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सोपान-प्रवेश: ‘भक्ति का जन्म’ और ‘अहंकार-रावणत्व’ की पहचान। बालकाण्ड में जगत-व्यवस्था (धर्म) के क्षय का निदान ‘अवतार’ है—यह सीढ़ी साधक को बताती है कि मुक्ति का आरम्भ बाह्य कथा से नहीं, भीतर की शरणागति और प्रेम-प्रकटता से होता है। इस खण्ड में रावण-प्रभुत्व (भोग-बल) बनाम हरि-प्राकट्य (प्रेम-बल) का द्वंद्व साधक के अंतःकरण में घटित होता है।
ଏହି ଅଂଶର ପ୍ରଧାନ ରସ ‘ଭୟାନକ’ରୁ ‘ଶାନ୍ତ/ଅଦ୍ଭୁତ’ ଦିଗକୁ ରୂପାନ୍ତର। ଆରମ୍ଭରେ ରାବଣ-ପରିବାର, କୁମ୍ଭକର୍ଣ୍ଣ, ମେଘନାଦ ଆଦିର ବର୍ଣ୍ଣନ ଦ୍ୱାରା ଅସୁର-ସମ୍ପଦାର ଉତ୍କର୍ଷ ଦେଖାଯାଏ; ଏହା ‘ଅହଂ-ପ୍ରତାପ’ର ଉଦ୍ଗାର, ଯେଉଁଠାରେ ଧର୍ମ, ଦୟା, ବେଦ-ଶ୍ରୁତି ଓ ସାଧୁ-ସମ୍ମାନର ଲୋପ ହୁଏ। ପରେ ପୃଥିବୀ (ଧେନୁ-ରୂପ)ର ବ୍ୟଥା ଓ ଦେବ-ସଭାର ବିମର୍ଶ କଥାକୁ କରୁଣା ଓ ଧର୍ମ-ଗ୍ଲାନିର ଭାବରେ ନେଇଯାଏ। ନିର୍ଣ୍ଣାୟକ ମୋଡ଼ ଶିବଙ୍କ ବାକ୍ୟ—‘ହରି ବ୍ୟାପକ… ପ୍ରେମ ତେଁ ପ୍ରଗଟ’; ଏଠାରେ ନିର୍ଗୁଣ-ବ୍ୟାପକତା ଓ ସଗୁଣ-ପ୍ରାକଟ୍ୟର ତୁଳସୀ-ସମନ୍ୱୟ ସ୍ପଷ୍ଟ। ବ୍ରହ୍ମ-ବାଣୀରେ ଅବତାର-ପ୍ରତିଜ୍ଞା ଆସିବାମାତ୍ରେ ଭୟ-ନିବାରଣ, ଆଶ୍ୱାସନ ଓ ‘ଅଦ୍ଭୁତ’ ରସ ପ୍ରବଳ ହୁଏ। ଏଭଳି ବାଳକାଣ୍ଡର ଏହି ଖଣ୍ଡ ସୋପାନ-ତର୍କରେ ସାଧକକୁ କହେ: ବିପତ୍ତିର ସମାଧାନ ବାହୁବଳ ନୁହେଁ, ପ୍ରେମ-ଶରଣାଗତି ଓ ପ୍ରଭୁ-ପ୍ରାକଟ୍ୟ।
ଚୌପାଈ 180.1-4
सुख संपति सुत सेन सहाई।जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई।।
नित नूतन सब बाढ़त जाई।जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई।।
अतिबल कुंभकरन अस भ्राता।जेहि कहुँ नहिं प्रतिभट जग जाता।।
करइ पान सोवइ षट मासा।जागत होइ तिहुँ पुर त्रासा।।
जौं दिन प्रति अहार कर सोई।बिस्व बेगि सब चौपट होई।।
समर धीर नहिं जाइ बखाना।तेहि सम अमित बीर बलवाना।।
बारिदनाद जेठ सुत तासू।भट महुँ प्रथम लीक जग जासू।।
जेहि न होइ रन सनमुख कोई।सुरपुर नितहिं परावन होई।।
sukha saṃpati suta sena sahāī |jaya pratāpa bala buddhi baṛāī ||
nita nūtana saba bāṛhata jāī |jimi pratilābha lobha adhikāī ||
atibala kumbhakarana asa bhrātā |jehi kahũ nahiṃ pratibhaṭa jaga jātā ||
karai pāna sovai ṣaṭa māsā |jāgata hoi tihũ pura trāsā ||
jaũ dina prati āhāra kara soī |bisva begi saba caupaṭa hoī ||
samara dhīra nahiṃ jāi bakhānā |tehi sama amita bīra balavānā ||
bāridanāda jeṭha suta tāsū |bhaṭa mahũ prathama līka jaga jāsū ||
jehi na hoi rana sanamukha koī |surapura nitahiṃ parāvana hoī ||
ସୁଖ, ସମ୍ପତ୍ତି, ପୁତ୍ର, ସେନା ଓ ସାହାଯ୍ୟକାରୀ, ଜୟ, ପ୍ରତାପ, ବଳ, ବୁଦ୍ଧି ଓ ମହିମା, ଏସବୁ ଦିନକୁ ଦିନ ବଢୁଥିଲା, ସର୍ବଦା ନୂତନ, ଯେପରି ପୁନର୍ବାର ଲାଭ ହେଲେ ଲୋଭ ବଢେ। ତାଙ୍କର କୁମ୍ଭକର୍ଣ୍ଣ ନାମରେ ଜଣେ ଭାଇ ଥିଲେ, ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶକ୍ତିଶାଳୀ, ଯାହାଙ୍କ ସହ ଜଗତରେ କୌଣସି ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦୀ ନଥିଲା। ସେ ମଦ୍ୟପାନ କରି ଛଅ ମାସ ଶୋଇ ରହୁଥିଲେ; ଯେବେ ଜାଗ୍ରତ ହୁଅନ୍ତି, ତିନୋଟି ଲୋକରେ ଭୟ ଛାୟିଯାଏ। ଯଦି ସେ ପ୍ରତିଦିନ ଖାଇ ଶୋଇ ନ ରୁହନ୍ତେ, ତେବେ ସମଗ୍ର ବିଶ୍ୱ ଶୀଘ୍ର ଧ୍ୱଂଶ ହୋଇଯାଇଥାନ୍ତା। ଯୁଦ୍ଧରେ ତାଙ୍କର ଧୈର୍ଯ୍ୟ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିବା ସମ୍ଭବ ନୁହେଁ, ଅସୀମ ଶକ୍ତିରେ ସେ ଅଦ୍ୱିତୀୟ ବୀର ଥିଲେ। ବରିଦନାଦ, ତାଙ୍କର ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ପୁତ୍ର, ଜଗତରେ ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଭାବେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଥିଲେ; ଯୁଦ୍ଧରେ କେହି ତାଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଠିଆ ହୋଇପାରୁ ନଥିଲେ, ସେ ସର୍ବଦା ଦେବପୁରୀକୁ ଭୟଭୀତ କରୁଥିଲେ।
ଦୋହା 180
कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतु अतिकाय।एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट निकाय।।180।।
kumukha akaṃpana kuliśarada dhūmaketu atikāya |eka-eka jaga jīti saka aise subhaṭa nikāya ||180||
କୁମୁଖ, ଅକମ୍ପନ, କୁଲିଶାରାଦ, ଧୂମକେତୁ, ଓ ଅତିକାୟ—ଏମିତି ବୀରମାନଙ୍କ ଦଳ ଥିଲା, ଯେ ପ୍ରତ୍ୟେକେ ଏକାକୀ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଗୋଟିଏ ଜଗତକୁ ଜିତି ପାରନ୍ତା।
ଚୌପାଈ 181.1-4
कामरूप जानहिं सब माया।सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया।।
दसमुख बैठ सभाँ एक बारा।देखि अमित आपन परिवारा।।
सुत समूह जन परिजन नाती।गे को पार निसाचर जाती।।
सेन बिलोकि सहज अभिमानी।बोला बचन क्रोध मद सानी।।
सुनहु सकल रजनीचर जूथा।हमरे बैरी बिबुध बरूथा।।
ते सनमुख नहिं करही लराई।देखि सबल रिपु जाहिं पराई।।
तेन्ह कर मरन एक बिधि होई।कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई।।
द्विजभोजन मख होम सराधा।सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा।।
kāmarūpa jānahĩ saba māyā।sapanẽhu jinh keṃ dharama na dāyā॥
daśamukha baiṭha sabhā̃ eka bārā।dekhi amita āpana parivārā॥
suta samūha jana parijana nātī।ge ko pāra nisācara jātī॥
sena biloki sahaja abhimānī।bolā bacana krodha mada sānī॥
sunahu sakala rajanīcara jūthā।hamare bairī bibudha barūthā॥
te sanamukha nahiṃ karahī larāī।dekhi sabala ripu jāhiṃ parāī॥
tenha kara marana eka bidhi hoī।kahauṃ bujhāi sunahu aba soī॥
dvijabhojana makha homa sarādhā।saba kai jāi karahu tumha bādhā॥
ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ମାୟାର କଳା ଜାଣିବାରେ ପାରଙ୍ଗମ ଥିଲେ ଓ ଇଚ୍ଛାମୁତାବକ ରୂପ ଧାରଣ କରିପାରୁଥିଲେ; ସ୍ୱପ୍ନରେ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କର ଧର୍ମ କିମ୍ବା ଦୟା ନଥିଲା। ଥରେ ଦଶମୁଖ ରାବଣ ନିଜ ସଭାରେ ବସି ନିଜର ଅସୀମ ପରିବାର ଦେଖିଲେ, ପୁତ୍ରବୃନ୍ଦ, ଜ୍ଞାତି, ଅନୁଚର ଓ ବଂଶଧର, ରାକ୍ଷସ ଜାତିର କୌଣସି ସୀମା ନଥିବା ପରି ଲାଗୁଥିଲା। ନିଜ ସେନା ଦେଖି, ସ୍ୱାଭାବିକ ଅହଙ୍କାରରେ ଭରି କ୍ରୋଧ ଓ ମଦରେ ଭରା ବଚନ କହିଲେ: ଶୁଣ ତୁମ୍ଭେ ସମସ୍ତ ରାକ୍ଷସଗଣ, ଦେବତାମାନେ ଆମ୍ଭର ଶତ୍ରୁ। ସେମାନେ ଆମ୍ଭ ସହ ସାମ୍ନାରେ ଯୁଦ୍ଧ କରିବେ ନାହିଁ; ଶକ୍ତିଶାଳୀ ଶତ୍ରୁ ଦେଖି ସେମାନେ ଦୂରରେ ରୁହନ୍ତି। ସେମାନଙ୍କ ନାଶର କେବଳ ଗୋଟିଏ ଉପାୟ ଅଛି, ମୁଁ କହୁଛି, ଶୁଣ। ସବୁଆଡ଼େ ଯାଇ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଭୋଜନ, ଯଜ୍ଞ, ହୋମ ଓ ପିତୃକାର୍ଯ୍ୟରେ ବାଧା ଦିଅ।
ଦୋହା 181
छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ।तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति अपनाइ।।181।।
chudhā-chīna balahīna sur sahajehiṁ milihahiṁ āi |tab mārihaũ ki chāṛihaũ bhalī bhā̃ti apanāi ||181||
“ଦେବମାନେ—କ୍ଷୁଧାର୍ତ୍ତ ଓ ଦୁର୍ବଳ—ସହଜେ ମୋ ସମ୍ମୁଖକୁ ଆସି ପଡ଼ିବେ। ତେବେ ମୁଁ ସେମାନଙ୍କୁ ବଧ କରିବି କି, ନା ଧର୍ମମାର୍ଗ ଭଲଭାବେ ବିଚାରି ଛାଡ଼ି ଦେବି?”
ଚୌପାଈ 182.1-7
मेघनाद कहुँ पुनि हँकरावा।दीन्ही सिख बलु बयरु बढ़ावा।।
जे सुर समर धीर बलवाना।जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना।।
तिन्हहि जीति रन आनेसु बाँधी।उठि सुत पितु अनुसासन काँधी।।
एहि बिधि सबही अग्या दीन्ही।आपुनु चलेउ गदा कर लीन्ही।।
चलत दसानन डोलति अवनी।गर्जत गर्भ स्त्रवहिं सुर रवनी।।
रावन आवत सुनेउ सकोहा।देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा।।
दिगपालन्ह के लोक सुहाए।सूने सकल दसानन पाए।।
पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी।देइ देवतन्ह गारि पचारी।।
रन मद मत्त फिरइ जग धावा।प्रतिभट खौजत कतहुँ न पावा।।
रबि ससि पवन बरुन धनधारी।अगिनि काल जम सब अधिकारी।।
किंनर सिद्ध मनुज सुर नागा।हठि सबही के पंथहिं लागा।।
ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी।दसमुख बसबर्ती नर नारी।।
आयसु करहिं सकल भयभीता।नवहिं आइ नित चरन बिनीता।।
meghanāda kahuṁ puni haṁkarāvā |dīnhī sikha balu bayaru baṛhāvā ||
je sura samara dhīra balavānā |jinha keṁ laribe kara abhimānā ||
tinahi jīti rana ānesu bāṁdhī |uṭhi suta pitu anusāsana kāṁdhī ||
ehi bidhi sabahī agyā dīnhī |āpunu caleu gadā kara līnhī ||
calata dasānana ḍolati avanī |garjata garbha stravahiṁ sura-ravanī ||
rāvana āvata suneu sakohā |devan̐ha take meru-giri khohā ||
digapālanha ke loka suhāe |sūne sakala dasānana pāe ||
puni puni siṁghanāda kari bhārī |dei devatanha gāri pacārī ||
rana-mada matta phirai jaga dhāvā |pratibhaṭa khaujata katahuṁ na pāvā ||
rabi sasi pavana baruna dhanadhārī |agini kāla jama saba adhikārī ||
kiṁnara siddha manuja sura nāgā |haṭhi sabahī ke panthahiṁ lāgā ||
brahma-sṛṣṭi jahaṁ lagi tanudhārī |dasamukha basabartī nara nārī ||
āyasu karahiṁ sakala bhayabhītā |navahiṁ āi nita carana binītā ||
ପୁଣି ସେ ମେଘନାଦଙ୍କୁ ଡାକି ଉପଦେଶ ଦେଲେ ଓ ତାଙ୍କ ଶକ୍ତି ଓ ଶତ୍ରୁତା ବଢ଼ାଇଲେ। ଯେଉଁ ଦେବତାମାନେ ଯୁଦ୍ଧରେ ଧୀର ଓ ବଳବାନ ଥିଲେ, ଯୋଦ୍ଧା ହିସାବରେ ଅଭିମାନୀ ଥିଲେ, ସେମାନଙ୍କୁ ଯୁଦ୍ଧରେ ଜିତି ବନ୍ଧନ କରି ଆଣିଲେ; ପୁତ୍ର ଉଠି ପିତାଙ୍କ ଆଜ୍ଞା କାନ୍ଧରେ ବହନ କଲେ। ଏହିପରି ସେ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଆଜ୍ଞା ଦେଲେ, ତାପରେ ନିଜେ ଗଦା ହାତରେ ନେଇ ଯାତ୍ରା କଲେ। ଦଶମୁଖ ଚାଲିବାରେ ପୃଥିବୀ କମ୍ପିତ ହେଲା; ତାଙ୍କ ଗର୍ଜନରେ ଦେବପତ୍ନୀମାନେ ଭୟରେ ଗର୍ଭପାତ କଲେ। ରାବଣ ଆସୁଛନ୍ତି ଶୁଣି ଭୟ ବ୍ୟାପିଗଲା; ଦେବତାମାନେ ମେରୁ ପର୍ବତର ଗୁହାରେ ଲୁଚିଗଲେ। ଦିଗପାଳମାନଙ୍କର ସୁନ୍ଦର ଲୋକଗୁଡ଼ିକ ରାବଣ ଶୂନ୍ୟ ପାଇଗଲେ। ବାରମ୍ବାର ଭୟଙ୍କର ସିଂହନାଦ କରି ଦେବତାମାନଙ୍କୁ ଗାଳିଗୁତ୍ତୋର କରି ତଡ଼ିଦେଲେ। ଯୁଦ୍ଧର ଉନ୍ମାଦରେ ମତ୍ତ ହୋଇ ସେ ଜଗତରେ ଘୁରିବୁଲିଲେ; ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦୀ ଖୋଜିଲେ କିନ୍ତୁ କେଉଁଠାରେ ମିଳିଲେ ନାହିଁ। ସୂର୍ଯ୍ୟ, ଚନ୍ଦ୍ର, ବାୟୁ, ଧନୁର୍ଦ୍ଧର ବରୁଣ, ଅଗ୍ନି, କାଳ, ୟମ, ସମସ୍ତ ଜଗତର ଅଧିକାରୀ, କିନ୍ନର, ସିଦ୍ଧ, ମନୁଷ୍ୟ, ଦେବତା ଓ ନାଗମାନଙ୍କୁ ବଳପୂର୍ବକ ନିଜ ପଥରେ ଲଗାଇଲେ। ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ସୃଷ୍ଟି ଯେଉଁଠାପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଦେହଧାରୀ ପ୍ରାଣୀମାନେ ଅଛନ୍ତି, ସେଠାରେ ଦଶମୁଖଙ୍କ ଅଧୀନରେ ନରନାରୀ ରହୁଛନ୍ତି। ସମସ୍ତେ ଭୟରେ ତାଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ପାଳନ କରୁଛନ୍ତି ଓ ପ୍ରତିଦିନ ବିନୟର ସହ ତାଙ୍କ ଚରଣରେ ପ୍ରଣାମ କରିବାକୁ ଆସୁଛନ୍ତି।
ଦୋହା 182(क)-(ख)
भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र।मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र।।182(क)।।
देव जच्छ गंधर्व नर किंनर नाग कुमारि।जीति बरीं निज बाहुबल बहु सुंदर बर नारि।।182(ख)।।
bhujabala bisva basya kari rākhēsi kōu na sutantra |maṇḍalīka mani rāvaṇa rāja karai nija mantra ||182(ka)||
deva jaccha gandharva nara kiṁnara nāga kumāri |jīti barīṁ nija bāhubala bahu sundara bara nāri ||182(kha)||
ନିଜ ବାହୁବଳର ଦୁର୍ଦ୍ଦମ ଶକ୍ତିରେ ସେ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ବଶ କରି ରଖିଥିଲା; କେହି ମୁକ୍ତ ରହିଲେ ନାହିଁ। ରାବଣ—କରଦାତା ରାଜମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ରତ୍ନସ୍ୱରୂପ—ନିଜ ଇଚ୍ଛା ଓ ପରାମର୍ଶରେ ଶାସନ କରୁଥିଲା। ଦେବ, ଯକ୍ଷ, ଗନ୍ଧର୍ବ, ମନୁଷ୍ୟ, କିନ୍ନର ଓ ନାଗକନ୍ୟାମାନେ— ସେମାନଙ୍କୁ ଜିତି, ବଳପୂର୍ବକ ଅନେକ ଶୋଭନ ଓ ଚୟିତ ନାରୀଙ୍କୁ ପତ୍ନୀ ଭାବେ ଗ୍ରହଣ କରିଥିଲା।
ଚୌପାଈ 183.1-4
इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ।सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ।।
प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा।तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा।।
देखत भीमरूप सब पापी।निसिचर निकर देव परितापी।।
करहि उपद्रव असुर निकाया।नाना रूप धरहिं करि माया।।
जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला।सो सब करहिं बेद प्रतिकूला।।
जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं।नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं।।
सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई।देव बिप्र गुरू मान न कोई।।
नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना।सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना।।
indrajīta sana jo kachu kaheū |so saba janu pahilehiṃ kari raheū ||
prathamahiṃ jinha kahuṃ āyasu dīnhā |tinh kara carita sunahu jo kīnhā ||
dekhata bhīmarūpa saba pāpī |nisīcara nikara deva paritāpī ||
karahi upadrava asura nikāyā |nānā rūpa dharahim̐ kari māyā ||
jehi bidhi hoi dharma nirmūlā |so saba karahiṃ beda pratikūlā ||
jehiṃ jehiṃ desa dhenu dvija pāvahiṃ |nagara gāuṃ pura āgi lagāvahiṃ ||
subha ācarana katahūṃ nahiṃ hoī |deva bipra gurū māna na koī ||
nahiṃ haribhagati jagya tapa gyānā |sapanehūṃ suni-a na beda purānā ||
ଇନ୍ଦ୍ରଜିତଙ୍କ ସାନିଧ୍ୟରେ ମୁଁ ଯାହା କହିଥିଲି, ତାହା ସବୁ ପୂର୍ବରୁ କରାଯାଇଥିବା ବୁଝ। ପ୍ରଥମେ ଯାହାଙ୍କୁ ଆଜ୍ଞା ଦିଆଯାଇଥିଲା, ସେମାନେ କଣ କରିଥିଲେ ଶୁଣ। ସମସ୍ତେ ଭୟଙ୍କର ରୂପର ପାପୀ ଥିଲେ, ରାକ୍ଷସ ଦଳ ଯେଉଁମାନେ ଦେବତାଙ୍କୁ ପୀଡ଼ିତ କରୁଥିଲେ। ଦାନବ ଦଳମାନେ ବିଭିନ୍ନ ରୂପ ଧରି ମାୟା କରି ଉପଦ୍ରବ ସୃଷ୍ଟି କରୁଥିଲେ। ଯେଉଁ ଉପାୟରେ ଧର୍ମ ନିର୍ମୂଳ ହୋଇପାରେ, ସେସବୁ ସେମାନେ କରୁଥିଲେ, ବେଦ ବିରୁଦ୍ଧରେ କାର୍ଯ୍ୟ କରୁଥିଲେ। ଯେଉଁଠାରେ ଗାଈ ଓ ବ୍ରାହ୍ମଣ ପାଉଥିଲେ, ସେଠାରେ ନଗର, ଗ୍ରାମ ଓ ପୁରରେ ଅଗ୍ନି ଲଗାଉଥିଲେ। କୌଣସି ଉତ୍ତମ ଆଚରଣ ନଥିଲା; କେହି ଦେବତା, ବ୍ରାହ୍ମଣ କିମ୍ବା ଗୁରୁଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ ଦେଉ ନଥିଲେ। ହରିଭକ୍ତି, ଯଜ୍ଞ, ତପସ୍ୟା କିମ୍ବା ଜ୍ଞାନ ନଥିଲା; ସ୍ୱପ୍ନରେ ମଧ୍ୟ ବେଦ କିମ୍ବା ପୁରାଣ ଶୁଣାଯାଉ ନଥିଲା।
ଛନ୍ଦ 183
जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा।आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा।।
अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहि काना।तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना।।
japa joga birāgā tapa makha bhāgā śravaṇa sunai dasasīsā |āpunu uṭhi dhāvai rahai na pāvai dhari saba ghālai khīsā ||
asa bhraṣṭa acārā bhā saṃsārā dharma suni-a nahi kānā |tehi bahu-bidhi trāsai desa nikāsai jo kaha beda purānā ||
ଜପ, ଯୋଗ, ବୈରାଗ୍ୟ, ତପସ୍ୟା ଓ ଯଜ୍ଞ ସବୁ ଉଡ଼ିଗଲା, ରାବଣ କେବଳ କାନରେ ଶୁଣୁଥିଲା। ସେ ନିଜେ ଉଠି ଦୌଡ଼ିବାକୁ ଲାଗେ, ରୋକି ରହିପାରେ ନାହିଁ; ଯାହା ପାଏ ସେ ସବୁ ନିଜ ଝୋଲାରେ ପୁରିଦିଏ। ଏପରି ସଂସାର ହୋଇଗଲା, ଆଚରଣ ନଷ୍ଟ ହେଲା, ଯେପରି କାନେର ନଥିବା ଲୋକ ପରି କେହି ଧର୍ମ ଶୁଣିବାକୁ ରାଜି ନୁହେଁ। ଅସଂଖ୍ୟ ଉପାୟରେ ସେ ଲୋକଙ୍କୁ ପୀଡ଼ିତ କରେ ଓ ଦେଶରୁ ବାହାର କରିଦିଏ, ଯେଉଁମାନେ ବେଦ ଓ ପୁରାଣର ବାଣୀ କହନ୍ତି।
ସୋରଠା 183
बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं।हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति।।183।।
barani na jāi anīti ghora nisācara jo karahiṁ |hiṁsā para ati prīti tinh ke pāpahi kavani miti ||183||
ରାତିରେ ଘୁରୁଥିବା ରାକ୍ଷସମାନେ ଯେ ଭୟଙ୍କର ଅଧର୍ମ କରନ୍ତି, ତାହାକୁ କଥାରେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ କହିହେବ ନାହିଁ। ହିଂସାରେ ଅତ୍ୟଧିକ ମୋହିତ—ତାଙ୍କ ପାପର ମାପ କିଏ ଧରିପାରିବ?
ଚୌପାଈ 184.1-4
बाढ़े खल बहु चोर जुआरा।जे लंपट परधन परदारा।।
मानहिं मातु पिता नहिं देवा।साधुन्ह सन करवावहिं सेवा।।
जिन्ह के यह आचरन भवानी।ते जानेहु निसिचर सब प्रानी।।
अतिसय देखि धर्म कै ग्लानी।परम सभीत धरा अकुलानी।।
गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही।जस मोहि गरुअ एक परद्रोही।।
सकल धर्म देखइ बिपरीता।कहि न सकइ रावन भय भीता।।
धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी।गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी।।
निज संताप सुनाएसि रोई।काहू तें कछु काज न होई।।
bāṛhe khala bahu cora juārā |je laṁpaṭa paradhana paradārā ||
mānahĩ mātu pitā nahĩ devā |sādhunha saṅ karavāvahĩ sevā ||
jinha ke yaha ācarana bhavānī |te jānehu nisi-cara saba prānī ||
atisaya dekhi dharma kai glānī |parama sabhīta dharā akulānī ||
giri sari siṁdhu bhāra nahĩ mohī |jasa mohĩ garuā eka para-drohī ||
sakala dharma dekhai biparītā |kahi na sakai rāvaṇa bhaya-bhītā ||
dhenu rūpa dhari hṛdayã bicārī |gaī tahā̃ jahã sura-muni jhārī ||
nija saṁtāpa sunāyesi roī |kāhū teṁ kachu kāja na hoī ||
ଦୁଷ୍ଟମାନେ ବଢ଼ିଗଲେ, ଚୋର ଓ ଜୁଆଡ଼ିମାନେ ବହୁ ସଂଖ୍ୟାରେ ଥିଲେ, ଯେଉଁମାନେ ବ୍ୟଭିଚାରୀ, ପରଧନ ଓ ପରସ୍ତ୍ରୀ ଲୋଭୀ ଥିଲେ। ସେମାନେ ମାତା, ପିତା କିମ୍ବା ଦେବତାଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ ଦେଉ ନଥିଲେ; ସାଧୁମାନଙ୍କୁ ସେବା କରିବାକୁ ବାଧ୍ୟ କରୁଥିଲେ। ହେ ଭବାନୀ, ଯାହାଙ୍କର ଏପରି ଆଚରଣ ଅଛି, ସେମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତେ ରାକ୍ଷସ ପ୍ରକୃତିର ବୋଲି ଜାଣ। ଧର୍ମର ଏପରି ଗ୍ଲାନି ଦେଖି ପୃଥିବୀ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭୟଭୀତ ଓ ଚିନ୍ତିତ ହେଲେ। ପର୍ବତ, ନଦୀ ଓ ସମୁଦ୍ରର ଭାର ମୋତେ କଷ୍ଟ ଦିଏ ନାହିଁ; କିନ୍ତୁ ଜଣେ ପ୍ରତିଦ୍ରୋହୀ ବ୍ୟକ୍ତି ସମସ୍ତଙ୍କ ଠାରୁ ଭାରୀ। ସମସ୍ତ ଧର୍ମ ବିପରୀତ ହୋଇଥିବା ଦେଖି, ରାବଣ ଭୟରେ କହିବାକୁ ସମର୍ଥ ହେଲା ନାହିଁ। ଗାଈ ରୂପ ଧରି ହୃଦୟରେ ବିଚାର କରି, ସେ ସେହି ସ୍ଥାନକୁ ଗଲେ ଯେଉଁଠାରେ ଦେବତା ଓ ମୁନିମାନଙ୍କର ଆଶ୍ରମ ଥିଲା। କାନ୍ଦି କାନ୍ଦି ସେ ନିଜର ଜଳନ୍ତା ପୀଡ଼ା କହିଲେ; କିନ୍ତୁ କାହାଠାରୁ କୌଣସି ପ୍ରତିକାର ମିଳିଲା ନାହିଁ।
ଛନ୍ଦ 184
सुर मुनि गंधर्बा मिलि करि सर्बा गे बिरंचि के लोका।सँग गोतनुधारी भूमि बिचारी परम बिकल भय सोका।।
ब्रह्माँ सब जाना मन अनुमाना मोर कछू न बसाई।जा करि तैं दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई।।
sura muni gandharbā mili kari sarbā ge birañci ke lokā |saṅga go-tanu-dhārī bhūmi bicārī parama bikala bhaya sokā ||
brahmā̃ saba jānā mana anumānā mora kachū na basāī |jā kari taĩ dāsī so abināsī hamareu tora sahāī ||
ଦେବତା, ମୁନି ଓ ଗନ୍ଧର୍ବମାନେ ସମସ୍ତେ ମିଳିତ ହୋଇ ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ଲୋକକୁ ଗଲେ। ସେମାନଙ୍କ ସହିତ ପୃଥିବୀ ମଧ୍ୟ ଗାଈ ରୂପ ଧରି ନିଜ ଦୁଃଖ ବିଚାର କଲେ ଓ ଭୟ ଓ ଶୋକରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବ୍ୟାକୁଳ ହେଲେ। ବ୍ରହ୍ମା ସବୁ ଜାଣିଲେ, କିନ୍ତୁ ମନରେ ଅନୁମାନ କଲେ: ମୋର କିଛି ବସ ନାହିଁ। ଯାହାଙ୍କ ପାଇଁ ତୁମ୍ଭେ ଦାସୀ ହୋଇ ରହିଛ, ସେ ଅବିନାଶୀ ପ୍ରଭୁ ହିଁ ତୁମ୍ଭର ଓ ଆମ୍ଭର ସାହାଯ୍ୟକାରୀ।
ସୋରଠା 184
धरनि धरहि मन धीर कह बिरंचि हरिपद सुमिरु।जानत जन की पीर प्रभु भंजिहि दारुन बिपति।।184।।
dharani dharahi mana dhīra kaha birañci haripada sumiru |Jānata jana kī pīra prabhu bhañjihi dāruna bipati ||184||
ବ୍ରହ୍ମା କହିଲେ—“ହେ ପୃଥିବୀ, ହୃଦୟରେ ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଧର; ପ୍ରଭୁଙ୍କ ଚରଣ ସ୍ମରଣ କର। ଯେ ସ୍ୱାମୀ ନିଜ ଜନଙ୍କ ଯନ୍ତ୍ରଣା ଜାଣନ୍ତି, ସେ ନିଶ୍ଚୟ ଏହି ଭୟଙ୍କର ବିପତ୍ତିକୁ ଭଙ୍ଗ କରିଦେବେ।”
ଚୌପାଈ 185.1-4
बैठे सुर सब करहिं बिचारा।कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा।।
पुर बैकुंठ जान कह कोई।कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई।।
जाके हृदयँ भगति जसि प्रीति।प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती।।
तेहि समाज गिरिजा मैं रहेऊँ।अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ।।
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना।प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।।
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं।कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं।।
अग जगमय सब रहित बिरागी।प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी।।
मोर बचन सब के मन माना।साधु साधु करि ब्रह्म बखाना।।
baiṭhe sura saba karahiṁ bicārā |kahaṁ pāia prabhu karia pukārā ||
pura baikuṇṭha jāni kaha koī |kou kaha payanidhi basa prabhu soī ||
jāke hṛdayaṁ bhagati jasi prīti |prabhu tahaṁ pragaṭa sadā tehiṁ rītī ||
tihi samāja girijā maiṁ raheūṁ |avasara pāi bacana eka kaheūṁ ||
hari byāpaka sarbatra samānā |prema teṁ pragaṭa hohiṁ maiṁ jānā ||
desa kāla disi bidisi-hu māhīṁ |kahahu so kahāṁ jahāṁ prabhu nāhīṁ ||
aga jagamaya saba rahita birāgī |prema teṁ prabhu pragaṭi jimi āgī ||
mora bacana saba ke mana mānā |sādhu sādhu kari brahma bakhānā ||
ସମସ୍ତ ଦେବତା ମିଳିତ ହୋଇ ବିଚାର କଲେ: ପ୍ରଭୁ କେଉଁଠାରେ ମିଳିବେ, କିପରି ତାଙ୍କୁ ଡାକିବୁ? ଜଣେ କହିଲେ, ସେ ବୈକୁଣ୍ଠ ନଗରରେ ଅଛନ୍ତି; ଅନ୍ୟ ଜଣେ କହିଲେ, ପ୍ରଭୁ ସମୁଦ୍ରରେ ବାସ କରନ୍ତି। କିନ୍ତୁ ସତ୍ୟ ଏହି ଯେ, ଯେଉଁ ହୃଦୟରେ ଭକ୍ତି ପ୍ରେମ ରୂପେ ବାସ କରେ, ସେଠାରେ ପ୍ରଭୁ ସର୍ବଦା ପ୍ରକଟ ହୁଅନ୍ତି। ହେ ଗିରିଜା, ସେହି ସଭାରେ ମୁଁ ମଧ୍ୟ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲି; ଅବସର ପାଇ ଗୋଟିଏ କଥା କହିଲି: ହରି ସର୍ବବ୍ୟାପୀ, ସର୍ବତ୍ର ସମାନ ରୂପେ ବିଦ୍ୟମାନ; କିନ୍ତୁ ମୁଁ ଜାଣେ ଯେ ପ୍ରେମରେ ସେ ପ୍ରକଟ ହୁଅନ୍ତି। ଦେଶ, କାଳ, ଦିଗ ଓ ବିଦିଗରେ କେଉଁଠାରେ ପ୍ରଭୁ ନାହାନ୍ତି, କୁହ ସେ କେଉଁଠାରେ? ଅଗ୍ନି ପରି ଯିଏ ଜଗତରେ ବ୍ୟାପ୍ତ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଅନାସକ୍ତ ରୁହନ୍ତି, ସେହିପରି ପ୍ରେମରେ ପ୍ରଭୁ ପ୍ରକଟ ହୁଅନ୍ତି। ମୋର କଥା ସମସ୍ତଙ୍କ ମନରେ ଗ୍ରହଣ ହେଲା; ସେମାନେ ଶାସ୍ତ୍ରୀୟ ଶାସ୍ତ୍ରୀୟ ବୋଲି କହି ବ୍ରହ୍ମଙ୍କ ପ୍ରଶଂସା କଲେ।
ଦୋହା 185
सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर।अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर।।185।।
suni birañci mana haraṣa tana pulaki nayana baha nīra |astuti karata jori kara sāvadhāna mati-dhīra ||185||
ଏହା ଶୁଣି ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ହୃଦୟ ଆନନ୍ଦରେ ଉଫାନିଉଠିଲା; ଶରୀର ପୁଲକିତ ହେଲା, ନୟନରୁ ଅଶ୍ରୁଧାରା ବହିଲା। ହାତ ଯୋଡି, ସେ ଧୃଢ଼ ଓ ସୁସ୍ଥିର-ବୁଦ୍ଧିମାନ ଭକ୍ତ ଭକ୍ତିଭାବରେ ସାବଧାନ ହୋଇ ସ୍ତୁତି କଲେ।
ଛନ୍ଦ 186
जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिधुंसुता प्रिय कंता।।
पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई।जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई।।
जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा।अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा।।
जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगतमोह मुनिबृंदा।निसि बासर ध्यावहिं गुन गन गावहिं जयति सच्चिदानंदा।।
जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा।सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा।।
जो भव भय भंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा।मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुर जूथा।सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहि जाना।जेहि दीन पिआरे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना।।
भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा।मुनि सिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पद कंजा।।
jaya jaya suranāyaka jana sukhadāyaka pranatapāla bhagavaṃtā |go dvija hitakārī jaya asurārī siṃdhusutā priya kaṃtā ||
pālana sur dharanī adbhuta karanī marama na jānai koī |jo sahaja kṛpālā dīnadayālā karau anugraha soī ||
jaya jaya abināsī saba ghaṭa bāsī byāpaka paramānaṃdā |abigata gotītaṃ carita punītaṃ māyārahita mukuṃdā ||
jehi lāgi birāgī ati anurāgī bigatamoha munibṛṃdā |nisi bāsara dhyāvahiṃ guna gana gāvahiṃ jayati saccidānaṃdā ||
jehiṃ sṛṣṭi upāī tribidha banāī saṃga sahāya na dūjā |so karau aghārī ciṃta hamārī jāni-a bhagati na pūjā ||
jo bhava bhaya bhaṃjana muni mana raṃjana gaṃjana bipati barūthā |mana baca krama bānī chāḍi sayānī sarana sakala sur jūthā ||
sārada śruti seṣā ṛṣaya aseṣā jā kahuṃ kou nahi jānā |jehi dīna piāre beda pukāre dravau so śrībhagavānā ||
bhava bāridhi maṃdara saba bidhi suṃdara guṇamaṃdira sukhapuṃjā |muni siddha sakala sur parama bhayātura namata nātha pada kaṃjā ||
ଜୟ ଜୟ ସୁରନାୟକ ଜନ ସୁଖଦାୟକ ପ୍ରଣତପାଳ ଭଗବନ୍ତ। ଗୋ ଦ୍ୱିଜ ହିତକାରୀ ଜୟ ଅସୁରାରୀ ସିନ୍ଧୁସୁତା ପ୍ରିୟ କାନ୍ତ। ସୁର ଧରଣୀ ପାଳନକର୍ତ୍ତା, ଅଦ୍ଭୁତ କରଣୀ, କେହି ଜାଣନ୍ତି ନାହିଁ ତାହାର ମର୍ମ। ଯିଏ ସହଜ କୃପାଳୁ, ଦୀନଦୟାଳୁ, ସେହି ଅନୁଗ୍ରହ କରନ୍ତୁ। ଜୟ ଜୟ ଅବିନାଶୀ, ସମସ୍ତ ହୃଦୟରେ ବାସକାରୀ, ବ୍ୟାପକ ପରମାନନ୍ଦ। ଅବ୍ୟକ୍ତ, ଗୋତୀତ, ପୁଣ୍ୟ ଚରିତ, ମାୟାରହିତ ମୁକୁନ୍ଦ। ଯାହା ପାଇଁ ବିରକ୍ତ ମୁନିବୃନ୍ଦ ଅତ୍ୟନୁରକ୍ତ ହୁଅନ୍ତି, ମୋହମୁକ୍ତ ହୋଇ ରାତିଦିନ ଧ୍ୟାନ କରନ୍ତି ଓ ଗୁଣଗାନ କରନ୍ତି, ଜୟତୁ ସଚ୍ଚିଦାନନ୍ଦ। ଯିଏ ସୃଷ୍ଟି ଉପାଦାନ କଲେ, ତ୍ରିବିଧ କରି ସୃଷ୍ଟି କଲେ, ଦ୍ୱିତୀୟ ସହାୟକ ନାହାଁନ୍ତି। ହେ ପାପନାଶକ, ମୋର ଚିନ୍ତା ନିଅନ୍ତୁ, ଜାଣନ୍ତୁ ଭକ୍ତି ପୂଜା ନୁହେଁ। ଯିଏ ଭବଭୟ ଭଞ୍ଜନ, ମୁନିମନ ରଞ୍ଜନ, ବିପତ୍ତି ଗଞ୍ଜନ, ସମସ୍ତ ସୁରଜୂଥ ମନବାଚା କର୍ମର ଚତୁରତା ତ୍ୟାଗ କରି ଶରଣ ନିଅନ୍ତି। ସାରଦା, ଶ୍ରୁତି, ଶେଷ, ଅସଂଖ୍ୟ ଋଷି କେହି ଜାଣନ୍ତି ନାହିଁ, ଦୀନପ୍ରିୟଙ୍କୁ ବେଦ ପୁକାରନ୍ତି, ଦ୍ରବନ୍ତୁ ସେହି ଶ୍ରୀଭଗବାନ। ଭବସାଗର ମନ୍ଦର, ସର୍ବବିଧି ସୁନ୍ଦର, ଗୁଣମନ୍ଦିର, ସୁଖପୁଞ୍ଜ, ମୁନିସିଦ୍ଧ ସମସ୍ତ ସୁର ପରମ ଭୟାତୁର ନାଥଙ୍କ ପଦକମଳରେ ନମତ।
ଦୋହା 186
जानि सभय सुरभूमि सुनि बचन समेत सनेह।गगनगिरा गंभीर भइ हरनि सोक संदेह।।186।।
jāni sabhaya surabhūmi suni bacana sameta saneha |gaganagirā gambhīra bhai harani soka sandeha ||186||
ଦେବଲୋକ ଭୟରେ ଆକ୍ରାନ୍ତ ବୋଲି ବୁଝି, ଆକାଶମଣ୍ଡଳରୁ ଗମ୍ଭୀର ଓ ମହିମାମୟ ଏକ ବାଣୀ ଉଦ୍ଭବିଲା—ସ୍ନେହରେ ଭିଜିଥିବା ସେଇ ଶବ୍ଦ ଶୋକ ଓ ସନ୍ଦେହକୁ ଦୂର କରିଦେଲା।
ଚୌପାଈ 187.1-5
जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा।तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा।।
अंसन्ह सहित मनुज अवतारा।लेहउँ दिनकर बंस उदारा।।
कस्यप अदिति महातप कीन्हा।तिन्ह कहुँ मैं पूरब बर दीन्हा।।
ते दसरथ कौसल्या रूपा।कोसलपुरीं प्रगट नरभूपा।।
तिन्ह के गृह अवतरिहउँ जाई।रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई।।
नारद बचन सत्य सब करिहउँ।परम सक्ति समेत अवतरिहउँ।।
हरिहउँ सकल भूमि गरुआई।निर्भय होहु देव समुदाई।।
गगन ब्रह्मबानी सुनी काना।तुरत फिरे सुर हृदय जुड़ाना।।
तब ब्रह्मा धरनिहि समुझावा।अभय भई भरोस जियँ आवा।।
jani ḍarapahu muni siddha suresā |tumhahi lāgi dharihaũ nara besā ||
aṁsanh sahita manuja avatārā |lehauṁ dinakara baṁsa udārā ||
kaśyapa aditi mahātapa kīnhā |tinh kahuँ maiṁ pūraba bara dīnhā ||
te dasaratha kausalya rūpā |kosalapurīṁ pragaṭa narabhūpā ||
tinh ke gṛha avatarihaũ jāī |raghukula tilaka so cāriu bhāī ||
nārada bacana satya saba karihaũ |parama śakti sameta avatarihaũ ||
harihaũ sakala bhūmi garuāī |nirbhaya hohu deva samudāī ||
gagana brahmabānī sunī kānā |turata phire sura hṛdaya juḍānā ||
taba brahmā dharani-hi samujhāvā |abhaya bhaī bharosa jiyã āvā ||
ହେ ମୁନି, ସିଦ୍ଧ ଓ ସୁରେଶ୍ୱରଗଣ, ଭୟ କରନ୍ତୁ ନାହିଁ। ତୁମ୍ଭମାନଙ୍କ ପାଇଁ ମୁଁ ନରବେଶ ଧାରଣ କରିବି। ଅଂଶସହିତ ମନୁଷ୍ୟ ଅବତାର ଗ୍ରହଣ କରି ଦିନକର ବଂଶରେ ଜନ୍ମିବି। କଶ୍ୟପ ଓ ଅଦିତି ମହାତପ କରିଥିଲେ, ସେମାନଙ୍କୁ ମୁଁ ପୂର୍ବରୁ ବର ଦେଇଥିଲି। ସେମାନେ ଦଶରଥ ଓ କୌଶଲ୍ୟା ହେବେ, କୋଶଳପୁରୀରେ ନୃପତି ରୂପେ ପ୍ରକଟ ହେବେ। ସେହି ଗୃହରେ ମୁଁ ଅବତୀର୍ଣ୍ଣ ହେବି, ରଘୁକୁଳ ତିଳକ ରୂପେ ଚାରି ଭାଇ ହୋଇ ପ୍ରକଟ ହେବି। ନାରଦଙ୍କ ବଚନ ସତ୍ୟ କରିବି, ପରମ ଶକ୍ତିସହିତ ଅବତାର ଗ୍ରହଣ କରିବି। ସମସ୍ତ ଭୂମିର ଭାର ହରଣ କରିବି, ହେ ଦେବସମୁଦାୟ, ନିର୍ଭୟ ହୁଅ। ଆକାଶରୁ ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କ ବାଣୀ ଶୁଣି ଦେବଗଣ ତୁରନ୍ତ ଫେରିଗଲେ, ହୃଦୟ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ ହେଲା। ତାହାପରେ ବ୍ରହ୍ମା ଧରଣୀକୁ ସମଝାଇଲେ, ଅଭୟ ହେଲା, ହୃଦୟରେ ଭରସା ଆସିଲା।
ଦୋହା 187
निज लोकहि बिरंचि गे देवन्ह इहइ सिखाइ।बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ।।187।।
nija lokahi birañci ge devanha iha-i sikhāi |bānara tanu dhari-dhari mahi hari pada sevahu jāi ||187||
ବ୍ରହ୍ମା ନିଜ ଲୋକକୁ ଫେରି ଯାଇ, ଏଭଳି ଦେବଗଣଙ୍କୁ ଉପଦେଶ ଦେଲେ— “ବାରମ୍ବାର ପୃଥିବୀକୁ ଅବତର, ବାନର-ରୂପ ଧାରଣ କରି; ଏବଂ ହରିଙ୍କ ଚରଣାରବିନ୍ଦରେ ସେବା କର।”
ଚୌପାଈ 188.1-4
गए देव सब निज निज धामा।भूमि सहित मन कहुँ बिश्रामा।।
जो कछु आयसु ब्रह्माँ दीन्हा।हरषे देव बिलंब न कीन्हा।।
बनचर देह धरि छिति माहीं।अतुलित बल प्रताप तिन्ह पाहीं।।
गिरि तरु नख आयुध सब बीरा।हरि मारग चितवहिं मतिधीरा।।
गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी।रहे निज निज अनीक रचि रूरी।।
यह सब रुचिर चरित मैं भाषा।अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा।।
अवधपुरीं रघुकुलमनि राऊ।बेद बिदित तेहि दसरथ नाऊँ।।
धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी।हृदयँ भगति मति सारँगपानी।।
gae deva saba nija nija dhāmā.bhūmi sahita mana kahuṁ bisrāmā.
jo kachu āyasu brahmā̃ dīnhā.haraṣe deva bilaṁba na kīnhā.
banacara deha dhari chiti māhīṁ.atulita bala pratāpa tinh pāhīṁ.
giri taru nakha āyudha saba bīrā.hari māraga chitavahiṁ mati-dhīrā.
giri kānana jahaṁ tahaṁ bhari pūrī.rahe nija nija anīka rachi rūrī.
yaha saba rucira carita maiṁ bhāṣā.aba so sunahu jo bīcahiṁ rākhā.
avadhapurīṁ raghukulamani rāū.beda bidita tehi dasaratha nāū̃.
dharama dhuraṁdhara guna-nidhi gyānī.hṛdayaṁ bhagati mati sāraṅgapānī.
ସମସ୍ତ ଦେବତା ନିଜ ନିଜ ଧାମକୁ ଗଲେ, ଭୂମି ମନରେ ବିଶ୍ରାମ ପାଇଲା। ବ୍ରହ୍ମା ଯାହା ଆଜ୍ଞା ଦେଇଥିଲେ, ଦେବଗଣ ଆନନ୍ଦରେ ବିଳମ୍ବ ନକରି ପାଳନ କଲେ। ବନଚର ଦେହ ଧରି ପୃଥିବୀରେ ରହିଲେ, ଅତୁଳିତ ବଳ ଓ ପ୍ରତାପ ଲାଭ କଲେ। ପର୍ବତ, ବୃକ୍ଷ ଓ ନଖ ଆୟୁଧଧାରୀ ସେହି ବୀରମାନେ ହରିଙ୍କ ମାର୍ଗରେ ଚିତ୍ବନ କରି ମତିଧୀର ହୋଇ ରହିଲେ। ପର୍ବତ ଓ କାନନରେ ସର୍ବତ୍ର ଭରି ପୂରି ନିଜ ନିଜ ସୈନ୍ୟ ସଜାଇ ରହିଲେ। ଏହି ସମସ୍ତ ରୁଚିର ଚରିତ ମୁଁ ବର୍ଣ୍ଣନା କଲି, ବର୍ତ୍ତମାନ ଯାହା ମଧ୍ୟଭାଗରେ ଅଛି ତାହା ଶୁଣ। ଅବଧପୁରୀରେ ରଘୁକୁଳମଣି ରାଜା ଥିଲେ, ବେଦରେ ବିଦିତ ତାହାଙ୍କ ନାମ ଦଶରଥ। ଧର୍ମଧୁରନ୍ଧର, ଗୁଣନିଧି, ଜ୍ଞାନୀ, ହୃଦୟରେ ଭକ୍ତି ଓ ଶାରଙ୍ଗପାଣିଙ୍କ ପ୍ରତି ମତି ଥିଲା।
ଦୋହା 188
कौसल्यादि नारि प्रिय सब आचरन पुनीत।पति अनुकूल प्रेम दृढ़ हरि पद कमल बिनीत।।188।।
kausalyādi nāri priya saba ācarana punīta |pati anukūla prema dṛḍha hari pada kamala binīta ||188||
କୌଶଲ୍ୟା ଆଦି ସମସ୍ତ ସତୀ-ସାଧ୍ବୀ ମହିଳାମାନେ ସଭାର ପ୍ରିୟ ଥିଲେ; ତାଙ୍କର ଜୀବନ-ଚରିତ୍ରର ପ୍ରତ୍ୟେକ ଆଚରଣ ପବିତ୍ରକାରୀ ଥିଲା। ଦୃଢ଼ ପ୍ରେମରେ, ସଦା ପତିପ୍ରିୟ ଓ ନମ୍ର ହୋଇ, ସେମାନେ ହରିଙ୍କ ପଦପଦ୍ମରେ ନିତ୍ୟ ଆଶ୍ରୟ ରଖିଲେ।
ଚୌପାଈ 189.1-4
एक बार भूपति मन माहीं।भै गलानि मोरें सुत नाहीं।।
गुर गृह गयउ तुरत महिपाला।चरन लागि करि बिनय बिसाला।।
निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ।कहि बसिष्ठ बहुबिधि समुझायउ।।
धरहु धीर होइहहिं सुत चारी।त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी।।
सृंगी रिषहि बसिष्ठ बोलावा।पुत्रकाम सुभ जग्य करावा।।
भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें।प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हें।।
जो बसिष्ठ कछु हृदयँ बिचारा।सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा।।
यह हबि बाँटि देहु नृप जाई।जथा जोग जेहि भाग बनाई।।
eka bāra bhūpati mana māhīṁ |bhai galāni moreṁ suta nāhīṁ ||
guru gṛha gayau turata mahipālā |caraṇa lāgi kari binaya bisālā ||
nija dukha sukha saba gurahi sunāyu |kahi basiṣṭha bahubidhi samujhāyu ||
dharahu dhīra hoihahiṁ suta cārī |tribhuvana bidita bhagata bhaya hārī ||
sṛṁgī riṣahi basiṣṭha bolāvā |putra-kāma subha jagya karāvā ||
bhagati sahita muni āhuti dīnhēṁ |pragaṭe agini carū kari līnhēṁ ||
jo basiṣṭha kachu hṛdayaṁ bicārā |sakala kāju bhā siddha tumhārā ||
yaha habi bāṁṭi dehu nṛpa jāī |jathā joga jehi bhāga banāī ||
ଥରେ ରାଜାଙ୍କ ମନରେ ଦୁଃଖ ହେଲା, ମୋର ପୁତ୍ର ନାହିଁ। ତୁରନ୍ତ ମହୀପାଳ ଗୁରୁଙ୍କ ଗୃହକୁ ଗଲେ, ଚରଣ ଲାଗି ବିନୟ କଲେ। ନିଜ ଦୁଃଖ ସୁଖ ସବୁ ଗୁରୁଙ୍କୁ ଶୁଣାଇଲେ, ବସିଷ୍ଠ ବହୁବିଧିରେ ସମଝାଇଲେ। ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଧର, ଚାରି ପୁତ୍ର ହେବେ, ତ୍ରିଭୁବନରେ ବିଦିତ, ଭକ୍ତଭୟ ହର୍ତ୍ତା ହେବେ। ବସିଷ୍ଠ ଶୃଙ୍ଗୀ ଋଷିଙ୍କୁ ଡାକି ପୁତ୍ରକାମ ଶୁଭ ଯଜ୍ଞ କରାଇଲେ। ଭକ୍ତିସହିତ ମୁନି ଆହୁତି ଦେଲେ, ଅଗ୍ନି ପ୍ରକଟ ହୋଇ ଚରୁ ହାତରେ ନେଲେ। ବସିଷ୍ଠ ଯାହା ହୃଦୟରେ ବିଚାରିଥିଲେ, ତୁମର ସମସ୍ତ କାର୍ଯ୍ୟ ସିଦ୍ଧ ହେଲା। ଏହି ହବି ବାଣ୍ଟି ଦିଅ ହେ ନୃପ, ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ଭାଗ କରି।
ଦୋହା 189
तब अदृस्य भए पावक सकल सभहि समुझाइ।परमानंद मगन नृप हरष न हृदयँ समाइ।।189।।
taba adṛsya bhae pāvaka sakala sabahi samujhāi.paramānanda magana nṛpa haraṣa na hṛdayaṁ samāi..189..
ତାପରେ ସମଗ୍ର ସଭାକୁ ଉପଦେଶ ଦେଇ ଓ ଆଶ୍ୱାସନ କରାଇ, ଯଜ୍ଞାଗ୍ନି ଅଦୃଶ୍ୟ ହେଲା। ରାଜା ପରମ ଆନନ୍ଦରେ ଡୁବି ଗଲେ; ତାଙ୍କର ହୃଦୟ ଆଉ ସେଇ ହର୍ଷକୁ ଧାରଣ କରିପାରୁନଥିଲା।
परंपरागत मान्यता में यह खंड ‘धर्म-ग्लानि’ से ‘अभय’ तक की गति दिखाता है; इसके पाठ से भय-शोक-संदेह का शमन, शरणागति-बुद्धि की दृढ़ता, और ‘प्रेम तें प्रगट’—भक्ति-विश्वास का जागरण माना जाता है (विशेषतः दोहा 186 की ‘जनि डरपहु…’ ब्रह्म-वाणी के साथ)।
सत्संग-परंपरा में अवतार-प्रतिज्ञा और शरणागति-स्थलों पर ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘सियाराममय सब जग जानी’ भाव-स्मरण का समपुट जोड़ा जाता है; स्तुति-छंदों के साथ ‘राम’ नाम-जप (एकाक्षरी ‘राम’) का समपुट भी प्रचलित है।
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