
Soma purchase and preparation rites.
Mantra 1
अ॒ग्नेस्त॒नूर॑सि॒ विष्ण॑वे त्वा॒ सोम॑स्य त॒नूर॑सि॒ विष्ण॑वे॒ त्वा ऽति॑थेराति॒थ्यम॑सि॒ विष्ण॑वे त्वा श्ये॒नाय॑ त्वा सोम॒भृते॒ विष्ण॑वे त्वा॒ऽग्नये॑ त्वा रायस्पोष॒दे विष्ण॑वे त्वा
तू अग्नि का शरीर है—विष्णु के लिए तुझे! तू सोम का शरीर है—विष्णु के लिए तुझे! तू अतिथि का आतिथ्य है—विष्णु के लिए तुझे! श्येन (बाज) के लिए तुझे, सोम-भर्ता के लिए—विष्णु के लिए तुझे! अग्नि के लिए तुझे, धन और पोषण देने वाले के रूप में—विष्णु के लिए तुझे!
Mantra 2
अ॒ग्नेर्ज॒नित्र॑मसि वृष॑णौ स्थ उ॒र्वश्य॑स्या॒युर॑सि पुरू॒रवा॑ असि । गा॒य॒त्रेण॑ त्वा॒ छन्द॑सा मन्थामि॒ त्रै॑ष्टुभेन त्वा॒ छन्द॑सा मन्थामि॒ जाग॑तेन त्वा॒ छन्द॑सा मन्थामि
तू अग्नि का जनक (उत्पादक) है; तुम दोनों वृषण (बलवान) हो। तू उर्वशी का आयु (जीवन) है; तू पुरूरवा है। गायत्री छन्द से मैं तुझे मथता/मंथन करता हूँ; त्रैष्टुभ छन्द से मैं तुझे मथता हूँ; जागत छन्द से मैं तुझे मथता हूँ।
Mantra 3
भव॑तं न॒: सम॑नसौ॒ सचे॑तसावरे॒पसौ॑ । मा य॒ज्ञᳪ हि॑ᳪसिष्टं॒ मा य॒ज्ञप॑तिं जातवेदसौ शिवौ भ॑वतम॒द्य न॑:
तुम दोनों हमारे लिए एक-मन, एक-चित्त, निष्कलंक रहो। हे दोनों जातवेदस्, यज्ञ को आहत न करो, यज्ञपति को आहत न करो। आज हमारे प्रति तुम दोनों शिव (अनुग्रही) बनो।
Mantra 4
अ॒ग्नाव॒ग्निश्च॑रति॒ प्रवि॑ष्ट॒ ऋषी॑णां पु॒त्रो अ॑भिशस्ति॒पावा॑ । स न॑: स्यो॒नः सु॒यजा॑ यजे॒ह दे॒वेभ्यो॑ ह॒व्यᳪ सद॒मप्र॑युच्छ॒न्त्स्वाहा॑
अग्नि में ही अग्नि विचरता है, भीतर प्रविष्ट; ऋषियों का पुत्र, अभिशाप-निवारक, शुद्ध करने वाला। वह हमारे लिए कल्याणकारी, सुयज्य (सुगमता से पूज्य) हो; तू यहाँ देवों के लिए हवि का यजन कर—अप्रयुच्छन्त् (अविरत, अच्युत) होकर—स्वाहा।
Mantra 5
आप॑तये त्वा॒ परि॑पतये गृह्णामि॒ तनू॒नप्त्रे॑ शाक्व॒राय॒ शक्व॑न॒ ओजि॑ष्ठाय । अना॑धृष्टमस्यनाधृ॒ष्यं दे॒वाना॒मोजोऽन॑भिशस्त्यभिशस्ति॒पा अ॑नभिशस्ते॒न्यमञ्ज॑सा स॒त्यमुप॑गेषᳪ स्वि॒ते मा॑ धाः
आपति (प्राप्ति के स्वामी) के लिए, परिपति (सर्वरक्षक स्वामी) के लिए, मैं तुझे ग्रहण करता हूँ; तनूनपात् के लिए, शाक्वर के लिए, शक्वन् के लिए, अति-ओजस्वी के लिए। तू अनाधृष्ट (अपराजित) है, अनाधृष्य (अजेय)—देवों का ओज; अभिशस्ति-पा (अभिशाप व आरोप से रक्षक), अनभिशस्त्य (निर्दोष, अप्रतिहत)। सरलता से सत्य के निकट जा; मुझे (उससे) वंचित न कर—स्विते, मा धाः।
Mantra 6
अग्ने॑ व्रतपा॒स्त्वे व्र॑त॒पा या तव॑ त॒नूरि॒यᳪ सा मयि॒ यो मम॑ त॒नूरे॒षा सा त्वयि॑ । स॒ह नौ॑ व्रतपते व्र॒तान्यनु॑ मे दी॒क्षां दी॒क्षाप॑ति॒र्मन्य॑ता॒मनु॒ तप॒स्तप॑स्पतिः
हे अग्ने, तू व्रतों का पालक है; तेरा यह शरीर मुझमें है, और मेरा यह शरीर तुझमें है। हे व्रतपते, हम दोनों साथ-साथ व्रतों का अनुसरण करें। दीक्षापति मेरी दीक्षा को स्वीकार/अनुमोदित करे; तपस्पति मेरे तप को स्वीकार/अनुमोदित करे।
Mantra 7
अ॒jशुर॑ᳪशुष्टे देव सो॒माप्या॑यता॒मिन्द्रा॑यैकधन॒विदे॑ । आ तुभ्य॒मिन्द्र॒: प्याय॑ता॒मा त्वमिन्द्रा॑य प्यायस्व । आ प्या॑यया॒स्मान्त्सखी॑न्त्स॒न्या मे॒धया॑ स्व॒स्ति ते॑ देव सोम सु॒त्याम॑शीय । एष्टा॒ राय॒: प्रेषे भगा॑य ऋ॒तमृ॑तवा॒दिभ्यो॒ नमो॒ द्यावा॑पृथि॒वीभ्या॑म्
हे देव सोम! यह सोम-अंकुर इन्द्र के लिए—एकमात्र धन के ज्ञाता—फूले-फले। इन्द्र तुम्हारे लिए पुष्ट हो; और तुम इन्द्र के लिए पुष्ट होओ। हमें, अपने मित्रों को, विजयकारी मेधा (प्रज्ञा) से पुष्ट करो। हे देव सोम! सुत्या (सोम-निष्पादन/पेराई) में हम तुम्हारे लिए स्वस्ति (कल्याण) प्राप्त करें। इच्छित धन-राशि भाग (भग) के लिए प्रेषित हो; ऋत के अनुसार बोलने वाले ऋतावानों को नमस्कार; द्यावा-पृथिवी (द्यौः और पृथिवी) को नमस्कार।
Mantra 8
या ते॑ अग्नेऽयःश॒या त॒नूर्वर्षि॑ष्ठा गह्वरे॒ष्ठा । उ॒ग्रं वचो॒ अपा॑वधीत्त्वे॒षं वचो॒ अपा॑वधी॒त्स्वाहा॑ । या ते॑ अग्ने रजःश॒या त॒नूर्वर्षि॑ष्ठा गह्वरे॒ष्ठा । उ॒ग्रं वचो॒ अपा॑वधीत्त्वे॒षं वचो॒ अपा॑वधी॒त्स्वाहा॑ । या ते॑ अग्ने हरिश॒या त॒नूर्वर्षि॑ष्ठा गह्वरे॒ष्ठा । उ॒ग्रं वचो॒ अपा॑वधीत्त्वे॒षं वचो॒ अपा॑वधी॒त्स्वाहा॑
हे अग्नि! जो तुम्हारा शरीर अयः-शया (लोहे पर स्थित) है—अत्यन्त बलवान, गह्वर (गहन स्थान) में स्थित—उसने उग्र वचन को दूर कर दिया, उसने तेजस्वी/दीप्त वचन को दूर कर दिया—स्वाहा। हे अग्नि! जो तुम्हारा शरीर रजः-शया (अन्तरिक्ष में स्थित) है—अत्यन्त बलवान, गह्वर में स्थित—उसने उग्र वचन को दूर कर दिया, उसने तेजस्वी वचन को दूर कर दिया—स्वाहा। हे अग्नि! जो तुम्हारा शरीर हरि-शया (हरित/पीताभ तेज पर स्थित) है—अत्यन्त बलवान, गह्वर में स्थित—उसने उग्र वचन को दूर कर दिया, उसने तेजस्वी वचन को दूर कर दिया—स्वाहा।
Mantra 9
त॒प्ताय॑नी मेऽसि वि॒त्ताय॑नी मेऽस्यव॑तान्मा नाथि॒तादव॑तान्मा व्यथि॒तात् । वि॒देद॒ग्निर्नभो॒ नामा ऽग्ने॑ अङ्गिर॒ आयु॑ना॒ नाम्नेहि॒ योऽस्यां पृ॑थि॒व्यामसि॒ यत्तेऽना॑धृष्टं॒ नाम॑ य॒ज्ञियं॒ तेन॒ त्वा द॑धे वि॒देद॒ग्निर्न॒भो॒ नामा ऽग्ने॑ अङ्गिर॒ आयु॑ना॒ नाम्नेहि॒ यो द्वि॒तीय॑स्यां पृथि॒व्यामसि॒ यत्तेऽना॑धृष्टं॒ नाम॑ य॒ज्ञियं॒ तेन॒ त्वा द॑धे वि॒देद॒ग्निर्न॒भो नामा ऽग्ने॑ अङ्गिर॒ आयु॑ना॒ नाम्नेहि॑ यस्तृ॒तीय॑स्यां पृथि॒व्यामसि॒ यत्तेऽना॑धृष्टं॒ नाम॑ य॒ज्ञियं॒ तेन॒ त्वा द॑धे । अनु॑ त्वा दे॒ववी॑तये
तप्तायनी (तापन हेतु) तुम मेरे हो; वित्तायनी (विजय/लाभ हेतु) तुम मेरे हो। मुझे अनाथता से बचाओ; मुझे व्यथा/क्लेश से बचाओ। ‘अग्नि जानता है—नभः नाम है’: हे अग्ने आङ्गिरस! ‘आयु’ नाम से यहाँ आओ—तुम जो इस पृथिवी में हो; तुम्हारा जो अनाधृष्ट (अपराजेय/अभेद्य), यज्ञिय (यज्ञ-योग्य) नाम है, उसी से मैं तुम्हें स्थापित करता हूँ। ‘अग्नि जानता है—नभः नाम है’: हे अग्ने आङ्गिरस! ‘आयु’ नाम से यहाँ आओ—तुम जो दूसरी पृथिवी में हो; तुम्हारा जो अनाधृष्ट, यज्ञिय नाम है, उसी से मैं तुम्हें स्थापित करता हूँ। ‘अग्नि जानता है—नभः नाम है’: हे अग्ने आङ्गिरस! ‘आयु’ नाम से यहाँ आओ—तुम जो तीसरी पृथिवी में हो; तुम्हारा जो अनाधृष्ट, यज्ञिय नाम है, उसी से मैं तुम्हें स्थापित करता हूँ। देववीति (देव-आह्वान/देव-सेवा) के लिए मैं तुम्हारा अनुसरण करता हूँ।
Mantra 10
सि॒jह्य॒सि सपत्नसा॒ही दे॒वेभ्य॑: कल्पस्व सि॒jह्य॒सि सपत्नसा॒ही दे॒वेभ्य॑:शुन्धस्व सि॒jह्य॒सि सपत्नसा॒ही दे॒वेभ्य॑: शुम्भस्व
तू सिंहिनी है, शत्रुओं को परास्त करने वाली; देवों के लिए स्वयं को तैयार कर। तू सिंहिनी है, शत्रुओं को परास्त करने वाली; देवों के लिए स्वयं को शुद्ध कर। तू सिंहिनी है, शत्रुओं को परास्त करने वाली; देवों के लिए स्वयं को सुशोभित कर।
Mantra 11
इ॒न्द्र॒घो॒षस् त्वा॒ वसु॑भिः पु॒रस्ता॑त् पातु । प्रचे॑तास् त्वा रुद्रैः प॒श्चात् पा॑तु । मनो॑जवास् त्वा पि॒तृभि॑र् दक्षिण॒तः पा॑तु । वि॒श्वक॑र्मा त्वाऽऽदि॒त्यैर् उ॑त्तर॒तः पा॑तु । इ॒दम॒हं त॒प्तं वार् ब॑हि॒र्धा य॒ज्ञान् निḥ सृ॑जामि ॥
इन्द्रघोष तुम्हारी पूर्व दिशा से वसुओं सहित रक्षा करे; प्रचेतस् (पूर्वज्ञ) तुम्हारी पश्चिम दिशा से रुद्रों सहित रक्षा करे; मनोजव (मन-वेग) तुम्हारी दक्षिण दिशा से पितरों सहित रक्षा करे; विश्वकर्मा तुम्हारी उत्तर दिशा से आदित्यों सहित रक्षा करे। यह तप्त जल मैं यज्ञ से बाहर, बहिर्धा, अब निष्कासित करता हूँ।
Mantra 12
सि॒jह्य॒सि॒ स्वाहा॑ । सि॒jह्य॒स्यादित्य॒वनि॒: स्वाहा॑ । सि॒jह्य॒सि ब्रह्म॒वनि॑: क्षत्र॒वनि॒: स्वाहा॑ । सि॒jह्य॒सि सुप्रजा॒वनी॑ रायस्पोष॒वनि॒: स्वाहा॑ । सि॒jह्यस्याव॑ह दे॒वान् यज॑मानाय॒ स्वाहा॑ । भू॒तेभ्य॑स् त्वा ॥
छिड़को—स्वाहा! आदित्यों की प्राप्ति (आदित्यवनि) के रूप में छिड़को—स्वाहा! ब्रह्म-तेज की प्राप्ति (ब्रह्मवनि) और क्षत्र-तेज की प्राप्ति (क्षत्रवनि) के रूप में छिड़को—स्वाहा! सुप्रजा की प्राप्ति (सुप्रजावनी) तथा धन-समृद्धि की प्राप्ति (रायस्पोषवनि) के रूप में छिड़को—स्वाहा! छिड़को; यजमान के लिए देवों को यहाँ ले आओ—स्वाहा! भूतों के लिए (भूतेभ्यः) तुझे।
Mantra 13
ध्रु॒वो॒ऽसि पृथि॒वीं दृ॑ᳪह । ध्रुव॒क्षिद॑स्य॒न्तरि॑क्षं दृᳪह । अच्युत॒क्षिद॑सि॒ दिवं॑ दृᳪह । अ॒ग्नेः पुरी॑षम् असि ॥
तू ध्रुव है; पृथ्वी को दृढ़ कर। तेरा आसन ध्रुव है; अन्तरिक्ष को दृढ़ कर। तेरा आसन अच्युत है; द्युलोक को दृढ़ कर। तू अग्नि का ‘पुरीष’ (पूरक/भराव) है।
Mantra 14
यु॒ञ्जते॒ मन॑ उ॒त यु॑ञ्जते॒ धियो॒ विप्रा॒ विप्र॑स्य बृह॒तो वि॑प॒श्चित॑: । वि होत्रा॑ दधे वयुना॒विद् एक॒ इन् म॒ही दे॒वस्य॑ सवि॒तुः परि॑ष्टुति॒: स्वाहा॑ ॥
वे मन को युक्त करते हैं और धियों (विचार-शक्तियों) को भी युक्त करते हैं—प्रेरित ऋषि, उस महान्, विपश्चित् (विशेष-ज्ञ) विप्र के। विधि-विद् एक ने होत्र-कार्य (यज्ञीय पुरोहित-कर्तव्य) को सुव्यवस्थित किया है; देव सविता की यह महती, सर्वतोव्यापी परिष्टुति (परिपूर्ण स्तुति) है—स्वाहा।
Mantra 15
इ॒दं विष्णु॒र् वि च॑क्रमे त्रे॒धा नि द॑धे प॒दम् । समू॑ढम् अस्य पाᳪसु॒रे स्वाहा॑ ॥
यह विष्णु ने विस्तार से पग बढ़ाया; त्रिधा उसने अपना पद (चरण-स्थान) स्थापित किया। उसका स्थान धूल में गूढ़ (छिपा) है—स्वाहा।
Mantra 16
इरा॑वती धेनु॒मती॒ हि भू॒तᳪ सू॑यव॒सिनी॒ मन॑वे दश॒स्या । व्य॑स्कभ्ना॒ रोद॑सी विष्णवे॒ते दा॒धर्थ॑ पृथि॒वीम॒भितो॑ म॒यूखै॒ः स्वाहा॑
हे (देवी), तू इरा-सम्पन्न, धेनु-सम्पन्न हुई है; उत्तम चरागाहों से युक्त, मनु के लिए सेवनीय हुई है। तूने दोनों लोकों को अलग-अलग स्थिर किया; हे विष्णु, तेरे लिए तूने पृथ्वी को चारों ओर किरणों (मयूखों) से दृढ़ किया। स्वाहा।
Mantra 17
दे॒व॒श्रुतौ॑ दे॒वेष्वा घो॑षतं॒ प्राची॒ प्रेत॑मध्व॒रं क॒ल्पय॑न्ती ऊ॒र्ध्वं य॒ज्ञं न॑यतं॒ मा जि॑ह्वरतम् । स्वं गो॒ष्ठमा व॑दतं देवी दुर्ये॒ आयु॒र्मा निर्वा॑दिष्टं प्र॒जां मा निर्वा॑दिष्ट॒मत्र॑ रमेथां॒ वर्ष्म॑न् पृथि॒व्याः
हे देव-श्रुत (देवों में प्रसिद्ध) दोनों, देवों के बीच उद्घोष करो; पूर्व दिशा की ओर जाओ, यज्ञ का विधान करते हुए। यज्ञ को ऊर्ध्व की ओर ले जाओ—कहीं जिह्वा (वाणी) से डिगो मत। हे देवियो, कठिन मार्ग में अपने ही गोष्ठ (आवास) को पुकारो/कहो। मेरा आयु न छीना जाए, मेरी प्रजा न छीनी जाए; यहाँ तुम पृथ्वी के पृष्ठ (वक्ष) पर रमण करो।
Mantra 18
विष्णो॒र्नुकं॑ वी॒र्या॒णि॒ प्र वो॑चं॒ यः पार्थि॑वानि विम॒मे रजा॑ᳪसि । यो अस्क॑भाय॒दुत्त॑रᳪ स॒धस्थं॑ विचक्रमा॒णस्त्रे॒धोरु॑गा॒यो विष्ण॑वे त्वा
अब मैं विष्णु के वीर्यपूर्ण पराक्रमों का उद्घोष करता हूँ—जिसने पार्थिव प्रदेशों को नापा, जिसने सर्वोच्च अधिष्ठान को स्थिर किया; जो त्रिविध पगों से विस्तृत-गामी होकर विचक्रमण करता है—विष्णु के लिए यह (अर्पण) तुम्हें।
Mantra 19
दि॒वो वा॑ विष्ण उ॒त वा॑ पृथि॒व्या म॒हो वा॑ विष्ण उ॒रोर॒न्तरि॑क्षात् । उ॒भा हि हस्ता॒ वसु॑ना पृ॒णस्वा प्र य॑च्छ॒ दक्षि॑णा॒दोत स॒व्याद्विष्ण॑वे त्वा
हे विष्णु! चाहे दिव्य लोक से, चाहे पृथ्वी से, अथवा महान् विस्तीर्ण अन्तरिक्ष से—तू दोनों हाथों को वसु (धन) से परिपूर्ण कर; दाहिने से भी और बाएँ से भी दान प्रवाहित कर—विष्णु के लिए यह (अर्पण) तुम्हें।
Mantra 20
प्र तद्विष्णु॑ स्तवते वी॒र्ये॒ण मृ॒गो न भी॒मः कु॑च॒रो गि॑रि॒ष्ठाः । यस्यो॒रुषु॑ त्रि॒षु वि॒क्रम॑णेष्वधिक्षि॒यन्ति॒ भुव॑नानि॒ विश्वा॑
अतः विष्णु अपने वीर्य (पराक्रम) से स्तुत्य है—भयङ्कर मृग के समान, जो विचरता है, पर्वतों पर स्थित रहता है; क्योंकि उसके तीन विस्तृत विक्रमों में समस्त भुवन निवास करते हैं।
Mantra 21
विष्णो॑ र॒राट॑मसि॒ । विष्णो॒ः श्नप्त्रे॑ स्थो । विष्णो॒ः स्यूर॑सि॒ । विष्णो॑र्ध्रु॒वो॒ऽसि । वै॒ष्ण॒वम॑सि॒ । विष्ण॑वे त्वा ।
तू विष्णु का अग्रभाग है; तुम विष्णु के बन्धन (कसाव) के लिए हो; तू विष्णु की रज्जु (स्यूर) है; तू विष्णु के लिए ध्रुव, स्थिर है। तू वैष्णव है; विष्णु के लिए मैं तुझे ग्रहण करता हूँ।
Mantra 22
दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम् । आ द॑दे॒ नार्य॑सी॒दम॒हᳪ रक्ष॑सां ग्री॒वा अपि॑ कृन्तामि । बृ॒हन्न॑सि बृ॒हद्र॑वा बृह॒तीमिन्द्रा॑य॒ वाचं॑ वद ।
देव सविता के प्रसव (प्रेरणा) से, अश्विनों की भुजाओं से, पूषन् के हाथों से मैं तुझे ग्रहण करता हूँ। तू न बच सकेगा; इसी से मैं राक्षसों की गर्दनें काट देता हूँ। तू महान है, महान-ध्वनि वाला है; इन्द्र के लिए ऊँची, बृहती वाणी बोल।
Mantra 23
र॒क्षो॒हणं॑ वलग॒हनं॑ वैष्ण॒वी मि॒दम॒हं तं व॑ल॒गमुत्कि॑रामि॒ यं मे॒ निष्ट्यो॒ यम॒मात्यो॑ निच॒खाने॒दम॒हं तं व॑ल॒गमुत्कि॑रामि॒ यं मे॑ समा॒नो यमस॑मानो निच॒खाने॒दम॒हं तं व॑ल॒गमुत्कि॑रामि॒ यं मे॒ सब॑न्धु॒र्यमस॑बन्धुर्निच॒खाने॒दम॒हं तं व॑ल॒गमुत्कि॑रामि॒ यं मे॑ सजा॒तो यमस॑जातो निच॒खानोत्कृ॒त्यां कि॑रामि ।
हे वैष्णवी—राक्षसों का संहार करने वाली, वलग (वलग-तंत्र) का विनाश करने वाली—इस वलग को मैं उखाड़कर बाहर फेंकता हूँ। जिसे मेरे प्रिय ने या अप्रिय ने गाड़ा हो—इस वलग को मैं उखाड़कर बाहर फेंकता हूँ। जिसे मेरा अपना (सम्बन्धी) या पराया ने गाड़ा हो—इस वलग को मैं उखाड़कर बाहर फेंकता हूँ। जिसे मेरा कुटुम्बी (समान) या असमान ने गाड़ा हो—इस वलग को मैं उखाड़कर बाहर फेंकता हूँ। जिसे मेरा बन्धु या अबन्धु ने गाड़ा हो—इस वलग को मैं उखाड़कर बाहर फेंकता हूँ। जिसे मेरा सहजात (साथ जन्मा) या असहजात ने गाड़ा हो—उसे उखाड़कर मैं दूर फेंकता हूँ।
Mantra 24
स्व॒राड॑सि सपत्न॒हा स॑त्र॒राड॑स्यभिमाति॒हा ज॑न॒राड॑सि रक्षो॒हा स॑र्व॒राड॑स्यमित्र॒हा ।
तू स्वराज् है—सपत्नों का संहार करने वाला। तू सत्र में राज करता है—अभिमाति (आक्रमण/द्वेष) का संहार करने वाला। तू जनों में राज करता है—राक्षसों का संहार करने वाला। तू सर्व पर राज करता है—अमित्र का संहार करने वाला।
Mantra 25
र॒क्षो॒हणो॑ वो वलग॒हन॒: प्रोक्षा॑मि वैष्ण॒वान् । र॑क्षो॒हणो॑ वो वलग॒हनोऽव॑नयामि वैष्ण॒वान् । र॑क्षो॒हणो॑ वो वलग॒हनोऽव॑स्तृणामि वैष्ण॒वान् । र॑क्षो॒हणौ॑ वां वलग॒हना॒ उप॑ दधामि वैष्ण॒वी । र॑क्षो॒हणौ॑ वां वलग॒हनौ॒ पर्यू॑हामि वैष्ण॒वी । वै॑ष्ण॒वम॑सि वै॑ष्ण॒वा स्थ॑ ।
हे वैष्णवों—राक्षसों के संहारक, वलग के विनाशक—मैं तुम्हें प्रोक्षण (छिड़काव) करता हूँ। हे वैष्णवों—राक्षसों के संहारक, वलग के विनाशक—मैं तुम्हें (अपने स्थान पर) अवनय करता हूँ। हे वैष्णवों—राक्षसों के संहारक, वलग के विनाशक—मैं तुम्हें अवस्तृण (बिछाता) हूँ। हे वैष्णवी—तुम दोनों राक्षसों के संहारक, वलग के विनाशक—मैं तुम्हें उपदधामि (स्थापित) करता हूँ। हे वैष्णवी—तुम दोनों राक्षसों के संहारक, वलग के विनाशक—मैं तुम्हें पर्यूहामि (चारों ओर से व्यवस्थित/घेरकर रखता) हूँ। तुम वैष्णव हो; तुम वैष्णव ही रहो।
Mantra 26
दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम् । आ द॑दे॒ नार्य॑सी॒दम॒हᳪ रक्ष॑सां ग्री॒वा अपि॑ कृन्तामि । यवो॑ऽसि य॒वया॒स्मद्द्वेषो॑ य॒वयारा॑तीर्दि॒वे त्वा॒ऽन्तरि॑क्षाय त्वा पृथि॒व्यै त्वा शुन्ध॑न्तांल्लो॒काः पि॑तृ॒षद॑नाः पितृ॒षद॑नमसि
देव सविता की प्रेरणा से, अश्विनों की भुजाओं से और पूषन् के हाथों से मैं तुझे ग्रहण करता हूँ। तू हानि न करे—इसी से मैं राक्षसों की गर्दनें काट देता हूँ। तू यव (जौ) है; हमारे से द्वेष को दूर कर, अराति (दुष्टता/वैर) को दूर कर। द्युलोक के लिए तुझे, अन्तरिक्ष के लिए तुझे, पृथ्वी के लिए तुझे—पितृ-आसन वाले लोक तुझे शुद्ध करें। तू पितृ-आसन है।
Mantra 27
उद्दिव॑ᳪ स्तभाना॒न्तरि॑क्षं पृण॒ दृᳪह॑स्व पृथि॒व्याम् द्यु॑ता॒नास्त्वा॑ मारु॒तो मिनो॑तु मि॒त्रावरु॑णौ ध्रु॒वेण॒ धर्म॑णा । ब्र॒ह्म॒वनि॑ त्वा क्षत्र॒वनि॑ रायस्पोष॒वनि॒ पर्यू॑हामि । ब्रह्म॑ दृᳪह क्ष॒त्रं दृ॒ᳪहायु॑र्दृᳪह प्र॒जां दृ॑ᳪह
द्युलोक को थामते हुए, अन्तरिक्ष को भर; पृथ्वी पर दृढ़ हो। तेजस्वी मरुत तुझे रचे; मित्र और वरुण तुझे ध्रुव धर्म से स्थापित करें। ब्रह्म-प्राप्ति के लिए, क्षत्र-प्राप्ति के लिए, धन और पोषण-प्राप्ति के लिए मैं तुझे चारों ओर से ढेर करता/घेरता हूँ। ब्रह्म को दृढ़ कर, क्षत्र को दृढ़ कर; आयु को दृढ़ कर, प्रजा को दृढ़ कर।
Mantra 28
ध्रु॒वासि॑ ध्रु॒वोऽयं यज॑मानो॒ऽस्मिन्ना॒यत॑ने प्र॒जया॑ प॒शुभि॑र्भूयात् । घृ॒तेन॑ द्यावापृथिवी पूर्येथा॒मिन्द्र॑स्य छ॒दिर॑सि विश्वज॒नस्य॑ छा॒या
तू ध्रुव है; यह यजमान भी ध्रुव है। इस आसन/आयतन में वह प्रजा और पशुओं से समृद्ध हो। घृत से द्यावा‑पृथिवी परिपूर्ण हों। तू इन्द्र का आवरण है, समस्त जनों की छाया है।
Mantra 29
परि॑ त्वा गिर्वणो॒ गिर॑ इ॒मा भ॑वन्तु वि॒श्वत॑:। वृ॒द्धायु॒मनु॒ वृद्ध॑यो॒ जुष्टा॑ भवन्तु॒ जुष्ट॑यः
हे गिर्वण (स्तुतियों से प्रशंसित) देव! ये स्तुतियाँ तुझे चारों ओर, सर्व दिशाओं में, घेरें। दीर्घायु के अनुगमन में वृद्धियाँ/समृद्धियाँ प्रिय हों—प्रिय समृद्धियाँ।
Mantra 30
इन्द्र॑स्य॒ स्यूर॒सीन्द्र॑स्य ध्रु॒वो॑ऽसि । ऐ॒न्द्रम॑सि वैश्वदे॒वम॑सि
तू इन्द्र का स्तम्भ (स्यूर) है; तू इन्द्र का ध्रुव है। तू ऐन्द्र है; तू वैश्वदेव है (समस्त देवों का)।
Mantra 31
वि॒भूर॑सि प्र॒वाह॑णो॒ वह्नि॑रसि हव्य॒वाह॑नः । श्वा॒त्रो॒ऽसि॒ प्रचे॑तास्तु॒थो॑ऽसि वि॒श्ववे॑दाः
तू विभु है; तू प्रवाहण (आगे ले जाने वाला) है। तू वह्नि है; तू हव्यवाहन (हवि को ले जाने वाला) है। तू श्वात्र (शीघ्रगामी) है; तू प्रचेताः (पूर्वज्ञ) है। तू तुथ (प्रज्वालक/प्रेरक) है; तू विश्ववेदाः (सर्वज्ञ) है।
Mantra 32
उ॒शिग॑सि क॒विरङ्घा॑रिरसि॒ बम्भा॑रिरव॒स्यूर॑सि॒ दुव॑स्वाञ्छु॒न्ध्यूर॑सि मार्जा॒लीय॑: स॒म्राड॑सि कृ॒शानु॑: परि॒षद्यो॑ऽसि॒ पव॑मानो॒ नभो॑ऽसि प्र॒तक्वा॑ मृ॒ष्टो॒ऽसि हव्य॒सूद॑न ऋ॒त॒धा॑माऽसि॒ स्व॒र्ज्योतिः
तू उशिग् (दीप्तिमान) है; तू कवि (ऋषि) है। तू अङ्घारि (दहकता अंगारा) है; तू बम्भारि (गर्जनशील) है। तू अवस्यु (सहायता का अन्वेषी/दाता) है; तू दुवस्वान् (उदार, दानशील) है। तू शुन्ध्यु (शोधक, पवित्र करने वाला) है; तू मार्जालीय (मल-मार्जक, स्वच्छ करने वाला) है। तू सम्राट् (सर्वाधिपति) है; तू कृशानु है। तू परिषद्य (परिषद् में आसीन निर्णायक/आकलनकर्ता) है; तू पवमान (पवित्र होकर बहने वाला) है। तू नभः (आकाश) है; तू प्रतक्वा (प्रगल्भ/प्रवहमान) है; तू मृष्ट (परिशुद्ध) है। तू हव्यसूदन (हव्य का वहन/प्रेरक) है; तू ऋतधामा (ऋत में स्थित धाम वाला) है; तू स्वर्ज्योतिः (स्वर्गीय प्रकाश) है।
Mantra 33
स॒मु॒द्रो॒ऽसि वि॒श्वव्य॑चा अ॒जोऽस्येक॑पा॒दहि॑रसि बु॒ध्न्यो वाग॑स्यै॒न्द्रम॑सि॒ सदो॒ऽस्यृत॑स्य द्वारौ॒ मा मा॒ सनता॑प्त॒मध्व॑नामध्वपते॒ प्र मा॑ तिर स्व॒स्ति मे॒ऽस्मिन्प॒थि दे॑व॒याने॑ भूयात्
तू समुद्र है, विश्वव्यचा (सर्वव्यापी) है। तू अज (अजन्मा) है, एकपाद (एक-पाद) है। तू बुध्न्य अहि (गहराई का सर्प) है। तू वाक् का ऐन्द्र (इन्द्र-सम्बन्धी) तेज/बल है; तू सदस् है। तू ऋत के दो द्वार है। हे अध्वपते (मार्गों के स्वामी), प्राचीन पथों पर मुझे न तपाना/न कष्ट देना; मुझे पार करा। इस देवयान (देवों की ओर ले जाने वाले) पथ में मेरा कल्याण हो।
Mantra 34
मि॒त्रस्य॑ मा॒ चक्षु॑षेक्षध्व॒मग्न॑यः सगराः॒ सग॑रा स्थ॒ सग॑रेण॒ नाम्ना॒ रौद्रे॒णानी॑केन पा॒त मा॑ऽग्नयः पिपृ॒त मा॑ऽग्नयो गोपा॒यत॑ मा॒ नमो॑ वोऽस्तु॒ मा मा॑ हिᳪसिष्ट
हे अग्नियों, मित्र के चक्षु से मेरी ओर देखो। तुम सगरा (परिवेष्टन/घेरा) हो; ‘सगरा’ नाम से तुम घिरे हुए हो। हे अग्नियों, रौद्र (रुद्र-सम्बन्धी) भयानक अग्रभाग से मेरी रक्षा करो। हे अग्नियों, मुझे पूर्ण करो; मेरी गोपनीय रक्षा करो। तुम्हें नमस्कार हो; मुझे आहत मत करना।
Mantra 35
ज्योति॑रसि वि॒श्वरू॑पं॒ विश्वे॑षां दे॒वाना॑ᳪ स॒मित् । त्वᳪ सो॑म तनू॒कृद्भ्यो॒ द्वेषो॑भ्यो॒ऽन्यकृ॑तेभ्य उ॒रु य॒न्तासि॒ वरू॑थ॒ᳪ स्वाहा॑ जुषा॒णो अ॒प्तुराज्य॑स्य वेतु॒ स्वाहा॑
तू ज्योति है, विश्वरूप है, समस्त देवों की समिधा है। हे सोम, तू तनु-क्षय करने वालों से, द्वेषों से, और पराये कर्ताओं से (उत्पन्न बाधाओं) के विरुद्ध विस्तृत रक्षक और शरण है। स्वाहा! प्रसन्न होकर स्वीकार करता हुआ, अप्तु के राज्यत्व को प्राप्त करे। स्वाहा!
Mantra 36
अग्ने॒ नय॑ सु॒पथा॑ रा॒ये॒ऽस्मान्विश्वा॑नि देव व॒युना॑नि वि॒द्वान् । यु॒यो॒ध्यस्मज्जु॑हुरा॒णमेनो॒ भूयि॑ष्ठां ते॒ नम॑ उक्तिं विधेम ।
हे अग्ने, तू हमें उत्तम पथ से धन की ओर ले चल; हे देव, तू समस्त विधानों/उपायों को जानने वाला है। जो पाप हमें भटकाता है, उसे हमसे दूर कर; हम वाणी द्वारा तुझे अत्यधिक नमस्कार-उक्ति अर्पित करें।
Mantra 37
अ॒यं नो॑ अ॒ग्निर्वरि॑वस्कृणोत्व॒यं मृध॑ः पु॒र ए॑तु प्रभि॒न्दन् । अ॒यं वाजा॑ञ्जयतु॒ वाज॑साताव॒यᳪ शत्रू॑ञ्जयतु॒ जर्हृ॑षाण॒ः स्वाहा॑ ।
यह हमारा अग्नि हमारे लिए व्यापक अवकाश (वरिवस्) करे; यह आघातों को चीरता हुआ हमारे आगे-आगे चले। यह वाज-साति में वाजों (पुरस्कारों) को जिताए; यह हर्षित होकर शत्रुओं को जीते—स्वाहा।
Mantra 38
उ॒रु वि॑ष्णो॒ वि क्र॑मस्वो॒रु क्षया॑य नस्कृधि । घृ॒तं घृ॑तयोने पिब॒ प्रप्र॑ य॒ज्ञप॑तिं तिर॒ स्वाहा॑ ।
हे विष्णो, व्यापक रूप से विक्रम करो; हमारे लिए निवास हेतु विस्तृत स्थान बना दो। हे घृत-योनि, घृत पियो; यज्ञपति को आगे बढ़ाओ, पार पहुँचाओ—स्वाहा।
Mantra 39
देव॑ सवितरे॒ष ते॒ सोम॒स्तᳪ र॑क्षस्व॒ मा त्वा॑ दभन् । ए॒तत्त्वं दे॑व सोम दे॒वो दे॒वाँ२ उपा॑गा इ॒दम॒हं म॑नु॒ष्या॒न्त्स॒ह रा॒यस्पोषे॑ण स्वाहा॒ । निर्वरु॑णस्य॒ पाशा॑न्मुच्ये ।
हे देव सवितृ, यह सोम तुम्हारा है; तुम इसकी रक्षा करो; कोई तुम्हें आहत न करे। हे देव सोम, यही तुम हो; देव होकर तुम देवों के पास पहुँचे हो। यह मैं मनुष्यों के पास (जाता/जाती) हूँ, धन-वृद्धि और पोषण सहित—स्वाहा। वरुण के पाशों से मैं मुक्त होऊँ।
Mantra 40
अग्ने॑ व्रतपा॒स्त्वे व्र॑त॒पा या तव॑ त॒नूर्मय्यभू॑दे॒षा सा त्वयि॒ यो मम॑ त॒नूस्त्वय्यभू॑दि॒यᳪ सा मयि॑ । य॒था॒य॒थं नौ॑ व्रतपते व्र॒तान्यनु॑ मे दी॒क्षां दी॒क्षाप॑ति॒रम॒ᳪस्तानु॒ तप॒स्तप॑स्पतिः ।
हे अग्नि, व्रतों के पालक—तू ही व्रतों का पालक है। तेरी जो तनु मुझमें प्रविष्ट हुई, वही यहाँ तुझमें है; और मेरी जो तनु तुझमें प्रविष्ट हुई, वही यहाँ मुझमें है। जैसे-जैसे उचित हो, हे व्रतपते, हमारे व्रतों का अनुसरण कर; हे दीक्षापते, मेरी दीक्षा का अनुसरण कर। हे तपस्पते, उन व्रतों के अनुसार तप का तप कर।
Mantra 41
उ॒रु वि॑ष्णो॒ वि क्र॑मस्वो॒रु क्षया॑य नस्कृधि । घृ॒तं घृ॑तयोने पिब॒ प्रप्र॑ य॒ज्ञप॑तिं तिर॒ स्वाहा॑
हे विष्णो, व्यापक होकर पग बढ़ाओ; हमारे लिए निवास हेतु विस्तृत क्षय (आवास) बना। हे घृतयोनि, घृत का पान करो। आगे-आगे, यज्ञपति को पार उतार—स्वाहा।
Mantra 42
अत्य॒न्याँ२ अगां॒ नान्याँ२ उपा॑गाम॒र्वाक् त्वा॒ परे॒भ्योऽवि॑दं प॒रोऽव॑रेभ्यः । तं त्वा॑ जुषामहे देव वनस्पते देवय॒ज्यायै॑ दे॒वास्त्वा॑ देवय॒ज्यायै॑ जुषन्तां॒ विष्ण॑वे त्वा । ओष॑धे॒ त्राय॑स्व स्वधि॑ते॒ मैन॑ᳪ हिᳪसीः
मैं एक (स्थान/वस्तु) से आगे गया, दूसरे की ओर नहीं गया; दूर वालों से भी, और निकट वालों से भी, मैं तुझे यहाँ (अपने सामने) पा गया। हे देव वनस्पते, देवों के यजन (देवयज्या) के लिए हम तुझे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करते हैं; देव भी तुझे देवयज्या के लिए प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करें—विष्णु के लिए हम तुझे (ग्रहण करते हैं)। हे ओषधि, रक्षा कर; हे स्वधिति (कुल्हाड़ी), मुझे हिंसा मत कर।
Mantra 43
द्यां मा ले॑खीर॒न्तरि॑क्षं॒ मा हि॑ᳪसीः पृथि॒व्या सम्भ॑व । अ॒यᳪ हि त्वा॒ स्वधि॑ति॒स्तेति॑जानः प्रणि॒नाय॑ मह॒ते सौ॑भगाय । अत॒स्त्वं दे॑व वनस्पते श॒तव॑ल्शो॒ वि रो॑ह स॒हस्र॑वल्शा॒ वि व॒यᳪ रु॑हेम
आकाश को मत खरोंच; अन्तरिक्ष को मत हिंसा कर; पृथ्वी से उत्पन्न हो। क्योंकि यह स्वधिति (कुल्हाड़ी) तुझे जानकर, महान सौभाग्य के लिए तुझे आगे ले आई है। इसलिए, हे देव वनस्पते, सौ शाखाओं/अंकुरों वाला होकर फिर उग; सहस्र शाखाओं/अंकुरों वाला होकर फिर उग; और हम भी (समृद्धि में) उगें/वृद्धि पाएं।
The three strides function as a ritual technology of measure: they ‘span’ and stabilize heaven, mid-space, and earth so the sacrifice proceeds through its stages in right order (ṛta) without collapse or deviation.
It aligns the sacrificer and priests with vayunā (right ordinance), ensuring that intention, cognition, and procedure cohere—so offerings and chants land correctly in the ritual sequence.
They close vulnerable transitions in the rite by placing guardians in the directions and safely releasing ritual byproducts, preserving purity and continuity as the Prātaḥsavana moves forward.