
Ulūpī–Citravāhinī Saṃvāda: Dhanaṃjaya-patana and Prāya-threat
Upa-parva: Āśvamedha-anuyāna (Sacrificial Horse Campaign) Episode
Vaiśaṃpāyana reports a sudden collapse: the lotus-eyed queen (Citravāhinī) laments intensely and faints from grief upon seeing Arjuna fallen on the battlefield. Regaining consciousness, she addresses Ulūpī, identifying Arjuna as slain ‘for your sake’ by her own young son, and challenges Ulūpī’s standing as dharma-knowing and devoted-wife (pativratā) given the outcome. She reframes the situation as a comprehensive fault that must be resolved through forgiveness and immediate restoration: she petitions Ulūpī to revive Dhanaṃjaya. The queen clarifies that her grief is not centered on the slain son but on the husband whose ‘hospitality’ (ātithya) has been repaid with death. Approaching Arjuna’s body, she urges him to rise and continue the Aśvamedha duty—pursuing the yajña-horse—since the Kurus’ lives depend upon him. She reiterates the accusation toward Ulūpī, yet also asserts that multiple wives are not inherently a male fault and urges Ulūpī not to hold a distorted view. She invokes an enduring, divinely-ordained bond of friendship, then issues an ultimatum: if Ulūpī does not show Arjuna alive that day, she will undertake prāya (fasting unto death). The chapter ends with her sitting in silent resolve, observed by others.
Chapter Arc: जनमेजय के समक्ष वैशम्पायन मणिपुर-राज्य का दृश्य रखते हैं: युधिष्ठिर के अश्वमेध का यज्ञीय अश्व लेकर अर्जुन सीमा पर आता है, और पुत्र बभ्रुवाहन ब्राह्मणों को आगे कर धन-दान सहित विनय से स्वागत करने निकल पड़ता है। → अर्जुन, क्षत्रधर्म का स्मरण कर, इस ‘सामनीति’ वाले स्वागत को अपमान मानता है। वह पुत्र को झिड़कता है—यज्ञीय अश्व की रक्षा करते हुए मैं युद्ध के लिए आया हूँ; अतिथि-सत्कार नहीं, रण-आह्वान चाहिए। पिता-पुत्र के बीच धर्म की परिभाषा पर टकराव तीखा होता जाता है और अंततः युद्ध अनिवार्य बन जाता है। → रण में अर्जुन दिव्य बाणों से बभ्रुवाहन के रथ का स्वर्ण-ध्वज काट गिराता है, पर प्रत्युत्तर में बभ्रुवाहन का घातक बाण अर्जुन के मर्म में प्रवेश कर उसे धराशायी कर देता है। विजयी पुत्र भी उसी क्षण मोह/मूर्च्छा में गिर पड़ता है। → अर्जुन के पतन का समाचार अंतःपुर तक पहुँचते ही शोक का विस्फोट होता है; चित्रांगदा (मणिपुर-नरेश की माता/अंतःपुर की प्रमुख) काँपती-रोती हुई निहत-से पड़े अर्जुन को देखती है। युद्ध-उत्साह का स्थान करुणा ले लेती है और सभा-भूमि शोक-भूमि बन जाती है। → अर्जुन अचेत/धराशायी है, बभ्रुवाहन भी मूर्च्छित—अब प्रश्न यह है कि यज्ञीय अश्व का मार्ग, पिता का प्राण, और पुत्र का धर्म—इन तीनों का समाधान किस उपाय से होगा?
Verse 1
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! मणिपुरनरेश बशभ्रुवाहनने जब सुना कि मेरे पिता आये हैं, तब वह ब्राह्मणोंको आगे करके बहुत-सा धन साथमें लेकर बड़ी विनयके साथ उनके दर्शनके लिये नगरसे बाहर निकला
毗湿摩波耶那说道:“噢,阇那梅阇耶!当摩尼补罗之王跋布卢婆诃那听闻我父已至,便出城相迎。他令婆罗门走在前列,携带丰厚财物,以极其谦恭之态前往拜见致敬。”
Verse 2
मणिपूरेश्वरं त्वेवमुपयातं धनंजय: । नाभ्यनन्दत् स मेधावी क्षत्रधर्ममनुस्मरन्,मणिपुर-नरेशको इस प्रकार आया देख परम बुद्धिमान् धनंजयने क्षत्रिय-धर्मका आश्रय लेकर उसका आदर नहीं किया
毗湿摩波耶那说道:当摩尼补罗之主如此前来时,智者檀那ंज耶(阿周那)谨记刹帝利之法,并未以礼相迎、加以尊崇。念及武士本分,他收敛客套,使这次相会依正当的武德与战法而行,而非出于私人的谦让。
Verse 3
उवाच च स धर्मात्मा समन्यु: फाल्गुनस्तदा । प्रक्रियेयं न ते युक्ता बहिस्त्व॑ क्षत्रधर्मत:,उस समय धर्मात्मा अर्जुन कुछ कुपित होकर बोले--“बेटा! तेरा यह ढंग ठीक नहीं है। जान पड़ता है, तू क्षत्रिय-धर्मसे बहिष्कृत हो गया है
当时,持法的法尔古那(阿周那)含怒说道:“孩子!你这般行止不合礼法。看来你已落在刹帝利之道之外了。”
Verse 4
संरक्ष्यमाणं तुरगं यौधिष्ठिरमुपागतम् । यज्ञियं विषयान्ते मां नायौत्सी: कि नु पुत्रक,“पुत्र! मैं महाराज युधिष्ठिरके यज्ञ-सम्बन्धी अश्वकी रक्षा करता हुआ तेरे राज्यके भीतर आया हूँ। फिर भी तू मुझसे युद्ध क्यों नहीं करता?
毗湿摩波耶那说道:“孩子!我护卫着由提湿陀罗祭礼之马,依仪式进入了你国的边境。可你,我儿,为何不向我发起战斗的挑战?”
Verse 5
धिक् त्वामस्तु सुद्दुर्बुद्धिं क्षत्रधर्मबहिष्कृतम् । यो मां युद्धाय सम्प्राप्तं साम्नैव प्रत्यगृह्नथा:
可耻啊你——心智乖谬,被逐出刹帝利之法——我前来求战,你却只用和解的软语来阻我。
Verse 6
“तुझ दुर्बुद्धिको धिक्कार है, तू निश्चय ही क्षत्रियधर्मसे भ्रष्ट हो गया है, क्योंकि युद्धके लिये आये हुए मेरा स्वागत-सत्कार तू सामनीतिसे कर रहा है ।। न त्वया पुरुषार्थो हि कश्चिदस्तीह जीवता । यस्त्व॑ स्त्रीवद् यथाप्राप्तं मां साम्ना प्रत्यगृह्नथा:,“तूने संसारमें जीवित रहकर भी कोई पुरुषार्थ नहीं किया। तभी तो एक स्त्रीकी भाँति तू यहाँ युद्धके लिये आये हुए मुझे शान्तिपूर्वक साथ लेनेके लिये चेष्टा कर रहा है
“可耻你这乖谬之智!你确已背离刹帝利之法:我为战而来,你却想以怀柔之策来迎受并笼络我。实则你活在世上,却从未有过半分男子的奋发;所以你像女子一般,想用平和的劝说来收取我这按本来面目而来(为交战)的人。”
Verse 7
यद्य॒हं न््यस्तशस्त्रस्त्वामागच्छेयं सुदुर्मते । प्रक्रियेयं भवेद् युक्ता तावत् तव नराधम,“दुर्बद्धे! नराधम! यदि मैं हथियार रखकर खाली हाथ तेरे पास आता तो इस ढंगसे मिलना ठीक हो सकता था”
毗湿摩波耶那说:“若我卸下兵刃、空手来见你这恶心之人,那么这种接待方式或可算合宜——至少对你这人中最下者而言。”
Verse 8
तमेवमुक्तं भर्त्रा तु विदित्वा पन्नगात्मजा | अमृष्यमाणा भिन्त्वोर्वीमुलूपी समुपागमत्,पतिदेव अर्जुन जब अपने पुत्र बभ्रुवाहनसे ऐसी बात कह रहे थे, उस समय नागकन्या उलूपी उस बातको सुनकर उनके अभिप्रायको जान गयी और उनके द्वारा किये गये पुत्रके तिरस्कारको सहन न कर सकनेके कारण वह धरती छेदकर वहाँ चली आयी
毗湿摩波耶那说:丈夫如此言说时,蛇族少女乌卢毗洞悉其意。她不能忍受对儿子的轻辱,便裂地而出,立刻来到那里。
Verse 9
सा ददर्श ततः पुत्र विमृशन््तमधोमुखम् । संतर्ज्यमानमसकृत् पित्रा युद्धार्थिना प्रभो,प्रभो! उसने देखा कि पुत्र बभ्रुवाहन नीचे मुँह किये किसी सोच-विचारमें पड़ा हुआ है और युद्धार्थी पिता उसे बारंबार डाँट-फटकार रहे हैं। तब मनोहर अंगोंवाली नागकन्या उलूपी धर्म-निपुण बभ्रुवाहनके पास आकर यह धर्मसम्मत बात बोली--
毗湿摩波耶那说:她随即看见儿子低首垂面,陷于忧惧的思量;而那渴望交战的父亲却一再呵斥他。此时,肢体娟美、通晓法度的那伽少女乌卢毗走近跋婆卢婆诃那,说出了合乎正法之言。
Verse 10
ततः सा चारुसर्वाज्री समुपेत्योरगात्मजा । उलूपी प्राह वचन धर्म्य धर्मविशारदम्,प्रभो! उसने देखा कि पुत्र बभ्रुवाहन नीचे मुँह किये किसी सोच-विचारमें पड़ा हुआ है और युद्धार्थी पिता उसे बारंबार डाँट-फटकार रहे हैं। तब मनोहर अंगोंवाली नागकन्या उलूपी धर्म-निपुण बभ्रुवाहनके पास आकर यह धर्मसम्मत बात बोली--
于是,蛇族所生、肢体娟丽的乌卢毗走上前来,对那位通晓法(dharma)者说出一番合乎正法、与达摩相应的话。就情境而言,她见到巴卜鲁瓦哈那垂首沉思,而其父嗜战心切,屡屡呵斥;因此她出面劝谏,以伦理之责为据。
Verse 11
उलूपीं मां निबोध त्वं मातरं पन्नगात्मजाम् | कुरुष्व वचन पुत्र धर्मस्ते भविता पर:,“बेटा! तुम्हें विदित होना चाहिये कि मैं तुम्हारी विमाता नागकन्या उलूपी हूँ। तुम मेरी आज्ञाका पालन करो। इससे तुम्हें महान् धर्मकी प्राप्ति होगी”
毗湿摩耶那说道:“孩子,你当知我乃乌卢毗——你的母亲,出自那伽族的女儿。听从我的训令吧,孩子;如此行之,更高的法(dharma)必将归于你。”
Verse 12
युध्यस्वैनं कुरुश्रेष्ठ पितरं युद्धदुर्मदम् । एवमेष हि ते प्रीतो भविष्यति न संशय:,“तुम्हारे पिता कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर और युद्धके मदसे उन्मत्त रहनेवाले हैं। अतः इनके साथ अवश्य युद्ध करो। ऐसा करनेसे ये तुमपर प्रसन्न होंगे। इसमें संशय नहीं है”
毗湿摩耶那说道:“与他交战吧,库鲁之最——那正是你的父亲,因战斗的傲气而沉醉。如此行之,他必定会悦纳于你;毫无疑问。”
Verse 13
एवं दुर्मर्षितो राजा स मात्रा बश्रुवाहन: । मनश्षक्रे महातेजा युद्धाय भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! माताके द्वारा इस प्रकार अमर्ष दिलाये जानेपर महातेजस्वी राजा बभ्रुवाहनने मन-ही-मन युद्ध करनेका निश्चय किया
毗湿摩耶那说道:就这样,因母亲的激将而被刺痛得难以忍受,那位威光赫赫的国王巴卜鲁瓦哈那在心中决意投入战斗,噢,婆罗多族之雄牛。
Verse 14
संनहा काउ्चनं वर्म शिरस्त्राणं च भानुमत् । तूणीरशतसम्बाधमारुरोह रथोत्तमम्,सुवर्णमय कवच पहनकर तेजस्वी शिरस्त्राण (टोप) धारण करके वह सैकड़ों तरकसोंसे भरे हुए उत्तम रथपर आरूढ़ हुआ
毗湿摩耶那说道:他系上金色胸甲,戴上光辉夺目的头盔,登上那乘上等战车,车上挤满数百箭囊——这表明他已为即将到来的交锋整装待发,也显出战士依其本分而行的严整决心。
Verse 15
सर्वोपकरणोपेतं युक्तमश्वचिर्मनोजवै: । सचक्रोपस्करं श्रीमान् हेमभाण्डपरिष्कृतम्,उस रथमें सब प्रकारकी युद्ध-सामग्री सजाकर रखी गयी थी। मनके समान वेगशाली घोड़े जुते हुए थे। चक्र और अन्य आवश्यक सामान भी प्रस्तुत थे। सोनेके भाण्ड उसकी शोभा बढ़ाते थे। सुवर्णसे ही उस रथका निर्माण हुआ था। उसपर सिंहके चिह्नवाली ऊँची ध्वजा फहरा रही थी। उस परम पूजित उत्तम रथपर सवार हो श्रीमान् राजा बभ्रुवाहन अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़ा
毗湿摩波耶那说:那辆华美的战车已备齐一切战具,驾以疾如心念之骏马,车轮与诸般所需器具皆已就绪。金饰辉煌,又以金制器皿精加点缀,王者威仪灿然生光——为即将展开的合乎法度的对决而备;届时,一位国王将依义务与荣誉,前出迎战阿周那。
Verse 16
परमार्चितमुच्छित्य ध्वजं सिंहं हिरण्मयम् | प्रययौ पार्थमुद्दिश्य स राजा बभ्रुवाहन:,उस रथमें सब प्रकारकी युद्ध-सामग्री सजाकर रखी गयी थी। मनके समान वेगशाली घोड़े जुते हुए थे। चक्र और अन्य आवश्यक सामान भी प्रस्तुत थे। सोनेके भाण्ड उसकी शोभा बढ़ाते थे। सुवर्णसे ही उस रथका निर्माण हुआ था। उसपर सिंहके चिह्नवाली ऊँची ध्वजा फहरा रही थी। उस परम पूजित उत्तम रथपर सवार हो श्रीमान् राजा बभ्रुवाहन अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़ा
毗湿摩波耶那说:他高举那面至为尊崇的金色旗幡,其上绘有狮子之徽;巴布鲁瓦诃那王遂启程,志在迎战帕尔塔(阿周那)。此颂凸显王者出战前的庄严筹备——外在的华贵与武备的齐整,皆指向那场关乎命运的相逢,考验着义务、血脉与克制。
Verse 17
ततो<भ्येत्य हयं वीरो यज्ञियं पार्थरक्षितम् ग्राहयामास पुरुषैर्ठयशिक्षाविशारदै:,पार्थद्वारा सुरक्षित उस यज्ञसम्बन्धी अश्वके पास जाकर उस वीरने अश्वशिक्षाविशारद पुरुषोंद्वारा उसे पकड़वा लिया
随后,那位勇士走近由阿周那守护的祭祀之马,命精通驯马与控马之人将其擒住——此举昭示着对阿湿婆梅陀大祭之权威与神圣的直接挑战。
Verse 18
गृहीतं वाजिन दृष्टवा प्रीतात्मा स धनंजय: । पुत्र रथस्थं भूमिष्ठ: संन्यवारयदाहवे,घोड़ेको पकड़ा गया देख अर्जुन मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुए। यद्यपि वे भूमिपर खड़े थे तो भी रथपर बैठे हुए अपने पुत्रको युद्धके मैदानमें आगे बढ़नेसे रोकने लगे
毗湿摩波耶那说:见祭马已被夺取,檀那ंज耶(阿周那)心中暗自欢喜。虽他本人立于地上,却在战阵之中制止了乘车在上的儿子,不许其贸然前冲。
Verse 19
स तत्र राजा तं वीर॑ शरसंघैरनेकश: । अर्दयामास निशितैराशीविषविषोपमै:,राजा बभ्रुवाहनने वहाँ अपने वीर पिताको विषैले साँपोंके समान जहरीले और तेज किये हुए सैकड़ों बाण-समूहोंद्वारा बींधकर अनेक बार पीड़ित किया
毗湿摩波耶那说:在那里,国王屡次以箭雨攻逼那位英雄——箭锋锐利,毒烈如毒蛇——一次又一次穿刺其身,使他痛楚难当。此景昭示:在战阵的盲目与争胜之心中,纵是骨肉之情,也会被战争冷酷的势头所压倒。
Verse 20
तयो: समभवद् युद्ध पितु: पुत्रस्य चातुलम् । देवासुररणप्रख्यमुभयो: प्रीयमाणयो:,वे पिता और पुत्र दोनों प्रसन्न होकर लड़ रहे थे। उन दोनोंका वह युद्ध देवासुर-संग्रामके समान भयंकर जान पड़ता था। उसकी इस जगत्में कहीं भी तुलना नहीं थी
毗湿摩波耶那说道:于是父与子之间兴起了一场奇绝的战斗。二人皆以一种激昂的快意交锋,其搏杀之可怖,宛如天神与阿修罗的传说大战——此等遭遇,世间无处可比。
Verse 21
किरीटिनं प्रविव्याध शरेणानतपर्वणा । जन्रुदेशे नरव्याप्र॑ प्रहसन् बभ्रुवाहन:,बभ्रुवाहनने हँसते-हँसते पुरुषसिंह अर्जुनके गलेकी हँसलीमें झुकी हुई गाँठवाले एक बाणद्वारा गहरी चोट पहुँचायी
毗湿摩波耶那说道:巴布鲁瓦哈那放声大笑,以一支节处弯曲的箭射中戴冠的阿周那——人中之虎——贯穿其锁骨与颈侧之处,创伤深重。
Verse 22
सो<भ्यगात् सह पुड्खेन वल्मीकमिव पन्नगः । विनिर्भिद्य च कौन्तेयं प्रविवेश महीतलम्,जैसे साँप बाँबीमें घुस जाता है, उसी प्रकार वह बाण अर्जुनके शरीरमें पंखसहित घुस गया और उसे छेदकर पृथ्वीमें समा गया
毗湿摩波耶那说道:“那支箭羽犹在,疾驰如蛇入蚁丘。它贯穿昆蒂之子(阿周那)之后,又直没入地,消失于大地之中。”
Verse 23
स गाढवेदनो धीमानालम्ब्य धनुरुत्तमम् | दिव्यं तेज: समाविश्य प्रमीत इव सो5भवत्,इससे अर्जुनको बड़ी वेदना हुई। बुद्धिमान् अर्जुन अपने उत्तम धनुषका सहारा लेकर दिव्य तेजमें स्थित हो मुर्देके समान हो गये
毗湿摩波耶那说道:剧痛袭来,智者阿周那倚着他那上乘之弓。身入神圣光辉之中,他竟如同死去一般——被震慑而凝止不动。
Verse 24
स संज्ञामुपलभ्याथ प्रशस्य पुरुषर्षभ: । पुत्र शक्रात्मजो वाक्यमिदमाह महाद्युति:,थोड़ी देर बाद होशमें आनेपर महातेजस्वी पुरुषप्रवर इन्द्रकुमार अर्जुनने अपने पुत्रकी प्रशंसा करते हुए इस प्रकार कहा--
随后他恢复了神识,那位人中雄牛——光辉灿然的阿周那、因陀罗之子——称赞其子,并说道如下之言。
Verse 25
साधु साधु महाबाहो वत्स चित्राड़्रदात्मज । सदृशं कर्म ते दृष्टवा प्रीतिमानस्मि पुत्रक,“महाबाहु चित्रांगदाकुमार! तुम्हें साधुवाद। वत्स! तुम धन्य हो। पुत्र! तुम्हारे योग्य पराक्रम देखकर मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ
毗湿摩波耶那说道:“好!好!臂力无双的勇士啊——亲爱的孩子,奇特罗昂伽陀之子。见你所为,既合乎你的门第,也配得上你的德勇,我心中充满欢喜,我的儿啊。”
Verse 26
विमुज्चाम्येष ते बाणान् पुत्र युद्धे स्थिरो भव | इत्येवमुक्त्वा नाराचैरभ्यवर्षदमित्रहा,“अच्छा बेटा! अब मैं तुमपर बाण छोड़ता हूँ। तुम सावधान एवं स्थिर हो जाओ।” ऐसा कहकर शत्रुसूदन अर्जुनने बभ्रुवाहनपर नाराचोंकी वर्षा आरम्भ कर दी
毗湿摩波耶那说道:“我儿,如今我将这些箭射向你;战阵之中,当稳立不移。”说罢,阿周那——诛敌者——便以锋利的那罗迦箭矢如雨般倾泻向婆婆卢伐诃那。
Verse 27
तान् स गाण्डीवनिर्मुक्तान् वज़्ाशनिसमप्रभान् । नाराचानच्छिनद् राजा भल्लै:सर्वास्त्रिधा द्विधा,परंतु राजा बभ्रुवाहनने गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए वज और बिजलीके समान तेजस्वी उन समस्त नाराचोंको अपने भल्लोंद्वारा मारकर प्रत्येकके दो-दो, तीन-तीन टुकड़े कर दिये
毗湿摩波耶那说道:国王以自己的婆罗(bhalla)箭矢,将那从甘狄婆弓射出的那罗迦箭——光焰如金刚、如雷电——一一截断,使每支都裂为两段或三段。
Verse 28
तस्य पार्थ: शरैंदिव्यैर्ध्वजं हेमपरिष्कृतम् । सुवर्णतालप्रतिमं क्षुरेणापाहरद् रथात्,राजन्! तब पाण्डुपुत्र अर्जुनने हँसते हुए-से अपने क्षुर नामक दिव्य बाणोंद्वारा बभ्रुवाहनके रथसे सुनहरे तालवृक्षके समान ऊँची सुवर्णभूषित ध्वजा काट गिरायी। शत्रुदमन नरेश! साथ ही उन्होंने उसके महान् वेगशाली विशालकाय घोड़ोंके भी प्राण ले लिये
毗湿摩波耶那说道:随后,帕尔塔(阿周那)以神箭从战车上斩落那饰以黄金的旗幡——高耸如金色多罗树——以刃如剃刀的“刹罗”(kṣura)箭将其削断,噢,大王。就在同一迅疾的攻势中,他也击毙了对手那几匹强健而烈性的骏马。
Verse 29
हयांश्वास्य महाकायान् महावेगानरिंदम । चकार राजन् निर्जीवान् प्रहसन्निव पाण्डव:,राजन्! तब पाण्डुपुत्र अर्जुनने हँसते हुए-से अपने क्षुर नामक दिव्य बाणोंद्वारा बभ्रुवाहनके रथसे सुनहरे तालवृक्षके समान ऊँची सुवर्णभूषित ध्वजा काट गिरायी। शत्रुदमन नरेश! साथ ही उन्होंने उसके महान् वेगशाली विशालकाय घोड़ोंके भी प्राण ले लिये
毗湿摩波耶那说道:大王啊,制敌者啊,般度之子(阿周那)仿佛含笑一般,击倒了对手那些雄壮有力的骏马——体躯巨大、奔速如风——使之尽皆毙命。
Verse 30
स रथादवतीर्याथ राजा परमकोपन: । पदाति: पितरं क्रुद्धो योधयामास पाण्डवम्,तब रथसे उतरकर परम क्रोधी राजा बभ्रुवाहन कुपित हो पैदल ही अपने पिता पाण्डुपुत्र अर्जुनके साथ युद्ध करने लगा
毗湿摩耶那说道:于是那位国王被狂烈的怒火所吞没,从战车上跃下。改以步战,他愤然与自己的父亲——般度族的阿周那——交锋。此景昭示:一旦怒气失控,便能遮蔽孝敬与达摩,甚至使父子之情化作战场。
Verse 31
सम्प्रीयमाण: पार्थानामृषभ: पुत्रविक्रमात् । नात्यर्थ पीडयामास पुत्र वज्रधरात्मज:,दुन्तीपुत्रोंमें श्रेष्ठ इन्द्रकुमार अर्जुन अपने बेटेके पराक्रमसे बहुत प्रसन्न हुए थे। इसलिये वे उसे अधिक पीड़ा नहीं देते थे
毗湿摩耶那说道:阿周那,般陀族中的雄牛,亦是执金刚杵者因陀罗之子,见儿子英勇无比,心中大悦;因此并未过分逼迫或惩治那少年。此段彰显父亲的克制与分寸:赞许勇武,却以适度的训诫调和,而非严酷相加。
Verse 32
स मन्यमानो विमुखं पितरं बश्रुवाहन: । शरैराशीविषाकारै: पुनरेवार्दयद् बली,बलवान् बश्रुवाहन पिताको युद्धसे विरत मानकर विषधर सर्पोके समान विषैले बाणोंद्वारा उन्हें पुनः पीड़ा देने लगा
见父亲似欲退避战斗,强大的跋布罗婆诃那以为父亲不愿再战,便又以如毒蛇般的箭矢重新猛攻。此景表明:在战阵炽热之中,纵是父子之情,也可能被武士之道与自以为必须履行的责任所遮蔽。
Verse 33
ततः स बाल्यात् पितरं विव्याध हृदि पत्रिणा । निशितेन सुपुड्खेन बलवद् बश्रुवाहन:,उसने बालोचित अविवेकके कारण परिणामपर विचार किये बिना ही सुन्दर पाँखवाले एक तीखे बाणद्वारा पिताकी छातीमें एक गहरा आघात किया
随后,他因年少无知、未思后果,竟以一支羽翎齐整、锋利无比的箭,猛力射入自己父亲的胸膛。此事昭示:缺乏省察的行动——尤其当其由稚嫩的冲动而非明辨所驱使——足以酿成重创,并招致沉重的道德后果。
Verse 34
विवेश पाण्डवं राजन् मर्म भित्त्वातिदुःखकृत् । स तेनातिभशं विद्धः पुत्रेण कुरुनन्दन:
毗湿摩耶那说道:大王啊,那箭矢射入般度族勇士体内,穿破要害,带来极度痛楚。库鲁的王子因此重创——竟出自亲子之手——使伤及骨肉的苦涩重担与道义的煎熬,沉沉压在战后余波之中。
Verse 35
महीं जगाम मोहार्तस्ततो राजन् धनंजय: । राजन! वह अत्यन्त दुःखदायी बाण पाण्बुपुत्र अर्जुनके मर्म-स्थलको विदीर्ण करके भीतर घुस गया। महाराज! पुत्रके चलाये हुए उस बाणसे अत्यन्त घायल होकर कुरुनन्दन अर्जुन मूर्च्छित हो पृथ्वीपर गिर पड़े ।। तस्मिन् निपतिते वीरे कौरवाणां धुरंधरे
毗耶娑之弟子毗舍摩波耶那说道:于是,檀那阇耶(阿周那)为迷惘所夺,沉沉倒向大地,哦,国王。大王啊!那支极其痛苦的箭矢撕裂了般度之子阿周那的要害(marman),并深深贯入体内。陛下!被儿子所发之箭重创,俱卢之骄子阿周那昏厥倒地。当那位勇士——在俱卢族战士中堪称栋梁者——如此倒下时……
Verse 36
व्यायम्य संयुगे राजा दृष्टवा च पितरं हतम्,राजा बश्रुवाहन युद्धस्थलमें बड़ा परिश्रम करके लड़ा था। वह भी अर्जुनके बाणसमूहोंद्वारा पहलेसे ही बहुत घायल हो चुका था। अत: पिताको मारा गया देख वह भी युद्धके मुहानेपर अचेत होकर गिर पड़ा और पृथ्वीका आलिंगन करने लगा
毗舍摩波耶那说道:巴卜鲁瓦诃那王在战阵中竭力奋战;及见父亲被杀——他本已被阿周那的箭雨重创——便在交锋之际的边缘昏厥倒下。惊骇与疲惫压倒了他,他失去知觉,跌伏在地,紧抱大地不放。
Verse 37
पूर्वमेव स बाणौघचैर्गाढविद्धो<र्जुनेन ह पपात सो5पि धरणीमालिड्ग्य रणमूर्थनि,राजा बश्रुवाहन युद्धस्थलमें बड़ा परिश्रम करके लड़ा था। वह भी अर्जुनके बाणसमूहोंद्वारा पहलेसे ही बहुत घायल हो चुका था। अत: पिताको मारा गया देख वह भी युद्धके मुहानेपर अचेत होकर गिर पड़ा और पृथ्वीका आलिंगन करने लगा
毗舍摩波耶那说道:他早先便已被阿周那密集的箭矢深深贯穿。因此他也在战阵最前沿倒下,昏厥坠地,抱住大地——既为创伤所困,又为目睹父亲被杀的震骇所压倒。
Verse 38
भर्तरें निहतं दृष्टवा पुत्रं च पतितं भुवि | चित्राड्भदा परित्रस्ता प्रविवेश रणाजिरे,पतिदेव मारे गये और पुत्र भी संज्ञाशून्य होकर पृथ्वीपर पड़ा है। यह देख चित्रांगदाने संतप्त हृदयसे समरांगणमें प्रवेश किया
毗舍摩波耶那说道:见丈夫被杀、儿子又昏厥倒地,吉多罗安伽陀(Citrāṅgadā)在恐惧与悲恸中战栗,仍踏入了战场。
Verse 39
शोकसंतप्तहृदया रुदती वेपती भृशम् | मणिपूरपतेर्माता ददर्श निहतं पतिम्,मणिपुर-नरेशकी माताका हृदय शोकसे संतप्त हो उठा था! रोती और काँपती हुई चित्रांगदाने देखा कि पतिदेव मारे गये
毗舍摩波耶那说道:她的心被悲痛灼烧,哭泣不止,浑身剧烈颤抖;摩尼补罗之主的母亲看见自己的丈夫横陈为尸。
Verse 79
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अर्जुनबभ्रुवाहनयुद्धे एकोनाशीतितमो<ध्याय:
至此,《圣摩诃婆罗多》之《马祭篇》(Aśvamedhika Parva)中,尤以《阿努歌谛》(Anugītā)一段所载“阿周那与跋卜噜婆诃那之战”第七十九章告终。此结语(篇末题记)标明一段叙事的收束:以《阿努歌谛》的法义省思为框架,并并置战争中义务与亲缘所引发的后果。
Verse 356
सो<पि मोहं जगामाथ ततत्रित्राड्रदासुत: । कौरव-धुरंधर वीर अर्जुनके धराशायी होनेपर चित्रांगदाकुमार बश्रुवाहन भी मूर्च्छित हो गया
毗舍摩耶那曰:于是他也陷入迷惘。其时,质多罗伽陀之子跋卜噜婆诃那,见英勇的阿周那——担负俱卢(Kaurava)重任之最杰者——仆倒在地,亦随之昏厥倒下。
How to assign responsibility when relational counsel and familial action lead to lethal outcomes: the chapter stages a conflict between blame (culpability) and the dharmic demand for immediate restorative action to protect life and public duty.
Grief is acknowledged but must be ethically directed: the narrative privileges life-preserving remediation, forgiveness, and continuity of duty over prolonged recrimination, especially when communal stability depends on a key agent’s survival.
No explicit phalaśruti appears in these verses; the chapter’s meta-function is contextual—demonstrating how post-war dharma operates through restoration, ritual obligation, and regulated emotion rather than through doctrinal reward statements.