Adhyaya 74
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 7435 Versesपाण्डव पक्ष के लिए निर्णायक विजय; त्रिगर्तों का दमन और अधीनता।

Adhyaya 74

प्राग्ज्योतिषे वज्रदत्त-धनंजय-समागमः (Vajradatta Confronts Dhanaṃjaya at Prāgjyotiṣa)

Upa-parva: Aśvamedha-anugamana (Horse-Tracking Campaign Episodes)

Vaiśaṃpāyana reports that the consecrated horse enters Prāgjyotiṣa territory, prompting Vajradatta—Bhagadatta’s son and a battle-hardened ruler—to emerge and contest the intrusion (1–3). Arjuna (Dhanaṃjaya), recognizing the challenge, advances rapidly with Gāṇḍīva prepared, treating the encounter as a regulated engagement tied to the horse’s protection (4). Vajradatta is temporarily disoriented by Arjuna’s arrow-work, releases the horse, and charges Arjuna directly (5). He then re-enters the city to re-arm and returns mounted on a foremost elephant, accompanied by royal insignia (parasol and white fly-whisk), and issues a challenge shaped by youthful pride and confusion in combat (6–8). Vajradatta drives the massive elephant toward Arjuna’s white horse; the elephant is described as disciplined for warfare and violently energetic (9–11). Arjuna fights the elephant-mounted adversary from the ground, meeting the charge with controlled archery (12). Vajradatta hurls blazing tomara-spears; Arjuna intercepts and fragments them mid-air with Gāṇḍīva arrows (13–14). Vajradatta counters with arrow volleys; Arjuna replies with faster, gold-feathered shafts, wounding Vajradatta, who falls but retains composure (15–17). Remounting, Vajradatta renews the contest; Arjuna sends serpent-like arrows, severely wounding the elephant, which bleeds profusely and is likened to a mountain with many streams (18–20). The chapter emphasizes ritualized sovereignty-testing through calibrated martial display rather than annihilative warfare.

Chapter Arc: यज्ञ का पवित्र अश्व पाण्डव-सीमा पर आता है, और सीमा-रक्षक वीर उसे घेरकर पकड़ने को उद्यत हो उठते हैं—यज्ञ की शान्ति के भीतर युद्ध का बीज फूट पड़ता है। → त्रिगर्त-वीर रथों पर, बद्ध-तूणीरा और सुसज्जित अश्वों सहित, यज्ञाश्व को घेरते हैं। किरीटी अर्जुन उनके अभिप्राय को भाँपकर पहले सान्त्व-नीति से रोकना चाहता है, परन्तु प्रतिरोध बढ़ता जाता है और वाणी का पुल टूटने लगता है। → सूर्यवर्मा अर्जुन पर तीव्र, लघु-अस्त्र-प्रदर्शन सहित शर-वर्षा करता है; अर्जुन रक्त पोंछकर दिव्य धनुष उठाता है और विष-सदृश तीक्ष्ण बाणों से प्रतिघात कर त्रिगर्तों की पंक्तियाँ तोड़ देता है—यज्ञाश्व की रक्षा हेतु उसका क्रोध निर्णायक बन जाता है। → त्रिगर्त-सेना भगदड़ में टूटती है। पराजित राजागण विनीत होकर आज्ञा माँगते हैं; अर्जुन उन्हें जीवन-रक्षा का उपदेश देता है—‘प्राण बचाओ, शासन स्वीकार करो’—और यज्ञाश्व का मार्ग सुरक्षित कर देता है। → पराजितों का समर्पण तो हो गया, पर अश्व की आगे की यात्रा में कौन-सा नया राज्य चुनौती देगा—यह अनकहा रह जाता है।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वरमें अ्जुनिके द्वारा अश्वका अनुसरणविषयक तिह्तत्तववाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ७३ ॥। अपने-आप बछ। आर: 2 चतु:सप्ततितमो< ध्याय: अर्जुनके द्वारा त्रिगर्तोंकी पराजय वैशम्पायन उवाच त्रिगर्तैरभवद्‌ युद्ध कुतवैरै: किरीटिन: । महारथसमज्ञातैहतानां पुत्रनप्तृभि:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! कुरुक्षेत्रके युद्धमें जो त्रिगर्त वीर मारे गये थे, उनके महारथी पुत्रों और पौत्रोंने किरीटधारी अर्जुनके साथ वैर बाँध लिया था। त्रिगर्तदेशमें जानेपर अर्जुनका उन त्रिगर्तोंक साथ घोर युद्ध हुआ था

毗湿摩波耶那说道:大王啊,特里伽尔塔人——其勇士曾在俱卢之野大战中被杀——对头戴宝冠的阿周那怀下了既定的仇怨。那些阵亡者的儿子与孙子,皆以大车战士之名著称,承继了这份世仇;当阿周那进入特里伽尔塔国境时,他与特里伽尔塔人之间便爆发了惨烈的战斗。此段揭示:未得化解的哀痛与复仇,会在大战结束之后仍使暴力跨世代延续。

Verse 2

ते समाज्ञाय सम्प्राप्तं यज्ञियं तुरगोत्तमम्‌ । विषयान्तं ततो वीरा दंशिता: पर्यवारयन्‌,'पाण्डवोंका यज्ञसम्बन्धी उत्तम अश्व हमारे राज्यकी सीमामें आ पहुँचा है” यह जानकर त्रिगर्तीीर कवच आदिसे सुसज्जित हो पीठपर तरकस बाँधे सजे-सजाये अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर निकले और उस अश्वको उन्होंने चारों ओरसे घेर लिया। राजन! घोड़ेको घेरकर वे उसे पकड़नेका उद्योग करने लगे

毗湿摩波耶那说道:得知那匹用于祭祀的上等神圣之马已抵达他们疆界,诸勇士披甲备具,从四面将其围住。既已合围,他们便着手夺取此马,以此挑战祭礼及其所宣示的王权威令。

Verse 3

रथिनो बद्धतूणीरा: सदश्वैः समलंकृतै: । परिवार्य हयं राजन ग्रहीतुं सम्प्रचक्रमु:,'पाण्डवोंका यज्ञसम्बन्धी उत्तम अश्व हमारे राज्यकी सीमामें आ पहुँचा है” यह जानकर त्रिगर्तीीर कवच आदिसे सुसज्जित हो पीठपर तरकस बाँधे सजे-सजाये अच्छे घोड़ोंसे जुते हुए रथपर बैठकर निकले और उस अश्वको उन्होंने चारों ओरसे घेर लिया। राजन! घोड़ेको घेरकर वे उसे पकड़नेका उद्योग करने लगे

毗湿摩波耶那说道:那些车战士背负箭囊,乘坐装饰华美、以良驹驾挽的战车,围住了祭马。大王啊,既已合围,他们便着手夺取此马——此举昭示对般度族阿湿婆梅陀大祭的挑战,也考验着王权之“权”与“责”的边界。

Verse 4

ततः किरीटी संचिन्त्य तेषां तत्र चिकीर्षितम्‌ । वारयामास तान्‌ वीरान्‌ सान्त्वपूर्वमरिंदम:,शत्रुओंका दमन करनेवाले अर्जुन यह जान गये कि वे क्‍या करना चाहते हैं। उनके मनोभावका विचार करके वे उन्हें शान्तिपूर्वक समझाते हुए युद्धसे रोकने लगे

于是,冠冕在首的英雄阿周那沉思这些武士在此地意欲何为。洞察其内心所向后,这位降伏仇敌者便先以温和、调停之辞安抚劝说,力图制止他们投入战斗——宁取息兵之道,不急于以暴制暴。

Verse 5

तदनादृत्य ते सर्वे शरैरभ्यहनंस्तदा । तमोरजोभ्यां संछन्नांस्तान्‌ किरीटी न्यवारयत्‌,किंतु वे सब उनकी बातकी अवहेलना करके उन्हें बाणोंद्वारा चोट पहुँचाने लगे। तमोगुण और रजोगुणके वशीभूत हुए उन त्रिगर्तोंको किरीटीने युद्धसे रोकनेकी पूरी चेष्टा की

然而他们全都不顾他的劝告,当即以箭雨齐发加以攻击。那些特里伽尔塔人心为昏暗与躁动所蔽(即惰性与激性,tamas 与 rajas),被基里提——阿周那——竭力制止;他努力将他们拦在战斗之外——意在遏止其鲁莽的侵暴,而非仅以同样的暴烈回击。

Verse 6

तानब्रवीत्‌ ततो जिष्णु: प्रहसन्निव भारत । निवर्तध्वमधर्मज्ञा: श्रेयो जीवितमेव च,भारत! तदनन्तर विजयशील अर्जुन हँसते हुए-से बोले--'धर्मको न जाननेवाले पापात्माओ! लौट जाओ। जीवनकी रक्षामें ही तुम्हारा कल्याण है”

随后,吉什努(阿周那)仿佛带着一丝微笑对他们说道:“噢,婆罗多啊,退回去吧。你们这些不识达摩之人——你们真正的福祉,在于保全性命。”

Verse 7

स हि वीर: प्रयास्यन्‌ वै धर्मराजेन वारितः । हतबान्धवा न ते पार्थ हन्तव्या: पार्थिवा इति,वीर अर्जुनने ऐसा इसलिये कहा कि चलते समय धर्मराज युधिष्ठिरने यह कहकर मना कर दिया था कि “कुन्तीनन्दन! जिन राजाओंके भाई-बन्धु कुरुक्षेत्रके युद्धमें मारे गये हैं, उनका तुम्हें वध नहीं करना चाहिये”

毗舍波耶那说道:当英雄阿周那将要出发时,法王由提施提罗拦住他,说道:“噢,帕尔塔,你不可杀那些在战争中已失去兄弟亲族的诸王。”此言彰显战后之义:当以克制为德,不再向已因俱卢之野而蒙丧痛的君主增添血债。

Verse 8

स तदा तद्‌ वच: श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमतः । तान्‌ निवर्तध्वमित्याह न न्यवर्तन्त चापि ते,बुद्धिमान्‌ धर्मरमाजके इस आदेशको सुनकर उसका पालन करते हुए ही अर्जुनने त्रिगर्तोंकी लौट जानेकी आज्ञा दी तथापि वे नहीं लौटे

当时他听见睿智的法王之言,便遵命对他们说道:“退回去。”然而他们仍不肯退。此段强调正义命令的伦理分量,也显出当它被拒绝时所呈现的道德失序。

Verse 9

ततल्त्रिगर्तराजानं सूर्यवर्माणमाहवे । विचित्य शरजालेन प्रजहास धनंजय:,तब उस युद्धस्थलमें त्रिगर्तराज सूर्यव्माके सारे अंगोंमें बाण धँसाकर अर्जुन हँसने लगे

就在那战场之上,檀那阇耶(阿周那)点名挑出特里伽尔塔之王苏利耶跋摩,万箭如网覆其周身,随即放声而笑——昭示其在交锋中的绝对上风,也预告战运正迅疾转向。

Verse 10

ततस्ते रथघोषेण रथनेमिस्वनेन च । पूरयन्तो दिश: सर्वा धनंजयमुपाद्रवन्‌,यह देख त्रिगर्तदेशीय वीर रथकी घरघराहट और पहियोंकी आवाजसे सारी दिशाओंको गुँजाते हुए वहाँ अर्जुनपर टूट पड़े

毗湿摩耶那说道:随后,那些勇士以战车的雷鸣与车轮的呼啸震满四方,使诸方皆为之回响,继而一齐冲向檀那阇耶(阿周那)。

Verse 11

सूर्यवर्मा ततः पार्थे शराणां नतपर्वणाम्‌ | शतान्यमुज्चद्‌ राजेन्द्र लघ्वस्त्रमभिदर्शयन्‌,राजेन्द्र! तदनन्तर सूर्यवर्माने अपने हाथोंकी फुर्ती दिखाते हुए अर्जुनपर झुकी हुई गाँठवाले एक सौ बाणोंका प्रहार किया

毗湿摩耶那说道:大王啊,随后苏利耶跋摩展示其武艺之迅捷,向帕尔他(阿周那)连发百支关节弯曲之箭。

Verse 12

तथैवान्ये महेष्वासा ये च तस्यानुयायिन: । मुमुचु: शरवर्षाणि धनंजयवधैषिण:,इसी प्रकार उसके अनुयायी वीरोंमें भी जो दूसरे-दूसरे महान्‌ धनुर्धर थे, वे भी अर्जुनको मार डालनेकी इच्छासे उनपर बाणोंकी वर्षा करने लगे

毗湿摩耶那说道:同样地,其他强弓劲射之士——皆为其随从——也怀着欲杀檀那阇耶(阿周那)之心,倾下箭雨如注。

Verse 13

स तान्‌ ज्यामुखनिर्मुक्तिबहुभि: सुबहून्‌ शरान्‌ । चिच्छेद पाण्डवो राजंस्ते भूमौ न्‍न्यपतंस्तदा,राजन! पाण्डुपुत्र अर्जुनने अपने धनुषकी प्रत्यंचासे छूटे हुए बहुसंख्यक बाणोंद्वारा शत्रुओंके बहुत-से बाणोंको काट डाला। वे कटे हुए बाण टुकड़े-टुकड़े होकर पृथ्वीपर गिर पड़े

毗湿摩耶那说道:大王啊,那位般度之子(阿周那)以弓弦所发无数利箭,斩断了敌军极多来箭;被截断的箭杆碎裂成段,纷纷坠地——显出他以严整之技驭力制势、化险为夷的战场掌控。

Verse 14

केतुवर्मा तु तेजस्वी तस्यैवावरजो युवा । युयुधे भ्रातुरर्थाय पाण्डवेन यशस्विना,(सूर्यवर्माके परास्त होनेपर) उसका छोटा भाई केतुवर्मा जो एक तेजस्वी नवयुवक था, अपने भाईका बदला लेनेके लिये यशस्वी वीर पाण्डुपुत्र अर्जुनके साथ युद्ध करने लगा

毗湿摩波耶那说道:计都跋摩(Ketuvarmā)乃光辉炽盛的少年勇士,正是那人的幼弟;为扶持兄长之事、在兄长败北之后求取报复,他与声名显赫的般度族英雄(阿周那)交战。

Verse 15

तमापततन्तं सम्प्रेक्ष्य केतुवर्माणमाहवे । अभ्यष्नन्निशितैर्बाणैर्बीभत्सु: परवीरहा,केतुवर्माको युद्धस्थलमें धावा करते देख शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनने अपने तीखे बाणोंसे उसे मार डाला

毗湿摩波耶那说道:见计都跋摩在战场上迎面猛冲,阿周那——彼婆诃苏(Bībhatsu),斩敌勇将者——立以锋利如刃之箭疾射,将那冲锋之勇士当场射倒。

Verse 16

केतुवर्मण्यभिहते धृतवर्मा महारथ: । रथेनाशु समुत्पत्य शरैर्जिष्णुमवाकिरत्‌,केतुवर्माके मारे जानेपर महारथी धृतवर्मा रथके द्वारा शीघ्र ही वहाँ आ धमका और अर्जुनपर बाणोंकी वर्षा करने लगा

毗湿摩波耶那说道:计都跋摩既被击倒,大车战士持律跋摩(Dhṛtavarman)便乘战车疾驰而至,以箭雨倾泻于吉什努(阿周那)身上。

Verse 17

तस्य तां शीघ्रतामीक्ष्य तुतोषातीव वीर्यवान्‌ । गुडाकेशो महातेजा बालस्य धृतवर्मण:

见其行动如此迅捷,强大的阿周那——古达凯沙(Guḍākeśa),大光明者——对少年持律跋摩甚为欣悦。

Verse 18

धृतवर्मा अभी बालक था तो भी उसकी उस फुर्तीको देखकर महातेजस्वी पराक्रमी अर्जुन बड़े प्रसन्न हुए ।। न संदधानं ददृशे नाददानं च तं तदा । किरन्तमेव स शरान्‌ ददृशे पाकशासनि:,वह कब बाण हाथमें लेता है और कब उसे धनुषपर चढ़ाता है, उसको इन्द्रकुमार अर्जुन भी नहीं देख पाते थे। उन्हें केवल इतना ही दिखायी देता था कि वह बाणोंकी वर्षा कर रहा है

毗湿摩波耶那说道:当时,连阿周那——因陀罗之子、惩罚波迦者——也看不清持律跋摩何时取箭、何时上弦;他所见唯有一事:那少年只是不绝如缕地倾泻箭雨。

Verse 19

स तु त॑ पूजयामास धृतवर्माणमाहवे । मनसा तु मुहूर्त वै रणे समभिहर्षयन्‌,उन्होंने रणभूमिमें थोड़ी देरतक मन-ही-मन धृतवर्माकी प्रशंसा की और युद्धमें उसका हर्ष एवं उत्साह बढ़ाते रहे

毗湿摩波耶那说:在战场上,他礼敬并褒扬持法摩(Dhṛtavarmā);又在片刻之间,于心中称赞他,从而在交锋之际扶持并激扬他的欢欣与战斗之气。

Verse 20

त॑ं पन्नगमिव क्रुद्धं कुरुवीर: स्मयन्निव । प्रीतिपूर्व महाबाहु: प्राणैर्न व्यपरोपयत्‌,यद्यपि धृतवर्मा सर्पके समान क्रोधमें भरा हुआ था तो भी कुरुवीर महाबाहु अर्जुन प्रेमपूर्वक मुसकराते हुए युद्ध करते थे। उन्होंने उसके प्राण नहीं लिये

毗湿摩波耶那说:纵然持法摩怒如毒蛇,俱卢英雄阿周那——臂力无双——仍含一丝微笑、怀着善意而战;即在战阵之中,他也未夺取对手性命。

Verse 21

स तथा रक्ष्यमाणो वै पार्थनामिततेजसा । धृतवर्मा शरं दीप्त॑ मुमोच विजये तदा,इस प्रकार अमित तेजस्वी अर्जुनके द्वारा जानबूझकर छोड़ दिये जानेपर धृतवर्माने उनके ऊपर एक अत्यन्त प्रज्वलित बाण चलाया

毗湿摩波耶那说:虽被光辉无量的帕尔他·阿周那护持——甚至有意放过——持法摩却在那一刻、争胜之热中,向他射出一支炽燃的利箭。

Verse 22

स तेन विजयस्तूर्णमासीद्‌ विद्धा: करे भृशम्‌ । मुमोच गाण्डिवं मोहात्‌ तत्‌ पपाताथ भूतले,उस बाणने तुरन्त आकर अर्जुनके हाथमें गहरी चोट पहुँचायी। उन्हें मूर्च्छा आ गयी और उनका गाण्डीव धनुष हाथसे छूटकर पृथ्वीपर जा पड़ा

毗湿摩波耶那说:被那一箭所中,阿周那立时受挫,手掌重创。迷惘昏眩之下,他松开了甘狄婆,神弓坠落于地。

Verse 23

धनुष: पततस्तस्य सव्यसाचिकराद्‌ विभो | बभूव सदृशं रूप॑ं शक्रचापस्य भारत,प्रभो! भरतनन्दन! अर्जुनके हाथसे गिरते हुए उस धनुषका रूप इन्द्रधनुषके समान प्रतीत होता था

毗湿摩波耶那说:“噢,强者——噢,婆罗多之主、婆罗多族之欢欣——当那张弓自萨维亚萨钦(阿周那)手中滑落坠地时,其形宛如释迦罗之弓——天际虹霓。”

Verse 24

तस्मिन्‌ निपतिते दिव्ये महाधनुषि पार्थिव: । जहास सस्वनं हासं धृतवर्मा महाहवे,उस दिव्य महाधनुषके गिर जानेपर महासमरमें खड़ा हुआ धृतवर्मा ठहाका मारकर जोर-जोरसे हँसने लगा

当那张天赐的巨弓坠落在地时,身处大战之中的持律跋摩(Dhṛtavarmā)忽然放声大笑,笑声铿然回荡。

Verse 25

ततो रोषार्दितो जिष्णु: प्रमृज्य रुधिरं करात्‌ । धनुरादत्त तद्‌ दिव्यं शरवर्षैववर्ष च,इससे अर्जुनका रोष बढ़ गया। उन्होंने हाथसे रक्त पोंछकर उस दिव्य धनुषको पुनः उठा लिया और धृतवर्मापर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी

随即,吉什努(阿周那)被怒火所驱,拭去手上的鲜血;他重新执起那张神弓,便向持律跋摩(Dhṛtavarman)倾泻箭雨。

Verse 26

ततो हलहलाशब्दो दिवस्पृणभवत्‌ तदा । नानाविधानां भूतानां तत्कर्माणि प्रशंसताम्‌,फिर तो अर्जुनके उस पराक्रमकी प्रशंसा करते हुए नाना प्रकारके प्राणियोंका कोलाहल समूचे आकाशकमें व्याप्त हो गया

就在那一刻,巨大的喧声——“哈拉哈拉”的呼喊——腾然而起,仿佛充满诸天;各类众生都在称颂那一壮举。

Verse 27

ततः सम्प्रेक्ष्य संक्रुद्धें कालान्तकयमोपमम्‌ । जिष्णु त्रैगर्तका योधा: परीता: पर्यवारयन्‌,अर्जुनको काल, अन्तक और यमराजके समान कुपित हुआ देख त्रिगर्तदेशीय योद्धाओंने चारों ओरसे आकर उन्हें घेर लिया

随后,见阿周那怒如迦罗——时间的终结者——又似阎摩——死亡之主——特里伽尔塔的战士们便从四面合围,将他团团围住。

Verse 28

अभिसृत्य परीप्सार्थ ततस्ते धृतवर्मण: । परिवत्रुर्गुडाकेशं तत्राक्रुद्धादू धनंजय:,धृतवर्माकी रक्षाके लिये सहसा आक्रमण करके त्रिगर्तोने गुडाकेश अर्जुनको जब सब ओरसे घेर लिया, तब उन्हें बड़ा क्रोध हुआ

毗舍婆耶那说道:随后,持律跋摩(Dhṛtavarman)麾下的战士为欲擒拿他而猛然冲上前来,从四面围住了古达给沙(阿周那)。见自己被困于重围之中,檀那阇耶怒火炽盛。

Verse 29

ततो योधान्‌ जघानाशु तेषां स दश चाष्ट च । महेन्द्रवज़प्रतिमैरायसैर्बहुभि: शरै:,फिर तो उन्होंने इन्द्रके वजकी भाँति दुस्सह लौहनिर्मित बहुसंख्यक बाणोंद्वारा बात- की-बातमें उनके अठारह प्रमुख योद्धाओंको यमलोक पहुँचा दिया

毗湿摩波耶那说道:随即在刹那之间,他击倒了他们的战士——十人又加八人——以无数铁箭,酷烈难当,如因陀罗之金刚雷霆,将十八名首要斗士送入阎摩之界。

Verse 30

तान्‌ सम्प्रभग्नान्‌ सम्प्रेक्ष्य त्वरमाणो धनंजय: । शरैराशीविषाकारैर्जघान स्वनवद्धसन्‌,तब तो त्रिगर्तोंमें भगदड़ मच गयी। उन्हें भागते देख अर्जुनने जोर-जोरसे हँसते हुए बड़ी उतावलीके साथ सर्पाकार बाणोंद्वारा उन सबको मारना आरम्भ किया

毗湿摩波耶那说道:见他们溃散奔逃,檀那阇耶(阿周那)急速追击,以形如毒蛇的箭矢射杀众人,战中放声大笑。

Verse 31

ते भग्नमनस: सर्वे त्रैगर्तकमहारथा: । दिशोभिदुद्रुवू राजन्‌ धनंजयशरार्दिता:,राजन! धनंजयके बाणोंसे पीड़ित हुए समस्त त्रिगर्तदेशीय महारथियोंका युद्धविषयक उत्साह नष्ट हो गया; अतः वे चारों दिशाओंमें भाग चले

毗湿摩波耶那说道:大王啊,特里伽尔塔国的诸位大车战士,被檀那阇耶之箭所折磨,斗志尽碎,遂向四方仓皇奔逃。

Verse 32

तमूचु: पुरुषव्याप्रं संशप्तकनिषूदनम्‌ । तवास्म किंकरा: सर्वे सर्वे वै वशगास्तव,उनमेंसे कितने ही संशप्तकसूदन पुरुषसिंह अर्जुनसे इस प्रकार कहने लगे --'कुन्तीनन्दन! हम सब आपके आज्ञाकारी सेवक हैं और सभी सदा आपके अधीन रहेंगे

毗湿摩波耶那说道:于是他们对阿周那——人中之虎、诛灭三誓军者——说道:“我们众人皆为你的仆从;确实,我们全都在你号令之下,并将永远顺从于你。”

Verse 33

आज्ञापयस्व न: पार्थ प्रद्दान्‌ प्रेष्यानवस्थितान्‌ । करिष्याम: प्रियं सर्व तव कौरवनन्दन,'पार्थ!! हम सभी सेवक विनीत भावसे आपके सामने खड़े हैं। आप हमें आज्ञा दें। कौरवनन्दन! हम सब लोग आपके समस्त प्रिय कार्य सदा करते रहेंगे”

毗湿摩波耶那说道:“请命令我们吧,帕尔塔。我们以恭顺之心立于此处,作为受命的侍从,随时听遣,任你差使。噢,俱卢族之荣光,我们必将成就你所珍爱的每一件事。”

Verse 34

एतदाज्ञाय वचन सर्वास्तानब्रवीत्‌ तदा । जीवितं रक्षत नृपा: शासन प्रतिगृह्यताम्‌,उनकी ये बातें सुनकर अर्जुनने उनसे कहा--'राजाओ! अपने प्राणोंकी रक्षा करो। इसका एक ही उपाय है, हमारा शासन स्वीकार कर लो”

他洞悉此情此势及其深意,便对诸王说道:“诸位君王,当护持性命。你们只有一途——接受我们的统御。”

Verse 74

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि त्रिगर्तपरा भवे चतुःसप्ततितमो<ध्याय:

至此,《圣摩诃婆罗多》之《马祭篇》(Āśvamedhika Parvan)中,尤以《阿努歌谛》(Anugītā)一段而言,关于特里伽尔塔人及其后续行止的第七十四章告终。

Frequently Asked Questions

Whether Prāgjyotiṣa will acknowledge the Aśvamedha’s implied suzerainty or contest it; the engagement functions as a public mechanism for validating political hierarchy under ritual law.

Power is to be exercised instrumentally and proportionately: Arjuna’s role is protection and stabilization of the ritual mandate, while the challenger’s response tests legitimacy within recognized norms of kṣatriya conduct.

No explicit phalaśruti appears in the provided verses; the meta-significance is implicit—this episode exemplifies how post-war order is reconstituted through ritualized diplomacy backed by controlled force.