃ti na jāhiṁ bakhāne ||

phala aneka bara bastu suhāīṁ |haraṣi bheṁṭa hita bhūpa paṭhāīṁ ||

bhūṣana basana mahāmani nānā |khaga mṛga haya gaya bahubidhi jānā ||

maṁgala saguna sugaṁdha suhāe |bahuta bhā̃ti mahipāla paṭhāe ||

dadhi ciurā upahāra apārā |bhari bhari kā̃vari cale kahārā ||

agavānanha jaba dīkhi barātā |ura ānaṁdu pulaka bhara gātā ||

dekhi banāva sahita agavānā |mudita barātinha hane nisānā ||

सोने के कलश भरे हुए थे, साथ मे थाली, प्लेट और बहुत सारे सुंदर बरतन थे। उनमे मीठी चीज़ें भरी थी, जैसे अमृत हो, इतनी तरह कि बता नही जा सकति। राजा ने खुशी से बहुत सारे फल और सुंदर चीज़ें वेलकम गिफ्ट भेजी। सोने का गहना, कपडे, बहुत कीमत के ज्वेल्स, पक्षी, हिरन, घोडे, हाथी और तरह तरह के सवारी के सामान भेजे। राजा ने मंगल वाली चीज़ें, शुभ निशानियां और अच्छी खुशबू वाली चीज़ें बहुत भेजी। दही और चिवडा का उपहार लाखों मे था, कहार भरी भरी कवर उठा के निकल पडे। जिस वक्त वेलकम वालों ने बारात को देखा, उनके दिल मे खुशी आई और शरीर मे खुशी से रोंगटे खडे हो गए। बाराती लोगों ने वेलकम वालों को उनके जमकर अरेंजमेंट के साथ देखा तो खुश हो के ढोल बजा दिए।

दोहा 305

हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल।जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल।।⁠305।।

haraṣi parasapara milana hita kachuka cale bagamela |janu ānaṁda samudra dui milata bihāi subela ||⁠305||

सब बहुत खुश थे और एक दूसरे से मिलने के लिए साथ चल पड़े, कुछ लोग दौड़ के आगे निकल गए। ऐसा लग रहा था जैसे दो खुशी के समुंदर अपने किनारे छोड़ के एक दूसरे में बह मिल रहे हैं।

चौपाई 306.1-4

बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं।मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं।।

बस्तु सकल राखीं नृप आगें।बिनय कीन्ह तिन्ह अति अनुरागें।।

प्रेम समेत रायँ सबु लीन्हा।भै बकसीस जाचकन्हि दीन्हा।।

करि पूजा मान्यता बड़ाई।जनवासे कहुँ चले लवाई।।

बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं।देखि धनहु धन मदु परिहरहीं।।

अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा।जहँ सब कहुँ सब भाँति सुपासा।।

जानी सियँ बरात पुर आई।कछु निज महिमा प्रगटि जनाई।।

हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाई।भूप पहुनई करन पठाई।।

baraṣi sumana sura suṁdari gāvahiṁ |mudita deva duṁdubhīṁ bajāvahiṁ ||

bastu sakala rākhīṁ nṛpa āgeṁ |binaya kīnha tinha ati anurāgeṁ ||

prema sameta rāyã sabu līnhā |bhai bakasīsa jācakanhi dīnhā ||

kari pūjā mānyatā baṛāī |janavāse kahũ cale lavāī ||

basana bicitra pā̃vaṛe parahīṁ |dekhi dhanahu dhana madu pariharahīṁ ||

ati suṁdara dīnheu janavāsā |jahã saba kahũ saba bhā̃ti supāsā ||

jānī siyã barāta pura āī |kachu nija mahimā pragaṭi janāī ||

hṛdayã sumiri saba siddhi bolāī |bhūpa pahunaī karana paṭhāī ||

ऊपर से फूल बरसा रहे थे। स्वर्ग की सुंदर औरतें गाना गा रही थी। और देवता खुशी से ढोल बजा रहे थे। उन्होंने सारे गिफ्ट्स राजा के सामने रख दिए। और बहुत प्रेम से विनमर्ता से भीख मांगी। राजा ने सब कुछ प्यार से ले लिया। फिर वो सब कुछ मांगने वालों को दान में दे दिया। उनकी पूजा की, इज्जत दी, तारीफ की। फिर उसको बारात के रुकने की जगह पर ले गए। रास्ते में खूबसूरत कपड़े बिछाए थे। वो देख कर धन के देवता भी अपने धन पे गर्व छोड़ दिए। उनको एक बहुत ही सुंदर जगह दी। जहां सबको हर तरह की सुख सुविधा मिली। सीता को पता चला कि बारात शहर में आ गई है। उसने थोड़ा सा अपना महत्व दिखा दिया। अपने दिल में सारे सिद्धि को याद किया। उनको बुलाया, और राजा की मेहमान नवाजी करने के लिए भेजा।

दोहा 306

सिधि सब सिय आयसु अकनि गईं जहाँ जनवास।लिएँ संपदा सकल सुख सुरपुर भोग बिलास।।⁠306।।

sidhi saba siya āyasu akani gaīṁ jahā̃ janavāsa |liẽ saṁpadā sakala sukha surapura bhoga bilāsa ||⁠306||

सीता ने जो हुकुम दिया, उसकी बात सुनकर सारे सिद्धि वहां चले गए जहां बारात वाले थे. साथ में धन-दौलत, हर तरह का सुख और स्वर्ग की सारी ऐश की चीज़ें ले गए.

चौपाई 307.1-4

निज निज बास बिलोकि बराती।सुर सुख सकल सुलभ सब भाँती।।

बिभव भेद कछु कोउ न जाना।सकल जनक कर करहिं बखाना।।

सिय महिमा रघुनायक जानी।हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी।।

पितु आगमनु सुनत दोउ भाई।हृदयँ न अति आनंदु अमाई।।

सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं।पितु दरसन लालचु मन माहीं।।

बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी।उपजा उर संतोषु बिसेषी।।

हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए।पुलक अंग अंबक जल छाए।।

चले जहाँ दसरथु जनवासे।मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे।।

nija nija bāsa biloki barātī |sura sukha sakala sulabha saba bhā̃tī ||

bibhava bheda kachu kou na jānā |sakala janaka kara karahiṁ bakhānā ||

siya mahimā raghunāyaka jānī |haraṣe hṛdayã hetu pahicānī ||

pitu āgamanu sunata dou bhāī |hṛdayã na ati ānaṁdu amāī ||

sakucanha kahi na sakata guru pāhīṁ |pitu darasana lālacu mana māhīṁ ||

bisvāmitra binaya baṛi dekhī |upajā ura saṁtoṣu biseṣī ||

haraṣi baṁdhu dou hṛdayã lagāe |pulaka aṁga aṁbaka jala chāe ||

cale jahā̃ dasarathu janavāse |manahũ sarobara takeu piāse ||

बराती जब अपनी अपनी जगह देखी, वहाँ हर तरह से देवताओं वाला सुख आसानी से मिल रहा था। इस शान का राज किसी को नहीं पता था। सब जनक की तारीफ कर रहे थे। राम को पता चल गया कि ये सीता की वजह से है। वो वजह समझ कर दिल में खुश हुआ। जब दोनों भाइयों ने सुना कि पिता आ रहे हैं, उनके दिल में इतनी खुशी नहीं समायी। शर्म की वजह से वो अपने गुरु से कह नहीं पाए, पर मन में पिता को देखने की चाहत थी। विश्वामित्र ने उनकी बड़ी विनम्रता देखी, तो दिल में खास संतोष पैदा हुआ। खुश होकर उसने दोनों भाइयों को दिल से लगा लिया, उसके बदन में खुशी दौड़ी और आंखों में आंसू आ गए। वहीं चले गए जहाँ दशरथ थे, जैसे प्यासे लोग तालाब देख लें।

दोहा 307

भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत।उठे हरषि सुखसिंधु महुँ चले थाह सी लेत।।⁠307।।

bhūpa biloke jabahiṁ muni āvata sutanha sameta |uṭhe haraṣi sukhasiṁdhu mahũ cale thāha sī leta ||⁠307||

जब राजा ने देखा कि रिशि अपने बेटों के साथ आ रहा है, तो खुशी से उठे और आगे चले गए, जैसे कोई खुशी के समंदर में उतर के उसकी गहराई नापने लगे।

चौपाई 308.1-4

मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा।बार बार पद रज धरि सीसा।।

कौसिक राउ लिये उर लाई।कहि असीस पूछी कुसलाई।।

पुनि दंडवत करत दोउ भाई।देखि नृपति उर सुखु न समाई।।

सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे।मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे।।

पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए।प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए।।

बिप्र बृंद बंदे दुहुँ भाईं।मन भावती असीसें पाईं।।

भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा।लिए उठाइ लाइ उर रामा।।

हरषे लखन देखि दोउ भ्राता।मिले प्रेम परिपूरित गाता।।

munihi daṁḍavata kīnha mahīsā |bāra bāra pada raja dhari sīsā ||

kausika rāu liye ura lāī |kahi asīsa pūchī kusalāī ||

puni daṁḍavata karata dou bhāī |dekhi nṛpati ura sukhu na samāī ||

suta hiyã lāi dusaha dukha meṭe |mṛtaka sarīra prāna janu bheṁṭe ||

puni basiṣṭha pada sira tinha nāe |prema mudita munibara ura lāe ||

bipra bṛṁda baṁde duhũ bhāīṁ |mana bhāvatī asīseṁ pāīṁ ||

bharata sahānuja kīnha pranāmā |lie uṭhāi lāi ura rāmā ||

haraṣe lakhana dekhi dou bhrātā |mile prema paripūrita gātā ||

राजा ने रिशि के आगे पूरा झुक कर प्रनाम किया, बार बार उनके पैर की धूल सिर पे लगाई। कौसिका ने राजा को गले लगाया, उनको आशीर्वाद दिया, और पूछा कि सब कैसा है। फिर दोनों भाई ने भी पूरा झुक कर प्रनाम किया, और उनको देख कर राजा के दिल की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। अपने बेटों को दिल से लगाकर उनका झेलना मुश्किल दुख मिटा दिया, जैसे किसी मरे हुए शरीर को वापस जान आ जाए। फिर उन दोनों ने वसिष्ठ के पैर मे सिर झुकाया, और बड़े रिशि खुशी और प्यार से उनको दिल से लगाए। दोनों भाई ने ब्राह्मनों के झुंडे को प्रनाम किया, और जो आशीर्वाद मिले उनसे दिल खुश हो गया। भरत अपने छोटे भाई के साथ उनको प्रनाम करके झुके, और राम ने उनको उठाकर दिल से लगाया। लखन दोनों भाई को देख कर बहुत खुश हुआ, और उनने प्यार भर कर उसको गले लगाया, पूरा बदन प्यार से भरा हुआ था।

दोहा 308

पुरजन परिजन जातिजन जाचक मंत्री मीत।मिले जथाबिधि सबहि प्रभु परम कृपाल बिनीत।।⁠308।।

purajana parijana jātijana jācaka maṁtrī mīta |mile jathābidhi sabahi prabhu parama kṛpāla binīta ||⁠308||

शहर के लोग, घर के नौकर, रिश्तेदार, माँगने वाले, मंत्री और दोस्त, सब मिल रहे थे। प्रभु सबसे मिला, हर एक के साथ जैसा सही था, वैसे ही। वो बहुत दयालु थे और बिल्कुल नरमी से पेश आए।

चौपाई 309.1-4

रामहि देखि बरात जुड़ानी।प्रीति कि रीति न जाति बखानी।।

नृप समीप सोहहिं सुत चारी।जनु धन धरमादिक तनुधारी।।

सुतन्ह समेत दसरथहि देखी।मुदित नगर नर नारि बिसेषी।।

सुमन बरिसि सुर हनहिं निसाना।नाकनटीं नाचहिं करि गाना।।

सतानंद अरु बिप्र सचिव गन।मागध सूत बिदुष बंदीजन।।

सहित बरात राउ सनमाना।आयसु मागि फिरे अगवाना।।

प्रथम बरात लगन तें आई।तातें पुर प्रमोदु अधिकाई।।

ब्रह्मानंदु लोग सब लहहीं।बढ़हुँ दिवस निसि बिधि सन कहहीं।।

rāmahi dekhi barāta juṛānī |prīti ki rīti na jāti bakhānī ||

nṛpa samīpa sohahiṁ suta cārī |janu dhana dharamādika tanudhārī ||

sutanha sameta dasarathahi dekhī |mudita nagara nara nāri biseṣī ||

sumana barisi sura hanahiṁ nisānā |nākanaṭīṁ nācahiṁ kari gānā ||

satānaṁda aru bipra saciva gana |māgadha sūta biduṣa baṁdījana ||

sahita barāta rāu sanamānā |āyasu māgi phire agavānā ||

prathama barāta lagana teṁ āī |tāteṁ pura pramodu adhikāī ||

brahmānaṁdu loga saba lahahīṁ |baṛhahũ divasa nisi bidhi sana kahahīṁ ||

राम को देख कर बारात के लोग सुकून में आ गए. उनकी प्यार की फीलिंग को अल्फाज़ में नहीं बताया जा सकता. राजा के पास चारों बेटे चमक रहे थे, जैसे पैसा, धरम और बाकी सब चीज़ें इंसान रूप ले कर खड़े हो. दशरथ को अपने बेटों के साथ देख कर शहर के आदमी और औरतों को बहुत ज़्यादा खुशी हुई. भगवान ने फूल बरसाए, ढोल बाजे, और ऊपर के नाचने वाले नाच के गाने लगे. शतानंद, ब्रह्मन, मंत्री, गाने वाले कवि, सूच देने वाले, पढ़े लिखे लोग और भजन गाने वाले सब आए. राजा ने उन सब के साथ बारात की इज़्ज़त की, और स्वागत के लिए आए लोगों ने आशीर्वाद मांग कर वापस जा लिया. बारात शादी के वक्त से पहले ही आ गई, इसलिए शहर में खुली खुशी और बढ़ गई. सब लोग उस खुशी में डूबे जो ब्रह्मा जैसी थी, और उन्होंने क्रिएटर से दुआ की कि दिन और रात लंबी हो जाए.

दोहा 309

रामु सीय सोभा अवधि सुकृत अवधि दोउ राज।जहँ जहँ पुरजन कहहिं अस मिलि नर नारि समाज।।⁠309।।

rāmu sīya sobhā avadhi sukṛta avadhi dou rāja |jahã jahã purajana kahahiṁ asa mili nara nāri samāja ||⁠309||

राम और सीता सुंदरता की हद्द थे। और दोनों राजा पुण्य की हद्द थे। जहां जहां शहर के लोग इकट्ठे होते, औरत और मर्द सब मिलकर यही बात कहते।

Frequently Asked Questions

परंपरागत मान्यता में बरात-आगमन/मंगल-सगुन वर्णन का पाठ ‘मंगल-प्रवेश’ कराता है—गृह/यात्रा/विवाहादि शुभ-कर्मों में विघ्न-शमन, चित्त-प्रसन्नता, और ‘राम-दर्शन-लालसा’ (भक्ति-उत्कंठा) की वृद्धि। विशेषतः दोहा 300 (‘कबहिं देखिबे नयन भरि…’) का भाव-स्मरण दर्शन-प्रेम को स्थिर करता है।

लोक-परंपरा में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (राम-नाम) या ‘सियाराममय सब जग जानी’ जैसे नाम-स्मरण-सम्पुट जोड़े जाते हैं; कथा-गायन में ‘जय सियाराम’ ध्रुवक (refrain) भी प्रचलित है। (यह क्षेत्र/सम्प्रदाय के अनुसार बदलता है।)

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