Adhyaya 51
Anushasana ParvaAdhyaya 5152 Verses

Adhyaya 51

गोमूल्यनिर्णयः — The Determination of Value through the Cow (Nahuṣa–Cyavana Episode)

Upa-parva: Dāna-Dharma and Go-Māhātmya (Gifts, Restitution, and the Cultural Valence of Cows)

Bhīṣma narrates to Yudhiṣṭhira an exemplum about King Nahuṣa’s encounter with the sage Cyavana (Bhṛgu’s son). Nahuṣa approaches with ritual propriety, offers service, and asks what would be pleasing. Cyavana directs him to compensate the exhausted Kaivarta/Niṣāda fishers associated with Cyavana’s situation, effectively framing ‘value’ as restitution owed to affected parties. Nahuṣa proposes escalating payments—thousand, hundred-thousand, a koṭi, even half or all the kingdom—yet Cyavana rejects these as incommensurate, insisting on a ‘sadṛśa’ (appropriate) valuation determined with counsel. A forest-dwelling ascetic, Gavijāta, advises that brāhmaṇas and cows are “anargheya” (beyond ordinary pricing) and proposes the cow as the fitting measure. Nahuṣa offers Cyavana a cow as the ‘price’; Cyavana accepts, declaring no wealth equal to cows, and articulates go-māhātmya: cows as foundations of prosperity, ritual utterances (svāhā/vaṣaṭ), and well-being. The Niṣādas petition for grace; Cyavana accepts the cow and releases them from fault, describing their ascent to heaven along with the fish they had caught—an etiological assertion of merit through contact, speech, and gift. Nahuṣa, satisfied and instructed, returns to righteous stability; the sages depart to their āśramas, closing the episode as a lesson in calibrated giving and ethical repair.

Chapter Arc: पिछले अध्याय के समापन के बाद युधिष्ठिर पितामह भीष्म से एक कठिन जिज्ञासा रखते हैं—वर्णसंकर की स्थिति में धर्म क्या है, और ऐसे लोगों के कर्म-कर्तव्य कैसे निश्चित हों? → भीष्म चातुर्वर्ण्य की उत्पत्ति को यज्ञ-व्यवस्था से जोड़कर बताते हैं कि प्रजापति ने लोक-व्यवस्था के लिए वर्णों के कर्म पहले ही नियत किए; फिर वे परस्पर-विवाह और ‘विगर्हित’ संतान-उत्पत्ति से समाज में मिश्रण, अव्यवस्था और पहचान-संकट का विस्तार करते हैं। → भीष्म वर्णों के धर्म-सीमांकन को कठोर स्वर में प्रतिपादित करते हैं—‘चारों वर्णों के धर्म अलग हैं; अन्य का नहीं’—और मिश्रित/नीच योनियों, निषाद, चाण्डाल, श्वपाक आदि की उत्पत्ति-श्रृंखला का विवरण देकर सामाजिक परिणामों को तीव्रता से सामने रखते हैं। → वह यह भी स्पष्ट करते हैं कि लोक में आचार-वृत्ति और जन्म-वृत्ति का गहरा संयोग देखा जाता है, पर मनुष्य अपने कर्म, शील और आचरण से कुल/पहचान को पुनः प्रकाशमान भी कर सकता है; इसलिए बुद्धिमान को ऐसी योनियों/संगतियों से बचना चाहिए जहाँ आत्म-उत्कर्ष का मार्ग अवरुद्ध हो। → वर्ण, कर्म और आचरण के इस कठोर वर्गीकरण के बाद प्रश्न खुला रह जाता है कि ‘कर्म-प्रधानता’ और ‘जन्म-प्रधानता’ के बीच निर्णायक कसौटी क्या हो—और आगे भीष्म इस तनाव को कैसे सुलझाएँगे।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें विवाहधर्मके अन्तर्गत पैतृक धनका विभागनामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ४७ ॥ अपना बछ। जि: - 'दार' शब्दकी व्युत्पत्ति इस प्रकार है--“आद्रियन्ते त्रिवर्गार्थिभि: इति दारा'। धर्म, अर्थ और कामकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंद्वारा जिनका आदर किया जाता है, वे दारा हैं। जहाँतक भोगविषयक आदर है, वह तो सभी स्त्रियोंके साथ समान है, परंतु व्यावहारिक जगत्‌में जो पतिके द्वारा आदर प्राप्त होता है, वह वर्णक्रमसे यथायोग्य न्यूनाधिक मात्रामें ही उपलब्ध होता है। यही बात उनके पुत्रोंके सम्बन्धमें भी लागू होती है। इसीलिये उनके पुत्रोंको पैतृक धनके विषयमें कम और अधिक भाग ग्रहण करनेका अधिकार है। अष्टचत्वारिशो<5् ध्याय: वर्णसंकर संतानोंकी उत्पत्तिका विस्तारसे वर्णन युधिषछ्िर उवाच अर्थाल्लोभाद्‌ वा कामाद्‌ वा वर्णानां चाप्यनिश्चयात्‌ । अज्ञानाद्‌ वापि वर्णानां जायते वर्णसंकर:,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! धन पाकर या धनके लोभमें आकर अथवा कामनाके वशीभूत होकर जब उच्च वर्णकी स्त्री नीच वर्णके पुरुषके साथ सम्बन्ध स्थापित कर लेती है तब वर्णसंकर संतान उत्पन्न होती है। वर्णोका निश्चय अथवा ज्ञान न होनेसे भी वर्णसंकरकी उत्पत्ति होती है। इस रीतिसे जो वर्णोके मिश्रणद्वारा उत्पन्न हुए मनुष्य हैं, उनका क्या धर्म है? और कौन-कौन-से कर्म हैं? यह मुझे बताइये

Yudhiṣṭhira dit : «Ô Aïeul, que ce soit sous l’attrait de la richesse, par cupidité, par désir, ou par incertitude quant au varṇa—voire par ignorance à ce sujet—il naît une descendance mêlée (varṇasaṅkara). Lorsque, dominée par de tels mobiles, une femme d’un ordre supérieur s’unit à un homme d’un ordre inférieur, une progéniture mixte voit le jour. Dis-moi : quel est le dharma de ceux qui naissent d’un tel mélange des ordres, et quels devoirs et métiers leur sont prescrits ?»

Verse 2

तेषामेतेन विधिना जातानां वर्णसंकरे । को धर्म: कानि कर्माणि तनमे ब्रूहि पितामह,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! धन पाकर या धनके लोभमें आकर अथवा कामनाके वशीभूत होकर जब उच्च वर्णकी स्त्री नीच वर्णके पुरुषके साथ सम्बन्ध स्थापित कर लेती है तब वर्णसंकर संतान उत्पन्न होती है। वर्णोका निश्चय अथवा ज्ञान न होनेसे भी वर्णसंकरकी उत्पत्ति होती है। इस रीतिसे जो वर्णोके मिश्रणद्वारा उत्पन्न हुए मनुष्य हैं, उनका क्या धर्म है? और कौन-कौन-से कर्म हैं? यह मुझे बताइये

Yudhiṣṭhira dit : «Grand-père, pour ceux qui naissent d’un tel mélange des ordres—du varṇasaṅkara—quel est leur dharma propre ? Quels devoirs et quelles occupations leur sont prescrits ? Je t’en prie, dis-le-moi.»

Verse 3

भीष्म उवाच चातुर्वर्ण्यस्य कर्माणि चातुर्वर्ण्य च केवलम्‌ । असृजतू स हि यज्ञार्थे पूर्वमेव प्रजापति:,भीष्मजीने कहा--बेटा! पूर्वकालमें प्रजापतिने यज्ञके लिये केवल चार वर्णों और उनके पृथक्‌-पृथक्‌ कर्मोंकी ही रचना की थी

Bhīṣma dit : «Mon enfant, dans les temps anciens, Prajāpati créa, pour la fin du sacrifice (yajña), uniquement les quatre varṇa et les devoirs distincts propres à ces quatre—rien au-delà.»

Verse 4

भायश्षितस्रो विप्रस्य द्वयोरात्मा प्रजायते | आनुपूर्व्याद्‌ द्वयोहीनौ मातृजात्यौ प्रसूयत:,ब्राह्मणकी जो चार भार्याएँ बतायी गयी हैं, उनमेंसे दो स्त्रियों--ब्राह्मणी और क्षत्रियाके गर्भसे ब्राह्मण ही उत्पन्न होता है और शेष दो वैश्या और शाद्रा स्त्रियोंके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होते हैं, वे ब्राह्मणत्वसे हीन क्रमश: माताकी जातिके समझे जाते हैं

Bhīṣma dit : «On dit qu’un brahmane a quatre épouses. De deux d’entre elles—une femme brahmane et une femme kṣatriya—naît un fils tenu pour brahmane. Mais des deux autres—lorsque les épouses sont vaiśya et śūdra—les fils qui naissent sont réputés inférieurs quant au statut brahmanique et, selon l’ordre établi, on comprend qu’ils suivent la caste de la mère.»

Verse 5

परं शवाद्‌ ब्राह्मणस्यैव पुत्र: शूद्रापुत्रं पारशवं तमाहु: । शुश्रूषक: स्वस्य कुलस्य स स्यात्‌ स्वचारित्रं नित्यमथो न जह्यात्‌,शूद्राके गर्भसे उत्पन्न हुआ ब्राह्मणका ही जो पुत्र है, वह शवसे अर्थात्‌ शूद्रसे पर-- उत्कृष्ट बताया गया है; इसीलिये ऋषिगण उसे पारशव कहते हैं। उसे अपने कुलकी सेवा करनी चाहिये और अपने इस सेवारूप आचारका कभी परित्याग नहीं करना चाहिये

Bhīṣma dit : «Le fils d’un brahmane né d’une femme śūdra est tenu pour supérieur à un “śava” (un śūdra déchu) ; c’est pourquoi les sages l’appellent Pāraśava. Qu’il demeure serviteur et assistant de sa propre lignée, et qu’il n’abandonne jamais cette discipline coutumière du service.»

Verse 6

सर्वानिपायानथ सम्प्रधार्य समुद्धरेत्‌ स्वस्य कुलस्य तन्‍्त्रम्‌ । ज्येष्ठो यवीयानपि यो द्विजस्य शुश्रूषया दानपरायण: स्यात्‌,शूद्रापुत्र सभी उपायोंका विचार करके अपनी कुल-परम्पराका उद्धार करे। वह अवस्थामें ज्येष्ठ होनेपर भी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यकी अपेक्षा छोटा ही समझा जाता है, अतः उसे त्रैवर्णिकोंकी सेवा करते हुए दानपरायण होना चाहिये

Bhīṣma dit : «Après avoir pesé avec soin tous les moyens possibles, il faut soutenir et rétablir l’ordre établi et la continuité de sa propre lignée. Même s’il est plus âgé, celui qui se tient hors des classes des “deux-fois-nés” est tenu pour inférieur à un brāhmane, un kṣatriya ou un vaiśya ; aussi doit-il se vouer au service des trois varṇa supérieurs et demeurer constant dans la générosité.»

Verse 7

तिस्त्र: क्षत्रियसम्बन्धाद्‌ द्वयोरात्मास्य जायते । हीनव्णसस्तृतीयायां शूद्रा उग्रा इति स्मृति:,क्षत्रियकी क्षत्रिया, वैश्या और शूद्रा--ये तीन भार्याएँ होती हैं। इनमेंसे क्षत्रिया और वैश्याके गर्भसे क्षत्रियके सम्पर्कसे जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह क्षत्रिय ही होता है। तीसरी शूद्राके गर्भसे हीन वर्णवाले शूद्र ही उत्पन्न होते हैं; जिनकी उग्र संज्ञा है। ऐसा धर्मशास्त्रका कथन है

Bhīṣma dit : «De l’union d’un kṣatriya avec trois sortes d’épouses, la tradition décrit la descendance. Des deux premières—une épouse kṣatriya et une épouse vaiśya—le fils engendré par le kṣatriya est tenu pour appartenir à l’ordre kṣatriya. Mais de la troisième, une épouse śūdra, la descendance est dite d’un rang inférieur ; la Smṛti les désigne sous le nom d’“Ugra”.»

Verse 8

दे चापि भारये वैश्यस्य द्वयोरात्मास्य जायते । शूद्रा शूद्रस्य चाप्येका शूद्रमेव प्रजायते,वैश्यकी दो भार्याएँ होती हैं--वैश्या और शूद्रा। उन दोनोंके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न होता है, वह वैश्य ही होता है। शूद्रकी एक ही भार्या होती है शूद्रा, जो शूद्रको ही जन्म देती है

Bhīṣma dit : «On dit qu’un vaiśya a deux épouses—l’une de la classe vaiśya et l’autre de la classe śūdra—et de l’une comme de l’autre, l’enfant né est tenu pour vaiśya. Un śūdra, en revanche, n’a qu’une seule épouse, une śūdrā, et elle n’enfante qu’un śūdra.»

Verse 9

अतोड<विशिष्ट स्त्वधमो गुरुदारप्रधर्षक: । बाहां वर्ण जनयति चातुर्वर्ण्यविगर्हितम्‌,अतः वर्णोमें नीचे दर्जेका शूद्र यदि गुरुजनों--ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी स्त्रियोंके साथ समागम करता है तो वह चारों वर्णोद्वारा निन्दित वर्णबहिष्कृत (चाण्डाल आदि) को जन्म देता है

Bhīṣma dit : Si un Śūdra, le plus vil, outrage les épouses des maîtres vénérables—brāhmanes, kṣatriyas et vaiśyas—il engendre une descendance honnie des quatre varṇa, rejetée hors de l’ordre des varṇa (tels les caṇḍāla et autres).

Verse 10

विप्रायां क्षत्रियो बाह्ूं सूतं स्तोमक्रियापरम्‌ । वैश्यो वैदेहक॑ चापि मौद्गल्यमपवर्जितम्‌,क्षत्रिय ब्राह्मणगीके साथ समागम करनेपर उसके गर्भसे 'सूत” जातिका पुत्र उत्पन्न करता है, जो वर्णबहिष्कृत और स्तुति-कर्म करनेवाला (एवं रथीका काम करनेवाला) होता है। उसी प्रकार वैश्य यदि ब्राह्मणीके साथ समागम करे तो वह संस्कारभ्रष्ट 'वैदेहक' जातिवाले पुत्रको उत्पन्न करता है, जिससे अन्तःपुरकी रक्षा आदिका काम लिया जाता है और इसीलिये जिसको “मौद्गल्य' भी कहते हैं

Bhīṣma dit : Lorsqu’un kṣatriya s’unit à une femme brāhmaṇī, il naît un fils nommé Sūta, tenu pour extérieur à l’ordre régulier des varṇa, dont l’occupation coutumière est la récitation d’éloges et les services connexes (tels que la conduite du char). De même, lorsqu’un vaiśya s’unit à une brāhmaṇī, il naît un fils nommé Vaidehaka, réputé déchu des rites prescrits et employé aux tâches des appartements intérieurs et de la garde ; pour cette raison on l’appelle aussi Maudgalya.

Verse 11

शूद्रश्नाण्डालमत्युग्रं वध्यघ्नं बाह्वासिनम्‌ । ब्राह्मण्यां सम्प्रजायन्त इत्येते कुलपांसना: । एते मतिमतां श्रेष्ठ वर्णसंकरजा: प्रभो,इसी तरह शाद्र ब्राह्यणीके साथ समागम करके अत्यन्त भयंकर चाण्डालको जन्म देता है, जो गाँवके बाहर बसता है और वध्यपुरुषोंको प्राणदण्ड आदि देनेका काम करता है। प्रभो! बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिर! ब्राह्मणीके साथ नीच पुरुषोंका संसर्ग होनेपर ये सभी कुलांगार पुत्र उत्पन्न होते हैं और वर्णसंकर कहलाते हैं

Bhīṣma dit : D’une brāhmaṇī, un śūdra engendre un Caṇḍāla d’une férocité extrême : il demeure hors du village et on l’emploie à tuer ou à exécuter ceux qui sont condamnés à mort. Ô seigneur, le meilleur des sages ! De tels enfants, nés de l’union d’un homme vil avec une brāhmaṇī, sont tenus pour la souillure d’une lignée et sont appelés « nés du mélange des varṇa » (varṇa-saṅkara).

Verse 12

बन्दी तु जायते वैश्यान्मागधो वाक्यजीवन: । शूद्रान्निषादो मत्स्यघ्न: क्षत्रियायां व्यतिक्रमात्‌,वैश्यके द्वारा क्षत्रिय जातिकी स्त्रीके गर्भसे उत्पन्न होनेवाला पुत्र वन्दी और मागध कहलाता है। वह लोगोंकी प्रशंसा करके अपनी जीविका चलाता है। इसी प्रकार यदि शूद्र क्षत्रिय जातिकी स्त्रीके साथ प्रतिलेम समागम करता है तो उससे मछली मारनेवाले निषाद जातिकी उत्पत्ति होती है

Bhīṣma dit : D’un homme vaiśya, lorsqu’il y a union transgressive avec une femme kṣatriya, naît un fils appelé Bandī ou Māgadha ; il vit de la parole, en louant et en proclamant les mérites d’autrui. De même, d’un śūdra, par une telle transgression avec une femme kṣatriya, naît le Niṣāda, dont l’occupation est de tuer des poissons.

Verse 13

शूद्रादायोगवश्वापि वैश्यायां ग्राम्यधर्मिण: । ब्राह्मणैरप्रतिग्राह्मुस्तक्षा स्व्धनजीवन:,और शाद्र यदि वैश्य जातिकी स्त्रीके साथ ग्राम्यधर्म (मैथुन) का आश्रय लेता है तो उससे '“आयोगव' जातिका पुत्र उत्पन्न होता है जो बढ़ईका काम करके अपने कमाये हुए धनसे जीवन निर्वाह करता है। ब्राह्मणोंको उससे दान नहीं लेना चाहिये

Bhīṣma dit : Même d’un śūdra qui, poussé par le désir, s’adonne à la conduite sexuelle des villages avec une femme vaiśya, naît un fils appelé Āyogava. Il vit du métier de charpentier, se soutenant par la richesse acquise de ses propres mains ; les brāhmanes ne doivent pas accepter de dons de sa part.

Verse 14

एते5पि सदृशान्‌ वर्णान्‌ जनयन्ति स्वयोनिषु । मातृजात्या: प्रसूयन्ते हवरा हीनयोनिषु,ये वर्णसंकर भी जब अपनी ही जातिकी स्त्रीके साथ समागम करते हैं, तब अपने ही समान वर्णवाले पुत्रोंको जन्म देते हैं और जब अपनेसे हीन जातिकी स्त्रीसे संसर्ग करते हैं, तब नीच संतानोंकी उत्पत्ति होती है। ये संतानें अपनी माताकी जातिकी समझी जाती हैं

Bhīṣma dit : Même ces hommes engendrent une descendance d’un ordre social semblable lorsqu’ils s’unissent au sein de leur propre communauté. Mais lorsqu’ils fréquentent des femmes de naissance inférieure, il naît une progéniture tenue pour inférieure ; et ces enfants sont réputés selon la lignée maternelle.

Verse 15

यथा चतुर्ष वर्णेषु द्वयोरात्मास्य जायते । आनन्तर्यात्‌ प्रजायन्ते तथा बाह्या: प्रधानत:,जैसे चार वर्णोमेंसे अपने और अपनेसे एक वर्ण नीचेकी स्त्रियोंसे जो पुत्र उत्पन्न किया जाता है, वह अपने ही वर्णका माना जाता है और एक वर्णका व्यवधान देकर नीचेके वर्णोकी स्त्रियोंसे उत्पन्न किये जानेवाले पुत्र प्रधान वर्णसे बाह्म--माताकी जातिवाले होते हैं, उसी प्रकार ये नौ--अम्बष्ठ, पारशव, उग्र, सूत, वैदेहक, चाण्डाल, मागध, निषाद और आयोगव--अपनी जातिमें और अपने-से नीचेवाली जातिमें जब संतान उत्पन्न करते हैं, तब वह संतान पिताकी ही जातिवाली होती है और जब एक जातिका अन्तर देकर नीचेकी जातियोंमें संतान उत्पन्न करते हैं, तब वे संतानें पिताकी जातिसे हीन माताओंकी जातिवाली होती हैं

Bhīṣma dit : « De même que, parmi les quatre varṇa, un fils engendré dans son propre varṇa—ou d’une femme du varṇa immédiatement inférieur sans franchir un degré intermédiaire—est compté comme appartenant au varṇa du père, de même, lorsqu’on franchit la limite en sautant un varṇa intermédiaire, la descendance est tenue, pour l’essentiel, pour ‘extérieure’ au varṇa paternel et reçoit le statut inférieur de la mère. Ainsi encore, parmi les neuf communautés mêlées (telles qu’Ambaṣṭha, Pāraśava, Ugra, Sūta, Vaidehaka, Cāṇḍāla, Māgadha, Niṣāda et Āyogava), s’ils engendrent des enfants dans leur propre communauté ou avec la communauté immédiatement inférieure, l’enfant est réputé de la communauté du père ; mais s’ils engendrent en sautant une communauté, les enfants sont traités comme appartenant à la communauté inférieure de la mère. »

Verse 16

ते चापि सदृशं वर्ण जनयन्ति स्वयोनिषु | परस्परस्य दारेषु जनयन्ति विगर्हितान्‌,इस प्रकार वर्णसंकर मनुष्य भी समान जातिकी स्त्रियोंमें अपने ही समान वर्णवाले पुत्रोंकी उत्पत्ति करते हैं और यदि परस्पर विभिन्न जातिकी स्त्रियोंसे उनका संसर्ग होता है तो वे अपनी अपेक्षा भी निन्दनीय संतानोंको ही जन्म देते हैं

Bhīṣma dit : « Ceux qui sont nés d’ordres mêlés engendrent eux aussi une descendance de condition semblable lorsqu’ils s’unissent entre eux. Mais lorsqu’ils ont commerce avec les épouses les uns des autres—des femmes de groupes différents—les enfants qui naissent sont tenus pour plus blâmables encore qu’eux-mêmes. »

Verse 17

यथा शाद्रो5पि ब्राह्मण्यां जन्तुं बाह्ां प्रसूयते । एवं बाह्यृतराद्‌ बाह्दाश्षातुर्वर्ण्यात्‌ प्रजायते,जैसे शूट्र ब्राह्मणीके गर्भसे चाण्डाल नामक बाहा (वर्ण-बहिष्कृत) पुत्र उत्पन्न करता है, उसी प्रकार उस बाह्य जातिका मनुष्य भी ब्राह्मण आदि चारों वर्णोकी एवं बाह्मतर जातिकी स्त्रियोंके साथ संसर्ग करके अपनी अपेक्षा भी नीच जातिवाला पुत्र पैदा करता है

Bhīṣma dit : De même qu’un Śūdra, en s’unissant à une femme brāhmane, engendre un enfant proscrit—exclu de l’ordre des varṇa—appelé Cāṇḍāla, de même celui qui est déjà hors de l’ordre social, en s’unissant à des femmes des quatre varṇa (et à des femmes de groupes plus exclus encore), produit une descendance tenue pour plus basse que lui-même.

Verse 18

प्रतिलोम॑ तु वर्धन्ते बाह्माद्‌ बाह्ुतरात्‌ पुनः । हीनाद्धीना: प्रसूयन्ते वर्णा: पजचदशैव तु

Bhīṣma dit : Dans les unions dites « pratiloma » (à rebours de l’ordre prescrit), la descendance se multiplie en formes de plus en plus mêlées. De ceux qu’on tient pour « inférieurs » naissent des groupes « plus inférieurs » encore ; ainsi parle-t-on, en tout, de quinze catégories sociales mêlées.

Verse 19

इस तरह बाह्य और बाह्मतर जातिकी स्ट्रियोंसे समागम करनेपर प्रतिलोम वर्णसंकरोंकी सृष्टि बढ़ती जाती है। क्रमश: हीन-से-हीन जातिके बालक जन्म लेने लगते हैं। इन संकर जातियोंकी संख्या सामान्यतः: पंद्रह है ।। अगम्यागमनाच्चैव जायते वर्णसंकर: । बाह्यानामनुजायन्ते सैरन्ध्रयां मागधेषु च । प्रसाधनोपचारज्ञमदासं दासजीवनम्‌,अगम्या स्त्रीके साथ समागम करनेपर वर्णसंकर संतानकी उत्पत्ति होती है। मागध जातिकी सैरन्ध्री स्त्रियोंसे यदि बाह्मजातीय पुरुषोंका संसर्ग हो तो उससे जो पुत्र उत्पन्न होता है वह राजा आदि पुरुषोंके शृंगार करने तथा उनके शरीरमें अंगराग लगाने आदिकी सेवाओंका जानकार होता है और दास न होकर भी दासवृत्तिसे जीवन निर्वाह करनेवाला होता है

Bhishma said: From illicit unions—approaching women with whom union is forbidden—there arises the mixing of social orders (varṇa-saṅkara). In particular, when men of the Brahmin order consort with Sairandhrī women among the Māgadhas, the offspring that is born is described as skilled in personal adornment and attendant services (such as applying unguents and arranging ornaments) for kings and other elites, living by a servile mode of livelihood even without being formally a slave. The passage frames such unions as ethically disordered and socially destabilizing, leading to progressively degraded mixed groups.

Verse 20

अतश्नायोगवं सूते वागुराबन्धजीवनम्‌ | मैरेयकं च वैदेह: सम्प्रसूतेडथ माधुकम्‌,मागधोंके आवान्तर भेद सैरन्ध्र जातिकी स्त्रीसे यदि आयोगव जातिका पुरुष समागम करे तो वह आयोगव जातिका पुत्र उत्पन्न करता है, जो जंगलोंमें जाल बिछाकर पशुओंको फँसानेका काम करके जीवन निर्वाह करता है। उसी जातिकी स्त्रीके साथ यदि वैदेह जातिका पुरुष समागम करता है तो वह मदिरा बनानेवाले मैरेयक जातिके पुत्रको जन्म देता है

Bhishma said: From the union that produces an Ataśnāyogava is born one whose livelihood is the setting of snares and nets (vāgurā), living by trapping animals. And from a Vaideha is born the Maireyaka—one associated with the preparation of intoxicating liquor; and thereafter (is mentioned) the Mādhuka as well. In this section Bhishma is describing, in the context of social and ethical order (dharma), traditional classifications of mixed unions and the occupations ascribed to their offspring, presenting them as part of a normative scheme of duties and livelihoods.

Verse 21

निषादके वीर्य और मागधसैरन्ध्रीके गर्भसे मदगुर जातिका पुरुष उत्पन्न होता है, जिसका दूसरा नाम दास भी है। वह नावसे अपनी जीविका चलाता है। चाण्डाल और मागधी सैरन्ध्रीके संयोगसे श्वपाक नामसे प्रसिद्ध अधम चाण्डालकी उत्पत्ति होती है। वह मुर्दोकी रखवालीका काम करता है

Bhishma said: From the seed of a Niṣāda and the womb of a Māgadha woman of the Sairandhrī class is born a man called Madgura, also known as a Dāsa; he earns his livelihood by working with a boat. From the union of a Cāṇḍāla and a Māgadhī woman of the Sairandhrī class arises one famed as Śvapāka, regarded as a degraded Cāṇḍāla; his occupation is guarding the dead. In this passage, Bhishma is describing traditional social classifications by birth and the occupations associated with them, as part of a broader discourse on social order and prescribed duties.

Verse 22

चतुरो मागधी सूते क्रूरान्‌ मायोपजीविन: । मांसं स्वादुकरं क्षौद्रं सौगन्धमिति विश्रुतम्‌

Bhīṣma said: “The Māgadhī woman bore four sons—cruel men who lived by deceit. They became notorious for producing and peddling things famed as ‘tasty meat,’ ‘honey,’ and ‘fragrance’—goods associated with sensual allure and moral corruption.”

Verse 23

इस प्रकार मागध जातिकी सैरन्ध्री स्‍त्री आयोगव आदि चार जातियोंसे समागम करके मायासे जीविका चलानेवाले पूर्वोक्त चार प्रकारके क्रूर पुत्रोंकोी उत्पन्न करती है। इनके सिवा दूसरे भी चार प्रकारके पुत्र मागधी सैरन्ध्रीसे उत्पन्न होते हैं जो उसके सजातीय अर्थात्‌ मागध-सैरन्ध्रसे ही उत्पन्न होते हैं। उनकी मांस, स्वादुकर, क्षौद्र और सौगन्ध--इन चार नामोंसे प्रसिद्धि होती है ।। वैदेहकाच्च पापिष्ठा क्रूर मायोपजीविनम्‌ । निषादान्मद्रनाथं च खरयानप्रयायिनम्‌,आयोगव जातिकी पापिष्ठा स्त्री वैदेह जातिके पुरुषसे समागम करके अत्यन्त क्र्र, मायाजीवी पुत्र उत्पन्न करती है। वही निषादके संयोगसे मद्रनाभ नामक जातिको जन्म देती है, जो गदहेकी सवारी करनेवाली होती है

Bhishma said: From a Vaidehaka man, that most sinful woman of the Āyogava stock gives birth to a son who is exceedingly cruel and lives by deceit. And from union with a Niṣāda she produces another group called Madranābha, people known for travelling by riding donkeys. The passage continues Bhishma’s ethical warning about social disorder and the harsh, deceptive livelihoods that arise from illicit or transgressive unions, presenting them as causes of cruelty and moral decline.

Verse 24

चाण्डालात्‌ पुल्कसं चापि खराश्चगजभोजिनम्‌ | मृतचैलप्रतिच्छन्न॑ भिन्नभाजनभोजिनम्‌

Bhīṣma dit : «Il faut reconnaître comme déchu et impur même un Pulkaśa né d’un Caṇḍāla : celui qui vit de la chair des ânes et des éléphants, se couvre des vêtements des morts et mange dans des récipients brisés.»

Verse 25

वही पापिष्ठा स्त्री जब चाण्डालसे समागम करती है तब पुल्कस जातिको जन्म देती है। पुल्कस गधे, घोड़े और हाथीके मांस खाते हैं। वे मुर्दोपर चढ़े हुए कफन लेकर पहनते और फूटे बर्तनमें भोजन करते हैं ।। आयोगवीषु जायन्ते हीनव्णस्तु ते त्रय: । क्षुद्रो वैदेहकादन्ध्रो बहिग्रामप्रतिश्रय:

Bhīṣma dit : «Des unions tenues pour irrégulières, on dit que naissent trois groupes socialement dégradés. On les décrit comme d’un rang amoindri, vivant aux marges au-delà des limites du village, et associés à des métiers jugés vils ; un exposé inscrit dans le discours du texte sur l’ordre social et les conséquences attribuées à la transgression des normes prescrites.»

Verse 26

चाण्डालात्‌ पाण्डुसौपाकस्त्वक्सारव्यवहारवान्‌,चाण्डाल पुरुष और निषाद जातिकी स्त्रीके संयोगसे पाण्डुसौपाक जातिका जन्म होता है। यह जाति बाँसकी डलिया आदि बनाकर जीविका चलाती है। वैदेह जातिकी सत्रीके साथ निषादका सम्पर्क होनेपर आहिण्डकका जन्म होता है, किंतु वही स्त्री जब चाण्डालके साथ सम्पर्क करती है तब उससे सौपाककी उत्पत्ति होती है। सौपाककी जीविका-वृत्ति चाण्डालके ही तुल्य है

Bhīṣma expose une taxinomie traditionnelle des unions mêlées : «D’un homme Caṇḍāla et d’une femme Niṣāda naît le groupe appelé Pāṇḍu-saupāka, dont la subsistance est décrite comme un travail du bambou—vannerie, paniers et objets semblables. Si une femme Vaideha s’unit à un Niṣāda, on dit qu’il naît un Āhiṇḍaka ; mais si cette même femme s’unit à un Caṇḍāla, on dit qu’il naît un Saupāka. Le moyen de subsistance du Saupāka est déclaré comparable à celui du Caṇḍāla.»

Verse 27

आहिण्डको निषादेन वैदेहाां सम्प्रसूयते । चण्डालेन तु सौपाकश्नण्डालसमतवृत्तिमान्‌,चाण्डाल पुरुष और निषाद जातिकी स्त्रीके संयोगसे पाण्डुसौपाक जातिका जन्म होता है। यह जाति बाँसकी डलिया आदि बनाकर जीविका चलाती है। वैदेह जातिकी सत्रीके साथ निषादका सम्पर्क होनेपर आहिण्डकका जन्म होता है, किंतु वही स्त्री जब चाण्डालके साथ सम्पर्क करती है तब उससे सौपाककी उत्पत्ति होती है। सौपाककी जीविका-वृत्ति चाण्डालके ही तुल्य है

Bhīṣma dit : «De l’union d’un homme Niṣāda avec une femme Vaidehā naît celui qu’on appelle Āhiṇḍaka. Mais de l’union d’un homme Caṇḍāla avec cette même femme Vaidehā naît un Saupāka, dont le mode de subsistance et la condition sociale sont tenus pour comparables à ceux d’un Caṇḍāla.»

Verse 28

निषादी चापि चाण्डालातू पुत्रमन्तेवसायिनम्‌ । श्मशानगोचरं सूते बाहौरपि बहिष्कृतम्‌,निषाद जातिकी स्त्रीमें चाण्डालके वीर्यसे अन्तेवसायीका जन्म होता है। इस जातिके लोग सदा श्मशानमें ही रहते हैं। निषाद आदि बाह्मजातिके लोग भी उसे बहिष्कृत या अछूत समझते हैं

Bhīṣma dit : «Une femme Niṣāda, en s’unissant à un Caṇḍāla, enfante un fils appelé Antevāsayin : celui qui hante les lieux de crémation et que l’on traite en paria, même parmi les communautés Bāhya (extérieures).»

Verse 29

इत्येते संकरे जाता: पितृमातृव्यतिक्रमात्‌ | प्रच्छन्ना वा प्रकाशा वा वेदितव्या: स्वकर्मभि:,इस प्रकार माता-पिताके व्यतिक्रम (वर्णान्तरके संयोग)-से ये वर्णसंकर जातियाँ उत्पन्न होती हैं। इनमेंसे कुछकी जातियाँ तो प्रकट होती हैं और कुछकी गुप्त। इन्हें इनके कर्मोसे ही पहचानना चाहिये

Bhīṣma dit : «Ainsi naissent ces groupes mêlés, issus de la transgression ou du croisement des lignées paternelle et maternelle (c’est-à-dire d’unions franchissant les limites du varṇa). Certaines identités demeurent cachées, d’autres sont connues au grand jour ; qu’on les reconnaisse à leur propre conduite et à leurs actes.»

Verse 30

चतुणमिव वर्णानां धर्मो नान्यस्य विद्यते | वर्णानां धर्महीनेषु संख्या नास्तीह कस्यचित्‌,शास्त्रोंमें चारों वर्णोके धर्मोका निश्चय किया गया है औरोंके नहीं। धर्महीन वर्णसंकर जातियोंमेंसे किसीके वर्णसम्बन्धी भेद और उपभेदोंकी भी यहाँ कोई नियत संख्या नहीं है

Bhīṣma dit : «Dans les śāstra, seul le dharma des quatre varṇa est établi avec certitude, et non celui des autres. Parmi les castes mêlées privées de dharma, il n’existe ici pour personne de nombre fixé de distinctions et de sous-distinctions selon la varṇa.»

Verse 31

यद्च्छयोपसम्पन्नैर्यज्ञसा धुबहिष्कृतै: । बाह्या बाह्ौौश्व जायन्ते यथावृत्ति यथाश्रयम्‌,जो जातिका विचार न करके स्वेच्छानुसार अन्य वर्णकी स्त्रियोंक साथ समागम करते हैं तथा जो यज्ञोंक अधिकार और साधु पुरुषोंसे बहिष्कृत हैं, ऐसे वर्णबाहा मनुष्योंसे ही वर्णसंकर संतानें उत्पन्न होती हैं और वे अपनी रुचिके अनुकूल कार्य करके भिन्न-भिन्न प्रकारकी आजीविका तथा आश्रयको अपनाती हैं

Bhīṣma dit : «De ceux qui, par simple caprice, s’unissent à des femmes d’un autre ordre sans égard pour la naissance ni la convenance — et qui sont exclus des sacrifices et retranchés de la compagnie des vertueux — ne naissent que des gens du dehors, des groupes proscrits. Cette descendance mêlée embrasse ensuite des moyens d’existence variés et cherche appui là où son inclination la mène, agissant selon ses habitudes et ses conditions plutôt que selon le dharma établi.»

Verse 32

चतुष्पथश्मशानानि शैलांश्वान्यान्‌ वनस्पतीन्‌ | कार्ष्णायसमलंकारं परिगृहय॒ च नित्यश:,ऐसे लोग सदा लोहेके आभूषण पहनकर चौराहोंमें, मरघटमें, पहाड़ोंपर और वृक्षोंके नीचे निवास करते हैं

Bhīṣma dit : «Ces gens, portant sans cesse des ornements de fer noir, établissent leur demeure en des lieux de mauvais augure, aux confins : aux carrefours, dans les terrains de crémation, sur les montagnes et sous les arbres.»

Verse 33

वसेयुरेते विज्ञाता वर्तयन्त: स्वकर्मभि: । युञ्जन्तो वाप्यलंकारांसतथोपकरणानि च,इन्हें चाहिये कि गहने तथा अन्य उपकरणोंको बनायें तथा अपने उद्योग-धंधोंसे जीविका चलाते हुए प्रकटरूपसे निवास करें

Bhīṣma dit : «Que ces gens, reconnus et connus pour ce qu’ils sont, vivent au grand jour. Qu’ils se soutiennent par leurs propres métiers, s’appliquant aussi à fabriquer des ornements et d’autres outils.»

Verse 34

गोब्राह्मणाय साहाय्य॑ कुर्वाणा वै न संशय: । आनुृशंस्यमनुक्रोश: सत्यवाक्यं तथा क्षमा,पुरुषसिंह! यदि ये गौ और ब्राह्मणोंकी सहायता करें, क्रूरतापूर्ण कर्मको त्याग दें, सबपर दया करें, सत्य बोलें, दूसरोंके अपराध क्षमा करें और अपने शरीरको कष्टमें डालकर भी दूसरोंकी रक्षा करें तो इन वर्णसंकर मनुष्योंकी भी पारमार्थिक उन्नति हो सकती है-- इसमें संशय नहीं है

Bhīṣma dit : Il n’y a aucun doute que même ceux d’origine sociale mêlée peuvent atteindre un véritable relèvement spirituel s’ils portent secours aux vaches et aux brāhmaṇa, renoncent aux actes cruels, témoignent de la compassion envers tous, disent la vérité et pratiquent le pardon. Ô lion parmi les hommes, une telle conduite—fondée sur la miséricorde, la vérité et la patience—ouvre la voie à un bien supérieur.

Verse 35

स्वशरीरैरपि त्राणं बाह्यानां सिद्धिकारणम्‌ । भवन्ति मनुजव्याघ्र तत्र मे नास्ति संशय:,पुरुषसिंह! यदि ये गौ और ब्राह्मणोंकी सहायता करें, क्रूरतापूर्ण कर्मको त्याग दें, सबपर दया करें, सत्य बोलें, दूसरोंके अपराध क्षमा करें और अपने शरीरको कष्टमें डालकर भी दूसरोंकी रक्षा करें तो इन वर्णसंकर मनुष्योंकी भी पारमार्थिक उन्नति हो सकती है-- इसमें संशय नहीं है

Bhīṣma dit : Même au prix de son propre corps, protéger autrui devient une cause d’accomplissement spirituel. Ô tigre parmi les hommes, je n’en ai aucun doute.

Verse 36

यथोपदेशं परिकीर्तितासु नर: प्रजायेत विचार्य बुद्धिमान । निहीनयोनिर्हि सुतो&5वसादयेत्‌ तितीर्षमाणं हि यथोपलो जले,राजन्‌! जैसा ऋषि-मुनियोंने उपदेश किया है, उसके अनुसार बतायी हुई वर्ण एवं बाह्मजातिकी स्त्रियोंमें बुद्धिमान मनुष्यको अपने हिताहितका भलीभाँति विचार करके ही संतान उत्पन्न करनी चाहिये; क्योंकि नीच योनिमें उत्पन्न हुआ पुत्र भवसागरसे पार जानेकी इच्छावाले पिताको उसी प्रकार डुबोता है, जैसे गलेमें बँधा हुआ पत्थर तैरनेवाले मनुष्यको पानीके अतलगर्तमें निमग्न कर देता है

Bhīṣma dit : Ô roi, un homme avisé ne devrait engendrer une descendance qu’après mûre réflexion, selon l’enseignement des sages, et avec des femmes des classes indiquées. Car un fils né d’un sein inférieur entraîne son père vers le bas—comme une pierre dans l’eau fait couler celui qui cherche à traverser.

Verse 37

अविद्वांसमलं लोके विद्वांसमपि वा पुनः । नयन्ति हापथं नार्य: कामक्रोधवशानुगम्‌,संसारमें कोई मूर्ख हो या विद्वान, काम और क्रोधके वशीभूत हुए मनुष्यको नारियाँ अवश्य ही कुमार्गपर पहुँचा देती हैं

Bhīṣma dit : Qu’un homme en ce monde soit ignorant ou savant, les femmes peuvent en vérité le conduire sur une mauvaise voie—s’il se laisse gouverner par le désir et la colère.

Verse 38

स्वभावश्चैव नारीणां नराणामिह दूषणम्‌ | अत्यर्थ न प्रसज्जन्ते प्रमदासु विपक्चित:,इस जगतमें मनुष्योंको कलंकित कर देना नारियोंका स्वभाव है; अतः विवेकी पुरुष युवती स्त्रियोंमें अधिक आसक्त नहीं होते हैं

Bhīṣma dit : Dans ce monde, la tendance naturelle des femmes est de devenir une cause par laquelle les hommes tombent dans le déshonneur. C’est pourquoi les hommes avisés ne s’attachent pas avec excès aux jeunes femmes.

Verse 39

युधिछिर उवाच वण्णपितमविज्ञाय नरं कलुषयोनिजम्‌ । आर्यरूपमिवानार्य कथं विद्यामहे वयम्‌,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! जो चारों वर्णोंसे बहिष्कृत, वर्णसंकर मनुष्यसे उत्पन्न और अनार्य होकर भी ऊपरसे देखनेमें आर्य-सा प्रतीत हो रहा हो उसे हमलोग कैसे पहचान सकते हैं?

Yudhiṣṭhira dit : «Ô Pitāmaha ! Un homme rejeté des quatre varṇa, né d’une lignée souillée, non-aryen, et pourtant semblable en apparence à un Arya—comment pourrions-nous le reconnaître ?»

Verse 40

भीष्म उवाच योनिसंकलुषे जातं नानाभावसमन्वितम्‌ । कर्मभि: सज्जनाचीर्ण॑विज्ञेया योनिशुद्धता,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! जो कलुषित योनिमें उत्पन्न हुआ है, वह ऐसी नाना प्रकारकी चेष्टाओंसे युक्त होता है, जो सत्पुरुषोंके आचारसे विपरीत हैं; अतः उसके कर्मोंसे ही उसकी पहचान होती है। इसी प्रकार सज्जनोचित आचरणोंसे योनिकी शुद्धताका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये

Bhīṣma dit : «Yudhiṣṭhira, celui qui naît d’une lignée souillée se signale par maintes dispositions et conduites contraires aux usages des vertueux ; on le reconnaît donc à ses actes. De même, la pureté d’une lignée se comprend par des actions conformes à la mesure des gens de bien.»

Verse 41

अनार्यत्वमनाचार: क्र्रत्वं निष्क्रियात्मता । पुरुषं व्यज्जयन्तीह लोके कलुषयोनिजम्‌,इस जगत्‌में अनार्यता, अनाचार, क्रूरता और अकर्मण्यता आदि दोष मनुष्यको कलुषित योनिसे उत्पन्न (वर्णसंकर) सिद्ध करते हैं

Bhīṣma dit : «En ce monde, des défauts tels que la grossièreté et l’indignité, l’absence de juste conduite, la cruauté et l’esprit inerte et paresseux dévoilent l’homme issu d’une lignée souillée.»

Verse 42

पित्रयं वा भजते शीलं मातृजं वा तथोभयम्‌ । न कथंचन संकीर्ण: प्रकृतिं स्वां नियच्छति,वर्णसंकर पुरुष अपने पिता या माताके अथवा दोनोंके ही स्वभावका अनुसरण करता है। वह किसी तरह अपनी प्रकृतिको छिपा नहीं सकता

Bhīṣma dit : «Un homme suit le tempérament reçu de son père, ou celui reçu de sa mère, ou le mélange des deux. Si mêlée que soit sa naissance, il ne peut en aucune façon retenir ni dissimuler sa nature propre.»

Verse 43

यथैव सदृशो रूपे मातापित्रोहि जायते । व्याप्रश्नित्रैस्तथा योनिं पुरुष: स्वां नियच्छति,जैसे बाघ अपनी चित्र-विचित्र खाल और रूपके द्वारा माता-पिताके समान ही होता है, उसी प्रकार मनुष्य भी अपनी योनिका ही अनुसरण करता है

Bhīṣma dit : «De même qu’une créature naît en forme semblable à sa mère et à son père—tel le tigre, reconnaissable à sa peau tachetée—ainsi l’homme suit-il la trace de sa propre origine.»

Verse 44

कुले स्रोतसि संच्छन्ने यस्य स्थाद्‌ योनिसंकर: । संश्रयत्येव तच्छीलं नरोडल्पमथवा बहु,यद्यपि कुल और वीर्य गुप्त रहते हैं अर्थात्‌ कौन किस कुलमें और किसके वीर्यसे उत्पन्न हुआ है, यह बात ऊपरसे प्रकट नहीं होती है तो भी जिसका जन्म संकर-योनिसे हुआ है, वह मनुष्य थोड़ा-बहुत अपने पिताके स्वभावका आश्रय लेता ही है

Bhīṣma dit : Même lorsque la lignée d’une famille est obscurcie—si bien qu’au dehors on ne sait pas qui relève de quel lignage ni de quelle semence l’on est né—, celui qui naît d’une union mêlée ou confuse (saṅkara-yoni) prend inévitablement la disposition de son père, peu ou prou. L’enseignement est que des origines cachées n’effacent pas les tendances héritées ; il faut donc veiller à la conduite, aux règles du mariage et à la sauvegarde de la lignée comme du caractère.

Verse 45

आर्यरूपसमाचारं चरन्तं कृतके पथि । सुवर्णमन्यवर्ण वा स्वशीलं शास्ति निश्चये,जो कृत्रिम मार्गका आश्रय लेकर श्रेष्ठ पुरुषोंक अनुरूप आचरण करता है, वह सोना है या काँच--शुद्ध वर्णका है या संकर वर्णका? इसका निश्चय करते समय उसका स्वभाव ही सब कुछ बता देता है

Bhīṣma dit : Lorsqu’un homme emprunte une voie artificielle et imite la conduite et la tenue des nobles, on peut se demander s’il est de l’or véritable ou du verre—de lignée pure ou mêlée. Mais pour trancher ce doute, c’est son propre caractère—sa disposition profonde et la constance de ses actes—qui finit par révéler la vérité.

Verse 46

नानावृत्तेषु भूतेषु नानाकर्मरतेषु च । जन्मवृत्तसमं लोके सुश्लिष्टं न विरज्यते,संसारके प्राणी नाना प्रकारके आचार-व्यवहारमें लगे हुए हैं, भाँति-भाँतिके कर्मामें तत्पर हैं; अतः आचरणके सिवा ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो जन्मके रहस्यको साफ तौरपर प्रकट कर सके

Bhīṣma dit : Les êtres du monde suivent des manières d’être diverses et s’appliquent à des actes variés ; aussi rien ne révèle aussi nettement le secret de la naissance que la conduite et les habitudes d’un homme.

Verse 47

शरीरमिह सत्त्वेन न तस्य परिकृष्यते । ज्येष्ठमध्यावरं सत्त्वं तुल्यसत्त्वं प्रमोदते,वर्णसंकरको शास्त्रीय बुद्धि प्राप्त हो जाय तो भी वह उसके शरीरको स्वभावसे नहीं हटा सकती। उत्तम, मध्यम या निकृष्ट जिस प्रकारके स्वभावसे उसके शरीरका निर्माण हुआ है, वैसा ही स्वभाव उसे आनन्ददायक जान पड़ता है

Bhīṣma dit : En ce monde, le corps d’un homme n’est pas arraché à sa disposition native par le seul fait d’adopter une vue plus raffinée ou « savante ». Que sa nature soit supérieure, moyenne ou inférieure—quel que soit le tempérament qui a façonné le corps et la personne—c’est cette même disposition qu’il trouve agréable et dont il se réjouit, prenant plaisir à ce qui lui ressemble.

Verse 48

ज्यायांसमपि शीलेन विहीनं नैव पूजयेत्‌ । अपि शूद्रं च धर्मज्ञं सदवृत्तमभिपूजयेत्‌,ऊँची जातिका मनुष्य भी यदि उत्तम शील अर्थात्‌ आचरणसे हीन हो तो उसका सत्कार न करे और शूद्र भी यदि धर्मज्ञ एवं सदाचारी हो तो उसका विशेष आदर करना चाहिये इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विवाहधर्मे वर्णसंकरक थने अष्टचत्वारिंशो5ध्याय:

Bhīṣma dit : On ne doit pas honorer même un homme de rang supérieur s’il est dépourvu de bonne conduite. Mais même un Śūdra, s’il connaît le dharma et vit selon une conduite droite, doit être honoré d’un respect particulier. L’enseignement place le caractère moral et la connaissance du dharma au-dessus du rang fondé sur la naissance pour décider qui mérite la vénération.

Verse 49

आत्मानमाख्याति हि कर्मभिर्नर: सुशीलचारित्रकुलै: शुभाशुभै: । प्रणष्टमप्याशु कुलं तथा नर: पुन: प्रकाशं कुरुते स्वकर्मत:,मनुष्य अपने शुभाशुभ कर्म, शील, आचरण और कुलके द्वारा अपना परिचय देता है। यदि उसका कुल नष्ट हो गया हो तो भी वह अपने कर्मोद्वारा उसे फिर शीघ्र ही प्रकाशमें ला देता है

Bhīṣma dit : On reconnaît véritablement un homme à ses actes—bons ou mauvais—ainsi qu’à la finesse de son caractère, de sa conduite et de son lignage. Quand bien même sa lignée serait tombée dans l’oubli ou la ruine, un homme peut promptement la ramener à l’honneur et à l’estime publique par la force de ses propres actions.

Verse 50

योनिष्वेतासु सर्वासु संकीर्णास्वितरासु च । यत्रात्मानं न जनयेद्‌ बुधस्तां परिवर्जयेत्‌,इन सभी ऊपर बतायी हुई नीच योनियोंमें तथा अन्य नीच जातियोंमें भी विद्धान्‌ पुरुषको संतानोत्पत्ति नहीं करनी चाहिये। उनका सर्वथा परित्याग करना ही उचित है

Bhīṣma dit : « Parmi tous ces ventres (naissances) décrits, et parmi d’autres naissances mêlées ou tenues pour dégradées, le sage ne doit pas engendrer là où il ne souhaiterait pas se reproduire lui-même. De telles unions doivent être entièrement évitées. »

Verse 231

निषादो मदगुरं सूते दासं नावोपजीविनम्‌ | मृतपं चापि चाण्डाल: श्वपाकमिति विश्रुतम्‌

Bhīṣma dit : « Un Niṣāda engendre celui qu’on nomme Madagura ; de lui naît un Dāsa qui vit des bateaux. De cette lignée surgit celui qu’on appelle Mṛtapa, et de lui le Cāṇḍāla, également renommé “Śvapāka” (cuisinier de chiens). »

Verse 253

कारावरो निषाद्यां तु चर्मकार: प्रसूयते । इस प्रकार ये तीन नीच जातिके मनुष्य आयोगवीकी संतानें हैं। निघाद जातिकी स्त्रीका यदि वैदेहक जातिके पुरुषसे संसर्ग हो तो क्षुद्र, अन्ध्र और कारावर नामक जातिवाले पुत्रोंकी उत्पत्ति होती है। इनमेंसे क्षुद्र और अन्ध्र तो गाँवसे बाहर रहते हैं और जंगली पशुओंकी हिंसा करके जीविका चलाते हैं तथा कारावर मृत पशुओंके चमड़ेका कारबार करता है। इसलिये चर्मकार या चमार कहलाता है

Bhīṣma dit : D’une Niṣādī (femme de la communauté Niṣāda) naît un Kārāvara ; et il en résulte aussi un Carmakāra (travailleur du cuir). Dans ce passage, Bhīṣma décrit des classifications traditionnelles de varṇa–jāti selon la naissance et l’occupation, en disant que certaines unions mêlées sont réputées engendrer des communautés vivant hors du village et subsistant par la chasse ou par le travail des peaux d’animaux morts — d’où l’appellation « Carmakāra », ouvrier du cuir.

Frequently Asked Questions

How to determine a ‘fitting’ compensation when ordinary metrics (money, territory) fail—especially when the situation involves r̥ṣi authority, social stakeholders (fishers), and the king’s fear of ethical fault.

Ethical action is calibrated, not merely maximal: dharma requires context-sensitive valuation (sadṛśa), restitution to impacted groups, and recognition of culturally sanctioned forms of merit such as go-dāna.

A functional phala motif appears when Cyavana’s acceptance and blessing results in the Niṣādas (and the fish) attaining heaven, implying salvific efficacy through respectful approach, truthful speech, and properly constituted giving.