Mahabharata Adhyaya 204
Drona ParvaAdhyaya 204171 Versesद्रोण के पतन के बाद कौरव-सेना में भग्नता; पाण्डव-पक्ष की बढ़त और मनोबल-उत्थान।

Adhyaya 204

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को सुनाते हैं—धृष्टद्युम्न के हाथों अतिरथी द्रोणाचार्य के निहत होते ही कौरव-सेना में भगदड़ मचती है और पाण्डवों में विजय-ध्वनि उठती है। उसी क्षण अर्जुन के मन में एक अद्भुत जिज्ञासा जागती है, क्योंकि युद्ध के बीच व्यास का ‘यदृच्छया’ आगमन होता है। → द्रोण-वध के बाद युद्ध का संतुलन बदल चुका है, पर अर्जुन के भीतर प्रश्न और भी तीव्र हो उठता है—ऐसे महाविनाश के बीच कौन-सा आश्रय, कौन-सी परम सत्ता है जो सबको धारण करती है? वह व्यास से शिव-महिमा पूछता है; व्यास कथा-धारा को युद्ध से उठाकर ब्रह्मा-वचन और देव-स्तुति की विराट ऊँचाई पर ले जाते हैं—महादेव के घोर-दीप्त, बहुरूप, सर्वनेत्र, सर्वव्यापी स्वरूप का वर्णन बढ़ता जाता है। → ब्रह्मा द्वारा शिव की परम-स्तुति—‘त्वं यज्ञः… त्वं गतिः… त्वं परायणम्’—और शिव के विश्वरूप का चरम उद्घोष: सहस्र/दशसहस्र नेत्र, सर्वतोऽक्षिमय, भूत-भव्य-भविष्य का उद्गम, तथा वे ही देने वाले और संहार करने वाले—यही अध्याय का शिखर है, जहाँ युद्ध-धूलि के ऊपर ब्रह्माण्डीय सत्य का प्रकाश फूट पड़ता है। → व्यास अर्जुन को यह बोध कराते हैं कि महादेव ही जगत के आधार, यज्ञ के आत्मा, और फलदाता-फलहरणकर्ता हैं; उनके अनेक पूज्य रूप लोक में प्रतिष्ठित हैं। अर्जुन की जिज्ञासा को दिशा मिलती है—विजय का कारण केवल बाहुबल नहीं, परमेश्वर-आश्रय और धर्म-स्थित प्रार्थना भी है। → अर्जुन के भीतर शिव-शरणागति और आगे के युद्ध-कर्तव्य का संकल्प गहराता है—पर द्रोण के पतन के बाद कौरव-पक्ष किस प्रकार प्रतिशोध और नई व्यूह-रचना करेगा, यह अगले प्रसंग की ओर कथा को धकेल देता है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २६ लोक मिलाकर कुल १०२३ श्लोक हैं।) #द-3८5>> | मर । >> द्र्याधिकद्विशततमो< ध्याय: व्यासजीका अर्जुनसे भगवान्‌ शिवकी महिमा बताना तथा द्रोणपर्वके पाठ और श्रवणका फल धृतराष्ट उवाच तस्मिन्नतिरथे द्रोणे निहते पार्षतेन वै मामका: पाण्डवाश्वैव किमकुर्वन्नत: परम्‌

ধৃতরাষ্ট্র বললেন—সঞ্জয়! পার্ষত (ধৃষ্টদ্যুম্ন) কর্তৃক অতিরথ দ্রোণ নিহত হলে, তারপর আমার পুত্রেরা ও পাণ্ডুপুত্রেরা কী করল?

Verse 2

संजय उवाच तस्मिन्नतिरथे द्रोणे निहते पार्षतेन वै कौरवेषु च भग्नेषु कुन्तीपुत्रो धनंजय:

সঞ্জয় বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! পার্ষত (ধৃষ্টদ্যুম্ন) কর্তৃক অতিরথ দ্রোণ নিহত হলে এবং কৌরবসেনা ভেঙে পলায়ন করলে, কুন্তীপুত্র ধনঞ্জয় (অর্জুন) বিজয়দায়ক এক আশ্চর্য ঘটনা দেখে, হঠাৎ সেখানে উপস্থিত মহর্ষি ব্যাসকে সে বিষয়ে জিজ্ঞাসা করল।

Verse 3

दृष्टवा सुमहदाश्चर्यमात्मनो विजयावहम्‌ | यदृच्छया55गतं व्यासं पप्रच्छ भरतर्षभ

সঞ্জয় বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ! নিজের পক্ষের বিজয় আনয়নকারী এক মহৎ ও আশ্চর্য ঘটনা দেখে, অর্জুন সংযোগক্রমে সেখানে আগত ব্যাসকে সে বিষয়ে জিজ্ঞাসা করল।

Verse 4

अजुन उवाच संग्रामे न्यहनं शत्रून्‌ शरौघैर्विमलैरहम्‌ । अग्रतो लक्षये यान्तं पुरुषं पावकप्रभम्‌

অর্জুন বললেন—মহর্ষে! যুদ্ধে আমি যখন নির্মল বাণসমূহের প্রবল বর্ষণে শত্রুদের সংহার করছিলাম, তখন আমার অগ্রে অগ্রে অগ্নিসদৃশ তেজস্বী এক পুরুষকে চলতে দেখলাম।

Verse 5

ज्वलन्तं शूलमुद्रम्य यां दिशं प्रतिपद्यते । तस्यां दिशि विदीर्यन्ते शत्रवों मे महामुने,महामुने! वे जलता हुआ शूल हाथमें लेकर जिस ओर जाते उसी दिशामें मेरे शत्रु विदीर्ण हो जाते थे

অর্জুন বললেন—হে মহামুনি! তিনি যখন জ্বলন্ত শূল তুলে যে দিকে অগ্রসর হতেন, সেই দিকেই আমার শত্রুরা বিদীর্ণ হয়ে চূর্ণ-বিচূর্ণ হয়ে যেত। তাঁর সঙ্গে চলা সেই অপ্রতিরোধ্য শক্তিতে যুদ্ধের গতি বদলে যেত, আর অধর্মীরা যেন দিব্য তেজের সামনে পতিত হতো।

Verse 6

तेन भग्नानरीन्‌ सर्वान्‌ मद्धग्नान्‌ मन्‍्यते जन: । तेन भग्नानि सैन्यानि पृष्ठतो<नुव्रजाम्पयहम्‌

তাঁর দ্বারাই সকল শত্রু ভগ্ন ও বিতাড়িত হয়েছিল; তবু লোক মনে করে আমি-ই তাদের পরাস্ত করেছি। শত্রুসেনা তাঁরই দ্বারা চূর্ণ হয়েছিল; আমি তো কেবল তাঁর পশ্চাতে চলেছিলাম—যশ প্রায়ই দৃশ্যমান কর্মীর গলায় ঝোলে, সত্য কারণ অদৃশ্যই থাকে।

Verse 7

भगवंस्तन्ममाचक्ष्व को वै स पुरुषोत्तम: । शूलपाणिम्मया दृष्टस्तेजसा सूर्यसंनिभ:,भगवन्‌! मुझे बताइये, वे महापुरुष कौन थे? मैंने उन्हें हाथमें त्रिशूल लिये देखा था। वे सूर्यके समान तेजस्वी थे

ভগবন্, আমাকে স্পষ্ট করে বলুন—সে পুরুষোত্তম কে? আমি তাকে হাতে শূল ধারণ করে দেখেছি; সে সূর্যের ন্যায় তেজস্বী।

Verse 8

न पद्भ्यां स्पृशते भूमिं न च शूलं विमुज्चति । शूलाच्छूलसहस्राणि निष्येतुस्तस्य तेजसा

তিনি পায়ে ভূমি স্পর্শ করতেন না, আর শূলও কখনো হাতছাড়া করতেন না। তাঁর তেজে সেই এক শূল থেকেই সহস্র সহস্র শূল উৎপন্ন হয়ে শত্রুদের উপর ঝাঁপিয়ে পড়ত।

Verse 9

व्यास उवाच प्रजापतीनां प्रथमं तैजसं पुरुष॑ प्रभुम्‌ । भुवनं भूर्भुव॑ देवं सर्वलोकेश्वरं प्रभुम्‌

ব্যাস বললেন—অর্জুন! তুমি বরদায়ক ভগবান শঙ্করকেই দর্শন করেছ—যিনি প্রজাপতিদের মধ্যে অগ্রগণ্য, তেজঃস্বরূপ পরম পুরুষ ও অন্তর্যামী প্রভু; যাঁর মধ্যে ভূঃ, ভুবঃ প্রভৃতি সকল ভুবন অন্তর্ভুক্ত; যিনি দিব্য দেব, সর্বলোকেশ্বর ও সর্বলোকের অধিপতি। অতএব তাঁরই শরণ গ্রহণ কর।

Verse 10

ईशान वरदं पार्थ दृष्टटानसि शड्करम्‌ | तं॑ गच्छ शरण देव॑ वरद॑ं भुवनेश्चरम्‌

ব্যাস বললেন—হে পার্থ! তুমি বরদাতা ঈশান শঙ্করকে দর্শন করেছ। সেই দিব্য বরপ্রদ, সকল ভুবনের অধীশ্বরের শরণ গ্রহণ করো। বিপদ ও ধর্মকর্তব্যের মাঝেও তোমার শক্তি পরম প্রভুর শরণাগতিতেই স্থিত হোক—কর্মকে যথার্থ শক্তি দান করার অধিকার একমাত্র তাঁরই।

Verse 11

महादेवं महात्मानमीशानं जटिलं विभुम्‌ । त्र्यक्षं महाभुजं रुद्रे शिखिनं चीरवाससम्‌

তিনি মহাদেব, মহাত্মা—ঈশান, সর্বব্যাপী, জটাধারী। ত্রিনয়ন, মহাবাহু রুদ্র; শিখাবদ্ধ কেশ ও বল্কলবস্ত্রে শোভিত।

Verse 12

महादेवं हरं स्थाणुं वरदं भुवनेश्वरम्‌ जगत्प्रधानमजितं जगत्प्रीतिमधी श्वरम्‌

মহাদেব—হর ও স্থাণু নামে প্রসিদ্ধ—বরদাতা এবং সকল ভুবনের অধীশ্বর। তিনি জগতের আদিম ভিত্তি, অজেয়; জগত প্রেম ও মঙ্গল তাঁরই থেকে পায়, এবং তিনিই সর্বাধিপতি।

Verse 13

जगद्योनिं जगद्वघीजं॑ जयिनं जगतो गतिम्‌ | विश्वात्मानं विश्वसृजं विश्वमूर्ति यशस्विनम्‌

তিনিই জগতের যোনি, জগতের বীজ, সদা বিজয়ী এবং জগতের গতি ও আশ্রয়। তিনি বিশ্বাত্মা, বিশ্বস্রষ্টা, বিশ্বরূপ এবং যশস্বী।

Verse 14

विश्वेश्वरं विश्वनरं कर्मणामीश्ररं प्रभुम्‌ शम्भुं स्वयम्भुं भूतेशं भूतभव्यभवोद्धवम्‌

তিনি বিশ্বেশ্বর, বিশ্বনিয়ন্তা, কর্মের অধীশ্বর ও প্রভু। তিনি শম্ভু, স্বয়ম্ভূ, সকল ভূতের অধিপতি; অতীত, ভবিষ্যৎ ও বর্তমান—সব কালের উৎসও তিনিই।

Verse 15

योगं योगेश्वरं सर्व सर्वलोकेश्वरेश्वरम्‌ । सर्वश्रेष्ठ जगच्छेष्ठं वरिष्ठ परमेछ्ठिनम्‌

তিনি স্বয়ং যোগ এবং যোগেশ্বর; তিনি সর্বস্বরূপ, এবং সকল লোকেশ্বরেরও ঈশ্বর। তিনি সর্বশ্রেষ্ঠ, সমগ্র জগতের শ্রেষ্ঠ, এবং শ্রেষ্ঠতম—পরমেষ্ঠী—তিনিই।

Verse 16

लोकत्रयविधातारमेकं॑ लोकत्रयाश्रयम्‌ । शुद्धात्मानं भवं भीम॑ं शशाडुककृतशेखरम्‌,तीनों लोकोंके एकमात्र स्रष्टा, त्रिलोकीके आश्रय, शुद्धात्मा, भव, भीम और चन्द्रमाका मुकुट धारण करनेवाले भी वे ही हैं

তিনি ত্রিলোকের একমাত্র বিধাতা এবং ত্রিলোকের আশ্রয়; তিনি শুদ্ধাত্মা, ভব, ভীম, এবং যাঁর শিরোভূষণ চন্দ্র।

Verse 17

शाश्वतं भूधरं देवं सर्ववागीश्चरेश्वरम्‌ । सुदुर्जयं जगन्नाथं जन्ममृत्युजरातिगम्‌

তিনি শাশ্বত দেব, পৃথিবীধারী, এবং সকল বাক্‌-ঈশ্বরদেরও ঈশ্বর। তিনি অজেয়, জগন্নাথ, এবং জন্ম-মৃত্যু-জরার অতীত।

Verse 18

ज्ञानात्मानं ज्ञानगम्यं ज्ञानश्रेष्ठं सुदुर्विदम्‌ । दातारं चैव भक्तानां प्रसादविहितान्‌ वरान्‌

তিনি জ্ঞানস্বরূপ, জ্ঞান দ্বারাই গম্য, এবং জ্ঞানের মধ্যে শ্রেষ্ঠ—তবু তাঁকে জানা অতি দুরূহ। তিনি ভক্তদের প্রতি প্রসন্ন হয়ে অনুগ্রহে মনঃকামিত উত্তম বর দান করেন।

Verse 19

तस्य पारिषदा दिव्या रूपैर्नानाविधैरविंभो: । वामना जटिला मुण्डा हस्वग्रीवा महोदरा:

সেই বিভু শংকরের দিব্য পার্ষদগণ নানাবিধ রূপে প্রকাশিত হচ্ছিলেন—কেউ বামন, কেউ জটাধারী, কেউ মুণ্ডিতমস্তক, কেউ খর্বগ্রীব; কারও উদর ছিল বৃহৎ। তাঁদের বেশভূষাও ছিল ভয়ংকর।

Verse 20

महाकाया महोत्साहा महाकर्णास्तथापरे | आननैविंकृतै: पादै: पार्थ वेषैश्व वैकृतै:

ব্যাস বললেন—হে পার্থ! শঙ্করের দিব্য পার্ষদগণ নানা বিচিত্র রূপে প্রকাশিত হন। কেউ মহাকায় ও মহোৎসাহী, কারও কান অতি বৃহৎ। কারও মুখ বিকৃত, কারও পা বেঁকে-চুরে; আর তাদের বেশভূষাও ভয়ংকর ও অদ্ভুত। এইভাবে প্রভুর অনুচরবৃন্দ নানারূপ ধারণ করে দৃশ্যমান হয়—সাধারণ সৌন্দর্যে নয়, বিস্ময় ও ভীতিমিশ্রিত মহিমায় মনকে আচ্ছন্ন করে।

Verse 21

ईदृशै: स महादेव: पूज्यमानो महेश्वर: । स शिवस्तात तेजस्वी प्रसादाद्‌ याति तेडग्रत:

এমন পার্ষদদের দ্বারা পূজিত সেই মহাদেব—মহেশ্বর—কৃপাবশে তোমার অগ্রে অগ্রে অগ্রসর হন। হে বৎস! সেই দীপ্তিমান শিবই পুরুষরূপে এগিয়ে গিয়ে তোমাকে পথ দেখান ও রক্ষা করেন।

Verse 22

तस्मिन्‌ घोरे सदा पार्थ संग्रामे रोमहर्षणे । दौणिकर्णकृपैर्गुप्तां महेष्वासै: प्रहारिभि:

ব্যাস বললেন—হে পার্থ, সেই ভয়ংকর ও সদা রোমাঞ্চকর যুদ্ধে অশ্বত্থামা, কর্ণ, কৃপ এবং অন্যান্য প্রহারকুশল মহাধনুর্ধরদের দ্বারা রক্ষিত কৌরবসেনাকে বহুরূপধারী মহাধনুর্ধর দেব মহেশ্বর ব্যতীত কে-ই বা মনে-মনেও বিনাশ করতে সক্ষম ছিল?

Verse 23

कस्तां सेनां तदा पार्थ मनसापि प्रधर्षयेत्‌ । ऋते देवान्महेष्वासाद्‌ बहुरूपान्महेश्वरात्‌

ব্যাস বললেন—হে পার্থ! তখন অশ্বত্থামা, কর্ণ, কৃপ এবং অন্যান্য প্রহারকুশল মহাধনুর্ধরদের দ্বারা রক্ষিত সেই সেনাকে কে-ই বা মনে-মনেও দমন করতে পারত? দেবগণের মধ্যে শ্রেষ্ঠ মহাধনুর্ধর, বহুরূপধারী মহেশ্বর ব্যতীত আর কে?

Verse 24

स्थातुमुत्सहते कश्रिन्न तस्मिन्नग्रतः स्थिते । न हि भूतं सम॑ तेन त्रिषु लोकेषु विद्यते

ব্যাস বললেন—যখন তিনি সম্মুখভাগে দাঁড়িয়ে থাকেন, তখন কেউই স্থির হয়ে দাঁড়াবার সাহস পায় না। কারণ ত্রিলোকে তাঁর সমান কোনো সত্তা নেই।

Verse 25

गन्धेनापि हि संग्रामे तस्य क्रुद्धस्य शत्रव:ः । विसंज्ञा हतभूयिष्ठा वेपन्ति च पतन्ति च,संग्राममें भगवान्‌ शंकरके कुपित होनेपर उनकी गन्धसे भी शत्रु बेहोश होकर काँपने लगते और अधमरे होकर गिर जाते हैं

যুদ্ধক্ষেত্রের মধ্যেও, যখন ভগবান শঙ্কর ক্রুদ্ধ হন, তখন তাঁর গন্ধমাত্রেই শত্রুরা মূর্ছিত হয়ে পড়ে; তারা কাঁপতে থাকে এবং অর্ধমৃতপ্রায় হয়ে লুটিয়ে পড়ে।

Verse 26

तस्मै नमस्तु कुर्वन्तो देवास्तिष्ठन्ति वै दिवि । ये चान्ये मानवा लोके ते च स्वर्ग जितो नरा:

তাঁকে নমস্কার করে দেবতারা নিশ্চয়ই স্বর্গে প্রতিষ্ঠিত থাকেন; আর এই লোকের অন্যান্য মানুষও যারা তাঁকে নমস্কার করে, তারাও স্বর্গলাভ করে।

Verse 27

उनको नमस्कार करनेवाले देवता सदा स्वर्गलोकमें निवास करते हैं। दूसरे भी जो मानव इस लोकमें उन्हें नमस्कार करते हैं, वे भी स्वर्गलोकपर विजय पाते हैं ।।

যে ভক্তেরা বরদাতা দেব—শিব, রুদ্র, উমাপতি, সর্বেশ্বর—কে একনিষ্ঠভাবে সদা উপাসনা করে, তারা পরম অনুগ্রহ লাভ করে এবং স্বর্গপ্রাপ্ত হয়।

Verse 28

नमस्कुरुष्व कौन्तेय तस्मै शान्ताय वै सदा

কৌন্তেয়! সেই চিরশান্ত স্বরূপ প্রভুকে সদা নমস্কার করো। রুদ্র, নীলকণ্ঠ, কনিষ্ঠ (সূক্ষ্ম/দীপ্তিমান), উৎকৃষ্ট তেজস্বী, জটাধারী, ভয়ংকর রূপধারী, পিঙ্গলনয়ন এবং কুবেরকে বরদানকারী সেই শিবকে নমস্কার।

Verse 29

रुद्राय शितिकण्ठाय कनिष्ठाय सुवर्चसे । कपर्दिने करालाय हर्यक्षवरदाय च

রুদ্র, শিতিকণ্ঠ (নীলকণ্ঠ), কনিষ্ঠ (সূক্ষ্ম/দীপ্তিমান), সুবর্চস্‌ (উজ্জ্বল তেজস্বী), কপর্দী (জটাধারী), করাল, পিঙ্গলাক্ষ এবং কুবেরকে বরদানকারী প্রভুকে নমস্কার।

Verse 30

याम्यायाव्यक्तकेशाय सद्वृत्ते शड्कराय च | काम्याय हरिनेत्राय स्थाणवे पुरुषाय च

ব্যাস বললেন—যিনি যমের অনুকূল কালস্বরূপ, যাঁর কেশ অব্যক্ত আকাশসম, যিনি সদাচারসম্পন্ন শঙ্কর—সকলের মঙ্গলকারী; যিনি মনোহর, যাঁর দৃষ্টি পিঙ্গল, যিনি স্থাণু এবং সর্বভূতের অন্তরে অধিষ্ঠিত অন্তর্যামী পুরুষ—তাঁকে প্রণাম।

Verse 31

हरिकेशाय मुण्डाय कृशायोत्तारणाय च । भास्कराय सुतीर्थाय देवदेवाय रंहसे

যাঁর কেশ হরিত-তাম্রবর্ণ, যাঁর মস্তক মুণ্ডিত, যিনি কৃশ এবং সংসারসাগর পার করান; যিনি সূর্যসম দীপ্ত, শ্রেষ্ঠ তীর্থস্বরূপ, দেবদেব এবং অপ্রতিরোধ্য বেগশালী মহাদেব—তাঁকে প্রণাম।

Verse 32

बहुरूपाय सर्वाय प्रियाय प्रियवाससे । उष्णीषिणे सुवक्त्राय सहस्राक्षाय मीढुषे

যিনি বহুরূপধারী, সর্বস্বরূপ, সকলের প্রিয় এবং বল্কলাদি বস্ত্র যাঁর প্রিয়; যিনি উষ্ণীষ ধারণ করেন, যাঁর মুখ সুদর্শন, যিনি সহস্রনয়ন এবং বর্ষা ও অনুগ্রহ দানকারী—সেই ভগবান শংকরকে প্রণাম।

Verse 33

गिरिशाय प्रशान्ताय यतये चीरवाससे । हिरण्यबाहवे राज्ञे उग्राय पतये दिशाम्‌

পর্বতেশ্বর, পরম প্রশান্ত, যতি-স্বরূপ ও চীরবস্ত্রধারী; স্বর্ণালংকৃত বাহুযুক্ত, রাজস দীপ্তিতে উজ্জ্বল, উগ্র এবং দিকসমূহের অধিপতি ভগবান শংকরকে প্রণাম।

Verse 34

पर्जन्यपतये चैव भूतानां पतये नम: । वृक्षाणां पतये चैव गवां च पतये नम:,जो मेघोंके अधिपति तथा सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी हैं, उन्हें नमस्कार है। वृक्षोंके पालक और गौओंके अधिपतिरूप आपको नमस्कार है

মেঘের অধিপতিকে প্রণাম, এবং সকল ভূতের অধিপতিকে প্রণাম। বৃক্ষের পালনকর্তাকে প্রণাম, এবং গাভীদের অধিপতিকেও প্রণাম।

Verse 35

वृक्षेरावतकायाय सेनान्ये मध्यमाय च । ख्रुवहस्ताय देवाय धन्विने भार्गवाय च

ব্যাস বললেন—যাঁর দেহ বৃক্ষাবৃত, যিনি সেনার অধিনায়ক এবং অন্তর্যামী ‘মধ্য’; যিনি যজমানরূপে হাতে খ্রুবা ধারণ করেন; যিনি দিব্য, ধনুর্ধর এবং ভৃগুবংশীয়—পরশুরাম-রূপ—তাঁকে প্রণাম।

Verse 36

बहुरूपाय विश्वस्य पतये मुछजवाससे । सहस्रशिरसे चैव सहस्रनयनाय च

ব্যাস বললেন—বিশ্বের অধিপতি, বহুরূপধারী; মুঞ্জ-তৃণবস্ত্রধারী; সহস্রশির এবং সহস্রনয়ন—তাঁকে (প্রণাম)।

Verse 37

शरणं गच्छ कौन्तेय वरदं भुवनेश्वरम्‌

ব্যাস বললেন—হে কৌন্তেয়! বরদাতা ভুবনেশ্বরের শরণ গ্রহণ কর।

Verse 38

उमापतिं विरूपाक्ष॑ दक्षयज्ञनिबर्हणम्‌ । प्रजानां पतिमव्यग्रं भूतानां पतिमव्ययम्‌

ব্যাস বললেন—উমাপতি বিরূপাক্ষ, দক্ষযজ্ঞ-ধ্বংসকারী; প্রজাদের অব্যগ্র অধিপতি, সকল ভূতের অব্যয় প্রভু—(তাঁকে স্মরণ/প্রণাম)।

Verse 39

कुन्तीनन्दन! तुम उन्हीं वरदायक भुवनेश्वर, उमा वल्लभ, त्रिनेत्रधारी, दक्षयज्ञविनाशक, प्रजापति, व्यग्रतारहित और अविनाशी भगवान्‌ भूतनाथकी शरणमें जाओ ।।

হে কুন্তীনন্দন! সেই বরদাতা ভুবনেশ্বর—উমাবল্লভ, ত্রিনেত্রধারী, দক্ষযজ্ঞ-ধ্বংসকারী, প্রজাপতি, অব্যগ্র ও অব্যয় ভূতনাথ—তাঁর শরণ গ্রহণ কর। আমি কপর্দিন (জটাজূটধারী), বৃষাবর্ত (উৎকৃষ্ট গতি-সম্পন্ন), বৃষনাভ (শোভিত নাভিযুক্ত), বৃষধ্বজ (ধ্বজে বৃষচিহ্নধারী), বৃষদর্প, বৃষপতি, বৃষশৃঙ্গ ও বৃষর্ষভ—ধর্মের মূর্তি ও ধর্মেশ্বর—সেই ভগবানের শরণ নিই।

Verse 40

वृषाड्कं वृषभोदारं वृषभं वृषभेक्षणम्‌ | वृषायुधं वृषशरं वृषभूतं वृषेश्चरम्‌

যাঁর ধ্বজে বৃষভচিহ্ন, যিনি বৃষভসম উদার ও অচল, বৃষভতুল্য বিস্তৃত দৃষ্টিসম্পন্ন; যাঁর অস্ত্র ও শর ধর্মময়; যিনি স্বয়ং ধর্মস্বরূপ এবং ধর্মের অধীশ্বর—সেই প্রভুর শরণ আমি গ্রহণ করি।

Verse 41

महोदरं महाकायं द्वीपिचर्मनिवासिनम्‌ । लोकेशं वरदं मुण्डं ब्रह्मुण्यं ब्राह्मणप्रियम्‌

তিনি মহোদর, মহাকায়, ব্যাঘ্রচর্মপরিধানকারী; লোকেশ্বর, বরদাতা, মুণ্ডিতমস্তক; ব্রহ্মনিষ্ঠ এবং ব্রাহ্মণদের প্রিয়।

Verse 42

त्रिशूलपार्णिं वरदं खड्गचर्मधरं प्रभुम्‌ । पिनाकिनं खड्गधरं लोकानां पतिमीश्वरम्‌

ত্রিশূলধারী, বরদাতা, খড়্গ ও ঢালধারী প্রভু; পিনাকধারী, হাতে তরবারি—লোকসমূহের অধিপতি ঈশ্বর।

Verse 43

प्रपद्ये शरणं देवं शरण्यं चीरवाससम्‌ | कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंको धारण करनेके कारण जिनका उदर और शरीर विशाल है

আমি সেই দেবের শরণ গ্রহণ করি, যিনি শরণদাতা, চীরবস্ত্রধারী।

Verse 44

सुवाससे नमस्तुभ्यं सुव्रताय सुधन्विने । धनुर्धराय देवाय प्रियधन्वाय धन्विने

উত্তম বস্ত্রধারী, উত্তম ব্রতধারী, শ্রেষ্ঠ ধনুর্ধর—আপনাকে নমস্কার। ধনুর্ধর দেব, ধনুষপ্রিয়, ধন্বী—আপনাকে প্রণাম।

Verse 45

धन्वन्तराय धनुषे धन्याचार्याय ते नम: । उग्रायुधाय देवाय नम: सुरवराय च

ধন্বন্তর, ধনুকধারী এবং ধনুর্বিদ্যার ধন্য আচার্য—আপনাকে নমস্কার। ভয়ংকর অস্ত্রধারী দেব, দেবগণের শ্রেষ্ঠ—আপনাকে নমস্কার।

Verse 46

नमोस्तु बहुरूपाय नमोस्तु बहुधन्विने । नमोअस्तु स्थाणवे नित्यं नमस्तस्मै तपस्विने

বহুরূপধারীকে নমস্কার; বহুধনুকধারীকে নমস্কার। স্থাণু—অচল প্রভুকে নিত্য নমস্কার; সেই তপস্বী শিবকে নমস্কার।

Verse 47

नमोस्तु त्रिपुरघ्नाय भगघ्नाय च वै नमः । वनस्पतीनां पतये नराणां पतये नम:,त्रिपुरुनाशक और भभमनेत्रविनाशक भगवान्‌ शिवको बारंबार नमस्कार है। वनस्पतियोंके पति तथा नरपतिरूप महादेवजीको नमस्कार है

ত্রিপুরবিনাশক ও ভগবধকারীকে বারংবার নমস্কার। বনস্পতিদের অধিপতি এবং নরদের অধিপতি—মানবজাতির পরম শাসককে—নমস্কার।

Verse 48

मातृणां पतये चैव गणानां पतये नमः । गवां च पतये नित्यं यज्ञानां पतये नम:,मातृकाओंके अधिपति और गणोंके पालक शिवको नमस्कार है। गोपति और यज्ञपति शंकरको नित्य नमस्कार है

মাতৃগণের অধিপতি ও গণদের অধিপতিকে নমস্কার। গোপতি এবং যজ্ঞপতি শঙ্করকে নিত্য নমস্কার।

Verse 49

अपां च पतये नित्यं देवानां पतये नमः । पूष्णो दन्‍तविनाशाय त्र्यक्षाय वरदाय च

জলসমূহের অধিপতিকে নিত্য নমস্কার, এবং দেবগণের অধিপতিকে নমস্কার। পূষণের দন্তভঙ্গকারী, ত্রিনয়ন ও বরদ প্রভুকেও নমস্কার।

Verse 50

कर्माणि यानि दिव्यानि महादेवस्य धीमत:

মহাবুদ্ধিমান মহাদেবের যে দিব্য কর্মসমূহ—

Verse 51

तानि ते कीर्तयिष्यामि यथाप्रज्ञं यथाश्रुतम्‌ । अर्जुन! अब मैं परम बुद्धिमान्‌ महादेवजीके जो दिव्य कर्म हैं, उनका अपनी बुद्धिके अनुसार जैसा मैंने सुन रखा है, वैसा ही तुम्हारे समक्ष वर्णन करता हूँ ।।

যেমন শুনেছি, তেমনই নিজের বুদ্ধি অনুযায়ী আমি তোমাকে সেই কর্মসমূহ বর্ণনা করব। অর্জুন! এখন আমি পরম প্রজ্ঞাবান মহাদেবের দিব্য কর্মগুলি, আমার সাধ্য অনুসারে, তোমার সম্মুখে বিবৃত করছি। এই জগতে না দেবতা, না অসুর, না গন্ধর্ব, না রাক্ষস—

Verse 52

सुखमेधन्ति कुपिते तस्मिन्नपि गुहागता: । यदि वे कुपित हो जाये तो देवता, असुर, गन्धर्व और राक्षस इस लोकमें अथवा पातालमें छिप जानेपर भी चैनसे नहीं रहने पाते हैं ।।

তিনি ক্রুদ্ধ হলে গুহায় আশ্রয় নিলেও কেউ স্বস্তিতে থাকতে পারে না।

Verse 53

विव्याध कुपितो यज्ञ निर्दयस्त्वभवत्‌ तदा । धनुषा बाणमुत्सृूज्य सघोषं विननाद च

ক্রুদ্ধ হয়ে তিনি যজ্ঞে আঘাত হানলেন; তখন তিনি নির্মম হয়ে উঠলেন। ধনুক থেকে বাণ ছেড়ে তিনি প্রবল গর্জনে নিনাদ করলেন।

Verse 54

ते न शर्म कुतः शान्तिं लेभिरे सम सुरास्तदा । विद्रुते सहसा यज्ञे कुपिते च महेश्वरे,देवताओंको उस समय कहीं भी सुख और शान्ति नहीं मिली, महेश्वरके कुपित होनेसे सहसा यज्ञमें उपद्रव खड़ा हो गया था

তখন দেবতারা কোথাও না স্বস্তি পেল, না শান্তি। যজ্ঞে হঠাৎ বিশৃঙ্খলা দেখা দিল, আর মহেশ্বর ক্রুদ্ধ হলেন।

Verse 55

तेन ज्यातलघोषेण सर्वे लोका: समाकुला: । बभूवुर्वशगा: पार्थ निपेतुश्च सुरासुरा:

ধনুর্জ্যার সেই গভীর, প্রতিধ্বনিত গর্জনে সমস্ত লোক ব্যাকুল হয়ে উঠল। হে পার্থ, সকলেই তার বশে পরিণত হল; দেবতা ও অসুর—উভয়েই আঘাতপ্রাপ্ত হয়ে ভূমিতে লুটিয়ে পড়ল।

Verse 56

आपक्षुक्षुभिरे सर्वाश्चकम्पे च वसुंधरा । पर्वताश्च व्यशीर्यन्त दिशो नागाश्ष मोहिता:

সমস্ত পক্ষী-প্রাণী ব্যাকুল হয়ে উঠল এবং পৃথিবী কেঁপে উঠল। পর্বত ফেটে চূর্ণ হতে লাগল; দিকসমূহ ও মহা নাগগণও মোহাচ্ছন্ন হল।

Verse 57

समुद्रके जलमें ज्वार आ गया, धरती काँपने लगी, पर्वत टूट-फूटकर बिखरने लगे और दिग्गज मूर्च्छित हो गये ।।

ভয়ংকর অন্ধকারে আচ্ছন্ন হয়ে সমস্ত লোকলোকে কোথাও আলো রইল না। যেন ভগবান শিব সূর্যসহ সকল জ্যোতির দীপ্তি নিভিয়ে দিলেন।

Verse 58

चुक्षुभुर्भयभीताश्च शान्तिं चक्रुस्तथैव च । ऋषय: सर्वभूतानामात्मनश्नव सुखैषिण:

মহর্ষিরা ভয়ে কাঁপতে কাঁপতে উৎকণ্ঠিত হলেন এবং তখনই শান্তিকর্মে প্রবৃত্ত হলেন। সকল জীবের এবং নিজেদেরও মঙ্গল ও সুখ কামনা করে তাঁরা পুণ্যাহবাচন প্রভৃতি শমন-অনুষ্ঠান আরম্ভ করলেন।

Verse 59

पूषाणमभ्यद्रवत शड्कर: प्रहसन्निव । पुरोडाशं भक्षयतो दशनान्‌ वै व्यशातयत्‌,उस समय हँसते हुए-से भगवान्‌ शंकरने पूषापर आक्रमण किया। वे पुरोडाश खा रहे थे। उन्होंने उनके सारे दाँत तोड़ डाले

তখন শংকর যেন হাসতে হাসতে পূষার দিকে ধেয়ে গেলেন। পূষা পুরোডাশ ভক্ষণ করছিলেন; শংকর তাঁর সমস্ত দাঁত ভেঙে দিলেন।

Verse 60

ततो निश्चक्रमुर्देवा वेपमाना नता: सम ते । पुनश्न संदधे दीप्तान्‌ देवानां निशिताउशरान्‌

তখন সকল দেবতা ভয়ে কাঁপতে কাঁপতে এবং নতশিরে যজ্ঞশালা থেকে বাইরে বেরিয়ে এলেন। তারপরই ভগবান শিব দেবতাদের লক্ষ্য করে তীক্ষ্ণ, দীপ্তিমান বাণ সংযোজন করলেন।

Verse 61

सधूमान्‌ सस्फुलिज्ांश्व विद्युत्तोयदर्संनि भान्‌ । त॑ दृष्टवा तु सुरा: सर्वे प्रणिपत्य महेश्वरम्‌

সেই বাণগুলি ধোঁয়ায় আবৃত, স্ফুলিঙ্গ ছিটিয়ে, বিদ্যুৎ, বর্ষাধারা ও মেঘগর্জনের ন্যায় প্রতীয়মান হচ্ছিল। সেই ভয়ংকর প্রকাশ দেখে সকল দেবতা মহেশ্বরকে প্রণাম করলেন।

Verse 62

रुद्रस्य यज्ञभागं च विशिष्ट ते त्वकल्पयन्‌ | धूम और चिनगारियोंसहित वे बाण बिजलीसहित मेघोंके समान जान पड़ते थे। तब सम्पूर्ण देवताओंने भगवान्‌ महेश्वरको कुपित देख उनके चरणोंमें प्रणाम किया और रुद्रके लिये उन्होंने विशिष्ट यज्ञभागकी कल्पना की ।।

ভগবান মহেশ্বর (রুদ্র) ক্রুদ্ধ—এ দেখে সকল দেবতা ভয়ে বিহ্বল হয়ে তাঁর চরণে লুটিয়ে পড়লেন এবং রুদ্রের জন্য যজ্ঞে এক বিশেষ ভাগ নির্ধারণ করলেন। তাঁর ক্রোধ শান্ত হলে যজ্ঞ সম্পূর্ণ হল; আর সেই দিন থেকে দেবতারা রুদ্রকে স্মরণ করে সতর্ক থাকে।

Verse 63

तेन चैवातिकोपेन स यज्ञ: संधितस्तदा । भग्नाश्नापि सुरा आसन्‌ भीताश्चाद्यापि त॑ं प्रति

সেই প্রবল ক্রোধের কারণেই তখন সেই যজ্ঞ পুনরায় সংহত হয়ে সম্পন্ন হয়েছিল। দেবতারা তখনও ভয়ে ছত্রভঙ্গ হয়েছিল, আর আজও তারা তাঁর প্রতি ভীত থাকে।

Verse 64

असुराणां पुराण्यासंस्त्रीणि वीर्यवर्तां दिवि । आयसं राजतं चैव सौवर्ण परमं महत्‌

ব্যাস বললেন—রাজন! প্রাচীন কালে পরাক্রমশালী অসুরদের আকাশে তিনটি নগর ছিল—একটি লোহার, দ্বিতীয়টি রূপার, আর তৃতীয়টি অতিবিশাল স্বর্ণনির্মিত।

Verse 65

सौवर्ण कमलाक्षस्य तारकाक्षस्य राजतम्‌ | तृतीयं तु पुरं तेषां विद्युम्मालिन आयसम्‌,उनमेंसे सोनेका नगर कमलाक्षके, चाँदीका तारकाक्षके तथा तीसरा लोहेका बना हुआ नगर विद्युन्मालीके अधिकारमें था

তিনটি দুর্গনগরের মধ্যে স্বর্ণনগর ছিল কমলাক্ষের, রৌপ্যনগর ছিল তারকাক্ষের, আর তৃতীয়টি—লোহায় নির্মিত নগর—বিদ্যুন্মালীর অধীন ছিল।

Verse 66

न शक्तस्तानि मघवान्‌ भेत्तुं सर्वायुधैरपि । अथ सर्वे सुरा रुद्रं जग्मु: शरणमर्दिता:

মঘবান ইন্দ্র সর্বপ্রকার অস্ত্রশস্ত্র প্রয়োগ করেও সেই নগরগুলিকে ভেদ করতে পারলেন না। তখন তাদের দ্বারা পীড়িত সকল দেবতা রুদ্র (শিব)-এর শরণে গেলেন।

Verse 67

ते तमूचुर्महात्मानं सर्वे देवा: सवासवा: । ब्रह्मदत्तवरा होते घोरास्त्रिपुरवासिन:

তখন ইন্দ্রসহ সকল দেবতা সেই মহাত্মাকে বললেন—“হে ব্রহ্মার দত্ত বরপ্রাপ্ত পুরোহিত! ত্রিপুরবাসীরা ভয়ংকর…”

Verse 68

त्वदृते देवदेवेश नान्य: शक्त: कथंचन

হে দেবদেবেশ! আপনার ব্যতীত আর কেউ কোনোভাবেই সক্ষম নয়।

Verse 69

हन्तुं दैत्यान्‌ महादेव जहि तांस्त्वं सुरद्विष: । 'देवदेवेश्वर महादेव! आपके सिवा दूसरा कोई उन दैत्योंका वध करनेमें समर्थ नहीं है; अतः आप उन देवद्रोहियोंको मार डालिये || ६८ $ ।।

হে মহাদেব! ঐ দৈত্যদের সংহার করুন—দেবদ্রোহীদের নিধন করুন। আপনার ব্যতীত তাদের বধে আর কেউ সক্ষম নয়; অতএব আপনি দেবশত্রুদের অবসান ঘটান।

Verse 70

निपातयिष्यसे चैतानसुरान्‌ भुवनेश्वर । 'भुवनेश्वर! रुद्र! आप जब इन असुरोंका विनाश कर डालेंगे, तबसे सम्पूर्ण यज्ञकर्मोमें जो पशु (यज्ञके साधनभूत उपकरण) होंगे, वे रुद्रके भाग समझे जायूँगे' ।।

ব্যাস বললেন—“হে ভুবনেশ্বর! তুমি এই অসুরদের নিপাত করবে। আর হে রুদ্র! তুমি যখন এদের বিনাশ সাধন করবে, তখন থেকে সকল যজ্ঞকর্মে যে পশু (যজ্ঞের সাধন-রূপ উপকরণ) থাকবে, তা রুদ্রের ভাগ বলে গণ্য হবে।” এ কথা শুনে দেবহিতকামনায় তিনি বললেন—“তথাস্তु।”

Verse 71

गन्धमादनविन्ध्यौ च कृत्वा वंशध्वजौ हर: । पृथ्वीं ससागरवनां रथं कृत्वा तु शड्कर:

ব্যাস বললেন—হর (শিব) গন্ধমাদন ও বিন্ধ্য—এই দুই পর্বতকে নিজের রথের ধ্বজদণ্ড করলেন; আর শঙ্কর সমুদ্র ও অরণ্যসহ পৃথিবীকেই রথরূপে নির্মাণ করলেন।

Verse 72

अक्ष॑ कृत्वा तु नागेन्द्रं शेषं नाम त्रिलोचन: । चक्रे कृत्वा तु चन्द्रार्कों देवदेव: पिनाकधृक्‌

ব্যাস বললেন—ত্রিনয়ন, পিনাকধারী দেবদেব (শিব) নাগেন্দ্র শेषকে রথের অক্ষ করলেন এবং চন্দ্র ও সূর্যকে দুই চক্র রূপে স্থাপন করলেন।

Verse 73

अणी कृत्वैलपत्रं च पुष्पदन्तं च ऋयम्बक: । यूपं कृत्वा तु मलयमवनाहं च तक्षकम्‌

ব্যাস বললেন—ঋয়ম্বক (শিব) অণি (তীক্ষ্ণ অগ্রভাগ) নির্মাণ করলেন, এবং এলপত্র ও পুষ্পদন্তকেও গড়লেন; আর যূপ নির্মাণ করে মলয়, অবনাহ ও তক্ষককেও তদনুসারে স্থাপন করলেন।

Verse 74

देवताओंके ऐसा कहनेपर भगवान्‌ शिवने “तथास्तु” कहकर उनके हितकी इच्छासे गन्धमादन और विन्ध्याचल इन दो पर्वतोंको अपने रथके दो पार्श्ववर्ती ध्वज बनाये। फिर समुद्र और पर्वतोंसहित समूची पृथ्वीको रथ बनाकर नागराज शेषको उस रथका धुरा बनाया। तत्पश्चात्‌ त्रिनेत्रधारी पिनाकपाणि देवाधिदेव महादेवने चन्द्रमा और सूर्य दोनोंको रथके दो पहिये बनाये। एलपत्रके पुत्र और पुष्पदनन्‍्तको जूएकी कीलें बनाया। फिर त्यम्बकने मलयाचलको यूप और तक्षक नागको जूआ बाँधनेकी रस्सी बना लिया || ७०-- ७३ || योक्‍त्राड्ानि च सत्त्वानि कृत्वा शर्व: प्रतापवान्‌ | वेदान्‌ कृत्वाडथ चतुरश्षतुरश्चवान्‌ महेश्वर:

ব্যাস বললেন—দেবতারা এ কথা বললে ভগবান শম্ভু দেবহিতকামনায় “তথাস্তু” বলে গন্ধমাদন ও বিন্ধ্য—এই দুই পর্বতকে নিজের রথের পার্শ্ব-ধ্বজ করলেন। তারপর সমুদ্র ও পর্বতসহ সমগ্র পৃথিবীকে রথরূপে গ্রহণ করে নাগরাজ শেষকে তার অক্ষ করলেন। পরে ত্রিনয়ন, পিনাকধারী দেবাধিদেব মহাদেব চন্দ্র ও সূর্যকে রথের দুই চক্র করলেন। এলপত্রের পুত্র ও পুষ্পদন্তকে জোয়ালের কীল স্থির করলেন; আর ত্র্যম্বক মলয়াচলকে যূপ এবং তক্ষক নাগকে জোয়াল বাঁধার রজ্জু করলেন। এইভাবেই প্রতাপশালী শর্ব অন্যান্য প্রাণীদের জোয়াল ও লাগামাদি রূপে স্থাপন করে, চার বেদকেই রথের চার অশ্ব করলেন।

Verse 75

उपवेदान्‌ खलीनांश्व॒ कृत्वा लोकत्रयेश्वर: । गायत्री प्रग्रह कृत्वा सावित्रीं च महेश्वर:,तत्पश्चात्‌ तीनों लोकोंके स्वामी महेश्वरने उपवेदोंको लगाम बनाकर गायत्री और सावित्रीको प्रग्रह बना लिया

ত্রিলোকেশ্বর মহেশ্বর উপবেদসমূহকে অশ্বের লাগামরূপে নির্মাণ করলেন; আর গায়ত্রী ও সাবিত্রীকে রশি (প্রগ্রহ) করে তিনি সবকিছুকে সংযত করলেন।

Verse 76

कृत्वोड्कार प्रतोदं च ब्रह्माणं चैव सारथिम्‌ । गाण्डीवं मन्दरं कृत्वा गुणं कृत्वा तु वासुकिम्‌

তিনি ওঁকারকে চাবুকরূপে, ব্রহ্মাকে সারথিরূপে স্থাপন করলেন; মন্দর পর্বতকে গাণ্ডীব ধনুরূপে এবং বাসুকিকে তার ধনুর্জ্যা (প্রত্যঞ্চা) করলেন।

Verse 77

विष्णुं शरोत्तमं कृत्वा शल्यमग्निं तथैव च | वायुं कृत्वाथ वाजाभ्यां पुड्खे वैवस्वतं यमम्‌

তিনি বিষ্ণুকে শ্রেষ্ঠ শররূপে করলেন, অগ্নিকে তার তীক্ষ্ণ ফলক (নোক) করলেন; বায়ুকে তার পাখা করলেন এবং লেজের পালক হিসেবে বৈবস্বত যমকে স্থাপন করলেন।

Verse 78

विद्युत्‌ कृत्वाथ निश्राणं मेरुं कृत्वाथ वै ध्वजम्‌ | आरुहा स रथं दिव्यं सर्वदेवमयं शिव:

তিনি বিদ্যুৎকে (অস্ত্রের) তীক্ষ্ণ ধাররূপে গড়লেন এবং মেরু পর্বতকে প্রধান ধ্বজরূপে স্থাপন করলেন; এভাবে সর্বদেবময় দিব্য রথে আরূঢ় হলেন শিব।

Verse 79

त्रिपुरस्यथ वधार्थाय स्थाणु: प्रहरतां वर: । असुराणामन्तकर: श्रीमानतुलविक्रम:

তখন ত্রিপুর বধের উদ্দেশ্যে, আঘাতকারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, অসুরসংহারক, শ্রীমন্ত ও অতুল বিক্রম স্থাণু (শিব) চূড়ান্ত প্রহার করতে উদ্যত হলেন।

Verse 80

स्तूयमान: सुरै: पार्थ ऋषिभिश्न तपोधनै: । स्थान माहेश्वरं कृत्वा दिव्यमप्रतिमं प्रभु:

হে পার্থ! দেবগণ ও তপোধন ঋষিদের দ্বারা স্তূত সেই প্রভু মহেশ্বরের এক দিব্য, অতুলনীয় ধাম প্রতিষ্ঠা করলেন।

Verse 81

यदा त्रीणि समेतानि अन्तरिक्षे पुराणि च

ব্যাস বললেন—যখন মধ্যাকাশে সেই তিনটি একত্র হল, এবং প্রাচীন (লক্ষণ)ও তদনুরূপ প্রকাশ পেল…

Verse 82

पुराणि न च तं शेकुर्दानिवा: प्रतिवीक्षितुम्‌

প্রাচীনজনেরাও তাকে সম্মুখে চেয়ে দেখার সাহস পেল না; দৃশ্যটি ছিল অতিশয় ভয়ংকর।

Verse 83

पुराणि दग्धवन्तं तं देवी याता प्रवीक्षितुम्‌

ব্যাস বললেন—প্রাচীন (অভিলেখ) দগ্ধকারী সেই ব্যক্তিকে পরীক্ষা করে দেখতে দেবী সেখানে গেলেন।

Verse 84

बालमड्कगतं कृत्वा स्वयं पञ्चशिखं पुन: । जिस समय वे तीनों पुरोंको दग्ध कर रहे थे, उस समय पार्वतीदेवी भी उन्हें देखनेके लिये एक पाँच शिखावाले बालकको गोदमें लेकर वहाँ गयीं ।।

তারপর উমা স্বয়ং পাঁচ-শিখাবিশিষ্ট বালককে কোলে নিয়ে, কৌতূহলে দেবগণকে জিজ্ঞাসা করলেন—“এ কে?”

Verse 85

असूयतश्च शक्रस्य वज्ेण प्रहरिष्यत: । बाहुं सवज्ं तं तस्य क्रुद्धस्यास्तम्भयत्‌ प्रभु:

অসূয়ায় উদ্বুদ্ধ শক্র (ইন্দ্র) যখন বজ্রাঘাত করতে উদ্যত হলেন, তখন প্রভু ক্রুদ্ধ ইন্দ্রের বজ্রসহ উত্তোলিত বাহু স্তম্ভিত করে থামিয়ে দিলেন।

Verse 86

प्रहस्य भगवांस्तूर्ण सर्वलोकेश्वरो विभु: । पार्वतीदेवीने देवताओंसे पूछा--“पहचानते हो

তখন শক্র (ইন্দ্র)-এর বাহু স্তম্ভিত হয়ে গেল, আর তিনি দেবগণের দ্বারা পরিবেষ্টিত হয়ে দাঁড়িয়ে রইলেন।

Verse 87

जगाम ससुरस्तूर्ण ब्रह्माणं प्रभुमव्ययम्‌ । तदनन्तर स्तम्भित हुई भुजाके साथ ही देवताओंसहित इन्द्र तुरंत ही वहाँसे अविनाशी भगवान्‌ ब्रह्माजीके पास गये ।।

তারপর ইন্দ্র দেবতাদের সঙ্গে দ্রুত অবিনাশী প্রভু ব্রহ্মার কাছে গেলেন। সেখানে পৌঁছে তারা মস্তক নত করে প্রণাম জানিয়ে, করজোড়ে বলল—“হে ব্রহ্মন্! পার্বতীর কোলে শিশুরূপধারী এক আশ্চর্য সত্তা ছিল; তাকে দেখেও আমরা চিনতে পারিনি, তিনি কে।”

Verse 88

किमप्यड्कगतं ब्रह्मन्‌ पार्वत्या भूतमद्भुतम्‌ । बालरूपधरं दृष्टवा नास्माभिरभिलक्षित:

“হে ব্রহ্মন্! পার্বতীর কোলে এক আশ্চর্য সত্তা ছিল। শিশুরূপে তাকে দেখেও আমরা বুঝতে পারিনি, তিনি কে।”

Verse 89

तस्मात्‌ त्वां प्रष्टमिच्छामो निर्जिता येन वै वयम्‌ । अयुध्यता हि बालेन लीलया सपुरंदरा:

“অতএব আমরা আপনাকে তার বিষয়ে জিজ্ঞাসা করতে চাই—যার দ্বারা আমরা পরাভূত হয়েছি। সেই বালক তো যুদ্ধ না করেই, ক্রীড়ার মতো সহজে, ইন্দ্রসহ আমাদের সকল দেবতাকে বশ করল।”

Verse 90

तेषां तद्‌ वचन श्रुत्वा ब्रह्मा ब्रह्म॒विदां वर: । ध्यात्वा स शम्भुं भगवान्‌ बालं चामिततेजसम्‌

তাদের কথা শুনে ব্রহ্মবিদদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ভগবান ব্রহ্মা ধ্যানে নিমগ্ন হলেন; ধ্যানের দ্বারা তিনি অমিত তেজে দীপ্ত শিশুরূপধারী ভগবান শম্ভু (শিব)-কে চিনে নিলেন।

Verse 91

उवाच भगवान्‌ ब्रह्मा शक्रादींश्व॒ सुरोत्तमान्‌ । चराचरस्य जगत: प्रभु: स भगवान्‌ हर:

তখন ভগবান ব্রহ্মা ইন্দ্র প্রভৃতি দেবশ্রেষ্ঠদের বললেন—“চরাচর জগতের অধীশ্বর সেই ভগবান হর (শঙ্কর)। মহাদেবের ঊর্ধ্বে আর কোনো শক্তি নেই। তোমরা উমা-পার্বতীর সঙ্গে যে অমিত তেজস্বী শিশুকে দেখেছিলে, সে স্বয়ং শঙ্করই; পার্বতীকে আনন্দ দিতে তিনি শিশুরূপ ধারণ করেছিলেন। অতএব এসো, আমরা সকলেই তাঁর শরণ গ্রহণ করি।”

Verse 92

तस्मात्‌ परतरं नान्यत्‌ किंचिदस्ति महेश्वरात्‌ । यो दृष्टो हमुमया सार्ध युष्माभिरमितद्युति:

অতএব মহেশ্বরের ঊর্ধ্বে আর কিছুই নেই। উমার সঙ্গে তোমরা যে অমিতদ্যুতিমান শিশুকে দেখেছিলে, সে স্বয়ং ভগবান শঙ্করই।

Verse 93

स पार्वत्या: कृते शर्व: कृतवान्‌ बालरूपताम्‌ | ते मया सहिता यूय॑ प्रापयध्वं तमेव हि

পার্বতীর জন্য শর্ব (শিব) শিশুরূপ ধারণ করেছিলেন। অতএব তোমরা সকলে আমার সঙ্গে চল—তাঁর কাছেই গিয়ে তাঁরই শরণ গ্রহণ কর।

Verse 94

स एष भगवान्‌ देव: सर्वलोकेश्वर: प्रभु: । न सम्बुबुधिरे चैनं देवास्तं भुवनेश्वरम्‌

তিনি-ই সেই ভগবান দেব, সর্বলোকেশ্বর প্রভু; তবু দেবতারাও সেই ভুবনেশ্বরকে যথার্থভাবে চিনতে পারেনি।

Verse 95

अथाश्येत्य ततो ब्रह्मा दृष्टवा स च महेश्वरम्‌

তখন ব্রহ্মা সেখানে গিয়ে মহেশ্বর (শিব)-কে দর্শন করে যথাবিধি অগ্রসর হলেন—ভক্তিভরে সেই সাক্ষাতে যেন বিশ্ব-ব্যবস্থার স্বীকৃতি প্রকাশ পেল।

Verse 96

ब्रह्मोवाच त्वं यज्ञों भुवनस्यास्य त्वं गतिस्त्वं परायणम्‌

ব্রহ্মা বললেন—“আপনিই এই ভুবনের যজ্ঞ; আপনিই এর আশ্রয়; আপনিই গতি এবং আপনিই পরম শরণ। আপনিই ভব, আপনিই মহাদেব; আপনিই পরম ধাম ও পরম পদ। আপনার দ্বারাই এই সমগ্র চরাচর জগৎ সর্বত্র পরিব্যাপ্ত।”

Verse 97

त्वं भवस्त्वं महादेवस्त्वं धाम परमं पदम्‌ | त्वया सर्वमिदं व्याप्तं जगत्‌ स्थावरजड्रमम्‌

“আপনিই ভব, আপনিই মহাদেব; আপনিই পরম ধাম ও পরম পদ। আপনার দ্বারাই এই সমগ্র জগৎ—স্থাবর ও জঙ্গম—সর্বত্র পরিব্যাপ্ত।”

Verse 98

भगवन्‌ भूतभव्येश लोकनाथ जगत्पते । प्रसादं कुरु शक्रस्य त्वया क्रोधार्दितस्य वै,भूत, वर्तमान और भविष्यके स्वामी भगवन्‌! लोकनाथ! जगत्पते! ये इन्द्र आपके क्रोधसे पीड़ित हो रहे हैं। आप इनपर कृपा कीजिये

“ভগবান! ভূত-ভব্যের অধীশ, লোকনাথ, জগত্পতে! শক্র (ইন্দ্র) আপনার ক্রোধে পীড়িত; তাঁর প্রতি প্রসন্ন হোন, কৃপা করুন।”

Verse 99

व्यास उवाच पद्मयोनिवच: श्रुत्वा ततः प्रीतो महेश्वर: । प्रसादाभिमुखो भूत्वा अट्टहासमथाकरोत्‌

ব্যাস বললেন—“পদ্মযোনি (ব্রহ্মা)-র বাক্য শুনে মহেশ্বর প্রসন্ন হলেন। কৃপা প্রদানে উদ্যত হয়ে তিনি তখন অট্টহাস করলেন।”

Verse 100

ततः प्रसादयामासुरुमां रुद्रं च ते सुरा: । अभवच्च पुनर्बाहुर्यथाप्रकृति वच्धिण:,तब देवताओंने पार्वतीदेवी तथा भगवान्‌ शंकरको प्रसन्न किया। फिर वज्रधारी इन्द्रकी बाँह जैसी पहले थी, वैसी हो गयी

তখন দেবতারা উমা ও রুদ্রকে প্রসন্ন করলেন। আর বজ্রধারী ইন্দ্রের বাহু পুনরায় পূর্বের মতো স্বাভাবিক অবস্থায় ফিরে এল।

Verse 101

तेषां प्रसन्नो भगवान्‌ सपत्नीको वृषध्वज: । देवानां त्रिदशश्रेष्ठो दक्षयज्ञविनाशन:,दक्षयज्ञका विनाश करनेवाले देवश्रेष्ठ भगवान्‌ वृषध्वज अपनी पत्नी उमाके साथ देवताओंपर प्रसन्न हो गये

তাদের প্রতি ভগবান বৃষধ্বজ (শিব) পত্নী উমাসহ প্রসন্ন হলেন—ত্রিদশদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ, এবং দক্ষযজ্ঞ-ধ্বংসকারী।

Verse 102

स वै रुद्र: स च शिव: सोडग्नि: सर्वश्न सर्ववित्‌ । स्चेन्द्रश्नेव वायुश्व सो5श्वचिनौ च स विद्युत:

তিনিই রুদ্র, তিনিই শিব; তিনিই অগ্নি—সর্বরূপ ও সর্বজ্ঞ। তিনিই ইন্দ্র, তিনিই বায়ু; তিনিই দুই অশ্বিনী-কুমার, এবং তিনিই বিদ্যুৎ।

Verse 103

स भव: स च पर्जन्यो महादेव: सनातन: । स चन्द्रमा: स चेशान: स सूर्यो वरुणश्व॒ सः,वे ही भव, वे ही मेघ और वे ही सनातन महादेव हैं। चन्द्रमा, ईशान, सूर्य और वरुण भी वे ही हैं

তিনিই ভব, তিনিই পর্জন্য (মেঘ-বর্ষণশক্তি), তিনিই সনাতন মহাদেব। তিনিই চন্দ্র, তিনিই ঈশান, তিনিই সূর্য, এবং তিনিই বরুণ।

Verse 104

स काल: सो&न्‍्तको मृत्यु: स यमो रात्र्यहानि तु । मासार्धमासा ऋतव: संध्ये संवत्सरशक्ष॒ सः,वे ही काल, अनाक, मृत्यु, यम, रात्रि, दिन, मास, पक्ष, ऋतु, संध्या और संवत्सर हैं

তিনিই কাল, তিনিই অন্তক, তিনিই মৃত্যু, তিনিই যম। তিনিই রাত্রি ও দিন; মাস, পক্ষ, ঋতু, সন্ধ্যা এবং সংবৎসরও তিনিই।

Verse 105

धाता च स विधाता च विश्वात्मा विश्वकर्मकृत्‌ | सर्वासां देवतानां च धारयत्यवपुर्वपु:

তিনিই ধাতা ও বিধাতা, বিশ্বাত্মা এবং বিশ্বরূপ কর্মের কর্তা। নিজে নির্দেহ হয়েও তিনি সকল দেবতার দেহ ধারণ করে তাদের ধারণ-রক্ষণ করেন।

Verse 106

सर्वदेवै: स्तुतो देव: सैकधा बहुधा च सः । शतधा सहस्रधा चैव भूय: शतसहस्रधा,सम्पूर्ण देवता सदा उनकी स्तुति करते हैं। वे महादेवजी एक होकर भी अनेक हैं। सौ, हजार और लाखों रूपोंमें वे ही विराज रहे हैं

সকল দেবতাই সেই দেবকে স্তব করে। তিনি এক হয়েও বহুরূপ—শতরূপে, সহস্ররূপে, আবার লক্ষ লক্ষ রূপে তিনি বিরাজমান।

Verse 107

द्वे तनू तस्य देवस्य वेदज्ञा ब्राह्मणा विदु: । घोरा चान्या शिवा चान्या ते तनू बहुधा पुनः

বেদজ্ঞ ব্রাহ্মণগণ সেই দেবের দুই রূপ জানেন—একটি ঘোর, অন্যটি শিব অর্থাৎ কল্যাণময়। এই দুই রূপ পৃথক, আর এদের থেকেই বারবার বহু রূপের প্রকাশ ঘটে।

Verse 108

घोरा तु या तनुस्तस्य सो<नग्निर्विष्णु: स भास्कर: । सौम्या तु पुनरेवास्य आपो ज्योतींषि चन्द्रमा:

তাঁর যে ঘোর রূপ, সেটাই অগ্নি, বিষ্ণু ও ভাস্কর (সূর্য); আর তাঁর যে সৌম্য রূপ, সেটাই জল, আকাশের জ্যোতি—গ্রহ-নক্ষত্র—এবং চন্দ্র।

Verse 109

वेदा: साज्रोपनिषद: पुराणाध्यात्मनिश्चया: । यदत्र परम गुहां स वै देवो महेश्वर:,वेद, वेदांग, उपनिषद्‌ पुराण और अध्यात्मशास्त्रके जो सिद्धान्त हैं तथा उनमें भी जो परम रहस्य है, वह भगवान्‌ महेश्वर ही हैं

বেদ, বেদাঙ্গ, উপনিষদ, পুরাণ এবং অধ্যাত্মশাস্ত্রের স্থির সিদ্ধান্তসমূহ—এবং তাতে নিহিত পরম গূঢ় রহস্য—সেই দেব মহেশ্বরই।

Verse 110

ईदृशश्व महादेवो भूयांश्न भगवानज: । न हि सर्वे मया शक्‍्या वक्तुं भगवतो गुणा:

ব্যাস বললেন—এমনই মহাদেব—চিরবর্ধমান, ভগবান, অজ। সেই প্রভুর সমস্ত গুণ সম্পূর্ণরূপে বর্ণনা করা আমার পক্ষে সম্ভব নয়।

Verse 111

अपि वर्षसहस्रेण सततं पाण्डुनन्दन । अर्जुन! यह है अजन्मा भगवान्‌ महादेवका महामहिमस्वरूप। मैं सहस्रों वर्षोतक लगातार वर्णन करता रहूँ तो भी भगवानके समस्त गुणोंका पार नहीं पा सकता ।।

ব্যাস বললেন—হে পাণ্ডুনন্দন অর্জুন! এই অজ, ভগবান মহাদেব পরম মহিমার মূর্তিস্বরূপ। আমি যদি হাজার হাজার বছর অবিরাম তাঁর বর্ণনা করিও, তবু ভগবানের সমস্ত গুণের পার পেতে পারব না।

Verse 112

आयुरारोग्यमैश्चर्य वित्तं कामांश्व पुष्कलान्‌

(তিনি) দীর্ঘায়ু, আরোগ্য, ঐশ্বর্য, ধন এবং প্রাচুর্যপূর্ণ কাম্য ভোগ (দান করেন)।

Verse 113

सेन्द्रादिषु च देवेषु तस्य चैश्वर्यमुच्यते

ব্যাস বললেন—ইন্দ্র প্রভৃতি দেবগণের মধ্যেও তাঁরই ঐশ্বর্য সর্বত্র ঘোষিত। তিনিই ঈশ্বররূপে জগতে মানুষের শুভাশুভ কর্মের ফল প্রদান করেন। সকল কামনার সিদ্ধিদাতা ঈশ্বরও তিনিই বলে কথিত।

Verse 114

स चैव व्यापृतो लोके मनुष्याणां शुभाशुभे । ऐश्वर्याच्चैव कामानामीश्व्‌रक्ष॒ स उच्यते

আর তিনিই জগতে মানুষের শুভাশুভ কর্মের বিষয়ে নিয়োজিত থেকে তাদের ফল বিধান করেন। ঐশ্বর্য ও কামনার সিদ্ধি যেহেতু তাঁরই অধীন, তাই তিনি ‘ঈশ্বর’ নামে অভিহিত।

Verse 115

महेश्वरश्न महतां भूतानामीश्वरश्च॒ सः । बहुभिरबहुधा रूपैर्विश्वं व्याप्रोति वै जगत्‌

মহাভূতসমূহের অধীশ্বর হওয়ায় তিনিই মহেশ্বর। নানাবিধ অসংখ্য রূপ ধারণ করে তিনি সমগ্র বিশ্বজগৎ জুড়ে পরিব্যাপ্ত।

Verse 116

तस्य देवस्य यद्‌ वक्‍त्रं समुद्रे तदधिषछ्ठितम्‌ । वडवामुखेति विख्यातं पिबत्‌ तोयमयं हवि:,उन महादेवजीका जो मुख है, वह समुद्रमें स्थित है। वह “वडवामुख” नामसे विख्यात होकर जलमय हविष्यका पान करता है

সেই দেবের যে মুখ সমুদ্রে প্রতিষ্ঠিত, তা ‘বডবামুখ’ নামে প্রসিদ্ধ; সে জলময় হব্য পান করে।

Verse 117

एष चैव श्मशानेषु देवो वसति नित्यश: । यजन्त्येनं जनास्तत्र वीरस्थान इतीश्वरम्‌,ये ही महादेवजी श्मशानभूमि (काशीपुरी)-में नित्य निवास करते हैं। वहाँ मनुष्य “वीरस्थानेश्वर” के नामसे इनकी आराधना करते हैं

এই দেব শ্মশানভূমিতে নিত্য বাস করেন। সেখানে লোকেরা তাঁকে ‘বীরস্থানেশ্বর’ নামে ঈশ্বর জেনে পূজা করে।

Verse 118

अस्य दीप्तानि रूपाणि घोराणि च बहूनि च । लोके यान्यस्य पूज्यन्ते मनुष्या: प्रवदन्ति च,इनके बहुत-से तेजस्वी घोर रूप हैं, जो लोकमें पूजित होते हैं और मनुष्य उनका कीर्तन करते रहते हैं

তাঁর বহু দীপ্তিমান রূপ আছে, আবার বহু ভয়ংকর রূপও আছে; লোকজগতে যেগুলি পূজিত হয় এবং মানুষ যেগুলির কথা নিত্য উচ্চারণ করে।

Verse 119

नामधेयानि लोकेषु बहुन्यस्य यथार्थवत्‌ । निरुच्यन्ते महत्त्वाच्च विभुत्वात्‌ कर्मणस्तथा,उनकी महत्ता, सर्वव्यापकता तथा कर्मके अनुसार लोकमें इनके बहुत-से यथार्थ नाम बताये जाते हैं

তাঁর মহত্ত্ব, সর্বব্যাপী বিভুতা এবং কর্মানুসারে লোকসমূহে তাঁর বহু যথার্থ নাম উচ্চারিত হয়।

Verse 120

वेदे चास्य समाम्नातं शतरुद्रियमुत्तमम्‌ । नाम्ना चानन्तरुद्रेति हुपस्थानं महात्मन:,यजुर्वेदमें भी परमात्मा शिवकी “शतरुद्रिय” नामक उत्तम स्तुति बतायी गयी है। अनन्तरुद्रनामसे इनका उपस्थान बताया गया है

বেদে সেই মহাত্মার জন্য ‘শতরুদ্রীয়’ নামে উৎকৃষ্ট স্তোত্র সংরক্ষিত আছে; আর ‘অনন্তরুদ্র’ নামে তাঁর উপাসনা-প্রণালীও বর্ণিত।

Verse 121

स कामानां प्रभुर्देवो ये दिव्या ये च मानुषा: । स विभु: स प्रभुर्देवो विश्व व्याप्रोति वै महत्‌

দিব্য হোক বা মানব—সমস্ত ভোগ ও কাম্যবস্তুর অধিপতি সেই দেবই। তিনি সর্বশক্তিমান প্রভু এই বিশাল বিশ্বে পরিব্যাপ্ত; তাই তিনি ‘বিভু’ ও ‘প্রভু’ নামে অভিহিত।

Verse 122

ज्येष्ठ भूतं वदन्त्येनं ब्राह्मणा मुनयस्तथा । प्रथमो होष देवानां मुखादस्यानलो5भवत्‌

ব্রাহ্মণগণ ও মুনিগণ তাঁকে সকল সত্তার মধ্যে জ্যেষ্ঠ বলেন। তিনি দেবতাদের মধ্যে অগ্রগণ্য; এবং তাঁর মুখ থেকে অগ্নিদেবের আবির্ভাব হয়েছে।

Verse 123

सर्वथा यत्‌ पशून्‌ पाति तैश्न यद्‌ रमते पुनः । तेषामधिपतिर्यच्च तस्मात्‌ पशुपति: स्मृत:

যিনি সর্বতোভাবে জীবদের রক্ষা করেন, আবার তাদের সঙ্গেই আনন্দ করেন, এবং তাদের অধিপতি—তাই তিনি ‘পশুপতি’ নামে স্মৃত।

Verse 124

दिव्यं च ब्रह्मचर्येण लिड्रमस्य यथा स्थितम्‌ । महयत्येष लोकांश्व महेश्वर इति स्मृत:,इनका दिव्य लिंग ब्रह्मचर्यसे स्थित है। ये सम्पूर्ण लोकोंको महिमान्वित करते हैं; इसलिये महेश्वर कहे गये हैं

তাঁর দিব্য লিঙ্গ ব্রহ্মচর্য দ্বারা প্রতিষ্ঠিত। তিনি সকল লোককে মহিমান্বিত ও ধারণ করেন; তাই তিনি ‘মহেশ্বর’ নামে স্মৃত।

Verse 125

ऋषयश्नैव देवाश्ष गन्धर्वाप्सरसस्तथा । लिज्भमस्यार्चयन्ति सम तच्चाप्यूर्ध्व समास्थितम्‌,ऋषि, देवता, गन्धर्व और अप्सराएँ इनके ऊर्ध्वलोकस्थित लिंगविग्रह (प्रतीक)-की पूजा करती हैं

ব্যাস বললেন—ঋষি, দেবতা, গন্ধর্ব ও অপ্সরাগণ সকলেই সেই পবিত্র লিঙ্গ-প্রতীকের পূজা করেন, যা ঊর্ধ্বলোকেতে প্রতিষ্ঠিত।

Verse 126

पूज्यमाने ततस्तस्मिन्‌ मोदते स महेश्वर: । सुखी प्रीतश्न॒ भवति प्रद्ृष्टश्वेव शड्कर:

সেই লিঙ্গ-প্রতীকের পূজা হলে কল্যাণময় মহেশ্বর আনন্দিত হন; শঙ্কর যেন প্রত্যক্ষ দর্শনে সুখী ও পরম প্রসন্ন হন।

Verse 127

यदस्य बहुधा रूप॑ भूतभव्यभवस्थितम्‌ | स्थावरं जज्भमं चैव बहुरूपस्तत: स्मृत:,भूत, भविष्य और वर्तमान--तीनों कालोंमें इनके स्थावर-जंगम बहुत-से रूप स्थित होते हैं; इसलिये इन्हें 'बहुरूप” नाम दिया गया है

ভূত, ভবিষ্যৎ ও বর্তমান—তিন কালে তাঁর স্থাবর ও জঙ্গম বহু রূপ বিদ্যমান; তাই তিনি ‘বহুরূপ’ নামে স্মৃত।

Verse 128

एकाक्षो जाज्वतन्नास्ते सर्वतो$क्षिमयो5पि वा । क्रोधाद्‌ यश्चाविशल्लोकांस्तस्मात्‌ सर्व इति स्मृत:

যদিও তাঁর চারিদিকে চক্ষু—তিনি যেন চক্ষুময়—তবু একটি বিশেষ অগ্নিময় একচক্ষু আছে, যা ক্রোধে সদা জ্বলতে থাকে; আর তিনি সর্বলোকব্যাপী বলে ‘সর্ব’ নামে স্মৃত।

Verse 129

धूम्ररूपं च यत्‌ तस्य धूर्जटिस्तेन चोच्यते । विश्वेदेवाश्व॒ यत्‌ तस्मिन्‌ विश्वरूपस्तत: स्मृत:

তাঁর রূপ ধূম্রবর্ণ; তাই তিনি ‘ধূর্জটি’ নামে অভিহিত। আর বিশ্বেদেবগণ তাঁর মধ্যেই প্রতিষ্ঠিত; তাই তিনি ‘বিশ্বরূপ’ নামে স্মৃত।

Verse 130

तिस्रो देवीर्यदा चैव भजते भुवनेश्वर: । द्यामप: पृथिवीं चैव तःऋरयम्बकश्न ततः स्मृत:

ব্যাস বললেন—যখন ভুবনেশ্বর আকাশ, জল ও পৃথিবী—এই তিন দিব্য রূপকে নিজের মতো গ্রহণ করে তাদের পালন‑রক্ষা করেন, তখন তিন মাতৃরূপের সঙ্গে সম্পর্কিত বলে তিনি ‘ত্র্যম্বক’ নামে স্মৃত হন।

Verse 131

समेधयति यत्नित्यं सर्वार्थान्‌ सर्वकर्मसु । शिवमिच्छन्‌ मनुष्याणां तस्मादेष शिव: स्मृत:

ব্যাস বললেন—যিনি মানুষের মঙ্গল কামনা করে তাদের সকল কর্মে সকল অভীষ্টের নিত্য সিদ্ধি সাধন করেন, তাই তিনি ‘শিব’ নামে স্মৃত।

Verse 132

सहस्राक्षोड्युताक्षो वा सर्वतो$क्षिमयो5पि वा । यच्च विश्व महत्‌ पाति महादेवस्तत: स्मृत:

ব্যাস বললেন—তিনি সহস্রনেত্র বা দশসহস্রনেত্র; বরং সর্বদিকেই নেত্রময়—সর্বত্র সতর্ক। আর যিনি এই মহৎ বিশ্বকে পালন করেন, তাই তিনি ‘মহাদেব’ নামে স্মৃত।

Verse 133

महत्‌ पूर्व स्थितो यच्च प्राणोत्पत्तिस्थितश्न यत्‌ । स्थितलिडज्ञश्न यन्नित्यं तस्मात्‌ स्थाणुरिति स्मृत:

ব্যাস বললেন—যিনি আদিকাল থেকেই মহৎ রূপে প্রতিষ্ঠিত, প্রাণের উৎপত্তি ও স্থিতির কারণ, এবং যাঁর লিঙ্গময় দেহ নিত্য অচল—তাই তিনি ‘স্থাণু’ নামে স্মৃত।

Verse 134

सूर्याचन्द्रमसोलोंके प्रकाशन्ते रुचश्व॒ या: । ता: केशसंज्ञितास्त्रयक्षे व्योमकेशस्तत: स्मृत:

ব্যাস বললেন—লোকে সূর্য ও চন্দ্রের যে কিরণসমূহ প্রকাশিত হয়, সেগুলি ত্রিনয়নের কেশ বলে কথিত। সেগুলি ব্যোমে দীপ্ত হওয়ায় তিনি ‘ব্যোমকেশ’ নামে স্মৃত।

Verse 135

भूतं भव्यं भविष्यं च सर्व जगदशेषत: । भव एव ततो यस्माद्‌ भूतभव्यभवोद्धव:,भूत, वर्तमान और भविष्य सम्पूर्ण जगत्‌ भगवान्‌ शंकरसे ही विस्तारको प्राप्त हुआ है; इसलिये वे 'भूतभव्यभवोद्धव” कहे गये हैं

অতীত, বর্তমান ও ভবিষ্যৎ—সমগ্র জগৎ সর্বতোভাবে—শুধু ভব (শিব) থেকেই উৎপন্ন ও বিস্তৃত হয়েছে; তাই তিনি ‘ভূতভব্যভবোদ্ভব’ নামে প্রশংসিত।

Verse 136

कपि: श्रेष्ठ इति प्रोक्तो धर्मश्व॒ वृष उच्यते । स देवदेवो भगवान्‌ कीर्त्यतेडतो वृषाकपि:

‘কপি’ শব্দটি ‘শ্রেষ্ঠ’ অর্থে বলা হয়েছে, আর ‘বৃষ’ ধর্মের এক নাম। অতএব দেবদেব ভগবান শঙ্কর ‘বৃষ’ ও ‘কপি’—উভয় দ্বারা নির্দেশিত হওয়ায়—‘বৃষাকপি’ নামে কীর্তিত।

Verse 137

ब्रह्माणमिन्द्रं वरुणं यमं धनदमेव च । निगृहा हरते यस्मात्‌ तस्माद्धर इति स्मृत:,वे ब्रह्मा, इन्द्र वरुण, यम तथा कुबेरको भी काबूमें करके उनसे उनका एऐश्वर्य हर लेते हैं; इसलिये “हर” कहे गये हैं

তিনি ব্রহ্মা, ইন্দ্র, বরুণ, যম এবং ধনদ (কুবের)কেও সংযত করে তাদের ঐশ্বর্য হরণ করতে পারেন; তাই তিনি ‘হর’ নামে স্মৃত।

Verse 138

निमीलिताभ्यां नेत्राभ्यां बलाद देवो महेश्वर: । ललाटे नेत्रमसृजत्‌ तेन तऋयक्ष: स उच्यते

দেব মহেশ্বর দুই চোখ বলপূর্বক বন্ধ করে কপালে এক চক্ষু সৃষ্টি করলেন; তাই তিনি ‘ত্র্যক্ষ’—ত্রিনেত্র—বলে অভিহিত।

Verse 139

विषमस्थ: शरीरेषु समश्न प्राणिनामिह । स वायुर्विषमस्थेषु प्राणोडपान: शरीरिषु

প্রাণীদের দেহে তিনি বিষম অবস্থার মধ্যেও সমভাবে প্রতিষ্ঠিত থাকেন। বিষম পরিস্থিতিতে পতিত সকল দেহধারীর অন্তরে সেই একই বায়ুই প্রाण ও অপান রূপে বিরাজ করে।

Verse 140

पूजयेद विग्रहं यस्तु लिड़ं चापि महात्मन: । लिड्/ं पूजयिता नित्यं महतीं श्रियमश्नुते

যে মহাত্মা ভগবান শিবের অর্চাবিগ্রহ বা লিঙ্গের পূজা করে, সে ভক্ত সম্মানের যোগ্য। যে নিত্য লিঙ্গপূজা করে, সে মহৎ ঐশ্বর্য লাভ করে।

Verse 141

ऊरुभ्यामर्धमाग्नेयं सोमर्थध च शिवा तनु: । आत्मनोडर्थ तथा चाग्नि: सोमो<र्थ पुनरुच्यते

উরু থেকে নীচে তাঁর দেহের অর্ধাংশ অগ্নিসদৃশ, ভয়ংকর; আর তার ঊর্ধ্বাংশ সোমস্বরূপ, শিবময়। কোনো কোনো আচার্য বলেন—সমগ্র দেহের এক অর্ধ ‘অগ্নি’ এবং অন্য অর্ধ ‘সোম’।

Verse 142

तैजसी महती दीप्ता देवेभ्यो5स्य शिवा तनु: । भास्वती मानुषेष्वस्य तनुर्घोराग्निरुच्यते

তাঁর শিবতনু তেজোময়, মহাদীপ্তিমান—দেবতাদের জন্য; কিন্তু মানুষের মধ্যে তাঁর যে দীপ্ত, ভয়ংকর তনু, তা ‘অগ্নি’ নামে কথিত।

Verse 143

ब्रह्मचर्य चरत्येष शिवा यास्य तनुस्तया । यास्य घोरतरा मूर्ति: सर्वानित्ति तयेश्वर:

যে শিবমূর্তি দ্বারা তিনি জগতের রক্ষা করেন, সেই মূর্তি ব্রহ্মচর্য পালন করে; আর যে অধিকতর ভয়ংকর মূর্তি, তার দ্বারা ঈশ্বর শঙ্কর সমগ্র জগতকে গ্রাস (সংহার) করেন।

Verse 144

यन्निर्दहति यत्‌ तीक्ष्णो यदुग्रो यत्‌ प्रतापवान्‌ । मांसशोणितमज्जादो यत्‌ ततो रुद्र उच्यते

যে সর্বত্র দহন ঘটায়, যে অতিশয় তীক্ষ্ণ, উগ্র ও প্রতাপশালী, যে মাংস-রক্ত-মজ্জা পর্যন্ত ভক্ষণ করে—তার এই রৌদ্র স্বভাবের কারণেই তাকে ‘রুদ্র’ বলা হয়।

Verse 145

एष देवो महादेवो यो5सौ पार्थ तवाग्रत: । संग्रामे शात्रवान्‌ निष्नंस्त्वया दृष्ट:ः पिनाकधूक्‌

ব্যাস বললেন—হে পার্থ! যুদ্ধক্ষেত্রে তোমার সম্মুখে যে শত্রুসেনাকে নিধন করতে তুমি দেখেছিলে, তিনি সেই পিনাকধারী মহাদেব। হে অর্জুন! স্বয়ং শিবই তোমার বৈরীদের সংহারক রূপে প্রকাশিত হয়েছিলেন।

Verse 146

सिन्धुराजवधार्थाय प्रतिज्ञाते त्वयानघ । कृष्णेन दर्शित: स्वप्रे यस्तु शैलेन्द्रमूर्थनि

ব্যাস বললেন—হে নিষ্পাপ! যখন তুমি সিন্ধুরাজকে বধ করার প্রতিজ্ঞা করেছিলে, তখন স্বপ্নে শ্রীকৃষ্ণ পর্বতশিখরে যাঁর দর্শন করিয়েছিলেন, তিনি সেই ভগবান শঙ্করই। আজ এই যুদ্ধে তিনি তোমার অগ্রে অগ্রে পথপ্রদর্শক হয়ে চলেছেন। তিনিই তোমাকে সেই দিব্যাস্ত্র দিয়েছিলেন, যেগুলির দ্বারা তুমি দানবদের নিধন করেছ।

Verse 147

एष वै भगवान्‌ देव: संग्रामे याति तेडग्रत: । येन दत्तानि ते<स्त्राणि यैस्त्वया दानवा हता:

ব্যাস বললেন—দেখো, এই ভগবান দেবই যুদ্ধে তোমার অগ্রে অগ্রে অগ্রসর হচ্ছেন। তিনিই তোমাকে সেই দিব্যাস্ত্র দিয়েছিলেন, যেগুলির দ্বারা তুমি দানবদের নিধন করেছ।

Verse 148

धन्यं यशस्यमायुष्य॑ पुण्य॑ वेदैश्व सम्मितम्‌ । देवदेवस्य ते पार्थ व्याख्यातं शतरुद्रियम्‌

ব্যাস বললেন—হে পার্থ! দেবাদিদেব শিবের স্তবের জন্য এখানে ‘শতরুদ্রিয়’ ব্যাখ্যা করা হয়েছে। এটি ধন্য, যশদায়ক, আয়ুবর্ধক, পরম পুণ্যময় এবং পবিত্রতায় বেদের তুল্য।

Verse 149

सर्वार्थसाथन पुण्यं सर्वकिल्बिषनाशनम्‌ | सर्वपापप्रशमनं सर्वदुःखभयापहम्‌

এই স্তোত্র সকল অভীষ্ট সিদ্ধিকারী, পরম পুণ্যময়, সকল কলুষ নাশক, সকল পাপ প্রশমক এবং সর্বপ্রকার দুঃখ ও ভয় দূরকারী।

Verse 150

चतुर्विधमिदं स्तोत्र यः शुणोति नर: सदा । विजित्य शत्रून्‌ सर्वान्‌ स रुद्रलोके महीयते

যে ব্যক্তি ভগবান শঙ্করের চতুর্বিধ স্বরূপ প্রকাশকারী এই স্তোত্রটি সর্বদা শ্রবণ করে, সে সকল শত্রুকে জয় করে রুদ্রলোকে প্রতিষ্ঠিত ও সম্মানিত হয়।

Verse 151

चरितं महात्मनो नित्यं सांग्रामिकमिदं स्मृतम्‌ । पठन्‌ वै शतरुद्रीयं शृण्वंश्ष सततोत्थित:

মহাত্মা শিবের এই চরিত সর্বদা সংগ্রামে বিজয়দায়ক বলে স্মৃত। যে সদা উদ্যত হয়ে শতরুদ্রিয় পাঠ করে ও শ্রবণ করে, এবং মানুষের মধ্যে যে কেউ ভক্তিভাবে নিরন্তর ভগবান বিশ্বেশ্বরের আরাধনা করে—ত্রিনয়ন শিব প্রসন্ন হলে সে সকল উৎকৃষ্ট কামনা লাভ করে।

Verse 152

भक्तो विश्वेश्वरं देव॑ं मानुषेषु च यः सदा । वरान्‌ कामान्‌ स लभते प्रसन्ने उ5यम्बके नर:

মানুষদের মধ্যে যে কেউ সর্বদা দেব বিশ্বেশ্বরের ভক্ত থাকে, ত্র্যম্বক (ত্রিনয়ন) প্রসন্ন হলে সে ইচ্ছিত ও উৎকৃষ্ট বর লাভ করে।

Verse 153

गच्छ युद्धयस्व कौन्तेय न तवास्ति पराजय: । यस्य मन्त्री च गोप्ता च पार्श्वस्थो हि जनार्दन:

কৌন্তেয়! যাও, যুদ্ধ করো। তোমার পরাজয় হতে পারে না; কারণ তোমার মন্ত্রী, রক্ষক ও পার্শ্বস্থ স্বয়ং জনার্দন শ্রীকৃষ্ণ।

Verse 154

संजय उवाच एवमुकक्‍्त्वार्जुनं संख्ये पराशरसुतस्तदा । जगाम भरतश्रेष्ठ यथागतमरिंदम

সঞ্জয় বললেন—হে শত্রুদমন, ভরতশ্রেষ্ঠ! রণক্ষেত্রে অর্জুনকে এ কথা বলে পরাশরপুত্র ব্যাস যেমন এসেছিলেন, তেমনই পথে ফিরে গেলেন।

Verse 155

युद्ध कृत्वा महद्‌ घोरं पज्चाहानि महाबल: । ब्राह्मणो निहतो राजन्‌ ब्रह्मलोकमवाप्तवान्‌,राजन! पाँच दिनोंतक अत्यन्त घोर युद्ध करके महाबली ब्राह्मण द्रोणाचार्य मारे गये और ब्रह्मलोकमें चले गये

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, পাঁচ দিন মহা ভয়ংকর যুদ্ধ করে মহাবলী ব্রাহ্মণ দ্রোণাচার্য নিহত হলেন; পতিত হয়ে তিনি ব্রহ্মলোক লাভ করলেন।

Verse 156

स्वधीते यत्‌ फल वेदे तदस्मिन्नपि पर्वणि । क्षत्रियाणामभीरूणां युक्तमत्र महद्‌ यश:

বেদের স্বাধ্যায়ে যে ফল লাভ হয়, এই পর্ব পাঠ ও শ্রবণ করলেও সেই ফলই মেলে। এখানে নির্ভয়ে যুদ্ধে প্রবৃত্ত ক্ষত্রিয়দের মহৎ যশ যথাযথভাবে কীর্তিত হয়েছে।

Verse 157

य इदं पठते पर्व शृणुयाद्‌ वापि नित्यश: । स मुच्यते महापापै: कृतैघोरिश्व॒ कर्मभि:,जो प्रतिदिन इस पर्वको पढ़ता अथवा सुनता है, वह पहलेके किये हुए बड़े-बड़े पापों तथा घोर कर्मोसे मुक्त हो जाता है

যে ব্যক্তি প্রতিদিন এই পর্ব পাঠ করে বা শ্রবণ করে, সে পূর্বে কৃত মহাপাপ ও ঘোর কর্ম থেকে মুক্ত হয়।

Verse 158

यज्ञावाप्तिब्रद्विणस्येह नित्यं घोरे युद्धे क्षत्रियाणां यशश्नव । शेषौ वर्णों काममिष्टं लभेते पुत्रान्‌ पौत्रान्‌ नित्यमिष्टांस्तथैव

এটি প্রতিদিন পাঠ ও শ্রবণ করলে ব্রাহ্মণ যজ্ঞফল লাভ করে; ক্ষত্রিয় ঘোর যুদ্ধে সুযশ অর্জন করে। অবশিষ্ট দুই বর্ণের লোকেরাও পুত্র-পৌত্র প্রভৃতি এবং অন্যান্য প্রিয়, অভীষ্ট বস্তু লাভ করে।

Verse 201

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रगोक्षपर्वमें व्यासवाक्य तथा शतरुद्रिय स्घुतिविषयक दो सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত নারায়ণাস্ত্র-গোক্ষপর্বে ব্যাসবাক্য ও শতরুদ্রীয় স্তুতি-বিষয়ক দুইশ একতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 202

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि द्वायधिकद्धिशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ा भारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रगोक्षपर्वमें दो सौ दोवाँ अध्याय पूरा हुआ

সঞ্জয় বললেন—এইভাবে শ্রীমহাভারতের দ্রোণপর্বের অন্তর্গত নারায়ণাস্ত্র-মোক্ষপর্বে দুই শত দুইতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 276

इहलोके सुखं प्राप्य ते यान्ति परमां गतिम्‌ | जो भक्त मनुष्य सदा अनन्यभावसे वरदायक देवता कल्याणस्वरूप

ব্যাস বললেন—যারা এই লোকেতে সুখ লাভ করে, তারা পরম গতি লাভ করে। যে ভক্তজন সর্বদা অনন্য ভক্তিভাবে বরদাতা, কল্যাণস্বরূপ, সর্বেশ্বর উমানাথ ভগবান রুদ্রের উপাসনা করে, তারা এখানেই মঙ্গলসুখ ভোগ করে এবং শেষে পরম গতি প্রাপ্ত হয়।

Verse 493

नीलकण्ठाय पिज्ञाय स्वर्णकेशाय वै नमः । जलपति तथा देवपतिको नित्य नमस्कार है। पूषाके दाँत तोड़नेवाले

নীলকণ্ঠ, পিঙ্গলবর্ণ ও স্বর্ণকেশধারী ভগবানকে নমস্কার। জলপতি এবং দেবপতিকে নিত্য নমস্কার। পূষার দন্তভঙ্গকারী, ত্রিনেত্রধারী, বরদাতা শিবকে নমস্কার। নীলকণ্ঠ, পিঙ্গলবর্ণ ও স্বর্ণকেশ শংকরকে নমস্কার।

Verse 673

पीडयन्त्यधिकं लोक॑ यस्मात्‌ ते वरदर्पिता: । इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंने महात्मा भगवान्‌ शंकरसे कहा--'प्रभो! ब्रह्माजीसे वरदान पाकर ये त्रिपुरनिवासी घोर दैत्य सम्पूर्ण जगत्‌को अधिकाधिक पीड़ा दे रहे हैं; क्योंकि वरदान प्राप्त होनेसे उनका घमंड बहुत बढ़ गया है

বর লাভ করে দম্ভে উন্মত্ত হওয়ায় তারা জগতকে অতিশয় পীড়া দিচ্ছে। তখন ইন্দ্রসহ সকল দেবতা মহাত্মা ভগবান শংকরকে বললেন—“প্রভো! ব্রহ্মার কাছ থেকে বর পেয়ে ত্রিপুরবাসী এই ভয়ংকর দৈত্যেরা সমগ্র জগতকে ক্রমশ অধিকাধিক কষ্ট দিচ্ছে; বরপ্রভাবে তাদের অহংকার অত্যন্ত বেড়ে গেছে।”

Verse 803

अतिष्ठत्‌ स्थाणुभूत: स सहस्र॑ परिवत्सरान्‌ | पार्थ! उस समय सम्पूर्ण देवता और तपोधन महर्षि भगवान्‌ शंकरकी स्तुति करने लगे। उन भगवानने उस अनुपम एवं दिव्य माहेश्वर स्थान (रथ)-का निर्माण करके उसपर एक हजार वर्षोतक स्थिरभावसे खड़े रहे

ব্যাস বললেন—তিনি সহস্র বছর স্তম্ভের ন্যায় অচল হয়ে দাঁড়িয়ে রইলেন। হে পার্থ! তখন সকল দেবতা ও তপোধন মহর্ষিগণ ভগবান শংকরের স্তব করতে লাগলেন। সেই ভগবান অতুলনীয় ও দিব্য মাহেশ্বর স্থান (রথ) নির্মাণ করে তাতে সহস্র বছর স্থিরভাবে অবস্থান করলেন।

Verse 816

त्रिपर्वणा त्रिशल्येन तदा तानि बिभेद सः । जब वे तीनों पुर आकाशमें एकत्र हुए, तब उन्होंने तीन गाँठ और तीन फलवाले बाणसे उन तीनों पुरोंको विदीर्ण कर डाला

নির্দিষ্ট ক্ষণে আকাশে যখন সেই তিন পুর একত্র হল, তখন সে তিন গাঁট ও তিন শল্যযুক্ত একটিমাত্র শর দিয়ে তাদের ভেদ করে চূর্ণ-বিচূর্ণ করে দিল।

Verse 823

शरं कालाग्निसंयुक्त विष्णुसोमसमायुतम्‌ । उस समय दानव उन नगरोंकी ओर और कालाग्निसे संयुक्त एवं विष्णु तथा सोमकी शक्तिसे सम्पन्न उस बाणकी ओर भी आँख उठाकर देख न सके

সেই সময় কালাগ্নিসংযুক্ত এবং বিষ্ণু ও সোমের শক্তিতে সমন্বিত সেই শরের তেজে দানবেরা না নগরগুলোর দিকে, না সেই দগ্ধমান ক্ষেপণাস্ত্রের দিকে—চোখ তুলে তাকাতেও পারল না।

Verse 956

अयं श्रेष्ठ इति ज्ञात्वा ववन्दे तं पितामह: । तदनन्तर ब्रह्माजीने निकट जाकर भगवान्‌ महेश्वरको देखा और ये ही सबसे श्रेष्ठ हैं, ऐसा जानकर उनकी वन्दना की

‘ইনিই শ্রেষ্ঠ’—এ কথা জেনে পিতামহ তাঁকে প্রণাম করলেন। তারপর ব্রহ্মচর্মের নিকটে গিয়ে তিনি ভগবান মহেশ্বরকে দর্শন করলেন এবং ‘ইনিই সর্বোচ্চ’ বলে নিশ্চিত হয়ে তাঁর বন্দনা করলেন।

Verse 1116

स मोचयति सुप्रीतः शरण्य: शरणागतान्‌ । जो सब प्रकारकी ग्रहबाधाओंसे पीड़ित हैं और सम्पूर्ण पापोंमें डूबे हुए हैं

শরণ্য ভগবান শিব শরণাগতদের প্রতি অতিশয় প্রসন্ন হয়ে তাদের উদ্ধার করেন। যারা সর্বপ্রকার গ্রহবাধায় পীড়িত এবং সর্বপাপে নিমগ্ন—তারাও যদি শরণ নেয়, তবে শরণাগতবৎসল শিব তাদের পাপ ও তাপ থেকে মুক্ত করেন।

Verse 1126

स ददाति मनुष्येभ्य: स चैवाक्षिपते पुन: । वे ही प्रसन्न होनेपर मनुष्योंको आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धन और प्रचुरमात्रामें मनोवांछित पदार्थ देते हैं तथा वे ही कुपित होनेपर फिर उन सबका संहार कर डालते हैं

তিনিই মানুষকে দান করেন, আবার তিনিই পুনরায় কেড়ে নেন। প্রসন্ন হলে তিনি আয়ু, আরোগ্য, ঐশ্বর্য, ধন এবং প্রাচুর্যে মনোবাঞ্ছিত ভোগ্যবস্তু দেন; আর ক্রুদ্ধ হলে সেই সবই আবার বিনাশ করেন।

Verse 3636

सहस्रबाहवे चैव सहस्रचरणाय च । जिनके बहुत-से रूप हैं

সহস্র বাহু ও সহস্র চরণধারী, বিশ্বপালক হয়েও মুঞ্জের কৌপীন ধারণকারী—যাঁর সহস্র শির, সহস্র নয়ন, সহস্র ভুজা ও সহস্র পদ—সেই ভগবান শঙ্করকে প্রণাম।

Verse 9436

सप्रजापतय: सर्वे बालार्कसदृशप्रभम्‌ । उस बालकके रूपमें ये सर्वलोकेश्वर प्रभु भगवान्‌ महादेव ही थे, किंतु प्रजापतियोंसहित सम्पूर्ण देवता बालसूर्यके सदृश कान्तिमान्‌ उन जगदीश्वरको पहचान न सके

সমস্ত প্রজাপতি নবোদিত বালসূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান এক সত্তাকে দেখলেন। কিন্তু সেই শিশুরূপেই তিনি ছিলেন সর্বলোকেশ্বর প্রভু ভগবান মহাদেব; তথাপি প্রজাপতিসহ সমগ্র দেবসমূহ সেই কান্তিমান জগদীশ্বরকে চিনতে পারলেন না।

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