
शल्यपरिघातः (Śalya Under Encirclement) — Mahābhārata, Śalya-parva, Adhyāya 12
Upa-parva: Śalya-vadha (Battle Engagements Leading to Śalya’s Fall) — Context Unit
Saṃjaya reports that as Yudhiṣṭhira is pressured by Śalya, Sātyaki, Bhīmasena, Nakula, and Sahadeva surround the Madra king with their chariots and strike him with successive volleys. Observers (siddhas and assembled sages) register astonishment at the spectacle of a single commander being pressed by many mahārathas. Śalya counters by drawing a formidable bow and inflicting heavy arrow-wounds on the attackers, including targeted strikes that cut bows and hit drivers, demonstrating technical dominance and battlefield control. The exchange escalates into a contest of projectile interception: tomara, nārāca, śakti, gadā, and śataghnī are launched toward Śalya and are cut down mid-flight by his arrows. Śalya’s arrow-rain thickens into a near-opaque ‘darkness of arrows,’ disrupting visibility for both sides and producing awe among celestial spectators. Despite suppression, the Pāṇḍava charioteers remain engaged, maintaining proximity and pressure around Śalya as the engagement continues.
Chapter Arc: रणभूमि में शल्य का तेज प्रलयाग्नि-सा दीप्त है—यम के पाश, इन्द्र के वज्र और कैलास-शिखरों जैसी उपमाएँ उसके भय को मूर्त कर देती हैं; उसी क्षण भीम महागदा उठाकर उस पर झपटता है। → भीम और मद्रराज शल्य, दो पर्वतों की भाँति गदाएँ उठाकर मण्डलों में घूमते हुए एक-दूसरे पर प्रहार करते हैं; चोटों से डगमगाते, फिर सँभलते, वे बार-बार निकट आते हैं—भीम क्षणिक मूर्च्छा से उठकर फिर समाह्वान करता है और युद्ध और उग्र हो उठता है। → गदायुद्ध की चरम घड़ी के बाद शल्य का रथ युधिष्ठिर की ओर मुड़ता है; धर्मपुत्र के वक्ष पर बाणों का जाल-सा बिछ जाता है—मेघजाल की तरह घिरा हुआ—और सभा-सी दृष्टि रखने वाले योद्धा भी क्षण भर को स्तब्ध हो जाते हैं कि क्या राजा धराशायी होगा। → भीम और शल्य दोनों के मर्मस्थानों में गहरी चोटें लगने से वे अत्यन्त व्याकुल होते हैं; इसी अवसर पर कृपाचार्य शल्य को शीघ्र रण से हटाकर ले जाते हैं, जिससे तत्काल विनाश टलता है और मोर्चा पुनः सँभलता है। → कौरवदल दुर्योधन के अग्रणी होकर सिंहनाद करता हुआ आगे बढ़ता है; पाण्डव-वीर भी गर्जना कर उसकी ओर धावा करते हैं—अगला टकराव किसके पक्ष को तोड़ेगा, यह अनिश्चित रह जाता है।
Verse 1
०: >> अर द्ादशो<ड् ध्याय: भीमसेन और शल्यका भयानक गदायुद्ध तथा युधिष्ठिरके साथ शल्यका युद्ध
قال سنجيا: أيها الملك، لما رأى شاليا، سيد مَدْرَة، سائقه صريعًا، خطف سريعًا مطرقته المصنوعة كلها من الحديد، ووقف ثابتًا لا يتزحزح كالجبل—عازمًا في قلب سنن الحرب القاسية.
Verse 2
तं॑ दीप्तमिव कालाग्निं पाशहस्तमिवान्तकम् । सशृज्गभमिव कैलासं सवज़मिव वासवम्
قال سنجيا: بدا مهيبًا مرعبًا—كلهيب الزمن المتأجج عند فناء العالم، وكالموت نفسه قابضًا على الحبل، وكجبل كايلاسا بقممه الشامخة، وكإندرا حامل الصاعقة. فلما رآه بهيماسينا على تلك الهيئة، قبض على مطرقته العظيمة واندفع بقوة ليطرحه أرضًا.
Verse 3
सशूलमिव हर्यक्ष॑ वने मत्तमिव द्विपम् | जवेनाभ्यपतद् भीम: प्रगृह् महतीं गदाम्
قال سنجيا: كالثور ذي القرن الحاد، وكالفيل الهائج في الغابة، اندفع بهيما مسرعًا وهو قابض على مطرقته العظيمة.
Verse 4
तत:ः शड्खप्रणादश्च तूर्याणां च सहस्रश: । सिंहनादश्न संजज्ञे शूराणां हर्षवर्धन:
قال سنجيا: عندئذٍ ارتفع دويّ الأبواق الصدفية، وتعالت—بالآلاف—أصوات الأبواق وسائر آلات الحرب. وانفجر من المقاتلين زئيرٌ كزئير الأسد، يزيدهم حماسةً ويشدّ عزمهم للقتال.
Verse 5
फिर तो शंखनाद, सहसौ्रों वाद्योका गम्भीर घोष तथा शूरवीरोंका हर्ष बढ़ानेवाला सिंहनाद सब ओर होने लगा ।। प्रेक्षनत: सर्वतस्तौ हि योधा योधमहाद्विपौ । तावकाश्षापरे चैव साधु साथ्वित्यपूजयन्
ثم من كل جانبٍ ارتفع دويُّ الأبواق الصدفية، وزئيرُ آلاف الآلات في نغمةٍ عميقة، وصيحاتٌ كزئير الأسد تزيد فرحَ المحاربين وحماستهم. وكان المقاتلون ينظرون من كل جهةٍ فيُثنون على هذين البطلين العظيمين كأنهما «فيلانِ للحرب»، وحتى من كان قائمًا في الفسحات المفتوحة صاح: «أحسنت! أحسنت!»، تعظيمًا لبأسهما إذ اشتدّ الاصطدام.
Verse 6
योद्धाओंमें महान् गजराजके समान पराक्रमी उन दोनों वीरोंको देखकर आपके और शत्रुपक्षके योद्धा सब ओरसे “वाह-वाह” कहकर उनके प्रति सम्मान प्रकट करने लगे --[५॥।।
قال سنجيا: لما رأى المحاربون هذين البطلين—وقد كانا في البأس كسيّدٍ عظيمٍ للفيلة—هتف رجالُ جيشك ورجالُ العدو من كل ناحية: «واهًا! واهًا!» وأظهروا لهما الإكرام. إذ ليس في هذا العالم، سوى شاليا ملكِ مَدْرَة أو بالاراما بهجةِ آل يادو، من محاربٍ يجرؤ على احتمال اندفاع بهيماسينا في الوغى.
Verse 7
तथा मद्राधिपस्यापि गदावेगं महात्मन: । सोदुमुत्सहते नानयो योधो युधि वृकोदरात्,“इसी प्रकार महामना मद्रराज शल्यकी गदाका वेग भी रणभूमिमें भीमसेनके सिवा दूसरा कोई योद्धा नहीं सह सकता'
قال سنجيا: «وكذلك فإن اندفاع الهراوة في يد شاليا، عظيمِ النفس سيدِ مَدْرَة، لا يطيقه في القتال محاربٌ غير فْرِكودَرا (بهيمَة)».
Verse 8
तौ वृषाविव नर्दन्तौ मण्डलानि विचेरतु: । आवर्तितौ गदाहस्तौ मद्रराजवृकोदरौ,शल्य और भीमसेन दोनों वीर हाथमें गदा लिये साँड़ोंकी तरह गर्जते हुए चक्कर लगाने और पैंतरे देने लगे
قال سنجيا: إن شاليا ملكَ مَدْرَة وبهيمَسينا (فْرِكودَرا)، وقد قبض كلٌّ منهما على هراوته، زأرا كثورين، ثم أخذا يدوران في جولاتٍ محسوبة، يلتفّان ويُموِّهان طلبًا للغلبة.
Verse 9
मण्डलावर्तमार्गेषु गदाविहरणेषु च । निर्विशेषम भूद् युद्ध तयो: पुरुषसिंहयो:
قال سنجيا: في دورانِهما على هيئة الدوائر، وفي مسالك الالتفاف في القتال، وفي فنّ المناورة بالهراوة وضربها، لم يظهر في قتال هذين «الأسدين من الرجال» أيُّ تفاوتٍ البتّة؛ فلم يبدُ أحدهما أرجح من الآخر، بل بدا كأنهما متكافئان مهارةً وبأسًا.
Verse 10
तप्तहेममयै: शुश्रे्बभूव भयवर्धिनी । अग्निजालैरिवाबद्धा पट्टा: शल्यस्य सा गदा,तपाये हुए उज्ज्वल सुवर्णमय पत्रोंसे जड़ी हुई शल्यकी वह भयंकर गदा आगकी ज्वालाओंसे लिपटी हुई-सी प्रतीत होती थी
قال سنجيا: كانت هراوة شاليا، المرصَّعة بصفائح من ذهب متوهّج لامع، مهيبةً تُضاعف الرهبة؛ كأنها مُحاطةٌ بشِباكٍ من نار.
Verse 11
इस प्रकार श्रीमह्याभारत शल्यपर्वमें भीमरेन और शल्यका युद्धविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ
قال سنجيا: وبينما كان بهيماسينا، ذو العزم العظيم، يواصل السير في مسالكه بمناورات دائرية وخدعٍ متنوّعة، كانت هراوته الجبّارة تتلألأ—كسحابةٍ تشقّها البروق—دلالةً على براعته القتالية وصلابته في أداء واجبه في ساحة الحرب.
Verse 12
ताडिता मद्रराजेन भीमस्य गदया गदा । दहा[मानेव खे राजन् सासृजत् पावकार्चिष:
قال سنجيا: أيها الملك، حين ضُرِبت هراوة بهيماسينا بهراوة ملك مادرا، اشتعلت كأنها تحترق في السماء، وتطايرت شراراتٌ كألسنة النار.
Verse 13
तथा भीमेन शल्यस्य ताडिता गदया गदा । अज्जारवर्ष मुमुचे तदद्भुतमिवाभवत्,इसी प्रकार भीमसेनकी गदासे ताड़ित होकर शल्यकी गदा भी अंगारे बरसाने लगी। वह है कक अकन्5
قال سنجيا: وكذلك، حين ضُرِبت هراوة شاليا بهراوة بهيما، أخذت تمطر جمراً متّقداً؛ وكأن أمراً عجيباً قد وقع.
Verse 14
महानागौ श्ज्ञैरिव महर्षभौ । तोत्रैरिव तदान्योन्यं गदाग्राभ्यां निजघ्नतु:
قال سنجيا: كما يضرب فيلان عظيمان بعضهما بأنيابهما، أو كما يتصادم ثوران جليلان بقرونهما، كذلك شرع البطلان المقدَّمان يضرب أحدهما الآخر بأطراف هراواتهما، كأنها مِهاميز.
Verse 15
तौ गदाभिह्ठ तैगत्रि: क्षणेन रुधिरोक्षितौ । प्रेक्षणीयतरावास्तां पुष्पिताविव किंशुकौ
قال سنجيا: لقد أُصيب المحاربان بضربات صولجانيهما إصابةً شديدة، فغدت أطرافهما في لحظةٍ مغطّاةً بالجراح ومغمورةً بالدم. ومع ذلك وقفا أبهى للنظر—كشجرتي كِمْشُكَة (بالاشا) في تمام الإزهار—يكشفان عن بهاء الشجاعة القاتم في قلب عنف الحرب.
Verse 16
गदया मद्रराजस्य सव्यदक्षिणमाहत: । भीमसेनो महाबाहुर्न चचालाचलो तथा,मद्रराजकी गदासे दायें-बायें अच्छी तरह चोट खाकर भी महाबाहु भीमसेन विचलित नहीं हुए। वे पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े रहे
قال سنجيا: مع أنه ضُرب ضرباتٍ شديدةً عن يساره ويمينه بصولجان ملك مَدْرَة، فإن بهيماسينا عظيمَ الساعدين لم يتزعزع. وقف ثابتًا لا يتحرك كالجبل—صورةً للعزم الراسخ وسط عنف الحرب.
Verse 17
तथा भीमगदावेगैस्ताड्यमानो मुहुर्मुहुः । शल्यो न विव्यथे राजन् दन्तिनेव महागिरि:
قال سنجيا: مع أنه كان يُضرَب مرارًا وتكرارًا بزخم صولجان بهيما العنيف، فإن شاليا لم يَفْزَع، أيها الملك—بل ظل ثابتًا لا يتحرك كجبلٍ عظيمٍ يهاجمه فيل.
Verse 18
इसी प्रकार भीमसेनकी गदाके वेगसे बारंबार आहत होनेपर भी शल्यको उसी प्रकार व्यथा नहीं हुई, जैसे दन््तार हाथीके आघातसे महान् पर्वत पीड़ित नहीं होता ।।
قال سنجيا: وكذلك، مع أن شاليا كان يُصاب مرارًا بزخم صولجان بهيماسينا، لم تعتَرِه وَجَعٌ—كما لا يتأذّى جبلٌ عظيمٌ من صدمة فيلٍ ذي أنياب. وفي ذلك الحين سُمِع في كل الجهات دويُّ اصطدام صولجاني «أسدي الرجال» كأنه صدى ارتطام صاعقتين (فَجْرَين/فَجْرَا: vajra).
Verse 19
निवृत्य तु महावीर्यों समुच्छितमहागदौ । पुनरन्तरमार्गस्थौ मण्डलानि विचेरतु:
قال سنجيا: ثم إن البطلين الجليلين—بهيماسينا وشاليا—رفعا صولجانيهما العظيمين عاليًا؛ فتارةً يتراجعان، وتارةً يثبتان في خطّ الاقتراب الأوسط، وتارةً يدوران في دوائر واسعة، وكلٌّ منهما يلتمس الثغرة المناسبة في المبارزة.
Verse 20
अथाश्येत्य पदान्यष्टौ संनिपातो5भवत् तयो: । उद्यम्य लोहदण्डाभ्यामतिमानुषकर्मणो:
قال سنجيا: ثم تقدّم الاثنان نحو بعضهما ثماني خطوات حتى التحما. ورفعا هراوتين من حديد، وشرعا—وهما ذوا بأسٍ يفوق طاقة البشر—يضرب أحدهما الآخر، وفي تلك اللحظة نشب بينهما صراعٌ رهيبٌ متلاحمٌ عن قرب.
Verse 21
पोथयन्तौ तदान्योन्यं मण्डलानि विचेरतु: । क्रियाविशेषं कृतिनौ दर्शयामासतुस्तदा,वे दोनों युद्धकलाके विद्वान् वीर, एक-दूसरेको कुचलते हुए मण्डलाकार विचरते और अपना-अपना विशेष कार्य-कौशल प्रदर्शित करते थे
قال سنجيا: في ذلك الحين كان المحاربان المتمكّنان يضغط أحدهما على الآخر ويدوران في حركاتٍ حلقية، وكلٌّ منهما يُظهر براعته الخاصة وتمكّنه من فنون القتال.
Verse 22
अथोट्यम्य गदे घोरे सशृज्भाविव पर्वतौ । तावाजघ्नतुरन्योन्यं मण्डलानि विचेरतु:,तदनन्तर वे पुनः अपनी भयंकर गदाएँ उठाकर शिखरयुक्त दो पर्वतोंके समान परस्पर आघात करने और मण्डलाकार गतिसे विचरने लगे
قال سنجيا: ثم رفعا هراوتيهما المروّعتين، فكأنهما جبلان توأمان تعلوهما القمم؛ وأخذا يتبادلان الضربات تباعًا وهما يدوران في حركةٍ حلقية.
Verse 23
क्रियाविशेषकृतिनौ रणभूमितले5चलौ । तौ परस्परसंरम्भाद् गदाभ्यां सुभशाहतौ
قال سنجيا: على أرض ساحة القتال ثبت الاثنان—وهما سيدا المناورات المتنوعة المحكمة—لا يتحركان. غير أنّ الحنق المتبادل دفعهما إلى أن يضرب أحدهما الآخر بهراوته ضربةً هائلة القوة.
Verse 24
युगपत पेततुर्वीरावुभाविन्द्रध्वजाविव । उभयो: सेनयोर्वीरास्तदा हाहाकृतो&$भवन्
قال سنجيا: وفي تلك اللحظة بعينها سقط البطلان معًا، كأنهما رايتا إندرا قد هُوِّيتا إلى الأرض. عندئذٍ أطلق فرسان الجيشين صرخة نواحٍ وندبة، فارتفع العويل في الميدان.
Verse 25
युद्धविषयक कार्यविशेषके ज्ञाता वे दोनों वीर अविचलभावसे रणभूमिमें डटे हुए थे। वे एक-दूसरेपर क्रोधपूर्वक गदाओंका प्रहार करके अत्यन्त घायल हो गये और दो इन्द्रध्वजोंके समान एक ही साथ पृथ्वीपर गिर पड़े। उस समय दोनों सेनाओंके वीर हाहाकार करने लगे ।।
قال سنجايا: إنّ البطلين، العارفين بدقائق شؤون القتال، لبثا ثابتين في ساحة المعركة بقلوب لا تتزعزع. وتبادلا ضربات الهراوات في غضبٍ عارم حتى أُثخِنا جراحًا، ثم سقطا معًا على الأرض كأنهما رايتان لإندرا قد انهدّتا في آنٍ واحد. عندئذٍ علا عويلُ أبطال الجيشين. وقد أُصيبت مواضعُهما القاتلة مرارًا فغشِيَهما الذهول؛ ثم في خضمّ القتال رُفِع «ثورُ المَدْرَة» وأُعيد إلى عربته هو.
Verse 26
क्षीणवद् विद्धलत्वात् तु निमेषात् पुनरुत्थित:
قال سنجايا: مع أنه بدا واهنًا كليًّا—جسده مترهّلًا ومثقوبًا بالجراح—فقد نهض من جديد في اللحظة التالية.
Verse 27
भीमसेनो गदापाणि: समाह्नयत मद्रपम् । इधर गदाधारी भीमसेन पलक मारते-मारते पुनः होशमें आकर उठ खड़े हुए और विह्वलताके कारण मतवाले पुरुषके समान मद्रराजको युद्धके लिये ललकारने लगे ।।
قال سنجايا: إنّ بهيماسينا، والهراوة في يده، تحدّى ملكَ مَدْرَة إلى القتال. فحينئذٍ تحرّك أبطالُ جانبك، مزوّدين بشتى أنواع السلاح (ليجيبوا).
Verse 28
भुजावुच्छित्य शस्त्र च शब्देन महता तत:
قال سنجايا: ثم رفع ذراعيه وسلاحه، وأطلق صيحةً عظيمةً مدوّية.
Verse 29
तदनीकमभिप्रेक्ष्य ततस्ते पाण्डुनन्दना:
قال سنجايا: فلمّا رأى أبناءُ باندو ذلك الصفَّ القتالي أمامهم، عزموا عندئذٍ وأقدموا على ما يلي من الفعل.
Verse 30
तेषामापततां तूर्ण पुत्रस्ते भरतर्षभ
قال سانجيا: «حين اندفع أولئك المحاربون مسرعين، يا ثورَ آلِ بهاراتا، كان ابنُك (دوريودانا)…»
Verse 31
स पपात रथोपस्थे तव पुत्रेण ताडित:
وقد صُرِع بضربةٍ من ابنك، فسقط على مقعد العربة الحربية—صورةٌ تُبيّن كيف تنقلب البأسُ والحياةُ في لهيب الحرب في لحظة، وكيف تغدو أفعالُ ذوي القربى أنفسِهم أدواتَ القدر العاجلة في ساحة القتال.
Verse 32
चेकितानं हतं दृष्टवा पाण्डवेया महारथा:
قال سانجيا: «لمّا رأى محاربو الباندافا العظام على العجلات تشيكيتانا صريعًا، أخذتهم صدمةُ الفقد—حادثةٌ عمّقت عزمهم، وفي الوقت نفسه كشفت الثمنَ القاسي الذي لا يلين للحرب.»
Verse 33
तावकानामनीकेषु पाण्डवा जितकाशिन:
قال سانجيا: «وفي صفوف جيشك كان الباندافا—وقد قهروا كاشي—مصطفّين؛ فكان حضورهم علامةً على بأسٍ اكتُسب بشقّ الأنفس، وعلى اندفاعٍ لا يهدأ لعواقب الحرب الأخلاقية والعسكرية.»
Verse 34
व्यचरन्त महाराज प्रेक्षणीया: समनन््ततः । महाराज! विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डव आपकी सेनाओंमें सब ओर निर्भय विचरते थे। उस समय वे देखने ही योग्य थे ।। ३३ $ ।। कृपश्च कृतवर्मा च सौबलश्न महारथ:
قال سانجيا: «يا أيها الملك، كانوا يتحرّكون من كل جانب—منظرًا جديرًا بالمشاهدة. وكان هناك أيضًا كِرِبا، وكِرِتَفارما، وساوبالا، وهو محاربٌ عظيم على العجلة.»
Verse 35
भारद्वाजस्य हन्तारं भूरिवीर्यपराक्रमम्
قال سانجيا: «(لقد أبصر) قاتلَ ابنِ بهارادفاجا—ذا القوة الغزيرة والبأسِ البطولي—واقفًا في غشاوةٍ أخلاقيةٍ قاتمةٍ بساحة القتال، حيث يمتزج الشجاعةُ بثِقلِ إزهاقِ الأرواح امتزاجًا لا انفصام له.»
Verse 36
दुर्योधनो महाराज धृष्टद्युम्नमयोधयत् । राजाधिराज! आपका पुत्र दुर्योधन अत्यन्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न द्रोणहन्ता धृष्टद्युम्नके साथ जूझने लगा ।। त्रिसाहस्रास्तथा राजंस्तव पुत्रेण चोदिता:
قال سانجيا: «أيها الملك العظيم، إن دُريودَهَنَةَ اشتبك في القتال مع دْهْرِشْتَديومْنَة. يا إمبراطور الملوك، إن ابنك دُريودَهَنَة—الممتلئ قوةً وبأسًا على نحوٍ فائق—قد دنا فصادم دْهْرِشْتَديومْنَةَ قاتلَ دْرونَة. وكذلك، أيها الملك، فإن الجموع بالآلاف قد حُثَّت أيضًا بابنك، دافعةً المعركة إلى الأمام.»
Verse 37
विजये धृतसंकल्पा: समरे त्यक्तजीविता:
قال سانجيا: «وقد عقدوا العزم على الظفر، فدخلوا المعركة وقد نبذوا التعلّق بالحياة—رجالٌ آثروا ثباتَ المقصد على حفظِ النفس، تحت مطالب الحرب القاسية.»
Verse 38
प्राविशंस्तावका राजन् हंसा इव महत् सर: । नरेश्वरर जैसे हंस महान् सरोवरमें प्रवेश करते हैं, उसी प्रकार आपके सैनिक समरांगणमें विजयका दृढ़ संकल्प ले प्राणोंका मोह छोड़कर शत्रुओंकी सेनामें जा घुसे ।।
قال سانجيا: «أيها الملك، اندفع محاربوك إلى الأمام—كالبجع يدخل بحيرةً عظيمة—وقد طرحوا التعلّق بالحياة، واقتحموا صفوف العدو بعزمٍ راسخ على الظفر. ثم قامت معركةٌ مروّعة، إذ كان الفريقان يبتغيان هلاكَ أحدهما الآخر.»
Verse 39
तस्मिन् प्रवत्ते संग्रामे राजन् वीरवरक्षये
قال سانجيا: «أيها الملك، لما اندلعت تلك المعركة على الحقيقة—فأفضت إلى هلاك خيرة الأبطال—…»
Verse 40
श्रवणान्नामधेयानां पाण्डवानां च कीर्तनात्
قال سانجيا: «بمجرد سماع أسمائهم، وبإنشاد أسماء أبناء باندو أيضًا…»
Verse 41
तद्रज: पुरुषव्यात्र शोणितेन प्रशामितम्
قال سانجيا: يا نمرَ الرجال، إن ذلك الغبار قد أُخمد وأُسكن بالدم.
Verse 42
दिशश्नल विमला जातास्तस्मिंस्तमसि नाशिते । पुरुषसिंह! उस समय इतना खून बहा कि उससे वहाँ छायी हुई सारी धूल बैठ गयी। उस धूलजनित अन्धकारका नाश होनेपर सम्पूर्ण दिशाएँ स्वच्छ हो गयीं ।।
قال سانجيا: «يا أسدَ الرجال! لما انقشع ذلك الظلام اتضحت الجهات. سال من الدم ما جعل الغبار المعلّق فوق الميدان يهبط ويستقرّ؛ وحين زال السواد المتولّد من الغبار بدت الآفاق كلّها صافيةً مضيئة. وهكذا ظلّت المعركة مستعرة—فظيعةَ الهيئة، مُرعبة.»
Verse 43
ब्रह्मलोकपरा भूत्वा प्रार्थयन्तो जयं युधि
قال سانجيا: وقد جعلوا برهمالوكـا (عالم براهما) الغاية العليا، دعوا بالنصر في ساحة القتال.
Verse 44
सुयुद्धेन पराक्रान्ता नस: स्वर्गमभीप्सव: । सबका लक्ष्य था ब्रह्मलोककी प्राप्ति। वे सभी सैनिक युद्धमें विजय चाहते और उत्तम युद्धके द्वारा पराक्रम दिखाते हुए स्वर्गलोक पानेकी अभिलाषा रखते थे ।।
قال سانجيا: «بقتالٍ نبيل أظهروا بأسهم، راغبين في السماء. وكان مقصدهم المشترك بلوغ برهمالوكـا. إن أولئك المحاربين جميعًا كانوا يطلبون الظفر في الحرب؛ وبخوض قتالٍ رفيع وإظهار الشجاعة، كانوا يتطلعون إلى نيل العالم السماوي—عازمين على إنجاز غاية سيدهم وتخليص أنفسهم من دَين القوت الذي نالوه.»
Verse 45
नानारूपाणि शस्त्राणि विसृजन्तो महारथा:
قال سنجيا: إن عظماء فرسان المركبات، وهم يقذفون أسلحةً شتّى الأشكال، دفعوا المعركة إلى الأمام—صورةٌ لزخم الحرب الذي لا يلين، حيث تُعلَن البسالة وواجب الدharma عبر عنفٍ منضبط لا عبر هوى شخصي.
Verse 46
हत विध्यत गृह्नीत प्रहरध्वं निकृन्तत
قال سنجيا: «اصرعوا العدو؛ اطعنوه؛ خذوه أسيراً؛ اضربوه؛ قطّعوه إرباً!» في لهيب القتال، هذا نداءُ حشدٍ يعكس زخم الحرب القاسي، حيث تكون أخلاق اللحظة هي الظفر والبقاء لا التروّي والمداولة.
Verse 47
तत: शल्यो महाराज धर्मपुत्रं युधिष्तिरम्
قال سنجيا: ثم إن شَليَه، أيها الملك العظيم، خاطب يودهيشثيرا ابنَ الدharma—ممهِّداً لمشهد النصح والمواجهة وسط الضغط الأخلاقي للحرب.
Verse 48
तस्य पार्थो महाराज नाराचान् वै चतुर्दश
قال سنجيا: أيها الملك، عندئذٍ أطلق بارثا (أرجونا) عليه أربع عشرة سهماً من سهام «ناراجا»—ردّاً قتالياً سريعاً منضبطاً ضمن واجبات الحرب الكئيبة.
Verse 49
आवार्य पाण्डवं बाणैहन्तुकामो महाबल:
قال سنجيا: بوابلٍ من السهام كفَّ الباندڤي، ثم—وقد عزم على قتله—تقدّم بقوةٍ عظيمة. ويؤكد هذا السطر زخم الحرب الكئيب: فالقوة القتالية تُساق بإرادةٍ مقصودة إلى التدمير، مبيّناً كيف تدفع «الرغبة/العزم (kāma/saṅkalpa)» الفعلَ حين تنهار الكوابح في ساحة القتال.
Verse 50
विव्याध समरे क्रुद्धो बहुभि: कड्कपत्रिभि: | महाबली शल्य पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको रोककर उन्हें मार डालनेकी इच्छासे समरांगणमें कंकपत्रयुक्त अनेक बाणोंद्वारा उनपर क्रोधपूर्वक प्रहार करने लगे ।। अथ भूयो महाराज शरेणानतपर्वणा
قال سانجيا: في لهيب المعركة، كان شاليا الجبار مستعرَ الغضب، عازمًا على قتل يودهيشتيرا ابن باندو، فأخذ يطعنه مرارًا في ساحة القتال بسهام كثيرة مُريَّشة بريش البلشون. ثم عاد، أيها الملك، فبِسهمٍ آخر كانت عُقَدُه منحنية إلى أسفل، واصل هجومه.
Verse 51
युधिष्ठिरं समाजघ्ने सर्वसैन्यस्य पश्यत: । राजाधिराज! फिर उन्होंने सारी सेनाके देखते-देखते झुकी हुई गाँठवाले बाणसे युधिष्ठिरको घायल कर दिया ।। धर्मराजो5पि संक्रुद्धों मद्रराज॑ं महायशा:
قال سانجيا: أمام أنظار الجيش كله ضرب يودهيشتيرا. يا إمبراطور الملوك، وبينما كانت القوات جميعًا تشاهد، جرحه شاليا بسهامٍ عُقَدُها خشنة منحنية إلى أسفل. عندئذٍ غضب الملك البارّ يودهيشتيرا—ذو الصيت الرفيع—على ملك مادرا.
Verse 52
चन्द्रसेनं च सप्तत्या सूतं च नवभि: शरै:
قال سانجيا: أصاب تشندراسينا بسبعين سهمًا، وأصاب السائق (سارثي العربة) بتسعة سهام.
Verse 53
चक्ररक्षे हते शल्य: पाण्डवेन महात्मना
قال سانجيا: لما قُتل المحارب الذي كان يحرس تشكيل العجلة (تشاكرا-فيوها) على يد الباندفي العظيم النفس، اضطرب عزم شاليا—وكان ذلك منعطفًا نذيرَ شؤمٍ في المعركة.
Verse 54
निजघान ततो राजंश्वेदीन् वै पज्चविंशतिम् । महात्मा पाण्डवके द्वारा अपने चक्ररक्षकके मारे जानेपर राजा शल्यने पचीस चेदि- योद्धाओंका संहार कर डाला || ५३ $ || सात्यकिं पड्चविंशत्या भीमसेनं च पठ्चभि:
قال سانجيا: ثم، أيها الملك، صرع شاليا خمسةً وعشرين من محاربي تشيدي (Śvedi/Cedi). كما هاجم ساتياكي بخمسةٍ وعشرين (سهمًا)، وبيماسينا بخمسة سهام، مواصلًا تبادل الضربات العنيف الذي لا يهدأ في ساحة الحرب.
Verse 55
माद्रीपुत्रो शतेनाजी विव्याथ निशितै: शरै: । फिर सात्यकिको पचीस, भीमसेनको पाँच तथा माद्रीके पुत्रोंकी सौ तीखे बाणोंसे रणभूमिमें घायल कर दिया ।। एवं विचरतस्तस्य संग्रामे राजसत्तम
قال سنجيا: إن ابن مادري ضربه في المعركة بمئة سهمٍ حادّ، فأثخنه جراحًا في ساحة الوغى. وهكذا، وبينما كان ذلك الملك الأسمى يتحرّك في لُجّة القتال، ظلّ صليل السلاح متواصلًا—كلُّ محاربٍ يمضي في واجبه كما يراه، تحت مطالب الحرب القاسية التي لا ترحم.
Verse 56
ध्वजाग्रं चास्य समरे कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:
قال سنجيا: في لُجّة القتال، ضرب يودهيشتِهيرا ابن كونتي قِمّة راية خصمه—لا ليُتلف شارة العربة فحسب، بل ليتحدّى هيبة العدو وعزيمته في خضمّ الضيق الأخلاقي الذي تفرضه الحرب.
Verse 57
पाण्डुपुत्रेण वै तस्य केतुं छिन्न॑ महात्मना
قال سنجيا: إن ذلك الابن النبيل لباندو قد قطع رايته حقًّا وأسقطها—وهو فعلٌ دلّ في قلب المعركة على براعةٍ في التدبير وثباتٍ في العزم الأخلاقي: كسر كبرياء العدو من غير أن يحيد عن واجب المحارب.
Verse 58
ध्वजं निपतितं दृष्टवा पाण्डवं च व्यवस्थितम्
قال سنجيا: لما رأى الراية قد سقطت، ورأى الباندڤا (يودهيشتِهيرا) ثابتًا أمامه، اشتعل ملك مادرا شاليا غضبًا وأطلق وابلًا من السهام كالمطر. وتُبرز هذه اللحظة كيف أن كبرياءً مجروحًا ورؤية خصمٍ لا يتزعزع قد تُفجّر سخطًا يدفع العنف إلى التصاعد في أتون الحرب.
Verse 59
शल्य: सायकवर्षेण पर्जन्य इव वृष्टिमान्
قال سنجيا: إن شاليا، وهو يسكب مطرًا من السهام، بدا كبرجَنيَة سحابةِ المطر حين تنهمر انهمارًا—وهي صورة تُبرز كيف أن البأس في لهيب القتال قد يشبه قوة الطبيعة الجارفة، الغامرة، التي لا تُحابِي أحدًا.
Verse 60
सात्यकिं भीमसेनं च माद्रीपुत्री च पाण्डवी
قال سنجيا: لقد أبصر/ذكر ساتياكي وبهيمسينا، وذكر أيضًا السيدة الباندفية ابنة مادري—مُلفتًا النظر إلى هؤلاء الأعلام في خضمّ كارثة الحرب المتفاقمة، حيث تُحدِّد السلالة والولاء معًا حدَّ الواجب وحدَّ الحزن.
Verse 61
एकैकं पज्चभिर्विद्ध्वा युधिष्ठिरमपीडयत् । सात्यकि, भीमसेन और माद्रीकुमार पाण्डुपुत्र नकुल-सहदेव--इनमेंसे प्रत्येकको पाँच- पाँच बाणोंसे घायल करके वे युधिष्ठिरको पीड़ा देने लगे || ६० $ ।।
قال سنجيا: بعدما طعن كلَّ واحدٍ منهم بخمس سهام، أخذ يُعذِّب يودهيشتيرا. ثم أُلقيت على صدر الباندفي شبكةٌ من السهام كأنها نسيجٌ ممتدّ—لا لتجريح الأجساد في ساحة القتال فحسب، بل لكسر عزيمة الملك عبر آلام رفاقه.
Verse 62
तस्य शल्यो रणे क्रुद्धः शरै: संनतपर्वभि:
قال سنجيا: في تلك المعركة كان شَليَهُ مستعرَ الغضب، فانهال عليه بسهامٍ محكمةِ المفاصل ثابتةِ التركيب—صورةُ سلاحٍ منضبطٍ تحوّل، في لهيب الحرب، إلى أداةٍ للهلاك.
Verse 63
दिश: संछादयामास प्रदिशश्न महारथ: । रणभूमिमें कुपित हुए महारथी शल्यने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे युधिष्ठिरकी सम्पूर्ण दिशाओं और विदिशाओंको ढक दिया ।।
قال سنجيا: وقد استشاط شَليَهُ، ذلك المقاتل العظيم على العربة، غضبًا في ساحة الوغى، فغطّى الجهات كلَّها والجهاتِ البينية حول يودهيشتيرا بوابلٍ كثيف من السهام، كأن مفاصلها منحنية وهي تمضي. ثم إن الملك يودهيشتيرا، وقد ضُغط عليه بتلك الشبكة من النبال، أبدى بأسًا عجيبًا—كجَمبها حين هاجمه فِرتراهَن (إندرا).
Verse 276
नानावादित्रशब्देन पाण्डुसेनामयोधयन् । तब आपके सैनिक नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर भाँति-भाँतिके रणवाद्योंकी गम्भीर ध्वनिके साथ पाण्डव-सेनासे युद्ध करने लगे
قال سنجيا: ومع جلبةِ شتّى آلات الحرب، اندفعت الجموع إلى جيش الباندافا وشرعت تقاتل—سلاحٌ مرفوع، وحديدٌ في الأيدي—وكانت الأصوات العميقة المتنوّعة في ساحة الوغى تُعلن اندلاع الحرب اندلاعًا تامًّا، وتُنبئ بتصلّب القلوب الذي تفرضه مثل هذه الفتنة.
Verse 283
अभ्यद्रवन् महाराज दुर्योधनपुरोगमा: । महाराज! दुर्योधन आदि कौरववीर दोनों हाथ और शस्त्र उठाकर महान् कोलाहल एवं सिंहनाद करते हुए शत्रुओंपर टूट पड़े
قال سنجيا: «أيها الملك، إن أبطال الكورافا، يتقدّمهم دوريودhana، اندفعوا إلى الأمام. رفعوا الأذرع والأسلحة، ثم انقضّوا على العدوّ في جلبة عظيمة وزئيرٍ كزئير الأسد—صورةٌ لاندفاع الحرب العنيف، حيث يدفع الكبرياء وحميّةُ الفروسية الرجالَ إلى التهوّر في العنف.»
Verse 303
प्रासेन चेकितानं वै विव्याध हृदये भृशम् । भरतश्रेष्ठ) आपके पुत्रने तुरंत ही एक प्रासका प्रहार करके उन आक्रमणकारी पाण्डव- योद्धाओंमेंसे चेकितानकी छातीपर गहरी चोट पहुँचायी
قال سنجيا: «وبحربةٍ طعن تشيكيتانا طعنةً عنيفة في موضع القلب. وفي اندفاع المعركة الكالح، يبيّن هذا الفعل كيف تنقلب المهارة القتالية سريعًا إلى عاقبةٍ قاتلة، حيث لا ينفصل البأس والواجب في ساحة الحرب عن الثمن المأساوي للعنف.»
Verse 316
रुधिरौघपरिक्लिन्न: प्रविश्य विपुलं तम: | आपके पुत्रद्वारा ताड़ित होकर चेकितान अत्यन्त मूर्च्छित हो रथकी बैठकमें गिर पड़ा। उस समय उसका सारा शरीर खूनसे लथपथ हो गया था
قال سنجيا: «لمّا ضُرِب تشيكيتانا على يد ابنِك غُشي عليه غشيانًا شديدًا، فسقط في مقعد عربته. وكان جسده كلّه مغمورًا بسيلٍ من الدم، كأنما يغوص في ظلمةٍ واسعة—علامةٌ على فظاعة الحرب القريبة، وعلى الثمن المأساوي حين تنقلب البراعة القتالية إلى تدميرٍ محض.»
Verse 323
असक्तमभ्यवर्षन्त शरवर्षाणि भागश: । चेकितानको मारा गया देख पाण्डव महारथी पृथक्-पृथक् बाणोंकी लगातार वर्षा करने लगे
قال سنجيا: «وبشدةٍ لا تنقطع أمطروا سهامًا كالغيث في دفعاتٍ موزونة. ولمّا رأى أبطال الباندافا تشيكيتانا صريعًا—وتوأما مادري، ويويودانا (ساتياكي)—أخذ كلٌّ منهم في ناحيته يبلّل عظماء فرسان العربات من الخصم بوابلٍ متصل من النبال. ويبرز المشهدُ تنسيقَ القتال المنضبط، حيث تقترن البراعة بالعزم والواجب وسط مطالب الحرب القاسية.»
Verse 346
अयोधयन् धर्मराजं मद्रराजपुरस्कृता: । तत्पश्चात् कृपाचार्य, कृतवर्मा और महारथी शकुनि मद्रराज शल्यको आगे करके धर्मराज युधिष्ठिरसे युद्ध करने लगे
قال سنجيا: «وقد جعلوا ملكَ مادرا في المقدّمة فاشتَبكوا مع دهرماراجا في القتال. ثم إن كريبا المُعلّم، وكريتافَرما، والمحارب العظيم على العربة شكوني—وقد قدّموا ملكَ مادرا شاليا أمامهم—انقضّوا على دهرماراجا يودهيشثيرا ليقاتلوه. ويُبرز المشهد كيف أنّه في فوضى الحرب، حتى الشيوخ الموقَّرين والفرسان المشهورين يحتشدون خلف قائدٍ مختار ليدفعوا هجومًا مركّزًا على مَن هو تجسيدُ الدارما.»
Verse 363
अयोधयन्त विजयं द्रोणपुत्रपुरस्कृता: । राजन्! आपके पुत्रसे प्रेरित हो तीन हजार योद्धा अश्वत्थामाको अगुआ बनाकर अर्जुनके साथ युद्ध करने लगे
قال سانجيا: أيها الملك، بدافعٍ من ابنك اندفع ثلاثةُ آلافِ محاربٍ—يتقدّمهم أشوَتّاما ابنُ درونا—فاشتبكوا مع أرجونا، يبتغون الظفرَ بالنصر.
Verse 386
अन्योन्यवधसंयुक्तमन्योन्यप्रीतिवर्धनम् । फिर तो एक-दूसरेके वधकी इच्छावाले उभयपक्षके सैनिकोंमें घोर युद्ध होने लगा। सभी एक-दूसरेके संहारके लिये सचेष्ट थे और वह युद्ध उनकी पारस्परिक प्रसन्नताको बढ़ा रहा था
قال سانجيا: ثم اندلع قتالٌ رهيب بين جيشي الفريقين، وقد تملّك كلاً منهما شوقُ قتلِ الآخر. كان الجميع يسعى إلى إفناء خصمه، ومع ذلك كان ذلك القتال يزيدهم نشوةً وحماسةً في ساحة الحرب، حتى اشتدّ هوله.
Verse 396
अनिलेनेरितं घोरमुन्तस्थौ पार्थिव रज: । राजन! बड़े-बड़े वीरोंका विनाश करनेवाले उस घोर संग्रामके आरम्भ होते ही वायुकी प्रेरणासे धरतीकी भयंकर धूल ऊपरको उठने लगी
قال سانجيا: أيها الملك، ما إن ابتدأت تلك المعركة المروّعة—المقدَّر لها أن تُهلك حتى أعظم الأبطال—حتى دفعت الريحُ غبارَ الأرض المخيف فارتفع عالياً، كأنه سحابةٌ تنذر بالخراب.
Verse 403
परस्परं विजानीमो यदयुद्धयन्नभीतवत् । उस समय उस धूलके अन्धकारमें समस्त योद्धा निर्भय-से होकर युद्ध कर रहे थे। पाण्डव तथा कौरव-योद्धा जो अपना नाम लेकर परिचय देते थे
قال سانجيا: في ذلك الظلام الأعمى الذي أثارته سحابة الغبار، ظلّ المحاربون يقاتلون بلا خوف. وفي خضمّ الاضطراب لم نكن نميّز بعضنا من بعض إلا بسماع المقاتلين ينادون بأسمائهم—أكانوا من الباندافا أم من الكاورافا—فغدت الهوية، لا الملامح، الدليلَ الوحيد في فوضى الحرب.
Verse 423
तावकानां परेषां च नासीत् कश्चित् पराड्मुख: । इस प्रकार वह घोर एवं भयानक संग्राम चलने लगा। उस समय आपके और शत्रुपक्षके योद्धाओंमेंसे कोई भी युद्धसे विमुख नहीं हुआ
قال سانجيا: لم يكن بين رجالِك ولا بين رجالِ الخصم من ولّى وجهه عن القتال. وهكذا مضت تلك المعركة الرهيبة المخيفة، وفي تلك اللحظة لم ينسحب أحدٌ من أيٍّ من الجيشين من ساحة الوغى.
Verse 446
स्वर्गसंसक्तमनसो योधा युयुधिरे तदा । सभी योद्धा स्वामीके दिये हुए अन्नके ऋणसे उऋण होनेके लिये उनके कार्यको सिद्ध करनेका दृढ़ निश्चय किये मनमें स्वर्गकी अभिलाषा रखकर उस समय उत्साहपूर्वक युद्ध कर रहे थे
قال سنجيا: عندئذٍ واصل المحاربون القتال، وقد تعلّقت عقولهم بالسماء. وكان أولئك المقاتلون جميعًا قد عزموا على سداد دَين الطعام الذي أنعم به سيدهم، وعلى إنجاز مقصده؛ فحملوا في قلوبهم شوق الجنة وخاضوا المعركة بحماسةٍ متقدة.
Verse 453
अन्योन्यमभिगर्जन्त: प्रहरन्त: परस्परम् । नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोग करके परस्पर प्रहार करनेवाले महारथी एक- दूसरेको लक्ष्य करके गर्जना करते थे
قال سنجيا: كانوا يزأرون بعضهم في وجه بعض، ويتبادلون الضربات تباعًا. فهؤلاء المقاتلون العظام على المركبات كانوا يقذفون ويشهرون شتى أنواع الأسلحة، مُثبّتين كل خصمٍ هدفًا لهم؛ يدوّي بينهم التحدّي ويقابلون الضربة بالضربة.
Verse 463
इति सम वाच: श्रूयन्ते तव तेषां च वै बले । आपकी और पाण्डवोंकी सेनामें “मारो, बींध डालो, पकड़ो, प्रहार करो और टुकड़े- टुकड़े कर डालो' ये ही बातें सुनायी देती थीं
قال سنجيا: وهكذا، في الجيشين كليهما—جيشك وجيش الباندافا—لم يُسمَع إلا نداءٌ واحدٌ متشابه: «اقتلوا! اطعنوا! أمسكوا! اضربوا! مزّقوا إربًا!»
Verse 476
विव्याध निशितैर्बाणै्न्तुकामो महारथम् | महाराज! तदनन्तर राजा शल्यने महारथी धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरको मार डालनेकी इच्छासे पैने बाणोंद्वारा बींध डाला
قال سنجيا: أيها الملك العظيم! ثم إن شاليا، وهو من عظماء فرسان المركبات، وقد تاقت نفسه إلى قتل البطل الجليل—الملك يودهيشتِهيرا ابن الدارما—طعنه بسهامٍ حادّةٍ ماضية.
Verse 486
मर्माण्युद्दिश्य मर्मज्ञो निचखान हसन्निव । महाराज! मर्मज्ञ कुन्तीकुमारने शल्यके मर्मस्थानोंको लक्ष्य करके हँसते हुए-से चौदह नाराच चलाये और उनके अंगोंमें धँसा दिये
قال سنجيا: أيها الملك! إن العارف بمواضع المقاتل ضرب وهو يقصدها، كأنه يبتسم. فابن كونتي، الخبير بعلم المَرْمَا (نقاط الحياة)، وجّه سهمه إلى مواضع شاليا القاتلة، وكأنه بابتسامةٍ هادئة أطلق أربع عشرة سَهْمًا من حديد، فأغرزها عميقًا في أعضائه.
Verse 516
विव्याध निशितैर्बाणै: कड़कबर्हिणवाजितै: । तब महायशस्वी धर्मराजने भी अत्यन्त कुपित हो कंक और मोरकी पाँखोंवाले पैने बाणोंसे मद्रराज शल्यको क्षत-विक्षत कर दिया
قال سانجيا: عندئذٍ إنَّ دارماراجا الجليل، وقد اشتعل غضبُه غضبًا شديدًا، طعن شاليا ملكَ مادرا بسهامٍ حادّةٍ مُزَيَّنةٍ بريشِ النَّسْرِ والطاووس، حتى غدا شاليا جريحًا ممزَّقَ الجسد. وفي أخلاق الحرب القاتمة يظهر الملكُ الحافظُ للدارما وهو يعمل بعزمٍ صارم، فيُقابل العنفَ بقوةٍ منضبطة حين يقتضي الواجب ذلك.
Verse 523
ट्रुमसेनं चतुःषष्ट्या निजघान महारथ: । इसके बाद महारथी युधिष्छिरने सत्तर बाणोंसे चन्द्रसेनको, नौ बाणोंसे शल्यके सारथिको और चौंसठ बाणोंसे ट्रमसेनको मार डाला
قال سانجيا: إنَّ المحارب العظيم على العربة صرع ترومسينا بأربعٍ وستين سهمًا. وفي اندفاعة القتال نفسها، أسقط يودهيشتيرا—بعزمٍ صارم تفرضه واجبات الكشترية—تشندراسينا بسبعين سهمًا، وقتل سائقَ عربة شاليا بتسعة، وأردى ترومسينا بأربعٍ وستين، دافعًا الحرب إلى الأمام بعنفٍ دقيقٍ موزون لا بقسوةٍ طائشة.
Verse 553
सम्प्रैषयच्छितान् पार्थ: शरानाशीविषोपमान् । नृपश्रेष्ठ) इस प्रकार संग्राममें विचरते हुए राजा शल्यको लक्ष्य करके कुन्तीकुमारने विषधर सर्पोंके समान भयंकर एवं तीखे बाण चलाये
قال سانجيا: إنَّ أرجونا ابنَ كونتي، وقد ثبّت نظره على الملك شاليا وهو يجول في ساحة القتال، أطلق سهامًا حادّةً مروِّعةً كالأفاعي السامّة، دافعًا المعركة إلى الأمام بعزمٍ حربيٍّ لا يلين.
Verse 563
प्रमुखे वर्तमानस्य भल्लेनापाहरद् रथात् । कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने समरांगणमें सामने खड़े हुए शल्यकी ध्वजाके अग्रभागको एक भल्लके द्वारा रथसे काट गिराया
قال سانجيا: بينما كان شاليا قائمًا في مقدّمة الصفوف، ضرب يودهيشتيرا—ابن كونتي—بسهمٍ حادٍّ من نوع «بهلّا» فقطع قِمّة راية شاليا المتقدّمة، فسقطت من على العربة. وفي نسيج الأخلاق الحربية لا يدلّ الفعل على عدوانٍ محض، بل على تفكيكٍ استراتيجيٍّ لكبرياء الخصم المرئيّ وعلامة تجمّعه، تذكيرًا بأن رموز السلطان هشّة كالأجساد في ساحةٍ يتنازع فيها الدارما.
Verse 573
निपतन्तमपश्याम गिरिशृज्भमिवाहतम् । महात्मा पाण्डुपुत्रके द्वारा कटकर गिरते हुए उस ध्वजको हमलोगोंने वज्ञजके आघातसे टूटकर नीचे गिरनेवाले पर्वत-शिखरके समान देखा था
قال سانجيا: لقد رأيناه يهوي—كقِمّة جبلٍ ضُرِبت فسقطت. وهكذا فإن الراية العظيمة لابن باندو، وقد قُطِعت من أصلها، تهاوت وانحدرت، كصخرةٍ شاهقةٍ تكسّرت تحت ضربةٍ جبّارة. وتؤكّد الصورة أنّه في الحرب، حتى أبهى رموز السلطان وأشدّها فخرًا تغدو هشّة حين يلتقي القدر بالقوة.
Verse 593
अभ्यवर्षदमेयात्मा क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभ: । अमेय आत्मबलसे सम्पन्न क्षत्रियशिरोमणि शल्य वृष्टिकारी मेघके समान क्षत्रियोंपर बाणोंकी वर्षा कर रहे थे
قال سانجيا: إن شاليا—ثورُ المحاربين، ذوُ روحٍ لا تُقاس وقوةٍ لا حدّ لها—أمطرَ الكشاتريا بوابلٍ من السهام. وكغيمةٍ حاملةٍ للمطر، ذلك الجوهرةُ المتوَّجةُ بين المقاتلين صبَّ عاصفةَ النبال على المحاربين الخصوم.
Verse 616
अपश्याम महाराज मेघजालमिवोदगतम् । महाराज! तदनन्तर हमलोगोंने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी छातीपर बाणोंका जाल-सा बिछा हुआ देखा, मानो आकाशमें मेघोंकी घटा घिर आयी हो
قال سانجيا: «أيها الملك العظيم، رأيناه كأن شبكةً من السحاب قد ارتفعت. ثم رأينا يودهيشتيرا ابن باندو وقد انبسط على صدره نسيجٌ من السهام، كأن كتلةً كثيفةً من الغيوم قد تجمّعت في السماء».
Verse 2536
अपोवाह कृप: शल्यं तूर्णणायोधनादथ । भीम और शल्य दोनोंके मर्मस्थानोंमें गहरी चोटें लगी थीं; इसलिये दोनों ही अत्यन्त व्याकुल हो गये थे। इतनेहीमें कृपाचार्य मद्रराज शल्यको अपने रथपर बिठाकर तुरंत ही युद्धभूमिसे दूर हटा ले गये
قال سانجيا: ثم إن كِرِپا حمل شاليا سريعًا بعيدًا عن ساحة القتال. فقد أُصيب بهيما وشاليا كلاهما بجراحٍ غائرة في مواضعَ قاتلة، فاستبدّ بهما اضطرابٌ شديد؛ وفي تلك اللحظة أجلس كِرِپاتشاريا شاليا، ملك مادرا، على عربته وسحبه على عجلٍ من ميدان المعركة.
Verse 2936
प्रययु: सिंहनादेन दुर्योधनपुरोगमान् । उस कौरवदलको धावा करते देख पाण्डव-वीर सिंहके समान गर्जना करके दुर्योधन आदिकी ओर बढ़ चले
قال سانجيا: بزئيرٍ كزئير الأسد اندفع أبطال الباندافا نحو دوريوذانا ومن يتقدّمون صفوفه. ولمّا رأوا جيش الكورافا يشنّ الهجوم، أجابوه بصيحاتٍ أسديةٍ لا تعرف الخوف، وتقدّموا لملاقاته في صدام الحرب.
The tension lies in balancing collective necessity (many warriors press a single commander to protect Yudhiṣṭhira and stabilize the line) with the ideal of honorable, regulated engagement—maintaining open contest through recognized weapons and roles.
The chapter illustrates that battlefield advantage is not only force but also control of tempo and perception: disciplined counter-fire, protection of critical personnel (drivers), and denial of visibility can neutralize numerical pressure.
No explicit phalaśruti is presented in the supplied passage; the chapter’s significance is primarily narrative-technical—documenting late-war tactical intensity and the ethical strain on commanders as the epic approaches its terminal phase.
Read Mahabharata in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.