Adhyaya 21
Sabha ParvaAdhyaya 2157 Verses

Adhyaya 21

Jarāsandha–Bhīma Niyuddha-prastāvaḥ (Commencement of the Regulated Duel)

Upa-parva: Jarāsandha-vadha (The Magadha Episode within Sabhā-parva)

Vaiśaṃpāyana narrates how Kṛṣṇa addresses Jarāsandha, inviting him to choose a single opponent from among three (Kṛṣṇa, Bhīma, Arjuna) for a duel. Jarāsandha elects Bhīma, and preparations follow in accordance with royal custom: the purohita approaches with ritual supports, auspicious rites (svastyayana) are completed, and Jarāsandha readies himself as a kṣatriya committed to martial duty. The combat begins as a close-quarters niyuddha (wrestling/hand-to-hand engagement): the two powerful fighters grapple, strike, and attempt leverage through pulls, pushes, knee blows, and heavy impacts, compared to collisions of mountains or mythic adversaries. The duel extends continuously across days and nights, with temporal markers in the month of Kārttika. Observing Jarāsandha’s fatigue, Kṛṣṇa advises Bhīma not to press a weakened opponent in a manner that could be read as improper; instead, he instructs Bhīma to fight on equal terms. Bhīma, understanding Jarāsandha’s vulnerability (randhra), forms an intention toward decisive resolution.

Chapter Arc: श्रीकृष्ण पाण्डवों को मगध की राजधानी गिरिव्रज की अद्भुत प्रशंसा सुनाते हैं—पाँच महाशृंग पर्वतों से घिरी, शीतल वृक्षों से शोभित, उत्सवों से स्फीत और अजेय-सी प्रतीत होती नगरी। → कृष्ण, भीम और अर्जुन नगर-परिसर के पर्वत-शिखरों, चैत्यक-प्रदेश और वनराजियों को देखते हुए आगे बढ़ते हैं; गिरिव्रज की दुर्गमता और जरासंध की प्रतिष्ठा उनके उद्देश्य को और भी जोखिमपूर्ण बनाती जाती है। → तीनों वीर रात्रि के समय नगर एवं राजभवन में प्रवेश करते हैं—द्वार-रक्षा, पर्वतीय अवरोध और नगर-व्यवस्था को भेदते हुए सिंहों की भाँति भीतर जा पहुँचते हैं, और जरासंध के अहंकार को उसके ही घर पर हर लेने का संकल्प मुखर होता है। → वे यज्ञ-परिसर/ब्राह्मण-वेष की मर्यादा के सहारे राजभवन तक पहुँचकर जरासंध के सामने उपस्थित होने की स्थिति बना लेते हैं—अब संवाद और चुनौती का क्षण निकट है। → जरासंध के सम्मुख पहुँचते ही वे क्या मांगेंगे—अतिथि-धर्म की शरण में दान, या सीधे युद्ध-आह्वान?

Shlokas

Verse 1

अत---#क्र+ एकविशो< ध्याय: श्रीकृष्णद्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा, चैत्यक पर्वतशिखर और नगाडोंको तोड़-फोड़-कर तीनोंका नगर एवं राजभवनमें प्रवेश तथा श्रीकृष्ण और जरासंधका संवाद वायुदेव उवाच एष पार्थ महान्‌ भाति पशुमान्‌ नित्यमम्बुमान्‌ | निरामय: सुवेश्माढ्यो निवेशो मागध: शुभ:,श्रीकृष्ण बोले--कुन्तीनन्दन! देखो, यह मगध-देशकी सुन्दर एवं विशाल राजधानी कैसी शोभा पा रही है। यहाँ पशुओंकी अधिकता है। जलकी भी सदा पूर्ण सुविधा रहती है। यहाँ रोग-व्याधिका प्रकोप नहीं होता। सुन्दर महलोंसे भरा-पूरा यह नगर बड़ा मनोहर प्रतीत होता है

বায়ু বললেন—হে পার্থ! দেখো, মগধের এই মহান নগর কী দীপ্তিমান—পশুধনে সমৃদ্ধ, সর্বদা জলপূর্ণ, রোগমুক্ত এবং সুন্দর প্রাসাদে ভরপুর। এই মগধ-নিবাস শুভ ও মনোহর।

Verse 2

वैहारो विपुल: शैलो वराहो वृषभस्तथा । तथा ऋषिगिरिस्तात शुभाश्वैव्यकपञ्चमा:,तात! यहाँ विहारोपयोगी विपुल, वराह, वृषभ (ऋषभ), ऋषिगिरि (मातंग) तथा पाँचवाँ चैत्यक नामक पर्वत है। बड़े-बड़े शिखरोंवाले ये पाँचों सुन्दर पर्वत शीतल छायावाले वृक्षोंसे सुशोभित हैं और एक साथ मिलकर एक-दूसरेके शरीरका स्पर्श करते हुए मानो गिरिव्रज नगरकी रक्षा कर रहे हैं

বায়ু বললেন—প্রিয়! এখানে বিহার নামে বিস্তৃত পর্বত আছে, আর বরাহ ও বৃষভও আছে; তদ্রূপ ঋষিগিরি আছে—এদের সঙ্গে শুভাশ্ব ও ঐব্যক পঞ্চম পর্বত।

Verse 3

एते पञ्च महाशज्भा: पर्वता: शीतलद्रुमा: । रक्षन्तीवाभिसंहत्य संहताड़ा गिरिव्रजम्‌,तात! यहाँ विहारोपयोगी विपुल, वराह, वृषभ (ऋषभ), ऋषिगिरि (मातंग) तथा पाँचवाँ चैत्यक नामक पर्वत है। बड़े-बड़े शिखरोंवाले ये पाँचों सुन्दर पर्वत शीतल छायावाले वृक्षोंसे सुशोभित हैं और एक साथ मिलकर एक-दूसरेके शरीरका स्पर्श करते हुए मानो गिरिव्रज नगरकी रक्षा कर रहे हैं

এই পাঁচ পর্বতের শিখর অতি উচ্চ, আর শীতল ছায়াদায়ক বৃক্ষে আচ্ছাদিত। একত্র হয়ে, দেহে দেহ মিলিয়ে, যেন তারা গিরিব্রজ নগরকে রক্ষা করছে।

Verse 4

पुष्पवेष्टितशाखाग्रैर्गन्धवद्धिर्मनोहरै: । निगूढा इव लोध्राणां वनै: कामिजनप्रियै:,वहाँ लोध नामक वृक्षोंके कई मनोहर वन हैं, जिनसे वे पाँचों पर्वत ढके हुए-से जान पड़ते हैं। उनकी शाखाओंके अग्रभागमें फ़ूल-ही-फूल दिखायी देते हैं। लोधोंके ये सुगन्धित वन कामीजनोंको बहुत प्रिय हैं

বায়ু বললেন—মনোরম, সুগন্ধি লোধ্র-বনে আচ্ছাদিত হয়ে সেই পর্বতগুলি যেন গোপন হয়ে আছে। শাখার অগ্রভাগ সর্বত্র পুষ্পমালায় আবৃত, আর এই মধুগন্ধ বন ভোগপ্রিয় লোকদের বিশেষ প্রিয়।

Verse 5

शूद्रायां गौतमो यत्र महात्मा संशितव्रत:ः । औशीनर्यामजनयत् काक्षीवाद्यान्‌ सुतान्‌ मुनि:,यहीं अत्यन्त कठोर व्रतका पालन करनेवाले महामना गौतमने उशीनरदेशकी शूद्रजातीय कन्याके गर्भसे काक्षीवान्‌ आदि पुत्रोंको उत्पन्न किया था

বায়ু বললেন—সেই স্থানে মহাত্মা, কঠোর ব্রতে স্থির মুনি গৌতম ঔশীনর দেশের এক শূদ্রা কন্যার গর্ভে কাক্ষীবান প্রভৃতি পুত্রদের জন্ম দিয়েছিলেন।

Verse 6

गौतम: प्रणयात्‌ तस्माद्‌ यथासौ तत्र सझनि । भजते मागधं वंशं स नृपाणामनुग्रहात्‌,इसी कारण वह गौतम मुनि राजाओंके प्रेमसे वहाँ आश्रममें रहता तथा मगधदेशीय राजवंशकी सेवा करता है

এই কারণেই স্নেহবশত, পূর্বাভ্যাসমতো মুনি গৌতম সেখানে সেই আশ্রমে বাস করেন; এবং রাজাদের অনুগ্রহে মগধের রাজবংশের সেবা করেন।

Verse 7

अड़वज्भादयश्चैव राजान: सुमहाबला: । गौतमक्षयमभ्येत्य रमन्ते सम पुरार्जुन,अर्जुन! पूर्वकालमें अंग-वंग आदि महाबली राजा भी गौतमके घरमें आकर आनन्दपूर्वक रहते थे

বায়ু বললেন—হে অর্জুন! প্রাচীনকালে অঙ্গ-বঙ্গ প্রভৃতি মহাবলী রাজারা গৌতমের অক্ষয় আবাসে এসে সন্তোষে বাস করতেন।

Verse 8

वनराजीस्तु पश्येमा: पिप्पलानां मनोरमा: । लोध्राणां च शुभा: पार्थ गौतमौक: समीपजा:,पार्थ! गौतमके आश्रमके निकट लहलहाती हुई पीपल और लोधोंकी इन सुन्दर एवं मनोरम वन-पंक्तियोंको तो देखो

বায়ু বললেন—হে পার্থ! গৌতমের আশ্রমের নিকটে জন্মানো পিপ্পল গাছের এই মনোরম বনসারি এবং লোধ্র গাছের এই শুভ সারিগুলি দেখো।

Verse 9

अर्बुदः शक्रवापी च पन्नगौ शत्रुतापनौ । स्वस्तिकस्यालयश्नात्र मणिनागस्य चोत्तम:,यहाँ अर्बुद और शक्रवापी नामवाले दो नाग रहते हैं, जो अपने शत्रुओंको संतप्त करनेवाले हैं। यहीं स्वस्तिक नाग और मणि नागके भी उत्तम भवन हैं

বায়ু বললেন—এখানে অর্বুদ ও শক্রবাপী নামে দুই নাগরাজ বাস করেন, যারা শত্রুদের দগ্ধ করে। এখানেই স্বস্তিক নাগ ও মণিনাগেরও উৎকৃষ্ট নিবাস রয়েছে।

Verse 10

अपरिहार्या मेघानां मागधा मनुना कृता: । कौशिको मणिमांश्वैव चक्राते चाप्यनुग्रहम्‌,मनुने मगधदेशके निवासियोंको मेघोंके लिये अपरिहार्य (अनुग्राह्म) कर दिया है; (अत: वहाँ सदा ही बादल समयपर यशथेष्ट वर्षा करते हैं।) चण्डकौशिक मुनि और मणिमान्‌ नाग भी मगधदेशपर अनुग्रह कर चुके हैं

বায়ুদেব বললেন—মনু মগধবাসীদের মেঘদের কাছে অপরিহার্য (বিশেষ অনুগ্রহভাজন) করে দিয়েছেন; তাই সে দেশে মেঘ যথাসময়ে ইচ্ছামতো বৃষ্টি বর্ষণ করে। চণ্ড-কৌশিক ঋষি ও মণিমান্ নাগও মগধদেশে অনুগ্রহ করেছেন।

Verse 11

(पाण्डरे विपुले चैव तथा वाराहकेडपि च । चैत्यके च गिरिश्रेष्ठे मातड़े च शिलोच्चये ।। एतेषु पर्वतेन्द्रेषु सर्वसिद्धमहालया: । यतीनामाश्रमाच्चैव मुनीनां च महात्मनाम्‌ ।। श्वैतवर्णके वृषभ, विपुल, वाराह, गिरिश्रेष्ठ चैत्यक तथा मातंग गिरि--इन सभी श्रेष्ठ पर्वतोंपर सम्पूर्ण सिद्धोंक विशाल भवन हैं तथा यतियों, मुनियों और महात्माओंके बहुत-से आश्रम हैं। वृषभस्य तमालस्य महावीर्यस्य वै तथा । गन्धर्वरक्षसां चैव नागानां च तथा5डलया: ।।) वृषभ, महापराक्रमी तमाल, गन्धर्वों, राक्षमों तथा नागोंके भी निवासस्थान उन पर्वतोंकी शोभा बढ़ाते हैं। एवं प्राप्य पुरं रम्यं दुराधर्ष समन्तत: । अर्थसिद्धि त्वनुपमां जरासंधोडभिमन्यते,इस प्रकार चारों ओरसे दुर्धर्ष उस रमणीय नगरको पाकर जरासंधको यह अभिमान बना रहता है कि मुझे अनुपम अर्थसिद्धि प्राप्त होगी

বায়ু বললেন—পাণ্ডর ও বিপুল পর্বতে, তদ্রূপ বারাহকেও; চৈত্যক, গিরিশ্রেষ্ঠ নামে উৎকৃষ্ট শিখরে, এবং মাতঙ্গ নামক উচ্চ শিলাচূড়ায়—এই সকল পর্বতরাজ্যে সিদ্ধদের বিশাল আবাস আছে, আর যতি, মুনি ও মহাত্মাদের বহু আশ্রমও রয়েছে। সেখানে বৃষভ, মহাবীর্যবান তামাল, এবং গন্ধর্ব, রাক্ষস ও নাগদেরও নিবাস সেই পর্বতমালার শোভা বৃদ্ধি করে। এভাবে চারিদিক থেকে দুর্ধর্ষ সেই মনোরম নগর লাভ করে জরাসন্ধ মনে করে—‘আমার অতুল অর্থসিদ্ধি হবে।’

Verse 12

वैशम्पायन उवाच एवमुक्‍क्त्वा तत: सर्वे भ्रातरो विपुलीजस:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसी बातें करते हुए वे सभी महातेजस्वी भाई श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीमसेन मगधकी राजधानीमें प्रवेश करनेके लिये चल पड़े। वह नगर चारों वर्णोके लोगोंसे भरा-पूरा था। उसमें रहनेवाले सभी लोग हृष्ट-पुष्ट दिखायी देते थे

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! এ কথা বলে সেই সকল মহাতেজস্বী ভ্রাতারা মগধের রাজধানীতে প্রবেশ করতে রওনা হলেন। নগরীটি চার বর্ণের জনসমুদ্রে পরিপূর্ণ ছিল, আর তার অধিবাসীরা হৃষ্ট-পুষ্ট, প্রসন্ন ও সমৃদ্ধ দেখাচ্ছিল।

Verse 13

वार्ष्णेय: पाण्डवौ चैव प्रतस्थुर्मागधं पुरम्‌ । हृष्टपुष्टजनोपेतं चातुर्वर्ण्यसमाकुलम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसी बातें करते हुए वे सभी महातेजस्वी भाई श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीमसेन मगधकी राजधानीमें प्रवेश करनेके लिये चल पड़े। वह नगर चारों वर्णोके लोगोंसे भरा-पूरा था। उसमें रहनेवाले सभी लोग हृष्ट-पुष्ट दिखायी देते थे

বৈশম্পায়ন বললেন—বার্ষ্ণেয় শ্রীকৃষ্ণ এবং সেই দুই পাণ্ডব মগধ-নগরের দিকে যাত্রা করলেন। রাজধানীটি হৃষ্ট-পুষ্ট জনসমুদ্রে পরিপূর্ণ ছিল এবং চার বর্ণের লোকসমাগমে মুখর ছিল।

Verse 14

स्फीतोत्सवमनाधुष्यमासेदुश्न गिरिव्रजम्‌ । ततो द्वारमनासाद्य पुरस्य गिरिमुच्छितम्‌,वहाँ अधिकाधिक उत्सव होते रहते थे। कोई भी उसको जीत नहीं सकता था। ऐसे गिरिव्रजके निकट वे तीनों जा पहुँचे। वे मुख्य फाटकपर न जाकर नगरके चैत्यक नामक ऊँचे पर्वतपर चले गये। उस नगरमें निवास करनेवाले मनुष्य तथा बृहद्रथ-परिवारके लोग उस पर्वतकी पूजा किया करते थे। मगधदेशकी प्रजाको यह चैत्यक पर्वत बहुत ही प्रिय था

বৈশম্পায়ন বললেন—নিত্যোৎসবে সমৃদ্ধ ও অজেয় বলে খ্যাত গিরিব্রজে সেই তিনজন এসে পৌঁছাল। তারপর নগরের প্রধান দ্বারে না গিয়ে তারা নগরের পাশে উঁচু ‘চৈত্যক’ পর্বতের দিকে গেল—যা নগরবাসী ও বৃহদ্রথবংশীয়েরা পূজা করে, এবং যা মগধজনের কাছে বিশেষ প্রিয়।

Verse 15

बाद्रथै: पूज्यमानं तथा नगरवासिभि: | मगधानां सुरुचिरं चैत्यकान्तं समाद्रवन्‌,वहाँ अधिकाधिक उत्सव होते रहते थे। कोई भी उसको जीत नहीं सकता था। ऐसे गिरिव्रजके निकट वे तीनों जा पहुँचे। वे मुख्य फाटकपर न जाकर नगरके चैत्यक नामक ऊँचे पर्वतपर चले गये। उस नगरमें निवास करनेवाले मनुष्य तथा बृहद्रथ-परिवारके लोग उस पर्वतकी पूजा किया करते थे। मगधदेशकी प्रजाको यह चैत्यक पर्वत बहुत ही प्रिय था

বৃহদ্রথবংশীয় ও নগরবাসীদের দ্বারা পূজিত, মগধজনের অতি প্রিয় ও মনোহর চৈত্যক পর্বতের দিকে তারা শ্রদ্ধাভরে অগ্রসর হল।

Verse 16

यत्र मांसादमृषभमाससाद बृहद्रथ: । तं॑ हत्वा मासतालाभिस्तिस्रो भेरीरकारयत्‌,उस स्थानपर राजा बृहद्रथने (वृषभरूपधारी) ऋषभ नामक एक मांसभक्षी राक्षससे युद्ध किया और उसे मारकर उसकी खालसे तीन बड़े-बड़े नगाड़े तैयार कराये, जिनपर चोट करनेसे महीनेभरतक आवाज होती रहती थी

যেখানে বৃহদ্রথ ‘ঋষভ’ নামের মাংসভোজী রাক্ষসের মুখোমুখি হয়েছিলেন; তাকে বধ করে তার চামড়া দিয়ে তিনি তিনটি ভেরী (নগাড়া) নির্মাণ করালেন, যার ধ্বনি মাসভর প্রতিধ্বনিত হতো।

Verse 17

स्वपुरे स्थापयामास तेन चानहा चर्मणा । यत्र ता: प्राणदन्‌ भेयों दिव्यपुष्पावचूर्णिता:,राजाने उन नगाड़ोंको उस राक्षसके चमड़ेसे मढ़ाकर अपने नगरमें रखवा दिया। जहाँ वे नगाड़े बजते थे, वहाँ दिव्य फूलोंकी वर्षा होने लगती थी

রাজা সেই রাক্ষসের চামড়া দিয়ে মুড়ে নগরে ওই নগাড়াগুলি স্থাপন করালেন। যেখানে যেখানে সেই ভেরীগুলি বাজত, সেখানে দেবপুষ্পের বর্ষা নেমে আসত।

Verse 18

भड्व्त्वा भेरीत्रयं तेडपि चैत्यप्राकारमाद्रवन्‌ । द्वारतोडभिमुखा: सर्वे ययुर्नाना55युधास्तदा,इन तीनों वीरोंने उपर्युक्त तीनों नगाड़ोंको फोड़कर चैत्यक पर्वतके परकोटेपर आक्रमण किया। उन सबने अनेक प्रकारके आयुध लेकर द्वारके सामने मगध-निवासियोंके परम प्रिय उस चैत्यक पर्वतपर धावा किया था। जरासंधको मारनेकी इच्छा रखकर मानो वे उसके मस्तकपर आघात कर रहे थे

সেই বীরেরা তিনটি নগাড়া ভেঙে চৈত্যকের প্রাচীর-পরিখার দিকে ধেয়ে গেল। তখন সকলেই নানা অস্ত্র ধারণ করে, দ্বারের দিকে মুখ করে অগ্রসর হল।

Verse 19

मागधानां सुरुचिरं चैत्यकं त॑ समाद्रवन्‌ । शिरसीव समाध्नन्तो जरासंधं जिघांसव:,इन तीनों वीरोंने उपर्युक्त तीनों नगाड़ोंको फोड़कर चैत्यक पर्वतके परकोटेपर आक्रमण किया। उन सबने अनेक प्रकारके आयुध लेकर द्वारके सामने मगध-निवासियोंके परम प्रिय उस चैत्यक पर्वतपर धावा किया था। जरासंधको मारनेकी इच्छा रखकर मानो वे उसके मस्तकपर आघात कर रहे थे

বৈশম্পায়ন বললেন— জরাসন্ধকে বধ করার বাসনায় তারা মগধবাসীদের অতি প্রিয় সেই অপূর্ব সুন্দর চৈত্যক-পর্বতে ঝাঁপিয়ে পড়ল; যেন জরাসন্ধের মস্তকেই আঘাত হানছে।

Verse 20

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत जरासंधवधपर्वमें कृष्ण, अर्जुन एवं भीमसेनकी मगधयात्राविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,स्थिरं सुविपुलं शृज़ं सुमहत्‌ तत्‌ पुरातनम्‌ । अर्चितं गन्धमाल्यैश्न सततं सुप्रतिष्ठितम्‌ उस चैत्यकका विशाल शिखर बहुत पुराना, किंतु सुदृढ़ था। मगधदेशमें उसकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। गन्ध और पुष्पकी मालाओंसे उसकी सदा पूजा की जाती थी। श्रीकृष्ण आदि तीनों वीरोंने अपनी विशाल भुजाओंसे टक्कर मारकर उस चैत्यक पर्वतके शिखरको गिरा दिया। तदनन्तर वे अत्यन्त प्रसन्न होकर मगधकी राजधानी गिरिव्रजके भीतर घुसे

বৈশম্পায়ন বললেন— সেই চৈত্যকের শিখর ছিল অচল, অতিবিস্তৃত, মহাবিশাল ও প্রাচীন। সুগন্ধি ও পুষ্পমালায় তা সর্বদা পূজিত হতো এবং উচ্চ মর্যাদায় প্রতিষ্ঠিত ছিল।

Verse 21

विपुलैर्बाहुभिवीरास्ते5भिहत्याभ्यपातयन्‌ । ततस्ते मागध॑ हृष्टा: पुरं प्रविविशुस्तदा,उस चैत्यकका विशाल शिखर बहुत पुराना, किंतु सुदृढ़ था। मगधदेशमें उसकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। गन्ध और पुष्पकी मालाओंसे उसकी सदा पूजा की जाती थी। श्रीकृष्ण आदि तीनों वीरोंने अपनी विशाल भुजाओंसे टक्कर मारकर उस चैत्यक पर्वतके शिखरको गिरा दिया। तदनन्तर वे अत्यन्त प्रसन्न होकर मगधकी राजधानी गिरिव्रजके भीतर घुसे

বৈশম্পায়ন বললেন— সেই বীরেরা তাদের প্রবল বাহুবলে আঘাত করে তাকে ভেঙে ফেলে দিল। তখন মগধবাসীরা আনন্দিত হয়ে সেই সময় নগরে প্রবেশ করল।

Verse 22

एतस्मिन्नेव काले तु ब्राह्मणा वेदपारगा: । दृष्टवा तु दुर्निमित्तानि जरासंधमदर्शयन्‌,इसी समय वेदोंके पारगामी दिद्वान्‌ ब्राह्मणोंने अनेक अपशकुन देखकर राजा जरासंधको उनके विषयमें सूचित किया

বৈশম্পায়ন বললেন— ঠিক সেই সময় বেদে পারদর্শী ব্রাহ্মণেরা অশুভ লক্ষণ দেখে জরাসন্ধকে গিয়ে তা জানালেন।

Verse 23

पर्यग्न्यकुर्वश्च नृपं द्विरदस्थं पुरोहिता: । ततस्तच्छान्तये राजा जरासंध: प्रतापवान्‌ | दीक्षितो नियमस्थोडसावुपवासपरो5भवत्‌,पुरोहितोंने राजाको हाथीपर बिठाकर उसके चारों ओर प्रज्वलित आग घुमायी। प्रतापी राजा जरासंधने अनिष्टकी शान्तिके लिये व्रतकी दीक्षा ले नियमोंका पालन करते हुए उपवास किया

বৈশম্পায়ন বললেন— পুরোহিতেরা হাতির পিঠে উপবিষ্ট রাজাকে ঘিরে পবিত্র অগ্নি-পরিক্রমার বিধি সম্পন্ন করলেন। তারপর সেই অশুভের প্রশমনার্থে প্রতাপশালী রাজা জরাসন্ধ দীক্ষা গ্রহণ করে নিয়মে স্থিত থেকে উপবাসে প্রবৃত্ত হলেন।

Verse 24

स्नातकव्रतिनस्ते तु बाहुशस्त्रा निरायुधा: । युयुत्सव: प्रविविशुर्जरासंधेन भारत,भारत! इधर भगवान्‌ श्रीकृष्ण, भीमसेन और अर्जुन स्नातक-व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मणोंके वेषमें अस्त्र-शस्त्रोंका परित्याग करके अपनी भुजाओंसे ही आयुधोंका काम लेते हुए जरासंधके साथ युद्ध करनेकी इच्छा रखकर नगरमें प्रविष्ट हुए

বৈশম্পায়ন বললেন— হে ভারত! স্নাতক-ব্রত পালনকারী সেই পুরুষেরা নিরস্ত্র হয়েও নিজেদের বাহুকেই অস্ত্র করে, জরাসন্ধের সঙ্গে যুদ্ধের সংকল্পে নগরে প্রবেশ করল।

Verse 25

भक्ष्यमाल्यापणानां च ददृशु: श्रियमुत्तमाम्‌ । स्फीतां सर्वगुणोपेतां सर्वकामसमृद्धिनीम्‌,उन्होंने खाने-पीनेकी वस्तुओं, फ़ूल-मालाओं तथा अन्य आवश्यक पदार्थोंकी दूकानोंसे सजे हुए हाट-बाटकी अपूर्व शोभा और सम्पदा देखी। नगरका वह वैभव बहुत बढ़ा-चढ़ा, सर्वगुणसम्पन्न तथा समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला था। उस गलीकी अद्भुत समृद्धिको देखकर वे महाबली नरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन एक मालीसे बलपूर्वक बहुत-सी मालाएँ लेकर नगरकी प्रधान सड़कसे चलने लगे

বৈশম্পায়ন বললেন— তারা খাদ্যদ্রব্য ও পুষ্পমালার দোকানে ভরা বাজারের শ্রেষ্ঠ শ্রী দেখল—সমৃদ্ধ, সর্বগুণে ভূষিত এবং সকল কামনা পূরণে সক্ষম।

Verse 26

तां तु दृष्टवा समृद्धि ते वीथ्यां तस्यां नरोत्तमा: । राजमार्गेण गच्छन्त: कृष्णभीमधनंजया: । बलादू गृहीत्वा माल्यानि मालाकारान्महाबला:,उन्होंने खाने-पीनेकी वस्तुओं, फ़ूल-मालाओं तथा अन्य आवश्यक पदार्थोंकी दूकानोंसे सजे हुए हाट-बाटकी अपूर्व शोभा और सम्पदा देखी। नगरका वह वैभव बहुत बढ़ा-चढ़ा, सर्वगुणसम्पन्न तथा समस्त कामनाओंकी पूर्ति करनेवाला था। उस गलीकी अद्भुत समृद्धिको देखकर वे महाबली नरश्रेष्ठ श्रीकृष्ण, भीम और अर्जुन एक मालीसे बलपूर्वक बहुत-सी मालाएँ लेकर नगरकी प्रधान सड़कसे चलने लगे

সেই পথের অপূর্ব সমৃদ্ধি দেখে নরশ্রেষ্ঠ কৃষ্ণ, ভীম ও ধনঞ্জয় রাজপথ ধরে অগ্রসর হলেন; আর মহাবলবান হয়ে তারা মালাকারদের কাছ থেকে জোর করে বহু মালা নিয়ে নিলেন।

Verse 27

विरागवसना: सर्वे स्रग्विणो मृष्टकुण्डला: । निवेशनमथाजम्मुर्जरासंधस्य धीमत:,उन सबके वस्त्र अनेक रंगके थे। उन्होंने गलेमें हार और कानोंमें चमकीले कुण्डल पहन रखे थे। वे क्रमश: बुद्धिमान्‌ राजा जरासंधके महलके समीप जा पहुँचे

বৈশম্পায়ন বললেন— তারা সকলেই বিচিত্র বর্ণের বস্ত্র পরিধান করেছিল; গলায় মালা ও কানে দীপ্ত, মসৃণ কুণ্ডল ধারণ করে, ক্রমান্বয়ে বুদ্ধিমান রাজা জরাসন্ধের নিবাসের নিকটে পৌঁছাল।

Verse 28

गोवासमिव वीक्षन्त: सिंहा हैमवता यथा । शालस्तम्भनिभास्तेषां चन्दनागुरुरूषिता:

বৈশম্পায়ন বললেন— তারা এমন দৃষ্টিতে তাকিয়েছিল, যেন হিমালয়ের সিংহ গোয়ালঘরের দিকে চেয়ে আছে। তাদের দেহ শালকাঠের স্তম্ভের মতো উচ্চ ও দৃঢ়, আর চন্দন ও অগুরুতে অনুলিপ্ত হয়ে সুগন্ধিত ছিল।

Verse 29

तान्‌ दृष्टवा द्विरदप्रख्याज्शालस्कन्धानिवोदगतान्‌ । व्यूढोरस्कान्‌ मागधानां विस्मय: समपद्यत,शालवृक्षके तनेके समान ऊँचे डील और चौड़ी छातीवाले गजराजसदृश उन बलवान वीरोंको देखकर मगधनिवासियोंको बड़ा आश्वर्य हुआ

শালবৃক্ষের উঁচু কাণ্ডের মতো উদ্গত, গজসম দেহধারী, প্রশস্ত ও সুগঠিত বক্ষবিশিষ্ট সেই বীরদের দেখে মগধবাসীরা বিস্ময়ে অভিভূত হল।

Verse 30

ते त्वतीत्य जनाकीर्णा: कक्षास्तिस््रो नरर्षभा: । अहंकारेण राजानमुपतस्थुर्गतव्यथा:,वे नरश्रेष्ठ लोगोंसे भरी हुई तीन ड्योढ़ियोंको पार करके निर्भय एवं निश्चिन्त हो बड़े अभिमानके साथ राजा जरासंधके निकट गये

লোকসমুদায়ে ভরা তিনটি প্রাঙ্গণ অতিক্রম করে সেই নরশ্রেষ্ঠেরা ভয় ও উদ্বেগহীন হয়ে গর্বভরে রাজা জরাসন্ধের নিকট উপস্থিত হল।

Verse 31

तान्‌ पाद्यमधुपकाह्िन्‌ गवार्हान्‌ सत्कृतिं गतान्‌ | प्रत्युत्थाय जरासंध उपतस्थे यथाविधि,वे पाद्य, मधुपर्क और गोदान पानेके योग्य थे। उनका सर्वत्र सत्कार होता था। उन्हें आया देख जरासंध उठकर खड़ा हो गया और उसने विधिपूर्वक उनका आतिथ्य-सत्कार किया

তাঁরা পাদ্য, মধুপর্ক ও গোদান গ্রহণের যোগ্য; সর্বত্রই তাঁদের সম্মান করা হত। তাঁদের আগমন দেখে জরাসন্ধ উঠে দাঁড়াল এবং বিধিমতো আতিথ্য-সৎকার করল।

Verse 32

उवाच चैतान्‌ राजासौ स्वागतं वो<स्त्विति प्रभु: । मौनमासीत्‌ तदा पार्थभीमयोर्जनमेजय

তখন সেই প্রভু রাজা তাঁদের বলল—“আপনাদের স্বাগতম; মঙ্গল হোক।” কিন্তু সেই মুহূর্তে, হে জনমেজয়, পার্থ ও ভীম নীরব রইল।

Verse 33

तेषां मध्ये महाबुद्धि: कृष्णो वचनमत्रवीत्‌ । वक्तुं नायाति राजेन्द्र एतयोर्नियमस्थयो:

তাঁদের মধ্যে মহাবুদ্ধিমান কৃষ্ণ বললেন—“হে রাজেন্দ্র! এ দু’জন, যারা নিজ নিজ নিয়মে স্থিত, তাদের মুখে এখন বাক্য আসে না।”

Verse 34

अर्वाड्निशीथात्‌ परतस्त्वया सार्ध वदिष्यत: । तदनन्तर शक्तिशाली राजाने इन तीनों अतिथियोंसे कहा--“आपलोगोंका स्वागत है।' जनमेजय! उस समय अर्जुन और भीमसेन तो मौन थे। उनमेंसे महाबुद्धिमान्‌ श्रीकृष्णने यह बात कही--'राजेन्द्र! ये दोनों एक नियम ले चुके हैं; अतः आधी रातसे पहले नहीं बोलते। आधी रातके बाद ये दोनों आपसे बात करेंगे” || ३२-३३ $ || यज्ञागारे स्थापयित्वा राजा राजगृहं गत:,तब राजा उन्हें यज्ञशालामें ठहराकर स्वयं राजभवनमें चला गया। फिर आधी रात होनेपर जहाँ वे ब्राह्मण ठहरे थे, वहाँ वह गया। राजन! उसका यह नियम भूमण्डलमें विख्यात था

বৈশম্পায়ন বললেন—“অর্ধরাত্রির পরে এরা আপনার সঙ্গে কথা বলবে।” তখন সেই পরাক্রান্ত রাজা তিন অতিথিকে বললেন—“আপনাদের স্বাগতম।” জনমেজয়! সেই সময় অর্জুন ও ভীমসেন নীরবই রইলেন। তাঁদের মধ্যে মহাবুদ্ধিমান শ্রীকৃষ্ণ বললেন—“রাজেন্দ্র! এ দু’জন ব্রত গ্রহণ করেছে; তাই অর্ধরাত্রির আগে কথা বলে না। অর্ধরাত্রির পরে এরা আপনার সঙ্গে আলাপ করবে।” তাদের যজ্ঞশালায় আশ্রয় দিয়ে রাজা নিজ প্রাসাদে গেলেন। তারপর অর্ধরাত্রি উপস্থিত হলে যেখানে সেই ব্রাহ্মণরা ছিলেন, সেখানে তিনি আবার গেলেন। রাজন, তাঁর এই নিয়ম পৃথিবীতে প্রসিদ্ধ ছিল।

Verse 35

ततोअर्धरात्रे सम्प्राप्ते यातो यत्र स्थिता द्विजा: । तस्य होतद्‌ व्रतं राजन्‌ बभूव भुवि विश्रुतम्‌,तब राजा उन्हें यज्ञशालामें ठहराकर स्वयं राजभवनमें चला गया। फिर आधी रात होनेपर जहाँ वे ब्राह्मण ठहरे थे, वहाँ वह गया। राजन! उसका यह नियम भूमण्डलमें विख्यात था

তারপর অর্ধরাত্রি উপস্থিত হলে রাজা সেখানে গেলেন, যেখানে সেই দ্বিজেরা অবস্থান করছিলেন। হে রাজন, তাঁর এই ব্রত পৃথিবীতে প্রসিদ্ধ ছিল।

Verse 36

सस्‍्नातकान ब्राह्मणान्‌ प्राप्ताछछुत्वा स समितिंजय: । अत्यर्धीत्रे नृपति: प्रत्युदूग॒च्छति भारत,भारत! युद्धविजयी राजा जरासंध स्नातक ब्राह्मणोंका आगमन सुनकर आधी रातके समय भी उनकी आवभगतके लिये उनके पास चला जाता था

হে ভারত! স্নাতক ব্রাহ্মণদের আগমন সংবাদ শুনে সেই সমিতিঞ্জয় (জরাসন্ধ) রাজা গভীর অর্ধরাত্রিতেও তাঁদের অভ্যর্থনা করতে এগিয়ে যেতেন।

Verse 37

तांस्त्वपूर्वेण वेषेण दृष्टवा स नृपसत्तम: । उपतस्थे जरासंधो विस्मितश्चाभवत्‌ तदा,उन तीनोंको अपूर्व वेषमें देखकर नृपश्रेष्ठ जरासंधको बड़ा विस्मय हुआ। वह उनके पास गया

তিনজনকে অদ্ভুত বেশে দেখে নৃপশ্রেষ্ঠ জরাসন্ধ বিস্ময়ে অভিভূত হলেন। তিনি তাঁদের কাছে এগিয়ে গেলেন এবং তখনও বিস্মিতই রইলেন।

Verse 38

ते तु दृष्टवैव राजानं जरासंध॑ नर्षभा: । इदमूचुरमित्रघ्ना: सर्वे भरतसत्तम,भरतवंशशिरोमणे! शत्रुओंका नाश करनेवाले वे सभी नरश्रेष्ठ राजा जरासंधको देखते ही इस प्रकार बोले--“महाराज! आपका कल्याण हो।” जनमेजय! ऐसा कहकर वे तीनों खड़े हो गये तथा कभी राजा जरासंधको और कभी आपसमें एक दूसरेको देखने लगे

হে ভরতসত্তম, ভরতবংশের শিরোমণি! শত্রুনাশক সেই সকল নরশ্রেষ্ঠ জরাসন্ধ রাজাকে দেখামাত্র বলল—“মহারাজ! আপনার মঙ্গল হোক।” জনমেজয়! এ কথা বলে তারা তিনজনই উঠে দাঁড়াল, আর কখনও রাজা জরাসন্ধের দিকে, কখনও নিজেদের মধ্যে একে অপরের দিকে তাকাতে লাগল।

Verse 39

स्वस्त्यस्तु कुशलं राजन्निति तत्र व्यवस्थिता: । त॑ नृप॑ नृपशार्दूल प्रेक्षमाणा: परस्परम्‌,भरतवंशशिरोमणे! शत्रुओंका नाश करनेवाले वे सभी नरश्रेष्ठ राजा जरासंधको देखते ही इस प्रकार बोले--“महाराज! आपका कल्याण हो।” जनमेजय! ऐसा कहकर वे तीनों खड़े हो गये तथा कभी राजा जरासंधको और कभी आपसमें एक दूसरेको देखने लगे

সেখানে দাঁড়িয়েই তাঁরা রাজাকে শিষ্ট আশীর্বাদ জানালেন—“মহারাজ, আপনার মঙ্গল হোক।” তারপর সেই তিন শ্রেষ্ঠ পুরুষ উঠে দাঁড়ালেন; হে নৃপশার্দূল, ভরতবংশ-শিরোমণি! তাঁরা কখনো রাজা জরাসন্ধের দিকে, কখনো পরস্পরের দিকে তাকাতে লাগলেন—যেন নীরবে পরবর্তী পদক্ষেপ বিচার করছেন।

Verse 40

तानब्रवीज्जरासंधस्तथा पाण्डवयादवान्‌ | आस्यतामिति राजेन्द्र ब्राह्मणच्छग्मसंवृतान्‌,राजेन्द्र! ब्राह्मणोंके छद्मवेषमें छिपे हुए उन पाण्डव तथा यादव वीरोंको लक्ष्य करके जरासंधने कहा--“आपलोग बैठ जायाँ'

তখন জরাসন্ধ সেই পাণ্ডব ও যাদব বীরদের—যাঁরা ব্রাহ্মণের ছদ্মবেশে আচ্ছন্ন ছিলেন—উদ্দেশ করে বললেন, “রাজেন্দ্র, আপনারা বসুন।”

Verse 41

अथोपविविशु: सर्वे त्रयस्ते पुरुषर्षभा: । सम्प्रदीप्तास्त्रयो लक्ष्म्या महाध्वर इवाग्नय:,फिर वे सभी बैठ गये। वे तीनों पुरुषसिंह महान्‌ यज्ञमें प्रजज्लित तीन अग्नियोंकी भाँति अपनी अपूर्व शोभासे उद्धासित हो रहे थे

তখন সেই তিন পুরুষর্ষভ বসে পড়লেন। তাঁদের দীপ্তিমান শোভা এমন জ্বলে উঠল, যেন মহাযজ্ঞে প্রজ্বলিত তিনটি অগ্নি।

Verse 42

तानुवाच जरासंध: सत्यसंधो नराधिप: । विगर्हमाण: कौरव्य वेषग्रहणवैकृतान्‌ । न स्नातकव्रता विप्रा बहिर्मालल्‍्यानुलेपना:,कुरुनन्दन! उस समय सत्यप्रतिज्ञ राजा जरासंधने वेषग्रहणके विपरीत आचरणवाले उन तीनोंकी निन्‍्दा करते हुए कहा--“ब्राह्मणो! इस मानव-जगतमें सर्वत्र प्रसिद्ध है कि स्नातक-व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण समावर्तन आदि विशेष निमित्तके बिना माला और चन्दन नहीं धारण करते। मुझे भी यह अच्छी तरह मालूम है। आपलोग कौन हैं? आपके गलेमें फ़ूलोंकी माला है और भुजाओंमें धनुषकी प्रत्यंचाकी रगड़का चिह्न स्पष्ट दिखायी देता है

তখন সত্যসংকল্প নরাধিপ জরাসন্ধ, হে কৌরব্য, তাদের ধিক্কার দিয়ে বললেন—যাদের আচরণ তাদের ধারণ করা বেশের সঙ্গে সঙ্গত ছিল না: “ব্রাহ্মণগণ! স্নাতক-ব্রত পালনকারী ব্রাহ্মণরা সমাবর্তন প্রভৃতি বিশেষ উপলক্ষ ছাড়া মালা ও চন্দনলেপ ধারণ করেন না—এ কথা লোকপ্রসিদ্ধ, এবং আমারও সুপরিচিত। তবে তোমরা কারা? তোমাদের গলায় পুষ্পমালা, আর বাহুতে ধনুর্জ্যার ঘর্ষণের চিহ্ন স্পষ্ট দেখা যাচ্ছে।”

Verse 43

भवन्तीति नृलोके5स्मिन्‌ विदितं मम सर्वश: । के यूयं पुष्पवन्तश्न भुजैज्याकृतलक्षणै:,कुरुनन्दन! उस समय सत्यप्रतिज्ञ राजा जरासंधने वेषग्रहणके विपरीत आचरणवाले उन तीनोंकी निन्‍्दा करते हुए कहा--“ब्राह्मणो! इस मानव-जगतमें सर्वत्र प्रसिद्ध है कि स्नातक-व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण समावर्तन आदि विशेष निमित्तके बिना माला और चन्दन नहीं धारण करते। मुझे भी यह अच्छी तरह मालूम है। आपलोग कौन हैं? आपके गलेमें फ़ूलोंकी माला है और भुजाओंमें धनुषकी प्रत्यंचाकी रगड़का चिह्न स्पष्ट दिखायी देता है

“এই রীতি মানবলোকে সর্বত্রই প্রসিদ্ধ, এবং আমারও সর্বতোভাবে জানা। তবে তোমরা কারা—যাদের গলায় পুষ্পমালা, আর বাহুতে ধনুর্জ্যার ঘর্ষণচিহ্ন?”

Verse 44

महाभारत-- जरासंधके भवनमें श्रीकृष्ण, भीमसेन और अर्जुन भीमसेन और जरासंधका युद्ध बिश्रत: क्षात्रमोज श्ष ब्राह्मण्यं प्रतिजानथ । एवं विरागवसना बहि्माल्यानुलेपना: । सत्यं वदत के यूयं सत्यं राजसु शोभते,“आपलोग क्षत्रियोचित तेज धारण करते हैं, परंतु ब्राह्मण होनेका परिचय दे रहे हैं। इस प्रकार भाँति-भाँतिके रंगीन कपड़े पहने और अकारण माला तथा चन्दन लगाये हुए आप कौन हैं? सच बताइये। राजाओंमें सत्यकी ही शोभा होती है

বৈশম্পায়ন বললেন— “তোমাদের ক্ষাত্রতেজ যেন লুপ্ত হয়েছে, অথচ তোমরা ব্রাহ্মণ্য দাবি করছ। এমন বিচিত্র বর্ণের বস্ত্র পরে, অকারণে মালা ও চন্দন মেখে—তোমরা কারা? সত্য বলো। রাজাদের মধ্যে সত্যই শোভা পায়।”

Verse 45

चैत्यकस्य गिरे: शृज्ूं भित्ता किमिह छद्मना । अद्वारेण प्रविष्टा: स्थ निर्भया राजकिल्बिषात्‌,'चैत्यक पर्वतके शिखरको तोड़कर राजाका अपराध करके भी उससे भयभीत न हो छटद्गावेष धारण किये द्वारके बिना ही इस नगरमें जो आपलोग घुस आये हैं, इसका क्या कारण है?

বৈশম্পায়ন বললেন— “চৈত্যক পর্বতের শিখর ভেঙে তোমরা ছদ্মবেশে এখানে কেন এলে? আর কোনো দ্বার না দিয়ে নগরে প্রবেশ করেও, রাজার অপরাধ করে, তোমরা কীভাবে নির্ভয়ে দাঁড়িয়ে আছ?”

Verse 46

वदध्वं वाचि वीर्य च ब्राह्मणस्य विशेषत: । कर्म चैतद्‌ विलिड्रस्थं कि वोउ्द्य प्रसमीक्षितम्‌,“बताइये, ब्राह्मणके तो प्रायः वचनमें ही वीरता होती है, उसकी क्रियामें नहीं। आपलोगोंने जो यह पर्वतशिखर तोड़नेका काम किया है, यह आपके वर्ण तथा वेषके सर्वथा विपरीत है, बताइये आपने आज क्या सोच रखा है?

বৈশম্পায়ন বললেন— “বলো। ব্রাহ্মণের বীর্য বিশেষত বাক্যেই—কর্মে নয়। তোমরা যে কাজ করেছ—পর্বতশিখর ভাঙা—তা তোমাদের বর্ণ ও বেশের সম্পূর্ণ বিপরীত। আজ তোমরা কী স্থির করেছ?”

Verse 47

एवं च मामुपास्थाय कस्माच्च विधिनाहणाम्‌ | प्रतीतां नानुगृह्नीत कार्य कि वास्मदागमे,“इस प्रकार मेरे यहाँ उपस्थित हो मेरे द्वारा विधिपूर्वक अर्पित की हुई इस पूजाको आपलोग ग्रहण क्‍यों नहीं करते हैं? फिर मेरे यहाँ आनेका प्रयोजन ही क्या है?”

বৈশম্পায়ন বললেন— “এভাবে আমার সামনে উপস্থিত হয়ে, বিধিপূর্বক অর্পিত এই পূজা তোমরা কেন গ্রহণ করছ না? যদি গ্রহণ না করো, তবে আমার গৃহে আসার উদ্দেশ্যই বা কী?”

Verse 48

एवमुक्ते ततः कृष्ण: प्रत्युवाच महामना: । स्निग्धगम्भीरया वाचा वाक्यं वाक्यविशारद:,जरासंधके ऐसा कहनेपर बोलनेमें चतुर महामना श्रीकृष्ण स्निग्ध एवं गम्भीर वाणीमें इस प्रकार बोले

এ কথা শুনে মহামনা, বাক্যপ্রয়োগে নিপুণ শ্রীকৃষ্ণ স্নিগ্ধ ও গম্ভীর কণ্ঠে প্রত্যুত্তর দিলেন।

Verse 49

श्रीकृष्ण उवाच स्नातकान ब्राह्मणान्‌ राजन्‌ विद्धयस्मांस्त्वं नराधिप । स्नातकव्रतिनो राजन ब्राह्मुणा: क्षत्रिया विश:,श्रीकृष्णने कहा--राजन्‌! तुम हमें (वेषके अनुसार) स्नातक ब्राह्मण समझ सकते हो। वैसे तो स्नातक व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य तीनों वर्णोके लोग होते हैं

শ্রীকৃষ্ণ বললেন—হে রাজন, নরাধিপ! আমাদের বাহ্যচিহ্ন ও আচরণ দেখে তুমি আমাদের স্নাতক ব্রাহ্মণ বলে জেনো। কিন্তু হে রাজন, স্নাতক-ব্রত পালনকারী ব্রাহ্মণ, ক্ষত্রিয় ও বৈশ্য—এই তিন দ্বিজবর্ণেই বিদ্যমান।

Verse 50

विशेषनियमाश्रैषामविशेषाश्च सन्त्युत । विशेषवांश्व सतत क्षत्रिय: श्रियमृच्छति,इन स्नातकोंमें कुछ विशेष नियमका पालन करनेवाले होते हैं और कुछ साधारण। विशेष नियमका पालन करनेवाला क्षत्रिय सदा लक्ष्मीको प्राप्त करता है

এই স্নাতকদের মধ্যে কেউ বিশেষ নিয়ম পালন করে, আর কেউ কেবল সাধারণ নিয়মে থাকে। যে ক্ষত্রিয় সর্বদা বিশেষ নিয়মে স্থিত থাকে, সে নিশ্চিতই শ্রী-লক্ষ্মী ও রাজসমৃদ্ধি লাভ করে।

Verse 51

पुष्पवत्सु ध्रुवा श्रीक्ष पुष्पवन्तस्ततो वयम्‌ । क्षत्रियो बाहुवीर्यस्तु न तथा वाक्यवीर्यवान्‌ | अप्रगल्भं वचस्तस्य तस्माद्‌ बार्हद्रथेरितम्‌,जो पुष्प धारण करनेवाले हैं, उनमें लक्ष्मीका निवास ध्रुव है, इसीलिये हमलोग पुष्पमालाधारी हैं। क्षत्रियका बल और पराक्रम उसकी भुजाओंमें होता है, वह बोलनेमें वैसा वीर नहीं होता। बृहद्रथनन्दन! इसीलिये क्षत्रियका वचन धृष्टतारहित (विनययुक्त) बताया गया है

শ্রীকৃষ্ণ বললেন—যেখানে পুষ্প আছে, সেখানে শ্রী-লক্ষ্মীর স্থিতি স্থির বলে মানা হয়; তাই আমরা পুষ্পমালাধারী। ক্ষত্রিয়ের বীর্য বাহুতে, বাক্যের দম্ভে নয়। অতএব, হে বৃহদ্রথনন্দন, ক্ষত্রিয়ের বাক্যকে ধৃষ্টতাহীন—সংযত ও বিনীত—বলা হয়েছে।

Verse 52

स्ववीर्य क्षत्रियाणां तु बाह्वोर्धाता न्यवेशयत्‌ । तद्‌ दिदृक्षसि चेद्‌ राजन द्रष्टास्यद्य न संशय:,विधाताने क्षत्रियोंका अपना बल उनकी भुजाओंमें ही भर दिया है। राजन! यदि आज उसे देखना चाहते हो तो निश्चय ही देख लोगे

বিধাতা ক্ষত্রিয়দের স্ববীর্য তাদের বাহুতেই স্থাপন করেছেন। হে রাজন, তুমি যদি আজ তা দেখতে চাও, তবে নিঃসন্দেহে দেখবে।

Verse 53

अद्वारेण रिपोर्गेह द्वारेण सुहृदो गुहान्‌ । प्रविशन्ति नरा धीरा द्वाराण्येतानि धर्मत:,धीर मनुष्य शत्रुके घरमें बिना दरवाजेके और मित्रके घरमें दरवाजेसे जाते हैं। शत्रु और मित्रके लिये ये धर्मत: द्वार बतलाये गये हैं

ধীর পুরুষ শত্রুর গৃহে দ্বার দিয়ে নয়, গোপন পথে প্রবেশ করে; আর বন্ধুর গৃহে যথাযথ দ্বার দিয়েই যায়। শত্রু ও মিত্রের সঙ্গে আচরণে ধর্মসম্মত এই-ই ‘দ্বার’ নির্ধারিত।

Verse 54

कार्यवन्तो गृहानेत्य शत्रुतो नारहणां वयम्‌ । प्रतिगृहल्लीम तद्‌ विद्धि एतन्न: शाश्व॒तं व्रतम्‌,हम अपने कार्यसे तुम्हारे घर आये हैं; अतः शत्रुसे पूजा नहीं ग्रहण कर सकते। इस बातको तुम अच्छी तरह समझ लो। यह हमारा सनातन व्रत है

আমরা এক বিশেষ কার্যসাধনে তোমার গৃহে এসেছি; অতএব শত্রুর কাছ থেকে সম্মান বা আতিথ্য গ্রহণ করতে পারি না। এ কথা ভালো করে জেনে রেখো—এটাই আমাদের চিরন্তন ব্রত।

Verse 113

आज हमलोग उसके घरपर ही चलकर उसका सारा घमंड हर लेंगे

আজই আমরা সোজা তার গৃহে গিয়ে তার সমস্ত দম্ভ চূর্ণ করব।

Verse 231

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि जरासंधवधपर्वणि कृष्णजरासंधसंवादे एकविंशो5ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের সভাপর্বে, জরাসন্ধবধপর্বের অন্তর্গত কৃষ্ণ-জরাসন্ধ সংলাপে একবিংশ অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 283

अशोभन्त महाराज बाहवो युद्धशालिनाम्‌ | जैसे हिमालयकी गुफाओंमें रहनेवाले सिंह गौओंका स्थान ढूँढ़ते हुए आगे बढ़ते हों, उसी प्रकार वे तीनों वीर राजभवनकी तलाश करते हुए वहाँ पहुँचे थे। महाराज! युद्धमें विशेष शोभा पानेवाले उन तीनों वीरोंकी भुजाएँ साखूके लट्ठे-जैसी सुशोभित हो रही थीं। उनपर चन्दन और अगुरुका लेप किया गया था

বৈশম্পায়ন বললেন—হে মহারাজ! যুদ্ধে যাঁরা বিশেষ দীপ্তি লাভ করেন, সেই বীরদের বাহু অপূর্ব শোভা পাচ্ছিল। যেমন হিমালয়ের গুহাবাসী সিংহ গাভীদের আবাস খুঁজতে অগ্রসর হয়, তেমনই সেই তিন বীর রাজপ্রাসাদের সন্ধানে এগিয়ে সেখানে উপস্থিত হলেন। তাঁদের বাহু শালকাষ্ঠের গুঁড়ির মতো দৃঢ়, আর তাতে চন্দন ও অগুরু লেপিত ছিল।

Frequently Asked Questions

The episode raises a dharmic question about how to treat an exhausted opponent: whether advantage-taking is permissible, or whether kṣatra-dharma requires maintaining parity and avoiding conduct that could be judged as improper coercion.

Strength is framed as accountable to norms: strategic success should remain aligned with regulated conduct, and counsel (nīti) functions to keep power within ethical boundaries even in high-stakes contests.

No explicit phalaśruti appears in this chapter’s cited verses; its significance is primarily narrative-ethical, establishing the duel’s normative frame and preparing for a later decisive outcome within the episode.