Adhyaya 15
Drona ParvaAdhyaya 1537 Versesपाण्डव पक्ष का पलड़ा भारी; कौरव सेना दबकर भयभीत और विखंडित, पाण्डवों में विजय-उत्साह।

Adhyaya 15

द्रोणपर्व — पञ्चदशोऽध्यायः (Droṇa Parva, Chapter 15): युधिष्ठिर-रक्षा तथा अर्जुनस्य शरवृष्टिः

Upa-parva: Droṇa-abhiyāna / Yudhiṣṭhira-anīka-saṅgharṣa (Drona’s offensive against Yudhiṣṭhira’s formation)

Sañjaya reports that Vṛṣasena, perceiving the Kaurava force in distress, sustains the field through weapon-skill and a wide-direction arrow discharge that fells infantry, cavalry, chariots, and elephants. Nakula’s unit engages; Draupadī’s sons move to protect their ally while Kaurava charioteers led by Droṇa’s son surge forward, producing a dense exchange likened to clouds covering mountains. The struggle intensifies around prominent combatants, with Droṇa urging steadiness and then driving toward Yudhiṣṭhira; a Pāñcāla youth (Cakrarakṣa) checks him briefly, drawing acclaim, but Droṇa overwhelms the defense and advances, striking multiple leaders and scattering the line. As talk arises that the Pāṇḍava king is ‘taken,’ Arjuna arrives at speed, creates an arrow-darkness that collapses visibility, and compels Droṇa and Duryodhana’s side to withdraw. Arjuna then conducts an orderly pullback of his own formations; allies praise him as he returns to camp with Kṛṣṇa.

Chapter Arc: धृतराष्ट्र संजय से कहता है कि जितने अद्भुत द्वन्द्व-युद्ध उसने सुने हैं, फिर भी उसका मन नहीं भरता; वह देवासुर-संग्राम-सा इस युद्ध का और वृत्तान्त चाहता है—विशेषतः शल्य और सौभद्र (अभिमन्यु) के प्रसंगों का। → संजय रणभूमि का दृश्य खींचता है जहाँ मद्रराज शल्य के अतिरिक्त कोई भी भीमसेन के वेग को सहने में समर्थ नहीं; दोनों महाबली गदा-युद्ध में आमने-सामने आते हैं और प्रहारों से गदाएँ चिनगारियाँ उगलती, आकाश को प्रकाशित करती हुई घूमती हैं। → शल्य और भीम—दोनों उठी हुई गदाओं के साथ महावेग से टूट पड़ते हैं; गदाएँ बिजली-सी चमकती हैं, मंडल बनाती हुई बीच मार्ग में टकराती-छूटती हैं, और क्षण-क्षण में निर्णायक प्रहार का भय समूचे सैन्य को स्तब्ध कर देता है। → अन्ततः शल्य पराजित होता है; पाण्डव महारथी धार्तराष्ट्रों को दबाकर रण में अग्नि-से दीप्त होते हैं। कौरव सेना भयभीत होकर दिशाओं में बिखरती है, जबकि पाण्डव पक्ष सिंहनाद, शंख, भेरी और मृदंग-निनाद से विजय-हर्ष प्रकट करता है। → धृतराष्ट्र की अतृप्त जिज्ञासा बनी रहती है—वह आगे के द्वन्द्वों और विशेषतः सौभद्र के युद्ध-वृत्तान्त को सुनने को उत्कंठित है।

Shlokas

Verse 1

नफमशा (0) असऔ मनन पज्चदशो< ध्याय: शल्यके साथ भीमसेनका युद्ध तथा शल्यकी पराजय धृतराष्ट्र रवाच बहूनि सुविचित्राणि द्वन्द्ययुद्धानि संजय । त्वयोक्तानि निशम्माहं स्पृहयामि सचक्षुषाम्‌,धृतराष्ट्र बोले--संजय! तुमने बहुत-से अत्यन्त विचित्र द्वन्द्ययुद्धोंका वर्णन किया है, उनकी कथा सुनकर मैं नेत्रवाले लोगोंके सौभाग्यकी स्पृहा करता हूँ

持国王说道:“三阇耶,你已叙述了许多极其奇异的单骑决斗。听你所言,我不禁渴望那仍具目力之人的福分。”

Verse 2

आश्चर्यभूतं लोकेषु कथयिष्यन्ति मानवा: । कुरूणां पाण्डवानां च युद्ध देवासुरोपमम्‌,देवताओं और असुरोंके समान इस कौरव-पाण्डव-युद्धको संसारके मनुष्य अत्यन्त आश्चर्यकी वस्तु बतायेंगे

三阇耶说道:“在诸世界之中,人们将把此事传为奇观——俱卢与般度之战,宛如天神与阿修罗的交锋。”

Verse 3

न हि मे तृप्तिरस्तीह शृण्वतो युद्धमुत्तमम्‌ । तस्मादातायनेरयुद्धं सौभद्रस्थ च शंस मे,इस समय इस उत्तम युद्ध-वृत्तान्तको सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है; अतः: शल्य और सुभद्राकुमारके युद्धका वृत्तान्त मुझसे कहो

三阇耶说道:“即便我在此聆听,也仍不满足于这卓绝的战事叙述。因此,请将阿塔耶那之子沙利耶与娑婆陀罗之子(阿毗曼纽)交战的经过,细细告知于我。”

Verse 4

संजय उवाच सादितं प्रेक्ष्य यन्तारं शल्य: सर्वायसीं गदाम्‌ | समुत्क्षिप्प नदन्‌ क्रुद्ध: प्रचस्कन्द रथोत्तमात्‌

三阇耶说道:“见自己的御者被击倒,沙利耶怒火冲天,抓起一柄通体铁铸的巨槌,高高举起,怒吼着从那上等战车上一跃而下。”

Verse 5

संजयने कहा--राजन्‌! राजा शल्य अपने सारथिको मारा गया देख कुपित हो उठे और पूर्णतः लोहेकी बनी हुई गदा उठाकर गर्जते हुए अपने उत्तम रथसे कूद पड़े ।। त॑ दीप्तमिव कालाग्निं दण्डहस्तमिवान्तकम्‌ | जवेनाभ्यपतद्‌ भीम: प्रगृह् महतीं गदाम्‌,उन्हें प्रलयकालकी प्रज्वलित अग्नि तथा दण्डधारी यमराजके समान आते देख भीमसेन विशाल गदा हाथमें लेकर बड़े वेगसे उनकी ओर दौड़े

三阇耶说道:“大王啊,沙利耶王见自己的御者被杀,怒焰顿起;他咆哮着抓起一柄巨大的铁槌,从那上等战车上一跃而下。毗摩见他逼来,犹如劫末炽燃之火,又如执罚杖的死神,便握紧自己的巨槌,以惊人的速度迎面冲去。”

Verse 6

सौभद्रो5प्यशनिप्रख्यां प्रगृह्ा महतीं गदाम्‌ । एह्टोहीत्यब्रवीच्छल्यं यत्नाद्‌ भीमेन वारित:,उधरसे अभिमन्यु भी वज्जके समान विशाल गदा हाथमें लेकर आ पहुँचा और “आओ, आओ' कहकर शल्यको ललकारने लगा। उस समय भीमसेनने बड़े प्रयत्नसे उसको रोका

三阇耶说道:苏跋陀罗之子阿毗曼纽亦挺身而出,举起一柄巨大的钉锤,宛如霹雳雷霆。他高呼“来!来!”,向沙利耶发起挑战。然而毗摩塞那费尽力气将他按住——昭示即便在战火狂怒之中,勇武也须受纪律与有序交战之法所统摄。

Verse 7

वारयित्वा तु सौभद्रं भीमसेन: प्रतापवान्‌ । शल्यमासाद्य समरे तस्थौ गिरिरिवाचल:,सुभद्राकुमार अभिमन्युको रोककर प्रतापी भीमसेन राजा शल्यके पास जा पहुँचे और समरभूमिमें पर्वतके समान अविचल भावसे खड़े हो गये

三阇耶说道:毗摩塞那这位威猛之士先将苏跋陀罗之子(阿毗曼纽)拦住,继而在战场上逼近沙利耶,巍然立定,纹丝不动,如同山岳——在兵戈纷乱中显出不移的决心,亦显其不退不避、直面强敌之责。

Verse 8

तथैव मद्रराजो5पि भीम॑ दृष्टवा महाबलम्‌ | ससाराभिमुखस्तूर्ण शार्दूल इव कुज्जरम्‌,इसी प्रकार मद्रराज शल्य भी महाबली भीमसेनको देखकर तुरंत उन्हींकी ओर बढ़े, मानो सिंह किसी गजराजपर आक्रमण कर रहा हो

三阇耶说道:同样,摩陀罗王沙利耶见到大力的毗摩,便立刻迎面疾冲而去,犹如猛虎扑向巨象。此偈凸显战士的好战决意与凶猛冲势——强者在战场上总要寻觅配得上的对手。

Verse 9

ततस्तूर्यनिनादाश्न शड्खानां च सहस्रश: । सिंहनादाश्न संजज्ञुभेरीणां च महास्वना:,उस समय सहस्रों रणवाद्यों और शंखोंके शब्द वहाँ गूँज उठे। वीरोंके सिंहनाद प्रकट होने लगे और नगाड़ोंके गम्भीर घोष सर्वत्र व्याप्त हो गये

三阇耶说道:随即,战号齐鸣,千百海螺之声轰然回荡。诸勇士发出狮吼,巨鼓的沉雷滚滚铺满四方——这不祥的武烈浪潮既鼓舞胆气,也预告着即将展开的滔天杀伐。

Verse 10

पश्यतां शतशो हाासीदन्योन्यमभिधावताम्‌ । पाण्डवानां कुरूणां च साधु साध्विति नि:स्वन:,एक दूसरेकी ओर दौड़ते हुए सैकड़ों दर्शकों, कौरवों और पाण्डवोंके साधुवादका महान्‌ शब्द वहाँ सब ओर गूँजने लगा

三阇耶说道:当他们在数百观者眼前相向奔突之时,潘度族与俱卢族两边同时爆发出震天的喝彩:“善哉!善哉!”声浪四面回响。此景昭示:纵在战争的道德幽暗之中,武艺与胆魄仍被公开称颂,甚至出自彼此为敌的阵营。

Verse 11

न हि मद्राधिपादन्य: सर्वराजसु भारत | सोदुमुत्सहते वेगं भीमसेनस्य संयुगे,भरतनन्दन! समस्त राजाओंमें मद्रराज शल्यके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं था, जो युद्धमें भीमसेनके वेगको सहनेका साहस कर सके

三阇耶说道:“噢,婆罗多啊!在诸王之中,除摩陀罗之主沙利耶外,再无人有勇气在战阵中承受毗摩塞那的冲击之势;噢,婆罗多族之欢悦者!”

Verse 12

तथा मद्राधिपस्यापि गदावेगं महात्मन: । सोढुमुत्सहते लोके युधि को<5न्यो वृकोदरात्‌,इसी प्रकार संसारमें भीमसेनके सिवा दूसरा कौन ऐसा वीर है, जो युद्धमें महामनस्वी मद्रराज शल्यकी गदाके वेगको सह सकता है

三阇耶说道:“同样,在这世间、在战场之上,除弗利拘陀罗(毗摩)之外,又有谁能承受摩陀罗之主、大心者沙利耶那柄钉锤的奔腾之力?”

Verse 13

पट्टै्जाम्बूनदैर्बद्धा बभूव जनहर्षणी । प्रजज्वाल तदा5<5विद्धा भीमेन महती गदा,उस समय भीमसेनके द्वारा घुमायी गयी विशाल गदा सुवर्णपत्रसे जटित होनेके कारण अग्निके समान प्रज्वलित हो रही थी। वह वीरजनोंके हृदयमें हर्ष और उत्साहकी वृद्धि करनेवाली थी

三阇耶说道:“那柄巨大的钉锤以阎浮那陀金片缠束,令众武士心生欢悦。毗摩挥旋驱使之时,它便如烈火般炽然闪耀——在英雄们心中点燃喜悦与战意。”

Verse 14

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें अभिमन्युका पराक्रमविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ,तथैव चरतो मार्गान्‌ मण्डलानि च सर्वश: । महाविद्युत्प्रतिकाशा शल्यस्य शुशुभे गदा इसी प्रकार गदायुद्धके विभिन्न मार्गों और मण्डलोंसे विचरते हुए महाराज शल्यकी महाविद्युतके समान प्रकाशमान गदा बड़ी शोभा पा रही थी

三阇耶说道:“同样,当它循着钉锤格斗所规定的一切路数,遍行诸式、环转诸轮之时,沙利耶王的钉锤如巨大的闪电般辉耀,显得分外壮丽。”

Verse 15

तौ वृषाविव नर्दन्तौ मण्डलानि विचेरतु: । आवर्तितगदाशूज्रावुभौ शल्यवृकोदरौ,इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणाभिषेकपर्वणि शल्यापयाने पठचदशो<ध्याय: ।। २५ || इस प्रकार श्रीमह्ाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणाभिषेकपर्वमें शल्यका पलायनविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ

三阇耶说道:“二人如两头雄壮公牛般咆哮,沙利耶与弗利拘陀罗相互绕行成圈。二者皆迅疾而可畏,钉锤翻旋,伺机寻隙以施一击。”

Verse 16

वे शल्य और भीमसेन दोनों गदारूप सींगोंको घुमा-घुमाकर साँड़ोंकी भाँति गरजते हुए पैंतरे बदल रहे थे ।। मण्डलावर्तमार्गेषु गदाविहरणेषु च । निर्विशेषम भूद्‌ युद्ध तयो: पुरुषसिंहयो:,मण्डलाकार घूमनेके मार्गों (पैंतरों) और गदाके प्रहारोंमें उन दोनों पुरुषसिंहोंकी योग्यता एक-सी जान पड़ती थी

三阇耶说道:舍利耶与毗摩塞那二人,挥旋钉锤如一对长角雄牛,咆哮着变换身势,绕圈寻隙以取上风。在那环行的步法与钉锤的操持、挥击之间,这两位如狮般的勇士较量,竟显得势均力敌。

Verse 17

ताडिता भीमसेनेन शल्यस्य महती गदा । साग्निज्वाला महारीद्रा तदा तूर्णमशीर्यत,उस समय भीमसेनकी गदासे टकराकर शल्यकी विशाल एवं महाभयंकर गदा आगकी चिनगारियाँ छोड़ती हुई तत्काल छिन्न-भिन्न होकर बिखर गयी

三阇耶说道:被毗摩塞那击中后,舍利耶那巨大而可怖的钉锤——迸射火星如烈焰——当即粉碎,四散飞落。

Verse 18

तथैव भीमसेनस्य द्विषताभिहता गदा । वर्षाप्रदोषे खद्योतैर्व॒तो वृक्ष इवाबभौ,इसी प्रकार शत्रुके आघात करनेपर भीमसेनकी गदा भी चिनगारियाँ छोड़ती हुई वर्षाकालकी संध्याकें समय जुगनुओंसे जगमगाते हुए वृक्षकी भाँति शोभा पाने लगी

三阇耶说道:同样地,毗摩塞那的钉锤在与敌相击时,因迸出火星而熠熠生辉——宛如雨季黄昏的一株大树,周遭萤火闪烁。

Verse 19

गदा क्षिप्ता तु समरे मद्रराजेन भारत | व्योम दीपयमाना सा ससूजे पावकं मुहुः,भारत! तब मद्रराज शल्यने समरभूमिमें दूसरी गदा चलायी, जो आकाशको प्रकाशित करती हुई बारंबार अंगारोंकी वर्षा कर रही थी

三阇耶说道:噢,婆罗多啊!战阵正酣之际,摩陀罗王舍利耶掷出一柄钉锤。它在空中燃耀,照亮苍穹,屡屡仿佛洒下火一般的星火雨。

Verse 20

तथैव भीमसेनेन द्विषते प्रेषिता गदा । तापयामास तत्‌ सैन्यं महोल्का पतती यथा,इसी प्रकार भीमसेनने शत्रुको लक्ष्य करके जो गदा चलायी थी, वह आकाशसे गिरती हुई बड़ी भारी उल्काके समान कौरव-सेनाको संतप्त करने लगी

三阇耶说道:同样地,毗摩塞那掷向敌人的钉锤,开始灼烧俱卢军阵,宛如一颗巨大的流星自天坠落。

Verse 21

ते गदे गदिनां श्रेष्ठौ समासाद्य परस्परम्‌ । श्वसन्त्यौ नागकन्ये वा ससृजाते विभावसुम्‌,वे दोनों गदाएँ गदाधारियोंमें श्रेष्ठ भीमसेन और शल्यको पाकर परस्पर टकराती हुई फुफकारती नागकन्याओंकी भाँति अग्निकी सृष्टि करती थीं

三阇耶说道:那两柄铁锤——由使锤之中最为卓绝者所挥——迎面相撞。相击之时,仿佛蛇女嘶嘶作响,又似喷吐烈焰,使战场的可怖景象与由忿怒交战所生的毁灭更为炽烈。

Verse 22

नखैरिव महाव्याप्रौ दनतैरिव महागजौ । तौ विचेरतुरासाद्य गदाग्रया भ्यां परस्परम्‌,जैसे दो बड़े व्याप्र पंजोंसे और दो विशाल हाथी दाँतोंसे आपसमें प्रहार करते हैं, उसी प्रकार भीमसेन और शल्य गदाओंके अग्रभागसे एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए विचर रहे थे

三阇耶说道:如两头猛虎以利爪相击,又如两头巨象以长牙相挑,毗摩塞那与舍利耶逼近彼此,盘旋周旋,各以铁锤前端互相猛击——此乃战争凶暴之象:在那一刻,决定胜负的不是道义劝说,而是力量与决心。

Verse 23

ततो गदाग्राभिहतौ क्षणेन रुधिरोक्षितौ | ददृशाते महात्मानौ किंशुकाविव पुष्पितौ,एक ही क्षणमें गदाके अग्रभागसे घायल होकर वे दोनों महामनस्वी वीर खूनसे लथपथ हो फूलोंसे भरे हुए दो पलाश वृक्षोंके समान दिखायी देने लगे

三阇耶说道:随后只在一瞬之间,两位大心之勇士被铁锤前端击中,浑身血染,望去宛如两株盛放的金舒迦树(帕拉沙树)。此偈揭示战争的惨烈反讽:看似“花开”的艳丽,其实是溅洒鲜血的猩红,提醒听者——勇武与暴烈常被视觉所粉饰,而其所指向的却是痛苦与死亡。

Verse 24

शुश्रुवे दिक्षु सर्वासु तयो: पुरुषसिंहयो: । गदाभिघातसंह्ाद: शक्राशनिरवोपम:,उन दोनों पुरुषसिंहोंकी गदाओंके टकरानेका शब्द इन्द्रके वजकी गड़गड़ाहटके समान सम्पूर्ण दिशाओंमें सुनायी देता था

三阇耶说道:四方八面皆闻那两位狮子般的男子以铁锤相击之轰鸣,宛如因陀罗金刚杵的雷震回响。此偈加重了决斗的道义分量:那撞击之声不仅是肉体的噪响,更是战争巨力向周遭世界扩散的征兆。

Verse 25

गदया मद्रराजेन सव्यदक्षिणमाहत: । नाकम्पत तदा भीमो भिद्यमान इवाचल:,उस समय मद्रराजकी गदासे बायें-दायें चोट खाकर भी भीमसेन विचलित नहीं हुए। जैसे पर्वत वजका आघात सहकर भी अविचलभावसे खड़ा रहता है

三阇耶说道:被摩陀罗王的铁锤左右连击,毗摩却丝毫不动摇。纵使遭受重击,他仍如不为所撼的高山般屹立——显出战士在战场暴烈之中的坚忍不拔。

Verse 26

तथा भीमगदावेगैस्ताड्यमानो महाबल: । धैर्यान्मद्राधिपस्तस्थौ वजैर्गिरिरिवाहत:,इसी प्रकार भीमसेनकी गदाके वेगसे आहत होकर महाबली मद्रराज वज्राघातसे पीड़ित पर्वतकी भाँति धैर्यपूर्वक खड़े रहे

三阇耶说道:被毗摩之钉锤挟着奔涌之势猛然击中,强大的摩陀罗王仍不动摇;凭借坚忍与定力,他稳立如山,仿佛群峰遭金刚雷霆反复轰击而不崩。

Verse 27

आपेततुर्महावेगौ समुच्छितगदावुभौ । पुनरन्तरमार्गस्थौ मण्डलानि विचेरतु:,वे दोनों महावेगशाली वीर गदा उठाये एक-दूसरेपर टूट पड़े। फिर अन्तर्मार्गमें स्थित हो मण्डलाकार गतिसे विचरने लगे

三阇耶说道:两位勇士各举钉锤,挟着惊人的劲势相向猛扑;继而在近身的内圈占位,开始环绕而行,如轮如环,试探破绽,等待一击之机。

Verse 28

अथाप्लुत्य पदान्यष्टौ संनिपत्य गजाविव । सहसा लोहदण्डाभ्यामन्योन्यमभिजष्नतु:,तत्पश्चात्‌ आठ पग चलकर दोनों दो हाथियोंकी भाँति परस्पर टूट पड़े और सहसा लोहेके डंडोंसे एक-दूसरेको मारने लगे

三阇耶说道:随后二人纵身前跃八步,像两头暴怒的象般迎面相撞;顷刻之间,便以铁杖互相猛击。

Verse 29

तौ परस्परवेगाच्च गदाभ्यां च भूशाहतौ । युगपत पेततुर्वीरौ क्षिताविन्द्रध्वजाविव,वे दोनों वीर परस्परके वेगसे और गदाओंद्वारा अत्यन्त घायल हो दो इन्द्रध्वजोंके समान एक ही समय पृथ्वीपर गिर पड़े

三阇耶说道:二人既被彼此冲撞之势所摧,又遭钉锤重创,伤势惨烈,竟同时仆倒在地,宛如两面因陀罗战旗在同一刻轰然倒塌。

Verse 30

ततो विह्वलमान त॑ नि:श्वसन्तं पुन: पुन: । शल्यमभ्यपतत्‌ तूर्ण कृतवर्मा महारथ:,उस समय शल्य अत्यन्त विह्लल होकर बारंबार लम्बी साँस खींच रहे थे। इतनेहीमें महारथी कृतवर्मा तुरंत राजा शल्यके पास आ पहुँचा

三阇耶说道:那时,舍利耶心神恍惚,反复长长喘息;就在此刻,大车战士克利多伐摩疾驰而来,赶到他身旁。

Verse 31

दृष्टवा चैनं महाराज गदयाभिनिपीडितम्‌ । विचेष्टन्तं यथा नागं मूर्च्छयाभिपरिप्लुतम्‌,महाराज! आकर उसने देखा कि राजा शल्य गदासे पीड़ित एवं मूच्छासे अचेत हो आहत हुए नागकी भाँति छटपटा रहे हैं

三阇耶说道:“大王啊,见他被钉锤重击压制,似蛇般扭动挣扎,昏厥之势覆压如沉没其中——众武士都目睹了这一击所带来的惨烈后果。”

Verse 32

ततः स्वरथमारोप्य मद्राणामधिपं रणे । अपोवाह रणात्‌ तूर्ण कृतवर्मा महारथ:,यह देख महारथी कृतवर्मा युद्धस्थलमें मद्रराज शल्यको अपने रथपर बिठाकर तुरंत ही रणभूमिसे बाहर हटा ले गया

三阇耶说道:随后,在战阵之中,大车战士克利多伐摩将摩陀罗之主——沙利耶——扶上自己的战车,迅速载他离开战场。

Verse 33

क्षीबवद्‌ विह्नललो वीरो निमेषात्‌ पुनरुत्थित: । भीमो<पि सुमहाबाहुर्गदापाणिरदृश्यत,तदनन्तर महाबाहु वीर भीमसेन भी मदोन्मत्तकी भाँति विह्लल हो पलक मारते-मारते उठकर खड़े हो गये और हाथमें गदा लिये दिखायी देने लगे

三阇耶说道:那勇士如醉者踉跄,却在一眨眼间又复起身。随后,臂力无双的毗摩也被看见手执钉锤,重新站立于阵前。

Verse 34

ततो मद्राधिपं दृष्टवा तव पुत्रा: पराड्मुखम्‌ । सनागपत्त्यश्वरथा: समकम्पन्त मारिष,आर्य! उस समय मद्रराज शल्यको युद्धसे विमुख हुआ देख हाथी, घोड़े, रथ और पैदल-सेनाओंसहित आपके सारे पुत्र भयसे काँप उठे

三阇耶说道:这时,见摩陀罗之主沙利耶背离战斗,你的诸子连同象兵、步兵、马兵与战车部队,都因恐惧而战栗。

Verse 35

ते पाण्डवैर््यमानास्तावका जितकाशिभि: । भीता दिशो<न्वपद्यन्त वातनुन्ना घना इव,विजयसे सुशोभित होनेवाले पाण्डवोंद्वारा पीड़ित हो आपके सभी सैनिक भयभीत हो हवाके उड़ाये हुए बादलोंकी भाँति चारों दिशाओंमें भाग गये

三阇耶说道:在光耀胜势的般度五子逼迫驱逐之下,你的军队惊惧失措,四散奔逃,宛如云团被狂风吹散推移。

Verse 36

निर्जित्य धार्तराष्ट्रांस्तु पाण्डवेया महारथा: । व्यरोचन्त रणे राजन्‌ दीप्यमाना इवाग्नय:,राजन्‌! इस प्रकार आपके पुत्रोंकी जीतकर महारथी पाण्डव प्रज्वलित अग्नियोंकी भाँति रणक्षेत्रमें प्रकाशित होने लगे

三阇耶说道:大王啊,战胜持国之子之后,般度族的诸位大车战士在战场上光辉夺目,犹如熊熊烈火——此喻昭示:战争中的胜利会化作可见的勇武与士气,然而这场冲突依旧背负沉重的道义之重,并带来毁灭。

Verse 37

सिंहनादान्‌ भृशं चक्र: शड्खान्‌ द्मुश्न हर्षिता: । भेरीक्ष वादयामासुर्मुदड्भां श्षानके: सह,उन्होंने हर्षित होकर बारंबार सिंहनाद किये और बहुत-से शंख बजाये; साथ ही उन्होंने भेरी, मृदंग और आनक आदि वाद्योंको भी बजवाया

三阇耶说道:他们欢欣鼓舞,屡屡发出如狮吼般的战呼,又吹响许多海螺号角;并且一齐擂动战鼓、mṛdaṅga鼓与ānaka鼓。此景昭示他们有意激起军中斗志,凝聚众心,以迎接将至的冲撞。

Frequently Asked Questions

The chapter frames a dharma-sankat between pursuing a high-value objective (pressing toward the opposing king) and the responsibility to limit destabilization: commanders weigh decisive pressure against the risks of chaos, misrecognition, and disproportionate harm under reduced visibility.

Effectiveness is shown as conditional on discipline: coordinated protection, timely interception, and controlled withdrawal can be ethically and strategically superior to uncontrolled pursuit, especially when fear and rumor threaten collective judgment.

No explicit phalaśruti appears; the meta-significance is conveyed narratively through Sañjaya’s reportage—how perception (arrow-darkness, dust, sunset) alters decision-making and why preserving command integrity becomes a central measure of dharmic action.