Adhyaya 51
Sabha ParvaAdhyaya 5138 Verses

Adhyaya 51

Dyūta-āhvāna: Śakuni’s Proposal, Vidura’s Warning, and the Summons of Yudhiṣṭhira (Sabhā-parva 51)

Upa-parva: Dyūta-āhvāna (Summons to the Dice-Assembly) Episode

Chapter 51 presents a tightly sequenced court dialogue that operationalizes the dice-game plan. Śakuni declares his intent to remove Yudhiṣṭhira’s prosperity through gambling, portraying dice-play as a domain of assured expertise. Duryodhana endorses the proposal and urges Dhṛtarāṣṭra to consent, while simultaneously discrediting Vidura’s likely counsel as partial to the Pāṇḍavas. Dhṛtarāṣṭra expresses initial reluctance and acknowledges the risk of enmity, yet frames the unfolding as constrained by daiva (destiny). Vaiśaṃpāyana then narrates the king’s practical orders: an opulent assembly hall is prepared with artisans and materials, emphasizing the institutional staging of the event. Dhṛtarāṣṭra instructs Vidura to bring Yudhiṣṭhira with his brothers, presenting the gathering as “friendly” play. Vidura explicitly refuses to approve, warning of kula-nāśa (dynastic collapse) and inevitable conflict; Dhṛtarāṣṭra responds that the world acts under the disposer’s ordinance. The chapter ends with the direct command to Vidura to summon Yudhiṣṭhira, marking the procedural point-of-no-return.

Chapter Arc: दुर्योधन धृतराष्ट्र के सम्मुख पाण्डवों के वैभव का वृत्तान्त छेड़ता है—युधिष्ठिर को भेंट में मिली अपार वस्तुओं को याद कर उसका मन जल उठता है। → वह एक-एक कर दूर-दूर देशों से आए राजाओं, म्लेच्छाधिपतियों और जनपदों की भेंटों का वर्णन करता है—उत्तम ऊन, सुवर्ण-परिष्कृत वस्त्र, तीव्रगामी आजानेय अश्व, विविध रत्न, रस-गन्ध, और असंख्य दासियाँ; यह सूची जितनी बढ़ती है, उतनी ही उसकी हीनता और ईर्ष्या तीखी होती जाती है। → दुर्योधन स्वीकार करता है कि शत्रुओं का वह वैभव देखकर उसका मन ‘मूढ़-सा’ हो गया—समृद्धि का दृश्य उसके भीतर विवेक नहीं, दाह जगाता है; युधिष्ठिर के द्वार पर ‘बलि’ लेकर खड़े राजाओं की भीड़ उसके अहंकार को चीर देती है। → वर्णन का प्रवाह एक निष्कर्ष में ढलता है—पाण्डवों की प्रतिष्ठा और युधिष्ठिर के यज्ञ/सभा-वैभव की सार्वभौमिक स्वीकृति; दुर्योधन के भीतर संताप स्थिर हो जाता है, और वह इसे पिता के सामने शब्द देता है। → यह संताप आगे चलकर किस उपाय में बदलेगा—केवल जलन रहेगा या द्यूत-छल की योजना बनेगा—यह प्रश्न अध्याय के अंत में हवा में टँगा रह जाता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपनआ कराता बछ। 2 एकपज्चाशत्तमो< ध्याय: युधिष्ठिरको भेंटमें मिली हुई वस्तुओंका दुर्योधनद्वारा वर्णन दुर्योधन उवाच यन्मया पाण्डवेयानां दृष्टं तच्छूणु भारत | आह्तं भूमिपालैर्हि वसु मुख्यं ततस्ततः,दुर्योधन बोला--भारत! मैंने पाण्डवोंके यज्ञमें राजाओंके द्वारा भिन्न-भिन्न देशोंसे लाये हुए जो उत्तम धनरत्न देखे थे, उन्हें बताता हूँ, सुनिये

Duryodhana said: “O Bhārata, listen to what I saw among the sons of Pāṇḍu. From many lands, kings brought and presented the finest treasures—choice wealth gathered from place after place.”

Verse 2

नाविदं मूढमात्मानं दृष्टवाहं तदरेर्धनम्‌ । फलतो भूमितो वापि प्रतिपद्यस्व भारत,भरतकुलभूषण! आप सच मानिये, शत्रुओंका वह वैभव देखकर मेरा मन मूढ़-सा हो गया था। मैं इस बातको न जान सका कि यह धन कितना है और किस देशसे लाया गया है

Duryodhana said: “When I saw that wealth belonging to the enemy, my mind became bewildered. I could not ascertain it—whether by its fruits (its yield) or by the land (from which it came)—its true measure or source. O Bhārata, ornament of the Bharata line, understand this.”

Verse 3

ऑऔर्णान्‌ बैलान्‌ वार्षदंशान्‌ जातरूपपरिष्कृतान्‌ । प्रावाराजिनमुख्यांश्व॒ काम्बोज: प्रददौ बहून्‌,काम्बोजनरेशने भेड़के ऊन, बिलमें रहनेवाले चूहे आदिके रोएँ तथा बिल्लियोंकी रोमावलियोंसे तैयार किये हुए सुवर्णचित्रित बहुत-से सुन्दर वस्त्र और मृगचर्म भेंटमें दिये थे। तीतर पक्षीकी भाँति चितकबरे और तोतेके समान नाकवाले तीन सौ घोड़े दिये थे। इसके सिवा तीन-तीन सौ ऊँटनियाँ और खच्चरियाँ भी दी थीं, जो पीलु, शमी और इंगुद खाकर मोटी-ताजी हुई थीं

Duryodhana said: “The king of Kāmboja presented many fine garments—woollen and other costly textiles—adorned and finished with gold. These were among the foremost coverings and robes offered as tribute.”

Verse 4

अश्वांस्तित्तिरिकल्माषांस्त्रिशतं शुकनासिकान्‌ | उष्ट्रवामीस्त्रिशतं च पुष्टा: पीलुशमीज्रुदै:,काम्बोजनरेशने भेड़के ऊन, बिलमें रहनेवाले चूहे आदिके रोएँ तथा बिल्लियोंकी रोमावलियोंसे तैयार किये हुए सुवर्णचित्रित बहुत-से सुन्दर वस्त्र और मृगचर्म भेंटमें दिये थे। तीतर पक्षीकी भाँति चितकबरे और तोतेके समान नाकवाले तीन सौ घोड़े दिये थे। इसके सिवा तीन-तीन सौ ऊँटनियाँ और खच्चरियाँ भी दी थीं, जो पीलु, शमी और इंगुद खाकर मोटी-ताजी हुई थीं

Duryodhana said: “They presented three hundred horses, speckled like partridges and with noses like parrots’ beaks. In addition, they gave three hundred she-camels and three hundred mules, well-fed and robust from grazing on pīlu, śamī, and iṅguda.”

Verse 5

गोवासना ब्राह्मणाश्न दासनीयाश्ष सर्वश: । प्रीत्यर्थ ते महाराज धर्मराज्ञों महात्मन:,महाराज! ब्राह्मणलोग तथा गाय-बैलोंका पोषण करनेवाले वैश्य और दास-कर्मके योग्य शूद्र आदि सभी महात्मा धर्मराजकी प्रसन्नताके लिये तीन खर्बके लागतकी भेंट लेकर दरवाजेपर रोके हुए खड़े थे। ब्राह्मणलोग तथा हरी-भरी खेती उपजाकर जीवन-निर्वाह करनेवाले और बहुत-से गाय-बैल रखनेवाले वैश्य सैकड़ों दलोंमें इकट्ठे होकर सोनेके बने हुए सुन्दर कलश एवं अन्य भेंट-सामग्री लेकर द्वारपर खड़े थे। परंतु भीतर प्रवेश नहीं कर पाते थे

Duryodhana said: “O great king, Brahmins, Vaiśyas who live by cattle-keeping, and all those fit for service (Śūdras and others) were standing at the gate with offerings, seeking to please the noble Dharmarāja. They had gathered in great companies, bearing beautiful golden vessels and other gifts, yet they could not gain entry within.”

Verse 6

त्रिखर्व बलिमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिता: । ब्रह्मणा वाटधानाश्न गोमन्त: शतसड्घश:,महाराज! ब्राह्मणलोग तथा गाय-बैलोंका पोषण करनेवाले वैश्य और दास-कर्मके योग्य शूद्र आदि सभी महात्मा धर्मराजकी प्रसन्नताके लिये तीन खर्बके लागतकी भेंट लेकर दरवाजेपर रोके हुए खड़े थे। ब्राह्मणलोग तथा हरी-भरी खेती उपजाकर जीवन-निर्वाह करनेवाले और बहुत-से गाय-बैल रखनेवाले वैश्य सैकड़ों दलोंमें इकट्ठे होकर सोनेके बने हुए सुन्दर कलश एवं अन्य भेंट-सामग्री लेकर द्वारपर खड़े थे। परंतु भीतर प्रवेश नहीं कर पाते थे

Duryodhana said: “Bearing tribute worth three kharvas, they stand at the very gate, held back and not allowed to enter. Brahmins and prosperous householders—those with well-tended fields and abundant cattle—have gathered in hundreds of companies, bringing golden jars and other offerings, yet they remain outside the door, unable to gain admission.”

Verse 7

कमण्डलूनुपादाय जातरूपमयाउ्छुभान्‌ । एवं बलि समादाय प्रवेशं लेभिरे न च,महाराज! ब्राह्मणलोग तथा गाय-बैलोंका पोषण करनेवाले वैश्य और दास-कर्मके योग्य शूद्र आदि सभी महात्मा धर्मराजकी प्रसन्नताके लिये तीन खर्बके लागतकी भेंट लेकर दरवाजेपर रोके हुए खड़े थे। ब्राह्मणलोग तथा हरी-भरी खेती उपजाकर जीवन-निर्वाह करनेवाले और बहुत-से गाय-बैल रखनेवाले वैश्य सैकड़ों दलोंमें इकट्ठे होकर सोनेके बने हुए सुन्दर कलश एवं अन्य भेंट-सामग्री लेकर द्वारपर खड़े थे। परंतु भीतर प्रवेश नहीं कर पाते थे

Duryodhana said: “Taking up auspicious water-pots made of gold, and bearing such offerings, they still did not obtain entry, O King. At the very door stood Brahmins, and also Vaiśyas who sustain themselves by flourishing agriculture and by tending many cows and bulls, along with Śūdras fit for service—noble-minded people all—bringing costly gifts to please Dharmarāja; yet they were unable to go inside.”

Verse 8

(यश्व स द्विजमुख्येन राज्ञ: शड्खो निवेदित: । प्रीत्या दत्त: कुणिन्देन धर्मराजाय धीमते ।। द्विजोंमें प्रधान राजा कुणिन्दने परम बुद्धिमान्‌ धर्मराज युधिष्ठिरको बड़े प्रेमसे एक शंख निवेदन किया। त॑ सर्वे भ्रातरो भ्रात्रे ददु: शड्खं किरीटिने । त॑ प्रत्यगृह्नाद्‌ बीभत्सुस्तोयजं हेममालिनम्‌ ।। चितं निष्कसहस्रेण भ्राजमानं स्वतेजसा । उस शंखको सब भाइयोंने मिलकर किरीटधारी अर्जुनको दे दिया। उसमें सोनेका हार जड़ा हुआ था और एक हजार स्वर्णमुद्राएँ मढ़ी गयी थीं। अर्जुनने उसे सादर ग्रहण किया। वह शंख अपने तेजसे प्रकाशित हो रहा था। रुचिरं दर्शनीयं च भूषितं विश्वकर्मणा ।। अधारयच्च धर्मश्न त॑ं नमस्य पुनः पुनः । साक्षात्‌ विश्वकर्माने उसे रत्नोंद्वारा विभूषित किया था। वह बहुत ही सुन्दर और दर्शनीय था। साक्षात्‌ धर्मने उस शंखको बार-बार नमस्कार करके धारण किया था। यो अन्नदाने नदति स ननादाधिकं तदा ।। प्रणादाद्‌ भूमिपास्तस्य पेतुर्हीना: स्वतेजसा ।। अन्नदान करनेपर वह शंख अपने-आप बज उठता था। उस समय उस शंखने बड़े जोरसे अपनी ध्वनिका विस्तार किया। उसके गम्भीर नादसे समस्त भूमिपाल तेजोहीन होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। धृष्टद्युम्न: पाण्डवाश्व॒ सात्यकि: केशवोडष्टम: । सत्त्वस्था: शौर्यसम्पन्ना अन्योन्यप्रियकारिण: ।। केवल धृष्टद्युम्न, पाँच पाण्डव, सात्यकि तथा आठवें श्रीकृष्ण धैर्यपूर्वक खड़े रहे। ये सब-के-सब एक-दूसरेका प्रिय करनेवाले तथा शौर्यसे सम्पन्न हैं। विसंज्ञान्‌ भूमिपान्‌ दृष्टवा मां च ते प्राहसंस्तदा ।। ततः प्रह्ृष्टो बीभत्सुरददाद्धेमशृद्धिण: । शतान्यनडुहां पञज्च द्विजमुख्याय भारत ।। इन्होंने मुझको तथा दूसरे भूमिपालोंको मूर्च्छित हुआ देख जोर-जोरसे हँसना आरम्भ किया। उस समय अर्जुनने अत्यन्त प्रसन्न होकर एक श्रेष्ठ ब्राह्मणको पाँच सौ हृष्ट-पुष्ट बैल दिये। वे बैल गाड़ीका बोझ ढोनेमें समर्थ थे और उनके सींगोंमें सोना मढ़ा गया था। सुमुखेन बलिम्ुख्य: प्रेषितो5जातशत्रवे । कुणिन्देन हिरण्यं च वासांसि विविधानि च ।। भारत! राजा सुमुखने अजातशत्रु युधिष्ठिरके पास भेंटकी प्रमुख वस्तुएँ भेजी थीं। कुणिन्दने भाँति-भाँतिके वस्त्र और सुवर्ण दिये थे। काश्मीरराजो मार्द्वीक॑ शुद्धं च रसवन्मधु । बलिं च कृत्स्नमादाय पाण्डवायाभ्युपाहरत्‌ ।। काश्मीरनरेशने मीठे तथा रसीले शुद्ध अंगूरोंके गुच्छे भेंट किये थे। साथ ही सब प्रकारकी उपहार-सामग्री लेकर उन्होंने पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी सेवामें उपस्थित की थी। यवना हयानुपादाय पर्वतीयान्‌ मनोजवान्‌ | आसनानि महाहणि कम्बलांश्व महाधनान्‌ ।। नवान्‌ विचित्रान्‌ सूक्ष्मांश्व॒ परार्घ्यान्‌ सुप्रदर्शनान्‌ । अन्यच्च विविध रत्नं द्वारि तिष्ठन्ति वारिता: ।। कितने ही यवन मनके समान वेगशाली पर्वतीय घोड़े, बहुमूल्य आसन, नूतन, सूक्ष्म, विचित्र दर्शनीय और कीमती कम्बल, भाँति-भाँतिके रत्न तथा अन्य वस्तुएँ लेकर राजद्वारपर खड़े थे, फिर भी अंदर नहीं जाने पाते थे। श्रुतायुरपि कालिज्री मणिरत्नमनुत्तमम्‌ | कलिंगनरेश श्रुतायुने उत्तम मणिरत्न भेंट किये। दक्षिणात्‌ सागराभ्याशात्‌ प्रावारांश्व पर:शतान्‌ ।। आऔदकानि सरत्नानि बलिं चादाय भारत । अन्येभ्यो भूमिपालेभ्य: पाण्डवाय न्यवेदयत्‌ ।। इसके सिवा, उन्होंने दूसरे भूपालोंसे दक्षिण समुद्रके निकटसे सैकड़ों उत्तरीय वस्त्र, शंख, रत्न तथा अन्य उपहार-सामग्री लेकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको समर्पित की। दार्दुरं चन्दनं मुख्यं भारान्‌ षण्णवतिं ध्रुवम्‌ । पाण्डवाय ददौ पाण्ड्य: शड्खांस्तावत एव च ।। पाण्ड्यनरेशने मलय और दर्दुरपर्वतके श्रेष्ठ चन्दनके छियानबे भार युधिष्ठिरको भेंट किये। फिर उतने ही शंख भी समर्पित किये। चन्दनागरु चानन्तं मुक्तावैदूर्यचित्रका: । चोलश्न केरलश्लोभौ ददतु: पाण्डवाय वै ।। चोल और केरलदेशके नरेशोंने असंख्य चन्दन, अगुरु तथा मोती, वैदूर्य तथा चित्रक नामक रत्न धर्मराज युधिष्ठिरको अर्पित किये। अश्मको हेमशटड्लीश्व दोग्ध्रीहेंमविभूषिता: । सवत्सा: कुम्भदोहाश्न गा: सहस्राण्यदाद्‌ दश ।। राजा अश्मकने बछड़ोंसहित दस हजार दुधारू गौएँ भेंट कीं, जिनके सींगोंमें सोना मढ़ा हुआ था और गलेमें सोनेके आभूषण पहनाये गये थे। उनके थन घड़ोंके समान दिखायी देते थे। सैन्धवानां सहस्राणि हयानां पञज्चविंशतिम्‌ । अददात्‌ सैन्धवो राजा हेममाल्यैरलंकृतान्‌ ।। सिन्धुनरेशने सुवर्णमालाओंसे अलंकृत पचीस हजार सिन्धुदेशीय घोड़े उपहारमें दिये थे। सौवीरो हस्तिभिरययक्तान्‌ रथांश्व त्रिशतावरान्‌ | जातरूपपरिष्कारान्‌ मणिरत्नविभूषितान्‌ ।। मध्यंदिनार्कप्रतिमांस्तेजसाप्रतिमानिव । बलिं च कृत्स्नमादाय पाण्डवाय न्यवेदयत्‌ ।। सौवीरराजने हाथी जुते हुए रथ प्रदान किये, जो तीन सौसे कम न रहे होंगे। उन रथोंको सुवर्ण, मणि तथा रत्नोंसे सजाया गया था। वे दोपहरके सूर्यकी भाँति जगमगा रहे थे। उनसे जो प्रभा फैल रही थी, उसकी कहीं भी उपमा न थी। इन रथोंके सिवा, उन्होंने अन्य सब प्रकारकी भी उपहार-सामग्री युधिष्ठिरको भेंट की थी। अवन्‍न्तिराजो रत्नानि विविधानि सहस्रश: । हाराड्रदांश्व॒ मुख्यान्‌ वै विविधं च विभूषणम्‌ ।। दासीनामयुतं चैव बलिमादाय भारत । सभाद्धारि नरश्रेष्ठ दिदृक्षुरवतिष्ठते ।। नरश्रेष्ठ भरतनन्दन! अवन्तीनरेश नाना प्रकारके सहस्रों रत्न, हार, श्रेष्ठ अंगद (बाजूबंद), भाँति-भाँतिके अन्यान्य आभूषण, दस हजार दासियों तथा अन्यान्य उपहार- सामग्री साथ लेकर राजसभाके द्वारपर खड़े थे और भीतर जाकर युधिष्छिरका दर्शन पानेके लिये उत्सुक हो रहे थे। दशार्णश्रेदिराजश्न शूरसेनश्व वीर्यवान्‌ बलिं च कृत्स्नमादाय पाण्डवाय न्यवेदयत्‌ ।। दशार्णनरेश, चेदिराज तथा पराक्रमी राजा शूरसेनने सब प्रकारकी उपहार-सामग्री लाकर युधिष्ठिरको समर्पित की। काशिराजेन हृष्टेन बली राजन्‌ निवेदित: ।। अशीतिगोसहस्राणि शतान्यष्टौ च दन्तिनाम्‌ । विविधानि च रत्नानि काशिराजो बलिं ददौ ।। राजन! काशीनरेशने भी बड़ी प्रसन्नताके साथ अस्सी हजार गौएँ, आठ सौ गजराज तथा नाना प्रकारके रत्न भेंट किये। कृतक्षणश्न वैदेह: कौसलश्न बृहद्धल: । ददतुर्वाजिमुख्यांश्न सहस्राणि चतुर्दश ।। विदेहराज कृतक्षण तथा कोसलनरेश बृहद्वधलने चौदह-चौदह हजार उत्तम घोड़े दिये थे। शैब्यो वसादिद्नि: सार्ध त्रिगर्तो मालवै: सह । तस्मै रत्नानि ददतुरेकैको भूमिपो5मितम्‌ ।। हारांस्तु मुक्तान्‌ मुख्यांश्व विविधं च विभूषणम्‌ ।) वस आदि नरेशोंसहित राजा शैब्य तथा मालवोंसहित त्रिगर्तराजने युधिष्ठिरको बहुत-से रत्न भेंट किये, उनमेंसे एक-एक भूपालने असंख्य हार, श्रेष्ठ मोती तथा भाँति-भाँतिके आभूषण समर्पित किये थे। शतं दासीसहस््राणां कार्पासिकनिवासिनाम्‌

Duryodhana said: “That conch which a foremost brahmin presented on behalf of a king—given with affection by the ruler of Kuṇinda to the wise Dharmarāja—was then handed by all the brothers to their brother, the diadem-wearing Arjuna. Bībhatsu received it with respect: a water-born conch, garlanded with gold, set with a thousand gold pieces, shining by its own radiance—beautiful, striking to behold, and adorned by Viśvakarman himself. The knower of dharma (Dharmarāja) had repeatedly bowed to it and worn it. And when gifts of food were being given (annadāna), that conch sounded of itself; then it roared even more loudly. At its reverberation, the assembled kings fell to the earth, their splendor broken.”

Verse 9

शूद्रा विप्रोत्तमार्हाणि राड़ुकवाण्यजिनानि च,महाराज! भरुकच्छ (भड़ौंच)-निवासी शाद्र श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके उपयोगमें आनेयोग्य रंकुमृगके चर्म तथा अन्य सब प्रकारकी भेंट-सामग्री लेकर उपस्थित हुए थे। वे अपने साथ गान्धारदेशके बहुत-से घोड़े भी लाये थे

Duryodhana said: “O great king, the foremost among the Śūdras—residents of Bharukaccha—have arrived bearing offerings fit for the best of Brahmins: antelope hides and other kinds of tribute. Along with these, they have also brought many horses from the land of Gandhāra.”

Verse 10

बलिं च कृत्स्नमादाय भरुकच्छनिवासिन: । उपनिन्युर्महाराज हयान्‌ गान्धारदेशजान्‌,महाराज! भरुकच्छ (भड़ौंच)-निवासी शाद्र श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके उपयोगमें आनेयोग्य रंकुमृगके चर्म तथा अन्य सब प्रकारकी भेंट-सामग्री लेकर उपस्थित हुए थे। वे अपने साथ गान्धारदेशके बहुत-से घोड़े भी लाये थे

Duryodhana said: “O great king, the residents of Bharukaccha arrived bringing the entire tribute—gifts and offerings of every kind—and they also presented horses bred in the land of Gandhāra.”

Verse 11

इन्द्रकृष्टरवर्तयन्ति धान्यैयें च नदीमुखै: । समुद्रनिष्कुटे जाता: पारेसिन्धु च मानवा:,जो समुद्रतटवर्ती गृहोद्यानमें तथा सिन्धुके उस पार रहते हैं, वर्षद्वारा इन्द्रके पैदा किये हुए तथा नदीके जलसे उत्पन्न हुए नाना प्रकारके धान्योंद्वारा जीवन-निर्वाह करते हैं, वे वैराम, पारद, आभीर तथा कितव जातिके लोग नाना प्रकारके रत्न एवं भाँति-भाँतिकी भेंट-सामग्री--बकरी, भेड़, गाय, सुवर्ण, गधे, ऊँट, फलसे तैयार किया हुआ मधु तथा अनेक प्रकारके कम्बल लेकर राजद्वारपर रोक दिये जानेके कारण (बाहर ही) खड़े थे और भीतर नहीं जाने पाते थे

Duryodhana said: “Those people who live along the seacoast and those who dwell beyond the Sindhu—men born in the ocean’s littoral regions—sustain themselves on many kinds of grains brought forth by Indra’s rains and by the waters that issue from the mouths of rivers.”

Verse 12

ते वैरामा: पारदाश्व आभीरा: कितवै: सह । विविधं बलिमादाय रत्नानि विविधानि च,जो समुद्रतटवर्ती गृहोद्यानमें तथा सिन्धुके उस पार रहते हैं, वर्षद्वारा इन्द्रके पैदा किये हुए तथा नदीके जलसे उत्पन्न हुए नाना प्रकारके धान्योंद्वारा जीवन-निर्वाह करते हैं, वे वैराम, पारद, आभीर तथा कितव जातिके लोग नाना प्रकारके रत्न एवं भाँति-भाँतिकी भेंट-सामग्री--बकरी, भेड़, गाय, सुवर्ण, गधे, ऊँट, फलसे तैयार किया हुआ मधु तथा अनेक प्रकारके कम्बल लेकर राजद्वारपर रोक दिये जानेके कारण (बाहर ही) खड़े थे और भीतर नहीं जाने पाते थे

Duryodhana said: “The Vairāmas, the Pāradāśvas, and the Ābhīras—together with the Kitavas—had come bearing diverse tributes and many kinds of precious goods. Yet, being stopped at the royal gate, they stood outside and could not enter.”

Verse 13

अजाविकं गोहिरण्यं खरोष्ट्र फलजं मधु । कम्बलान्‌ विविधांश्रैव द्वारि तिष्ठन्ति वारिता:,जो समुद्रतटवर्ती गृहोद्यानमें तथा सिन्धुके उस पार रहते हैं, वर्षद्वारा इन्द्रके पैदा किये हुए तथा नदीके जलसे उत्पन्न हुए नाना प्रकारके धान्योंद्वारा जीवन-निर्वाह करते हैं, वे वैराम, पारद, आभीर तथा कितव जातिके लोग नाना प्रकारके रत्न एवं भाँति-भाँतिकी भेंट-सामग्री--बकरी, भेड़, गाय, सुवर्ण, गधे, ऊँट, फलसे तैयार किया हुआ मधु तथा अनेक प्रकारके कम्बल लेकर राजद्वारपर रोक दिये जानेके कारण (बाहर ही) खड़े थे और भीतर नहीं जाने पाते थे

Duryodhana said: “Goats and sheep, cattle and gold, donkeys and camels, honey prepared from fruits, and many kinds of blankets—these offerings have been brought, yet those bearing them are being stopped at the palace gate and are left standing outside.”

Verse 14

प्राग्ज्योतिषाधिप: शूरो म्लेच्छानामधिपो बली । यवनै: सहितो राजा भगदत्तो महारथ:,प्राग्ज्योतिषपुरके अधिपति तथा म्लेच्छोंके स्वामी शूरवीर एवं बलवान्‌ महारथी राजा भगदत्त यवनोंके साथ पधारे थे और वायुके समान वेगवाले अच्छी जातिके शीघ्रगामी घोड़े तथा सब प्रकारकी भेंट-सामग्री लेकर राजद्दवारपर खड़े थे। (अधिक भीड़के कारण) उनका प्रवेश भी रोक दिया गया था

Duryodhana said: “Bhagadatta, the mighty king—lord of Prāgjyotiṣa, a valiant ruler and powerful overlord of the Mlecchas—has arrived accompanied by Yavanas. A great chariot-warrior, he stands at the royal gate with swift, well-bred horses and every kind of tribute; yet, because of the heavy crowd, even his entry has been held back.”

Verse 15

आजानेयान्‌ हयाज्छीघ्रानादायानिलरंहस: । बलिं च कृत्स्नमादाय द्वारि तिष्ठति वारित:,प्राग्ज्योतिषपुरके अधिपति तथा म्लेच्छोंके स्वामी शूरवीर एवं बलवान्‌ महारथी राजा भगदत्त यवनोंके साथ पधारे थे और वायुके समान वेगवाले अच्छी जातिके शीघ्रगामी घोड़े तथा सब प्रकारकी भेंट-सामग्री लेकर राजद्दवारपर खड़े थे। (अधिक भीड़के कारण) उनका प्रवेश भी रोक दिया गया था

Duryodhana said: “Having brought swift Ajāneya horses, fast as the wind, and carrying a complete set of tribute-gifts, he stands at the palace gate, held back (from entering).”

Verse 16

अश्मसारमयं भाण्डं शुद्धदन्तत्सरूनसीन्‌ । प्राग्ज्योतिषाधिपो दत्त्वा भगदत्तो5व्रजत्‌ तदा,उस समय प्राग्ज्योतिषनरेश भगदत्त हीरे और पद्मराग आदि मणियोंके आभूषण तथा विशुद्ध हाथी-दाँतकी मूँठवाले खड्ग देकर भीतर गये थे

Duryodhana said: “At that time Bhagadatta, the lord of Prāgjyotiṣa, presented a vessel made of hard stone and swords furnished with handles of pure ivory; having given these gifts, he then withdrew.”

Verse 17

द्ययक्षांस्त्रयक्षॉल्ललाटाक्षान्‌ नानादिग्भ्य: समागतान्‌ | औष्णीकानन्तवासांश्व॒ रोमकान्‌ पुरुषादकान्‌,द्रयक्ष, त््यक्ष, ललाटाक्ष, औष्णीक, अन्तवास, रोमक, पुरुषादक तथा एकपाद--इन देशोंके राजा नाना दिशाओंसे आकर राजद्वारपर रोक दिये जानेके कारण खड़े थे, यह मैंने अपनी आँखों देखा था। ये राजालोग भेंट-सामग्री लेकर आये थे और अपने साथ अनेक रंगवाले बहुत-से दूरगामी गधे (खच्चर) लाये थे, जिनकी गर्दन काली और शरीर विशाल थे। उनकी संख्या दस हजार थी। वे सभी रासभ सिखलाये हुए तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें विख्यात थे

Duryodhana said: “I myself saw those kings—Triyakṣas, Lalāṭākṣas, Auṣṇīkas, Antavāsas, Romakas, and Puruṣādakas—who had come from many directions. Stopped at the royal gate, they stood there bearing tribute, along with many swift, far-travelling pack-asses of varied colors, black-necked and large-bodied, famed in all quarters and well-trained.”

Verse 18

एकपादांश्व॒ तत्राहमपश्यं द्वारि वारितान्‌ । राजानो बलिमादाय नानावर्णाननेकश:,द्रयक्ष, त््यक्ष, ललाटाक्ष, औष्णीक, अन्तवास, रोमक, पुरुषादक तथा एकपाद--इन देशोंके राजा नाना दिशाओंसे आकर राजद्वारपर रोक दिये जानेके कारण खड़े थे, यह मैंने अपनी आँखों देखा था। ये राजालोग भेंट-सामग्री लेकर आये थे और अपने साथ अनेक रंगवाले बहुत-से दूरगामी गधे (खच्चर) लाये थे, जिनकी गर्दन काली और शरीर विशाल थे। उनकी संख्या दस हजार थी। वे सभी रासभ सिखलाये हुए तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें विख्यात थे

Duryodhana said: “There I myself saw, at the palace gate, kings from many regions being held back. They had come bearing tribute—gifts of many kinds and in great variety.”

Verse 19

कृष्णग्रीवान्‌ महाकायान्‌ रासभान्‌ दूरपातिन: । आजहुर्दशसाहस्रान्‌ विनीतान्‌ दिक्षु विश्वुतान्‌,द्रयक्ष, त््यक्ष, ललाटाक्ष, औष्णीक, अन्तवास, रोमक, पुरुषादक तथा एकपाद--इन देशोंके राजा नाना दिशाओंसे आकर राजद्वारपर रोक दिये जानेके कारण खड़े थे, यह मैंने अपनी आँखों देखा था। ये राजालोग भेंट-सामग्री लेकर आये थे और अपने साथ अनेक रंगवाले बहुत-से दूरगामी गधे (खच्चर) लाये थे, जिनकी गर्दन काली और शरीर विशाल थे। उनकी संख्या दस हजार थी। वे सभी रासभ सिखलाये हुए तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें विख्यात थे

Duryodhana said: “They brought ten thousand well-trained mules—black-necked, huge-bodied, and fit for long journeys—beasts renowned in every quarter.” In the flow of the tale, this is part of his report on the vast tributes gathering at the royal gate, displaying the amassed might and wealth of the world and hinting at the moral strain between rightful kingship and the pride that prosperity can kindle.

Verse 20

प्रमाणरागसम्पन्नान्‌ वड्क्षुतीरसमुद्धवान्‌ । बल्‍्यर्थ ददतस्तस्मै हिरण्यं रजतं बहु

Duryodhana said: “They were men of proper standing and loyal attachment, born on the banks of the Vaḍkṣu; and, as tribute, they were giving him abundant gold and silver.”

Verse 21

इन्द्रगोपकवर्णाभाउछुकवर्णान्‌ मनोजवान्‌

Duryodhana describes them as lustrous like the indragopaka insect, colored like the uccuka bird, and swift as the mind.

Verse 22

तथैवेन्द्रायुधनिभान्‌ संध्याभ्रसदृशानपि । अनेकवर्णानारण्यान्‌ गृहीत्वाश्वान्‌ महाजवान्‌

Duryodhana said: “Likewise, they had procured great, swift horses—some gleaming like Indra’s rainbow, others like the clouds at twilight, and still others of many hues, hardy and suited to the forest.”

Verse 23

जातरूपमनर्घ्य च ददुस्तस्यैकपादका: । एकपाददेशीय राजाओंने इन्द्रगोप (बीरबहूटी)-के समान लाल, तोतेके समान हरे, मनके समान वेगशाली, इन्द्रधनुषके तुल्य बहुरंगे, संध्याकालके बादलोंके सदूश लाल और अनेक वर्णवाले महावेगशाली जंगली घोड़े एवं बहुमूल्य सुवर्ण उन्हें भेंटमें दिये || २१-२२ ३ || चीनाउ्छकांस्तथा चौड़ान्‌ बर्बरान्‌ वनवासिन:,चीन, शक, ओड्, वनवासी बर्बर, वार्ष्णेय, हार, हूण, कृष्ण, हिमालयप्रदेश, नीप और अनूप देशोंके नाना रूपधारी राजा वहाँ भेंट देनेके लिये आये थे, किंतु रोक दिये जानेके कारण दरवाजेपर ही खड़े थे। उन्होंने अनेक रूपवाले दस हजार गधे भेंटके लिये वहाँ प्रस्तुत किये थे, जिनकी गर्दन काली और शरीर विशाल थे, जो सौ कोसतक लगातार चल सकते थे। वे सभी सिखलाये हुए तथा सब दिशाओंमें विख्यात थे

Duryodhana said: “The men of Ekāpāda presented him with priceless gold (jātarūpa) and other costly gifts.” In the ethical frame of the Sabha narrative, this is part of Duryodhana’s jealous catalogue of the immense tributes and honors received by Yudhiṣṭhira—an outward prosperity that, in his mind, sharpens rivalry and helps drive the later turn toward adharma.

Verse 24

वार्ष्णेयान्‌ हारहूणांश्व कृष्णान्‌ हैमवर्तास्तथा । नीपानूपानधिगतान्‌ विविधान्‌ द्वारवारितान्‌,चीन, शक, ओड्, वनवासी बर्बर, वार्ष्णेय, हार, हूण, कृष्ण, हिमालयप्रदेश, नीप और अनूप देशोंके नाना रूपधारी राजा वहाँ भेंट देनेके लिये आये थे, किंतु रोक दिये जानेके कारण दरवाजेपर ही खड़े थे। उन्होंने अनेक रूपवाले दस हजार गधे भेंटके लिये वहाँ प्रस्तुत किये थे, जिनकी गर्दन काली और शरीर विशाल थे, जो सौ कोसतक लगातार चल सकते थे। वे सभी सिखलाये हुए तथा सब दिशाओंमें विख्यात थे

Duryodhana said: “There were Vārṣṇeyas, Hāras and Hūṇas, the Kṛṣṇas, and men too from the Himalayan region; likewise people from the lands of Nīpa and Anūpa—of many kinds—who came up to the gate but were held back, left standing at the door.”

Verse 25

बल्यर्थ ददतस्तस्य नानारूपाननेकश: । कृष्णग्रीवान्‌ महाकायान्‌ रासभाञठ्छतपातिन: । अहार्षुर्दशसाहस्रान्‌ विनीतान्‌ दिक्षु विश्रुतान्‌,चीन, शक, ओड्, वनवासी बर्बर, वार्ष्णेय, हार, हूण, कृष्ण, हिमालयप्रदेश, नीप और अनूप देशोंके नाना रूपधारी राजा वहाँ भेंट देनेके लिये आये थे, किंतु रोक दिये जानेके कारण दरवाजेपर ही खड़े थे। उन्होंने अनेक रूपवाले दस हजार गधे भेंटके लिये वहाँ प्रस्तुत किये थे, जिनकी गर्दन काली और शरीर विशाल थे, जो सौ कोसतक लगातार चल सकते थे। वे सभी सिखलाये हुए तथा सब दिशाओंमें विख्यात थे

Duryodhana said: “When gifts were being presented to him in great abundance and in many forms, there were brought ten thousand donkeys as tribute—black-necked, huge-bodied, and able to travel a hundred krośas without stopping. They were well-trained and renowned in all directions.”

Verse 26

प्रमाणरागस्पर्शाब्यं बाह्लीचीनसमुद्धवम्‌ । ऑऔर्ण च राड़कवं चैव कीटजं पट्टजं तथा

Duryodhana said: “Also (there were) textiles and garments—distinguished by their measure, dye, and feel—originating from Bāhlīka and China: woollen cloth, the fine fabric called rāḍakava, and likewise silk produced from insects, as well as cloth made from paṭṭa (silk).”

Verse 27

कुटीकृतं तथैवात्र कमलाभं सहस्रश: । श्लक्षणं वस्त्रमकार्पासमाविकं मृदु चाजिनम्‌

Duryodhana said: “Here, too, there are thousands upon thousands of exquisitely fashioned items—lotus-like in beauty—along with fine, smooth garments: some not made of cotton, some of wool, and also soft hides.”

Verse 28

निशितांश्वैव दीर्घासीनृष्टिशक्तिपरश्वधान्‌ । अपरान्तसमुद्धूतांस्तथैव परशूज्छितान्‌

Duryodhana said: “(I saw) sharp weapons—long swords, spears, javelins, and battle-axes—along with other arms brought in from the western regions, and likewise axes fitted and prepared for use.”

Verse 29

रसान्‌ गन्धांश्व विविधान्‌ रत्नानि च सहस्रश: । बलिं च कृत्स्नमादाय द्वारि तिष्ठन्ति वारिता:

Bringing delicacies and fragrances of many kinds, and jewels by the thousand, and bearing the whole tribute, they stand at the gate—held back, not permitted to enter.

Verse 30

शकास्तुषारा: कड़्काश्न रोमशा: शुद्धिणो नरा: । जिनकी लंबाई-चौड़ाई पूरी थी, जिनका रंग सुन्दर और स्पर्श सुखद था, ऐसे बाह्नीक चीनके बने हुए, ऊनी, हिरनके रोमसमूहसे बने हुए, रेशमी, पाटके, विचित्र गुच्छेदार तथा कमलके तुल्य कोमल सहस्रों चिकने वस्त्र, जिनमें कपासका नाम भी नहीं था तथा मुलायम मृगचर्म--ये सभी वस्तुएँ भेंटके लिये प्रस्तुत थीं। तीखी और लंबी तलवारें, ऋष्टि, शक्ति, फरसे, अपरान्त (पश्चिम) देशके बने हुए तीखे परशु, भाँति-भाँतिके रस और गन्ध, सहस्ौरों रत्न तथा सम्पूर्ण भेंट-सामग्री लेकर शक, तुषार, कंक, रोमश तथा शुंगीदेशके लोग राजद्वारपर रोके जाकर खड़े थे || २६--२९ $ || महागजान्‌ दूरगमान्‌ गणितानर्बुदान्‌ हयान्‌,दूरतक जानेवाले बड़े-बड़े हाथी, जिनकी संख्या एक अर्बुद थी एवं घोड़े, जिनकी संख्या कई सौ अर्बुद थी और सुवर्ण जो एक पद्मकी लागतका था--इन सबको तथा भाँति-भाँतिकी दूसरी उपहार-सामग्रीको साथ लेकर कितने ही नरेश राजद्वारपर रोके जाकर भेंट देनेके लिये खड़े थे

Duryodhana said: “The Śakas, Tuṣāras, Kaṅkas, Romaśas, and the men of Śuṅgi stood halted at the royal gate, bearing the full array of tribute-gifts—fine garments of many kinds (wool, deer-hair, silk, linen, and soft lotus-like fabrics), soft hides, sharp and long swords, spears and lances, axes from the western lands, diverse perfumes and essences, and countless jewels. Along with these, other kings too waited at the gate with immense, far-ranging elephants and vast numbers of horses, and with gold and other offerings—ready to present them as tribute.”

Verse 31

शतशश्वचैव बहुश: सुवर्ण पद्मसम्मितम्‌ । बलिमादाय विविध द्वारि तिष्ठन्ति वारिता:,दूरतक जानेवाले बड़े-बड़े हाथी, जिनकी संख्या एक अर्बुद थी एवं घोड़े, जिनकी संख्या कई सौ अर्बुद थी और सुवर्ण जो एक पद्मकी लागतका था--इन सबको तथा भाँति-भाँतिकी दूसरी उपहार-सामग्रीको साथ लेकर कितने ही नरेश राजद्वारपर रोके जाकर भेंट देनेके लिये खड़े थे

Duryodhana said: “Again and again, in hundreds and in many ways, kings—bearing tribute of gold valued at a ‘padma’ and other varied offerings—stand at the palace gates, held back and made to wait.”

Verse 32

आसनानि महाहाणि यानानि शयनानि च । मणिकाउ्चनचित्राणि गजदन्तमयानि च,बहुमूल्य आसन, वाहन, रत्न तथा सुवर्णसे जटित हाथीदाँतकी बनी हुए शय्याएँ, विचित्र कवच, भाँति-भाँतिके शस्त्र, सुवर्णभूषित, व्याप्रचर्मसे आच्छादित और सुशिक्षित घोड़ोंसे जुते हुए अनेक प्रकारके रथ, हाथियोंपर बिछाने योग्य विचित्र कम्बल, विभिन्न प्रकारके रत्न, नाराच, अर्धनाराच तथा अनेक तरहके शस्त्र--इन सब बहुमूल्य वस्तुओंको देकर पूर्वदेशके नरपतिगण महात्मा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें प्रविष्ट हुए थे

Duryodhana said: “There were seats of great value, vehicles, and beds as well—some adorned with gems and gold, others fashioned from ivory.”

Verse 33

कवचानि विचित्राणि शस्त्राणि विविधानि च । रथांश्व विविधाकाराज्जातरूपपरिष्कृतान्‌,बहुमूल्य आसन, वाहन, रत्न तथा सुवर्णसे जटित हाथीदाँतकी बनी हुए शय्याएँ, विचित्र कवच, भाँति-भाँतिके शस्त्र, सुवर्णभूषित, व्याप्रचर्मसे आच्छादित और सुशिक्षित घोड़ोंसे जुते हुए अनेक प्रकारके रथ, हाथियोंपर बिछाने योग्य विचित्र कम्बल, विभिन्न प्रकारके रत्न, नाराच, अर्धनाराच तथा अनेक तरहके शस्त्र--इन सब बहुमूल्य वस्तुओंको देकर पूर्वदेशके नरपतिगण महात्मा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें प्रविष्ट हुए थे

Duryodhana said: “They brought wondrous coats of mail and weapons of many kinds, and also chariots of diverse designs, finely adorned with gold.”

Verse 34

हयैर्विनीतै: सम्पन्नान्‌ वैयाच्रपरिवारितान्‌ | विचित्रांश्न परिस्तोमान्‌ रत्नानि विविधानि च,बहुमूल्य आसन, वाहन, रत्न तथा सुवर्णसे जटित हाथीदाँतकी बनी हुए शय्याएँ, विचित्र कवच, भाँति-भाँतिके शस्त्र, सुवर्णभूषित, व्याप्रचर्मसे आच्छादित और सुशिक्षित घोड़ोंसे जुते हुए अनेक प्रकारके रथ, हाथियोंपर बिछाने योग्य विचित्र कम्बल, विभिन्न प्रकारके रत्न, नाराच, अर्धनाराच तथा अनेक तरहके शस्त्र--इन सब बहुमूल्य वस्तुओंको देकर पूर्वदेशके नरपतिगण महात्मा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें प्रविष्ट हुए थे

Duryodhana said: “They brought well-trained horses, richly equipped and covered with tiger-skins; and they offered many kinds of splendid coverings and spreads, along with various precious gems.”

Verse 35

नाराचानर्धनाराचाऊछस्त्राणि विविधानि च । एतद्‌ दत्त्वा महद्‌ द्रव्यं पूर्वदेशाधिपा तृपा: ।। प्रविष्टा यज्ञलसदनं पाण्डवस्य महात्मन:,बहुमूल्य आसन, वाहन, रत्न तथा सुवर्णसे जटित हाथीदाँतकी बनी हुए शय्याएँ, विचित्र कवच, भाँति-भाँतिके शस्त्र, सुवर्णभूषित, व्याप्रचर्मसे आच्छादित और सुशिक्षित घोड़ोंसे जुते हुए अनेक प्रकारके रथ, हाथियोंपर बिछाने योग्य विचित्र कम्बल, विभिन्न प्रकारके रत्न, नाराच, अर्धनाराच तथा अनेक तरहके शस्त्र--इन सब बहुमूल्य वस्तुओंको देकर पूर्वदेशके नरपतिगण महात्मा पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें प्रविष्ट हुए थे

Duryodhana said: “They presented costly wealth—nārāca and half-nārāca arrows, along with many kinds of weapons. Having given these great valuables, the satisfied rulers of the eastern lands then entered the sacrificial hall of the high-souled Pāṇḍava.”

Verse 51

इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि दुर्योधनसंतापे एकपञ्चाशत्तमो<ध्याय: ।। ५१ || इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत झ्यूतपर्वमें दुर्योधनसंतापविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ

Thus, in the revered Mahābhārata, within the Sabhā Parva—specifically the Dyūta Parva—ends the fifty-first chapter, themed around Duryodhana’s anguish.

Verse 83

श्यामास्तन्व्यो दीर्घकेश्यो हेमाभरणभूषिता: । कार्पासिक देशमें निवास करनेवाली एक लाख दासियाँ उस यज्ञमें सेवा कर रही थीं। वे सब-की-सब श्यामा तथा तन्‍्वंगी थीं। उन सबके केश बड़े-बड़े थे और वे सभी सोनेके आभूषणोंसे विभूषित थीं

Duryodhana said: “There were one hundred thousand maidservants attending that sacrificial rite, dwelling in the region of Kārpāsika. All of them were dark-complexioned and slender-waisted; their hair was long, and they were adorned with ornaments of gold.”

Verse 203

दत्त्वा प्रवेशं प्राप्तास्ते युधिष्ठिरनिवेशने । उनकी लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई जैसी होनी चाहिये, वैसी ही थी। उनका रंग भी अच्छा था। वे समस्त रासभ वंक्षु नदीके तटपर उत्पन्न हुए थे। उक्त राजालोग युधिष्ठिरको भेंटके लिये बहुत-सा सोना और चाँदी देते थे और देकर युधिष्ठिरके यज्ञमण्डपमें प्रविष्ट होते थे

Duryodhana said: “Having presented their gifts, they were admitted and entered Yudhiṣṭhira’s residence (the sacrificial pavilion).”

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether a king should authorize an ostensibly lawful court event when credible counsel predicts it will function as coercive dispossession—testing responsibility, consent, and the ethics of state-sanctioned procedure.

The chapter illustrates how appeals to “custom” and “destiny” can mask agency and accountability; ethical governance requires discernment, not merely formal authorization or fatalistic resignation.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-commentary functions narratively through Vaiśaṃpāyana’s framing and the causal emphasis that institutional decisions, once staged publicly, become difficult to reverse.