यह सोपान ‘त्याग-धर्म’ से ‘सेवा-धर्म’ की ओर ले जाता है। अयोध्या-काण्ड में राम का वनगमन केवल राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि भक्त के भीतर ‘अहं-राज्य’ का विसर्जन है। भरत-चरित्र इस चरण का द्वार है: निष्काम कर्तव्य, भ्रातृ-प्रेम, और लोक-कल्याण के लिए स्व-सुख का त्याग। यहाँ ‘राजधर्म’ भी साधना बनता है—पादुका-शासन के माध्यम से ईश्वर-आज्ञा का सामाजिक रूपांतरण।
ایودھیا کاند کا نمایاں رس کرُنا ہے، مگر مقصد غم کو پھیلانا نہیں—غم کو پاک کرنا ہے۔ رام-ونگمن کے بعد ‘دھرم’ کا مرکز راج-سنگھاسن سے ہٹ کر ‘آگیا-پالن’ میں قائم ہو جاتا ہے۔ اس حصے میں تلسی داس نیتی، مریادا اور پریم کو ایک ہی دھُری پر رکھتے ہیں: رام کی وِنَیتا، بھرت کی نِشکامتا، اور گرو-وچن کی برتری۔ پیش کردہ اقتباس میں اَتری-آشرم کا ‘پُنّیہ-بھُوگول’ (بھرتکُوپ) لوک-کلیان کی علامت ہے—بھکتی کا جل عوامی ہو جاتا ہے۔ پھر بھرت کی ون-پریکرمہ، تیرتھوں میں نِمَجّن-پرنام، اور آخرکار رام سے ‘راجاگیا’ مانگنا—یہ سب سادھک کی باطنی یاترا ہے: پہلے شُچِتا (پاکیزگی)، پھر درشتی-شودھن (دیویہ درشن)، اور آخر میں کرتویہ-ستھاپن (اَوَدھ-پالن)۔ یوں ایودھیا کاند سوپان میں ‘وِرہ-بھکتی’ کو ‘سیوا-بھکتی’ میں بدل دیتا ہے۔
Verse 633 (चौपाई)
देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई।। नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना।। जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बनज बिकासे।। सम दम संजम नियम उपासा। नखत भरत हिय बिमल अकासा।। ध्रुव बिस्वास अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी।। राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा।। भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती।। बरनत सकल सुकचि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं।।
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Verse 634 (दोहा/सोरठा)
नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति।। मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति।।325।।
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परंपरा में भरत-चरित्र के पाठ को ‘निष्काम सेवा, भ्रातृ-प्रेम, और राज्य/गृहस्थ-धर्म की शुद्धि’ का फलदायक माना गया है। ‘भरतकूप’ प्रसंग का स्मरण तीर्थ-स्नान-सदृश मन-शुद्धि और लोक-कल्याण-बुद्धि बढ़ाने वाला कहा जाता है—मन, वाणी, कर्म की ‘बिमलता’ (पंक्ति: ‘होइहहिं बिमल करम मन बानी’)।
इस खंड (भरत-विनय, पादुका-प्रदान, सेवा-धर्म) में साधारणतः राम-नाम-सम्पुट प्रचलित है: ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम राम’ का जप। कुछ परंपराओं में ‘भरतचरित’ के साथ ‘प्रनतपाल’ भाव हेतु ‘दीन दयाल’/‘कृपालु’ नाम-स्मरण भी जोड़ा जाता है।
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