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Rishi: Atharvanic tradition (speculative-ritual hymn)
Devata: Brahmaudana / Yajña personified (ritual entity as devatā)
Chandas: Mixed/prose-like anuṣṭubh-adjacent; treated as mantraic statement (not a strict RV-style stanza)
Mantra 1
ब्रह्मौदनम्। छन्दां॑सि प॒क्षौ मुख॑मस्य स॒त्यं वि॑ष्टा॒री जा॒तस्तप॒सोऽधि॑ य॒ज्ञः
यह ब्राह्मण लोगों के लिए खाना है। इसके दो पंख हैं, जैसे गाने के दो हिस्से होते हैं। इसका मुँह सच्चाई है। यह बहुत फैला हुआ है। तपस्या से पैदा हुआ यह यज्ञ है।
Mantra 2
अ॒न॒स्थाः पू॒ताः पव॑नेन शु॒द्धाः शुच॑यः॒ शुचि॒मपि॑ यन्ति लो॒कम्। नैषां शि॒श्नं प्र द॑हति जा॒तवे॑दाः स्व॒र्गे लो॒के ब॒हु स्त्रैण॑मेषाम्
जिन लोगों के पास हड्डी नहीं रहती, वो साफ हो जाते हैं। हवा उन्हे साफ करती है और वो साफ दुनिया में जाते हैं। अग्नि उनकी बॉडी को नहीं जलाता। स्वर्ग में उनके लिए औरतों का हिस्सा बहुत मिलता है।
Mantra 3
वि॒ष्टा॒रिण॑मोद॒नं ये पच॑न्ति॒ नैना॒नव॑र्तिः सचते क॒दा च॒न। आस्ते॑ य॒म उप॑ याति दे॒वान्त्सं ग॑न्ध॒र्वैर्मदते सो॒म्येभिः॑
जो लोग विस्तरिन नाम की खीर बनाते हैं, उनको मौत कभी नहीं पकड़ती। वो लोग यमराज के पास जाते हैं। वहाँ देवताओं के साथ रहते हैं। गंधर्व जैसे लोग उनके साथ खुश रहते हैं। सोम रस जैसा आनंद मिलता है उनको।
Mantra 4
वि॒ष्टा॒रिण॑मोद॒नं ये पच॑न्ति॒ नैना॑न् य॒मः परि॑ मुष्णाति॒ रेतः॑ । र॒थी ह॑ भू॒त्वा र॑थ॒यान॑ ईयते प॒क्षी ह॑ भू॒त्वाति॒ दिवः॒ समे॑ति
जो लोग विस्तरिन खीर पकाते हैं, यमराज उनकी औलाद नहीं ले जाता। वो रथ में बैठ के आसमान में घूमता है। पक्षी बन के वाह ऊपर तक जाता है जहाँ आसमान भी नहीं होता। यह सब उनको मिलता है जो यह खीर बनाते हैं।
Mantra 5
ष॒ य॒ज्ञानां॒ वित॑तो॒ वहि॑ष्ठो विष्टा॒रिणं॑ प॒क्त्वा दि॒वमा विवे॑श । आ॒ण्डीकं॑ कुमु॑दं॒ सं त॑नोति॒ बिसं॑ शा॒लूकं॒ शफ॑को मुला॒ली। ए॒तास्त्वा॒ धारा॒ उप॑ यन्तु॒ सर्वाः॑ स्व॒र्गे लो॒के मधु॑म॒त् पिन्व॑माना॒ उप॑ त्वा तिष्ठन्तु पुष्क॒रिणीः॒ सम॑न्ताः
जो यह खीर पकाता है वो सबसे बड़ा यज्ञ करने वाला बन जाता है। वो सीधा स्वर्ग में जाता है। वहाँ उसे कमल और कुमुद जैसे फूल मिलते हैं। नदियाँ उसके पास आती हैं जो शहद जैसी मीठी हैं। स्वर्ग में हर तरफ कमल के ताल हो जाते हैं उसके आस-पास।
Mantra 6
घृ॒तह्र॑दा॒ मधु॑कूलाः॒ सुरो॑दकाः क्षी॒रेण॑ पू॒र्णा उ॑द॒केन॑ द॒ध्ना। ए॒तास्त्वा॒ धारा॒ उप॑ यन्तु॒ सर्वाः॑ स्व॒र्गे लो॒के मधु॑म॒त् पिन्व॑माना॒ उप॑ त्वा तिष्ठन्तु पुष्क॒रिणीः॒ सम॑न्ताः
स्वर्ग में घी से भरे ताल हैं। उनके किनारे शहद जैसे मीठे हैं। वहाँ दूध और दही से भरे ताल हैं। ऐसी नदियाँ उसके पास आती हैं जो शहद जैसी मीठी हैं। स्वर्ग में हर तरफ कमल के ताल हो जाते हैं उसके आस-पास।
Mantra 7
च॒तुरः॑ कु॒म्भांश्च॑तु॒र्धा द॑दामि क्षी॒रेण॑ पू॒र्नाँ उ॑द॒केन॑ द॒ध्ना। ए॒तास्त्वा॒ धारा॒ उप॑ यन्तु॒ सर्वाः॑ स्व॒र्गे लो॒के मधु॑म॒त् पिन्व॑माना॒ उप॑ त्वा तिष्ठन्तु पुष्क॒रिणीः॒ सम॑न्ताः
मैं चार मटके रख रहा हूँ, चार जगह। एक में दूध, एक में पानी, एक में दही भरा है। यह सब धारें तुम्हारे पास आएँ। स्वर्ग में यह मीठी हो के तुम तक पहुँचे। कमल वाले तालाब तुम्हारे चारों तरफ हो।
Mantra 8
इ॒ममो॑द॒नं नि द॑धे ब्राह्म॒णेषु॑ विष्टा॒रिणं॑ लोक॒जितं॑ स्व॒र्ग॑म्। स मे॒ मा क्षे॑ष्ट स्व॒धया॒ पिन्व॑मानो वि॒श्वरू॑पा धे॒नुः का॑म॒दुघा॑ मे अस्तु
मैं यह बना हुआ चावल ब्राह्मणों के लिए रख रहा हूँ। यह सबको खिलाता है और स्वर्ग तक ले जाता है। यह मुझे नुकसान नहीं करेगा। यह एक गाय जैसा है जो हर चीज़ देता है। मेरे सारे काम पूरी करेगा।
It is cooked odana (porridge/boiled rice) treated as brahman-filled and identified with Yajña’s own body, so the food becomes a carrier of ritual power and merit.
The hymn sacralizes the offering by giving it a cosmic-ritual anatomy: chandas (metres) provide structure and ‘wings,’ satya (truth) is the validating ‘mouth,’ and tapas is the generating heat that makes yajña effective.
It is a protective clause ensuring the charged offering does not rebound negatively on the patron—i.e., the consecration is safe, properly transferred, and yields benefit rather than ritual fault or backlash.
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