Katharudra
vedic_generalAtharva47 Verses

Katharudra

vedic_generalAtharva

कठरुद्र उपनिषद् अथर्ववेद से संबद्ध शैव उपनिषदों में मानी जाती है। इसमें रुद्र को केवल वैदिक देवता नहीं, बल्कि सर्वव्यापक ब्रह्म-तत्त्व के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह ग्रंथ वैदिक स्तुति और उपासना को उपनिषद् की आत्मविद्या में रूपांतरित करता है, जहाँ मुक्ति का साधन बाह्य कर्म नहीं, बल्कि ज्ञान और अंतर्मुखी साधना है। उपनिषद् का केंद्रीय प्रतिपादन आत्मा और रुद्र की अभिन्नता है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीन अवस्थाओं के साक्षी चैतन्य को रुद्र कहा गया है; नाम-रूप का जगत उसी में उदित होकर उसी में लीन होता है। ओंकार-ध्यान, मंत्र-जप और ‘अंतर्यज्ञ’ (अहंकार, कामना, अज्ञान का आंतरिक समर्पण) को साधना के रूप में रेखांकित किया जाता है। ऐतिहासिक दृष्टि से यह उपनिषद् शैव भक्ति को वैदिक अधिकार के साथ जोड़ती है और रुद्र/शिव को ब्रह्म तथा अंतर्यामी के रूप में प्रतिष्ठित करती है। इसका दार्शनिक महत्व ज्ञान और भक्ति के समन्वय तथा अद्वैताभिमुख आत्मबोध की स्पष्टता में निहित है।

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Key Teachings

• Rudra as Brahman: Rudra/Śiva is affirmed as the supreme

all-pervading reality and the source

sustenance

and dissolution of the cosmos.

• Ātman–Rudra identity: liberation arises from realizing the non-difference of one’s inner self and Rudra as the indwelling witness (antaryāmin).

• Inner sacrifice (antar-yajña): external ritual is reinterpreted as inward offering—ego

desire

and ignorance are “sacrificed” in knowledge.

• Oṃ and mantra as contemplative supports: sacred sound functions as a means to steady the mind and disclose the non-dual ground of consciousness.

• Three states and the witness: waking

dream

and deep sleep are transcended by recognizing the witnessing consciousness as Rudra.

• Grace and purification: Rudra’s fierce power is also compassionate purification

removing fear and granting spiritual clarity.

• Renunciation and discipline: restraint

truth

and dispassion are presented as prerequisites for stable realization.

• Unity-in-diversity: the many names and forms are expressions of the one Rudra; plurality is not denied but grounded in non-dual reality.

Verses of the Katharudra

47 verses with Sanskrit text, transliteration, and translation.

Verse 1

देवा ह वै भगवन्तम् अब्रुवन्—अधीहि भगवन् ब्रह्मविद्याम् ॥१॥

देवताओं ने सचमुच भगवान् से कहा—“हे भगवन्, हमें ब्रह्मविद्या का उपदेश कीजिए।” ॥१॥

Brahmavidyā (knowledge of Brahman)

Verse 2

स प्रजापतिर् अब्रवीत्—सशिखान् केशान् निष्कृत्य विसृज्य यज्ञोपवीतं निष्कृत्य पुत्रं दृष्ट्वा त्वं ब्रह्मा त्वं यज्ञस् त्वं वषट्कारस् त्वम् ओङ्कारस् त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं धाता त्वं विधाता त्वं प्र...

प्रजापति ने कहा—शिखासहित केशों को काटकर त्याग दे और यज्ञोपवीत भी उतार दे। फिर पुत्र को देखकर कहे—‘तू ब्रह्मा है, तू यज्ञ है, तू वषट्कार है, तू ओंकार है, तू स्वाहा है, तू स्वधा है, तू धाता है, तू विधाता है, तू प्रतिष्ठा है।’ तब पुत्र कहे—‘मैं ब्रह्मा हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं वषट्कार हूँ, मैं ओंकार हूँ, मैं स्वाहा हूँ, मैं स्वधा हूँ, मैं धाता हूँ, मैं विधाता हूँ, मैं त्वष्टा हूँ, मैं प्रतिष्ठा हूँ।’ इन वचनों के पीछे-पीछे चलते हुए वह एक अश्रु गिराए; अश्रु का अनुचित पतन हो तो संतान-परंपरा कट जाती है। दाहिने प्रदक्षिणा करके, इधर-उधर पीछे न देखते हुए वे लौट आते हैं। ॥२॥

Saṃnyāsa; identity of self with Brahman; internalization of yajña (adhyātma-yajña)

Verse 3

स स्वर्ग्यो भवति ब्रह्मचारी वेदमधीत्य वेदोक्ताचरितब्रह्मचर्यो दारानाहृत्य पुत्रानुत्पाद्य ताननुपादिभिर्वितत्येष्ट्वा च शक्तितो यज्ञैः । तस्य संन्यासो गुरुभिरनुज्ञातस्य बान्धवैश्च । सोऽरण्यं परेत्य द्व...

वह स्वर्ग के योग्य होता है—ब्रह्मचारी होकर वेद का अध्ययन करके, वेद-विहित ब्रह्मचर्य का आचरण करके; फिर विवाह कर पुत्र उत्पन्न करके, पौत्रों द्वारा वंश-विस्तार करके, और सामर्थ्य के अनुसार यज्ञ करके। उसका संन्यास गुरुजनों तथा बंधु-बांधवों की अनुमति से हो। वह वन में जाकर बारह रात्रियों तक दूध से अग्निहोत्र करे और बारह रात्रियों तक दूध पर ही निर्वाह करे। बारह रात्रियों के अंत में अग्नि वैश्वानर और प्रजापति के लिए प्राजापत्य—वैष्णव चरु—तीन पात्रों में अर्पित करे। पूर्व के काष्ठ-पात्र अग्नि में होम करे, मिट्टी के पात्र जल में विसर्जित करे, और धातु के पात्र गुरु को दे, यह कहकर—‘आप मुझे छोड़कर दूर न जाएँ।’ गुरु उत्तर दे—‘मैं तुम्हें छोड़कर दूर नहीं जाऊँगा।’ कुछ कहते हैं—गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और आहवनीय में अरणि-स्थान की भस्म की एक मुट्ठी पी ले। शिखासहित केशों को काटकर त्याग दे और ‘भूः स्वाहा’ कहकर यज्ञोपवीत को जल में अर्पित करे। इसके बाद उपवास, जल-प्रवेश, अग्नि-प्रवेश, वीर-मार्ग, महाप्रस्थान या वृद्धाश्रम—इनमें से किसी मार्ग को ग्रहण करे। दूध के साथ जो वह संध्याकाल में खाए वही उसका सायंहोम है; जो प्रातः खाए वही प्रातःहोम; अमावस्या का आचरण ही दर्श-यज्ञ; पूर्णिमा का आचरण ही पौर्णमास; और वसंत में केश-दाढ़ी-रोम-नख कटवाना ही उसका अग्निष्टोम है। ॥३॥

Saṃnyāsa-dharma; karma-to-jñāna transition; internalization of Vedic ritual

Verse 4

संन्यस्याग्निं न पुनरावर्तयेत् मृत्युञ्जयमावहमित्यध्यात्ममन्त्रान् पठेत् । स्वस्ति सर्वजीवेभ्य इत्युक्त्वात्मानमनन्यं ध्यायन् तदूर्ध्वबाहुर्विमुक्तमार्गो भवेत् । अनिकेतश्चरेत् । भिक्षाशी यत्किञ्चिन्ना...

पवित्र अग्नियों का संन्यास करके फिर पूर्वाश्रम में न लौटे। “मृत्युञ्जय को प्राप्त कराने वाले” अध्यात्म-मंत्रों का जप करे। “सभी जीवों का कल्याण हो” कहकर, आत्मा को अद्वितीय (अनन्य) मानकर ध्यान करता हुआ, ऊर्ध्वबाहु होकर वह मोक्ष-मार्ग का पथिक बनता है। वह अनिकेत होकर विचरे। भिक्षा पर जीते हुए जो कुछ भी मिले, उसे बिना विवेक के न ग्रहण करे। प्राणियों की रक्षा के लिए एक कण मात्र के लिए भी न दौड़े—वर्षा-ऋतु में अपवाद है। इस विषय में श्लोक भी हैं।

Sannyasa and Moksha (renunciation as a discipline for liberation through Atman-contemplation and ahiṃsā)

Verse 5

कुण्डिकां चमसं शिक्यं त्रिविष्टमुपानहौ । शीतोपघातिनीं कन्थां कौपीनाच्छादनं तथा ॥ पवित्रं ज्ञानशाटीं च उत्तरासङ्गमेव च । यज्ञोपवीतं वेदांश्च सर्वं तद्वर्जयेद्यतिः ॥ स्नानं पानं तथा शौचमद्भिः पूताभिराचर...

जल-पात्र, भिक्षापात्र, (वस्तु-वाहक) शिक्य, त्रिदण्ड और पादुका; शीत से रक्षा करने वाली कन्था और कौपीन—ये। पवित्र (कुश/अंगूठी), ज्ञान-वस्त्र और उत्तरीय; यज्ञोपवीत और वेद—इन सबको यति त्याग दे। स्नान, पान और शौच शुद्ध जल से करे। वह नदी-तट पर शयन करे या देवालयों में सोए। सुख-दुःख के बहाने शरीर को अत्यधिक न पालित करे। प्रशंसा में हर्षित न हो; निन्दा में दूसरों को शाप न दे।

Vairāgya and Tyāga (renunciation of external markers and inner equanimity)

Verse 6

कुण्डिकां चमसं शिक्यं त्रिविष्टमुपानहौ । शीतोपघातिनीं कन्थां कौपीनाच्छादनं तथा ॥ पवित्रं ज्ञानशाटीं च उत्तरासङ्गमेव च । यज्ञोपवीतं वेदांश्च सर्वं तद्वर्जयेद्यतिः ॥ स्नानं पानं तथा शौचमद्भिः पूताभिराचर...

जल-पात्र, भिक्षापात्र, (वस्तु-वाहक) शिक्य, त्रिदण्ड और पादुका; शीत से रक्षा करने वाली कन्था और कौपीन—ये। पवित्र (कुश/अंगूठी), ज्ञान-वस्त्र और उत्तरीय; यज्ञोपवीत और वेद—इन सबको यति त्याग दे। स्नान, पान और शौच शुद्ध जल से करे। वह नदी-तट पर शयन करे या देवालयों में सोए। सुख-दुःख के बहाने शरीर को अत्यधिक न पालित करे। प्रशंसा में हर्षित न हो; निन्दा में दूसरों को शाप न दे।

Vairāgya and Tyāga (renunciation and even-mindedness)

Verse 7

कुण्डिकां चमसं शिक्यं त्रिविष्टमुपानहौ । शीतोपघातिनीं कन्थां कौपीनाच्छादनं तथा ॥ पवित्रं ज्ञानशाटीं च उत्तरासङ्गमेव च । यज्ञोपवीतं वेदांश्च सर्वं तद्वर्जयेद्यतिः ॥ स्नानं पानं तथा शौचमद्भिः पूताभिराचर...

यति को चाहिए कि वह कमण्डलु, भिक्षापात्र, झोली, त्रिदण्ड, पादुका, शीत-रक्षक कन्था, कौपीन-आवरण; तथा पवित्र, ज्ञान-वस्त्र, उत्तरीय, यज्ञोपवीत और यहाँ तक कि वेदों के बाह्य आश्रय—इन सबका त्याग कर दे। स्नान, पान और शौच वह शुद्ध जल से करे। वह नदी के पुलिन पर शयन करे या देवालयों में सोए। सुख-दुःख के द्वारा शरीर को अत्यधिक न सताए। प्रशंसा में हर्षित न हो, निन्दा में दूसरों को शाप न दे।

Sannyāsa (renunciation) as a discipline for mokṣa; vairāgya and titikṣā supporting Brahma-jñāna

Verse 8

कुण्डिकां चमसं शिक्यं त्रिविष्टमुपानहौ । शीतोपघातिनीं कन्थां कौपीनाच्छादनं तथा ॥ पवित्रं ज्ञानशाटीं च उत्तरासङ्गमेव च । यज्ञोपवीतं वेदांश्च सर्वं तद्वर्जयेद्यतिः ॥ स्नानं पानं तथा शौचमद्भिः पूताभिराचर...

यति को चाहिए कि वह कमण्डलु, भिक्षापात्र, झोली, त्रिदण्ड, पादुका, शीत-रक्षक कन्था, कौपीन-आवरण; तथा पवित्र, ज्ञान-वस्त्र, उत्तरीय, यज्ञोपवीत और वेदों के बाह्य आश्रय—इन सबका त्याग कर दे। स्नान, पान और शौच वह शुद्ध जल से करे। वह नदी के पुलिन पर शयन करे या देवालयों में सोए। सुख-दुःख के द्वारा शरीर को अत्यधिक न सताए। प्रशंसा में हर्षित न हो, निन्दा में दूसरों को शाप न दे।

Vairāgya and samatā as immediate supports for jñāna-niṣṭhā (abidance in knowledge)

Verse 9

ब्रह्मचर्येण सन्तिष्ठेदप्रमादेन मस्करी । दर्शनं स्पर्शनं केलिः कीर्तनं गुह्यभाषणम् ॥ संकल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिर्वृत्तिरेव च । एतन्मैथुनमष्टाङ्गं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ विपरीतं ब्रह्मचर्यमनुष्ठेयं मुमुक...

भिक्षुक यति को प्रमाद-रहित होकर ब्रह्मचर्य में स्थित रहना चाहिए। देखना, स्पर्श करना, क्रीड़ा, उसका वर्णन करना, गुप्त वार्ता, संकल्प, दृढ़ निश्चय और क्रिया की पूर्णता—इन आठों को मनीषी जन मैथुन कहते हैं। इसके विपरीत जो ब्रह्मचर्य है, उसे मुक्ति चाहने वालों को साधना चाहिए—उस स्वयंज्योति तेज में स्थित होकर जो जगत को प्रकाशित करता है, नित्य स्वयं स्फुरित रहता है।

Brahmacarya and pramāda-rahitatā (non-negligence) as aids to ātma-jñāna; self-luminous Ātman/Brahman (svayaṃ-prakāśa)

Verse 10

ब्रह्मचर्येण सन्तिष्ठेदप्रमादेन मस्करी । दर्शनं स्पर्शनं केलिः कीर्तनं गुह्यभाषणम् ॥ संकल्पोऽध्यवसायश्च क्रियान्निर्वृत्तिरेव च । एतन्मैथुनमष्टाङ्गं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ विपरीतं ब्रह्मचर्यमनुष्ठेयं मुम...

हे मस्करी (संन्यासी), ब्रह्मचर्य से दृढ़ रहो और प्रमाद से रहित रहो। दर्शन, स्पर्श, क्रीड़ा, कीर्तन/प्रशंसा, और गुप्त वार्ता; फिर संकल्प, दृढ़ निश्चय, तथा क्रिया का आरम्भ होकर पूर्ण होना—इसे मनीषीजन अष्टाङ्ग मैथुन कहते हैं। इसके विपरीत जो ब्रह्मचर्य है, उसे मुमुक्षुओं को साधना चाहिए, जिससे जगत् को प्रकाशित करने वाला स्वयंज्योति नित्य प्रकाश स्वयं स्फुरित होकर अनुभव में स्थिर हो।

Brahmacarya (sense-restraint) as a support for Brahma-jñāna; self-luminous Brahman/Ātman

Verse 11

ब्रह्मचर्येण सन्तिष्ठेदप्रमादेन मस्करी । दर्शनं स्पर्शनं केलिः कीर्तनं गुह्यभाषणम् ॥ संकल्पोऽध्यवसायश्च क्रियान्निर्वृत्तिरेव च । एतन्मैथुनमष्टाङ्गं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ विपरीतं ब्रह्मचर्यमनुष्ठेयं मुम...

हे मस्करी (संन्यासी), ब्रह्मचर्य से दृढ़ रहो और प्रमाद से रहित रहो। दर्शन, स्पर्श, क्रीड़ा, कीर्तन/प्रशंसा, और गुप्त वार्ता; फिर संकल्प, दृढ़ निश्चय, तथा क्रिया का आरम्भ होकर पूर्ण होना—इसे मनीषीजन अष्टाङ्ग मैथुन कहते हैं। इसके विपरीत जो ब्रह्मचर्य है, उसे मुमुक्षुओं को साधना चाहिए, जिससे जगत् को प्रकाशित करने वाला स्वयंज्योति नित्य प्रकाश स्वयं स्फुरित होकर अनुभव में स्थिर हो।

Brahmacarya and purification of antaḥkaraṇa for realization of svayaṃprakāśa Ātman

Verse 12

स एव जगतः साक्षी सर्वात्मा विमलाकृतिः । प्रतिष्ठा सर्वभूतानां प्रज्ञानघनलक्षणः ॥ न कर्मणा न प्रजया न चान्येनापि केचित् । ब्रह्मवेदनमात्रेण ब्रह्माप्नोत्येव मानवः ॥

वही एक जगत् का साक्षी है, सबका आत्मा है, निर्मल स्वरूप वाला; समस्त प्राणियों का आधार है और प्रज्ञान-घन (चैतन्य-समूह) के लक्षण से युक्त है। न कर्म से, न संतान से, और न किसी अन्य साधन से—केवल ब्रह्म-ज्ञान से ही मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त करता है।

Ātman/Brahman as sākṣin (witness) and prajñāna-ghana; mokṣa through jñāna (not karma)

Verse 13

स एव जगतः साक्षी सर्वात्मा विमलाकृतिः । प्रतिष्ठा सर्वभूतानां प्रज्ञानघनलक्षणः ॥ न कर्मणा न प्रजया न चान्येनापि केचित् । ब्रह्मवेदनमात्रेण ब्रह्माप्नोत्येव मानवः ॥

वही समस्त जगत् का साक्षी, सबका आत्मा, निर्मल स्वरूप है; वही समस्त प्राणियों का आधार है और चेतना-घन के रूप में प्रकाशित है। न कर्म से, न संतान से, न किसी अन्य साधन से कोई उसे प्राप्त करता है; केवल ब्रह्म-ज्ञान के द्वारा ही मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त होता है।

Brahman-Atman as sākṣin (witness) and jñāna as the sole means to mokṣa

Verse 14

तद्विद्याविषयं ब्रह्म सत्यज्ञानसुखाद्वयम् । संसारे च गुहावाच्ये मायाज्ञानादिसंज्ञके ॥ निहितं ब्रह्म यो वेद परमे व्योम्नि संज्ञिते । सोऽश्नुते सकलान्कामान्क्रमेणैव द्विजोत्तमः ॥ प्रत्यगात्मानमज्ञानमाया...

उस (पराविद्या) का विषय ब्रह्म है—सत्य, ज्ञान और आनन्दस्वरूप, अद्वितीय। वही ब्रह्म संसार में ‘गुहा’ कहे जाने वाले स्थान में, माया, अज्ञान आदि नामों से सूचित आवरण में छिपा हुआ-सा कहा जाता है। जो द्विजोत्तम ‘परम व्योम’ नामक परम आकाश में निहित उस ब्रह्म को जान लेता है, वह क्रमशः समस्त कामनाओं का भोग करता है। प्रत्यगात्मा को अज्ञान और मायाशक्ति का साक्षी जानकर, ‘मैं एक ब्रह्म हूँ’ ऐसा निश्चय करके, वह स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है।

Brahman as sat-cit-ānanda advaya; māyā/avidyā as veiling; realization ‘aham brahmāsmi’

Verse 15

तद्विद्याविषयं ब्रह्म सत्यज्ञानसुखाद्वयम् । संसारे च गुहावाच्ये मायाज्ञानादिसंज्ञके ॥ निहितं ब्रह्म यो वेद परमे व्योम्नि संज्ञिते । सोऽश्नुते सकलान्कामान्क्रमेणैव द्विजोत्तमः ॥ प्रत्यगात्मानमज्ञानमाया...

उस (पराविद्या) का विषय ब्रह्म है—सत्य, ज्ञान और आनन्दस्वरूप, अद्वितीय। वही ब्रह्म संसार में ‘गुहा’ कहे जाने वाले स्थान में, माया, अज्ञान आदि नामों से सूचित आवरण में छिपा हुआ-सा कहा जाता है। जो द्विजोत्तम ‘परम व्योम’ नामक परम आकाश में निहित उस ब्रह्म को जान लेता है, वह क्रमशः समस्त कामनाओं का भोग करता है। प्रत्यगात्मा को अज्ञान और मायाशक्ति का साक्षी जानकर, ‘मैं एक ब्रह्म हूँ’ ऐसा निश्चय करके, वह स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है।

Non-dual Brahman (sat-cit-ānanda) and self-realization through ‘aham brahmāsmi’ overcoming māyā/avidyā

Verse 16

तद्विद्याविषयं ब्रह्म सत्यज्ञानसुखाद्वयम् । संसारे च गुहावाच्ये मायाज्ञानादिसंज्ञके ॥ निहितं ब्रह्म यो वेद परमे व्योम्नि संज्ञिते । सोऽश्नुते सकलान्कामान्क्रमेणैव द्विजोत्तमः ॥ प्रत्यगात्मानमज्ञानमाया...

उस विद्या का विषय ब्रह्म है—जो सत्य, ज्ञान (चैतन्य) और सुखस्वरूप, तथा अद्वैत है। माया, अज्ञान आदि नामों से प्रसिद्ध इस संसार-रूपी ‘गुहा’ में वही ब्रह्म छिपा हुआ है। जो ‘परम व्योम’ कहे जाने वाले परम आकाश में निहित उस ब्रह्म को जान लेता है, वह द्विजों में श्रेष्ठ क्रमशः समस्त अभिलाषित फल प्राप्त करता है। जो प्रत्यगात्मा को अज्ञान और माया-शक्ति का साक्षी जानकर “मैं एक ब्रह्म हूँ” ऐसा अनुभव करता है, वह स्वयं ब्रह्म ही हो जाता है।

Brahman-Atman identity; Māyā/avidyā as veiling; sākṣin (witness-consciousness)

Verse 17

ब्रह्मभूतात्मनस्तस्मादेतस्माच्छक्तिमिश्रितात् । अपञ्चीकृत आकाशसंभूतो रज्जुसर्पवत् ॥ आकाशाद्वायुसंज्ञस्तु स्पर्शोऽपञ्चीकृतः पुनः । वायोरग्निस्तथा चाग्नेराप अद्भ्यो वसुन्धरा ॥ तानि भूतानि सूक्ष्माणि पञ्...

ब्रह्मरूप हुए उस आत्मतत्त्व से, शक्ति (शक्ति-तत्त्व) से मिश्रित इस कारण से, अपञ्चीकृत आकाश उत्पन्न होता है—रस्सी में सर्प के समान (आभासरूप)। आकाश से फिर अपञ्चीकृत ‘स्पर्श’ नामक वायु उत्पन्न होती है। वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी। तब ईश्वर उन सूक्ष्म भूतों का पञ्चीकरण करके, उन्हीं से ब्रह्माण्ड आदि की सृष्टि करता है—निश्चय ही शिव के द्वारा। ब्रह्माण्ड के उदर में देव, दानव, यक्ष, किन्नर, मनुष्य तथा पशु-पक्षी आदि अपने-अपने कर्म के अनुसार स्थित होते हैं।

Cosmology of elements (pañcīkaraṇa/apāñcīkaraṇa); Śakti; karma-based embodiment; māyā-like appearance

Verse 18

ब्रह्मभूतात्मनस्तस्मादेतस्माच्छक्तिमिश्रितात् । अपञ्चीकृत आकाशसंभूतो रज्जुसर्पवत् ॥ आकाशाद्वायुसंज्ञस्तु स्पर्शोऽपञ्चीकृतः पुनः । वायोरग्निस्तथा चाग्नेराप अद्भ्यो वसुन्धरा ॥ तानि भूतानि सूक्ष्माणि पञ्...

यह मंत्र वही सृष्टि-क्रम पुनः कहता है। ब्रह्मरूप आत्मतत्त्व से, शक्ति से संयुक्त कारण से, अपञ्चीकृत सूक्ष्म भूत—आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी—उत्पन्न होते हैं। फिर ईश्वर उनका पञ्चीकरण करके, उन्हीं से ब्रह्माण्ड आदि की रचना करता है—शिव के अधिष्ठान में। उस ब्रह्माण्ड के भीतर देव आदि, मनुष्य तथा पशु-पक्षी आदि अपने-अपने कर्म के अनुसार उत्पन्न और स्थित होते हैं।

Cosmology of elements (pañcīkaraṇa) and karmic embodiment

Verse 19

ब्रह्मभूतात्मनस्तस्मादेतस्माच्छक्तिमिश्रितात् । अपञ्चीकृत आकाशसंभूतो रज्जुसर्पवत् ॥ आकाशाद्वायुसंज्ञस्तु स्पर्शोऽपञ्चीकृतः पुनः । वायोरग्निस्तथा चाग्नेराप अद्भ्यो वसुन्धरा ॥ तानि भूतानि सूक्ष्माणि पञ्...

ब्रह्मरूप हुए आत्मतत्त्व से, शक्ति से मिश्रित उस कारण से, अपञ्चीकृत आकाश उत्पन्न होता है—जैसे रस्सी में सर्प का भ्रम। आकाश से फिर अपञ्चीकृत स्पर्श-तत्त्व, जिसे वायु कहते हैं, प्रकट होता है; वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी। तब ईश्वर उन सूक्ष्म भूतों का पञ्चीकरण करके, शिव के द्वारा, ब्रह्माण्ड आदि इस जगत की सृष्टि करता है। ब्रह्माण्ड के गर्भ में देव, दानव, यक्ष-किन्नर, मनुष्य तथा पशु-पक्षी आदि अपने-अपने कर्म के अनुसार स्थित होते हैं।

Sṛṣṭi-krama (cosmogenesis), pañcīkaraṇa, māyā/śakti, karma and embodiment

Verse 20

ब्रह्मभूतात्मनस्तस्मादेतस्माच्छक्तिमिश्रितात् । अपञ्चीकृत आकाशसंभूतो रज्जुसर्पवत् ॥ आकाशाद्वायुसंज्ञस्तु स्पर्शोऽपञ्चीकृतः पुनः । वायोरग्निस्तथा चाग्नेराप अद्भ्यो वसुन्धरा ॥ तानि भूतानि सूक्ष्माणि पञ्...

ब्रह्मरूप हुए आत्मतत्त्व से, शक्ति से मिश्रित उस कारण से, अपञ्चीकृत आकाश उत्पन्न होता है—जैसे रस्सी में सर्प का भ्रम। आकाश से फिर अपञ्चीकृत स्पर्श-तत्त्व, जिसे वायु कहते हैं, प्रकट होता है; वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी। तब ईश्वर उन सूक्ष्म भूतों का पञ्चीकरण करके, शिव के द्वारा, ब्रह्माण्ड आदि इस जगत की सृष्टि करता है। ब्रह्माण्ड के गर्भ में देव, दानव, यक्ष-किन्नर, मनुष्य तथा पशु-पक्षी आदि अपने-अपने कर्म के अनुसार स्थित होते हैं।

Cosmic manifestation through śakti; pañcīkaraṇa; karmic differentiation of embodied beings

Verse 21

अस्थिस्नाय्वादिरूपोऽयं शरीरं भाति देहिनाम् । योऽयमन्नमयो ह्यात्मा भाति सर्वशरीरिणः ॥ ततः प्राणमयो ह्यात्मा विभिन्नश्चान्तरः स्थितः । ततो विज्ञान आत्मा तु ततोऽन्यश्चान्तरः स्वतः ॥ आनन्दमय आत्मा तु ततोऽ...

अस्थि, स्नायु आदि के रूप में यह शरीर देहधारियों को दिखाई देता है; यही सब शरीरियों में प्रकट होने वाला अन्नमय आत्मा है। इसके भीतर भिन्न प्राणमय आत्मा स्थित है; फिर विज्ञानमय आत्मा, और उसके भीतर स्वयंसिद्ध एक और अन्तरात्मा। उसके भीतर आनन्दमय आत्मा स्थित है। अन्नमय प्राणमय से पूर्ण है; प्राणमय स्वभाव से मनोमय से पूर्ण है; और मनोमय आत्मा ज्ञानमय से पूर्ण है। ज्ञानमय सदा आनन्द से पूर्ण—सदा सुखस्वरूप है। और आनन्दमय भी ब्रह्म से भिन्न साक्षी द्वारा प्रकाशित/पूर्ण होता है। ब्रह्म सबके अन्तर में पूर्ण है, किसी अन्य से नहीं; यही ‘ब्रह्मपुच्छ’ कहलाने वाला तत्त्व सत्य और ज्ञान—इन दो लक्षणों वाला है।

Pañca-kośa (sheaths) analysis; sākṣin (witness); Brahman as inner fullness (antarvyāpti)

Verse 22

अस्थिस्नाय्वादिरूपोऽयं शरीरं भाति देहिनाम् । योऽयमन्नमयो ह्यात्मा भाति सर्वशरीरिणः ॥ ततः प्राणमयो ह्यात्मा विभिन्नश्चान्तरः स्थितः । ततो विज्ञान आत्मा तु ततोऽन्यश्चान्तरः स्वतः ॥ आनन्दमय आत्मा तु ततोऽ...

अस्थि, स्नायु आदि से बना यह शरीर देहधारियों को प्रतीत होता है। सब शरीरधारियों में अन्नमय आत्मा प्रकट होती है। उसके भीतर उससे भिन्न प्राणमय आत्मा स्थित है; उसके भीतर विज्ञानमय आत्मा; और उसके भीतर उससे भी भिन्न आनन्दमय आत्मा स्थित है। अन्नमय प्राणमय से परिपूर्ण है; प्राण स्वभावतः मनोमय से परिपूर्ण है; मनोमय ज्ञानमय से परिपूर्ण है। ज्ञानमय सदा आनन्द—सुख—से परिपूर्ण रहता है। और आनन्दमय भी ब्रह्म से भिन्न साक्षी द्वारा प्रकाशित होता है। ब्रह्म ही सबके अन्तर में पूर्ण है, किसी अन्य से नहीं। यही ‘ब्रह्मपुच्छ’ कहलाता है, सत्य और ज्ञान—इन दोनों के स्वरूप वाला।

Pañcakośa (five sheaths) culminating in the witnessing Brahman; inner Self beyond annamaya–ānandamaya

Verse 23

अस्थिस्नाय्वादिरूपोऽयं शरीरं भाति देहिनाम् । योऽयमन्नमयो ह्यात्मा भाति सर्वशरीरिणः ॥ ततः प्राणमयो ह्यात्मा विभिन्नश्चान्तरः स्थितः । ततो विज्ञान आत्मा तु ततोऽन्यश्चान्तरः स्वतः ॥ आनन्दमय आत्मा तु ततोऽ...

अस्थि, स्नायु आदि से युक्त यह शरीर देहधारियों को दिखाई देता है। सब देहधारियों में अन्नमय आत्मा प्रकट होती है। फिर उसके भीतर उससे भिन्न प्राणमय आत्मा है; फिर विज्ञानमय आत्मा; फिर भीतर ही उससे भिन्न आनन्दमय आत्मा। अन्नमय प्राणमय से परिपूर्ण है; प्राण मनोमय से परिपूर्ण है; मनोमय ज्ञानमय से परिपूर्ण है। ज्ञानमय सदा आनन्द—सुख—से परिपूर्ण है। आनन्दमय भी ब्रह्म से भिन्न साक्षी से सम्बद्ध/प्रकाशित होता है। ब्रह्म ही सबके अन्तर में पूर्ण है, किसी अन्य से नहीं—यही ‘ब्रह्मपुच्छ’ है, सत्य और ज्ञान के स्वरूप वाला।

Discrimination of kośas and establishment in sākṣin-Brahman

Verse 24

अस्थिस्नाय्वादिरूपोऽयं शरीरं भाति देहिनाम् । योऽयमन्नमयो ह्यात्मा भाति सर्वशरीरिणः ॥ ततः प्राणमयो ह्यात्मा विभिन्नश्चान्तरः स्थितः । ततो विज्ञान आत्मा तु ततोऽन्यश्चान्तरः स्वतः ॥ आनन्दमय आत्मा तु ततोऽ...

अस्थि-स्नायु आदि स्वरूप वाला यह शरीर देहधारियों को प्रतीत होता है। सब देहधारियों में अन्नमय आत्मा प्रकट होती है। उसके भीतर उससे भिन्न प्राणमय आत्मा है; उसके भीतर विज्ञानमय आत्मा; उसके भीतर आनन्दमय आत्मा। अन्नमय प्राणमय से व्याप्त है; प्राण मनोमय से; मन ज्ञानमय से; और ज्ञान सदा आनन्द से व्याप्त है। आनन्दमय भी उससे परे स्थित साक्षी द्वारा जाना जाता है। ब्रह्म ही सबके अन्तर में पूर्ण है, किसी अन्य से नहीं—इसी को ‘ब्रह्मपुच्छ’ कहते हैं, जो सत्य और ज्ञान से चिह्नित है।

Ātman as sākṣin beyond pañcakośa; Brahman as inner fullness (pūrṇatā)

Verse 25

अस्थिस्नाय्वादिरूपोऽयं शरीरं भाति देहिनाम् । योऽयमन्नमयो ह्यात्मा भाति सर्वशरीरिणः ॥ ततः प्राणमयो ह्यात्मा विभिन्नश्चान्तरः स्थितः । ततो विज्ञान आत्मा तु ततोऽन्यश्चान्तरः स्वतः ॥ आनन्दमय आत्मा तु ततोऽ...

अस्थि, स्नायु आदि से बना यह शरीर देहधारियों को प्रतीत होता है। सब प्राणियों में अन्नमय आत्मा प्रकट है। उसके भीतर उससे भिन्न प्राणमय आत्मा स्थित है; उसके भीतर विज्ञानमय आत्मा; और उसके भीतर आनन्दमय आत्मा। अन्नमय प्राणमय से, प्राण मनोमय से, मन ज्ञानमय से पूर्ण होता है; ज्ञानमय सदा आनन्द—सुख—से परिपूर्ण है। आनन्दमय भी ब्रह्म रूप अन्य साक्षी से प्रकाशित होता है। ब्रह्म सबके अन्तर में पूर्ण है, किसी अन्य से नहीं; यही ‘ब्रह्मपुच्छ’ है, सत्य और ज्ञान-स्वरूप।

Pañca-kośa (five sheaths) and Brahman as sākṣin (witness) beyond ānandamaya

Verse 26

अस्थिस्नाय्वादिरूपोऽयं शरीरं भाति देहिनाम् । योऽयमन्नमयो ह्यात्मा भाति सर्वशरीरिणः ॥ ततः प्राणमयो ह्यात्मा विभिन्नश्चान्तरः स्थितः । ततो विज्ञान आत्मा तु ततोऽन्यश्चान्तरः स्वतः ॥ आनन्दमय आत्मा तु ततोऽ...

अस्थि-स्नायु से बना यह देह अन्नमय आत्मा से व्याप्त है; उसके भीतर उससे भिन्न प्राणमय है; उसके भीतर विज्ञानमय; उसके भीतर आनन्दमय। आनन्द से भी परे अन्तर-साक्षी ब्रह्म ही है, जो सबके भीतर पूर्ण है। यही ‘ब्रह्मपुच्छ’ कहलाता है, सत्य और ज्ञान-लक्षण से युक्त।

Reiteration of pañca-kośa analysis culminating in Brahman as sākṣin

Verse 27

सारमेव रसं लब्ध्वा साक्षाद्देही सनातनम् । सुखी भवति सर्वत्र अन्यथा सुखता कुतः ॥ असत्यस्मिन्परानन्दे स्वात्मभूतेऽखिलात्मनाम् । को जीवति नरो जन्तुः को वा नित्यं विचेष्टते ॥ तस्मात्सर्वात्मना चित्ते भासम...

परम सार-रूप रस को प्राप्त करके सनातन देही आत्मा प्रत्यक्ष ही सर्वत्र सुखी होता है; अन्यथा सुख कहाँ से आए? यदि सबके आत्मस्वरूप परम आनन्द असत्य होता, तो कौन जीवित रहता और कौन निरन्तर कर्म करता? इसलिए मन में आत्मरूप से जो प्रकाशमान है, वही सदा दुःख-भार से दबे जीवात्मा को आनन्दित करता है। जब यह महायति अदृश्यत्व आदि लक्षण वाले परम अद्वैत में भेदरहित तत्त्व को जान लेता है, वही परम अभय, परम कल्याण, परम अमृत—सद्रूप ब्रह्म है, जो त्रिविध परिछेद से रहित है। पर यदि मनुष्य उसमें किंचित् भी भेद जानता है, तो निश्चय ही भय उत्पन्न होता है। इसी आनन्दकोश से स्तम्भ-पर्यन्त से लेकर विष्णु आदि तक प्राणी क्रमशः नित्य सुखी होते हैं। पदों से विरक्त, श्रोत्रिय और प्रसन्नचित्त के लिए स्वरूपभूत आनन्द पर में स्वयं प्रकाशित होता है। वाणी किसी निमित्त पर आश्रित होकर चलती है; जहाँ निमित्त नहीं, वहाँ से वाणी लौट आती है। निर्विशेष परमानन्द में शब्द कैसे चले? इसलिए मन सूक्ष्म है और सब विषयों से निवृत्त; उसी से श्रोत्र, त्वचा, नेत्र आदि ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ प्रवृत्त होती हैं।

Ānanda/Brahman as the ground of life; Abhaya (fearlessness) through Advaita; language-mind limitation (yato vāco nivartante)

Verse 28

सारमेव रसं लब्ध्वा साक्षाद्देही सनातनम् । सुखी भवति सर्वत्र अन्यथा सुखता कुतः ॥ असत्यस्मिन् परानन्दे स्वात्मभूतेऽखिलात्मनाम् । को जीवति नरो जन्तुः को वा नित्यं विचेष्टते ॥ तस्मात् सर्वात्मना चित्ते भा...

जो साधक ‘रस’ रूप सार को—सनातन देही आत्मा को—प्रत्यक्ष पा लेता है, वह सर्वत्र सुखी होता है; अन्यथा सुख कहाँ से आए? जो परमानन्द असत्य (विषय-रूप) नहीं, अपितु समस्त आत्माओं का स्वात्मा है—उसमें कौन मनुष्य या प्राणी जी सकता है, या कौन निरन्तर चेष्टा कर सकता है? इसलिए चित्त में सर्वात्मा रूप से प्रकाशमान वही पुरुष दुःख से भरे जीवात्मा को सदा आनन्दित करता है। जब यह महायति अदृश्यत्व आदि लक्षण वाले उस तत्त्व में भेदरहित परम अद्वैत को जान लेता है, वही परम अभय, अत्यन्त कल्याण और परम अमृत है—सत्स्वरूप परम ब्रह्म, त्रिविध परिछेद से रहित। परन्तु जब कोई पुरुष उसमें किंचित् भी भेद देखता है, तब उसके लिए भय उत्पन्न होता है—इसमें संशय नहीं। इसी आनन्दकोश के कारण तृण से लेकर विष्णु पर्यन्त (और आगे) सब प्राणी नित्य सुखी होते हैं, परन्तु तारतम्य के क्रम से। पद-पद के भोगों से विरक्त, श्रोत्रिय और प्रसन्नचित्त साधक के लिए स्वरूपभूत आनन्द परब्रह्म में स्वयं प्रकाशित होता है। शब्द किसी निमित्त का आश्रय लेकर ही चलता है; निमित्त के अभाव में वाणी वहाँ से लौट आती है। निर्विशेष परमानन्द में शब्द कैसे चले? इसलिए यह मन अत्यन्त सूक्ष्म है और सर्वविषयों से निवृत्त है; इसी से श्रोत्र, त्वक्, चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ प्रवृत्त होती हैं।

Ānanda as Brahman/Ātman; nirbheda (non-difference) and fearlessness; limits of speech and mind (yato vāco nivartante)

Verse 29

सारमेव रसं लब्ध्वा साक्षाद्देही सनातनम् । सुखी भवति सर्वत्र अन्यथा सुखता कुतः ॥ असत्यस्मिन् परानन्दे स्वात्मभूतेऽखिलात्मनाम् । को जीवति नरो जन्तुः को वा नित्यं विचेष्टते ॥ तस्मात् सर्वात्मना चित्ते भा...

जो साधक ‘रस’ रूप सार को—सनातन देही आत्मा को—प्रत्यक्ष पा लेता है, वह सर्वत्र सुखी होता है; अन्यथा सुख कहाँ से आए? जो परमानन्द विषय-रूप से असत्य नहीं, बल्कि समस्त आत्माओं का स्वात्मा है—उसमें कौन मनुष्य या प्राणी जी सकता है, या कौन निरन्तर चेष्टा कर सकता है? इसलिए चित्त में सर्वात्मा रूप से प्रकाशमान वही पुरुष दुःख से भरे जीवात्मा को सदा आनन्दित करता है। जब यह महायति अदृश्यत्व आदि लक्षण वाले उस तत्त्व में भेदरहित परम अद्वैत को जान लेता है, वही परम अभय, अत्यन्त कल्याण और परम अमृत है—सत्स्वरूप परम ब्रह्म, त्रिविध परिछेद से रहित। परन्तु जब कोई पुरुष उसमें किंचित् भी भेद देखता है, तब उसके लिए भय उत्पन्न होता है—इसमें संशय नहीं। इसी आनन्दकोश के कारण तृण से लेकर विष्णु पर्यन्त (और आगे) सब प्राणी नित्य सुखी होते हैं, परन्तु तारतम्य के क्रम से। पद-पद के भोगों से विरक्त, श्रोत्रिय और प्रसन्नचित्त साधक के लिए स्वरूपभूत आनन्द परब्रह्म में स्वयं प्रकाशित होता है। शब्द किसी निमित्त का आश्रय लेकर ही चलता है; निमित्त के अभाव में वाणी वहाँ से लौट आती है। निर्विशेष परमानन्द में शब्द कैसे चले? इसलिए यह मन अत्यन्त सूक्ष्म है और सर्वविषयों से निवृत्त है; इसी से श्रोत्र, त्वक्, चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ प्रवृत्त होती हैं।

Non-dual Brahman-bliss (parānanda), fear from bheda, apophatic limit of speech/mind

Verse 30

सारमेव रसं लब्ध्वा साक्षाद्देही सनातनम् । सुखी भवति सर्वत्र अन्यथा सुखता कुतः ॥ असत्यस्मिन् परानन्दे स्वात्मभूतेऽखिलात्मनाम् । को जीवति नरो जन्तुः को वा नित्यं विचेष्टते ॥ तस्मात् सर्वात्मना चित्ते भा...

जो साधक ‘रस’ रूप सार को—सनातन देही आत्मा को—प्रत्यक्ष पा लेता है, वह सर्वत्र सुखी होता है; अन्यथा सुख कहाँ से आए? जो परमानन्द विषय-रूप से असत्य नहीं, बल्कि समस्त आत्माओं का स्वात्मा है—उसमें कौन मनुष्य या प्राणी जी सकता है, या कौन निरन्तर चेष्टा कर सकता है? इसलिए चित्त में सर्वात्मा रूप से प्रकाशमान वही पुरुष दुःख से भरे जीवात्मा को सदा आनन्दित करता है। जब यह महायति अदृश्यत्व आदि लक्षण वाले उस तत्त्व में भेदरहित परम अद्वैत को जान लेता है, वही परम अभय, अत्यन्त कल्याण और परम अमृत है—सत्स्वरूप परम ब्रह्म, त्रिविध परिछेद से रहित। परन्तु जब कोई पुरुष उसमें किंचित् भी भेद देखता है, तब उसके लिए भय उत्पन्न होता है—इसमें संशय नहीं। इसी आनन्दकोश के कारण तृण से लेकर विष्णु पर्यन्त (और आगे) सब प्राणी नित्य सुखी होते हैं, परन्तु तारतम्य के क्रम से। पद-पद के भोगों से विरक्त, श्रोत्रिय और प्रसन्नचित्त साधक के लिए स्वरूपभूत आनन्द परब्रह्म में स्वयं प्रकाशित होता है। शब्द किसी निमित्त का आश्रय लेकर ही चलता है; निमित्त के अभाव में वाणी वहाँ से लौट आती है। निर्विशेष परमानन्द में शब्द कैसे चले? इसलिए यह मन अत्यन्त सूक्ष्म है और सर्वविषयों से निवृत्त है; इसी से श्रोत्र, त्वक्, चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ प्रवृत्त होती हैं।

Brahman as parānanda; nirviśeṣa and ineffability; fearlessness through advaita-jñāna

Verse 31

सारमेव रसं लब्ध्वा साक्षाद्देही सनातनम् । सुखी भवति सर्वत्र अन्यथा सुखता कुतः ॥ असत्यस्मिन् परानन्दे स्वात्मभूतेऽखिलात्मनाम् । को जीवति नरो जन्तुः को वा नित्यं विचेष्टते ॥ तस्मात् सर्वात्मना चित्ते भा...

जो सार-रूप रस को प्राप्त कर लेता है, वह सनातन देही आत्मा को साक्षात् जानकर सर्वत्र सुखी होता है; अन्यथा सुख कहाँ से आए? इस असत्य व्यवहार-जगत में, जो अखिल आत्माओं का स्वस्वरूप परमानन्द है, उसके बिना कौन मनुष्य या प्राणी जी सकेगा, और कौन निरन्तर प्रयत्न करेगा? इसलिए चित्त में सर्वात्मभाव से प्रकाशित वही पुरुष सदा दुःख से भरे जीवात्मा को आनन्दित करता है। जब महायति उस अदृश्यत्वादि-लक्षण परमाद्वैत में भेदरहित तत्त्व को पा लेता है, तब वही परम अभय, अत्यन्त कल्याण और परम अमृत—सद्रूप ब्रह्म—त्रिविध परिछेद से रहित—होता है। परन्तु यदि उसमें तनिक भी भेद जाना जाए तो भय अवश्य होता है, इसमें संशय नहीं। इसी आनन्दकोश के कारण ठूँठ से लेकर विष्णु आदि तक प्राणी क्रमशः नित्य सुखी होते हैं। पद-पद के भोगों से विरक्त, श्रोत्रिय और प्रसन्नचित्त के लिए स्वरूपभूत आनन्द पर में स्वयं प्रकाशित होता है। वाणी किसी निमित्त के आश्रय से चलती है; निमित्त न रहने पर शब्द लौट जाते हैं। निर्विशेष परमानन्द में शब्द कैसे चले? इसलिए यह मन सूक्ष्म है और सर्वविषयों से निवृत्त है; जिससे श्रोत्र, त्वचा, नेत्र आदि तथा कर्मेन्द्रियाँ भी प्रवृत्त होती हैं।

Ānanda as Brahman; Nirbheda (non-difference) and fearlessness; speech/mind returning (yato vāco nivartante)

Verse 32

सारमेव रसं लब्ध्वा साक्षाद्देही सनातनम् । सुखी भवति सर्वत्र अन्यथा सुखता कुतः ॥ असत्यस्मिन् परानन्दे स्वात्मभूतेऽखिलात्मनाम् । को जीवति नरो जन्तुः को वा नित्यं विचेष्टते ॥ तस्मात् सर्वात्मना चित्ते भा...

जो सार-रूप रस को प्राप्त कर लेता है, वह सनातन देही आत्मा को साक्षात् जानकर सर्वत्र सुखी होता है; अन्यथा सुख कहाँ से आए? इस असत्य व्यवहार-जगत में, जो अखिल आत्माओं का स्वस्वरूप परमानन्द है, उसके बिना कौन मनुष्य या प्राणी जी सकेगा, या कौन निरन्तर प्रयत्न करेगा? इसलिए चित्त में सर्वात्मभाव से प्रकाशित वही पुरुष सदा दुःख से भरे जीवात्मा को आनन्दित करता है। जब महायति उस अदृश्यत्वादि-लक्षण परमाद्वैत में भेदरहित तत्त्व को पा लेता है, तब वही परम अभय, अत्यन्त कल्याण और परम अमृत—सद्रूप ब्रह्म—त्रिविध परिछेद से रहित—होता है। परन्तु यदि उसमें तनिक भी भेद जाना जाए तो भय अवश्य होता है, इसमें संशय नहीं। इसी आनन्दकोश के कारण ठूँठ से लेकर विष्णु आदि तक प्राणी क्रमशः नित्य सुखी होते हैं। पद-पद के भोगों से विरक्त, श्रोत्रिय और प्रसन्नचित्त के लिए स्वरूपभूत आनन्द पर में स्वयं प्रकाशित होता है। वाणी किसी निमित्त के आश्रय से चलती है; निमित्त न रहने पर शब्द लौट जाते हैं। निर्विशेष परमानन्द में शब्द कैसे चले? इसलिए यह मन सूक्ष्म है और सर्वविषयों से निवृत्त है; जिससे श्रोत्र, त्वचा, नेत्र आदि तथा कर्मेन्द्रियाँ भी प्रवृत्त होती हैं।

Non-dual Brahmānanda; fear from bheda-buddhi; apophatic limit of speech

Verse 33

सारमेव रसं लब्ध्वा साक्षाद्देही सनातनम् । सुखी भवति सर्वत्र अन्यथा सुखता कुतः ॥ असत्यस्मिन् परानन्दे स्वात्मभूतेऽखिलात्मनाम् । को जीवति नरो जन्तुः को वा नित्यं विचेष्टते ॥ तस्मात् सर्वात्मना चित्ते भा...

जो सार-रूप रस को प्राप्त कर लेता है, वह सनातन देही आत्मा को साक्षात् जानकर सर्वत्र सुखी होता है; अन्यथा सुख कहाँ से आए? इस असत्य व्यवहार-जगत में, जो अखिल आत्माओं का स्वस्वरूप परमानन्द है, उसके बिना कौन मनुष्य या प्राणी जी सकेगा, या कौन निरन्तर प्रयत्न करेगा? इसलिए चित्त में सर्वात्मभाव से प्रकाशित वही पुरुष सदा दुःख से भरे जीवात्मा को आनन्दित करता है। जब महायति उस अदृश्यत्वादि-लक्षण परमाद्वैत में भेदरहित तत्त्व को पा लेता है, तब वही परम अभय, अत्यन्त कल्याण और परम अमृत—सद्रूप ब्रह्म—त्रिविध परिछेद से रहित—होता है। परन्तु यदि उसमें तनिक भी भेद जाना जाए तो भय अवश्य होता है, इसमें संशय नहीं। इसी आनन्दकोश के कारण ठूँठ से लेकर विष्णु आदि तक प्राणी क्रमशः नित्य सुखी होते हैं। पद-पद के भोगों से विरक्त, श्रोत्रिय और प्रसन्नचित्त के लिए स्वरूपभूत आनन्द पर में स्वयं प्रकाशित होता है। वाणी किसी निमित्त के आश्रय से चलती है; निमित्त न रहने पर शब्द लौट जाते हैं। निर्विशेष परमानन्द में शब्द कैसे चले? इसलिए यह मन सूक्ष्म है और सर्वविषयों से निवृत्त है; जिससे श्रोत्र, त्वचा, नेत्र आदि तथा कर्मेन्द्रियाँ भी प्रवृत्त होती हैं।

Brahman as supreme bliss beyond speech; non-duality as the ground of fearlessness

Verse 34

सारमेव रसं लब्ध्वा साक्षाद्देही सनातनम् । सुखी भवति सर्वत्र अन्यथा सुखता कुतः ॥ असत्यस्मिन् परानन्दे स्वात्मभूतेऽखिलात्मनाम् । को जीवति नरो जन्तुः को वा नित्यं विचेष्टते ॥ तस्मात् सर्वात्मना चित्ते भा...

जो साधक सार-रूप ‘रस’ को—सनातन देही आत्मा को—प्रत्यक्ष पा लेता है, वह सर्वत्र सुखी होता है; अन्यथा सुख कहाँ से आए? जो परम आनन्द असत्य-सा (विषय-रूप से अगोचर) है और समस्त आत्माओं का स्वात्मा है—उसमें कौन मनुष्य या प्राणी जी सकता है, या कौन निरन्तर चेष्टा कर सकता है? इसलिए वही पुरुष, जो सम्पूर्ण आत्मभाव से चित्त में प्रकाशमान है, दुःख से भरे जीवात्मा को सदा आनन्दित करता है। जब यह महायति अदृश्यत्व आदि लक्षण वाले उस तत्त्व में निर्भेद परमाद्वैत को प्राप्त करता है, वही परम अभय, अत्यन्त कल्याण और परम अमृत है—सत्स्वरूप परम ब्रह्म, जो त्रिविध परिछेद से रहित है। पर यदि कोई उसमें अल्प भी भेद जान ले, तो निःसन्देह उसके लिए भय उत्पन्न होता है। उसी के आनन्दकोश से स्थावर से लेकर विष्णु आदि तक प्राणी तारतम्य के क्रम से नित्य सुखी होते हैं। पद-प्रतिष्ठा आदि से विरक्त, श्रोत्रिय और प्रसन्नचित्त के लिए स्वरूपभूत आनन्द पर में स्वयं प्रकाशित होता है। वाणी किसी न किसी निमित्त का आश्रय लेकर ही चलती है; जहाँ निमित्त नहीं, वहाँ से वाणी लौट आती है। निर्विशेष परम आनन्द में शब्द कैसे चले? इसलिए यह मन सूक्ष्म है और समस्त विषयों से निवृत्त है; जिससे श्रोत्र, त्वक्, चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ भी (उद्भूत/प्रवृत्त) होती हैं।

Paramānanda as Brahman/Ātman; nirbheda-paramādvaita; fearlessness through non-dual realization; limits of speech and mind (yato vāco nivartante)

Verse 35

सारमेव रसं लब्ध्वा साक्षाद्देही सनातनम् । सुखी भवति सर्वत्र अन्यथा सुखता कुतः ॥ असत्यस्मिन् परानन्दे स्वात्मभूतेऽखिलात्मनाम् । को जीवति नरो जन्तुः को वा नित्यं विचेष्टते ॥ तस्मात् सर्वात्मना चित्ते भा...

साररूप ‘रस’—सनातन देही आत्मा—का साक्षात् लाभ होने पर मनुष्य सर्वत्र सुखी होता है; अन्यथा सुखता कहाँ से? जो परमानन्द विषय-रूप से असत्य-सा (अगोचर) है और समस्त आत्माओं का स्वात्मा है—उसमें कौन मनुष्य या प्राणी जी सकता है, या कौन निरन्तर चेष्टा कर सकता है? इसलिए सम्पूर्ण आत्मभाव से चित्त में प्रकाशमान वही पुरुष दुःखग्रस्त जीवात्मा को सदा आनन्दित करता है। जब यह महायति अदृश्यत्व आदि लक्षण वाले उस तत्त्व में निर्भेद परमाद्वैत को पाता है, वही परम अभय, अत्यन्त कल्याण और परम अमृत है—सत्स्वरूप परम ब्रह्म, त्रिविध परिछेद से रहित। पर यदि कोई उसमें अल्प भी भेद जान ले, तो निःसन्देह उसके लिए भय उत्पन्न होता है। उसी के आनन्दकोश से स्थावर से लेकर विष्णु आदि तक प्राणी तारतम्य के क्रम से नित्य सुखी होते हैं। पद-प्रतिष्ठा आदि से विरक्त, श्रोत्रिय और प्रसन्नचित्त के लिए स्वरूपभूत आनन्द पर में स्वयं प्रकाशित होता है। वाणी किसी न किसी निमित्त का आश्रय लेकर ही चलती है; जहाँ निमित्त नहीं, वहाँ से वाणी लौट आती है। निर्विशेष परमानन्द में शब्द कैसे चले? इसलिए यह मन सूक्ष्म है और समस्त विषयों से निवृत्त है; जिससे श्रोत्र, त्वक्, चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ भी (उद्भूत/प्रवृत्त) होती हैं।

Advaita (nirbheda) and svarūpānanda; abhaya through non-dual knowledge; ineffability of Brahman

Verse 36

सारमेव रसं लब्ध्वा साक्षाद्देही सनातनम् । सुखी भवति सर्वत्र अन्यथा सुखता कुतः ॥ असत्यस्मिन् परानन्दे स्वात्मभूतेऽखिलात्मनाम् । को जीवति नरो जन्तुः को वा नित्यं विचेष्टते ॥ तस्मात् सर्वात्मना चित्ते भा...

साररूप ‘रस’—सनातन देही आत्मा—का प्रत्यक्ष बोध होने पर साधक सर्वत्र सुखी होता है; अन्यथा सुख कहाँ से? जो परमानन्द विषय-रूप से अगोचर है और समस्त आत्माओं का स्वात्मा है—उसमें कौन मनुष्य या प्राणी जी सकता है, या कौन निरन्तर चेष्टा कर सकता है? इसलिए सम्पूर्ण आत्मभाव से चित्त में प्रकाशमान वही पुरुष दुःख से भरे जीवात्मा को सदा आनन्दित करता है। जब यह महायति अदृश्यत्व आदि लक्षण वाले उस तत्त्व में निर्भेद परमाद्वैत को प्राप्त करता है, वही परम अभय, अत्यन्त कल्याण और परम अमृत है—सत्स्वरूप परम ब्रह्म, त्रिविध परिछेद से रहित। पर यदि कोई उसमें अल्प भी भेद जान ले, तो निःसन्देह उसके लिए भय उत्पन्न होता है। उसी के आनन्दकोश से स्थावर से लेकर विष्णु आदि तक प्राणी तारतम्य के क्रम से नित्य सुखी होते हैं। पद-प्रतिष्ठा आदि से विरक्त, श्रोत्रिय और प्रसन्नचित्त के लिए स्वरूपभूत आनन्द पर में स्वयं प्रकाशित होता है। वाणी किसी न किसी निमित्त का आश्रय लेकर ही चलती है; जहाँ निमित्त नहीं, वहाँ से वाणी लौट आती है। निर्विशेष परमानन्द में शब्द कैसे चले? इसलिए यह मन सूक्ष्म है और समस्त विषयों से निवृत्त है; जिससे श्रोत्र, त्वक्, चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ भी (उद्भूत/प्रवृत्त) होती हैं।

Aikya (identity) of Ātman and Brahman as paramānanda; abhaya; apophatic transcendence of speech/mind

Verse 37

सारमेव रसं लब्ध्वा साक्षाद्देही सनातनम् । सुखी भवति सर्वत्र अन्यथा सुखता कुतः ॥ असत्यस्मिन् परानन्दे स्वात्मभूतेऽखिलात्मनाम् । को जीवति नरो जन्तुः को वा नित्यं विचेष्टते ॥ तस्मात् सर्वात्मना चित्ते भा...

जो सार-रूप रस को प्राप्त कर सनातन देही आत्मा का साक्षात् अनुभव करता है, वह सर्वत्र सुखी होता है; अन्यथा सुख कहाँ से आए? जो परम आनन्द वस्तु-रूप ‘सत्य’ नहीं, और जो समस्त आत्माओं का स्वात्मा है—उसमें कौन मनुष्य या प्राणी वास्तव में ‘जीता’ है, और कौन निरन्तर ‘कर्म’ करता है? इसलिए समग्र आत्मभाव से चित्त में प्रकाशित वह पुरुष दुःख से भरे जीवात्मा को सदा आनन्दित करता है। जब यह महायति अदृश्यत्व आदि लक्षणों वाले उस तत्त्व में भेद-रहित परम अद्वैत को प्राप्त करता है—वही परम अभय, अत्यन्त कल्याण, परम अमृत है; वही सत्स्वरूप परम ब्रह्म है, जो त्रिविध परिछेद (देश-काल-वस्तु) से रहित है। परन्तु जब कोई पुरुष उसमें किंचित् भी अन्तर देखता है, तब उसके लिए भय होता है—इसमें संशय नहीं। उसी के आनन्दकोश से विष्णु से लेकर तृण-स्तम्भ तक सब प्राणी क्रमशः तारतम्य से नित्य सुखी होते हैं। जो श्रोत्रिय, प्रसन्नचित्त और विविध पदों से विरक्त है, उसके लिए स्वरूपभूत आनन्द परब्रह्म में स्वयं प्रकाशित होता है। वाणी किसी निमित्त का आश्रय लेकर ही चलती है; निमित्त के अभाव से जहाँ से वाणी लौट आती है। निर्विशेष परमानन्द में शब्द कैसे चले? इसलिए यह सूक्ष्म मन तथा श्रोत्र-त्वक्-चक्षु आदि और कर्मेन्द्रियाँ भी समस्त विषयों से निवृत्त हो जाती हैं।

Brahmānanda (supreme bliss) as non-dual Brahman; fearlessness through advaita; withdrawal of speech/mind (yato vāco nivartante)

Verse 38

व्यावृत्तानि परं प्राप्तुं न समर्थानि तानि तु ॥ तद्ब्रह्मानन्दमद्वन्द्वं निर्गुणं सत्यचिद्घनम् । विदित्वा स्वात्मरूपेण न बिभेति कुतश्चन ॥ एवं यस्तु विजानाति स्वगुरोरुपदेशतः । स साध्वासाधुकर्मभ्यां सदा...

वे इन्द्रियाँ, विषयों से निवृत्त होकर भी, परम को प्राप्त करने में समर्थ नहीं होतीं। परन्तु जो उस ब्रह्मानन्द को—द्वन्द्व-रहित, निर्गुण, सत्य-चिद्घन—अपने ही आत्मस्वरूप के रूप में जान लेता है, वह किसी से भी नहीं डरता। और जो अपने गुरु के उपदेश से ऐसा जानता है, वह प्रभु-स्वरूप पुरुष शुभ-अशुभ कर्मों से कभी नहीं तपता, यद्यपि समस्त जगत् ‘तप्य’ और ‘तापक’ (प्रभावित और प्रभावक) के रूप में प्रकट होता है।

Jñāna of nirguṇa Brahman as svātman; transcendence of karma’s binding power; dvandvātīta (beyond opposites)

Verse 39

व्यावृत्तानि परं प्राप्तुं न समर्थानि तानि तु ॥ तद्ब्रह्मानन्दमद्वन्द्वं निर्गुणं सत्यचिद्घनम् । विदित्वा स्वात्मरूपेण न बिभेति कुतश्चन ॥ एवं यस्तु विजानाति स्वगुरोरुपदेशतः । स साध्वासाधुकर्मभ्यां सदा...

वे इन्द्रियाँ, विषयों से निवृत्त होकर भी, परम को प्राप्त करने में समर्थ नहीं होतीं। परन्तु जो उस ब्रह्मानन्द को—द्वन्द्व-रहित, निर्गुण, सत्य-चिद्घन—अपने ही आत्मस्वरूप के रूप में जान लेता है, वह किसी से भी नहीं डरता। और जो अपने गुरु के उपदेश से ऐसा जानता है, वह प्रभु-स्वरूप पुरुष शुभ-अशुभ कर्मों से कभी नहीं तपता, यद्यपि समस्त जगत् ‘तप्य’ और ‘तापक’ (प्रभावित और प्रभावक) के रूप में प्रकट होता है।

Jñāna of nirguṇa Brahman as svātman; transcendence of karma’s binding power; dvandvātīta (beyond opposites)

Verse 40

व्यावृत्तानि परं प्राप्तुं न समर्थानि तानि तु ॥ तद्ब्रह्मानन्दमद्वन्द्वं निर्गुणं सत्यचिद्घनम् । विदित्वा स्वात्मरूपेण न बिभेति कुतश्चन ॥ एवं यस्तु विजानाति स्वगुरोरुपदेशतः । स साध्वासाधुकर्मभ्यां सदा...

जो साधन और प्रयत्न विमुख हो गए हैं, वे परम को प्राप्त करने में समर्थ नहीं होते। उस ब्रह्म को—आनन्दस्वरूप, अद्वैत, निर्गुण, सत्य-चिद्घन—अपने ही आत्मस्वरूप के रूप में जानकर मनुष्य कहीं से भी भय नहीं करता। जो अपने गुरु के उपदेश से इसे जान लेता है, वह स्वाधीन प्रभु पुरुष सदा शुभ-अशुभ कर्मों से तपता नहीं। यह समस्त जगत् ताप्य और अताप्य—प्रभावित और अप्रभावित—रूप में ही प्रतीत होता है।

Brahman-Atman identity; nirguṇa Brahman; freedom from fear; karma non-affliction for the knower

Verse 41

प्रत्यगात्मतया भाति ज्ञानाद्वेदान्तवाक्यजात् ॥ शुद्धमीश्वरचैतन्यं जीवचैतन्यमेव च । प्रमाता च प्रमाणं च प्रमेयं च फलं तथा ॥ इति सप्तविधं प्रोक्तं भिद्यते व्यवहारतः । मायोपाधिविनिर्मुक्तं शुद्धमित्यभिधी...

वेदान्त-वाक्यों के समूह से उत्पन्न ज्ञान के द्वारा वह प्रत्यगात्मा के रूप में प्रकाशित होता है। वही ‘शुद्ध’ कहा जाता है—ईश्वर-चैतन्य और जीव-चैतन्य; तथा वही व्यवहार में प्रमाता (ज्ञाता), प्रमाण (ज्ञान-साधन), प्रमेय (ज्ञेय) और फल (परिणाम) भी कहलाता है। इस प्रकार वह सात प्रकार का कहा गया है, भेद केवल व्यवहार में है। जो माया-उपाधि से रहित है, वही ‘शुद्ध’ कहलाता है। माया-संबंध से ‘ईश्वर’ और अविद्या के वश से ‘जीव’ कहा जाता है। अन्तःकरण-संबंध से ‘प्रमाता’ और वृत्ति-संबंध से ‘प्रमाण’ कहा जाता है। अज्ञात चैतन्य ‘प्रमेय’ और ज्ञात चैतन्य ‘फल’ कहलाता है।

Sevenfold functional differentiation of one consciousness (caitanya) via upādhis; māyā/avidyā; pramātṛ-pramāṇa-prameya-phala schema; vyavahāra vs paramārtha

Verse 42

प्रत्यगात्मतया भाति ज्ञानाद्वेदान्तवाक्यजात् ॥ शुद्धमीश्वरचैतन्यं जीवचैतन्यमेव च । प्रमाता च प्रमाणं च प्रमेयं च फलं तथा ॥ इति सप्तविधं प्रोक्तं भिद्यते व्यवहारतः । मायोपाधिविनिर्मुक्तं शुद्धमित्यभिधी...

वेदान्त-वाक्यों के समूह से उत्पन्न ज्ञान के द्वारा वह प्रत्यगात्मा के रूप में प्रकाशित होता है। वही ‘शुद्ध’ कहा जाता है—ईश्वर-चैतन्य और जीव-चैतन्य; तथा वही व्यवहार में प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और फल भी कहलाता है। इस प्रकार वह सात प्रकार का कहा गया है; भेद केवल व्यवहार में है। जो माया-उपाधि से रहित है, वही ‘शुद्ध’ कहलाता है। माया-संबंध से ‘ईश्वर’ और अविद्या के वश से ‘जीव’ कहा जाता है। अन्तःकरण-संबंध से ‘प्रमाता’ और वृत्ति-संबंध से ‘प्रमाण’ कहा जाता है। अज्ञात चैतन्य ‘प्रमेय’ और ज्ञात चैतन्य ‘फल’ कहलाता है।

Upādhi-based differentiation of consciousness; vyavahāra/paramārtha; Advaita epistemic categories

Verse 43

प्रत्यगात्मतया भाति ज्ञानाद्वेदान्तवाक्यजात् ॥ शुद्धमीश्वरचैतन्यं जीवचैतन्यमेव च । प्रमाता च प्रमाणं च प्रमेयं च फलं तथा ॥ इति सप्तविधं प्रोक्तं भिद्यते व्यवहारतः । मायोपाधिविनिर्मुक्तं शुद्धमित्यभिधी...

वेदान्त-वाक्यों के समूह से उत्पन्न ज्ञान द्वारा आत्मा प्रत्यगात्मा (अन्तर्मुख आत्मा) के रूप में प्रकाशित होती है। शुद्ध चैतन्य, ईश्वर-चैतन्य, जीव-चैतन्य, प्रमाता (जानने वाला), प्रमाण (ज्ञान का साधन), प्रमेय (ज्ञेय), तथा फल—यह सात प्रकार का भेद केवल व्यवहार-स्तर पर कहा गया है। जो माया-उपाधि से रहित है वह ‘शुद्ध’ कहलाता है। माया-संबंध से वही ‘ईश्वर’ कहा जाता है; अविद्या के वश से ‘जीव’। अन्तःकरण के संबंध से ‘प्रमाता’, और उसकी वृत्ति के संबंध से ‘प्रमाण’ कहा जाता है। अज्ञात चैतन्य ‘प्रमेय’ और ज्ञात चैतन्य ‘फल’ कहलाता है।

Atman–Brahman consciousness analyzed via upādhis (māyā/avidyā) and epistemic categories (pramātṛ–pramāṇa–prameya–phala)

Verse 44

प्रत्यगात्मतया भाति ज्ञानाद्वेदान्तवाक्यजात् ॥ शुद्धमीश्वरचैतन्यं जीवचैतन्यमेव च । प्रमाता च प्रमाणं च प्रमेयं च फलं तथा ॥ इति सप्तविधं प्रोक्तं भिद्यते व्यवहारतः । मायोपाधिविनिर्मुक्तं शुद्धमित्यभिधी...

वेदान्त-वाक्यों के समूह से उत्पन्न ज्ञान से आत्मा प्रत्यगात्मा के रूप में प्रकाशित होती है। शुद्ध चैतन्य, ईश्वर-चैतन्य, जीव-चैतन्य, प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और फल—यह सातविध शिक्षा है; पर भेद केवल व्यवहार में ही माना जाता है। माया-उपाधि से मुक्त वही ‘शुद्ध’ कहलाता है। माया के संबंध से ‘ईश्वर’, अविद्या के वश से ‘जीव’। अन्तःकरण के संबंध से ‘प्रमाता’, और उसकी वृत्ति के संबंध से ‘प्रमाण’ कहा जाता है। अज्ञात चैतन्य ‘प्रमेय’ और ज्ञात चैतन्य ‘फल’ कहलाता है।

Vyavahāra-bheda (empirical differentiation) of one consciousness via upādhis and epistemic roles

Verse 45

प्रत्यगात्मतया भाति ज्ञानाद्वेदान्तवाक्यजात् ॥ शुद्धमीश्वरचैतन्यं जीवचैतन्यमेव च । प्रमाता च प्रमाणं च प्रमेयं च फलं तथा ॥ इति सप्तविधं प्रोक्तं भिद्यते व्यवहारतः । मायोपाधिविनिर्मुक्तं शुद्धमित्यभिधी...

वेदान्त-वाक्यों से उत्पन्न ज्ञान से आत्मा प्रत्यगात्मा के रूप में भासित होती है। ‘शुद्ध’, ‘ईश्वर-चैतन्य’, ‘जीव-चैतन्य’, तथा ‘प्रमाता’, ‘प्रमाण’, ‘प्रमेय’ और ‘फल’—यह सातविध भेद केवल व्यवहार-प्रयोग में ही दिखता है। माया-उपाधि से मुक्त वही ‘शुद्ध’ कहलाता है। माया-संबंध से ‘ईश्वर’, अविद्या-आधीनता से ‘जीव’। अन्तःकरण-संबंध से ‘प्रमाता’, और उसकी वृत्ति-संबंध से ‘प्रमाण’ कहा जाता है। अज्ञात चैतन्य ‘प्रमेय’ और ज्ञात चैतन्य ‘फल’ कहलाता है।

Śuddha-caitanya and its apparent sevenfold differentiation (saptavidha-bheda) in vyavahāra

Verse 46

सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं स्वात्मानं भावयेत् सुधीः ॥ एवं यो वेद तत्त्वेन ब्रह्मभूयाय कल्पते । सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारं वच्मि यथार्थतः ॥ स्वयं मृत्वा स्वयं भूत्वा स्वयमेवावशिष्यते ॥ इत्युपनिषत् ॥४६–४७॥

बुद्धिमान साधक को सभी उपाधियों से मुक्त अपने आत्मस्वरूप का निरन्तर ध्यान करना चाहिए। जो इसे तत्त्वतः जानता है, वह ब्रह्मभाव के योग्य हो जाता है। मैं समस्त वेदान्त के सिद्धान्तों का सार यथार्थ रूप से कहता हूँ। स्वयं ‘मरकर’ अर्थात देहादि-अहंकार का त्याग करके, स्वयं ‘होकर’ अर्थात ब्रह्मरूप होकर, अंत में केवल वही स्वयंस्वरूप शेष रहता है। इस प्रकार उपनिषद् समाप्त होती है।

Ātman–Brahman identity; removal of upādhis (limiting adjuncts); mokṣa through jñāna

Verse 47

सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं स्वात्मानं भावयेत् सुधीः ॥ एवं यो वेद तत्त्वेन ब्रह्मभूयाय कल्पते । सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारं वच्मि यथार्थतः ॥ स्वयं मृत्वा स्वयं भूत्वा स्वयमेवावशिष्यते ॥ इत्युपनिषत् ॥४६–४७॥

बुद्धिमान साधक को सभी उपाधियों से मुक्त अपने आत्मस्वरूप का निरन्तर ध्यान करना चाहिए। जो इसे तत्त्वतः जानता है, वह ब्रह्मभाव के योग्य हो जाता है। मैं समस्त वेदान्त के सिद्धान्तों का सार यथार्थ रूप से कहता हूँ। स्वयं ‘मरकर’ अर्थात देहादि-अहंकार का त्याग करके, स्वयं ‘होकर’ अर्थात ब्रह्मरूप होकर, अंत में केवल वही स्वयंस्वरूप शेष रहता है। इस प्रकार उपनिषद् समाप्त होती है।

Jñāna leading to brahma-niṣṭhā; upādhi-śūnyatā; nondual remainder (avaśiṣyate)