Adhyaya 316
Vana ParvaAdhyaya 316136 Verses

Adhyaya 316

Chapter Arc: Yudhishthira arrives at the forest lake and beholds a dreadful sight: Arjuna’s bow and arrows scattered, and his brothers—Arjuna, Bhima, Nakula, Sahadeva—lying fallen and motionless, as if life has fled them. → Grief-stricken, he searches for signs of wounds and finds none—no weapon-strikes, no footprints—only an uncanny stillness, convincing him that some vast, unseen being has struck them down. A disembodied Yaksha voice asserts dominion over the water and demands that Yudhishthira answer questions before drinking. → The Yaksha unleashes a cascade of riddling questions—about the self, fate, friendship, livelihood, refuge, and the essence of dharma—and Yudhishthira answers with steady clarity, refusing temptation and speaking of compassion, restraint of mind, and the enduring bond of the good. → Pleased, the Yaksha reveals his identity and power, admits he has felled the brothers, and—moved by Yudhishthira’s truthfulness and dharmic insight—grants boons that lead toward the restoration of the fallen brothers and the safeguarding of the Pandavas’ forest-journey. → The Yaksha’s final condition and the precise choice Yudhishthira must make (whom to revive and why) hangs over the scene, testing dharma against affection and strategy.

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३ श्लोक मिलाकर कुल ४५३६ “लोक हैं।) हू... “+(>9) #:६.# #25-१ त्रयोदशाधिकत्रिशततमो< ध्याय: यक्ष और युधिष्ठिरका प्रश्नोत्तर तथा युधिष्ठिरके उत्तरसे संतुष्ट हुए यक्षका चारों हल जीवित होनेका वरदान ना वैशग्पायन उवाच स ददर्श हतान्‌ भ्रातूँललोकपालानिव च्युतान्‌ | चुगान्ते समनुप्राप्ते शक्रप्रतिमगौरवान्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! युधिष्छिरने इन्द्रके समान गौरवशाली अपने भाइयोंको सरोवरके तटपर निर्जीवकी भाँति पड़े हुए देखा; मानो प्रलय-कालमें सम्पूर्ण लोकपाल अपने लोकोससे भ्रष्ट होकर गिर गये हों

বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! যুধিষ্ঠির সরোবরতীরে তাঁর ভ্রাতৃগণকে নিহত অবস্থায় পড়ে থাকতে দেখলেন—যেন যুগান্তে লোকপালগণ নিজ নিজ পদচ্যুত হয়ে পতিত হয়েছে; ইন্দ্রসম গৌরবে দীপ্ত সেই বীরেরা এখন নিথর।

Verse 2

विनिकीर्णभनुर्बाणं दृष्टवा निहतमर्जुनम्‌ । भीमसेनं यमौ चैव निर्विचेष्टान्‌ गतायुष:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे--

ধনুক-বাণ ছড়িয়ে-ছিটিয়ে থাকা অবস্থায় নিহত অর্জুনকে দেখে, আর ভীমসেন ও যমজদ্বয়কেও প্রাণহীন ও নিথর দেখে, মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির দীর্ঘক্ষণ করুণ বিলাপ করলেন।

Verse 3

स दीर्घमुष्णं नि:श्वस्य शोकबाष्पपरिप्लुत: । तान्‌ दृष्टवा पतितान्‌ भ्रातृन्‌ सर्वाश्विन्तासमन्वितः,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे--

শোকজ অশ্রুতে সিক্ত হয়ে তিনি দীর্ঘ, উষ্ণ নিশ্বাস ফেললেন; পতিত ভ্রাতৃগণকে দেখে নানাবিধ আশঙ্কায় আচ্ছন্ন হয়ে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন।

Verse 4

ननु त्वया महाबाहो प्रतिज्ञातं वृकोदर,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- महात्मनि महाबाहो कुरूणां कीर्तिविर्धने । वे बोले--“महाबाहु वृकोदर! तुमने यह प्रतिज्ञा की थी कि "मैं युद्धमें अपनी गदासे दुर्योधनकी दोनों जाँघें तोड़ डालूँगा। महाबाहो! तुम कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले थे। तुम्हारा हृदय विशाल था। वीर! आज तुम्हारे गिर जानेसे मेरे लिये वह सब कुछ व्यर्थ हो गया

বৈশম্পায়ন বললেন— “মহাবাহু বৃকোদর, তুমি কি সেই দৃঢ় প্রতিজ্ঞা করনি?” এই বলে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন। ভ্রাতাদের পতিত দেখে এবং বীরদের প্রতিজ্ঞা যেন ব্যর্থ হয়ে গেল মনে করে তিনি শোক ও উদ্বেগে আচ্ছন্ন হলেন; তখন তাঁর বাক্য ধর্ম, প্রতিশ্রুতি ও কুলমর্যাদার ভারের কথাই উচ্চারণ করল।

Verse 5

सुयोधनस्य भेत्स्यामि गदया सक्थिनी रणे | व्यर्थ तदद्य मे सर्व त्वयि वीर निपातिते,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे--

“যুদ্ধে গদা দিয়ে আমি সুয়োধনের উরুদ্বয় চূর্ণ করব”—এ ছিল আমার প্রতিজ্ঞা; কিন্তু হে বীর, আজ তুমি পতিত হওয়ায় তা সম্পূর্ণই ব্যর্থ হল। এই বলে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির শোকে অভিভূত হয়ে দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন—যেন ধর্মের আশা ভেঙে পড়েছে এবং অধর্মই জয়ী হয়েছে।

Verse 6

मनुष्यसम्भवा वाचो विधर्मिण्य: प्रतिश्रुता:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे--

“মানুষের দুর্বলতা থেকে জন্ম নেওয়া কথা—ধর্মচ্যুত প্রতিশ্রুতি—কী করে ফল দেবে?” এই বিপর্যয় দেখে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির শোকে দগ্ধ হয়ে দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন।

Verse 7

देवाश्वापि यदावोचन्‌ सूतके त्वां धनंजय,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “धनंजय! जब तुम्हारा जन्म हुआ था, उस समय देवताओंने भी कहा था कि “कुन्ती! तुम्हारा यह पुत्र सहस्रनेत्रधारी इन्द्रसे किसी बातमें कम न होगा।' उत्तर पारियात्र पर्वतपर सब प्राणियोंने तुम्हारे विषयमें यही कहा था कि “ये अर्जुन शीघ्र ही पाण्डवोंकी खोयी हुई राजलक्ष्मीको पुनः लौटा लायेंगे। युद्धमें कोई भी इनपर विजय पानेवाला न होगा और ये भी किसीको परास्त किये बिना न रहेंगे”

বৈশম্পায়ন বললেন— “ধনঞ্জয়, তোমার জন্মসংস্কারের সময় দেবতারাও যখন তোমার বিষয়ে বলেছিলেন,” তা স্মরণ করে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন। জন্মকালের সেই দিব্য বাণী মনে পড়ায় তাঁর শোক আরও বেড়ে গেল—নিয়তির প্রতি বিশ্বাস আর চোখের সামনে ক্ষতির মধ্যে মন দ্বন্দ্বে পড়ল।

Verse 8

सहस्राक्षादनवर: कुन्ति पुत्रस्तवेति वै । उत्तरे पारियात्रे च जगुर्भूतानि सर्वश:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “धनंजय! जब तुम्हारा जन्म हुआ था, उस समय देवताओंने भी कहा था कि “कुन्ती! तुम्हारा यह पुत्र सहस्रनेत्रधारी इन्द्रसे किसी बातमें कम न होगा।' उत्तर पारियात्र पर्वतपर सब प्राणियोंने तुम्हारे विषयमें यही कहा था कि “ये अर्जुन शीघ्र ही पाण्डवोंकी खोयी हुई राजलक्ष्मीको पुनः लौटा लायेंगे। युद्धमें कोई भी इनपर विजय पानेवाला न होगा और ये भी किसीको परास्त किये बिना न रहेंगे”

“কুন্তী, তোমার এই পুত্র সহস্রাক্ষ ইন্দ্রের চেয়ে কোনো অংশে কম নয়”—এমনই বলা হয়েছিল; আর উত্তর পারিয়াত্রে সর্বত্র সকল প্রাণীও এই ঘোষণাই করেছিল। সকলের সেই উচ্চারণ স্মরণ করে মহাবাহু ধর্মপুত্র শোকের ভার বহন করলেন।

Verse 9

धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “धनंजय! जब तुम्हारा जन्म हुआ था, उस समय देवताओंने भी कहा था कि “कुन्ती! तुम्हारा यह पुत्र सहस्रनेत्रधारी इन्द्रसे किसी बातमें कम न होगा।' उत्तर पारियात्र पर्वतपर सब प्राणियोंने तुम्हारे विषयमें यही कहा था कि “ये अर्जुन शीघ्र ही पाण्डवोंकी खोयी हुई राजलक्ष्मीको पुनः लौटा लायेंगे। युद्धमें कोई भी इनपर विजय पानेवाला न होगा और ये भी किसीको परास्त किये बिना न रहेंगे”

বৈশম্পায়ন বললেন— মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করতে লাগলেন। অর্জুনকে মৃতপ্রায় হয়ে ভূমিতে পতিত, তার ধনু ও বাণ ছড়িয়ে-ছিটিয়ে পড়ে আছে দেখে, আর ভীমসেন ও নকুল-সহদেবকেও প্রাণহীন, নিশ্চেষ্ট হয়ে পড়ে থাকতে দেখে, যুধিষ্ঠির উত্তপ্ত দীর্ঘ নিশ্বাস ফেলতে লাগলেন; শোকের অশ্রু চোখ থেকে উথলে উঠে তাঁকে ভিজিয়ে দিল। সকল ভ্রাতাকে এভাবে নিপতিত দেখে মহাবাহু ধর্মপুত্র গভীর চিন্তায় নিমগ্ন হয়ে দীর্ঘকাল কাঁদতে লাগলেন— “ধনঞ্জয়! তোমার জন্মকালে দেবতারাও বলেছিলেন— ‘কুন্তী! তোমার এই পুত্র সহস্রনেত্র ইন্দ্রের তুলনায় কোনো অংশে কম হবে না।’ আর উত্তর পারিয়াত্র পর্বতে সকল প্রাণী তোমার সম্বন্ধে এ কথাই বলেছিল— ‘এই অর্জুন শীঘ্রই পাণ্ডবদের হারানো রাজলক্ষ্মী ফিরিয়ে আনবে। যুদ্ধে কেউ তাকে জয় করতে পারবে না, আর সেও কাউকে পরাস্ত না করে ফিরবে না।’”

Verse 10

सो<यं मृत्युवशं यात: कथं जिष्णुर्महाबल: । अयं ममाशां संहत्य शेते भूमौ धनंजय:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे--

বৈশম্পায়ন বললেন— “এত মহাবলী জিষ্ণু (অর্জুন) কীভাবে মৃত্যুর অধীন হলো? এই ধনঞ্জয় যেন আমার সমস্ত আশাকেই চূর্ণ করে ভূমিতে শুয়ে আছে।” এ দৃশ্য দেখে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির শোকে দগ্ধ হৃদয়ে দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন।

Verse 11

रणे प्रमत्तौ वीरौ च सदा शत्रुनिबर्हणी,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “कुन्तीके ये दोनों महाबली पुत्र भीमसेन और अर्जुन--जो किसी भी अस्त्रसे प्रतिहत न होनेवाले, समरांगणमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले तथा सदैव शत्रुओंका संहार करनेवाले वीर थे, वे आज सहसा शत्रुके अधीन कैसे हो गये?

বৈশম্পায়ন বললেন— রণে উন্মত্ত দুই বীর, যারা সদাই শত্রুনিধনকারী—তাদের এভাবে পতিত দেখে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন— “কুন্তীর এই দুই মহাবলী পুত্র—ভীমসেন ও ধনঞ্জয়—যারা কোনো অস্ত্রে প্রতিহত হয় না, সমরে উন্মত্ত হয়ে লড়ে, এবং সদাই শত্রু সংহার করে—তারা আজ হঠাৎ শত্রুর অধীন হলো কীভাবে?”

Verse 12

कथं रिपुवशं यातौ कुन्तीपुत्रौ महाबलौ । यौ सर्वास्त्राप्रतिहती भीमसेनधनंजयौ,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “कुन्तीके ये दोनों महाबली पुत्र भीमसेन और अर्जुन--जो किसी भी अस्त्रसे प्रतिहत न होनेवाले, समरांगणमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले तथा सदैव शत्रुओंका संहार करनेवाले वीर थे, वे आज सहसा शत्रुके अधीन कैसे हो गये?

বৈশম্পায়ন বললেন— “কুন্তীর মহাবলী পুত্র—ভীমসেন ও ধনঞ্জয়—যারা কোনো অস্ত্রে প্রতিহত হয় না, তারা কীভাবে শত্রুর অধীন হলো?” ভাইদের ভূমিতে পতিত দেখে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির শোকে ব্যাকুল হয়ে দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন।

Verse 13

अश्मसारमयं नून॑ हृदयं मम दुर्हदः । यमौ यदेतौ दृष्टवाद्य पतितौ नावदीर्यते,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “मुझ दुष्टका हृदय निश्चय ही पत्थर और लोहेका बना हुआ है, जो कि आज इन दोनों भाई नकुल और सहदेवको धरतीपर पड़ा देख विदीर्ण नहीं हो जाता है

বৈশম্পায়ন বললেন— “নিশ্চয়ই আমার—দুর্মনের—হৃদয় পাথর ও লোহার; আজ এই দুই যমজ ভাইকে ভূমিতে পতিত দেখে তবু তা বিদীর্ণ হয় না!” এ কথা বলে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির শোকে ব্যাকুল হয়ে আত্মনিন্দা করতে করতে দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন।

Verse 14

शास्त्रज्ञा देशकालज्ञास्तपोयुक्ता: क्रियान्विता: । अकृत्वा सदृशं कर्म कि शेध्वं पुरुषर्षभा:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- 'पुरुषसिंह बन्धुओ! तुमलोग शास्त्रोंके विद्वान देशकालको समझनेवाले, तपस्वी और कर्मठ वीर थे। अपने योग्य पराक्रम किये बिना ही तुमलोग (प्राणहीन हो) कैसे सो रहे हो?

বৈশম্পায়ন বললেন— “হে পুরুষর্ষভগণ! তোমরা শাস্ত্রজ্ঞ, দেশ-কালবিচারী, তপস্যায় সংযত এবং কর্মে দৃঢ়। তোমাদের শক্তির উপযুক্ত কর্ম না করেই তোমরা এভাবে কেন পড়ে আছ?” ভ্রাতৃগণকে নিথর ও পতিত দেখে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির শোকে আচ্ছন্ন হলেন; উত্তপ্ত দীর্ঘ নিশ্বাস ফেলতে ফেলতে, অশ্রুসজল নয়নে তিনি দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন।

Verse 15

अविक्षतशरीराश्षाप्यप्रमृष्टशरासना: । असंज्ञा भुवि संगम्य कि शेध्वमपराजिता:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “तुम्हारे शरीरोंमें कोई घाव नहीं है, तुमने धनुष-बाणका स्पर्शतक नहीं किया है तथा तुम किसीसे परास्त होनेवाले नहीं हो; ऐसी दशामें इस पृथ्वीपर संज्ञाशून्य होकर क्‍यों पड़े हो?”

বৈশম্পায়ন বললেন— “তোমাদের দেহে ক্ষত নেই; ধনুক-বাণও স্পর্শ করা হয়নি; আর তোমরা পরাজিত হওয়ার লোক নও। তবে কেন এই পৃথিবীতে সংজ্ঞাহীন হয়ে পড়ে আছ?” কোনো আঘাতচিহ্ন না থাকা সত্ত্বেও ভ্রাতৃগণকে এভাবে পতিত দেখে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির উদ্বেগ ও শোকে ভেঙে পড়ে দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন।

Verse 16

सानूनिवाद्रे: संसुप्तान्‌ दृष्टवा भ्रातृून्‌ महामति: । सुखं प्रसुप्तान्‌ प्रस्विन्न: खिन्न: कष्टां दशां गत:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- परम बुद्धिमान्‌ युधिष्ठिर धरतीपर पड़े हुए पर्वत-शिखरोंके समान अपने भाइयोंको इस प्रकार सुखकी नींद सोते देखकर बहुत दुःखी हुए। उनके सारे अंगोंमें पसीना निकल आया और वे अत्यन्त कष्टप्रद अवस्थामें पहुँच गये

বৈশম্পায়ন বললেন— ভূমিতে পড়ে থাকা ভ্রাতৃগণকে পর্বতশৃঙ্গের মতো দেখে, যেন তারা শান্ত নিদ্রায় মগ্ন—এ দৃশ্য দেখে মহামতি যুধিষ্ঠির ভেতরে ভেতরে ভেঙে পড়লেন। ভয়াবহ সত্য উপলব্ধি হতেই তাঁর সর্বাঙ্গে ঘাম ছুটল; তিনি চরম ক্লেশে পতিত হলেন। শোক ও উদ্বেগে ডুবে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন।

Verse 17

एवमेवेदमित्युक्त्वा धर्मात्मा स नरेश्वर: । शोकसागरमध्यस्थो दध्यौ कारणमाकुल:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “यह ऐसी ही होनहार है”, ऐसा कहकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर शोकसागरमें मग्न तथा व्याकुल होकर भाइयोंकी मृत्युके कारणपर विचार करने लगे

বৈশম্পায়ন বললেন— “এটাই তো—এভাবেই হওয়ার ছিল,” বলে ধর্মাত্মা নরেশ যুধিষ্ঠির শোকসাগরের মাঝখানে দাঁড়িয়ে থাকা মানুষের মতো ব্যাকুল হয়ে কারণ চিন্তা করতে লাগলেন। তারপর মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন, যেন এই বিপর্যয়ের গোপন ধর্মকারণ খুঁজছেন।

Verse 18

इतिकर्तव्यतां चेति देशकालविभागवित्‌ | नाभिपेदे महाबाहुश्चिन्तयानो महामति:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- वे यह भी सोचने लगे कि “अब क्या करना चाहिये?” महाबुद्धिमान्‌ महाबाहु युधिष्छिर देश और कालके तत्त्वको पृथकृ-पृथक्‌ जाननेवाले थे; तो भी बहुत सोचने-विचारनेपर भी वे किसी निश्चयपर नहीं पहुँच सके

বৈশম্পায়ন বললেন— “এখন কী করা উচিত?”—এ কথা ভাবতে ভাবতে, দেশ-কালবিভাগে পারদর্শী মহাবুদ্ধিমান মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠিরও বহু চিন্তার পর কোনো সিদ্ধান্তে পৌঁছাতে পারলেন না। শোকে আচ্ছন্ন হয়ে তিনি দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন।

Verse 19

विप्रणष्टां श्रियं चैषामाहर्ता पुनरज्जसा । नास्य जेता रणे कश्चिदजेता नैष कस्यचित्‌,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- अथ संस्तभ्य धर्मात्मा तदा55त्मानं तपोयुतः । एवं विलप्य बहुथा धर्मपुत्रो युधिष्ठिर: तत्पश्चात्‌ धर्मात्मा और तपस्वी धर्मपुत्र युधिष्ठिर अपने मनको स्थिर करके बहुत विलाप करनेके पश्चात्‌ अपनी बुद्धिद्वारा यह विचार करने लगे--“इन वीरोंको किसने मार गिराया है? इनके शरीरोंमें अस्त्र-शस्त्रोंके आघातका कोई चिह्न नहीं है और न इस स्थानपर किसी दूसरेके पैरोंका निशान ही है। मैं समझता हूँ, अवश्य वह कोई भारी भूत है, जिसने मेरे भाइयोंको मारा है

বৈশম্পায়ন বললেন—“এ সে অচিরেই তাদের হারানো শ্রী পুনরুদ্ধার করবে। যুদ্ধে তাকে কেউ জয় করতে পারে না; সেও কারও দ্বারা পরাজিত হয় না।” ভ্রাতৃগণকে পতিত দেখে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন। তারপর ধর্মাত্মা তপস্বী যুধিষ্ঠির বহুবার শোক প্রকাশ করে মন সংযত করে বুদ্ধি দিয়ে চিন্তা করতে লাগলেন।

Verse 20

बुद्धया विचिन्तयामास वीरा: केन निपातिता:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- तत्पश्चात्‌ धर्मात्मा और तपस्वी धर्मपुत्र युधिष्ठिर अपने मनको स्थिर करके बहुत विलाप करनेके पश्चात्‌ अपनी बुद्धिद्वारा यह विचार करने लगे--“इन वीरोंको किसने मार गिराया है? इनके शरीरोंमें अस्त्र-शस्त्रोंके आघातका कोई चिह्न नहीं है और न इस स्थानपर किसी दूसरेके पैरोंका निशान ही है। मैं समझता हूँ, अवश्य वह कोई भारी भूत है, जिसने मेरे भाइयोंको मारा है

তখন মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করে স্থির বুদ্ধিতে ভাবতে লাগলেন—“এই বীরদের কে নিপাতিত করল?”

Verse 21

नैषां शस्त्रप्रहारो5स्ति पद नेहास्ति कस्यचित्‌ । भूतं महदिदं मन्ये भ्रातरो येन मे हता:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- तत्पश्चात्‌ धर्मात्मा और तपस्वी धर्मपुत्र युधिष्ठिर अपने मनको स्थिर करके बहुत विलाप करनेके पश्चात्‌ अपनी बुद्धिद्वारा यह विचार करने लगे--“इन वीरोंको किसने मार गिराया है? इनके शरीरोंमें अस्त्र-शस्त्रोंके आघातका कोई चिह्न नहीं है और न इस स्थानपर किसी दूसरेके पैरोंका निशान ही है। मैं समझता हूँ, अवश्य वह कोई भारी भूत है, जिसने मेरे भाइयोंको मारा है

“এদের দেহে অস্ত্রাঘাতের কোনো চিহ্ন নেই, আর এখানে কারও পদচিহ্নও নেই। আমি মনে করি, কোনো মহাশক্তিধর ভূতসত্তাই আমার ভাইদের হত্যা করেছে।” এ কথা বলে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন।

Verse 22

एकाग्रं चिन्तयिष्यामि पीत्वा वेत्स्यामि वा जलम्‌ | स्यात्‌ तु दुर्योधनेनेदमुपांशुविहितं कृतम्‌,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “इस विषयमें मैं चित्तको एकाग्र करके फिर सोचूँगा अथवा पानी पीकर इस रहस्यको समझनेकी चेष्टा करूँगा। सम्भव है, दुर्योधनने चुपके-चुपके कोई षड्यन्त्र किया हो

“আমি একাগ্রচিত্তে চিন্তা করব; অথবা জল পান করে এই রহস্য বুঝে নেব। হতে পারে, দুর্যোধন গোপনে এ কাজ করিয়েছে।” এ কথা বলে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন।

Verse 23

गान्धारराजरचितं सतत जिद्दाबुद्धिना । यस्य कार्यमकार्य वा सममेव भवत्युत,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “अथवा जिसकी बुद्धिमें सदा कुटिलता ही निवास करती है, उस गान्धारराज शकुनिकी भी यह करतूत हो सकती है। जिसके लिये कर्तव्य और अकर्तव्य दोनों बराबर हैं, उस अजितात्मा पापी शकुनिपर कौन वीर पुरुष विश्वास कर सकता है? अथवा गुप्तरूपसे नियुक्त किये हुए पुरुषोंद्वारा दुरात्मा दुर्योधनने ही यह हिंसात्मक प्रयोग किया होगा”

“অথবা এ কাজ গাঁধাররাজ শকুনিরই রচনা—যার বুদ্ধি সদা কুটিল, আর যার কাছে কর্তব্য ও অকর্তব্য সমান।” এ কথা বলে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন।

Verse 24

कस्तस्य विश्वसेद्‌ वीरो दुष्कृतेरकृतात्मन: । अथवा पुरुषैर्गूढै: प्रयोगो5यं दुरात्मन:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “अथवा जिसकी बुद्धिमें सदा कुटिलता ही निवास करती है, उस गान्धारराज शकुनिकी भी यह करतूत हो सकती है। जिसके लिये कर्तव्य और अकर्तव्य दोनों बराबर हैं, उस अजितात्मा पापी शकुनिपर कौन वीर पुरुष विश्वास कर सकता है? अथवा गुप्तरूपसे नियुक्त किये हुए पुरुषोंद्वारा दुरात्मा दुर्योधनने ही यह हिंसात्मक प्रयोग किया होगा”

বৈশম্পায়ন বললেন— “যে দুষ্কর্মে আসক্ত এবং আত্মসংযমহীন, তার উপর কোন বীর বিশ্বাস করতে পারে? অথবা কোনো দুষ্টচিত্তের প্ররোচনায় গোপন লোকদের দ্বারা এই হিংস্র কৌশল কার্যকর হয়েছে।” ভ্রাতাদের নিথর দেহ ভূমিতে পতিত দেখে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির শোকে নিমজ্জিত হলেন এবং দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন—বিশ্বাসঘাতের সন্দেহে তিনি তাদের ধিক্কার দিলেন, যাদের কাছে ধর্ম-অধর্ম একাকার হয়ে গেছে।

Verse 25

भवेदिति महाबुद्धिर्बहुधा तदचिन्तयत्‌ | तस्यासीन्न विषेणेदमुदकं दूषितं यथा,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- इस प्रकार परम बुद्धिमान्‌ युधिष्ठिर भाँति-भाँतिकी चिन्ता करने लगे। (परीक्षा करनेपर) उन्हें इस बातका निश्चय हो गया था कि इस सरोवरके जलमें जहर नहीं मिलाया गया है

বৈশম্পায়ন বললেন— মহাবুদ্ধিমান যুধিষ্ঠির নানা ভাবে ভাবলেন—“এ কীভাবে ঘটল?” পরীক্ষা করে তিনি নিশ্চিত হলেন যে এই সরোবরের জল বিষে দূষিত নয়। তবু ভ্রাতাদের নিথর অবস্থায় দেখে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির শোকে ব্যাকুল হয়ে দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন—বিপদের মধ্যে কারণ অন্বেষণ করতে করতে বিবেক আঁকড়ে ধরার চেষ্টা করলেন।

Verse 26

मृतानामपि चैतेषां विकृतं नैव जायते । मुखवर्णा: प्रसन्ना मे ५ 40025 %8 [,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “क्योंकि मर जानेपर भी मेरे इन भाइयोंके शरीरमें कोई विकृति नहीं उत्पन्न हुई है। अब भी मेरे भाइयोंके मुखकी कान्ति प्रसन्न है।। इस तरह वे सोच-विचारमें ही डूबे रहे

বৈশম্পায়ন বললেন— যুধিষ্ঠির বললেন, “মৃত হলেও এদের দেহে কোনো বিকৃতি দেখা যাচ্ছে না। তাদের মুখের বর্ণ আমার কাছে এখনও শান্ত ও প্রসন্ন মনে হচ্ছে।” এ দৃশ্য তাঁকে আরও শোকাকুল করে গভীর চিন্তায় নিমজ্জিত করল।

Verse 27

एकैकशश्लोघबलानिमान्‌ पुरुषसत्तमान्‌ | को<न्य: प्रतिसमासेत कालान्तकयमादृते,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “मेरे इन पुरुषरत्न भाइयोंमेंसे प्रत्येकके शरीरमें बलका अगाध सिन्धु लहराता था। आयु पूर्ण होनेपर सबका अन्त कर देनेवाले यमराजके सिवा दूसरा कौन इनसे भिड़ सकता था?”

বৈশম্পায়ন বললেন— যুধিষ্ঠির বললেন, “আমার এই শ্রেষ্ঠ পুরুষভ্রাতাদের প্রত্যেকের শক্তি ছিল প্রশংসনীয়; কালের অন্তক যম ছাড়া আর কে তাদের মোকাবিলা করতে পারত?” ভ্রাতাদের পতিত দেখে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির শোকে দগ্ধ হয়ে দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন।

Verse 28

एतेन व्यवसायेन तत्‌ तोयं व्यवगाढवान्‌ | गाहमानश्न तत्‌ तोयमन्तरिक्षात्‌ स शुश्रुवे,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- इस प्रकार निश्चय करके युधिष्ठिर जलमें उतरे। पानीमें प्रवेश करते ही उनके कानोंमें आकाशवाणी सुनायी दी

বৈশম্পায়ন বললেন— এই সিদ্ধান্ত নিয়ে যুধিষ্ঠির সেই জলে নামলেন। জলে এগোতেই তিনি আকাশ থেকে এক বাণী শুনলেন। ভ্রাতাদের পতিত দেখে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির শোকে ব্যাকুল হয়ে দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন—তবু কর্তব্যবোধে কারণ জানার জন্য অগ্রসর হলেন।

Verse 29

यक्ष उवाच अहं बक: शैवलमत्स्यभक्षो नीता मया प्रेतवशं तवानुजा: । त्वं पज्चमो भविता राजपुत्र नचेत्‌ प्रश्नान्‌ पछतो व्याकरोषि,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- यक्ष बोला--राजकुमार! मैं सेवार और मछली खानेवाला बगुला हूँ। मैंने ही तुम्हारे छोटे भाइयोंको यमलोक भेजा है; अतः मेरे पूछनेपर यदि तुम मेरे प्रश्नोंका उत्तर न दोगे, तो तुम भी यमलोकके पाँचवें अतिथि होओगे

যক্ষ বলল—“আমি শৈবাল ও মাছভোজী বক। আমি তোমার কনিষ্ঠ ভ্রাতাদের মৃত্যুর অধীন করেছি। হে রাজপুত্র! আমার প্রশ্নের উত্তর না দিলে তুমিও পঞ্চম হয়ে যমলোকে অতিথি হবে।” অর্জুন প্রাণহীন হয়ে পড়ে ছিল; তার ধনুক-বাণ চারদিকে ছড়িয়ে ছিল। ভীমসেন, নকুল ও সহদেবও নিঃশ্বাসহীন, নিশ্চল হয়ে ভূমিতে লুটিয়ে ছিল। এ দৃশ্য দেখে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির দগ্ধ দীর্ঘশ্বাস ফেললেন; শোকের অশ্রু চোখ ভিজিয়ে গড়িয়ে পড়ল। সকল ভ্রাতাকে এভাবে পতিত দেখে তিনি গভীর উদ্বেগে নিমগ্ন হয়ে দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন। তখন যক্ষ আবার বলল—“রাজপুত্র, আমি শৈবাল-মাছভোজী বক; আমিই তোমার অনুজদের যমলোকে পাঠিয়েছি। অতএব জিজ্ঞাসিত প্রশ্নের উত্তর না দিলে তুমিও মৃত্যুলোকের পঞ্চম অতিথি হবে।”

Verse 30

मा तात साहसं कार्षीमम पूर्वपरिग्रह: । प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय तत: पिब हरस्व च,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- तात! जल पीनेका साहस न करना। इसपर मेरा पहलेसे ही अधिकार हो गया है। कुन्तीकुमार! मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो और तब जल पीओ और ले भी जाओ

বৈশম্পায়ন বললেন—“বৎস, দুঃসাহস কোরো না। এই জল আমার পূর্ব থেকেই অধিকৃত। হে কুন্তীপুত্র, আগে আমার প্রশ্নগুলির উত্তর দাও; তারপর জল পান করো—এবং নিয়ে যেও।” অর্জুন মৃত হয়ে পড়ে ছিল; তার ধনুক-বাণ চারদিকে ছড়িয়ে ছিল। ভীমসেন, নকুল ও সহদেবও প্রাণহীন, নিশ্চল হয়ে পড়ে ছিল। তা দেখে মহাবাহু ধর্মপুত্র যুধিষ্ঠির দগ্ধ ভারী নিশ্বাস ফেললেন; শোকাশ্রু চোখ থেকে উথলে উঠে তাঁকে ভিজিয়ে দিল। ভাইদের এভাবে পতিত দেখে তিনি গভীর উদ্বেগে ডুবে দীর্ঘক্ষণ বিলাপ করলেন।

Verse 31

युधिछिर उवाच रुद्राणां वा वसूनां वा मरुतां वा प्रधानभाक्‌ । पृच्छामि को भवान्‌ देवो नैतच्छकुनिना कृतम्‌,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- युधिष्ठिर बोले--मैं पूछता हूँ, तुम रुद्रों, वसुओं अथवा मरुद्गणोंमेंसे कौन-से प्रधान देवता हो? बताओ। यह काम किसी पक्षीका किया हुआ नहीं हो सकता?

যুধিষ্ঠির বললেন—“আমি জিজ্ঞাসা করছি—তুমি কি রুদ্রদের মধ্যে প্রধান, না বসুদের মধ্যে, না মরুতদের মধ্যে? বলো, তুমি কোন দেবতা? এ কাজ কোনো সাধারণ পাখির হতে পারে না।”

Verse 32

हिमवान्‌ पारियात्रश्न विन्ध्यो मलय एव च । चत्वार: पर्वता: केन पातिता भूरितेजस:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- मेरे महातेजस्वी भाई हिमवान, पारियात्र, विन्ध्य तथा मलय--इन चारों पर्वतोंके समान हैं। इन्हें किसने मार गिराया है?

হিমবান, পারিয়াত্র, বিন্ধ্য ও মলয়—এই চার মহাপর্বতের মতোই আমার তেজস্বী ভ্রাতারা। কে তাদের এভাবে নিপাতিত করল?

Verse 33

अतीव ते महत्‌ कर्म कृतं च बलिनां वर । यान्‌ न देवा न गन्धर्वा नासुराश्च न राक्षसा:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम्‌ । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे--

হে বলবানদের শ্রেষ্ঠ! তুমি অতিশয় মহান কর্ম সাধন করেছ—যা দেবগণও পারে না, গন্ধর্বও নয়, অসুরও নয়, রাক্ষসও নয়।

Verse 34

विषहेरन्‌ महायुद्धे कृतं ते तन्महादभुतम्‌ । न ते जानामि यत्‌ कार्य नाभिजानामि काड्क्षितम्‌

যুধিষ্ঠির বললেন— মহাযুদ্ধে তুমি যা সহ্য করেছ, তা সত্যিই মহা-অদ্ভুত। কিন্তু তোমার উদ্দেশ্য কী, আমি জানি না; তুমি কী কামনা কর, তাও আমি বুঝতে পারি না।

Verse 35

बलवानोंमें श्रेष्ठ वीर! तुमने यह अत्यन्त महान्‌ कर्म किया है। बड़े-बड़े युद्धोंमें जिन वीरों-(के प्रभाव)-को देवता, गन्धर्व, असुर तथा राक्षस भी नहीं सह सकते थे, उन्हें गिराकर तुमने परम अद्भुत पराक्रम किया है। तुम्हारा कार्य क्या है? यह मैं नहीं जानता। तुम क्या चाहते हो? इसका भी मुझे पता नहीं है ।। कौतूहलं महज्जातं साध्वसं चागतं मम । येनास्म्युद्विग्नहरदय: समुत्पन्नशिरोज्वर:,पृच्छामि भगवंस्तस्मात्‌ को भवानिह तिष्ठति । तुम्हारे विषयमें मुझे महान्‌ कौतूहल हो गया है। तुमसे मुझे कुछ भय भी लगने लगा है, जिससे मेरा हृदय उद्विग्न हो उठा है और सिरमें संताप होने लगा है। अतः भगवन! मैं विनयपूर्वक पूछता हूँ, तुम यहाँ कौन विराज रहे हो?

যুধিষ্ঠির বললেন— হে বলবানদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ বীর! তুমি এক অতিমহৎ কর্ম সাধন করেছ। মহাযুদ্ধে এমন সব যোদ্ধা ছিলেন, যাদের প্রভাব দেবতা, গন্ধর্ব, অসুর ও রাক্ষসেরাও সহ্য করতে পারত না—তাদের পরাস্ত করে তুমি পরম অদ্ভুত পরাক্রম প্রদর্শন করেছ। কিন্তু তোমার উদ্দেশ্য কী, আমি জানি না; তুমি কী চাও, তাও আমার অজানা। আমার মনে মহৎ কৌতূহল জেগেছে, আর কিছু ভয়ও এসেছে; তাতে হৃদয় অস্থির, মাথায় যেন জ্বর উঠছে। অতএব, হে ভগবান, বিনীতভাবে জিজ্ঞাসা করি—আপনি কে, যিনি এখানে দাঁড়িয়ে আছেন?

Verse 36

यक्ष उवाच यक्षो5हमस्मि भद्रं ते नास्मि पक्षी जलेचर:

যক্ষ বলল— আমি যক্ষ; তোমার মঙ্গল হোক। আমি না পাখি, না জলচর প্রাণী।

Verse 37

वैशग्पायन उवाच ततस्तामशिवां श्र॒ुत्वा वाचं स परुषाक्षराम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন— তখন সে অশুভ, কঠোর অক্ষরযুক্ত সেই বাক্য শুনে (প্রতিক্রিয়া জানাল)।

Verse 38

यक्षस्य ब्रुवतो राजन्नुपक्रम्प तदा स्थित: । विरूपाक्षं महाकायं यक्षं तालसमुच्छुयम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন— হে রাজন! যক্ষ কথা বলতেই সে এগিয়ে গিয়ে তার নিকটে দাঁড়াল। সে দেখল—বিকট ও ভয়ংকর দৃষ্টিসম্পন্ন, মহাকায়, তালগাছের মতো উচ্চ সেই যক্ষকে।

Verse 39

ज्वलनार्कप्रतीकाशमधृष्यं पर्वतोपमम्‌ । वृक्षमाश्रित्य तिष्ठन्तं ददर्श भरतर्षभ:

বৈশম্পায়ন বললেন—ভারতশ্রেষ্ঠ তাঁকে বৃক্ষের আশ্রয়ে দাঁড়িয়ে থাকতে দেখলেন—অগ্নি ও সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান, অদম্য, এবং পর্বতের ন্যায় উচ্চ।

Verse 40

मेघगम्भीरनादेन तर्जयन्तं महास्वनम्‌ | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! तत्पश्चात्‌ उस समय इस प्रकार बोलनेवाले उस यक्षकी वह अमंगलमयी और कठोर वाणी सुनकर भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर उसके पास जाकर खड़े हो गये। उन्होंने देखा, एक विकट नेत्रोंवाला विशालकाय यक्ष वृक्षके ऊपर बैठा है। वह बड़ा ही दुर्धर्ष, ताड़के समान लंबा, अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी तथा पर्वतके समान ऊँचा है। वही अपनी मेघके समान गम्भीर नादयुक्त वाणीसे उन्हें फटकार रहा है। उसकी आवाज बहुत ऊँची है ।। यक्ष उवाच इमे ते भ्रातरो राजन्‌ वार्यमाणा मयासकृत्‌,यक्षने कहा--राजन्‌! तुम्हारे इन भाइयोंको मैंने बार-बार रोका था; फिर भी ये बलपूर्वक जल ले जाना चाहते थे; इसीसे मैंने इन्हें मार डाला। महाराज युधिष्छिर! यदि तुम्हें अपने प्राण बचानेकी इच्छा हो, तो वहाँ जल नहीं पीना चाहिये। पार्थ! तुम पानी पीनेका साहस न करना, यह पहलेसे ही मेरे अधिकारकी वस्तु है। कुन्तीनन्दन! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो, उसके बाद जल पीओ और ले भी जाओ

মেঘের মতো গম্ভীর ধ্বনিতে গর্জে উঠে সেই যক্ষ মহাস্বরে ভয় দেখাচ্ছিল। ভরতশ্রেষ্ঠ যুধিষ্ঠির কাছে গিয়ে দেখলেন—ভয়ংকর নয়নবিশিষ্ট এক বিশাল যক্ষ গাছের ডালে বসে আছে; তালগাছের মতো দীর্ঘ, অগ্নি ও সূর্যের ন্যায় দীপ্ত, এবং পর্বতের ন্যায় উচ্চ। সে মেঘগম্ভীর বাণীতে তাদের ধমকাচ্ছিল। যক্ষ বলল—“রাজন! তোমার এই ভ্রাতাদের আমি বারবার নিষেধ করেছি; তবু তারা বলপ্রয়োগে জল নিতে চেয়েছিল, তাই আমি তাদের নিধন করেছি। যুধিষ্ঠির! প্রাণ রক্ষা করতে চাইলে এই জল পান কোরো না। পার্থ! দুঃসাহস কোরো না—এ জল পূর্ব থেকেই আমার অধিকারে। কুন্তীপুত্র! আগে আমার প্রশ্নের উত্তর দাও; তারপর জল পান করো এবং নিয়ে যাও।”

Verse 41

बलात्‌ तोयं जिहीर्षन्तस्ततो वै मृदिता मया | न पेयमुदकं राजन्‌ प्राणानिह परीप्सता,यक्षने कहा--राजन्‌! तुम्हारे इन भाइयोंको मैंने बार-बार रोका था; फिर भी ये बलपूर्वक जल ले जाना चाहते थे; इसीसे मैंने इन्हें मार डाला। महाराज युधिष्छिर! यदि तुम्हें अपने प्राण बचानेकी इच्छा हो, तो वहाँ जल नहीं पीना चाहिये। पार्थ! तुम पानी पीनेका साहस न करना, यह पहलेसे ही मेरे अधिकारकी वस्तु है। कुन्तीनन्दन! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो, उसके बाद जल पीओ और ले भी जाओ

যক্ষ বলল—“তারা বলপ্রয়োগে জল নিতে চেয়েছিল, তাই আমি তাদের নিধন করেছি। রাজন! এখানে প্রাণ রক্ষা করতে চাইলে এই জল পান কোরো না। কুন্তীপুত্র! আগে আমার প্রশ্নের উত্তর দাও; তারপর জল পান করো এবং নিয়ে যাও।”

Verse 42

पार्थ मा साहसं कार्षीमम पूर्वपरिग्रह: । प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय ततः पिब हरस्व च,यक्षने कहा--राजन्‌! तुम्हारे इन भाइयोंको मैंने बार-बार रोका था; फिर भी ये बलपूर्वक जल ले जाना चाहते थे; इसीसे मैंने इन्हें मार डाला। महाराज युधिष्छिर! यदि तुम्हें अपने प्राण बचानेकी इच्छा हो, तो वहाँ जल नहीं पीना चाहिये। पार्थ! तुम पानी पीनेका साहस न करना, यह पहलेसे ही मेरे अधिकारकी वस्तु है। कुन्तीनन्दन! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो, उसके बाद जल पीओ और ले भी जाओ

যক্ষ বলল—“পার্থ! দুঃসাহস কোরো না; এ জল পূর্ব থেকেই আমার অধিকারে। কুন্তীপুত্র! আগে আমার প্রশ্নের উত্তর দাও; তারপর জল পান করো এবং নিয়ে যাও।”

Verse 43

युधिछिर उवाच न चाहं कामये यक्ष तव पूर्वपरिग्रहम्‌ । काम॑ नैतत्‌ प्रशंसन्ति सन्‍्तो हि पुरुषा: सदा,युधिष्ठिरने कहा--यक्ष! मैं तुम्हारे अधिकारकी वस्तुको नहीं ले जाना चाहता। मैं स्वयं ही अपनी बड़ाई करूँ; इस बातकी सत्पुरुष कभी प्रशंसा नहीं करते। मैं अपनी बुद्धिके अनुसार तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर दूँगा, तुम मुझसे प्रश्न करो

যুধিষ্ঠির বললেন—“হে যক্ষ! যা তোমার পূর্ব অধিকারভুক্ত, তা আমি নিতে চাই না। সৎপুরুষেরা সর্বদা আত্মপ্রশংসাকে প্রশ্রয় দেন না। আমি আমার বুদ্ধি অনুযায়ী তোমার প্রশ্নের উত্তর দেব—যা জিজ্ঞাসা করতে চাও, জিজ্ঞাসা করো।”

Verse 44

यदात्मना स्वमात्मान प्रशंसे पुरुषर्षभ । यथाप्रज्ञं तु ते प्रश्नान्‌ प्रतिवक्ष्यामि पूच्छ माम्‌,युधिष्ठिरने कहा--यक्ष! मैं तुम्हारे अधिकारकी वस्तुको नहीं ले जाना चाहता। मैं स्वयं ही अपनी बड़ाई करूँ; इस बातकी सत्पुरुष कभी प्रशंसा नहीं करते। मैं अपनी बुद्धिके अनुसार तुम्हारे प्रश्नोंका उत्तर दूँगा, तुम मुझसे प्रश्न करो

যুধিষ্ঠির বললেন—হে পুরুষশ্রেষ্ঠ! যে নিজেই নিজের প্রশংসা করে, সেই প্রশংসা সৎপুরুষেরা অনুমোদন করেন না। তবু আমার বুদ্ধি অনুযায়ী আমি তোমার প্রশ্নগুলির উত্তর দেব; তুমি আমাকে প্রশ্ন করো।

Verse 45

यक्ष उवाच कि स्विदादित्यमुन्नयति के च तस्याभितकश्नचरा: । कश्नैनमस्तं नयति कम्मेंश्ष प्रतेतिष्ठति,यक्षने पूछा--सूर्यको कौन ऊपर उठाता (उदित करता) है? उसके चारों ओर कौन चलते हैं? उसे अस्त कौन करता है? और वह किसमें प्रतिष्ठित है?

যক্ষ জিজ্ঞাসা করল—সূর্যকে কে ঊর্ধ্বে তোলে (উদিত করে)? তার চারিদিকে কারা বিচরণ করে? কে তাকে অস্ত করে? আর সে শেষ পর্যন্ত কিসে প্রতিষ্ঠিত?

Verse 46

युधिछिर उवाच ब्रह्मादित्यमुन्नयति देवास्तस्याभितकश्चरा: । धर्मश्षास्तं नयति च सत्ये च प्रतितिष्ठति,युधिष्ठिर बोले--ब्रह्म सूर्यको ऊपर उठाता (उदित करता) है, देवता उसके चारों ओर चलते हैं, धर्म उसे अस्त करता है और वह सत्यमें प्रतिष्ठित है

যুধিষ্ঠির বললেন—ব্রহ্মা সূর্যকে ঊর্ধ্বে তোলে; দেবতারা তার চারিদিকে বিচরণ করেন। ধর্ম তাকে অস্ত করে, আর সে সত্যে প্রতিষ্ঠিত।

Verse 47

यक्ष उवाच केनस्विच्छोत्रियो भवति केनस्विद्‌ विन्दते महत्‌ । केनस्विद्‌ द्वितीयवान्‌ भवति राजन्‌ केन च बुद्धिमान्‌,यक्षने पूछा--राजन्‌! मनुष्य श्रोत्रिय किससे होता है? महत्पदको किसके द्वारा प्राप्त करता है? वह किसके द्वारा द्वितीयवान्‌ होता है? और किससे बुद्धिमान होता है?

যক্ষ বলল—হে রাজন! মানুষ কী দ্বারা সত্য শ्रोত্রিয় হয়? কী দ্বারা মহত্ত্ব লাভ করে? কী দ্বারা ‘দ্বিতীয়বান’—অর্থাৎ নির্ভরযোগ্য সহায়/সঙ্গী—পায়? আর কী দ্বারা জ্ঞানী হয়?

Verse 48

युधिछिर उवाच श्रुतेन श्रोत्रियो भवति तपसा विन्दते महत्‌ | धृत्या द्वितीयवान्‌ भवति बुद्धिमान्‌ वृद्धसेवया,युधिष्ठिर बोले--वेदाध्ययनके द्वारा मनुष्य श्रोत्रिय होता है, तपसे महत्पद प्राप्त करता है, धर्यसे द्वितीयवान्‌ (दूसरे साथीसे युक्त) होता है और वृद्ध पुरुषोंकी सेवासे बुद्धिमान्‌ होता है

যুধিষ্ঠির বললেন—শ্রুতি-অধ্যয়নে মানুষ শ्रोত্রিয় হয়; তপস্যায় মহত্ত্ব লাভ করে। ধৈর্যে সে ‘দ্বিতীয়বান’—সহায় ও সঙ্গী—পায়; আর বৃদ্ধজনের সেবায় জ্ঞানী হয়।

Verse 49

यक्ष उवाच कि ब्राह्मणानां देवत्वं कश्न धर्म: सतामिव । कश्चैषां मानुषो भाव: किमेषामसतामिव,यक्षने पूछा--्राह्मणोंमें देवत्व क्या है? उनमें सत्पुरुषोंका-सा धर्म क्या है? उनका मनुष्यभाव क्या है? और उनमें असत्पुरुषोंका-सा आचरण क्‍या है?

যক্ষ বলল—ব্রাহ্মণদের দেবত্ব কী? তাদের মধ্যে সৎজনের মতো ধর্ম কী? তাদের মানবভাব কী? আর তাদের মধ্যে অসৎজনের মতো আচরণই বা কী?

Verse 50

युधिछिर उवाच स्वाध्याय एपषां देवत्वं तप एषां सतामिव । मरणं मानुषो भाव: परिवादोडसतामिव,युधिष्ठिर बोले--वेदोंका स्वाध्याय ही ब्राह्मणोंमें देवत्व है, तप सत्पुरुषोंका-सा धर्म है, मरना मनुष्य-भाव है और निन्दा करना असत्पुरुषोंका-सा आचरण है

যুধিষ্ঠির বললেন—বেদের স্বাধ্যায়ই ব্রাহ্মণদের দেবত্ব; তপস্যাই তাদের সৎজনসম ধর্ম; মৃত্যু মানবভাব; আর পরনিন্দা অসৎজনের আচরণ।

Verse 51

यक्ष उवाच कि क्षत्रियाणां देवत्वं कश्न धर्म: सतामिव । कश्नैषां मानुषो भाव: किमेषामसतामिव,यक्षने पूछा-.क्षत्रियोंमें देवत्व क्या है? उनमें सत्पुरुषोंका-सा धर्म क्या है? उनका मनुष्यभाव क्या है? और उनमें असत्पुरुषोंका-सा आचरण क्या है?

যক্ষ বলল—ক্ষত্রিয়দের দেবত্ব কী? তাদের মধ্যে সৎজনের মতো ধর্ম কী? তাদের মানবভাব কী? আর তাদের মধ্যে অসৎজনের মতো আচরণ কী?

Verse 52

युधिछिर उवाच इष्वस्त्रमेषां देवत्वं यज्ञ एषां सतामिव । भयं वै मानुषो भाव: परित्यागोडसतामिव,युधिष्ठिर बोले--बाण विद्या क्षत्रियोंका देवत्व है, यज्ञ उनका सत्पुरुषोंका-सा धर्म है, भय मानवीय भाव है और शरणमें आये हुए दु:खियोंका परित्याग कर देना उनमें असत्पुरुषोंका-सा आचरण है

যুধিষ্ঠির বললেন—ধনুর্বিদ্যা ও অস্ত্রনৈপুণ্য ক্ষত্রিয়দের দেবত্ব; যজ্ঞ তাদের সৎজনসম ধর্ম; ভয় মানবভাব; আর আশ্রয়প্রার্থীর দুঃখে তাকে ত্যাগ করা অসৎজনের আচরণ।

Verse 53

यक्ष उवाच किमेकं यज्ञियं साम किमेकं यज्ञियं यजु: । का चैषां वृणुते यज्ञं कां यज्ञो नातिवर्तते,यक्षने पूछा--कौन एक वस्तु यज्ञिय साम है? कौन एक (यज्ञसम्बन्धी) यज्ञिय यजु है? कौन एक वस्तु यज्ञका वरण करती है? और किस एकका यज्ञ अतिक्रमण नहीं करता?

যক্ষ বলল—যজ্ঞীয় সাম একটিই বা কী? যজ্ঞীয় যজুঃ একটিই বা কী? এদের মধ্যে কোন এক বস্তু যজ্ঞকে গ্রহণ করে? আর কোন একটিকে যজ্ঞ কখনও অতিক্রম করে না?

Verse 54

युधिछिर उवाच प्राणो वै यज्ञियं साम मनो वै यज्ञियं यजु: । ऋगेका वृणुते यज्ञ तां यज्ञो नातिवर्तते,युधिष्ठिर बोले--प्राण ही यज्ञिय साम है, मन ही यज्ञसम्बन्धी यजु है, एकमात्र ऋचा ही यज्ञका वरण करती है और उसीका यज्ञ अतिक्रमण नहीं करता

যুধিষ্ঠির বললেন— প্রাণই যজ্ঞোপযোগী সাম, মনই যজ্ঞোপযোগী যজুঃ। একমাত্র ঋক্‌-মন্ত্রই যজ্ঞকে গ্রহণ করে ও ধারণ করে; যজ্ঞ সেই ঋকের সীমা লঙ্ঘন করে না।

Verse 55

यक्ष उवाच किंस्विदावपतां श्रेष्ठ किंस्विन्निवपतां वरम्‌ | किंस्वित्‌ प्रतिष्ठमानानां किंस्वित्‌ प्रसवतां वरम्‌

যক্ষ বলল— যারা চাষ করে তাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ কী? যারা বীজ বোনে তাদের মধ্যে উত্তম কী? যারা প্রতিষ্ঠা লাভ করে স্থির থাকতে চায় তাদের শ্রেষ্ঠ আশ্রয় কী? আর যারা সন্তান উৎপন্ন করে তাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ কী?

Verse 56

यक्षने पूछा--खेती करनेवालोंके लिये कौन-सी वस्तु श्रेष्ठ है? बिखेरने (बोने) वालोंके लिये क्या श्रेष्ठ है? प्रतिष्ठाप्राप्त धनियोंके लिये कौन-सी वस्तु श्रेष्ठ है? तथा संतानोत्पादन करनेवालोंके लिये क्या श्रेष्ठ है? ।। युधिछिर उवाच वर्षमावपतां श्रेष्ठ बीज॑ निवपतां वरम्‌ | गाव: प्रतिष्ठमानानां पुत्र: प्रसवतां वर:,महात्मनि महाबाहो कुरूणां कीर्तिविर्धने । वे बोले--“महाबाहु वृकोदर! तुमने यह प्रतिज्ञा की थी कि "मैं युद्धमें अपनी गदासे दुर्योधनकी दोनों जाँघें तोड़ डालूँगा। महाबाहो! तुम कुरुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले थे। तुम्हारा हृदय विशाल था। वीर! आज तुम्हारे गिर जानेसे मेरे लिये वह सब कुछ व्यर्थ हो गया युधिष्ठिर बोले--खेती करनेवालोंके लिये वर्षा श्रेष्ठ है। बिखेरने (बोने) वालोंके लिये बीज श्रेष्ठ है। प्रतिष्ठाप्राप्त धनियोंके लिये गौ (का पालन-पोषण और संग्रह) श्रेष्ठ है और संतानोत्पादन करनेवालोंके लिये पुत्र श्रेष्ठ है

যুধিষ্ঠির বললেন— চাষিদের জন্য বৃষ্টি শ্রেষ্ঠ; বীজ বোনাদের জন্য বীজই উত্তম। প্রতিষ্ঠিত ধনীদের জন্য গবাদি পশুই শ্রেষ্ঠ আশ্রয়; আর সন্তানপ্রার্থী জনের জন্য পুত্রই শ্রেষ্ঠ।

Verse 57

यक्ष उवाच इन्द्रियार्थाननु भवन्‌ बुद्धिमाँलल्‍लोकपूजित: । सम्मत: सर्वभूतानामुच्छवसन्‌ को न जीवति,यक्षने पूछा--ऐसा कौन पुरुष है, जो बुद्धिमान, लोकमें सम्मानित और सब प्राणियोंका माननीय होकर एवं इन्द्रियोंक विषयोंको अनुभव करते तथा श्वास लेते हुए भी वास्तवमें जीवित नहीं है?

যক্ষ বলল— কে সেই ব্যক্তি, যে ইন্দ্রিয়বিষয় ভোগ করে, বুদ্ধিমান, লোকপূজিত, সর্বভূতের সম্মত, এবং শ্বাস নিতে নিতে-ও প্রকৃতপক্ষে জীবিত নয়?

Verse 58

युधिछिर उवाच देवतातिथिभृत्यानां पितृणामात्मनश्न यः । न निर्वपति पज्चानामुच्छवसन्‌ न स जीवति

যুধিষ্ঠির বললেন— যে ব্যক্তি দেবতা, অতিথি, ভৃত্য/আশ্রিত, পিতৃগণ এবং নিজের প্রতি— এই পাঁচের প্রাপ্য অংশ যথাযথভাবে নিবেদন করে না, সে শ্বাস নিলেও প্রকৃতপক্ষে জীবিত নয়।

Verse 59

युधिष्ठिरने कहा--जो देवता, अतिथि, भरणीय कुटुम्बीजन, पितर और आत्मा--इन पाँचोंका पोषण नहीं करता, वह श्वास लेनेपर भी जीवित नहीं है ।। यक्ष उवाच किंस्विद्‌ गुरुतरं भूमे: किंस्विदुच्चतरं च खात्‌ । किंस्विच्छीघ्रतरं वायो: किंस्विद्‌ बहुतरं तृणात्‌,यक्षने पूछा--पृथ्वीसे भी भारी क्या है? आकाशसे भी ऊँचा क्या है? वायुसे भी तेज चलनेवाला क्या है? और तिनकोंसे भी अधिक (असंख्य) क्या है?

যুধিষ্ঠির বললেন—যে ব্যক্তি দেবতা, অতিথি, পালনীয় কুটুম্বজন, পিতৃগণ এবং নিজের আত্মা—এই পাঁচজনকে পালন-পোষণ করে না, সে শ্বাস নিলেও জীবিত নয়। যক্ষ জিজ্ঞেস করল—পৃথিবীর চেয়েও ভারী কী? আকাশের চেয়েও উঁচু কী? বায়ুর চেয়েও দ্রুত কী? আর তৃণকণার চেয়েও অধিক অসংখ্য কী?

Verse 60

युधिछ्िर उवाच माता गुरुतरा भूमे: खातू्‌ पितोच्चतरस्तथा । मन: शीघ्रतरं वाताच्चिन्ता बहुतरी तृणात्‌,युधिष्ठिर बोले--माताका गौरव पृथ्वीसे भी अधिक है। पिता आकाशसे भी ऊँचा है। मन वायुसे भी तेज चलनेवाला है और चिन्ता तिनकोंसे भी अधिक असंख्य एवं अनन्त है

যুধিষ্ঠির বললেন—মাতা পৃথিবীর চেয়েও অধিক গুরুভার, পিতা আকাশের চেয়েও উচ্চতর। মন বায়ুর চেয়েও দ্রুতগামী, আর চিন্তা তৃণকণার চেয়েও অধিক অসংখ্য।

Verse 61

यक्ष उवाच किंस्वित्‌ सुप्तं न निमिषति किंस्विज्जातं न चोपति | कस्यस्विद्धृदयं नास्ति किंस्विद्‌ वेगेन वर्धते,यक्षने पूछा--कौन सोनेपर भी आँखें नहीं मूँदता? उत्पन्न होकर भी कौन चेष्टा नहीं करता? किसमें हृदय नहीं है? और कौन वेगसे बढ़ता है

যক্ষ জিজ্ঞেস করল—কোনটি ঘুমিয়েও চোখের পলক ফেলে না? কোনটি জন্ম নিয়েও চেষ্টা করে না? কার হৃদয় নেই? আর কোনটি বেগে বৃদ্ধি পায়?

Verse 62

युधिछिर उवाच मत्स्य: सुप्तो न निमिषत्यण्डं जातं न चोपति । अश्मनो हृदयं नास्ति नदी वेगेन वर्धते,युधिष्ठिर बोले--मछली सोनेपर भी आँखें नहीं मूँदती, अण्डा उत्पन्न होकर भी चेष्टा नहीं करता, पत्थरमें हृदय नहीं है और नदी वेगसे बढ़ती है

যুধিষ্ঠির বললেন—মাছ ঘুমিয়েও পলক ফেলে না; ডিম জন্ম নিয়েও চেষ্টা করে না। পাথরের হৃদয় নেই; আর নদী স্রোতের বেগে বৃদ্ধি পায়।

Verse 63

यक्ष उवाच किंस्वित्‌ प्रवसतो मित्र किंस्विन्मित्रं गृहे सतः । आतुरस्य च किं मित्र किंस्विन्मित्रं मरिष्यत:,यक्षने पूछा--प्रवासी (परदेशके यात्री)-का मित्र कौन है? गृहवासी (गृहस्थ)-का मित्र कौन है? रोगीका मित्र कौन है? और मृत्युके समीप पहुँचे हुए पुरुषका मित्र कौन है?

যক্ষ জিজ্ঞেস করল—প্রবাসীর বন্ধু কে? গৃহবাসীর বন্ধু কে? রোগীর বন্ধু কে? আর মৃত্যুর নিকটে পৌঁছানো মানুষের বন্ধু কে?

Verse 64

युधिछिर उवाच सार्थ: प्रवसतो मित्र भार्या मित्र गृहे सतः । आतुरस्य भिषड्मित्र दानं मित्र मरिष्यत:,युधिष्ठिर बोले--सहयात्रियोंका समुदाय अथवा साथमें यात्रा करनेवाला साथी ही प्रवासीका मित्र है, पत्नी गृहवासीका मित्र है, वैद्य रोगीका मित्र है और दान मुमूर्षु (अर्थात्‌ मरनेवाले) मनुष्यका मित्र है

যুধিষ্ঠির বললেন—বিদেশযাত্রীর বন্ধু হলো কাফেলা ও সহযাত্রীগণ; গৃহবাসীর বন্ধু স্ত্রী; রোগীর বন্ধু চিকিৎসক; আর মৃত্যুপথযাত্রীর প্রকৃত বন্ধু দান—যে পুণ্যদান পরলোকে সহায় হয়।

Verse 65

यक्ष उवाच को35तिथि: सर्वभूतानां किंस्विद्‌ धर्म सनातनम्‌ | अमृतं किंस्विद्‌ राजेन्द्र किंस्वित्‌ सर्वमिदं जगत्‌,यक्षने पूछा--राजेन्द्र! समस्त प्राणियोंका अतिथि कौन है? सनातन धर्म कया है? अमृत क्या है? और यह सारा जगत्‌ क्या है?

যক্ষ জিজ্ঞাসা করল—হে রাজেন্দ্র! সকল প্রাণীর অতিথি কে? সনাতন ধর্ম কী? ‘অমৃত’ কাকে বলে? আর সত্যতই এই সমগ্র জগৎ কী?

Verse 66

भवतां दिव्यवाचस्तु ता भवन्तु कथं मृषा । “साधारण मनुष्योंकी बातें तथा उनकी प्रतिज्ञाएँ तो झूठी निकल जाती हैं; परंतु तुमलोगोंके सम्बन्धमें जो दिव्य वाणियाँ हुई थीं, वे कैसे मिथ्या हो सकती हैं?,युधिछिर उवाच अतिथि: सर्वभूतानामग्नि: सोमो गवामृतम्‌ | सनातनोअमृतो धर्मो वायु: सर्वमिदं जगत्‌ युधिष्ठिर बोले--अग्नि समस्त प्राणियोंका अतिथि है, गौका दूध अमृत है, अविनाशी नित्य धर्म ही सनातन धर्म है और वायु यह सारा जगत्‌ है

যুধিষ্ঠির বললেন—অগ্নি সকল প্রাণীর অতিথি; গাভীর দুধই অমৃত; অবিনশ্বর ও নিত্য ধর্মই সনাতন ধর্ম; আর বায়ুই এই সমগ্র জগৎ—সর্বত্র ব্যাপ্ত।

Verse 67

यक्ष उवाच किंस्विदेको विचरते जात: को जायते पुन: । किंस्विद्धिमस्य भैषज्यं किंस्विदावपनं महत्‌

যক্ষ জিজ্ঞাসা করল—কী একা একা বিচরণ করে? কে জন্ম নিয়ে বারবার পুনর্জন্ম লাভ করে? এই অবস্থার প্রতিকার কী? আর মহৎ ‘আবপন’—সর্বোচ্চ বপন/বীজরোপণ—কী?

Verse 68

यक्षने पूछा--अकेला कौन विचरता है? एक बार उत्पन्न होकर पुन: कौन उत्पन्न होता है? शीतकी ओषधि क्या है? और महान्‌ आवपन (क्षेत्र) क्या है? ।। युधिछिर उवाच सूर्य एको विचरते चन्द्रमा जायते पुनः । अग्निर्हिमस्य भैषज्यं भूमिरावपनं महत्‌,युधिष्ठिर बोले--सूर्य अकेला विचरता है, चन्द्रमा एक बार जन्म लेकर पुनः जन्म लेता है, अग्नि शीतकी ओषधि है और पृथ्वी बड़ा भारी आवपन है

যুধিষ্ঠির বললেন—সূর্য একাই বিচরণ করে; চন্দ্র জন্ম নিয়ে বারবার পুনর্জন্ম লাভ করে; অগ্নি শীতের ঔষধ; আর পৃথিবীই মহৎ আবপন—অর্থাৎ মহাবিস্তৃত কর্মক্ষেত্র।

Verse 69

यक्ष उवाच किंस्विदेकपदं धर्म्य किंस्विदेकपर्द यश: । किंस्विदेकपदं स्वर्ग्य किंस्विदेकप्दं सुखम्‌,यक्षने पूछा--धर्मका मुख्य स्थान क्‍या है? यशका मुख्य स्थान क्या है? स्वर्गका मुख्य स्थान क्‍या है? और सुखका मुख्य स्थान क्‍या है?

যক্ষ বলল—ধর্মের একমাত্র প্রধান ভিত্তি কী? যশের একমাত্র ভিত্তি কী? স্বর্গলাভের একমাত্র ভিত্তি কী? আর সুখের একমাত্র ভিত্তি কী?

Verse 70

युधिछिर उवाच दाक्ष्यमेकपद धर्म्य दानमेकपर्द यश: । सत्यमेकपदं स्वर्ग्य शीलमेकपदं सुखम्‌,युधिछिर बोले--धर्मका मुख्य स्थान दक्षता है, यशका मुख्य स्थान दान है, स्वर्गका मुख्य स्थान सत्य है और सुखका मुख्य स्थान शील है

যুধিষ্ঠির বললেন—ধর্মের প্রধান ভিত্তি দক্ষতা; যশের প্রধান ভিত্তি দান। স্বর্গের প্রধান ভিত্তি সত্য, আর সুখের প্রধান ভিত্তি শীল (সদাচার)।

Verse 71

यक्ष उवाच किंस्विदात्मा मनुष्यस्य किंस्विद्‌ दैवकृत: सखा । उपजीवनं किंस्विदस्य किंस्विदस्य परायणम्‌

যক্ষ বলল—মানুষের নিজের আত্মা আসলে কী? ভাগ্যদত্ত সঙ্গী কে? তার জীবিকার উপায় কী? আর তার পরম আশ্রয়, শেষ অবলম্বন কী?

Verse 72

यक्षने पूछा--मनुष्यकी आत्मा क्‍या है? इसका दैवकृत सखा कौन है? इसका उपजीवन (जीवनका सहारा) क्या है? और इसका परम आश्रय क्या है? ।। युधिछिर उवाच पुत्र आत्मा मनुष्यस्य भार्या दैवकृतः सखा | उपजीवनं च पर्जन्यो दानमस्य परायणम्‌,युधिष्ठिर बोले--पुत्र मनुष्यकी आत्मा है, स्त्री इसकी दैवकृत सहचरी है, मेघ उपजीवन है और दान इसका परम आश्रय है

যুধিষ্ঠির বললেন—পুত্রই মানুষের আত্মা; স্ত্রী তার ভাগ্যদত্ত সঙ্গিনী। পর্জন্য (বৃষ্টি-দাতা মেঘ) তার জীবিকার অবলম্বন, আর দানই তার পরম আশ্রয়।

Verse 73

यक्ष उवाच धन्यानामुत्तमं किंस्विद्‌ धनानां स्यात्‌ किमुत्तमम्‌ | लाभानामुत्तमं कि स्यात्‌ सुखानां स्यात्‌ किमुत्तमम्‌,यक्षने पूछा--धन्यवादके योग्य पुरुषोंमें उत्तम गुण क्या है? धनोंमें उत्तम धन क्या है? लाभोंमें प्रधान लाभ क्‍या है? और सुखोंमें उत्तम सुख क्या है?

যক্ষ বলল—ধন্য (প্রশংসনীয়) পুরুষদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ কী? ধনসমূহের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ধন কোনটি? লাভগুলির মধ্যে প্রধান লাভ কী? আর সুখগুলির মধ্যে শ্রেষ্ঠ সুখ কী?

Verse 74

युधिछिर उवाच धन्यानामुत्तमं दाक्ष्यं धनानामुत्तमं श्रुतम्‌ । लाभानां श्रेय आरोग्यं सुखानां तुष्टिरुत्तमा,युधिष्ठिर बोले--धन्य पुरुषोंमें दक्षता ही उत्तम गुण है, धनोंमें शास्त्रज्ञान प्रधान है, लाभोंमें आरोग्य श्रेष्ठ है और सुखोंमें संतोष ही उत्तम सुख है

যুধিষ্ঠির বললেন—ধন্যজনদের মধ্যে দক্ষতাই শ্রেষ্ঠ; ধনের মধ্যে শাস্ত্রজ্ঞানই প্রধান; লাভের মধ্যে আরোগ্যই শ্রেয়, আর সুখের মধ্যে সন্তোষই সর্বোত্তম।

Verse 75

यक्ष उवाच कश्च धर्म: परो लोके कश्न धर्म: सदाफल: । कि नयम्य न शोचन्ति कैश्नल संधिर्न जीर्यते,यक्षने पूछा--लोकमें श्रेष्ठ धर्म क्या है? नित्य फलवाला धर्म क्‍या है? किसको वशमें रखनेसे मनुष्य शोक नहीं करते? और किनके साथ की हुई मित्रता नष्ट नहीं होती?

যক্ষ জিজ্ঞাসা করল—এই জগতে সর্বোচ্চ ধর্ম কী? কোন ধর্ম সদা ফলদায়ী? কাকে সংযত করলে মানুষ শোকমুক্ত হয়? আর কার সঙ্গে করা মৈত্রী কখনও ক্ষয় হয় না?

Verse 76

युधिछिर उवाच आनुशंस्यं परो धर्मस्त्रयी धर्म: सदाफल: । मनो यम्य न शोचन्ति संधि: सदभिर्न जीर्यते,युधिष्ठिर बोले--लोकमें दया श्रेष्ठ धर्म है, वेदोक्त धर्म नित्य फलवाला है, मनको वशभमें रखनेसे मनुष्य शोक नहीं करते और सत्पुरुषोंके साथ की हुई मित्रता नष्ट नहीं होती

যুধিষ্ঠির বললেন—দয়াই সর্বোচ্চ ধর্ম; বেদোক্ত (ত্রয়ী) ধর্ম সদা ফলদায়ী; মনকে সংযত করলে মানুষ শোক করে না; আর সজ্জনদের সঙ্গে করা মৈত্রী ক্ষয় হয় না।

Verse 77

यक्ष उवाच कि नु हित्वा प्रियो भवति कि नु हित्वा न शोचति । कि नु हित्वार्थवान्‌ भवति कि नु हित्वा सुखी भवेत्‌,यक्षने पूछा--किस वस्तुको त्यागकर मनुष्य प्रिय होता है? किसको त्यागकर शोक नहीं करता? किसको त्यागकर वह अर्थवान्‌ होता है? और किसको त्यागकर सुखी होता है?

যক্ষ জিজ্ঞাসা করল—কী ত্যাগ করলে মানুষ প্রিয় হয়? কী ত্যাগ করলে শোক থাকে না? কী ত্যাগ করলে সে সত্যিই সমৃদ্ধ হয়? আর কী ত্যাগ করলে সুখী হয়?

Verse 78

युधिछिर उवाच मान हित्वा प्रियो भवति क्रोधं हित्वा न शोचति । काम हित्वार्थवान्‌ भवति लोभ हित्वा सुखी भवेत्‌,युधिष्ठिर बोले--मानको त्याग देनेपर मनुष्य प्रिय होता है, क्रोधको त्यागकर शोक नहीं करता, कामको त्यागकर वह अर्थवान्‌ होता है और लोभको त्यागकर सुखी होता है

যুধিষ্ঠির বললেন—অহংকার ত্যাগ করলে মানুষ প্রিয় হয়; ক্রোধ ত্যাগ করলে শোক থাকে না; কাম ত্যাগ করলে সে সমৃদ্ধ হয়; আর লোভ ত্যাগ করলে সুখী হয়।

Verse 79

यक्ष उवाच किमर्थ ब्राह्मणे दानं किमर्थ नटनर्तके । किमर्थ चैव भृत्येषु किमर्थ चैव राजसु,यक्षने पूछा--ब्राह्मणको किसलिये दान दिया जाता है? नट और नर्तकोंको क्‍यों दान देते हैं? सेवकोंको दान देनेका क्‍या प्रयोजन है? और राजाओंको क्‍यों दान दिया जाता है?

যক্ষ বলল—ব্রাহ্মণকে দান কোন উদ্দেশ্যে দেওয়া হয়? নট ও নর্তকদের কেন দান দেওয়া হয়? ভৃত্যদের কেন দেওয়া হয়? আর রাজাদের কেন দান দেওয়া হয়?

Verse 80

युधिछिर उवाच धर्मार्थ ब्राह्मणे दानं यशो<र्थ नटनर्तके । भृत्येषु भरणार्थ वै भयार्थ चैव राजसु,युधिष्ठिर बोले--ब्राह्मणको धर्मके लिये दान दिया जाता है, नट-नर्तकोंको यशके लिये दान (धन) देते हैं, सेवकोंको उनके भरण-पोषणके लिये दान (वेतन) दिया जाता है और राजाओंको भयके कारण दान (कर) देते हैं

যুধিষ্ঠির বললেন—ব্রাহ্মণকে দান দেওয়া হয় ধর্মের জন্য; নট-নর্তকদের দেওয়া হয় যশ ও লোকসম্মানের জন্য; ভৃত্যদের দেওয়া হয় তাদের ভরণ-পোষণের জন্য; আর রাজাদের দেওয়া হয় ভয়ের কারণে—কর বা উপঢৌকনরূপে।

Verse 81

यक्ष उवाच केनस्विदावृतो लोक: केनस्विन्न प्रकाशते । केन त्यजति मित्राणि केन स्वर्ग न गच्छति,यक्षने पूछा--जगत्‌ किस वस्तुसे ढका हुआ है? किसके कारण वह प्रकाशित नहीं होता? मनुष्य मित्रोंको किसलिये त्याग देता है? और स्वर्गमें किस कारण नहीं जाता?

যক্ষ বলল—জগৎ কোন বস্তুতে আচ্ছন্ন? কোন কারণে তা প্রকাশিত হয় না? মানুষ কোন কারণে বন্ধুদের ত্যাগ করে? আর কোন কারণে স্বর্গে গমন করে না?

Verse 82

युधिछिर उवाच अज्ञानेनावृतो लोकस्तमसा न प्रकाशते । लोभात्‌ त्यजति मित्राणि संगात्‌ स्वर्ग न गच्छति,युधिष्ठिर बोले--जगत्‌ अज्ञानसे ढका हुआ है, तमोगुणके कारण वह प्रकाशित नहीं होता, लोभके कारण मनुष्य मित्रोंको त्याग देता है और आसक्तिके कारण स्वर्गमें नहीं जाता

যুধিষ্ঠির বললেন—জগৎ অজ্ঞানে আচ্ছন্ন; তমসের কারণে তা প্রকাশিত হয় না; লোভে মানুষ বন্ধুদের ত্যাগ করে; আর আসক্তির কারণে স্বর্গে গমন করে না।

Verse 83

यक्ष उवाच मृतः कथं स्यात्‌ पुरुष: कथ॑ राष्ट्र मृतं भवेत्‌ । श्राद्ध मृतं कथं वा स्यात्‌ कथं यज्ञों मृतो भवेत्‌

যক্ষ বলল—কীভাবে একজন মানুষকে ‘মৃত’ বলা হয়? কীভাবে একটি রাজ্যকে ‘মৃত’ বলা যায়? কখন শ্রাদ্ধ ‘মৃত’ গণ্য হয়? আর কখন যজ্ঞকে ‘মৃত’ বলা হয়?

Verse 84

यक्षने पूछा--पुरुष किस प्रकार मरा हुआ कहा जाता है? राष्ट्र किस प्रकार मर जाता है? श्राद्ध किस प्रकार मृत हो जाता है? और यज्ञ कैसे नष्ट हो जाता है? ।। युधिछिर उवाच मृतो दरिद्र: पुरुषो मृतं राष्ट्रमराजकम्‌ मृतमश्रोत्रियं श्राद्ध मृतो यज्ञस्त्वदक्षिण:

যক্ষ জিজ্ঞাসা করল— কোন অবস্থায় পুরুষকে ‘মৃত’ বলা হয়? রাষ্ট্র কীভাবে ‘মরে’? শ্রাদ্ধ কীভাবে ‘মৃত’ হয়? আর যজ্ঞ কীভাবে নষ্ট হয়? ॥ যুধিষ্ঠির বললেন— দারিদ্র্যে পতিত মানুষকে মৃত বলা হয়; রাজাহীন রাজ্য মৃত; অশ্রোত্রিয়কে অর্পিত শ্রাদ্ধ মৃত; আর দক্ষিণাবিহীন যজ্ঞ নষ্ট (মৃত) হয়॥

Verse 85

युधिष्ठिर बोले--दरिद्र पुरुष मरा हुआ है यानी मरे हुएके समान है, बिना राजाका राज्य मर जाता है यानी नष्ट हो जाता है, श्रोत्रिय ब्राह्मणके बिना श्राद्ध मृत हो जाता है और बिना दक्षिणाका यज्ञ नष्ट हो जाता है ।। यक्ष उवाच का दिक्‌ किमुदकं प्रोक्त किमन्नं किं च वै विषम्‌ | श्राद्धस्य कालमाख्याहि तत: पिब हरस्व च,यक्षने पूछा--दिशा क्‍या है? जल क्या है? अन्न क्या है? विष क्‍या है? और श्राद्धका समय क्या है? यह बताओ। इसके बाद जल पीओ और ले भी जाओ

যক্ষ বলল— ‘দিক্’ কী? ‘জল’ কী বলা হয়? ‘অন্ন’ কী, আর ‘বিষ’ই বা কী? শ্রাদ্ধের সময়ও বলো; তারপর জল পান করো, এবং নিয়ে যাও॥

Verse 86

युधिछिर उवाच सन्‍्तो दिग्‌ जलमाकाशं गौरन्न प्रार्थना विषम्‌ | श्राद्धस्य ब्राह्मण: काल: कथं वा यक्ष मन्यसे,युधिष्ठिर बोले--सत्पुरुष दिशा हैं, आकाश जल है, पृथ्वी अन्न है, प्रार्थना (कामना) विष है और ब्राह्मण ही श्राद्धका समय है अथवा यक्ष! इस विषयमें तुम्हारी क्या मान्यता है?

যুধিষ্ঠির বললেন— সজ্জনরাই দিক্; আকাশই জল; পৃথিবীই অন্ন; প্রার্থনা/লোভই বিষ; আর শ্রাদ্ধের ক্ষেত্রে ব্রাহ্মণই কাল (নির্ণায়ক সময়)। হে যক্ষ, তুমি এ বিষয়ে কী মনে কর?॥

Verse 87

यक्ष उवाच तप: कि लक्षणं प्रोक्तं को दमश्न प्रकीर्तित: । क्षमा च का परा प्रोक्ता का च ह्वी: परिकीर्तिता,यक्षने पूछा--तपका क्या लक्षण बताया गया है? दम किसे कहा गया है? उत्तम क्षमा क्या बतायी गयी है? और लज्जा किसको कहा गया है?

যক্ষ বলল— তপস্যার লক্ষণ কী বলা হয়েছে? ‘দম’ কাকে বলে? পরম ক্ষমা কী? আর ‘হ্রী’ (লজ্জা/সংকোচ) কাকে বলা হয়?॥

Verse 88

युधिछिर उवाच तप: स्वधर्मवर्तित्वं मनसो दमनं दम: । क्षमा द्न्द्सहिष्णुत्वं ह्वीरकार्यनिवर्तनम्‌,युधिष्ठिर बोले--अपने धर्ममें तत्पर रहना तप है, मनके दमनका ही नाम दम है, सर्दी- गरमी आदि द्वन्दोंको सहन करना क्षमा है तथा न करने योग्य कामसे दूर रहना लज्जा है

যুধিষ্ঠির বললেন— স্বধর্মে অবিচল থাকা তপ; মনের সংযমই দম; শীত-উষ্ণ প্রভৃতি দ্বন্দ্ব সহ্য করাই ক্ষমা; আর অকার্য থেকে সরে থাকাই হ্রী (লজ্জা/সংকোচ)॥

Verse 89

यक्ष उवाच किं ज्ञानं प्रोच्यते राजन्‌ कः शमश्रन प्रकीर्तित: | दया च का परा प्रोक्ता कि चार्जवमुदाहतम्‌,यक्षने पूछा--राजन्‌! ज्ञान किसे कहते हैं? शम क्या कहलाता है? उत्तम दया किसका नाम है? और आर्जव (सरलता) किसे कहते हैं?

যক্ষ বলল— হে রাজন! জ্ঞান কাকে বলে? শম (আত্মসংযম) কী নামে খ্যাত? পরম দয়া কোনটি বলা হয়েছে? আর আর্জব (সরলতা) কাকে বলা হয়?

Verse 90

युधिछिर उवाच ज्ञान तत्त्वार्थसम्बोध: शमक्षित्तप्रशान्तता | दया सर्वसुखैषित्वमार्जवं समचित्तता,युधिष्ठिर बोले--परमात्मतत्त्वका यथार्थ बोध ही ज्ञान है, चित्तकी शान्ति ही शम है, सबके सुखकी इच्छा रखना ही उत्तम दया है और समचित्त होना ही आर्जव (सरलता) है

যুধিষ্ঠির বললেন— তত্ত্ব ও অর্থের যথার্থ বোধই জ্ঞান; চিত্তের প্রশান্তিই শম; সকল প্রাণীর সুখ কামনাই পরম দয়া; আর সর্বাবস্থায় সমচিত্ততাই আর্জব (সরলতা/নির্মলতা)।

Verse 91

यक्ष उवाच कः शत्रुर्दुर्जय: पुंसां कश्न व्याधिरनन्तक: । कीदृशश्च स्मृतः साधुरसाधु: कीदृश: स्मृत:,यक्षने पूछा--मनुष्योंका दुर्जय शत्रु कौन है? अनन्त व्याधि कया है? साधु कौन माना जाता है? और असाधु किसे कहते हैं?

যক্ষ বলল— মানুষের সেই কোন শত্রু, যাকে জয় করা অতি দুরূহ? কোন ব্যাধি অন্তহীন? কেমন ব্যক্তি ‘সাধু’ বলে স্মরণীয়, আর কেমন ব্যক্তি ‘অসাধু’ বলে স্মরণীয়?

Verse 92

युधिछिर उवाच क्रोध: सुदुर्जय: शत्रुलोंभो व्याधिरनन्तक: । सर्वभूतहित: साधुरसाधुर्निर्देय: स्मृत:,युधिष्ठिर बोले--क्रोध दुर्जय शत्रु है, लोभ अनन्त व्याधि है तथा जो समस्त प्राणियोंका हित करनेवाला हो, वही साधु है और निर्दयी पुरुषको ही असाधु माना गया है

যুধিষ্ঠির বললেন— ক্রোধই অতি দুর্জয় শত্রু; লোভই অন্তহীন ব্যাধি; যে সর্বভূতের হিত সাধন করে সে-ই সাধু; আর নির্দয় ব্যক্তি অসাধু বলে স্মৃত।

Verse 93

यक्ष उवाच को मोह: प्रोच्यते राजन्‌ कश्च मान: प्रकीर्तित: । किमालस्यं च विज्ञेयं कक्ष शोक: प्रकीर्तितः:,यक्षने पूछा--राजन्‌! मोह किसे कहते हैं? मान क्या कहलाता है? आलस्य किसे जानना चाहिये? और शोक किसे कहते हैं?

যক্ষ বলল— হে রাজন! মোহ কাকে বলে? মান (অহংকার) কী নামে খ্যাত? আলস্য কাকে বুঝতে হবে? আর শোক কাকে বলা হয়?

Verse 94

युधिछिर उवाच मोहो हि धर्ममूढत्वं मानस्त्वात्माभिमानिता । धर्मनिष्क्रियता55लस्यं शोकस्त्वज्ञानमुच्यते,युधिष्ठिर बोले--धर्ममूढ़ता ही मोह है, आत्माभिमान ही मान है, धर्मका पालन न करना आलस्य है और अज्ञानको ही शोक कहते हैं

যুধিষ্ঠির বললেন—ধর্মসম্বন্ধে মোহাচ্ছন্ন মূঢ়তাই মোহ, আত্মাভিমানই মান; ধর্মানুসারে কর্ম না করাই আলস্য, আর যাকে লোক শোক বলে তা আসলে অজ্ঞান।

Verse 95

यक्ष उवाच कि स्थैर्यमृषिश्रि: प्रोक्ते कि च धैर्यमुदाह्तम्‌ । स्‍्नान॑ च किं पर प्रोक्तं दानं च किमिहोच्यते,यक्षने पूछा--ऋषियोंने स्थिरता किसे कहा है? धैर्य क्या कहलाता है? परम स्नान किसे कहते हैं? और दान किसका नाम है?

যক্ষ জিজ্ঞেস করল—ঋষিরা স্থৈর্য কাকে বলেছেন? ধৈর্য কী বলে ঘোষিত? পরম ‘স্নান’ (শুদ্ধি) কী? আর এখানে ‘দান’ কাকে বলা হয়?

Verse 96

युधिछिर उवाच स्वधर्मे स्थिरता स्थैर्य धेर्यमिन्द्रियनिग्रह: । स्नान मनोमलत्यागो दान वै भूतरक्षणम्‌

যুধিষ্ঠির বললেন—নিজ ধর্মে স্থির থাকা-ই স্থৈর্য; ইন্দ্রিয়সংযমই ধৈর্য; মনের মল ত্যাগ করাই পরম স্নান; আর জীবের রক্ষা করাই দান।

Verse 97

युधिष्ठिर बोले--अपने धर्ममें स्थिर रहना ही स्थिरता है, इन्द्रियनिग्रह धैर्य है, मानसिक मलोंका त्याग करना परम स्नान है और प्राणियोंकी रक्षा करना ही दान है ।। यक्ष उवाच कः: पण्डित:ः पुमान्‌ ज्ञेयो नास्तिक: कश्न उच्यते । को मूर्ख: कश्न काम: स्यात्‌ को मत्सर इति स्मृतः,यक्षने पूछा--किस पुरुषको पण्डित समझना चाहिये, नास्तिक कौन कहलाता है? मूर्ख कौन है? काम क्या है? तथा मत्सर किसे कहते हैं?

যক্ষ জিজ্ঞেস করল—কোন পুরুষকে পণ্ডিত বলে জানতে হবে? নাস্তিক কাকে বলে? মূর্খ কে? কাম কী? আর ‘মৎসর’ (ঈর্ষা) কাকে বলা হয়?

Verse 98

युधिछ्िर उवाच धर्मज्ञ: पण्डितो ज्ञेयो नास्तिको मूर्ख उच्यते । काम: संसारहेतुश्न हृत्तापो मत्सर: स्मृत:,युधिष्ठिर बोले--धर्मज्ञको पण्डित समझना चाहिये, मूर्ख नास्तिक कहलाता है और नास्तिक मूर्ख है तथा जो जन्म-मरणरूप संसारका कारण है, वह वासना काम है और हृदयकी जलन ही मत्सर है

যুধিষ্ঠির বললেন—ধর্মজ্ঞ ব্যক্তিই পণ্ডিত বলে গণ্য; নাস্তিককে মূর্খ বলা হয়। কামই সংসার (জন্ম-মৃত্যু) বন্ধনের কারণ, আর হৃদয়ের দহনই ‘মৎসর’ বলে স্মৃত।

Verse 99

यक्ष उवाच को5हड्कार इति प्रोक्त: कश्न दम्भ: प्रकीर्तित: । कि तद्‌ दैवं परं प्रोक्त कि तत्‌ पैशुन्यमुच्यते,यक्षने पूछा--अहंकार किसे कहते हैं? दम्भ क्या कहलाता है? जिसे परम दैव कहते हैं, वह क्या है? और पैशुन्य किसका नाम है?

যক্ষ বলল—অহংকার কাকে বলে? দম্ভ বা ভণ্ডামি কী? পরম ‘দৈব’ বলে যাকে বলা হয়, তা কী? আর ‘পৈশুন্য’—দুরভিসন্ধিমূলক পরনিন্দা—কাকে বলে?

Verse 100

युधिछिर उवाच महाज्ञानमहड्कारो दम्भो धर्मो ध्वजोच्छूय: । दैवं दानफल प्रोक्तं पैशुन्यं परदूषणम्‌,युधिष्ठिर बोले--महान्‌ अज्ञान अहंकार है, अपनेको झूठ-मूठ बड़ा धर्मात्मा प्रसिद्ध करना दम्भ है, दानका फल दैव कहलाता है और दूसरोंको दोष लगाना पैशुन्य (चुगली) है

যুধিষ্ঠির বললেন—মহা অজ্ঞানই অহংকার। নিজেকে অতিধার্মিক বলে জাহির করাই দম্ভ। দানের ফলকে ‘দৈব’ বলা হয়। আর অন্যের দোষ খোঁজা ও অপবাদ দেওয়াই পৈশুন্য।

Verse 101

यक्ष उवाच धर्मश्चार्थक्ष॒ कामश्ष॒ परस्परविरोधिन: । एषां नित्यविरुद्धानां कथमेकत्र संगम:,यक्षने पूछा--धर्म, अर्थ और काम--ये सब परस्पर विरोधी हैं। इन नित्य-विरुद्ध पुरुषार्थोका एक स्थानपर कैसे संयोग हो सकता है?

যক্ষ বলল—ধর্ম, অর্থ ও কাম পরস্পরবিরোধী। যেগুলি চিরকাল সংঘাতে থাকে, তাদের একত্র মিলন এক জীবনে কীভাবে সম্ভব?

Verse 102

युधिषछ्िर उवाच यदा धर्मश्न भार्या च परस्परवशानुगौ । तदा धर्मार्थकामानां त्रयाणामपि संगम:,युधिछ्िर बोले--जब धर्म और भार्या-ये दोनों परस्पर अविरोधी होकर मनुष्यके वशमें हो जाते हैं, उस समय धर्म, अर्थ और काम--इन तीनों परस्पर विरोधियोंका भी एक साथ रहना सहज हो जाता है-

যুধিষ্ঠির বললেন—যখন ধর্ম ও স্ত্রী পরস্পর বিরোধ না করে মানুষের বশে থাকে, তখন ধর্ম-অর্থ-কাম—এই তিনটিরও একত্র মিলন ঘটে।

Verse 103

यक्ष उवाच अक्षयो नरक: केन प्राप्यते भरतर्षभ । एतनमे मृच्छत: प्रश्ननं तच्छीघ्र॑ वक्तुमहसि,यक्षने पूछा--भरतश्रेष्ठ) अक्षय नरक किस पुरुषको प्राप्त होता है? मेरे इस प्रश्नका शीघ्र ही उत्तर दो

যক্ষ বলল—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! কোন আচরণে মানুষ অক্ষয় নরক লাভ করে? আমার এই প্রশ্নের উত্তর শীঘ্রই দাও।

Verse 104

युधिछिर उवाच ब्राह्मणं स्‍्वयमाहूय याचमानमकिज्चनम्‌ । पश्चान्नास्तीति यो ब्रूयात्‌ सो$क्षयं नरक॑ व्रजेत्‌,युधिष्ठिर बोले--जो पुरुष भिक्षा माँगनेवाले किसी अकिज्चन ब्राह्मणको स्वयं बुलाकर फिर उसे “नाहीं' कर देता है, वह अक्षय नरकमें जाता है

যুধিষ্ঠির বললেন—যে ব্যক্তি ভিক্ষাপ্রার্থী একেবারে নিঃস্ব ব্রাহ্মণকে নিজে ডেকে পরে তাকে বলে, “কিছু নেই”, সে অনন্ত নরকে গমন করে।

Verse 105

वेदेषु धर्मशास्त्रेषु मिथ्या यो वै द्विजातिषु । देवेषु पितृधर्मेषु सो$क्षयं नरकं॑ व्रजेत्‌,जो पुरुष वेद, धर्मशास्त्र, ब्राह्मण, देवता और पितृधर्मोमें मिथ्याबुद्धि रखता है, वह अक्षय नरकको प्राप्त होता है

যুধিষ্ঠির বললেন—যে ব্যক্তি বেদ ও ধর্মশাস্ত্র, দ্বিজ (ব্রাহ্মণ), দেবতা এবং পিতৃধর্ম (শ্রাদ্ধাদি) সম্বন্ধে মিথ্যা বা অবজ্ঞাপূর্ণ বুদ্ধি পোষণ করে, সে অবিনশ্বর নরকে গমন করে।

Verse 106

आश्रित्य यं वयं नाथ दुःखान्येतानि सेहिम । “वे ही महाबली अर्जुन आज मृत्युके अधीन कैसे हो गये? ये वे ही धनंजय मेरी आशालताको छिजन्न-भिन्न करके धरतीपर पड़े हैं; जिन्हें अपना रक्षक बनाकर और जिनका ही भारी भरोसा करके हमलोग ये सारे दुःख सहते आये हैं,विद्यमाने धने लोभाद्‌ दानभोगविवर्जित: । पश्चान्नास्तीति यो ब्रूयात्‌ सो$क्षयं नरकं॑ व्रजेत्‌ धन पास रहते हुए भी जो लोभवश दान और भोगसे रहित है तथा (माँगनेवाले ब्राह्मणादिको एवं न्याययुक्त भोगके लिये स्त्री-पुत्रादिको) पीछेसे यह कह देता है कि मेरे पास कुछ नहीं है, वह अक्षय नरकमें जाता है

বৈশম্পায়ন বললেন—হে নাথ! যাঁর আশ্রয়ে আমরা এই দুঃখ সহ্য করেছি। কিন্তু যার ধন থাকা সত্ত্বেও লোভবশত দানও করে না, ন্যায়সঙ্গত ভোগও করে না, এবং পরে প্রার্থনাকারী বা অধিকারপ্রাপ্তদের বলে, “আমার কাছে কিছু নেই”, সে অবিনশ্বর নরকে গমন করে।

Verse 107

यक्ष उवाच राजन्‌ कुलेन वृत्तेन स्वाध्यायेन श्रुतेन वा । ब्राह्म॒ण्यं केन भवति प्रब्रूहीतत्‌ सुनिश्चितम्‌,यक्षने पूछा--राजन्‌! कुल, आचार, स्वाध्याय और शास्त्रश्रवण--इनमेंसे किसके द्वारा ब्राह्मणत्व सिद्ध होता है? यह बात निश्चय करके बताओ

যক্ষ জিজ্ঞেস করল—হে রাজন! কুল, আচরণ, স্বাধ্যায়, না কি শ্রবণজনিত বিদ্যা—এর কোনটির দ্বারা ব্রাহ্মণ্য প্রতিষ্ঠিত হয়? নিশ্চিত করে বলুন।

Verse 108

युधिछिर उवाच शृणु यक्ष कुलं तात न स्वाध्यायो न च श्रुतम्‌ । कारणं हि द्विजत्वे च वृत्तमेव न संशय:

যুধিষ্ঠির বললেন—শোনো, হে যক্ষ, প্রিয়জন; না কুল, না স্বাধ্যায়, না কেবল শ্রুত—এগুলোই কারণ নয়। দ্বিজত্বের প্রকৃত ভিত্তি একমাত্র আচরণ—এতে সন্দেহ নেই।

Verse 109

युधिष्ठिर बोले--तात यक्ष! सुनो न तो कुल ब्राह्मणत्वमें कारण है न स्वाध्याय और न शास्त्रश्रवण। ब्राह्मणत्वका हेतु आचार ही है, इसमें संशय नहीं है ।। वृत्तं यत्नेन संरक्ष्यं ब्राह्मणेन विशेषत: । अक्षीणवृत्तो न क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हत:,इसलिये प्रयत्नपूर्वक सदाचारकी ही रक्षा करनी चाहिये। ब्राह्मणको तो उसपर विशेषरूपसे दृष्टि रखनी जरूरी है; क्योंकि जिसका सदाचार अक्षुण्ण है, उसका ब्राह्मणत्व भी बना हुआ है और जिसका आचार नष्ट हो गया, वह तो स्वयं भी नष्ट हो गया

যুধিষ্ঠির বললেন—হে যক্ষ, শোনো। কুলে জন্ম, স্বাধ্যায়, কিংবা শাস্ত্রশ্রবণ—এগুলির কোনোটিই ব্রাহ্মণ্যত্বের প্রকৃত কারণ নয়। ব্রাহ্মণ্যত্বের ভিত্তি একমাত্র আচার—এ বিষয়ে সন্দেহ নেই। অতএব সদাচারকে যত্নসহকারে রক্ষা করা উচিত; বিশেষত ব্রাহ্মণের তা সর্বদা সতর্কভাবে পালন করা কর্তব্য। যার আচার অক্ষুণ্ণ, সে ক্ষয়প্রাপ্ত হয় না; কিন্তু যার আচার নষ্ট, সে সর্বতোভাবে নষ্ট।

Verse 110

पठका: पाठकाश्ैव ये चान्ये शास्त्रचिन्तका: । सर्वे व्यसनिनो मूर्खा यः क्रियावान्‌ स पण्डित:,पढ़नेवाले, पढ़ानेवाले तथा शास्त्रका विचार करनेवाले--ये सब तो व्यसनी और मूर्ख ही हैं। पण्डित तो वही है, जो अपने (शास्त्रोक्त) कर्तव्यका पालन करता है

যারা কেবল পড়ে, যারা পড়ায়, আর যারা শুধু শাস্ত্র নিয়ে তর্ক-বিচার করে—কর্মে না নামলে তারা সকলেই আসক্ত ও মূর্খ। প্রকৃত পণ্ডিত সেই, যে শাস্ত্রবিধি অনুযায়ী কর্তব্যকর্মে নিবিষ্ট।

Verse 111

चतुर्वेदो<पि दुर्वत्त: स शूद्रादतिरिच्यते । योडग्निहोत्रपरो दान्तः स ब्राह्मण इति स्मृत:

চার বেদে পারদর্শী হলেও যদি কারও আচরণ দুষিত হয়, তবে তাকে শূদ্রের চেয়েও অধম গণ্য করা হয়। কিন্তু যে অগ্নিহোত্রে নিবিষ্ট, ইন্দ্রিয়সংযমী ও শিষ্ট—তাকেই স্মৃতিতে সত্য ব্রাহ্মণ বলা হয়েছে।

Verse 112

चारों वेद पढ़ा होनेपर भी जो दुराचारी है, वह अधमतामें शूद्रसे भी बढ़कर है। जो (नित्य) अग्निहोत्रमें तत्पर और जितेन्द्रिय है, वही “ब्राह्मण” कहा जाता है ।। यक्ष उवाच प्रियवचनवादी कि लभते विमृशितकार्यकर: कि लभते । बहुमित्रकर: किं लभते धर्मरत: कि लभते कथय,यक्षने पूछा--बताओ; मधुर वचन बोलनेवालेको क्‍या मिलता है? सोच-विचारकर काम करनेवाला क्या पा लेता है? जो बहुत-से मित्र बना लेता है, उसे क्या लाभ होता है? और जो धर्मनिष्ठ है, उसे क्या मिलता है?

যক্ষ জিজ্ঞাসা করল—বলো, মধুর বাক্য বললে কী লাভ হয়? ভেবে-চিন্তে কাজ করলে কী পাওয়া যায়? যে বহু বন্ধু করে, তার কী উপকার? আর যে ধর্মে নিবিষ্ট, সে কী অর্জন করে?

Verse 113

युधिषछ्िर उवाच प्रियवचनवादी प्रियो भवति विमृशितकार्यकरोडथिकं जयति । बहुमित्रकर: सुखं वसते यश्ष धर्मरत: स गतिं लभते,युधिष्ठिर बोले--मधुर वचन बोलनेवाला सबको प्रिय होता है, सोच-विचारकर काम करनेवालेको अधिकतर सफलता मिलती है एवं जो बहुत-से मित्र बना लेता है, वह सुखसे रहता है और जो धर्मनिष्ठ है, वह सदगति पाता है

যুধিষ্ঠির বললেন—মধুর বাক্য বললে মানুষ সকলের প্রিয় হয়। ভেবে-চিন্তে কাজ করলে অধিকাংশ সময় সাফল্য লাভ হয়। যে বহু বন্ধু করে, সে সুখে বাস করে। আর যে ধর্মে নিবিষ্ট, সে সদ্গতি লাভ করে।

Verse 114

यक्ष उवाच को मोदते किमाश्चर्य क: पन्था: का च वार्तिका । ममैतांश्वतुरः प्रश्नान्‌ कथयित्वा जलं पिब,यक्षने पूछा--सुखी कौन है? आश्वर्य क्या है? मार्ग क्या है और वार्ता क्या है? मेरे इन चार प्रश्नोंका उत्तर देकर जल पीओ

যক্ষ বলল—কে সত্যিই তৃপ্ত? সর্বশ্রেষ্ঠ বিস্ময় কী? পথ কোনটি? আর যথোচিত বাক্যালাপ কী? আমার এই চার প্রশ্নের উত্তর দিয়ে তবে জল পান করো।

Verse 115

युधिछिर उवाच पजञ्चमे5हनि षष्ठे वा शाकं पचति स्वे गृहे । अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते,युधिष्ठिर बोले--जलचर यक्ष! जिस पुरुषपर ऋण नहीं है और जो परदेशमें नहीं है, वह भले ही पाँचवें या छठे दिन अपने घरके भीतर साग-पात ही पकाकर खाता हो, तो भी वही सुखी है

যুধিষ্ঠির বললেন—হে জলচর যক্ষ! যে ব্যক্তি ঋণমুক্ত এবং পরদেশে বাস করে না, সে পঞ্চম বা ষষ্ঠ দিনে নিজের ঘরে কেবল শাক রান্না করলেও, সেই-ই সত্যিই আনন্দিত।

Verse 116

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्‌ | शेषा: स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमत: परम्‌,संसारसे रोज-रोज प्राणी यमलोकमें जा रहे हैं; किंतु जो बचे हुए हैं, वे सर्वदा जीते रहनेकी इच्छा करते हैं; इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा?

প্রতিদিন প্রাণীরা যমালয়ে চলে যাচ্ছে; তবু যারা বেঁচে থাকে, তারা স্থায়ীভাবে বেঁচে থাকতে চায়—এর চেয়ে বড় বিস্ময় আর কী হতে পারে?

Verse 117

तर्कोउप्रतिष्ठ: श्रुतयो विभिन्ना नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणम्‌ । धर्मस्य तत्त्वं निहित॑ गुहायां महाजनो येन गत: स पन्था:,तर्ककी कहीं स्थिति नहीं है, श्रुतियाँ भी भिन्न-भिन्न हैं, एक ही ऋषि नहीं है कि जिसका मत प्रमाण माना जाय तथा धर्मका तत्त्व गुहामें निहित है अर्थात्‌ अत्यन्य गूढ़ है; अत: जिससे महापुरुष जाते रहे हैं, वही मार्ग है

তর্কের স্থির ভিত্তি নেই; শ্রুতিগুলি নানা ও পরস্পরভিন্ন। এমন এক ঋষিও নেই যার মতই চূড়ান্ত প্রমাণ। ধর্মের তত্ত্ব গুহার গভীরে নিহিত—অতিশয় সূক্ষ্ম। অতএব মহাজনেরা যে পথে গেছেন, সেই পথই গ্রহণীয়।

Verse 118

अस्मिन्‌ महामोहमये कटाहे सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन । मारसत्‌दर्वीपरिघट्टनेन भूतानि काल: पचतीति वार्ता,इस महामोहरूपी कड़ाहेमें भगवान्‌ काल समस्त प्राणियोंको मास और ऋतुरूप करछीसे उलट-पलटकर सूर्यरूप अग्नि और रात-दिनरूप ईंधनके द्वारा राँध रहे हैं, यही वार्ता है

এই মহামোহরূপ কড়াইয়ে কালদেব সূর্যরূপ অগ্নি ও রাত্রি-দিনরূপ ইন্ধনে, মাস ও ঋতুরূপ খুন্তি নাড়িয়ে, সকল প্রাণীকে রাঁধছেন—এই-ই হলো ‘বার্তা’।

Verse 119

यक्ष उवाच व्याख्याता मे त्वया प्रश्ना याथातथ्यं परंतप । पुरुष त्विदानीं व्याख्याहि यश्च सर्वधनी नर:

যক্ষ বলল—পরন্তপ! তুমি আমার প্রশ্নগুলির উত্তর যথাযথ সত্যরূপে ব্যাখ্যা করেছ। এখন বলো—‘পুরুষ’ কাকে বলে, আর কোন মানুষই বা সত্যার্থে ‘সর্বধনী’?

Verse 120

यक्षने पूछा--परंतप! तुमने मेरे सब प्रश्नोंके उत्तर ठीक-ठीक दे दिये, अब तुम पुरुषकी भी व्याख्या कर दो और यह बताओ कि सबसे बड़ा धनी कौन है? ।। युधिछिर उवाच दिवं स्पृशति भूमिं च शब्द: पुण्येन कर्मणा । यावत्‌ स शब्दो भवति तावत्‌ पुरुष उच्यते,युधिष्ठिर बोले--जिस व्यक्तिके पुण्यकर्मोकी कीर्तिका शब्द जबतक स्वर्ग और भूमिको स्पर्श करता है, तबतक वह पुरुष कहलाता है

যুধিষ্ঠির বললেন—পুণ্যকর্মজাত কীর্তির ধ্বনি স্বর্গ ও পৃথিবী—উভয়কেই স্পর্শ করে। যতক্ষণ সেই কীর্তি স্থায়ী থাকে, ততক্ষণই সে ‘পুরুষ’ নামে অভিহিত হয়।

Verse 121

तुल्ये प्रियाप्रिये यस्य सुखदुःखे तथैव च । अतीतानागते चोभे स वै सर्वधनी नर:,जो मनुष्य प्रिय-अप्रिय, सुख-दुःख और भूत-भविष्यत्‌--इन द्वद्धोंमें सम है, वही सबसे बड़ा धनी है

যুধিষ্ঠির বললেন—যে মানুষ প্রিয়-অপ্রিয়, সুখ-দুঃখ, এবং অতীত ও ভবিষ্যৎ—এই দ্বন্দ্বসমূহে সমভাব রাখে, সেই-ই সত্যার্থে সর্বাধিক ধনী।

Verse 122

(भूतभव्यभविष्येषु नि:स्पूह: शान्तमानस: । सुप्रसन्न: सदा योगी स वै सर्वधनी श्वरः ।।) जो भूत, वर्तमान और भविष्य सभी विषयोंकी ओरसे निःस्पृह, शान्तचित्त, सुप्रसन्न और सदा योगयुक्त है, वही सब धनियोंका स्वामी है ।। यक्ष उवाच व्याख्यात: पुरुषो राजन्‌ यश्च सर्वधनी नर: । तस्मात्‌ त्वमेकं भ्रातृणां यमिच्छसि स जीवतु,यक्षने कहा--राजन्‌! जो सबसे बढ़कर धनी पुरुष है, उसकी तुमने ठीक-ठीक व्याख्या कर दी; इसलिये अपने भाइयोंमेंसे जिस एकको तुम चाहो, वही जीवित हो सकता है

যে অতীত, বর্তমান ও ভবিষ্যৎ—সব কিছুর প্রতিই নিঃস্পৃহ; যার মন শান্ত; যার স্বভাব সদা প্রসন্ন; এবং যে সর্বদা যোগে প্রতিষ্ঠিত—সেই-ই সত্যার্থে সকল ধনের অধিপতি। যক্ষ বলল—হে রাজন! তুমি ‘পুরুষ’ এবং ‘সর্বধনী’ মানুষের যথার্থ ব্যাখ্যা করেছ। অতএব তোমার ভ্রাতৃদের মধ্যে যাকে ইচ্ছা কর, সে-ই জীবিত হোক।

Verse 123

युधिछिर उवाच श्यामो य एष रक्ताक्षो बृहच्छाल इवोत्थित: । व्यूढोरस्को महाबाहुर्नकुलो यक्ष जीवतु,युधिष्ठिर बोले--यक्ष! यह जो श्यामवर्ण, अरुणनयन, सुविशाल शालवृक्षके समान ऊँचा और चौड़ी छातीवाला महाबाहु नकुल है, वही जीवित हो जाय

যুধিষ্ঠির বললেন—হে যক্ষ! এই যে শ্যামবর্ণ, রক্তাভ নয়ন, মহাশাল বৃক্ষের ন্যায় ঊর্ধ্বে উঠা, প্রশস্ত বক্ষ ও মহাবাহু নকুল—এ-ই জীবিত থাকুক।

Verse 124

यक्ष उवाच प्रियस्ते भीमसेनो5यमर्जुनो व: परायणम्‌ | स कस्मान्नकुलं राजन्‌ सापत्नं जीवमिच्छसि,यक्षने कहा--राजन्‌! यह तुम्हारा प्रिय भीमसेन है और यह तुमलोगोंका सबसे बड़ा सहारा अर्जुन है; इन्हें छोड़कर तुम किसलिये सौतेले भाई नकुलको जिलाना चाहते हो?

যক্ষ বলল—রাজন! এই ভীমসেন তোমার প্রিয়, আর এই অর্জুন তোমাদের সর্বশ্রেষ্ঠ আশ্রয়। তাদের ছেড়ে তুমি কেন সৎমাতৃজাত ভাই নকুলকে জীবিত করতে চাও?

Verse 125

यस्य नागसहस्रेण दशसंख्येन वै बलम्‌ | तुल्यं त॑ भीममुत्सूज्य नकुलं जीवमिच्छसि,जिसमें दस हजार हाथियोंके समान बल है, उस भीमको छोड़कर तुम नकुलको ही क्यों जिलाना चाहते हो?

যার বল দশ হাজার হাতির সমান, সেই ভীমকে ছেড়ে তুমি কেন নকুলকেই জীবিত করতে চাও?

Verse 126

तथैनं मनुजाः प्राहुर्भीमसेनं प्रियं तव । अथ केनानुभावेन सापत्नं जीवमिच्छसि,सभी मनुष्य भीमसेनको तुम्हारा प्रिय बतलाते हैं; उसे छोड़कर भला सौतेले भाई नकुलमें तुम कौन-सा सामर्थ्य देखकर उसे जिलाना चाहते हो?

মানুষেরা বলে ভীমসেনই তোমার সর্বাধিক প্রিয়। তবে তাকে ছেড়ে কোন গুণ বা সামর্থ্য দেখে তুমি সৎভাই নকুলকে জীবিত করতে চাও?

Verse 127

यस्य बाहुबलं सर्वे पाण्डवा: समुपासते । अर्जुनं तमपाहाय नकुलं जीवमिच्छसि,जिसके बाहुबलका सभी पाण्डवोंको पूरा भरोसा है, उस अर्जुनको भी छोड़कर तुम्हें नकुलको जिला देनेकी इच्छा क्‍यों है?

যার বাহুবলের উপর সকল পাণ্ডব নির্ভর করে, সেই অর্জুনকে ছেড়ে তুমি কেন নকুলকে জীবিত করতে চাও?

Verse 128

युधिछिर उवाच धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षित: । तस्माद्‌ धर्म न त्यजामि मा नो धर्मो हतोडवधीत्‌,युधिष्ठिर बोले--यदि धर्मका नाश किया जाय, तो वह नष्ट हुआ धर्म ही कर्ताको भी नष्ट कर देता है और यदि उसकी रक्षा की जाय, तो वही कर्ताकी भी रक्षा कर लेता है। इसीसे मैं धर्मका त्याग नहीं करता कि कहीं नष्ट होकर वह धर्म मेरा ही नाश न कर दे

যুধিষ্ঠির বললেন—ধর্ম নষ্ট করলে নষ্ট ধর্মই নাশকারীকেও নাশ করে; আর ধর্ম রক্ষা করলে ধর্মই রক্ষককে রক্ষা করে। তাই আমি ধর্ম ত্যাগ করি না—পাছে নষ্ট ধর্মই আমাকে নাশ করে।

Verse 129

आनुशंस्यं परो धर्म: परमार्थाच्च मे मतम्‌ | आनृशंस्यं चिकीर्षामि नकुलो यक्ष जीवतु,यक्ष! मेरा ऐसा विचार है कि वस्तुतः अनृशंसता (दया तथा समता) ही परम धर्म है। यही सोचकर मैं सबके प्रति दया और समानभाव रखना चाहता हूँ; इसलिये नकुल ही जीवित हो जाय

যুধিষ্ঠির বললেন—করুণা-ই পরম ধর্ম; পরম কল্যাণের ভিত্তিতে এটাই আমার স্থির বিশ্বাস। আমি অক্রূরতা ও দয়ার পথে চলতে চাই; অতএব, হে যক্ষ, নকুলই জীবিত থাকুক।

Verse 130

धर्मशील: सदा राजा इति मां मानवा विदु: । स्वधर्मान्न चलिष्यामि नकुलो यक्ष जीवतु,यक्ष! लोग मेरे विषयमें ऐसा समझते हैं कि राजा युधिष्ठिर धर्मात्मा हैं; अतएव मैं अपने धर्मसे विचलित नहीं होऊँगा। मेरा भाई नकुल जीवित हो जाय

যুধিষ্ঠির বললেন—মানুষ আমাকে সর্বদা ধর্মনিষ্ঠ রাজা বলে জানে। তাই আমি আমার স্বধর্ম থেকে বিচ্যুত হব না। হে যক্ষ, নকুল জীবিত থাকুক।

Verse 131

कुन्ती चैव तु माद्री च द्वे भायें तु पितुर्मम । उभे सपुत्रे स्थातां वै इति मे धीयते मति:,मेरे पिताके कुन्ती और माद्री नामकी दो भार्याएँ रहीं। वे दोनों ही पुत्रवती बनी रहें, ऐसा मेरा विचार है

যুধিষ্ঠির বললেন—আমার পিতার দুই পত্নী ছিলেন—কুন্তী ও মাদ্রী। আমার স্থির মত, উভয়েই পুত্রসমৃদ্ধ থাকুন।

Verse 132

यथा कुन्ती तथा माद्री विशेषो नास्ति मे तयो: । मातृभ्यां सममिच्छामि नकुलो यक्ष जीवतु,यक्ष! मेरे लिये जैसी कुन्ती है, वैसी ही माद्री। उन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है। मैं दोनों माताओंके प्रति समानभाव ही रखना चाहता हूँ। इसलिये नकुल ही जीवित हो

যুধিষ্ঠির বললেন—আমার কাছে কুন্তী যেমন, মাদ্রীও তেমন; তাদের মধ্যে আমি কোনো ভেদ দেখি না। আমি দুই মাতার প্রতিই সমান শ্রদ্ধা রাখতে চাই; তাই, হে যক্ষ, নকুলই জীবিত থাকুক।

Verse 133

यक्ष उवाच तस्य ते<र्थाच्च कामाच्च आनृशंस्यं परं मतम्‌ | तस्मात्‌ ते भ्रातर: सर्वे जीवन्तु भरतर्षभ,यक्षने कहा--भरतगश्रेष्ठ! तुमने अर्थ और कामसे भी अधिक दया और समताका आदर किया है, इसलिये तुम्हारे सभी भाई जीवित हो जायेँ

যক্ষ বলল—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! তুমি অর্থ ও কাম থেকেও ঊর্ধ্বে করুণা ও ন্যায়সমতাকে স্থান দিয়েছ; তাই তোমার সকল ভ্রাতা জীবিত হোক।

Verse 312

इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें नकुल आदि चारों भाइयोंके मूर्च्छित होकर गिरनेसे सम्बन्ध रखनेवाला तीन सौ बारहवाँ अध्याय प्रा हुआ ॥/

এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের অন্তর্গত আরণ্যেয়পর্বে নকুল প্রভৃতি চার ভ্রাতার মূর্ছিত হয়ে পতিত হওয়ার প্রসঙ্গ-সম্পর্কিত তিনশো বারোতম অধ্যায় আরম্ভ হল।

Verse 313

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि आरणेयपर्वणि यक्षप्रश्नने त्रयोदशाधिकत्रिशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहद्या भारत वनप्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें यक्षप्रश्रविषयक तीन सौ तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের অন্তর্গত আরণ্যেয়পর্বে যক্ষপ্রশ্ন-বিষয়ক তিনশো তেরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 363

मयैते निहता:ः सर्वे भ्रातरस्ते महौजस: । यक्षने कहा--तुम्हारा कल्याण हो। मैं जलचर पक्षी नहीं हूँ, यक्ष हूँ। तुम्हारे ये सभी महान्‌ तेजस्वी भाई मेरे द्वारा ही मारे गये हैं

যক্ষ বলল—তোমার এই সকল মহাবল পরাক্রান্ত ভ্রাতা আমার দ্বারাই নিহত হয়েছে।