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साधना-सीढ़ी का प्रथम सोपान: ‘श्रवण → संग → संस्कार’ से भक्ति का जन्म। बालकाण्ड में राम-लीला का प्रवेश ‘यज्ञ-रक्षा’ और ‘अहल्या-उद्धार’ जैसे प्रसंगों द्वारा होता है—जहाँ भय (असुर-उत्पात) का शमन, पाप/शाप (अहल्या) का विमोचन, और दर्शन-लालसा (मिथिला-नगर) का सौंदर्य-आस्वाद—तीनों मिलकर जिज्ञासु चित्त को शरणागति की ओर मोड़ते हैं। यह चरण साधक के भीतर ‘निर्भयता’ और ‘अनुग्रह’ का संस्कार बैठाता है: प्रभु की निकटता केवल राजसत्ता नहीं, करुणा-प्रधान धर्म-सेतु है।
यह प्रकरण साधना-सीढ़ी के प्रथम सोपान को मूर्त करता है: (1) ‘श्रवण’—गुरु-वाक्य (विश्वामित्र) से राम-लीला का प्रवेश; (2) ‘संग’—राम-सान्निध्य से भय का क्षय और धर्म-रक्षा का संस्कार; (3) ‘संस्कार’—अहल्या-उद्धार द्वारा यह बोध कि मुक्ति दंड-प्रधान नहीं, कृपा-प्रधान है। यज्ञ-रक्षा ‘अंतःयज्ञ’ का प्रतीक है—चित्त में सतोगुण की आहुति और विक्षेप/असुर-वृत्ति का शमन। अहल्या शाप-बंधन ‘जड़ हुई चेतना’ और अपराध-बोध/अविद्या का रूपक है; प्रभु-पाद-रज स्पर्श ‘नाम/कृपा’ की वह शक्ति है जो निष्क्रिय आत्मा को जाग्रत कर देती है। मिथिला-वर्णन बाह्य सौंदर्य नहीं, ‘चित्त-शुद्धि’ का आलंबन है—दर्शन-लालसा को प्रेम में बदलकर शरणागति की ओर मोड़ता है। समग्रतः तुलसी यहाँ दिखाते हैं कि निर्गुण-ब्रह्म सगुण-लीला में करुणा-प्रधान धर्म-सेतु बनकर आता है—राजसत्ता नहीं, अनुग्रह ही प्रभु-निकटता का सार है।
Verse 440 (चौपाई)
प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई।। होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख कीं रखवारी।। सुनि मारीच निसाचर क्रोही। लै सहाय धावा मुनिद्रोही।। बिनु फर बान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर पारा।। पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु सँघारा।। मारि असुर द्विज निर्मयकारी। अस्तुति करहिं देव मुनि झारी।। तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया। रहे कीन्हि बिप्रन्ह पर दाया।। भगति हेतु बहु कथा पुराना। कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना।। तब मुनि सादर कहा बुझाई। चरित एक प्रभु देखिअ जाई।। धनुषजग्य मुनि रघुकुल नाथा। हरषि चले मुनिबर के साथा।। आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जंतु तहँ नाहीं।। पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कहा बिसेषी।।
सुबह रघु के राजा ने ऋषि से कहा, तुम डरो मत और यज्ञ करो। ऋषि ने हवन शुरू किया और वो खुद यज्ञ की रक्षा करने लगा। मारीच राक्षस ने सुना और गुस्सा हो गया। उसने सुबाहु को साथ लिया और ऋषि के दुश्मन की तरह दौड़ा आया। राम ने एक बाण से उसको मारा, वो सौ योजन दूर समुंदर के पार गिर गया। फिर राम ने आग्नि बाण से सुबाहु को मारा और उसके भाई ने राक्षस की सेना को खत्म किया। राक्षसों को मारकर ब्राह्मण लोग शुद्धि किया और देवता और ऋषि लोग ने तारीफ की। कुछ दिन वहाँ रघु के राजा रहा और ब्राह्मण लोग पर दया की। ब्राह्मण ने पुरानी कहानियाँ बताईं भक्ति के लिए, जबकि प्रभु सब जानता था। तब ऋषि ने इज़्ज़त से समझाया कि चलो प्रभु का एक और चरित्र देखते हैं। ऋषि ने कहा, रघु कुल के नाथ, वहाँ धनुष का यज्ञ है। वो खुशी से बड़े ऋषि के साथ चले गए। रास्ते में एक आश्रम दिखा, वहाँ कोई पक्षी नहीं, कोई जानवर नहीं। प्रभु ने पत्थर देखा और ऋषि से पूछा। ऋषि ने पूरी कहानी बताई।
Verse 441 (दोहा/सोरठा)
गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर। चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर।।210।।
गौतम की पत्नी एक शाप की वजह से पत्थर बन गई थी। वो राम के चरणों की धूल माँग रही थी। हे रघुवीर, मुझपे कृपा करो।
Verse 442 (छंद)
परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही। देखत रघुनायक जन सुख दायक सनमुख होइ कर जोरि रही।। अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही। अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही।। धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई। अति निर्मल बानीं अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई।। मै नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई। राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई।। मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना। देखेउँ भरि लोचन हरि भवमोचन इहइ लाभ संकर जाना।। बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना। पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना।। जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी। सोइ पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी।। एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी। जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पतिलोक अनंद भरी।।
जब उसने राम के चरणों को छुआ, वो पाप धोने वाले और दुख मिटाने वाले थे। उसका सारा तप पूरा हो गया। राम को देख के वो खुशी से भर गई और हाथ जोड़ के खड़ी हो गई। इतना प्यार था कि उसका बदन काँपने लगा, कुछ बोल नहीं पा रही थी। वो बहुत खुशनसीब थी, राम के चरणों से लगी रही और आँखों से आँसू आ गए। उसने अपने मन को संभाला और राम को पहचाना। राम की कृपा से उसको भक्ति मिल गई। उसने साफ शब्दों में राम की स्तुति की। राम को ज्ञान से ही पाया जाता है, उनकी जय हो। उसने कहा, मैं एक पापी औरत हूँ और भगवान पूरे जग को साफ करते हैं। राम रावण का दुश्मन है और अपने भक्तों को खुशी देते हैं। कमल जैसे नैन वाले राम, मुझे इस दुनिया के डर से बचाओ, मैं आपकी शरण में आई हूँ। ऋषि का शाप मुझे मिला, वो मुझे बड़ा उपकार लगा। मैंने अपनी आँखों से हरि को देख लिया, यह शिव का वरदान है। प्रभु, मेरी अरदास सुनो, मैं सिंपल हूँ, मैं कोई और चीज़ नहीं माँगता। मेरा मन एक मधुमक्खी की तरह आपके चरणों की महक पी रहा है। वो चरणों से गंगा निकली थी जो शिव ने अपने सिर पे धारी थी। ब्रह्मा भी उन चरणों की पूजा करते हैं, कृपा करके मेरे सिर पे रख दो। ऐसे ही गौतम की पत्नी राम के चरणों में गिर गई और बार बार प्रणाम किया। उसको वो मिल गया जो वो चाहती थी, और वो अपने पति के पास खुशी से चली गई।
Verse 443 (दोहा/सोरठा)
अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल। तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल।।211।।
प्रभु गरीबों का दोस्त है, हरि बहुत दयालु है और किसी मतलब के लिए काम नहीं करता। तुलसीदास बोलते हैं, हे बेवकूफ, इनकी भक्ति करो और झूठ-मूठ के जाल को छोड़ो।
Verse 444 (चौपाई)
चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा।। गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि आई।। तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए। बिबिध दान महिदेवन्हि पाए।। हरषि चले मुनि बृंद सहाया। बेगि बिदेह नगर निअराया।। पुर रम्यता राम जब देखी। हरषे अनुज समेत बिसेषी।। बापीं कूप सरित सर नाना। सलिल सुधासम मनि सोपाना।। गुंजत मंजु मत्त रस भृंगा। कूजत कल बहुबरन बिहंगा।। बरन बरन बिकसे बन जाता। त्रिबिध समीर सदा सुखदाता।।
राम और लक्ष्मण ऋषि के साथ चले गए जहाँ गंगा नदी बहती है। गधि के बेटे ने उनको पूरा बताया कि गंगा कैसे धरती पर आई थी। फिर राम ने रिशियों के साथ नहाया और लोगों को दान दिया। ऋषि मंडली के साथ वो खुशी से चले और जल्दी विदेह नगर पास आ गए। राम ने शहर की खूबसूरती देखी तो खुश हो गया, लक्ष्मण भी खुश था। वहाँ कुआँ, तालाब, नदियाँ और झील थी, पानी अमृत जैसा था और सीढ़ियाँ रत्नों की बनी थी। भौरे मधुर गूँज रहे थे, पक्षी गाना गा रहे थे। जंगल में हर तरह के पेड़ फूल रहे थे, हवा भी खुशगवार थी।
Verse 445 (दोहा/सोरठा)
सुमन बाटिका बाग बन बिपुल बिहंग निवास। फूलत फलत सुपल्लवत सोहत पुर चहुँ पास।।212।।
वहाँ फूलों के बाग थे, जंगल थे जहाँ पक्षी रहते थे। पेड़ फूल रहे थे, फल लग रहे थे, नए पत्ते आ रहे थे। शहर चारों तरफ से चमक रहा था।
Verse 446 (चौपाई)
बनइ न बरनत नगर निकाई। जहाँ जाइ मन तहँइँ लोभाई।। चारु बजारु बिचित्र अँबारी। मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी।। धनिक बनिक बर धनद समाना। बैठ सकल बस्तु लै नाना।। चौहट सुंदर गलीं सुहाई। संतत रहहिं सुगंध सिंचाई।। मंगलमय मंदिर सब केरें। चित्रित जनु रतिनाथ चितेरें।। पुर नर नारि सुभग सुचि संता। धरमसील ग्यानी गुनवंता।। अति अनूप जहँ जनक निवासू। बिथकहिं बिबुध बिलोकि बिलासू।। होत चकित चित कोट बिलोकी। सकल भुवन सोभा जनु रोकी।।
इस शहर की खूबसूरती को शब्दों में बयान करना मुश्किल है। जहाँ भी नज़र जाती है, वहाँ दिल खो जाता है। बज़ारी सुंदर थी, अजब-अजब महल थे, जैसे विष्णु ने खुद अपना घर सजाया हो। धनवान सौदागर बैठे थे, सब कुछ बेच रहे थे, जैसे कुबेर के बराबर। चौक और गलियाँ सुंदर थी, खुशबू चलती थी। हर घर मंगल मय था, जैसे प्यार के देवता ने पेंट किया हो। शहर के लोग अच्छे थे, धरम और ज्ञान वाले। सबसे खास जनक का महल था, देवता भी देख के हैरान हो जाते थे। किला देख के दिल खुश हो जाता था, जैसे सारी दुनिया की खूबसूरती वहीं रुक गई हो।
Verse 447 (दोहा/सोरठा)
धवल धाम मनि पुरट पट सुघटित नाना भाँति। सिय निवास सुंदर सदन सोभा किमि कहि जाति।।213।।
सफेद महल थे, सोना दरवाज़े, अलग-अलग तरह के पर्दा। सीता के घर की खूबसूरती को कैसे बताऊँ? इतना सुंदर था कि बात नहीं बनती।
Verse 448 (चौपाई)
सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा। भूप भीर नट मागध भाटा।। बनी बिसाल बाजि गज साला। हय गय रथ संकुल सब काला।। सूर सचिव सेनप बहुतेरे। नृपगृह सरिस सदन सब केरे।। पुर बाहेर सर सारित समीपा। उतरे जहँ तहँ बिपुल महीपा।। देखि अनूप एक अँवराई। सब सुपास सब भाँति सुहाई।। कौसिक कहेउ मोर मनु माना। इहाँ रहिअ रघुबीर सुजाना।। भलेहिं नाथ कहि कृपानिकेता। उतरे तहँ मुनिबृंद समेता।। बिस्वामित्र महामुनि आए। समाचार मिथिलापति पाए।।
दरवाज़े मज़बूत थे, पत्थर के जैसे। राजा, गायक, कवि सब वहीं खड़े थे। घोड़े और हाथी के लिए बड़े अस्तबल थे, कभी खाली नहीं होते थे। योद्धा, मंत्री, सेनापति बहुत थे। हर घर राजा के महल जैसा लगता था। शहर के पास तालाब और नदियाँ थी, वहाँ राजा लोग उतरते थे। एक सुंदर बगिया देख के सब खुश हो गए। कुशिक ने कहा, यहाँ रघुनाथ रुक जाएंगे। राजा ने कहा, ठीक है प्रभु, और वहीं उतर गए सब रिशियों के साथ। विश्वामित्र आए, और मिथिला के राजा को खबर मिली।
Verse 449 (दोहा/सोरठा)
संग सचिव सुचि भूरि भट भूसुर बर गुर ग्याति। चले मिलन मुनिनायकहि मुदित राउ एहि भाँति।।214।।
अपने मंत्री, योद्धा, पंडित और ब्राह्मण लोग ले के राजा खुश हो कर चल पड़ा। वहीं जाके रिशियों के स्वामी से मिलने।
Verse 450 (चौपाई)
कीन्ह प्रनामु चरन धरि माथा। दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा।। बिप्रबृंद सब सादर बंदे। जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे।। कुसल प्रस्न कहि बारहिं बारा। बिस्वामित्र नृपहि बैठारा।। तेहि अवसर आए दोउ भाई। गए रहे देखन फुलवाई।। स्याम गौर मृदु बयस किसोरा। लोचन सुखद बिस्व चित चोरा।। उठे सकल जब रघुपति आए। बिस्वामित्र निकट बैठाए।। भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता। बारि बिलोचन पुलकित गाता।। मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी।।
राजा ने सर झुकाया और चरणों में माथा लगाया। रिशियों के स्वामी खुश हो कर आशीर्वाद दिया। सब ब्राह्मण लोग इज़्ज़त से प्रणाम किया, अपनी किस्मत समझ के। राजा बहुत खुश था। विश्वामित्र ने राजा से कई बार पूछा, कैसे हो आप? फिर उसे बिठाया। उसी वक़्त दोनों भाई आए, वो फूलों की बगिया देख रहे थे। एक काला, एक गोरा, दोनों जवान, नज़र आती थी तो दिल खुश हो जाता था। जब रघुनाथ आए, सब उठ खड़े हुए। विश्वामित्र ने उनको पास बिठाया। दोनों भाइयों को देख के सब खुश हो गए, आँखों में पानी आ गया। राजा ने उनकी शकल देखी, इतनी प्यारी, मन मोह लिया। अब जानना चाहता था, यह कौन हैं।
Verse 451 (दोहा/सोरठा)
प्रेम मगन मनु जानि नृपु करि बिबेकु धरि धीर। बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर।।215।।
राजा ने देखा कि मुनि का मन प्रेम में डूबा हुआ है। फिर भी उसने समझदारी से काम लिया और खुद को संभाला। उसने मुनि के चरणों में सिर झुकाया। आँखों में भारी भाव था, जब उसने बात शुरू की।
Verse 452 (चौपाई)
कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक।। ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि की सोइ आवा।। सहज बिरागरुप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा।। ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ। कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ।। इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा।। कह मुनि बिहसि कहेहु नृप नीका। बचन तुम्हार न होइ अलीका।। ए प्रिय सबहि जहाँ लगि प्रानी। मन मुसुकाहिं रामु सुनि बानी।। रघुकुल मनि दसरथ के जाए। मम हित लागि नरेस पठाए।।
राजा ने पूछा, नाथ, यह दोनों सुंदर बालक कौन हैं? क्या यह रिशियों के वंश के हैं या राजा परिवार के? क्या वही ब्रह्मा हैं जिन्हें वेदों में नेति-नेति कहते हैं? क्या वो दो रूप में आए हैं? मेरा मन तो अलग रहने में ही रहता है। पर जब इन्हें देखता हूँ, तो चकोर पक्षी की तरह चाँद के लिए तड़पता हूँ। इसलिए मैं सच-सच पूछता हूँ। नाथ, कुछ मत छुपाओ। इन्हें देख के इतना प्यार आता है कि मन ब्रह्मा के सुख को भी छोड़ देता है। मुनि मुस्कुरा के बोला, राजा, अच्छा पूछो। तुम्हारी बात व्यर्थ नहीं जाएगी। यह दोनों सब प्राणियों को प्यारे हैं। राम ने उनकी बात सुन के मन ही मन मुस्काया। यह रघु वंश के रत्न हैं, दशरथ के बेटे हैं। राजा ने मेरे लिए ही इन्हें भेजा है।
Verse 453 (दोहा/सोरठा)
रामु लखनु दोउ बंधुबर रूप सील बल धाम। मख राखेउ सबु साखि जगु जिते असुर संग्राम।।216।।
राम और लक्ष्मण दोनों बड़े भाई हैं। रूप और करैक्टर दोनों में अच्छे हैं, बल भी उनमें है। उन्होंने यज्ञ रखा, और पूरा जग देखता रहा जब उन्होंने राक्षसों से लड़ाई जीती।
Verse 454 (चौपाई)
मुनि तव चरन देखि कह राऊ। कहि न सकउँ निज पुन्य प्राभाऊ।। सुंदर स्याम गौर दोउ भ्राता। आनँदहू के आनँद दाता।। इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि। कहि न जाइ मन भाव सुहावनि।। सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू। ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू।। पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू। पुलक गात उर अधिक उछाहू।। म्रुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू। चलेउ लवाइ नगर अवनीसू।। सुंदर सदनु सुखद सब काला। तहाँ बासु लै दीन्ह भुआला।। करि पूजा सब बिधि सेवकाई। गयउ राउ गृह बिदा कराई।।
राजा ने कहा, मुनि, आपके चरण देख के मैं अपने पुण्य का फल नहीं बता सकता। यह दोनों भाई एक काला है एक गोरा, दोनों सुंदर हैं। खुशी भी इनसे मिलती है। दोनों का प्यार इतना साफ है, मन खुश हो जाता है। नाथ, सुनिए, यह दोनों ब्रह्मा और जीव की तरह आपस में प्यार करते हैं। राजा ने बार-बार प्रभु को देखा। शरीर में सुकन हुई, मन खुश हो गया। उसने मुनि की तारीफ की, चरणों में सिर झुकाया, और शहर की तरफ चल पड़ा। राजा ने उन्हें एक सुंदर महल दिया जो हर मौसम में सुख देता है। वहाँ उन्होंने रहने लगा, और नौकर भी लगा दिए। पूजा और सेवा करवाके राजा उनसे विदाई ली और अपने घर चला गया।
Verse 455 (दोहा/सोरठा)
रिषय संग रघुबंस मनि करि भोजनु बिश्रामु। बैठे प्रभु भ्राता सहित दिवसु रहा भरि जामु।।217।।
रघुकुल के रत्न ने रिशियों के साथ खाना खाया और थोड़ा आराम किया। फिर वो अपने भाइयों के साथ बैठ गए। दिन भर ऐसे ही बीत गया।
Verse 456 (चौपाई)
लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी।। प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं। प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं।। राम अनुज मन की गति जानी। भगत बछलता हिंयँ हुलसानी।। परम बिनीत सकुचि मुसुकाई। बोले गुर अनुसासन पाई।। नाथ लखनु पुरु देखन चहहीं। प्रभु सकोच डर प्रगट न कहहीं।। जौं राउर आयसु मैं पावौं। नगर देखाइ तुरत लै आवौ।। सुनि मुनीसु कह बचन सप्रीती। कस न राम तुम्ह राखहु नीती।। धरम सेतु पालक तुम्ह ताता। प्रेम बिबस सेवक सुखदाता।।
लक्ष्मण के दिल में एक ख्वाइश उठी कि काश मैं जनकपुर जाकर देख सकूं। पर वो राम से डरते थे और रिशि के सामने शर्माते थे, इसलिए अपनी बात ज़ुबान पर नहीं लाए। अंदर ही अंदर मुस्कुरा रहे थे। राम ने अपने भाई के दिल की बात समझ ली। अपने भक्त के प्यार से उनका खुश हो गया। राम थोड़ा शर्माके मुस्कुराए और गुरु की परमिशन लेकर बोले। मेरे प्रभु, लक्ष्मण शहर देखना चाहते हैं। पर आपसे डरते और शर्माते हैं, इसलिए कह नहीं रहे। अगर आप हुकुम दें तो मैं उन्हें शहर दिखाकर तुरंत वापस ला आऊंगा। यह सुनके रिशि बोले, बहुत प्यार से। राम तुम्हे धरम के रास्ते पे कैसे नहीं रखेंगे? तुम धरम का पालन करते हो, मेरे बेटा। और प्यार में सेवक अपने मालिक को खुशी देता है।
Verse 457 (दोहा/सोरठा)
जाइ देखी आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाइ। करहु सुफल सब के नयन सुंदर बदन देखाइ।।218।।
जाओ, शहर देखो और वापस आओ, दोनों भाई। तुम दोनों खुशी के खजाने हो। अपने सुंदर चेहरे दिखाकर सबकी आँखों को खुश कर दो।
Verse 458 (चौपाई)
मुनि पद कमल बंदि दोउ भ्राता। चले लोक लोचन सुख दाता।। बालक बृंदि देखि अति सोभा। लगे संग लोचन मनु लोभा।। पीत बसन परिकर कटि भाथा। चारु चाप सर सोहत हाथा।। तन अनुहरत सुचंदन खोरी। स्यामल गौर मनोहर जोरी।। केहरि कंधर बाहु बिसाला। उर अति रुचिर नागमनि माला।। सुभग सोन सरसीरुह लोचन। बदन मयंक तापत्रय मोचन।। कानन्हि कनक फूल छबि देहीं। चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं।। चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी। तिलक रेखा सोभा जनु चाँकी।।
दोनों भाई ने रिशि के चरणों को प्रणाम किया और निकल पड़े। यह दोनों दुनिया की आँखों को खुशी देते हैं। बच्चों का एक ग्रुप उनकी सुंदरता देखकर पीछे चल पड़ा। उनका दिल उन्हें देखकर खो गया। दोनों ने पीले कपड़े पहने थे, कमर पर क्विवर था, हाथ में सुंदर धनुष और तीर चमक रहे थे। जहाँ से गुज़रते, चंदन की खुशबू उनके पीछे रहती। एक का रंग साँवला, एक का गोरा, दोनों मिलके बहुत अच्छा लगता था। शेर जैसा कंधा, बड़े-बड़े हाथ, छाती पर नागमणि की माला चमक रही थी। आँखें सोना जैसी कमल जैसी, चेहरा चाँद जैसा, तीन तरह के दुख दूर कर देता है। कान में सोना के फूल जैसे गहने, हर नज़र से दिल चुरा लेते थे। उनकी नज़र प्यारी थी, भौंहें टेढ़ी-मेढ़ी, तिलक और रेखा चमक रही थी जैसे जानबूझके सजाया हो।
Verse 459 (दोहा/सोरठा)
रुचिर चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस। नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस।।219।।
चारों तरफ से चेहरा सुंदर था, सिर पे जुड़ा बना था, बाल घुंघराला था। नाखून से लेकर सिर के बाल तक दोनों भाई सुंदर थे, हर अंग में शोभा थी।
परंपरा में यज्ञ-रक्षा और अहल्या-उद्धार का पाठ ‘भय-निवारण’ और ‘कृपा-प्राप्ति’ का साधन माना जाता है: असुर-भय/अंतर्बाधा शांत होती है और शरणागत-भाव दृढ़ होता है। विशेषतः अहल्या-स्तुति का श्रवण/पाठ पाप-बोध को कृपा-विनय में रूपांतरित कर ‘चरण-रज-आश्रय’ की रुचि जगाता है।
सामान्य राम-नाम-सम्पुट: ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (या ‘सीताराम’). अहल्या-उद्धार/शरणागति प्रसंग में कई परंपराएँ ‘राम राम’ या ‘श्रीराम शरणं मम’ भाव-सम्पुट भी रखती हैं।
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