Adhyaya 68
Bhishma ParvaAdhyaya 6878 Versesसंजय के कथनानुसार पाण्डव-पक्ष धर्म-बल से प्रबल और कौरव-पक्ष हीन-कर्म से क्षीण; धृतराष्ट्र के मन में पराजय की निश्चितता गहराती है।

Adhyaya 68

भीष्मस्य भीमसेन-निरोधः (Bhīṣma checks Bhīmasena; matched engagements intensify)

Upa-parva: Bhīṣma-vadha-prastāva (Engagements under Bhīṣma’s command)

Saṃjaya reports to Dhṛtarāṣṭra the coordinated onset of engagements as key Pandava and allied fighters advance toward designated Kaurava opponents. Śikhaṇḍī with Matsya-Virāṭa closes upon Bhīṣma; Dhanaṃjaya (Arjuna) presses multiple senior bowmen; Bhīmasena moves against Duryodhana and Duḥśāsana; Sahadeva advances on Śakuni and Ulūka; Nakula engages the Trigartas; allied commanders (Sātyaki, Cekitāna, Saubhadra) confront Śālvas and Kekayas; Dhṛṣṭaketu and Ghaṭotkaca oppose the Kaurava chariot divisions; and Dhṛṣṭadyumna meets Droṇa. The chapter then shifts from pairing to atmosphere: midday dust and volleys obscure sky and directions; the field gleams with armor and weapons; chariots appear like celestial bodies. A tactical inflection follows: Bhīṣma, observing the army, blocks Bhīmasena, showers him with sharpened arrows, cuts down Bhīma’s thrown spear, and then severs Bhīma’s bow. Sātyaki rapidly counters by attacking Bhīṣma, but Bhīṣma strikes down Sātyaki’s charioteer, causing the horses to bolt and generating alarm and regrouping cries among the Pandava side. Bhīṣma then renews pressure on the Pandava host, prompting Panchalas and Somakas to concentrate their effort against him; both armies surge forward, and the engagement expands into a general clash.

Chapter Arc: धृतराष्ट्र, संजय से युद्ध-समाचार सुनकर पुत्रों की पराजय का बोध पाते ही भीतर-भीतर जल उठता है—उसे लगता है कि विदुर की पुरानी चेतावनियाँ अब हृदय को दग्ध करने आई हैं। → धृतराष्ट्र की चिन्ता क्रमशः निश्चित भय में बदलती है: वह किसी ऐसे वीर को नहीं देखता जो रणभूमि में उसके पुत्रों की रक्षा कर सके। वह पराजय के कारण पूछता है; संजय उत्तर देने को उठता है और पाण्डवों की ‘अवध्यता’ का हेतु धर्म में स्थापित करता है—जबकि कौरव-पक्ष अधर्म और पाप-प्रवृत्ति से क्षीण हो रहा है। → संजय का निर्णायक कथन कि पाण्डव धर्म-बल से युद्ध में अवध्य और विजयी हैं, और धृतराष्ट्र का यह भय-घोष कि ‘भीम निश्चय ही मेरे पुत्रों का संहार करेगा’—यहीं अध्याय का शिखर बनता है। → संजय धृतराष्ट्र को कारण-व्याख्या देकर स्थिर करता है: विजय-पराजय का मूल दैव-योग नहीं, धर्म-अधर्म का संचय है। धृतराष्ट्र फिर भी महासागर-तुल्य शोक के पार न जा पाने की असहायता स्वीकार करता है। → भीम के हाथों कौरव-पुत्रों के विनाश की आशंका एक अनिवार्य भविष्य की तरह लटकती रहती है—अगले समाचार उसी भय को ठोस रूप देने वाले हैं।

Shlokas

Verse 1

/ [दाक्षिणात्य अधिक पाठका इं श्लोक मिलाकर कुल ८७६ “लोक हैं।] नीफजशार (0) आज असन- पञज्चषष्टितमो< ध्याय: धृतराष्ट्र-संजय-संवादके प्रसंगमें दुर्योधनके द्वारा पाण्डवोंकी विजयका कारण पूछनेपर भीष्मका ब्रह्माजीके द्वारा की हुई भगवत्‌-स्तुतिका कथन धृतराष्ट उवाच भयं मे सुमहज्जातं विस्मयश्वैव संजय । श्रुत्वा पाण्डुकुमाराणां कर्म देवै: सुदुष्करम्‌,धृतराष्ट्र बोले--संजय! पाण्डवोंका देवताओंके लिये भी दुष्कर पराक्रम सुनकर मुझे बड़ा भारी भय और विस्मय हो रहा है

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَ: «يا سنجيا، لقد قام في نفسي خوفٌ عظيم، ومعه دهشةٌ أيضًا، حين سمعتُ بأعمال أبناء باندو—مآثرَ يعسر إنجازها حتى على الآلهة.»

Verse 2

पुत्राणां च पराभावं श्रुत्वा संजय सर्वश: । चिन्ता मे महती सूत भविष्यति कथं त्विति,सूत संजय! अपने पुत्रोंकी सब प्रकारसे पराजयका हाल सुनकर मेरी चिन्ता बढ़ती ही जा रही है। सोचता हूँ कैसे उनकी विजय होगी

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَ: «يا سنجيا، أيها السائق، بعدما سمعتُ من كل وجه خبر هزيمة أبنائي، تعاظم قلقي. وما زلت أتساءل: كيف يمكن للنصر أن يأتيهم؟»

Verse 3

ध्रुवं विदुरवाक्यानि धक्ष्यन्ति हृदयं मम । यथा हि दृश्यते सर्व दैवयोगेन संजय,संजय! निश्चय ही विदुरके वाक्य मेरे हृदयको जलाकर भस्म कर डालेंगे, क्योंकि उन्होंने जैसा कहा था, दैवयोगसे वह सब वैसा ही होता दिखायी देता है

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَ: «لا ريب أن كلمات فيدورا ستحرق قلبي حتى يصير رمادًا. لأنك يا سنجيا—نعم، يا سنجيا—إن كل شيء يُرى الآن يتكشف تمامًا كما أنبأ، بقوة القضاء والقدر.»

Verse 4

यत्र भीष्ममुखान्‌ सर्वान्‌ शस्त्रज्ञान्‌ योधसत्तमान्‌ । पाण्डवानामनीकेषु योधयन्ति प्रहारिण:

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «أين يكون أبطالُنا الأوائل—يتقدّمهم بِهِيشْمَا، وكلّهم حُذّاقٌ بعِلم السلاح وخِيارُ المقاتلين—وقد دُفعوا للاشتباك مع كتائب الباندَفَة، يضربون ويُضارِبون في زحمة الحرب؟»

Verse 5

पाण्डवोंकी सेनाओंमें ऐसे-ऐसे प्रहारकुशल योद्धा हैं, जो शस्त्रविद्याके ज्ञाता एवं योद्धाओंमें श्रेष्ठ भीष्म आदि समस्त महारथियोंके साथ भी युद्ध कर लेते हैं ।। केनावध्या महात्मान: पाण्डुपुत्रा महाबला: | केन दत्तवरास्तात किं वा ज्ञानं विदन्ति ते,तात! महाबली महात्मा पाण्डव किस कारणसे अवध्य हैं? किसने उन्हें वर दिया है अथवा कौन-सा ज्ञान वे जानते हैं?

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «في جيوش الباندَفَة محاربون بارعون في الضرب، عارفون بعِلم السلاح، حتى إنهم يبارزون جميع المَهارَثَة مثل بِهِيشْمَا وسائر العظام. فبأي سببٍ صار أبناءُ پاندو—وهم عظامٌ أشدّاء—غيرَ قابلين للقتل؟ يا بُنيّ، مَن الذي منحهم العطايا؟ أم أيَّ علمٍ خاصٍّ يعرفونه؟»

Verse 6

येन क्षयं न गच्छन्ति दिवि तारागणा इव । पुनः पुनर्न मृष्यामि हतं सैन्यं तु पाण्डवै:,जिससे आकाशके तारोंके समान वे नष्ट नहीं हो रहे हैं। मैं पाण्डवोंके द्वारा बारंबार अपनी सेनाके मारे जानेकी बात सुनकर सहन नहीं कर पाता हूँ

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «بأي وسيلةٍ لا يسقطون في الهلاك—كجماعات النجوم في السماء؟ لا أطيق، مرة بعد مرة، أن أسمع أنّ جيشي قد قُتل على يد الباندَفَة.»

Verse 7

मय्येव दण्ड: पतति दैवात्‌ परमदारुण: । यथावध्या: पाण्डुसुता यथा वध्याश्व मे सुता:

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «بفعل القضاء، إن عقابًا بالغَ الفظاعة يقع عليّ وحدي—حتى كأن أبناءَ پاندو يُعامَلون كمن لا يُقتَلون، بينما يُعامَل أبنائي كمن كُتِب عليهم القتل.»

Verse 8

एतन्मे सर्वमाचक्ष्व याथातथ्येन संजय । दैववश मेरे ही ऊपर अत्यन्त भयंकर दण्ड पड़ रहा है। संजय! क्यों पाण्डव अवध्य हैं और क्‍यों मेरे पुत्र मारे जा रहे हैं? यह सब यथार्थरूपसे मुझे बताओ ।। न हि पारं प्रपश्यामि दुःखस्यास्थ कथंचन

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «أخبرني بهذا كلّه يا سَنْجَيَا، كما هو على الحقيقة. لقد وقع عليّ، بقوة القضاء، عقابٌ بالغُ الهول. يا سَنْجَيَا—لِمَ صار الباندَفَة غيرَ قابلين للقتل، ولِمَ يُقتَل أبنائي؟ بيّن لي كلَّ ذلك على صورته الواقعة، فإني لا أرى لهذه الكآبة نهايةً على أي وجه.»

Verse 9

पुत्राणां व्यसन मन्ये ध्रुवं प्राप्त सुदारुणम्‌

رثى دِهْرِتَرَاشْتْرَا قائلاً: «إني لأظنّ أن نازلةً ثابتةً، شديدةَ القسوة، قد حلّت لا محالة بأبنائي»—إدراكٌ قَلِقٌ بأن الطريق الذي اختاروه قد أينع ثمراً من معاناةٍ لا مفرّ منها.

Verse 10

न हि पश्यामि त॑ वीरं यो मे रक्षेत्‌ सुतान्‌ रणे

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «حقّاً، لا أرى ذلك البطل الذي يستطيع أن يحمي أبنائي في ساحة القتال». وفي هذا الاعتراف القَلِق يطفو معاً تعلّق الملك الأعمى بأبنائه وخوفه من عواقب الحرب الأخلاقية والعملية، مُشيراً إلى هشاشة السلطان حين يقوم على المحاباة لا على الدارما.

Verse 11

ध्रुवं विनाश: सम्प्राप्त: पुत्राणां मम संजय । मैं ऐसे किसी वीरको नहीं देखता, जो रणक्षेत्रमें मेरे पुत्रोंकी रक्षा कर सके। संजय! अवश्य ही मेरे पुत्रोंक विनाशकी घड़ी आ पहुँची है || १० इ ।। तस्मान्मे कारणं सूत शक्ति चैव विशेषत:

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «يا سَنْجَيَا، لقد حضر لا محالة هلاك أبنائي. لا أرى محارباً ذا بأسٍ يستطيع أن يحمي أبنائي في ساحة القتال. لذلك، يا سَنْجَيَا، فقد أزفت يقيناً ساعة فنائهم. فحدّثني، أيها السائس، عن سبب ذلك—وخاصةً عن القوة الحقيقية الكامنة وراءه.»

Verse 12

पृच्छतो वै यथातत्त्वं सर्वमाख्यातुमरहसि । अतः सूत! मैं तुमसे शक्तिः और कारणकेः विषयमें जो विशेष प्रश्न कर रहा हूँ, वह सब यथार्थरूपसे बताओ ।। दुर्योधनश्व यच्चक्रे दृष्टवा स्वान्‌ विमुखान्‌ रणे,युद्धमें अपने सैनिकोंको विमुख हुआ देख दुर्योधनने क्या किया? भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, शकुनि, जयद्रथ, महाधनुर्धर अश्वत्थामा और महाबली विकर्णने भी क्या किया? महाप्राज्ञ संजय! मेरे पुत्रोंके विमुख होनेपर उन महामना महारथियोंने उस समय क्‍या निश्चय किया?

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «ينبغي لك أن تروي لي كلَّ شيء على حقيقته كما وقع. لذلك، يا سُوتا، أخبرني كاملاً وبصدق عمّا أسأل—وخاصةً عن القوة الفاعلة والأسباب الكامنة وراءها. حين رأى دُرْيُوذَنَةُ رجالَه يولّون في القتال، ماذا صنع؟ وماذا صنع بِهِيشْمَةُ ودْرُونَةُ وكْرِبَةُ وشَكُونِي وجَيْدَرَثَةُ، وأَشْوَتْثَامَا الرامي العظيم، ووِيكَرْنَةُ الجسور؟ يا سَنْجَيَا الحكيم، عندما فترت عزائم أبنائي، أيَّ عزمٍ عقده أولئك العظام من فرسان المركبات في تلك الساعة؟»

Verse 13

भीष्मद्रोणौ कृपश्चैव सौबलश्न जयद्रथ: । द्रौणिवापि महेष्वासो विकर्णो वा महाबल:,युद्धमें अपने सैनिकोंको विमुख हुआ देख दुर्योधनने क्या किया? भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, शकुनि, जयद्रथ, महाधनुर्धर अश्वत्थामा और महाबली विकर्णने भी क्या किया? महाप्राज्ञ संजय! मेरे पुत्रोंके विमुख होनेपर उन महामना महारथियोंने उस समय क्‍या निश्चय किया?

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَا: «ماذا صنع دُرْيُوذَنَةُ حين رأى جنده يولّون في القتال؟ وماذا صنع بِهِيشْمَةُ ودْرُونَةُ وكْرِبَةُ وشَكُونِي ابنُ سُوبَالَا، وجَيْدَرَثَةُ، وأَشْوَتْثَامَا الرامي العظيم ابنُ دْرُونَةَ، ووِيكَرْنَةُ الشديد البأس؟ يا سَنْجَيَا ذا الحكمة العظيمة—حين بدا أن أبنائي قد فتروا، أيَّ عزمٍ عقده أولئك النبلاء، أولئك المتقدّمون من فرسان المركبات، في تلك اللحظة؟»

Verse 14

निश्चयो वापि कस्तेषां तदा ह्वासीन्महात्मनाम्‌ | विमुखेषु महाप्राज्ञ मम पुत्रेषु संजय,युद्धमें अपने सैनिकोंको विमुख हुआ देख दुर्योधनने क्या किया? भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, शकुनि, जयद्रथ, महाधनुर्धर अश्वत्थामा और महाबली विकर्णने भी क्या किया? महाप्राज्ञ संजय! मेरे पुत्रोंके विमुख होनेपर उन महामना महारथियोंने उस समय क्‍या निश्चय किया?

قال دِهْرِتَرَاشْتْرَة: «يا سَنْجَايَا الحكيم، حين انصرف أبنائي ووهنت قلوبهم في ساحة القتال، أيُّ عزمٍ عقده أولئك القادة العظام النفوس آنذاك؟ ماذا صنع دُرْيُودْهَنَة حين رأى جيشه يتزلزل، وأيَّ نهجٍ اتخذه بِهِيشْمَة ودْرُونَة وكْرِبَة وشَكُونِي وجَيَدْرَثَة، وأَشْوَتْثَامَا الرامي العظيم، وفِيكَرْنَة الجبار؟ إنما أسأل: لما انثنى أبنائي، ماذا قرر أولئك المَهَارَثِيّون ذوو الهمم العُلا في تلك الساعة؟»

Verse 15

संजय उवाच शृणु राजन्नवहित: श्रुत्वा चैवावधारय । नैव मन्त्रकृतं किंचिन्नैव मायां तथाविधाम्‌,संजयने कहा--महाराज! सावधान होकर सुनिये और सुनकर स्वयं ही पाण्डवोंकी शक्ति और अपनी पराजयके कारणके विषयमें निश्चय कीजिये। पाण्डवोंमें न कोई मन्त्रका प्रभाव है और न कोई वैसी माया ही वे करते हैं

قال سَنْجَايَا: «اسمعْ أيها الملك بتمام الانتباه؛ فإذا سمعتَ فتأمّل واحكم لنفسك. ليس في الباندافا قوةٌ مصنوعةٌ بالتعاويذ، ولا يستعملون مثل تلك السحر الخادع. إن قوتهم—وهزائمك—ناشئةٌ عن أسبابٍ أخرى، لا عن حيلٍ غيبية.»

Verse 16

न वै विभीषिकां कांचिदू राजन्‌ कुर्वन्ति पाण्डवा: । युध्यन्ति ते यथान्यायं शक्तिमन्तश्न संयुगे,राजन! पाण्डवलोग युद्धमें किसी विभीषिकाका प्रदर्शन नहीं करते। अर्थात्‌ किसी भी प्रकारसे भयभीत नहीं होते। वे न्यायपूर्वक युद्ध करते हैं। शक्तिशाली तो वे हैं ही

قال سَنْجَايَا: «أيها الملك، إن الباندافا لا يصنعون مشهداً للرعب، ولا يُبدون خوفاً. إنهم يقاتلون وفق الحق والشرع، وهم في المعركة ذوو بأسٍ شديد.»

Verse 17

धर्मेण सर्वकार्याणि जीवितादीनि भारत । आरभमन्ते सदा पार्था: प्रार्थथाना महद्‌ यश:,भारत! कुन्तीके पुत्र जीवन-निर्वाह आदिके सभी कार्य सदा धर्मपूर्वक ही आरम्भ करते हैं। कारण कि वे जगत्‌में अपना महान्‌ यश फैलाना चाहते हैं

قال سَنْجَايَا: «يا بَهَارَتَة، إن أبناء پْرِثَا يشرعون في كل شأن—حتى في أسباب المعاش—على الدوام وفق الدَّهَرْمَا، لأنهم يبتغون أن ينالوا مجداً عظيماً ويذيعوه في العالم بسلوكٍ قويم.»

Verse 18

नते युद्धान्निवर्तन्ते धर्मोपेता महाबला: । श्रिया परमया युक्ता यतो धर्मस्ततो जय:,वे युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते हैं। धर्मबलसे सम्पन्न होनेके कारण ही वे महाबली और उत्तम समृद्धिसे युक्त हैं। जहाँ धर्म होता है, उसी पक्षकी विजय होती है

قال سَنْجَايَا: «إن أولئك الأقوياء، الراسخين في الدَّهَرْمَا، لا يرتدّون عن القتال. ولأنهم مسنودون بقوة الاستقامة فهم حقاً عظام البأس، موفورو الحظ بأعلى مراتب الازدهار. فحيث تقوم الدَّهَرْمَا تقوم الغلبة.»

Verse 19

तेनावध्या रणे पार्था जययुक्ताश्च पार्थिव । तव पुत्रा दुरात्मान: पापेष्वभिरता: सदा

قال سانجيا: «لذلك، أيها الملك، إن أبناء بريثا لا يُقهَرون في ساحة القتال، ثابتون على الارتباط بالنصر. أما أبناؤك فذوو نيات خبيثة، يلتذّون دائمًا بمسالك الإثم».

Verse 20

सुबहूनि नृशंसानि पुत्रैस्तव जनेश्वर,जनेश्वर! आपके पुत्रोंने नीच मनुष्योंकी भाँति पाण्डवोंके प्रति बहुत-से क्रूरतापूर्ण बर्ताव तथा छल-कपट किये हैं, परंतु आपके पुत्रोंका वह सारा अपराध भुलाकर पाण्डव सदा उन दोषोंपर पर्दा ही डालते आये हैं। पाण्डुके बड़े भाई महाराज! इसपर भी आपके पुत्र इन पाण्डवोंको अधिक आदर नहीं देते हैं

قال سانجيا: «يا سيد الناس—يا ملك! إن أبناءك، وقد تصرّفوا كالسفلة، ارتكبوا كثيرًا من القسوة والخداع في حقّ الباندافا. ومع ذلك فإن الباندافا، كأنهم طرحوا تلك الجرائر جانبًا وكأنهم نسوها، ظلّوا منذ زمن طويل يسترون تلك العيوب ولا يفضحونها. ومع هذا، أيها الملك العظيم، يا أخا باندو الأكبر، لا يُبدي أبناؤك للباندافا ما يستحقونه من توقير.»

Verse 21

निकृतानीह पाण्डूनां नीचैरिव यथा नरै: । सर्व च तदनादृत्य पुत्राणां तव किल्बिषम्‌,जनेश्वर! आपके पुत्रोंने नीच मनुष्योंकी भाँति पाण्डवोंके प्रति बहुत-से क्रूरतापूर्ण बर्ताव तथा छल-कपट किये हैं, परंतु आपके पुत्रोंका वह सारा अपराध भुलाकर पाण्डव सदा उन दोषोंपर पर्दा ही डालते आये हैं। पाण्डुके बड़े भाई महाराज! इसपर भी आपके पुत्र इन पाण्डवोंको अधिक आदर नहीं देते हैं

قال سانجيا: «هنا ارتكب أبناؤك أعمالًا كثيرة من القسوة والخداع ضدّ الباندافا، كما يفعل السفلة. ومع ذلك فإن الباندافا قد طرحوا جانبًا كلّ جنايات أبنائك، ومنذ زمن طويل احتملوها بل ستروا تلك العيوب. ومع هذا، يا سيد الناس، لا يُبدي أبناؤك للباندافا ما يستحقونه من احترام.»

Verse 22

सापद्नवा: सदैवासन्‌ पाण्डवा: पाण्डुपूर्वज । न चैतान्‌ बहु मन्यन्ते पुत्रास्तव विशाम्पते,जनेश्वर! आपके पुत्रोंने नीच मनुष्योंकी भाँति पाण्डवोंके प्रति बहुत-से क्रूरतापूर्ण बर्ताव तथा छल-कपट किये हैं, परंतु आपके पुत्रोंका वह सारा अपराध भुलाकर पाण्डव सदा उन दोषोंपर पर्दा ही डालते आये हैं। पाण्डुके बड़े भाई महाराज! इसपर भी आपके पुत्र इन पाण्डवोंको अधिक आदर नहीं देते हैं

قال سانجيا: «يا ملك، يا أخا باندو الأكبر، إن الباندافا كانوا دائمًا حُلماء لا يحملون ضغينة. غير أن أبناءك، يا سيد الرعية، لا يضعونهم موضع التقدير الواجب.»

Verse 23

तस्य पापस्य सततं क्रियमाणस्य कर्मण: । साम्प्रतं सुमहद्‌ घोरं फल प्राप्तं जनेश्वर,जनेश्वर! निरन्तर किये जानेवाले उसी पाप-कर्मका इस समय यह अत्यन्त भयंकर फल प्राप्त हुआ है

قال سانجيا: «يا سيد الناس، إن ذلك الفعل الآثم—الذي كان يُرتكب على الدوام مرة بعد مرة—قد نال الآن عاقبة عظيمة مروّعة. لقد نضجت ثمرة الشرّ المستدام أخيرًا في هذه اللحظة.»

Verse 24

स त्वं भुड़क्ष्य महाराज सपुत्र: ससुहृज्जन: । नावबुध्यसि यद्‌ राजन्‌ वार्यमाण: सुहृज्जनै:,महाराज! आप सुहृदोंके मना करनेपर भी जो ध्यान नहीं देते हैं, इससे अब स्वयं ही पुत्रों और सुहदोंसहित अपनी अनीतिका फल भोगिये

قال سنجيا: «لذلك، أيها الملك العظيم، لا بدّ لك أن تتحمّل عاقبة الأمر—مع أبنائك ودائرة المخلصين من محبّيك—لأنك، أيها الملك، لا تعقل حتى حين يكفّك وينذرك من يصدقون لك الودّ».

Verse 25

विदुरेणाथ भीष्मेण द्रोणेन च महात्मना | तथा मया चाप्यसकृद्‌ वार्यमाणो न बुध्यसे,विदुर, भीष्म तथा महात्मा द्रोणने और मैंने भी बारंबार आपको मना किया है; किंतु आप कभी समझ नहीं पाते थे

قال سنجيا: «لقد كُفِفت مرارًا—على يد فيدورا، وبهِيشما، ودرونا عظيم النفس، وكذلك منّي—ومع ذلك، وإن أُنذرت مرة بعد مرة، لم تبلغ الفهم».

Verse 26

वाक्यं हित॑ च पथ्यं च मर्त्या: पथ्यमिवौषधम्‌ । पुत्राणां मतमाज्ञाय जितान्‌ मन्यसि पाण्डवान्‌,जैसे मरणासन्न मनुष्य हितकारी औषधको भी फेंक देते हैं, उसी प्रकार आपने हमलोगोंके कहे हुए लाभकारी और हितकर वचनोंको भी ठुकरा दिया एवं अब अपने पुत्रोंकी बातमें आकर यह मान रहे हैं कि हमने पाण्डवोंको जीत लिया

قال سنجيا: «كما أن البشر إذا دنا منهم الموت طرحوا حتى الدواء النافع، كذلك أنت قد نبذت نصحنا الذي فيه منفعة وحسن قصد. والآن، وقد أخذت برأي أبنائك، تتوهّم أن الباندافا قد قُهِروا».

Verse 27

शृणु भूयो यथातत्त्वं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । कारणं भरतमश्रेष्ठ पाण्डवानां जयं प्रति

قال سنجيا: «اسمع مرة أخرى على وجه الحقيقة ما تسألني عنه. يا خيرَ آلِ بهاراتا، سأبيّن لك السبب المتعلّق بانتصار الباندافا».

Verse 28

तत्‌ ते5हं कथयिष्यामि यथाश्रुतमरिंदम । भरतश्रेष्ठी आप पाण्डवोंकी विजय और अपनी पराजयका जो कारण पूछते हैं, उसके विषयमें यथार्थ बातें सुनिये। शत्रुदमन! मैंने जैसा सुन रखा है, वह आपको बताऊँगा ।। २७ - दुर्योधनेन सम्पृष्ट एतमर्थ पितामह:,दुर्योधनने यही बात पितामह भीष्मसे पूछी थी। महाराज! युद्धमें अपने समस्त महारथी भाइयोंको पराजित हुआ देख आपके पुत्र कुरुराज दुर्योधनका हृदय शोकसे मोहित हो गया। उसने रातमें महाज्ञानी पितामह भीष्मके पास विनयपूर्वक जाकर जो कुछ पूछा था, वह बताता हूँ, मुझसे सुनिये

قال سنجيا: «سأقصّ عليك الأمر كما سمعته، يا قاهرَ الأعداء. يا خيرَ آلِ بهاراتا، أصغِ إلى الخبر الحقّ عمّا تسأل: سببَ ظفرِ الباندافا وسببَ هزيمتك. سأرويه لك كما نُقِل إليّ. فهذا بعينه ما سأله دوريوذانا للجدّ بهيشما: إذ رأى في الحرب أن فرسانه العظام وإخوته جميعًا يُغلَبون، غشي الحزنُ قلبَ دوريوذانا ابنِ ملكِ الكورو. وفي الليل دنا بتواضع من الجدّ الحكيم بهيشما وسأله؛ وذلك ما سأرويه الآن—فاسمعه منّي».

Verse 29

दृष्टवा भ्रातृन्‌ रणे सर्वान्‌ निर्जितांस्तु महारथान्‌ । शोकसम्मूढहदयो निशाकाले सम कौरव:,दुर्योधनने यही बात पितामह भीष्मसे पूछी थी। महाराज! युद्धमें अपने समस्त महारथी भाइयोंको पराजित हुआ देख आपके पुत्र कुरुराज दुर्योधनका हृदय शोकसे मोहित हो गया। उसने रातमें महाज्ञानी पितामह भीष्मके पास विनयपूर्वक जाकर जो कुछ पूछा था, वह बताता हूँ, मुझसे सुनिये

قال سانجيا: لما رأى جميع إخوته—أولئك المحاربين العظام على المركبات—قد هُزموا في ساحة القتال، غمر الحزن قلب دوريوذانا، أمير الكورو. وفي الليل، وقد غشّى الأسى فكره، دنا بتواضع من الجدّ الجليل بهيشما، بالغ الحكمة، وسأله؛ فاسمع يا أيها الملك ما الذي سأل عنه.

Verse 30

पितामहं महाप्राज्ञं विनयेनोपगम्य ह । यदब्रवीत्‌ सुतस्ते5सौ तन्मे शृणु जनेश्वर,दुर्योधनने यही बात पितामह भीष्मसे पूछी थी। महाराज! युद्धमें अपने समस्त महारथी भाइयोंको पराजित हुआ देख आपके पुत्र कुरुराज दुर्योधनका हृदय शोकसे मोहित हो गया। उसने रातमें महाज्ञानी पितामह भीष्मके पास विनयपूर्वक जाकर जो कुछ पूछा था, वह बताता हूँ, मुझसे सुनिये

قال سانجيا: لما دنا بتواضع من الجدّ بهيشما، عظيم الحكمة، نطق ابنك بكلمات. يا سيد الناس، اسمع مني ما الذي قاله.

Verse 31

दुर्योधन उवाच द्रोणश्न त्वं च शल्यश्न कृपो द्रोणिस्तथैव च | कृतवर्मा च हार्दिक्य: काम्बोजश्न सुदक्षिण:,दुर्योधनने पूछा--पितामह! आप, द्रोणाचार्य, शल्य, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, हृदिकपुत्र कृतवर्मा, कम्बोजराज सुदक्षिण, भूरिश्रवा, विकर्ण तथा पराक्रमी भगदत्त--ये सब महारथी कहे जाते हैं। सभी कुलीन और युद्धमें मेरे लिये अपना शरीर निछावर करनेको तैयार हैं

قال دوريوذانا: «ها هو درونا، وأنت أيضًا يا جدّي؛ وشياليا؛ وكريبا؛ وكذلك دروني (أشڤاتثاما)؛ وكريتَڤرما ابن هريديكا؛ وسودكشينا من الكامبوجا—هؤلاء هم أبرَز المحاربين في صفّنا.»

Verse 32

भूरिश्रवा विकर्णश्र भगदत्तश्न वीर्यवान्‌ । महारथा: समाख्याता: कुलपुत्रास्तनुत्यज:,दुर्योधनने पूछा--पितामह! आप, द्रोणाचार्य, शल्य, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, हृदिकपुत्र कृतवर्मा, कम्बोजराज सुदक्षिण, भूरिश्रवा, विकर्ण तथा पराक्रमी भगदत्त--ये सब महारथी कहे जाते हैं। सभी कुलीन और युद्धमें मेरे लिये अपना शरीर निछावर करनेको तैयार हैं

قال دوريوذانا: «وبهوريشرافاس، وفيكارنا، وبهاگاداتّا الشجاع—كلّهم يُعلَنون مَهاراثا، عظامَ فرسان المركبات. إنهم أبناءُ بيوتٍ نبيلة، مستعدّون لبذل أجسادهم في الحرب من أجلي.»

Verse 33

त्रयाणामपि लोकानां पर्याप्ता इति मे मति: । पाण्डवानां समस्ताश्न नातिष्ठन्त पराक्रमे,मेरा तो ऐसा विश्वास है कि आप सब लोग मिल जायाँ तो तीनों लोकोंपर भी विजय पानेमें समर्थ हो सकते हैं, परंतु पाण्डवोंके पराक्रमके सामने आप सब लोग टिक नहीं पाते हैं। इसका क्या कारण है?

«إن رأيي أنكم لو اجتمعتم جميعًا لقدرتم على قهر العوالم الثلاثة؛ ولكنكم أمام بأس الباندڤا لا تثبتون. فما سبب ذلك؟»

Verse 34

तत्र मे संशयो जातस्तन्ममाचक्ष्व पृच्छत: । यं समाश्रित्य कौन्तेया जयन्त्यस्मान्‌ क्षणे क्षणे,इस विषयमें मुझे बड़ा भारी संदेह है; अतः मेरे प्रश्नके अनुसार आप उसका उत्तर दीजिये। किसका आश्रय लेकर ये कुन्तीके पुत्र क्षण-क्षणमें हमलोगोंपर विजय पा रहे हैं

لقد قام في نفسي شكٌّ عظيم؛ فاجبني كما أسأل. على مَن يعتمد أبناء كونتي حتى يغلِبونا لحظةً بعد لحظة؟

Verse 35

भीष्म उवाच शृणु राजन्‌ वचो महां यथा वक्ष्यामि कौरव । बहुशश्न मयोक्तोडसि न च मे तत्‌ त्वया कृतम्‌,भीष्मजीने कहा--कुरुनन्दन! नरेश्वर! मेरी बात सुनो। इस विषयमें जो यथार्थ बात है, उसे बताता हूँ। मैंने अनेक बार पहले भी तुमसे ये बातें कही हैं, परंतु तुमने उन्हें माना नहीं है

قال بيشما: «اسمع يا أيها الملك، يا ابن الكورافا. سأقول لك الحق كما ينبغي. لقد قلت لك هذا مرارًا، ولكنك لم تعمل به.»

Verse 36

क्रियतां पाण्डवै: सार्थ शमो भरतसत्तम । एतत्‌ क्षेममहं मन्ये पृथिव्यास्तव वा विभो,भरतश्रेष्ठ। तुम पाण्डवोंके साथ संधि कर लो। प्रभो! इसीमें मैं तुम्हारा और भूमण्डलका कल्याण समझता हूँ

يا خيرَ آلِ بهاراتا، اصنع صلحًا مع الباندافا. أيها الملكُ الجليل، إني أرى في هذا السبيلَ الخيرَ الحقّ—لك وللأرضِ نفسها.

Verse 37

भुड्क्ष्वेमां पृथिवीं राजन्‌ भ्रातृभि: सहित: सुखी । दुर्हदस्तापयन्‌ सर्वान्‌ नन्दयंश्वापि बान्धवान्‌,राजन! तुम अपने सभी शत्रुओंको संताप और बन्धु-बान्धवोंको आनन्द प्रदान करते हुए भाइयोंके साथ मिलकर सुखी रहो और इस पृथ्वीका राज्य भोगो

أيها الملك، تمتّع بهذه الأرض واحكمها سعيدًا مع إخوتك؛ أذِلْ كلَّ عدوٍّ معادٍ، وأفرِحْ ذوي القربى والحلفاء.

Verse 38

न च मे क्रोशतस्तात श्रुतवानसि वै पुरा । तदिदं समनुप्राप्तं यत्‌ पाण्डूनवमन्यसे,तात! इस तरहकी बातें मैंने पहले पुकार-पुकारकर कही हैं, परंतु तुमने उन सबको अनसुनी कर दिया है। तुम जो पाण्डवोंका अपमान करते आये हो, आज उसीका यह फल प्राप्त हुआ है

يا بُنيّ، ما كنتَ لتسمعني من قبل، وإن كنتُ أصرخ محذّرًا. وها قد أدركتك اليوم تلك العاقبة بعينها: لأنك طالما أهنتَ أبناء باندو، فأنت تجني ثمرة ذلك الازدراء.

Verse 39

यश्च हेतुरवध्यत्वे तेषामक्लिष्टकर्मणाम्‌ । तं शृुणुष्व महाबाहो मम कीर्तयतः प्रभो,महाबाहो! प्रभो! अनायास ही महान्‌ कर्म करनेवाले पाण्डवोंके अवध्य होनेमें जो हेतु है, उसे बताता हूँ, सुनो

قال بيشما: «يا مولاي عظيمَ الساعدَين، أَصغِ إليّ وأنا أُبيّن السببَ الذي يجعل أولئك الباندافا—الذين تُنجَز أعمالُهم بلا عناء ولا دَنَسٍ أخلاقي—غيرَ قابلين للقتل. اسمع مني عِلّةَ حصانتهم التي لا تُنتهك».

Verse 40

नास्ति लोकेषु तद्‌ भूतं भविता नो भविष्यति । यो जयेत्‌ पाण्डवान्‌ सर्वान्‌ पालिताउ्छार्ड्र्धन्वना,(ससुरासुरमर्त्येषु यो विद्यात्‌ तत्त्वतो हरिम्‌ ।) लोकमें ऐसा कोई प्राणी न हुआ है, न है और न होगा, जो शार्ज्ू-धनुष धारण करनेवाले भगवान्‌ श्रीकृष्णके द्वारा सुरक्षित इन सब पाण्डवोंपर विजय पा सके तथा देवता, असुर और मनुष्योंमें ऐसा भी कोई नहीं है, जो उन भगवान्‌ श्रीहरिको यथार्थरूपसे जान सके

قال بيشما: «ليس في العوالم كلّها كائنٌ كان أو يكون أو سيكون يستطيع أن يقهر الباندافا جميعًا، إذ هم في حمى كريشنا حاملِ قوسِ شارنغا. وكذلك بين الآلهة والآسورا والبشر لا أحد يقدر أن يعرف هاري معرفةً حقيقيةً على ما هو عليه في ذاته».

Verse 41

यत्‌ तु मे कथितं तात मुनिभिर्भावितात्मभि: । पुराणगीतं धर्मज्ञ तच्छुणुष्व यथातथम्‌,तात धर्मज्ञ! पवित्र अन्तःकरणवाले मुनियोंने मुझसे जो पुराणप्रतिपादित यथार्थ बातें कही हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो

ولكن الآن، يا بُنيّ، يا عارفَ الدَّرما، أَصغِ إليه كما هو على وجهه. ما أخبرني به الحكماءُ ذوو الباطن المُهذَّب—تعليمٌ عتيقٌ تُنشده تقاليدُ البورانا—سأرويه لك على حقيقته دون تبديل.

Verse 42

पुरा किल सुरा: सर्वे ऋषयश्न समागता: । पितामहमुपासेदु: पर्वते गन्धमादने,पहलेकी बात है, समस्त देवता और महर्षि गन्धमादन पर्वतपर आकर पितामह ब्रह्माजीके पास बैठे

قال بيشما: «في سالف الزمان اجتمع جميعُ الآلهة والريشيّون العظام. فتقدّموا إلى بيتامها براهما على جبل غندهامادانا، ولازموه بالخدمة، يلتمسون حضوره وهدايته في أمرٍ ذي شأنٍ مقدّس».

Verse 43

तेषां मध्ये समासीन: प्रजापतिरपश्यत । विमान प्रज्वलद्‌ भासा स्थितं प्रवरमम्बरे,उस समय उनके बीचमें बैठे हुए प्रजापति ब्रह्माने आकाशमें खड़ा हुआ एक श्रेष्ठ विमान देखा, जो अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहा था

وكان براهما، بصفته براجابتي، جالسًا في وسطهم، فرأى في السماء مركبةً سماويةً فاخرةً قائمةً في الفضاء، تتوهّج وتتلألأ بضيائها المتقد.

Verse 44

ध्यानेनावेद्य तद्‌ ब्रह्मा कृत्वा च नियतो55जलिम्‌ । नमश्नकार हद्ृष्टात्मा पुरुषं परमेश्वरम्‌,अपने मनको संयममें रखनेवाले ब्रह्माजीने ध्यानसे यथार्थ बात जानकर हाथ जोड़ लिये और प्रसन्नचित्त होकर उन परम पुरुष परमेश्वरको नमस्कार किया

فلما أدرك براهما تلك الحقيقة بالتأمل، وهو ضابطٌ لنفسه، ضمَّ كفَّيه بخشوع؛ وبقلبٍ مفعمٍ بالفرح انحنى ساجدًا للـ«بوروشا» الأعلى، ربِّ الجميع وسيدِ الكون.

Verse 45

ऋषयस्त्वथ देवाश्न दृष्टवा ब्रह्माणमुत्थितम्‌ स्थिता: प्राउजलय: सर्वे पश्यन्तो महदद्‌्भुतम्‌,ऋषि तथा देवता ब्रह्माजीको खड़े (और हाथ जोड़े) हुए देख स्वयं भी उस परम अद्भुत तेजका दर्शन करते हुए हाथ जोड़कर खड़े हो गये

قال بهيشما: ثم إن الحكماء والآلهة، لما رأوا براهما قد نهض ووقف، وقفوا جميعًا بأكفٍّ مضمومة. وإذ أبصروا ذلك التجلي العظيم العجيب، ظلّوا منصتين في خشوعٍ وهيبة.

Verse 46

यथावच्च तम भ्यर्च्य ब्रह्मा ब्रह्मविदां वर: । जगाद जगत: स्त्रष्टा परं परमधर्मवित्‌,ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, परम धर्मज्ञ, जगत्‌स्रष्टा ब्रह्माजीनी उन तेजोमय परम पुरुषका यथावत्‌ पूजन करके उनकी स्तुति की

قال بهيشما: وبعد أن عبده على الوجه اللائق، تكلّم براهما—أعظم العارفين بالبراهمن، وخالق العوالم، وأسمى العارفين بالدارما—مقدّمًا الثناء لتلك الشخصية العليا المتلألئة.

Verse 47

विश्वावसुर्विश्वमूर्ति वि श्लेशो विष्वक्सेनो विश्वकर्मा वशी च । विश्वेश्वरो वासुदेवो$सि तस्माद्‌ योगात्मान दैवतं त्वामुपैमि,प्रभो! आप सम्पूर्ण विश्वको आच्छादित करनेवाले, विश्वस्वरूप और विश्वके स्वामी हैं। विश्वमें सब ओर आपकी सेना है। यह विश्व आपका कार्य है। आप सबको अपने वशमें रखनेवाले हैं। इसीलिये आपको विश्वेश्वर और वासुदेव कहते हैं। आप योगस्वरूप देवता हैं, मैं आपकी शरणमें आया हूँ

قال بهيشما: «أنت الحضور الشامل الذي يملأ الوجود، وأنت صورة الكون ذاته؛ أنت الذي يفصل ويُذيب؛ ربٌّ لقواه حضورٌ في كل جهة؛ الصانع الكونيّ والسيّد القاهر. لذلك تُدعى ربَّ العالمين وڤاسوديفا (Vāsudeva). يا ربّ، أنت الإله الذي جوهره اليوغا؛ وإليك ألجأ وأعتصم.»

Verse 48

जय विश्व महादेव जय लोकहिते रत । जय योगीश्वर विभो जय योगपरावर,विश्वरूप महादेव! आपकी जय हो, लोकहितमें लगे रहनेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो। सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले योगीश्वर! आपकी जय हो। योगके आदि और अन्त! आपकी जय हो

قال بهيشما: «النصر لك، يا مهاديفا (Mahādeva) الذي يملأ الكون كلَّه. النصر لك، يا من لا يزال منصرفًا إلى خير العوالم. النصر لك، يا سيّد اليوغيين، يا ذا السطوة الشاملة والحضور الكلّي. النصر لك، يا من أنت بدء اليوغا وختامها—يا مهاديفا ذو الصورة الكونية.»

Verse 49

पद्मगर्भ विशालाक्ष जय लोकेश्ररेश्वर । भूतभव्यभवन्नाथ जय सौम्यात्मजात्मज,आपकी नाभिसे आदि कमलकी उत्पत्ति हुई है, आपके नेत्र विशाल हैं, आप लोकेश्वरोंके भी ईश्वर हैं; आपकी जय हो। भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी! आपकी जय हो। आपका स्वरूप सौम्य है, मैं स्वयम्भू ब्रह्मा आपका पुत्र हूँ। आप असंख्य गुणोंके आधार और सबको शरण देनेवाले हैं, आपकी जय हो। शार्ज््धनुष धारण करनेवाले नारायण! आपकी महिमाका पार पाना बहुत ही कठिन है, आपकी जय हो

يمدح بهيشما الربَّ الأعلى بترنيمةِ تسليمٍ وخضوع: «النصرُ لك، يا من يخرج من سُرَّتِه اللوتسُ الأوّل؛ يا واسعَ العينين؛ يا سيّدًا حتى على سادة العوالم. النصرُ لك، يا مالكَ الماضي والمستقبل والحاضر. صورتُك لطيفةٌ مباركة؛ وأنا—براهما المولودُ من ذاته—ابنُك. أنتَ سندُ الفضائل التي لا تُحصى وملجأُ الجميع. يا نارايانا، حاملَ قوسِ شارنغا (Śārṅga)، إن عظمتَك عسيرةٌ جدًّا على الإحاطة—فالنصرُ لك.»

Verse 50

असंख्येयगुणाधार जय सर्वपरायण । नारायण सुदुष्पार जय शार्ज्ुधनुर्धर,आपकी नाभिसे आदि कमलकी उत्पत्ति हुई है, आपके नेत्र विशाल हैं, आप लोकेश्वरोंके भी ईश्वर हैं; आपकी जय हो। भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी! आपकी जय हो। आपका स्वरूप सौम्य है, मैं स्वयम्भू ब्रह्मा आपका पुत्र हूँ। आप असंख्य गुणोंके आधार और सबको शरण देनेवाले हैं, आपकी जय हो। शार्ज््धनुष धारण करनेवाले नारायण! आपकी महिमाका पार पाना बहुत ही कठिन है, आपकी जय हो

يمدح بهيشما نارايانا بوصفه الأساس الذي لا ينفد لفضائل لا تُحصى، والملجأ الأخير لجميع الكائنات. من سُرَّته خرج اللوتسُ البدئي؛ عيناه واسعتان، وهو ربٌّ حتى على حكّام العوالم. هو سيّد الماضي والمستقبل والحاضر، لطيفُ الهيئة؛ ويُقال إن براهما المولود من ذاته قد صدر عنه بوصفه ابنًا. وإذ يعلن بهيشما أن عظمته عسيرةٌ جدًّا على الإحاطة، يظلّ يهتف مرارًا بتمجيده بوصفه حاملَ قوسِ شارنغا (Śārṅga)—عبادةٌ تُؤطِّر الحرب لا كعنفٍ فحسب، بل كميدانٍ تُستدعى فيه السيادةُ القصوى والحمايةُ والدارما.

Verse 51

जय सर्वगुणोपेत विश्वमूर्ते निरामय । विश्वेश्वर महाबाहो जय लोकार्थतत्पर,आप समस्त कल्याणमय गुणोंसे सम्पन्न, विश्वमूर्ति और निरामय हैं; आपकी जय हो। जगत्‌का अभीष्ट साधन करनेवाले महाबाहु विश्वेश्वरर! आपकी जय हो

قال بهيشما: «النصرُ لك—يا من اجتمعت فيك كلُّ الفضائل المباركة، يا ذا الصورة الكونية، يا منزَّهًا عن كلِّ ألم. النصرُ لك، يا ربَّ الكون، يا عظيمَ الساعدين، يا من لا يزال منصرفًا إلى تحقيق الخير الحقّ والمقاصد المشروعة للعوالم.»

Verse 52

महोरग वराहाद्य हरिकेश विभो जय । हरिवास दिशामीश विश्ववासामिताव्यय,आप महान्‌ शेषनाग और महावाराह-रूप धारण करनेवाले हैं, सबके आदि कारण हैं। हरिकेश! प्रभो! आपकी जय हो, आप पीताम्बरधारी, दिशाओंके स्वामी, विश्वके आधार, अप्रमेय और अविनाशी हैं

يمدح بهيشما الربَّ الأعلى: «النصرُ لك، يا هاري-كيشا (Hari-keśa)، أيها السيدُ الشاملُ لكلِّ مكان—يا من تتخذ صورة الحيّة العظمى شيشا (Śeṣa) وصورة الخنزير البريّ الجبّار فاراها (Varāha)، يا عِلّةَ كلِّ شيء الأولى. يا ربَّ الثوب الأصفر، يا حاكمَ الجهات، يا سندَ الكون—يا من لا يُقاس ولا يفنى—النصرُ لك.»

Verse 53

व्यक्ताव्यक्तामितस्थान नियतेन्द्रिय सत्क्रिय । असंख्येयात्मभावज्ञ जय गम्भीर कामद,व्यक्त और अव्यक्त--सब आपहीका स्वरूप है, आपके रहनेका स्थान असीम-अनन्त है, आप इन्द्रियोंके नियन्ता हैं। आपके सभी कर्म शुभ-ही-शुभ हैं। आपकी कोई इयत्ता नहीं है, आप आत्मस्वरूपके ज्ञाता, स्वभावतः गम्भीर और भक्तोंकी कामनाएँ पूर्ण करनेवाले हैं; आपकी जय हो

قال بهيشما: أنتَ نفسك الظاهرُ والباطنُ معًا. مقامُك وامتدادُك لا يُقاسان ولا حدَّ لهما. أنتَ مُسيطرُ الحواس، وكلُّ أفعالك خالصةُ البركة. أنتَ فوق كلِّ عدٍّ وقياس؛ تعرف حقيقةَ الذات وطبيعةَ الكائنات الباطنة. وبحكم طبيعتك أنتَ عميق، وتُتمِّم رغباتِ عابديك. النصرُ لك.

Verse 54

अनन्तविदित ब्रह्मन्‌ नित्य भूतविभावन । कृतकार्य कृतप्रज्ञ धर्मज्ञ विजयावह,ब्रह्म! आप अनन्तबोधस्वरूप हैं, नित्य हैं और सम्पूर्ण भूतोंको उत्पन्न करनेवाले हैं। आपको कुछ करना बाकी नहीं है, आपकी बुद्धि पवित्र है, आप धर्मका तत्त्व जाननेवाले और विजयप्रदाता हैं

يا براهمن، يا من عُرف بعلمٍ لا نهاية له! أنت أزليّ، ومُنشِئُ جميع الكائنات. لا عملَ بقي عليك؛ وعقلك طاهر. أنت العارف بحقيقة الدارما، وأنت واهبُ الظفر.

Verse 55

गुह्मात्मन्‌ सर्वयोगात्मन्‌ स्फुटं सम्भूतसम्भव । भूताद्य लोकतत्त्वेश जय भूतविभावन,पूर्णयोगस्वरूप परमात्मन्‌! आपका स्वरूप गूढ होता हुआ भी स्पष्ट है। अबतक जो हो चुका है और जो हो रहा है, सब आपका ही रूप है। आप सम्पूर्ण भूतोंक आदि कारण और लोकतत्त्वके स्वामी हैं। भूतभावन! आपकी जय हो

يا الذاتَ الخفيّة، يا روحَ كلِّ اليوغا—مع أنك لطيفٌ دقيق، فإنك ظاهرٌ جليّ بوصفك مصدرَ كل ما يكون. يا ربَّ مبادئ العوالم، يا العلّةَ الأولى للكائنات—لك الظفرُ، يا مُقيمَ الخلق ومُعيلَهم. يا الذاتَ العليا، يا تجسيدَ اليوغا الكاملة: ما وقع وما يقع إنما هو صورتُك أنت. أنت السببُ الأول لجميع الموجودات، وأنت سيّدُ النظام الحقّ للعالم. لك المجد.

Verse 56

आत्मयोने महाभाग कल्पसंक्षेप तत्पर । उद्भावनमनोभाव जय ब्रह्म जनप्रिय,आप स्वयम्भू हैं, आपका सौभाग्य महान्‌ है। आप इस कल्पका संहार करनेवाले एवं विशुद्ध परब्रह्म हैं। ध्यान करनेसे अन्तःकरणमें आपका आविर्भाव होता है, आप जीवमात्रके प्रियतम परब्रह्म हैं, आपकी जय हो

أنت سْفايَمبهو، القائم بذاته، وحظُّك عظيم. أنت مُنهي هذا الكَلْپا، وأنت البراهمن الأعلى الطاهر. وبالتأمّل تتجلّى في باطن القلب. يا براهمن، يا أحبَّ ما يكون إلى جميع الأحياء—لك الظفر.

Verse 57

निसर्गसर्गनिरत कामेश परमेश्वर । अमृतोद्धव सद्भाव मुक्तात्मन्‌ विजयप्रद,आप स्वभावतः: संसारकी सृष्टिमें प्रवृत्त रहते हैं, आप ही सम्पूर्ण कामनाओंके स्वामी परमेश्वर हैं। अमृतकी उत्पत्तिके स्थान, सत्यस्वरूप, मुक्तात्मा और विजय देनेवाले आप ही हैं

بحسب طبيعتك أنت دائمُ الانشغال بانبساط العالم وتنظيمه—بنشأته العفوية وخلقه المنظَّم. أنت سيّدُ كل الرغبات، الربُّ الأعلى. أنت المصدرُ الذي تُنال منه الخلود، وتجسيدُ الحقّ والوجود الحقيقي، والذاتُ المتحرّرة، وواهبُ النصر.

Verse 58

प्रजापतिपते देव पद्मनाभ महाबल । आत्मभूत महाभूत सत्त्वात्मन्‌ जय सर्वदा,देव! आप ही प्रजापतियोंके भी पति, पद्मनाभ और महाबली हैं। आत्मा और महाभूत भी आप ही हैं। सत्त्वस्वरूप परमेश्वर! सदा आपकी जय हो

يا إلهَ الآلهة، يا ربَّ البراجاپاتيين، يا بادمانابها، يا عظيمَ القوّة! أنت الذاتُ الساكنة في الداخل، وأنت أيضاً العناصرُ العظمى التي يتكوّن منها العالم. يا ربَّ من جوهره ساتفا (sattva) النقي—ليكن النصرُ لك على الدوام.

Verse 59

पादौ तव धरा देवी दिशो बाहू दिवं शिर: । मूर्तिस्ते5हं सुरा: कायश्नन्द्रादित्यौ च चक्षुषी,पृथ्वीदेवी आपके चरण हैं, दिशाएँ बाहु हैं और द्युलोक मस्तक है। मैं ब्रह्मा आपका शरीर, देवता अंग-प्रत्यंग और चन्द्रमा तथा सूर्य नेत्र हैं

قال بيشما: «يا ربّ! إنّ إلهةَ الأرضِ هي قدماك؛ والجهاتُ أذرعُك؛ والسماءُ رأسُك. وأنا صورتُك المتجسّدة؛ والآلهةُ أطرافُك وأعضاؤك؛ والقمرُ والشمسُ هما عيناك الاثنتان.»

Verse 60

बल॑ तपश्न सत्यं च कर्म धर्मात्मकं तव । तेजोडग्नि: पवन: श्वास आपस्ते स्वेदसम्भवा:,तप और सत्य आपका बल है तथा धर्म और कर्म आपका स्वरूप है। अग्नि आपका तेज, वायु साँस और जल पसीना है

قال بيشما: «إنّ التَّقشّف (tapas) والصدق (satya) هما قوّتُك؛ والدارما والعملُ القويم هما طبيعتُك ذاتُها. إشراقُك نارٌ؛ ونَفَسُك ريحٌ؛ والمياهُ مولودةٌ من عَرَقِك.»

Verse 61

अश्रिनौ श्रवणाौ नित्यं देवी जिह्नला सरस्वती । वेदा: संस्कारनिष्ठा हि त्वयीदं जगदाश्रितम्‌,अश्विनीकुमार आपके कान और सरस्वती देवी आपकी जिह्ढा हैं। वेद आपकी संस्कारनिष्ठा हैं। यह जगत्‌ सदा आपहीके आधारपर टिका हुआ है

قال بيشما: «إنّ التوأمين الأشفينيَّين هما أذناك على الدوام، والإلهة ساراسفتي هي لسانُك. والڤيدات هي أساسُك الراسخ في الانضباط المقدّس والنظام المُكرَّس. وعلىك وحدك يستند هذا العالم كلّه على الدوام طلبًا للسند.»

Verse 62

न संख्यानं परीमाणं न तेजो न पराक्रमम्‌ । न बल॑ योगयोगीश जानीमस्ते न सम्भवम्‌,योग-योगीश्वर! हम न तो आपकी संख्या जानते हैं, न परिमाण। आपके तेज, पराक्रम और बलका भी हमें पता नहीं है। हम यह भी नहीं जानते कि आपका आविर्भाव कैसे होता है

قال بيشما: «يا سيّد اليوغا! لا نعرف عددَك ولا نستطيع قياسَك. لا نحيط بإشراقك ولا ببأسك ولا بقوّتك؛ ولا ندرك كيف يكون تجلّيك وظهورك.»

Verse 63

त्वद्धक्तिनिरता देव नियमैस्त्वां समाश्रिता: । अर्चयाम: सदा विष्णो परमेशं महेश्वरम्‌

قال بيشما: «يا ربّ، إذ نحن ثابتون على الإخلاص لك، منضبطون بالفرائض والرياضات المقدّسة، فإنّا نلوذ بك ملجأً. يا ڤِشنو، إنّا نعبدك على الدوام—الربّ الأعلى، السيّد العظيم.»

Verse 64

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें चौथे दिनका युद्धविरामविषयक चौसठवाँ अध्याय पूरा हुआ,ऋषयो देवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगा: । पिशाचा मानुषाश्वैव मृगपक्षिसरीसूपा:

ويمضي سَنْجَيا قائلاً إن نطاق الكائنات الحاضرة والمتأثرة بما جرى كان واسعًا: الرِّشِيّون، والغَنْدهَرْفَة—موسيقيّو السماء—، والياكشا والراكشا، والكائنات الأفعوانية كالناغا، والبيشاتشا، والبشر؛ ومعهم الوحوش والطيور والزواحف الدبيبة. ويؤكد هذا البيت أن اضطراب الحرب لا ينحصر في الملوك والمحاربين وحدهم، بل يرتد صداه في النظام الأخلاقي والكوني بأسره، فيستدعي انتباه جميع طبقات الموجودات، ويذكّر بالعواقب الشاملة للأدهرما والعنف.

Verse 65

एवमादि मया सृष्टं पृथिव्यां त्वत्प्रसादजम्‌ | देव! हम तो आपकी उपासनामें लगे रहते हैं। आपके नियमोंका पालन करते हुए आपके ही शरण हैं। विष्णो! हम सदा आप परमेश्वर एवं महेश्वरका पूजन ही करते हैं। आपकी ही कृपासे हमने पृथ्वीपर ऋषि, देवता, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, पिशाच, मनुष्य, मृग, पक्षी तथा कीड़े-मकोड़े आदिकी सृष्टि की है ।। ६३-६४ ह ।। पद्मनाभ विशालाक्ष कृष्ण दु:खप्रणाशन,पद्मनाभ! विशाललोचन! दुःखहारी श्रीकृष्ण! आप ही सम्पूर्ण प्राणियोंके आश्रय और नेता हैं, आप ही संसारके गुरु हैं। देवेश्वरर! आपकी कृपादृष्टि होनेसे ही सब देवता सदा सुखी रहते हैं इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि विश्वोपाख्याने पजचषष्टितमो< ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वनें विश्वोपाख्यानविषयक पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

قال بهيشما: «إن هذا كله—ابتداءً من خلق الكائنات—لم يوجد على الأرض إلا بفضلك. أيها الرب، نحن ملازمون لعبادتك على الدوام؛ نلتزم سننك، ولا نلوذ إلا بك. يا فيشنو، نعبدك أبدًا بوصفك الإله الأعلى وبوصفك المهيشفرا، السيد العظيم. وبرحمتك أُظهرنا على الأرض مراتب الوجود: الرِّشِيّين، والآلهة، والغندهرفات، والياكشا، والراكشا، والناغا من ذوي الطبيعة الأفعوانية، والبيشاتشا، والبشر، والوحوش، والطيور، وحتى أصغر الدواب الزاحفة. يا بادمانابها، يا كريشنا واسع العينين، يا مُزيل الحزن: أنت سند جميع الأحياء وهاديهم؛ أنت معلّم العالم. يا ربّ الآلهة، إنما يظلّ الآلهة في سعادة دائمة حين تقع عليهم نظرتك الرحيمة.»

Verse 66

त्वं गति: सर्वभूतानां त्वं नेता त्वं जगदगुरु: । त्वत्प्रसादेन देवेश सुखिनो विबुधा: सदा,पद्मनाभ! विशाललोचन! दुःखहारी श्रीकृष्ण! आप ही सम्पूर्ण प्राणियोंके आश्रय और नेता हैं, आप ही संसारके गुरु हैं। देवेश्वरर! आपकी कृपादृष्टि होनेसे ही सब देवता सदा सुखी रहते हैं

«أنت مآل جميع الكائنات، وأنت القائد، وأنت معلّم العالم. يا ربّ الآلهة، بفضلك يظلّ الآلهة سعداء على الدوام. يا بادمانابها! يا كريشنا واسع العينين، يا مُزيل الألم: أنت سند جميع الأحياء وهاديهم، وأنت أستاذ الدنيا. يا ربّ الآلهة، بنظرتك الرحيمة وحدها يبقى الآلهة في سعادة دائمة.»

Verse 67

पृथिवी निर्भया देव त्वत्प्रसादात्‌ू सदाभवत्‌ । तस्माद्‌ भव विशालाक्ष यदुवंशविवर्धन:,देव! आपके ही प्रसादसे पृथ्वी सदा निर्भय रही है, इसलिये विशाललोचन! आप पुनः पृथ्वीपर यदुवंशमें अवतार लेकर उसकी कीर्ति बढ़ाइये

قال بهيشما: «أيها الرب، بفضلك ظلت الأرض على الدوام آمنة من الخوف. لذلك، يا واسع العينين، كن مرة أخرى مُنمّي سلالة يادو: خذ ولادةً جديدة على الأرض وزِدْها مجدًا وذِكرًا.»

Verse 68

धर्मसंस्थापनार्थाय दैत्यानां च वधाय च । जगतो धारणार्थाय विज्ञाप्यं कुरु मे विभो

قال بهيشما: «يا ذا القدرة، اعمل عملاً يُعلَن أنه لثلاث غايات: لإقامة الدهرما من جديد، ولقتل الدايتيّات، ولحمل العالم وصونه. فلتُعرَف مقاصدك، لخير الجميع.»

Verse 69

प्रभो! धर्मकी स्थापना, दैत्योंके वध और जगतकी रक्षाके लिये हमारी प्रार्थना अवश्य स्वीकार कीजिये ।। यत्‌ तत्‌ परमकं गुहां त्वत्प्रसादादिदं विभो । वासुदेव तदेतत्‌ ते मयोद्गीत॑ यथातथम्‌,वासुदेव! आप ही पूर्णतम परमेश्वर हैं। आपका जो परम गुहाय यथार्थस्वरूप है, उसीका यहाँ इस रूपमें आपकी कृपासे ही गान किया गया है

قال بيشما: «يا ربّ، من أجل إقامة الدَّرما، ومن أجل إفناء الدَّيتْيَة، ومن أجل حماية العالم، تقبّل دعاءنا. يا من يَسَعُ كلَّ شيء، يا فاسوديفا—بفضل نعمتك أُنشدتُ هنا الحقيقةَ العُليا الأشدَّ سرًّا عنك، كما هي على وجهها الحقّ.»

Verse 70

सृष्टवा संकर्षणं देवं स्वयमात्मानमात्मना । कृष्ण त्वमात्मनासाक्षी: प्रद्मुम्नं चात्मसम्भवम्‌,श्रीकृष्ण! आपने आत्माद्वारा स्वयं अपने-आपको ही संकर्षणदेवके रूपमें प्रकट करके अपने ही द्वारा आत्मजस्वरूप प्रद्युम्नकी सृष्टि की है

قال بيشما: «يا كريشنا، بذاتك أنت أظهرتَ ذاتك عينَها في صورة الإله سَنْكَرْشَنَة؛ ثم من نفسك أخرجتَ برَدْيُومْنَة، المولود من جوهرك. وهكذا تقوم شاهدًا باطنًا—ذاتيَّ العِلّة، ذاتيَّ التجلي، ومصدرَ فيوضاتك المنبثقة منك.»

Verse 71

प्रद्युम्नादनिरुद्ध त्वं यं विदुर्विष्णुमव्ययम्‌ । अनिरुद्धो$सृजन्मां वै ब्रह्माणं लोकधारिणम्‌,प्रद्यम्नसे आपने ही उन अनिरुद्धको प्रकट किया है जिन्हें ज्ञानाजन अविनाशी विष्णुरूपसे जानते हैं। उन विष्णुरूप अनिरुद्धने ही मुझ लोकधाता ब्रह्माकी सृष्टि की है

«ومن برَدْيُومْنَة أظهرتَ أَنيرُدْهَة، الذي يعرفه الحكماءُ في صورة فيشنو الذي لا يفنى. وذلك الأَنيرُدْهَةُ في هيئة فيشنو هو الذي خلقني أنا—براهما، حاملَ العوالم.»

Verse 72

वासुदेवमय: सोऊहं त्वयैवास्मि विनिर्मित: । (तस्माद्‌ याचामि लोकेश चतुरात्मानमात्मना ।) विभज्य भागशो&5त्मानं व्रज मानुषतां विभो,प्रभो! इस प्रकार आपने ही मेरी सृष्टि की है। आपसे अभिन्न होनेके कारण मैं भी वासुदेवमय हूँ। लोकेश्वर! इसलिये याचना करता हूँ कि आप अपने-आपको स्वयं ही (वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्म और अनिरुद्ध)--इन चार रूपोंमें विभक्त करके मानव-शरीर ग्रहण कीजिये

قال بيشما: «إنما أنت وحدك الذي صاغني؛ ولأنني غير منفصل عنك فأنا أيضًا مغمورٌ بفاسوديفا. لذلك، يا ربَّ العوالم، أتضرّع إليك: اقسم ذاتك إلى أربعة أوجه، وادخل الوجود الإنساني جزءًا فجزءًا. يا سيّدَ الشمول—تقبّل البشرية في تلك الصور الأربع (فاسوديفا، سَنْكَرْشَنَة، برَدْيُومْنَة، وأَنيرُدْهَة).»

Verse 73

तत्रासुरवधं कृत्वा सर्वलोकसुखाय वै । धर्म प्राप्प यश: प्राप्य योगं प्राप्स्पसि तत्त्वत:,वहाँ सब लोगोंके सुखके लिये असुरोंका वध करके धर्म और यशका विस्तार कीजिये। अन्तमें अवतारका उद्देश्य पूर्ण करके आप पुनः अपने पारमार्थिक स्वरूपसे संयुक्त हो जायूँगे

«هناك، من أجل سعادة جميع الخلائق، اقتلِ الأَسورا، وانشرِ الدَّرما وانلِ المجد. وفي النهاية، حين يكتمل مقصدُ تجسّدك (الأفاتارا)، ستعود فتتّحد بحقيقتك العُليا على وجهها الحقّ.»

Verse 74

त्वां हि ब्रह्मर्षयो लोके देवाश्षामितविक्रम । तैस्तैहिं नामभिर्युक्ता गायन्ति परमात्मकम्‌,अमित पराक्रमी परमेश्वर! संसारमें महर्षि और देवगण एकाग्रचित्त हो उन-उन लीलानुसारी नामोंद्वारा आपके परमात्मस्वरूपका गान करते रहते हैं

قال بهيشما: «يا ذا البأس الذي لا يُقاس! إنّ البراهمارِشيّين والآلهة في هذا العالم، وقد جمعوا عقولهم على إخلاصٍ ذي نقطةٍ واحدة، يواصلون على الدوام إنشادك بوصفك الذاتَ العليا (Paramātman)، ويمدحونك بأسماءٍ كثيرة توافق أفعالك الإلهية المتنوعة وتجلياتك.»

Verse 75

स्थिताश्च सर्वे त्वयि भूतसंघा: कृत्वा55श्रयं त्वां वरदं सुबाहो । अनादिमध्यान्तमपारयोगं लोकस्य सेतु प्रवदन्ति विप्रा:,सुबाहो! आप वरदायक प्रभुका ही आश्रय लेकर समस्त प्राणिसमुदाय आपमें ही स्थित हैं। ब्राह्गणलोग आपको आदि, मध्य और अन्तसे रहित, किसी सीमाके सम्बन्धसे शून्य (असीम) तथा लोकमर्यादाकी रक्षाके लिये सेतुस्वरूप बताते हैं

قال بهيشما: «يا عظيمَ الساعد! إنّ جموع الكائنات كلّها تقيم فيك وحدك، إذ اتخذتك ملجأً—يا واهبَ النِّعَم. ويُعلن الحكماء أنّك بلا بدءٍ ولا وسطٍ ولا نهاية؛ متجاوزٌ لكل مقياسٍ يحدّ؛ وأنك “جسر” (setu) يصون نظام الدارما وأخلاق العالم.»

Verse 86

समुद्रस्पेव महतो भुजाभ्यां प्रतरन्‌ नर: । जैसे अपनी भुजाओंसे तैरनेवाला मनुष्य महासागरका पार नहीं पा सकता, उसी प्रकार मैं इस दुःखका अन्त किसी प्रकार नहीं देखता हूँ

قال دِهرتَراشترَ: «كما أنّ رجلاً يحاول أن يعبر المحيط العظيم سباحةً بذراعيه وحدهما لا يبلغ الشاطئ البعيد، كذلك لا أرى لهذه الحسرة نهايةً البتّة.»

Verse 93

घातयिष्यति मे सर्वान्‌ पुत्रान्‌ भीमो न संशय: । निश्चय ही मेरे पुत्रोंपर अत्यन्त भयंकर संकट प्राप्त हो गया है। मेरा विश्वास है कि भीमसेन मेरे सभी पुत्रोंकोी मार डालेंगे, इसमें संशय नहीं है

قال دِهرتَراشترَ: «إنّ بهيما سيُهلك جميع أبنائي لا محالة—لا شكّ في ذلك.»

Verse 196

निष्ठरा हीनकर्माणस्तेन हीयन्ति संयुगे । महाराज! धर्मके ही कारण दुन्तीके पुत्र युद्धमें अवध्य और विजयी हो रहे हैं। इधर आपके दुरात्मा पुत्र सदा पापोंमें ही तत्पर रहते हैं। निर्दय होनेके साथ ही निकृष्ट कर्ममें लगे रहते हैं। इसीलिये युद्धस्थलमें उन्हें हानि उठानी पड़ती है

قال سَنجايا: «أيها الملك العظيم، إنّ القساةَ المنهمكين في الأفعال الدنيئة يَضعُفون في المعركة بسبب سلوكهم ذاته. وبسبب الدارما (dharma) صار أبناءُ كونتي عصيّين على القهر وظافرين في الحرب. أمّا أبناؤك ذوو النيات الخبيثة فهم دائمًا مُقبلون على الإثم؛ قساةٌ ومنغمسون في أعمالٍ وضيعة، ولذلك ينالهم الخسران في ساحة القتال.»

Frequently Asked Questions

The chapter implicitly stages duty versus attachment: warriors execute assigned roles against relatives and allies, where obedience to command and protection of the host compete with personal bonds and individual rivalries.

Operational discipline matters: decisive containment of a high-impact opponent (Bhīmasena) and disruption of enemy mobility (Sātyaki’s chariot) can alter collective morale and local outcomes more than isolated heroics.

No explicit phalaśruti appears in this unit; its significance is contextual—documenting how tactical decisions and battlefield perception (dust, obscured directions) shape consequence within the epic’s dharma-and-karma framework.