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सोपान-प्रवेश: ‘भक्ति का जन्म’ और ‘नाम-रूप’ में ब्रह्म की सहज सुलभता। बाललीला के माध्यम से जीव का चित्त कठोर तर्क-चतुराई छोड़कर प्रेम-सरलता (बालभाव) में उतरता है; यही मुक्तिसोपान का प्रथम स्थिर पायदान है—जहाँ निर्गुण-अगोचर प्रभु सगुण-शिशु बनकर साधक की दृष्टि को रस, विस्मय और शरणागति में शिक्षित करते हैं।
यह खण्ड ‘भक्ति का जन्म’ को तर्क-चातुर्य नहीं, बल्कि बालभाव-सरलता और वात्सल्य के द्वारा उद्घाटित करता है। कौसल्या का प्रेम साधक-चित्त का प्रतीक है: जब चित्त ‘माँ’ की तरह निष्कपट होकर प्रभु को अपनाता है, तब वही सगुण-शिशु भीतर ‘निर्गुण-अनन्त’ का द्वार खोल देता है (ब्रह्माण्ड-दर्शन = सीमित देह में असीम का प्रकाश)। ‘राम जगत पितु माता’ का संकेत बताता है कि ईश्वर केवल उपास्य नहीं, पालनकर्ता-आश्रय भी हैं—भक्ति का केन्द्र शरणागति है। नगर-सुख/लोक-समृद्धि ‘लोक-संग्रह’ का प्रतीक है: भक्ति निजी भाव से निकलकर समाज-धर्म में परिणत होती है। विश्वामित्र-आगमन इस क्रम को पूर्ण करता है—सरल प्रेम से आरम्भ हुई भक्ति अब धर्म-कर्तव्य (यज्ञ-रक्षा, अधर्म-निवारण) में परिपक्व होने लगती है।
Verse 420 (दोहा/सोरठा)
देखरावा मातहि निज अदभुत रुप अखंड। रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड।। 201।।
dekharāvā māta-hi nija adbhuta rūpa akhaṇḍa | roma roma prati lāge koṭi koṭi brahmāṇḍa || 201 ||
राम ने अपनी माँ को अपना असली रूप दिखाया। वो रूप इतना बड़ा था कि बाँटे नहीं बनता। उसके बालों के एक-एक बाल में करोड़-करोड़ ब्रह्मांड दिख रहे थे। माँ देखती रह गई।
Verse 421 (चौपाई)
अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन।। काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ।। देखी माया सब बिधि गाढ़ी। अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी।। देखा जीव नचावइ जाही। देखी भगति जो छोरइ ताही।। तन पुलकित मुख बचन न आवा। नयन मूदि चरननि सिरु नावा।। बिसमयवंत देखि महतारी। भए बहुरि सिसुरूप खरारी।। अस्तुति करि न जाइ भय माना। जगत पिता मैं सुत करि जाना।। हरि जननि बहुबिधि समुझाई। यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई।।
aganita ravi sasi siva caturānana | bahu giri sarita sindhu mahi kānana || kāla karma guna gyāna subhāū | sou dekhā jo sunā na kāū || dekhī māyā saba bidhi gāṛhī | ati sabhīta jorẽ kara ṭhāṛhī || dekhā jīva nacāvai jāhī | dekhī bhagati jo chōrai tāhī || tana pulakita mukha bacana na āvā | nayana mūdi caranani siru nāvā || bisamayavanta dekhi mahatārī | bhae bahuri sisu-rūpa kharārī || astuti kari na jāi bhaya mānā | jagata pitā mai suta kari jānā || hari janani bahu-bidhi samujhāī | yaha jani katahũ kahasi sunu māī ||
उन्होंने अनेक सूरज और चाँद देखे, शिव और ब्रह्मा भी साथ में। पहाड़, नदियाँ, समुंदर और जंगल भी सब दिखाई दिए। काल, करम, गुण, ज्ञान और सबका स्वभाव, यह सब वो देखा जो किसी ने सुना भी नहीं था। माया को इतना गहरा देखा कि डर के मारे हाथ जोड़ के खड़ी हो गई। जीव को जो नचाता है उस भगवान को देखा, और वो भक्ति भी देखी जिससे वो अपने भक्त के लिए सब छोड़ देता है। शरीर में रोमांच हो गया, मुँह से कुछ बोल नहीं पाया। आँखें बंद करके चरणों में सर झुका दिया। माता यह सब देख के हैरान रह गई, और खर वध करने वाले फिर से छोटा बच्चा बन गए। उनकी स्तुति करना मुश्किल हो गया, डर इतना था। सोचा, यह तो दुनिया के पिता हैं, मैंने उन्हें बेटा समझा? भगवान ने अपनी माता को बहुत समझाया। कहा, यह बात कहीं मत बताना, सुनो माँ।
Verse 422 (दोहा/सोरठा)
बार बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि।। अब जनि कबहूँ ब्यापै प्रभु मोहि माया तोरि।। 202।।
bāra bāra kausalayā binaya karai kara jori | aba jani kabahū̃ byāpai prabhu mohi māyā tori || 202 ||
कौशल्या बार-बार हाथ जोड़ के अर्ज़ करती हैं। कहती हैं, प्रभु, अब तुम्हारी मुझ पर कभी माया न आए।
Verse 423 (चौपाई)
बालचरित हरि बहुबिधि कीन्हा। अति अनंद दासन्ह कहँ दीन्हा।। कछुक काल बीतें सब भाई। बड़े भए परिजन सुखदाई।। चूड़ाकरन कीन्ह गुरु जाई। बिप्रन्ह पुनि दछिना बहु पाई।। परम मनोहर चरित अपारा। करत फिरत चारिउ सुकुमारा।। मन क्रम बचन अगोचर जोई। दसरथ अजिर बिचर प्रभु सोई।। भोजन करत बोल जब राजा। नहिं आवत तजि बाल समाजा।। कौसल्या जब बोलन जाई। ठुमकु ठुमकु प्रभु चलहिं पराई।। निगम नेति सिव अंत न पावा। ताहि धरै जननी हठि धावा।। धूरस धूरि भरें तनु आए। भूपति बिहसि गोद बैठाए।।
bālacarita hari bahubidhi kīnhā. ati anaṁda dāsanha kahaṁ dīnhā.. kacuka kāla bīteṁ saba bhāī. baṛe bhae parijana sukhadāī.. cūṛākarana kīnhā guru jāī. bipranha puni dachinā bahu pāī.. parama manohara carita apārā. karata phirata cāriu sukumārā.. mana krama bacana agocara joī. dasaratha ajīra bicara prabhu soī.. bhojana karata bola jaba rājā. nahiṁ āvata taji bāla samājā.. kausalyā jaba bolana jāī. ṭhumaku ṭhumaku prabhu calahiṁ parāī.. nigama neti siva aṁta na pāvā. tāhi dharai jananī haṭhi dhāvā.. dhūrasa dhūri bhareṁ tanu āe. bhūpati bihasi goda baiṭhāe..
भगवान ने बचपन में बहुत तरह के खेल दिए, और अपने सेवकों को बहुत खुशी दी। थोड़ा वक़्त बीतने के बाद चारों भाई बड़े हो गए, और घर वाले खुश थे। गुरु आए और बच्चों का पहला बाल मुंडवाया। ब्राह्मणों को बहुत दान दिया गया। बहुत प्यारे और अनंत थे वो चरित्र, चारों राजकुमार खेलते फिरते थे। जिसे मन, करम और बानी नहीं पा सकती, वो दशरथ के महल में घूमता था। जब राजा खाना खाता था और उन्हें बुलाता था, तो वो बच्चों के साथ खेलना छोड़ के नहीं आता था। जब कौशल्या उन्हें लेने जाती, तो वो ठुमक-ठुमक के भाग जाता था। जिसे वेद भी नहीं पा सकते, शिव भी नहीं पा सकते, उसको माँ प्यार से पकड़ने के लिए दौड़ती थी। धूल में लटके-मिटके आता था, और राजा मुस्कुरा के गोद में बिठा लेता था।
Verse 424 (दोहा/सोरठा)
भोजन करत चपल चित इत उत अवसरु पाइ। भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ।।203।।
bhojana karata capala cita ita uta avasaru pāi | bhāji cale kilakata mukha dadhi odana lapaṭāi ||203||
खाना खाते वक़्त बच्चों का मन इधर-उधर लगता था। जैसे ही मौका मिलता, वो दौड़ पड़ते थे। हँसते हुए भागते थे, मुँह पर दही और चावल लगा हुआ होता था।
Verse 425 (चौपाई)
बालचरित अति सरल सुहाए। सारद सेष संभु श्रुति गाए।। जिन कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए बिधाता।। भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता।। गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई।। जाकी सहज स्वास श्रुति चारी। सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी।। बिद्या बिनय निपुन गुन सीला। खेलहिं खेल सकल नृपलीला।। करतल बान धनुष अति सोहा। देखत रूप चराचर मोहा।। जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिं सब भाई। थकित होहिं सब लोग लुगाई।।
bālacarita ati sarala suhāe | sārad seṣa saṁbhu śruti gāe || jina kara mana inha sana nahiṁ rātā | te jana baṁcita kie bidhātā || bhae kumāra jabahiṁ saba bhrātā | dīnha janeū guru pitu mātā || gura-gṛhaṁ gae paṛhana raghurāī | alapa kāla bidyā saba āī || jākī sahaja svāsa śruti cārī | so hari paṛha yaha kautuka bhārī || bidyā binaya nipuna guna sīlā | khelahiṁ khela sakala nṛpa-līlā || kara-tala bāna dhanuṣa ati sohā | dekhata rūpa carācara mohā || jinha bīthinha biharahiṁ saba bhāī | thakita hohiṁ saba loga lugāī ||
बचपन के ये खेल बहुत सिंपल और प्यारे हैं। सरस्वती, शेषनाग, शिव और वेद भी इनकी बात करते हैं। जिनका मन इन बातों में नहीं लगता, उन्हें भगवान ने रहने दिया। जब सब भाई बड़े हो गए, तो उन्हें जनेऊ दिया गया। गुरु, पिता और माँ ने यह संस्कार किया। फिर सब गुरु के घर पढ़ने गए। थोड़े ही दिन में सब विद्या आ गई। जिसकी साँस में वेद हैं, उस हरि का पढ़ना, यह एक बड़ा खेल है। विद्या में निपुण, विनय में, गुण और शील में, सब राजकुमार खेलते थे। हाथ में बाण और धनुष लेकर सबको मोह देता था। जितनी गलियों में वो घूमते थे, लोग देख-देख के थक जाते थे।
Verse 426 (दोहा/सोरठा)
कोसलपुर बासी नर नारि बृद्ध अरु बाल। प्रानहु ते प्रिय लागत सब कहुँ राम कृपाल।।204।।
kosalapura bāsī nara nāri bṛddha aru bāla | prānahu te priya lāgata saba kahuँ rāma kṛpāla ||204||
कोसलापुर में जो लोग रहते थे, औरतें और मर्द, बुढ़े और बच्चे सब। सबको राम अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारा था। राम सबपे तरस खाते थे।
Verse 427 (चौपाई)
बंधु सखा संग लेहिं बोलाई। बन मृगया नित खेलहिं जाई।। पावन मृग मारहिं जियँ जानी। दिन प्रति नृपहि देखावहिं आनी।। जे मृग राम बान के मारे। ते तनु तजि सुरलोक सिधारे।। अनुज सखा सँग भोजन करहीं। मातु पिता अग्या अनुसरहीं।। जेहि बिधि सुखी होहिं पुर लोगा। करहिं कृपानिधि सोइ संजोगा।। बेद पुरान सुनहिं मन लाई। आपु कहहिं अनुजन्ह समुझाई।। प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा।। आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा।।
bandhu sakhā saṅga lehiṁ bolāī | bana mṛgayā nita khelahiṁ jāī || pāvana mṛga mārahiṁ jiyaṁ jānī | dina prati nṛpahi dekhāvahiṁ ānī || je mṛga rāma bāna ke māre | te tanu taji suraloka sidhāre || anuja sakhā saṅga bhojana karahīṁ | mātu pitā agyā anusarahīṁ || jehi bidhi sukhī hohiṁ pura logā | karahiṁ kṛpānidhi soi saṁjogā || beda purāna sunahiṁ mana lāī | āpu kahahiṁ anujanha samujhāī || prātakāla uṭhi kai raghunāthā | mātu pitā guru nāvahiṁ māthā || āyasu māgi karahiṁ pura kājā | dekhi carita haraṣai mana rājā ||
अपने भाई-बंदों और दोस्तों को साथ लेके वो जंगल में जाते थे। रोज़ शिकार खेलते थे वहाँ। हिरण मारते थे, दिल में यह बात रखते थे कि यह साफ करता है। रोज़ राजा को दिखाते थे। जो हिरण राम के तीर से मारे गए, वो अपना शरीर छोड़के भगवान के पास चले गए। छोटे भाई और दोस्तों के साथ खाना खाते थे। माँ बाप की बात मानते थे। जिस तरह से शहर के लोग खुश हो सके, उस तरह का काम करता था वो जो सबपर तरस खाता था। वेद और पुराण सुनते थे, दिल लगाके। जो समझा, छोटे भाइयों को समझाता था। सुबह उठके राम माँ बाप और गुरु को पैर छूते थे। इजाज़त माँगके शहर का काम करते थे। राजा देखके खुश होता था।
Verse 428 (दोहा/सोरठा)
ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप॥ भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप॥205॥
byāpaka akala anīha aja nirguna nāma na rūpa | bhagata hetu nānā bidhi karata caritra anūpa ||205||
भगवान सब जगह हैं, दिमाग से भी ऊपर हैं। कोई इच्छा नहीं, कोई जनम नहीं। न कोई नाम, न कोई शकल। पर अपने भक्तों के लिए धूप के रूप में आते हैं। बहुत तरह से काम करते हैं, कोई उनके जैसा नहीं।
Verse 429 (चौपाई)
यह सब चरित कहा मैं गाई। आगिलि कथा सुनहु मन लाई।। बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी। बसहि बिपिन सुभ आश्रम जानी।। जहँ जप जग्य मुनि करही। अति मारीच सुबाहुहि डरहीं।। देखत जग्य निसाचर धावहि। करहि उपद्रव मुनि दुख पावहिं।। गाधितनय मन चिंता ब्यापी। हरि बिनु मरहि न निसिचर पापी।। तब मुनिवर मन कीन्ह बिचारा। प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा।। एहुँ मिस देखौं पद जाई। करि बिनती आनौ दोउ भाई।। ग्यान बिराग सकल गुन अयना। सो प्रभु मै देखब भरि नयना।।
yaha saba carita kahā maiṁ gāī | āgili kathā sunahu mana lāī || bisvāmitra mahāmuni gyānī | basahi bipina subha āśrama jānī || jahaṁ japa jagya muni karahī | ati mārīca subāhuhi ḍarahīṁ || dekhata jagya nisācara dhāvahi | karahi upadrava muni dukha pāvahiṁ || gādhi-tanaya mana ciṁtā byāpī | hari binu marahi na nisīcara pāpī || taba munivara mana kīnha bicārā | prabhu avatareu harana mahi bhārā || ehuṁ misa dekhauṁ pada jāī | kari binatī ānau dou bhāī || gyāna birāga sakala guna ayanā | so prabhu mai dekhab bhari nayanā ||
यह सब बात मैंने गाके सुनाई। अब आगे की कथा सुनो, दिल लगाके। विश्वामित्र बड़े ज्ञान वाले रिशि थे। जंगल में अच्छा आश्रम था उनका। वहाँ रिशि लोग पूजा करते थे। पर मारीच और सुबाहु का बहुत डर था। जब पूजा चल रही होती, राक्षस आ जाते थे। रिशि लोग परेशान हो जाते थे। गधि के बेटे ने सोचा, हरि के बिना यह पापी नहीं मरेंगे। तब राही ने सोचा, भगवान ने धरती का बोझ उतरने के लिए जनम लिया है। मैं जाके उनके पास भीख माँगूँगा, दोनों भाइयों को लाऊँगा। वो ज्ञान और वैराग्य का आईना हैं, उन्हे मैं अपने आँखों भर देखूँगा।
Verse 430 (दोहा/सोरठा)
बहुबिधि करत मनोरथ जात लागि नहिं बार। करि मज्जन सरऊ जल गए भूप दरबार।।206।।
bahubidhi karata manoratha jāta lāgi nahiṃ bāra | kari majjana saraū jala gae bhūpa darabāra ||206||
जब उन्होंने मन में इरादा कर लिया, तो बहुत तरह से काम किया। देर नहीं लगी। सरयू नदी में नहाके राजा के दरबार चले गए।
Verse 431 (चौपाई)
मुनि आगमन सुना जब राजा। मिलन गयऊ लै बिप्र समाजा।। करि दंडवत मुनिहि सनमानी। निज आसन बैठारेन्हि आनी।। चरन पखारि कीन्हि अति पूजा। मो सम आजु धन्य नहिं दूजा।। बिबिध भाँति भोजन करवावा। मुनिवर हृदयँ हरष अति पावा।। पुनि चरननि मेले सुत चारी। राम देखि मुनि देह बिसारी।। भए मगन देखत मुख सोभा। जनु चकोर पूरन ससि लोभा।। तब मन हरषि बचन कह राऊ। मुनि अस कृपा न कीन्हिहु काऊ।। केहि कारन आगमन तुम्हारा। कहहु सो करत न लावउँ बारा।। असुर समूह सतावहिं मोही। मै जाचन आयउँ नृप तोही।। अनुज समेत देहु रघुनाथा। निसिचर बध मैं होब सनाथा।।
muni āgamana sunā jaba rājā | milana gayau lai bipra samājā || kari daṇḍavata munihi sanamānī | nija āsana baiṭhārenhi ānī || carana pakhāri kīnhi ati pūjā | mo sama āju dhanya nahi dūjā || bibidha bhā̃ti bhojana karavāvā | munivara hṛdayã haraṣa ati pāvā || puni caranani mele suta cārī | rāma dekhi muni deha bisārī || bhae magana dekhata mukha sobhā | janu cakora pūrana sasi lobhā || taba mana haraṣi bacana kaha rāū | muni asa kṛpā na kīnhihu kāū || kehi kārana āgamana tumhārā | kahahu so karata na lāvaũ bārā || asura samūha satāvahĩ mohī | mai jācana āyũ nṛpa tohī || anuja sameta dehu raghunāthā | nisicara badha maĩ hoba sanāthā ||
जब राजा ने सुना कि रिशि आ रहे हैं, वो ब्राह्मण लोग ले के मिलने गए। रिशि को दंडवत करके पूजा की, और अपना आसन दे के बिठाया। उनके पाँव धोके पूजा की, और बोले, आज मेरे जैसा खुश कोई नहीं। बहुत तरह का खाना खिलाया, रिशि के दिल में बहुत खुशी हुई। फिर राजा ने अपने चारों बेटे रिशि के पाँव पास बिठाए। राम को देख के रिशि को अपनी बॉडी का भी पता नहीं रहा। वो इतने खुश हो गए जैसे चाँद को देख के चकोर पक्षी ललचाता है। तब राजा ने खुश होके कहा, रिशि ने मेरे ऊपर इतनी कृपा किसी पे नहीं की। आप ऐसे क्यों आए हैं, बताओ, मैं देर भी नहीं करूँगा। राक्षस लोग मुझे बहुत परेशान करते हैं, इसलिए मैं आपसे गुज़ारिश करने आया हूँ। रघुनाथ को उनके भाई के साथ मुझे दे दो, मैं राक्षसों को मार के अपना काम पूरा करूँगा।
Verse 432 (दोहा/सोरठा)
देहु भूप मन हरषित तजहु मोह अग्यान। धर्म सुजस प्रभु तुम्ह कौं इन्ह कहँ अति कल्यान।।207।।
dehu bhūpa mana haraṣita tajahu moha agyāna | dharma sujasa prabhu tumha kaũ inha kahã ati kalyāna ||207||
राजा, दिल से खुश हो के यह दे दो, और अपना भ्रम और अंधेरा छोड़ दो। मैं आपके लिए धरम और अच्छी बड़ाई चाहता हूँ, यह सब आपके भले के लिए कह रहा हूँ।
Verse 433 (दोहा/सोरठा)
सौंपे भूप रिषिहि सुत बहु बिधि देइ असीस। जननी भवन गए प्रभु चले नाइ पद सीस।।208(क)।। पुरुषसिंह दोउ बीर हरषि चले मुनि भय हरन।। कृपासिंधु मतिधीर अखिल बिस्व कारन करन।।208(ख)।।
sauṁpe bhūpa riṣi-hi suta bahu bidhi dei asīsa | jananī bhavana gae prabhu cale nāi pada sīsa ||208(ka)|| puruṣasiṁha dou bīra haraṣi cale muni bhaya harana || kṛpāsiṁdhu matidhīra akhila bisva kārana karana ||208(kha)||
राजा ने अपने बेटे रिशि को सौंप दिए, और उन्हें आशीर्वाद दिया। माँ लोग अंदर चले गए, और राम लक्ष्मण ने रिशि के पाँव टच करके उनके साथ चल दिए। दोनों बड़े वीर थे, खुश हो के चले, रिशि का डर मिटाने वाले। वो सब पर दया करते थे, समझदार थे, और सारी दुनिया के कारण थे।
Verse 434 (दोहा/सोरठा)
आयुष सब समर्पि कै प्रभु निज आश्रम आनि। कंद मूल फल भोजन दीन्ह भगति हित जानि।।209।।
āyuṣa saba samarpi kai prabhu nija āśrama āni | kanda mūla phala bhojana dīnh(a) bhagati hita jāni ||209||
रिशि ने अपनी जान भी भगवान को दे दी, और उन्हें अपने आश्रम ले आए। उन्होंने जान बूझ के सिंपल खाना दिया, कंद मूल और फल, क्योंकि भक्ति में यह सही है।
Verse 435 (दोहा/सोरठा)
सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान। सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान।।14(क)।। सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर। करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर।।14(ख)।। कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल। बाल बिनय सुनि सुरुचि लखि मोपर होहु कृपाल।।14(ग)।। बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ। सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित।।14(घ)।। बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस। जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु।।14(ङ)।। बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहि कीन्ह जहँ। संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी।।14(च)।। बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउँ कर जोरि। होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि।।14(छ)।।
जो लोग समझदार हैं, वो सिंपल कविता में लिखी हुई अच्छी बात को मानते हैं। अपना पुराना दुश्मनी भूल जाते हैं और सुन के उसकी तारीफ करते हैं। पर यह तभी हो सकता है जब दिल साफ हो, मेरी समझ और ताकत बहुत कम है। हे हरि, मुझ पे कृपा करो, मैं तुम्हारी महिमा गाऊँ, बार बार गुज़ारिश करता हूँ। मैं कवि हूँ, रघुवर की कथा जानता हूँ, मन के सरोवर में रहता हूँ। मेरी सिंपल अर्ज़ सुन के, मेरी भक्ति देख के, मुझ पे दया करो। उस रिशि के पाँव को नमस्ते जो रामायण लिखा, जो चीनी जैसी मीठी है, बड़े नरम दिल वाली, और कोई दोष नहीं। चारों वेद को नमस्ते, जो संसार के समुंदर में कश्ती जैसी हैं। जो रघुवर की महिमा गाते हैं, उन्हें सपने में भी दुख नहीं होता। ब्रह्मा के पाँव की धूल को नमस्ते, जिन्होंने संसार के समुंदर को पार करने का रास्ता बनाया। संत लोग के लिए अमृत की चाँदनी निकली, और बुरे लोग का ज़हर समुंदर का पानी बन गया। देवी देवता, ब्राह्मण, ज्ञानी, और ग्रहों के पाँव को नमस्ते करके हाथ जोड़ के कह रहा हूँ। खुश हो जाओ और मेरे सारे अच्छे इरादे पूरे करो।
Verse 436 (चौपाई)
राम चरित चिंतामनि चारू। संत सुमति तिय सुभग सिंगारू।। जग मंगल गुन ग्राम राम के। दानि मुकुति धन धरम धाम के।। सदगुर ग्यान बिराग जोग के। बिबुध बैद भव भीम रोग के।। जननि जनक सिय राम प्रेम के। बीज सकल ब्रत धरम नेम के।। समन पाप संताप सोक के। प्रिय पालक परलोक लोक के।। सचिव सुभट भूपति बिचार के। कुंभज लोभ उदधि अपार के।। काम कोह कलिमल करिगन के। केहरि सावक जन मन बन के।। अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद घन दारिद दवारि के।। मंत्र महामनि बिषय ब्याल के। मेटत कठिन कुअंक भाल के।। हरन मोह तम दिनकर कर से। सेवक सालि पाल जलधर से।। अभिमत दानि देवतरु बर से। सेवत सुलभ सुखद हरि हर से।। सुकबि सरद नभ मन उडगन से। रामभगत जन जीवन धन से।। सकल सुकृत फल भूरि भोग से। जग हित निरुपधि साधु लोग से।। सेवक मन मानस मराल से। पावक गंग तंरग माल से।।
राम की कहानी ऐसी चिंतामणि है जो सब काम पूरी करती है। यह साधु लोग का गहना है, समझदार लोग की समझ, और भाग्यशाली लोग की शोभा। राम की महिमा गुणों का गाँव है, जग में मंगल लाती है। यह मुक्ति देती है, धन का खजाना है, धरम का घर है। यह सच्चा गुरु है ज्ञान, वैराग्य और योग का। देवता लोग का डॉक्टर है भव के बड़े रोग का। यह सीता और राम के प्यार की माँ बाप है। सारे व्रत, धरम और नियम इसमें बीज है। यह पाप, दुख और गम मिटाती है। यह दुनिया और परलोक की प्यारी रक्षा करती है। यह सलाहकार है, बहादुर सेनापति है, और राजनीति का राजा है। समुंदर की लालच को इसमें बंद किया है। यह शेर है जो काम, गुस्सा और कलियुग के दोष के हाथी को मारता है। भगवान के सेवक के दिल का जंगल है। यह मेहमान है, शिव जी का प्यारा है। यह बादल है जो इच्छा पूरी करता है और दरिद्रता मिटाता है। यह मंत्र है जो इंद्रियों के साँप को मारता है और माथ के पाप के निशान को मिटाता है। यह अंधेरा मोह का धूप से दूर करती है। सेवक को खाना देती है, बादल पानी देता है। यह ऐसा पेड़ है जो जो माँगो वो देता है। हरि और शिव की सेवा आसान है और सुख देता है। कवि के दिमाग के लिए आकाश है। राम के भक्त की जान और धन है। यह पुण्य का पूरा फल देती है। जग में भलाई करती है और साधु लोग की भलाई चाहती है। सेवक के दिल की झील का हंस है। गंगा की लहरों को साफ करती है।
Verse 437 (चौपाई)
सप्त प्रबन्ध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मन माना।। रघुपति महिमा अगुन अबाधा। बरनब सोइ बर बारि अगाधा।। राम सीय जस सलिल सुधासम। उपमा बीचि बिलास मनोरम।। पुरइनि सघन चारु चौपाई। जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई।। छंद सोरठा सुंदर दोहा। सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा।। अरथ अनूप सुमाव सुभासा। सोइ पराग मकरंद सुबासा।। सुकृत पुंज मंजुल अलि माला। ग्यान बिराग बिचार मराला।। धुनि अवरेब कबित गुन जाती। मीन मनोहर ते बहुभाँती।। अरथ धरम कामादिक चारी। कहब ग्यान बिग्यान बिचारी।। नव रस जप तप जोग बिरागा। ते सब जलचर चारु तड़ागा।। सुकृती साधु नाम गुन गाना। ते बिचित्र जल बिहग समाना।। संतसभा चहुँ दिसि अवँराई। श्रद्धा रितु बसंत सम गाई।। भगति निरुपन बिबिध बिधाना। छमा दया दम लता बिताना।। सम जम नियम फूल फल ग्याना। हरि पत रति रस बेद बखाना।। औरउ कथा अनेक प्रसंगा। तेइ सुक पिक बहुबरन बिहंगा।।
इस ग्रंथ के सात भाग सुंदर सीढ़ियाँ हैं। ज्ञान की आँख उन्हें देखती है और मन हैरान रह जाता है। रघु के स्वामी की महिमा गुण से परे है, कोई सीमा नहीं। मैं जितना समझा सकता हूँ लिखता हूँ, लेकिन यह समुंदर जैसा गहरा है। राम और सीता की कीर्ति पानी और अमृत जैसी है। इसमें जो उदाहरण हैं वो मन को भाते हैं। चौपाइयाँ कमल जैसी घनी और सुंदर हैं। युक्तियाँ मोती जैसी हैं सुंदर सीप में। सोरठा और दोहा रंग-बिरंगे कमल हैं जो झील को सजाते हैं। अर्थ अनुपम है और भाषा सुंदर है, फूलों के पोलेन और खुशबू जैसी। पुण्य का संकलन मधुमक्खियों की माला है। ज्ञान, वैराग्य और विचार हंस हैं। ध्वनि और कवित्व की गुण मछलियाँ हैं मन को भाते हैं। अर्थ, धरम, काम और मोक्ष मैं ज्ञान और विवेक से बताता हूँ। नौ रस, नाम जप, तप, योग और वैराग्य सुंदर तालाब हैं पानी के जीव से भरे। साधु लोग नाम और गुण गाते हैं, अजब पक्षी हैं पानी में। साधुओं की सभा चारों तरफ है, श्रद्धा बसंत जैसी गाती है। भक्ति का वर्णन तारों की बेल है, क्षमा, दया और दम की। व्रत, नियम, फूल और फल ज्ञान के हैं। हरि में प्रेम और आनंद, वेद बताते हैं। बहुत सी कहानियाँ और प्रसंग हैं, तोता और रंग-बिरंगे पक्षी जैसे।
Verse 438 (चौपाई)
सुनि राजा अति अप्रिय बानी। हृदय कंप मुख दुति कुमुलानी।। चौथेंपन पायउँ सुत चारी। बिप्र बचन नहिं कहेहु बिचारी।। मागहु भूमि धेनु धन कोसा। सर्बस देउँ आजु सहरोसा।। देह प्रान तें प्रिय कछु नाही। सोउ मुनि देउँ निमिष एक माही।। सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाईं। राम देत नहिं बनइ गोसाई।। कहँ निसिचर अति घोर कठोरा। कहँ सुंदर सुत परम किसोरा।। सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी। हृदयँ हरष माना मुनि ग्यानी।। तब बसिष्ट बहु निधि समुझावा। नृप संदेह नास कहँ पावा।। अति आदर दोउ तनय बोलाए। हृदयँ लाइ बहु भाँति सिखाए।। मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनि पिता आन नहिं कोऊ।।
राजा ने जब वो कठिन बात सुनी तो उसका दिल काँप गया और चेहरा उदास हो गया। राजा ने कहा, मैंने चार बेटे पाए हैं, लेकिन ब्राह्मण की बात का मैंने सोचा नहीं। आप ज़मीन माँगो, गायें माँगो, धन माँगो, खजाना माँगो। मैं आज खुशी से सब दे देता हूँ। मेरा शरीर और जान से ज़्यादा प्यारा कुछ नहीं, वो भी मैं आपको एक पल में दे देता हूँ। मेरे सारे बेटे मेरी जान जैसे प्यारे हैं। राम को देना ठीक नहीं है। वो राक्षस है, बहुत कठोर और भयानक। और यहाँ मेरा सुंदर बेटा है, एक किशोर। राजा की बात में जो प्यार था वो सुन कर मुनि को खुशी हुई। फिर वशिष्ठ ने राजा को समझाया और राजा का डाउट खत्म हो गया। राजा ने दोनों बेटों को प्यार से बुलाया और उन्हें अपने दिल में लिया। राजा ने कहा, मेरे प्राण नाथ, तुम दोनों मेरे बेटे हो। आप मुनि, आप मेरे पिता हो, और कोई नहीं।
Verse 439 (चौपाई)
अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला।। कटि पट पीत कसें बर भाथा। रुचिर चाप सायक दुहुँ हाथा।। स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। बिस्बामित्र महानिधि पाई।। प्रभु ब्रह्मन्यदेव मै जाना। मोहि निति पिता तजेहु भगवाना।। चले जात मुनि दीन्हि दिखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई।। एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा।। तब रिषि निज नाथहि जियँ चीन्ही। बिद्यानिधि कहुँ बिद्या दीन्ही।। जाते लाग न छुधा पिपासा। अतुलित बल तनु तेज प्रकासा।।
उसकी आँखें लाल थी, छाती और बाजू चौड़ी थी। शरीर नीला था कमल के पानी जैसा, तमाल के पेड़ जैसा काला। उसने पीला कपड़ा कमर में बाँधा था। दोनों हाथ में सुंदर धनुष और बाण थे। दोनों भाई काला और गोरा, दोनों सुंदर थे। विश्वामित्र ने बड़ा खजाना पा लिया। मैं जानता हूँ यह प्रभु ब्राह्मण का देवता है। आप हमेशा मेरे पिता हैं। जब वो चले गए तो ऋषि ने रास्ता दिखाया। ताड़का ने सुना और गुस्से से दौड़ा आई। एक ही बाण से उसकी जान ले ली। उसे दीन जानके अपना स्थान दिया। तब ऋषि ने अपने प्रभु को दिल में पहचाना। उसको विद्या दी, ज्ञान का खजाना दिया। तब से भूख प्यास नहीं लगी। शरीर में अखंड बल और तेज चमकता है।
परम्परानुसार बाललीला और कौसल्या-ब्रह्माण्ड-दर्शन का पाठ चित्त की कठोरता/भय को हरकर प्रेम-भक्ति की वृद्धि करता है; माया-भ्रम का क्षय, गृहस्थ-जीवन में शान्ति, और ‘राम-नाम’ में दृढ़ निष्ठा का फल कहा जाता है। विश्वामित्र-प्रसंग का पाठ धर्म-कार्य में साहस और विघ्न-नाश हेतु विशेष मान्य है।
सामान्यत: ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ नाम-संपुट या ‘राम राम’ जप-संपुट प्रचलित है। यज्ञ-रक्षा/विघ्न-शमन हेतु कुछ परम्पराओं में ‘ॐ श्रीरामाय नमः’ (नाम-मंत्र) को चौराई/दोहा के आरम्भ-अन्त में जोड़ा जाता है।
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