Ayodhya KandaPrakarana 1621 Verses

Prakarana 16

यह सोपान ‘विरह-योग’ का द्वार है: गृह-धर्म (राजधर्म/कुलधर्म) और वन-धर्म (त्याग/वैराग्य) के संधि-क्षण पर साधक का चित्त ‘आसक्ति’ से ‘समर्पण’ की सीढ़ी चढ़ता है। अयोध्या काण्ड में राम का वनगमन केवल ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि ‘इच्छा-त्याग’ का आध्यात्मिक अभ्यास है—जहाँ प्रिय-वियोग में भी नाम-स्मरण, धैर्य, विवेक और धर्म-स्थिति मोक्षमार्ग की सीढ़ियाँ बनते हैं।

ଅୟୋଧ୍ୟା କାଣ୍ଡର ପ୍ରଧାନ ରସ କରୁଣ, କିନ୍ତୁ ସେ କରୁଣା ‘ଶୋକ’ ନୁହେଁ—‘ଧର୍ମ-ପ୍ରକାଶ’ରେ ପରିଶୁଦ୍ଧ କରୁଣା। ଏହି ଖଣ୍ଡ (ଦୋହା ୧୫୦–୧୫୯)ରେ କରୁଣ-ରସର ଧୁରା ତିନି କେନ୍ଦ୍ରକୁ ଘେରି ଘୁରେ: (୧) ରାମଙ୍କ ମର୍ଯ୍ୟାଦା-ଆଚରଣ—କେବଟକୁ ଆଶ୍ୱାସନ, ପିତା-ଗୁରୁ-ମାତୃସମାଜ ପାଇଁ ସନ୍ଦେଶ; (୨) ଅୟୋଧ୍ୟାର ସାମୂହିକ ଶୋକ—ଦଶରଥଙ୍କ ପ୍ରାଣାନ୍ତ, ରାଣୀମାନଙ୍କ ବିଲାପ, ନଗରର କୋଳାହଳ; (୩) ଭରତଙ୍କ ଭିତରେ ଉଠୁଥିବା ଅନିଷ୍ଟ-ଶଙ୍କା ଓ ନଗର-ପ୍ରବେଶରେ ଅଶୁଭ-ଲକ୍ଷଣ। ତୁଳସୀ ଏଠାରେ ‘ଧୀରଜ–ବିବେକ’କୁ ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ ଔଷଧ ଭାବେ ଦେଖାନ୍ତି: ମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କ ଉପଦେଶ, କୌଶଲ୍ୟାଙ୍କ ଜାହାଜ-ରୂପକ (ଅବଧ-ଜାହାଜର କର୍ଣ୍ଣଧାର ଦଶରଥ), ଏବଂ ଶେଷରେ ‘ରାମ-ନାମ’ର ଧ୍ୱନି—‘ରାମ ରାମ କହି’—ଯାହା ମୃତ୍ୟୁରେ ମଧ୍ୟ ମୋକ୍ଷ-ସୋପାନ ହୁଏ। ଏପରି ଅୟୋଧ୍ୟା କାଣ୍ଡ ମନକୁ ଶିଖାଏ ଯେ ବିୟୋଗରେ ମଧ୍ୟ ଭକ୍ତି ‘ସ୍ଥିତପ୍ରଜ୍ଞତା’ ଦିଗକୁ ନେଇଯାଏ।

Verses

ଚୌପାଈ 150.1-4

पुनि पुनि पूँछत मंत्रहि राऊ।प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ।।

करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ।रामु लखनु सिय नयन देखाऊ।।

सचिव धीर धरि कह मुदु बानी।महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी।।

बीर सुधीर धुरंधर देवा।साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा।।

जनम मरन सब दुख भोगा।हानि लाभ प्रिय मिलन बियोगा।।

काल करम बस हौहिं गोसाईं।बरबस राति दिवस की नाईं।।

सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं।दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं।।

धीरज धरहु बिबेकु बिचारी।छाड़िअ सोच सकल हितकारी।।

puni puni pū̃chata maṁtrahi rāū |priyatama suana sãdesa sunāū ||

karahi sakhā soi begi upāū |rāmu lakhanu siya nayana dekhāū ||

saciva dhīra dhari kaha mudu bānī |mahārāja tumha paṁḍita gyānī ||

bīra sudhīra dhuraṁdhara devā |sādhu samāju sadā tumha sevā ||

janama marana saba dukha bhogā |hāni lābha priya milana biyogā ||

kāla karama basa hauhiṁ gosāīṁ |barabasa rāti divasa kī nāīṁ ||

sukha haraṣahiṁ jaṛa dukha bilakhāhīṁ |dou sama dhīra dharahiṁ mana māhīṁ ||

dhīraja dharahu bibeku bicārī |chāṛia soca sakala hitakārī ||

ବାରବାର ରାଜା ମନ୍ତ୍ରୀଙ୍କୁ ପଚାରିଲେ: ମୋର ପ୍ରିୟତମ ପୁତ୍ରର ସନ୍ଦେଶ ଶୁଣାଅ। ହେ ବନ୍ଧୁ, ଶୀଘ୍ର କୌଣସି ଉପାୟ କର, ଯେନ ମୋର ଆଖିରେ ରାମ, ଲକ୍ଷ୍ମଣ ଓ ସୀତା ଦେଖାଯାଏ। ମନ୍ତ୍ରୀ ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଧରି କୋମଳ ବାଣୀରେ କହିଲେ: ମହାରାଜ, ଆପଣ ପଣ୍ଡିତ ଓ ଜ୍ଞାନୀ। ଆପଣ ବୀର, ସୁଧୀର, ରାଜ୍ୟଭାର ବହନକାରୀ ଦେବ, ଏବଂ ସଦା ସାଧୁ ସମାଜର ସେବା କରିଛନ୍ତି। ଜନ୍ମ ଓ ମୃତ୍ୟୁ, ସମସ୍ତ ଦୁଃଖ ଭୋଗ, ହାନି ଓ ଲାଭ, ପ୍ରିୟଜନଙ୍କ ମିଳନ ଓ ବିଯୋଗ, ଏହି ସବୁ ଘଟେ, ସ୍ୱାମୀ, କାଳ ଓ କର୍ମର ବଶରେ, ରାତ୍ରି ଓ ଦିବସ ପରି ଅନିବାର୍ଯ୍ୟଭାବେ। ମୂର୍ଖମାନେ ସୁଖରେ ଆନନ୍ଦିତ ହୁଅନ୍ତି, ଦୁଃଖରେ ବିଳାପ କରନ୍ତି, କିନ୍ତୁ ଧୀର ବ୍ୟକ୍ତିମାନେ ଉଭୟକୁ ସମାନ ଜ୍ଞାନ କରି ମନରେ ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଧାରଣ କରନ୍ତି। ବିବେକ ବିଚାରି ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଧରନ୍ତୁ, ସର୍ବହିତକାରୀ ହୋଇ ସମସ୍ତ ଚିନ୍ତା ତ୍ୟାଗ କରନ୍ତୁ।

ଦୋହା 150

प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरि तीर।न्हाई रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ बीर।।⁠150।।

prathama bāsu tamasā bhayau dūsara surasari tīra |nhāī rahe jalapānu kari siya sameta dou bīra ||⁠150||

ପ୍ରଥମ ବାସ ତମସାରେ ହେଲା, ଦ୍ୱିତୀୟ ଗଙ୍ଗା କୂଳରେ। ସ୍ନାନ କରି ଜଳପାନ କରି ସୀତା ସହିତ ଦୁଇ ବୀର ବିଶ୍ରାମ ନିଲେ।

ଚୌପାଈ 151.1-4

केवट कीन्हि बहुत सेवकाई।सो जामिनि सिंगरौर गवाँई।।

होत प्रात बट छीरु मगावा।जटा मुकुट निज सीस बनावा।।

राम सखाँ तब नाव मगाई।प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई।।

लखन बान धनु धरे बनाई।आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई।।

बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा।बोले मधुर बचन धरि धीरा।।

तात प्रनामु तात सन कहेहु।बार बार पद पंकज गहेहू।।

करबि पायँ परि बिनय बहोरी।तात करिअ जनि चिंता मोरी।।

बन मग मंगल कुसल हमारें।कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें।।

kevaṭa kīnhi bahuta sevakāī |so jāmini siṁgaraura gavā̃ī ||

hota prāta baṭa chīru magāvā |jaṭā mukuṭa nija sīsa banāvā ||

rāma sakhā̃ taba nāva magāī |priyā caṛhāi caṛhe raghurāī ||

lakhana bāna dhanu dhare banāī |āpu caṛhe prabhu āyasu pāī ||

bikala biloki mohi raghubīrā |bole madhura bacana dhari dhīrā ||

tāta pranāmu tāta sana kahehu |bāra bāra pada paṁkaja gahehū ||

karabi pāyã pari binaya bahorī |tāta karia jani ciṁtā morī ||

bana maga maṁgala kusala hamāreṁ |kṛpā anugraha punya tumhāreṁ ||

କେବଟ ବହୁତ ସେବା କଲେ, ଏବଂ ସେହି ରାତି ସିଂଗରୌରରେ କଟିଲା। ପ୍ରଭାତରେ ବଟବୃକ୍ଷର କ୍ଷୀର ମଗାଇ ନିଜ ମସ୍ତକରେ ଜଟାମୁକୁଟ ସଜାଇଲେ। ତତେ ରାମଙ୍କ ସଖା ନାଉ ମଗାଇଲେ; ପ୍ରିୟାଙ୍କୁ ଚଢ଼ାଇ ରଘୁରାଇ ନିଜେ ଆରୋହଣ କଲେ। ଲକ୍ଷ୍ମଣ ବାଣ ଓ ଧନୁ ସଜାଇ ପ୍ରଭୁଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ପାଇ ନିଜେ ଆରୋହଣ କଲେ। ମୋତେ ବ୍ୟାକୁଳ ଦେଖି ରଘୁବୀର ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଧରି ମଧୁର ବଚନ କହିଲେ। ତାତ, ମୋର ପ୍ରଣାମ ତାତଙ୍କ ନିକଟରେ କୁହ, ବାରମ୍ବାର ତାଙ୍କ ପଦପଙ୍କଜ ଧର। ତାହାପରେ ତାଙ୍କ ପଦରେ ପଡ଼ି ବିନତି କର, ତାତ, ମୋ ପାଇଁ ଚିନ୍ତା କରନ୍ତୁ ନାହିଁ। ତୋମର କୃପା, ଅନୁଗ୍ରହ ଓ ପୁଣ୍ୟରେ ବନପଥରେ ଆମର ମଙ୍ଗଳ ଓ କୁଶଳ ହେଲା।

ଛନ୍ଦ 151

तुम्हरे अनुग्रह तात कानन जात सब सुखु पाइहौं।प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरि आइहौं।।

जननीं सकल परितोषि परि परि पायँ करि बिनती घनी।तुलसी करेहु सोइ जतनु जेहिं कुसली रहहिं कोसल धनी।।

tumhare anugraha tāta kānana jāta saba sukhu pāihauṁ |pratipāli āyasu kusala dekhana pāya puni phiri āihauṁ ||

jananīṁ sakala paritoṣi pari pari pāyã kari binatī ghanī |tulasī karehu soi jatanu jehiṁ kusalī rahahiṁ kosala dhanī ||

ଆପଣଙ୍କ ଅନୁଗ୍ରହରୁ, ପିତା, ବନକୁ ଗଲେ ମୁଁ ସମସ୍ତ ସୁଖ ପାଇବି। ଆଜ୍ଞା ପାଳନ କରି, କୁଶଳରେ ତାଙ୍କ ଚରଣ ଦର୍ଶନ କରିବାକୁ ପୁଣି ଫେରି ଆସିବି। ସମସ୍ତ ମାତାଙ୍କୁ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦିଅନ୍ତୁ, ବାରିବାରି ତାଙ୍କ ଚରଣରେ ପଡ଼ି ଅନେକ ଅନୁନୟ କରି। ତୁଳସୀଦାସ କହନ୍ତି: ସମସ୍ତ ଚେଷ୍ଟା କରନ୍ତୁ, ଯେପରି କୋଶଳର ଧନୀ କୁଶଳରେ ରହନ୍ତି।

ସୋରଠା 151

गुर सन कहब सँदेसु बार बार पद पदुम गहि।करब सोइ उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति।।⁠151।।

gura sana kahaba sãdesu bāra bāra pada paduma gahi |karaba soi upadesu jehiṁ na soca mohi avadhapati ||⁠151||

ଗୁରୁଙ୍କ ପାଖରେ ବାରବାର ତାଙ୍କ ଚରଣକମଳ ଧରି ମୋର ସନ୍ଦେଶ ପହଞ୍ଚାଇ ଦିଅ। ତାଙ୍କୁ କୁହ, ସେହି ଉପଦେଶ ଦିଅନ୍ତୁ ଯେଉଁଥିରୁ ଅୟୋଧ୍ୟାପତି ମୋ ନିମନ୍ତେ କୌଣସି ଚିନ୍ତା ନ କରନ୍ତି।

ଚୌପାଈ 152.1-4

पुरजन परिजन सकल निहोरी।तात सुनाएहु बिनती मोरी।।

सोइ सब भाँति मोर हितकारी।जातें रह नरनाहु सुखारी।।

कहब सँदेसु भरत के आएँ।नीति न तजिअ राजपदु पाएँ।।

पालेहु प्रजहि करम मन बानी।सेएहु मातु सकल सम जानी।।

ओर निबाहेहु भायप भाई।करि पितु मातु सुजन सेवकाई।।

तात भाँति तेहि राखब राऊ।सोच मोर जेहिं करै न काऊ।।

लखन कहे कछु बचन कठोरा।बरजि राम पुनि मोहि निहोरा।।

बार बार निज सपथ देवाई।कहबि न तात लखन लरिकाई।।

purajana parijana sakala nihorī |tāta sunāehu binatī morī ||

soi saba bhā̃ti mora hitakārī |jāteṁ raha naranāhu sukhārī ||

kahaba sãdesu bharata ke āẽ |nīti na tajia rājapadu pāẽ ||

pālehu prajahi karama mana bānī |seehu mātu sakala sama jānī ||

ora nibāhehu bhāyapa bhāī |kari pitu mātu sujana sevakāī ||

tāta bhā̃ti tehi rākhaba rāū |soca mora jehiṁ karai na kāū ||

lakhana kahe kachu bacana kaṭhorā |baraji rāma puni mohi nihorā ||

bāra bāra nija sapatha devāī |kahabi na tāta lakhana larikāī ||

ନଗରବାସୀ ଓ ଗୃହସ୍ୱଜନ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ଅନୁନୟ କର, ତାପରେ ହେ ତାତ, ମୋର ଏହି ବିନତୀ ଶୁଣାଅ। ଯିଏ ସର୍ବପ୍ରକାରେ ମୋର ହିତକାରୀ, ସେ ଅଟେ ଯାହାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ରାଜା ସୁଖୀ ରହନ୍ତି। ଭରତ ଆସିଲେ ତାଙ୍କୁ ଏହି ସନ୍ଦେଶ ଦିଅ: ରାଜପଦ ଲାଭ କରି ନୀତି ପରିତ୍ୟାଗ କର ନାହିଁ। କର୍ମରେ, ମନରେ ଓ ବାକ୍ୟରେ ପ୍ରଜାଙ୍କୁ ପାଳନ କର, ଏବଂ ସମସ୍ତ ମାତାଙ୍କୁ ସମାନ ଜାଣି ସେବା କର। ହେ ଭ୍ରାତା, ପିତା, ମାତା ଓ ସୁଜନମାନଙ୍କୁ ସେବା କରି ଭ୍ରାତୃଧର୍ମ ଅନ୍ତ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ପାଳନ କର। ହେ ତାତ, ରାଜାଙ୍କୁ ଏପରିଭାବେ ରକ୍ଷା କର ଯେ ସେ ମୋ ପାଇଁ କୌଣସି ଚିନ୍ତା ନ କରନ୍ତି। ଲକ୍ଷ୍ମଣ କିଛି କଠୋର ବଚନ କହିଲେ, କିନ୍ତୁ ରାମ ତାଙ୍କୁ ବାରଣ କରି ମୋତେ ପୁଣି ଅନୁନୟ କଲେ। ବାରବାର ନିଜ ନାମରେ ଶପଥ ଖୁଆଇ କହିଲେ, ହେ ତାତ, ଲକ୍ଷ୍ମଣଙ୍କ ବାଲ୍ୟଚେଷ୍ଟା ତୁମେ କହିବ ନାହିଁ।

ଦୋହା 152

कहि प्रनाम कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह।थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह।।⁠152।।

kahi pranāma kachu kahana liya siya bhai sithila saneha |thakita bacana locana sajala pulaka pallavita deha ||⁠152||

ପ୍ରଣାମ ଜଣାଇ ସୀତା ଆଉ କିଛି କହିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କଲେ, କିନ୍ତୁ ପ୍ରେମରେ ସେ ମୁଗ୍ଧ-ମଳିନ ହୋଇପଡିଲେ। ବାକ୍ୟ ରୁଦ୍ଧ ହେଲା, ନୟନ ଜଳରେ ଭରିଗଲା, ଏବଂ ଶରୀର ଆନନ୍ଦରେ କମ୍ପିତ ଓ ରୋମାଞ୍ଚିତ ହେଲା, ଯେମିତି ଗଛ ନୂତନ ପଲ୍ଲବ ଅଙ୍କୁରିତ କରେ।

ଚୌପାଈ 153.1-4

तेहि अवसर रघुबर रूख पाई।केवट पारहि नाव चलाई।।

रघुकुलतिलक चले एहि भाँती।देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती।।

मैं आपन किमि कहौं कलेसू।जिअत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू।।

अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ।हानि गलानि सोच बस भयऊ।।

सुत बचन सुनतहिं नरनाहू।परेउ धरनि उर दारुन दाहू।।

तलफत बिषम मोह मन मापा।माजा मनहुँ मीन कहुँ ब्यापा।।

करि बिलाप सब रोवहिं रानी।महा बिपति किमि जाइ बखानी।।

सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा।धीरजहू कर धीरजु भागा।।

tehi avasara raghubara rūkha pāī |kevaṭa pārahi nāva calāī ||

raghukulatilaka cale ehi bhā̃tī |dekhaũ ṭhāṛha kulisa dhari chātī ||

maiṁ āpana kimi kahauṁ kalesū |jiata phireũ lei rāma sãdesū ||

asa kahi saciva bacana rahi gayaū |hāni galāni soca basa bhayaū ||

suta bacana sunatahiṁ naranāhū |pareu dharani ura dāruna dāhū ||

talaphata biṣama moha mana māpā |mājā manahũ mīna kahũ byāpā ||

kari bilāpa saba rovahiṁ rānī |mahā bipati kimi jāi bakhānī ||

suni bilāpa dukhahū dukhu lāgā |dhīrajahū kara dhīraju bhāgā ||

ସେହି ଅବସରରେ ରଘୁବରଙ୍କ ଇଚ୍ଛାର ଚିହ୍ନ ପାଇ କେବଟ ଡଙ୍ଗା ପାର କଲା। ଏହିଭାବେ ରଘୁକୁଳର ତିଳକ ଚାଲିଗଲେ, ଆଉ ମୁଁ ବଜ୍ର ଭଳି ହୃଦୟ ଧରି ଠିଆ ହୋଇ ଦେଖିଲି। ମୁଁ ମୋର ନିଜର କଷ୍ଟ କିପରି କହିବି, ଯିଏ ରାମଙ୍କ ସନ୍ଦେଶ ନେଇ ଜୀବିତ ଫେରି ଆସିଛି। ଏହା କହି ସଚିବ ନୀରବ ହୋଇଗଲେ, ଶୋକ, ଲଜ୍ଜା ଓ ଚିନ୍ତାରେ ଆବିଷ୍ଟ ହେଲେ। ସାରଥିର କଥା ଶୁଣିବା ମାତ୍ରେ ରାଜା ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଗଲେ, ବୁକରେ ଭୟଙ୍କର ଦାହ। ସେ ଭୟଙ୍କର ମୋହରେ ମନରେ ଛଟଫଟ କଲେ, ଯେନ କାଦୁଅରେ ମାଛ ଆକ୍ରାନ୍ତ ହୋଇଛି। ସବୁ ରାଣୀ କାନ୍ଦି ବିଳାପ କଲେ; ଏତେ ବଡ଼ ବିପଦ କିପରି ବର୍ଣ୍ଣନା କରାଯାଏ। ସେହି ବିଳାପ ଶୁଣି ଦୁଃଖର ବି ଦୁଃଖ ହେଲା, ଧୈର୍ଯ୍ୟର ବି ଧୈର୍ଯ୍ୟ ପଳାଇଗଲା।

ଦୋହା 153

भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु।बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुँ कुलिस कठोरु।।⁠153।।

bhayau kolāhalu avadha ati suni nṛpa rāura soru |bipula bihaga bana pareu nisi mānahũ kulisa kaṭhoru ||⁠153||

ରାଜାଙ୍କ ପ୍ରାସାଦର ଶବ୍ଦ ଶୁଣି ଅଯୋଧ୍ୟାରେ ଅତି କୋଲାହଳ ଉଠିଲ। ମନେ ହେଲ ଯେନ ରାତିରେ ପକ୍ଷୀମାନଙ୍କରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ବନରେ ଏକ ନିଷ୍ଠୁର ବଜ୍ରପାତ ପଡ଼ିଛି।

ଚୌପାଈ 154.1-4

प्रान कंठगत भयउ भुआलू।मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू।।

इद्रीं सकल बिकल भइँ भारी।जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी।।

कौसल्याँ नृपु दीख मलाना।रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना।।

उर धरि धीर राम महतारी।बोली बचन समय अनुसारी।।

नाथ समुझि मन करिअ बिचारू।राम बियोग पयोधि अपारू।।

करनधार तुम्ह अवध जहाजू।चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू।।

धीरजु धरिअ त पाइअ पारू।नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू।।

जौं जियँ धरिअ बिनय पिय मोरी।रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी।।

prāna kaṁṭhagata bhayau bhuālū |mani bihīna janu byākula byālū ||

idrīṁ sakala bikala bhaĩ bhārī |janu sara sarasija banu binu bārī ||

kausalyā̃ nṛpu dīkha malānā |rabikula rabi ãthayau jiyã jānā ||

ura dhari dhīra rāma mahatārī |bolī bacana samaya anusārī ||

nātha samujhi mana karia bicārū |rāma biyoga payodhi apārū ||

karanadhāra tumha avadha jahājū |caṛheu sakala priya pathika samājū ||

dhīraju dharia ta pāia pārū |nāhiṁ ta būṛihi sabu parivārū ||

jauṁ jiyã dharia binaya piya morī |rāmu lakhanu siya milahiṁ bahorī ||

ରାଜାଙ୍କର ପ୍ରାଣ କଣ୍ଠକୁ ଉଠିଲା, ମଣିହୀନ ସାପ ପରି ସେ ଯେନ ବ୍ୟାକୁଳ ହୋଇଗଲେ। ତାଙ୍କର ସମସ୍ତ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ଭୟଙ୍କର ଭାବେ ବିକଳ ହେଲା, ଯେନ ଜଳହୀନ ପଦ୍ମସରୋବର। କୌଶଲ୍ୟା ରାଜାଙ୍କୁ ବିଷଣ୍ଣ ଓ ମ୍ଲାନ ଦେଖି ହୃଦୟରେ ଅନୁଭବ କଲେ ଯେ ସୂର୍ଯ୍ୟବଂଶର ସୂର୍ଯ୍ୟ ଅସ୍ତମିତ ହେଉଛନ୍ତି। ରାମଙ୍କ ମାତା ହୃଦୟରେ ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଧରି ସମୟୋପଯୋଗୀ ବଚନ କହିଲେ। ନାଥ, ବୁଝି ମନରେ ବିଚାର କରନ୍ତୁ, ରାମଙ୍କ ବିୟୋଗ ଏକ ଅପାର ସମୁଦ୍ର। ଆପଣ ନାବିକ, ଅୟୋଧ୍ୟା ନୌକା, ଆଉ ସମସ୍ତ ପ୍ରିୟଜନମାନେ ଆରୋହୀ ଯାତ୍ରୀ ସମାଜ। ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଧରିଲେ ପାର ପାଇବେ, ନଚେତ ସମସ୍ତ ପରିବାର ଡୁବିଯିବ। ପ୍ରିୟ, ମୋର ଏହି ବିନୟ ଯଦି ହୃଦୟରେ ଧାରଣ କରନ୍ତି, ତେବେ ରାମ, ଲକ୍ଷ୍ମଣ ଓ ସୀତା ପୁଣି ମିଳିତ ହେବେ।

ଦୋହା 154

प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उघारि।तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि।।⁠154।।

priyā bacana mṛdu sunata nṛpu citayau ā̃khi ughāri |talaphata mīna malīna janu sīṁcata sītala bāri ||⁠154||

ପ୍ରିୟାର କୋମଳ ବଚନ ଶୁଣି ରାଜା ଆଖି ଖୋଲି ଚାହିଁଲେ, ଯେମିତି ତଡ଼ପାଇ ଥିବା ମଲିନ ମାଛ, ଯେବେ ତା'ର ଉପରେ ଶୀତଳ ଜଳ ଛିଞ୍ଚନ କରାଯାଏ।

ଚୌପାଈ 155.1-4

धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू।कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू।।

कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही।कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही।।

बिलपत राउ बिकल बहु भाँती।भइ जुग सरिस सिराति न राती।।

तापस अंध साप सुधि आई।कौसल्यहि सब कथा सुनाई।।

भयउ बिकल बरनत इतिहासा।राम रहित धिग जीवन आसा।।

सो तनु राखि करब मैं काहा।जेंहि न प्रेम पनु मोर निबाहा।।

हा रघुनंदन प्रान पिरीते।तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते।।

हा जानकी लखन हा रघुबर।हा पितु हित चित चातक जलधर।।

dhari dhīraju uṭhī baiṭha bhuālū |kahu sumaṁtra kahã rāma kṛpālū ||

kahā̃ lakhanu kahã rāmu sanehī |kahã priya putrabadhū baidehī ||

bilapata rāu bikala bahu bhā̃tī |bhai juga sarisa sirāti na rātī ||

tāpasa aṁdha sāpa sudhi āī |kausalyahi saba kathā sunāī ||

bhayau bikala baranata itihāsā |rāma rahita dhiga jīvana āsā ||

so tanu rākhi karaba maiṁ kāhā |jeṁhi na prema panu mora nibāhā ||

hā raghunaṁdana prāna pirīte |tumha binu jiata bahuta dina bīte ||

hā jānakī lakhana hā raghubara |hā pitu hita cita cātaka jaladhara ||

ଧୈର୍ଯ୍ୟ ଧରି ରାଜା ଉଠି ବସିଲେ, ଏବଂ କହିଲେ, "କୁହ ସୁମନ୍ତ୍ର, କୃପାଳୁ ରାମ କେଉଁଠାରେ?" "ଲକ୍ଷ୍ମଣ କେଉଁଠାରେ? ପ୍ରିୟ ରାମ କେଉଁଠାରେ? ପ୍ରିୟ ପୁତ୍ରବଧୂ ବୈଦେହୀ କେଉଁଠାରେ?" ରାଜା ବହୁ ପ୍ରକାରେ ବିକଳ ହୋଇ ବିଳାପ କଲେ, ଏବଂ ରାତ୍ରି ଯୁଗ ସମାନ ମନେ ହେଲା, ଶେଷ ହେବକୁ ଚାହୁଁ ନାହିଁ। ଅନ୍ଧ ତାପସର ଅଭିଶାପର ସ୍ମୃତି ମନକୁ ଆସିଲା, ଏବଂ ସେ କୌଶଲ୍ୟାଙ୍କୁ ସମସ୍ତ କଥା ଶୁଣାଇଲେ। ଇତିହାସ ବର୍ଣ୍ଣନା କରିବାକୁ କରିବାକୁ ସେ ଗଭୀର ଭାବେ ବିକଳ ହୋଇପଡିଲେ: "ରାମ ବିନା ଏହି ଜୀବନ ଧିକ, ବଞ୍ଚି ରହିବାର ଆଶା ଧିକ।" "ଏହି ଦେହ ରଖି ମୁଁ କଣ କରିବି, ଯାହା ମୋର ପ୍ରେମର ପ୍ରତିଜ୍ଞା ରକ୍ଷା କରିନାହିଁ?" "ହା ରଘୁନନ୍ଦନ, ପ୍ରାଣର ପ୍ରିୟ! ତୁମକୁ ବିନା ଅନେକ ଦିନ ବଞ୍ଚି କଟାଇଛି।" "ହା ଜାନକୀ! ହା ଲକ୍ଷ୍ମଣ! ହା ରଘୁବର, ପିତାଙ୍କ ହିତଚିନ୍ତା ରୂପ ଚାତକର ଜଳଧର!"

ଦୋହା 155

राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम।तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम।।⁠155।।

rāma rāma kahi rāma kahi rāma rāma kahi rāma |tanu parihari raghubara birahã rāu gayau suradhāma ||⁠155||

"ରାମ, ରାମ" ବୋଲି ବାରମ୍ବାର କହି, "ରାମ, ରାମ" କହି, ରାଜା ରଘୁପତିଙ୍କ ବିରହ ବେଦନାରେ ଶରୀର ତ୍ୟାଗ କରି ଦେବଲୋକକୁ ଗଲେ।

ଚୌପାଈ 156.1-4

जिअन मरन फलु दसरथ पावा।अंड अनेक अमल जसु छावा।।

जिअत राम बिधु बदनु निहारा।राम बिरह करि मरनु सँवारा।।

सोक बिकल सब रोवहिं रानी।रूपु सील बलु तेजु बखानी।।

करहिं बिलाप अनेक प्रकारा।परहीं भूमितल बारहिं बारा।।

बिलपहिं बिकल दास अरु दासी।घर घर रुदनु करहिं पुरबासी।।

अँथयउ आजु भानुकुल भानू।धरम अवधि गुन रूप निधानू।।

गारीं सकल कैकइहि देहीं।नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं।।

एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी।आए सकल महामुनि ग्यानी।।

jiana marana phalu dasaratha pāvā |aṁḍa aneka amala jasu chāvā ||

jiata rāma bidhu badanu nihārā |rāma biraha kari maranu sãvārā ||

soka bikala saba rovahiṁ rānī |rūpu sīla balu teju bakhānī ||

karahiṁ bilāpa aneka prakārā |parahīṁ bhūmitala bārahiṁ bārā ||

bilapahiṁ bikala dāsa aru dāsī |ghara ghara rudanu karahiṁ purabāsī ||

ãthayau āju bhānukula bhānū |dharama avadhi guna rūpa nidhānū ||

gārīṁ sakala kaikaihi dehīṁ |nayana bihīna kīnha jaga jehīṁ ||

ehi bidhi bilapata raini bihānī |āe sakala mahāmuni gyānī ||

ଦଶରଥ ଜୀବନ ଓ ମୃତ୍ୟୁ ଉଭୟର ଫଳ ପାଇଲେ, ଏବଂ ତାଙ୍କର ନିର୍ମଳ ଯଶ ଅସଂଖ୍ୟ ବ୍ରହ୍ମାଣ୍ଡରେ ବ୍ୟାପିଗଲା। ଜୀବିତ ଅବସ୍ଥାରେ ସେ ରାମଙ୍କ ଚନ୍ଦ୍ରବଦନ ଦର୍ଶନ କଲେ, ଏବଂ ରାମଙ୍କ ବିରହରେ ମୃତ୍ୟୁବରଣ କରି ନିଜର ମୃତ୍ୟୁକୁ ସୁଶୋଭିତ କଲେ। ଶୋକାକୁଳ ସମସ୍ତ ରାଣୀମାନେ କାନ୍ଦିଲେ, ଏବଂ ତାଙ୍କର ରୂପ, ଶୀଳ, ବଳ ଓ ତେଜର ବର୍ଣ୍ଣନା କଲେ। ସେମାନେ ନାନା ପ୍ରକାରେ ବିଳାପ କଲେ, ଏବଂ ବାରବାର ଭୂମିତଳରେ ପଡିଲେ। ଦାସ ଓ ଦାସୀମାନେ ବ୍ୟାକୁଳ ହୋଇ କାନ୍ଦିଲେ, ଏବଂ ଘରେ ଘରେ ନଗରବାସୀମାନେ ରୁଦନ କଲେ। ଆଜି ସୂର୍ଯ୍ୟବଂଶର ସୂର୍ଯ୍ୟ ଅସ୍ତ ଗଲା, ଯିଏ ଧର୍ମର ସୀମା, ଗୁଣ ଓ ରୂପର ନିଧି। ସମସ୍ତେ କୈକେୟୀଙ୍କୁ ଗାଳି ଦେଲେ, ଯିଏ ଜଗତକୁ ନୟନହୀନ କରିଛନ୍ତି। ଏହିପରି ବିଳାପ କରୁ କରୁ ରାତି ବିତିଗଲା, ଏବଂ ସମସ୍ତ ମହାମୁନି ଓ ଜ୍ଞାନୀଗଣ ଆସିଲେ।

ଦୋହା 156

तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास।सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास।।⁠156।।

taba basiṣṭha muni samaya sama kahi aneka itihāsa |soka nevāreu sabahi kara nija bigyāna prakāsa ||⁠156||

ତତେ ବସିଷ୍ଠ ମୁନି ଅବସର ଅନୁସାରେ ଅନେକ ପ୍ରାଚୀନ ଇତିହାସ ବର୍ଣ୍ଣନା କଲେ, ଏବଂ ନିଜ ବିଜ୍ଞାନର ଆଲୋକ ପ୍ରକାଶ କରି ସମସ୍ତଙ୍କର ଶୋକ ଦୂର କଲେ।

ଚୌପାଈ 157.1-4

तेल नाँव भरि नृप तनु राखा।दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा।।

धावहु बेगि भरत पहिं जाहू।नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू।।

एतनेइ कहेहु भरत सन जाई।गुर बोलाई पठयउ दोउ भाई।।

सुनि मुनि आयसु धावन धाए।चले बेग बर बाजि लजाए।।

अनरथु अवध अरंभेउ जब तें।कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें।।

देखहिं राति भयानक सपना।जागि करहिं कटु कोटि कलपना।।

बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना।सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना।।

मागहिं हृदयँ महेस मनाई।कुसल मातु पितु परिजन भाई।।

tela nā̃va bhari nṛpa tanu rākhā |dūta bolāi bahuri asa bhāṣā ||

dhāvahu begi bharata pahiṁ jāhū |nṛpa sudhi katahũ kahahu jani kāhū ||

etanei kahehu bharata sana jāī |gura bolāī paṭhayau dou bhāī ||

suni muni āyasu dhāvana dhāe |cale bega bara bāji lajāe ||

anarathu avadha araṁbheu jaba teṁ |kusaguna hohiṁ bharata kahũ taba teṁ ||

dekhahiṁ rāti bhayānaka sapanā |jāgi karahiṁ kaṭu koṭi kalapanā ||

bipra jevā̃i dehiṁ dina dānā |siva abhiṣeka karahiṁ bidhi nānā ||

māgahiṁ hṛdayã mahesa manāī |kusala mātu pitu parijana bhāī ||

ତେଲ ଭରା ଏକ ପାତ୍ରରେ ରାଜାଙ୍କ ଦେହ ରଖିଲେ। ତାପରେ ଦୂତମାନଙ୍କୁ ଡାକି ଏହିପରି କହିଲେ। ଶୀଘ୍ର ଦୌଡ଼ି ଭରତଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଅ। ରାଜାଙ୍କ ସମ୍ବାଦ କୋଉଠି କାହାକୁ ଯେମିତି ନ କହ। ଭରତଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ ଏତିକି କହ, ଗୁରୁ ତୁମ୍ଭେମାନେ ଦୁଇ ଭାଇଙ୍କୁ ଡାକି ପଠାଇଛନ୍ତି। ମୁନିଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ଶୁଣି ଦୂତମାନେ ଦୌଡ଼ି ଗଲେ। ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଅଶ୍ୱଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଲଜ୍ଜା ଦେବା ବେଗରେ ସେମାନେ ଯାତ୍ରା କଲେ। ଯେବେ ଠାରୁ ଅୟୋଧ୍ୟାରେ ଅନର୍ଥ ଆରମ୍ଭ ହେଲା, ସେବେ ଠାରୁ ଭରତଙ୍କୁ କୁଶକୁନ ଦେଖା ଦେଉଥିଲା। ରାତିରେ ଭୟଙ୍କର ସ୍ୱପ୍ନ ଦେଖୁଥିଲେ, ଜାଗ୍ରତ ହୋଇ କୋଟି କଟୁ କଲ୍ପନା କରୁଥିଲେ। ପ୍ରତିଦିନ ବ୍ରାହ୍ମଣ ଓ ଅତିଥିମାନଙ୍କୁ ଅନ୍ନ ଦାନ କରୁଥିଲେ, ଶିବଙ୍କ ଅଭିଷେକ ନାନା ଉପାୟରେ କରୁଥିଲେ। ମହେଶଙ୍କୁ ମନେ ମନେ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ କରି ମାତା, ପିତା, ପରିଜନ ଓ ଭାଇମାନଙ୍କ କୁଶଳ କାମନା କରୁଥିଲେ।

ଦୋହା 157

एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ।गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ।।⁠157।।

ehi bidhi socata bharata mana dhāvana pahũce āi |gura anusāsana śravana suni cale ganesu manāi ||⁠157||

ଏହିପରି ଭରତ ମନରେ ଚିନ୍ତା କରୁଥିବା ବେଳେ ଦୂତମାନେ ଦୌଡ଼ି ଆସି ପହଞ୍ଚିଲେ। ନିଜ କର୍ଣରେ ଗୁରୁଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ଶୁଣି ସେ ଗଣେଶଙ୍କୁ ମାନସିକ କରି ଯାତ୍ରା କଲେ।

ଚୌପାଈ 158.1-4

चले समीर बेग हय हाँके।नाघत सरित सैल बन बाँके।।

हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई।अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई।।

एक निमेष बरस सम जाई।एहि बिधि भरत नगर निअराई।।

असगुन होहिं नगर पैठारा।रटहिं कुभाँति कुखेत करारा।।

खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला।सुनि सुनि होइ भरत मन सूला।।

श्रीहत सर सरिता बन बागा।नगरु बिसेषि भयावनु लागा।।

खग मृग हय गय जाहिं न जोए।राम बियोग कुरोग बिगोए।।

नगर नारि नर निपट दुखारी।मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी।।

cale samīra bega haya hā̃ke |nāghata sarita saila bana bā̃ke ||

hṛdayã socu baṛa kachu na sohāī |asa jānahiṁ jiyã jāũ uṛāī ||

eka nimeṣa barasa sama jāī |ehi bidhi bharata nagara niarāī ||

asaguna hohiṁ nagara paiṭhārā |raṭahiṁ kubhā̃ti kukheta karārā ||

khara siāra bolahiṁ pratikūlā |suni suni hoi bharata mana sūlā ||

śrīhata sara saritā bana bāgā |nagaru biseṣi bhayāvanu lāgā ||

khaga mṛga haya gaya jāhiṁ na joe |rāma biyoga kuroga bigoe ||

nagara nāri nara nipaṭa dukhārī |manahũ sabanhi saba saṁpati hārī ||

ବାୟୁର ବେଗରେ ଅଶ୍ୱ ତଡ଼ାଇ ସେମାନେ ଚାଲିଲେ, ନଦୀ, ପର୍ବତ ଓ ବକ୍ର ଅରଣ୍ୟ ଅତିକ୍ରମ କରି। ହୃଦୟରେ ବିରାଟ ଚିନ୍ତା, କିଛି ମନକୁ ଭାଇଲା ନାହିଁ, ମନରେ ଭାବିଲେ, "ଯଦି ଉଡ଼ି ଯାଇପାରିଲା ଭଲ ହୋଇଥାନ୍ତା।" ଏକ ନିମେଷ ଏକ ବର୍ଷ ସମାନ ବିତିଲା। ଏହିପରି ଭରତ ନଗରର ନିକଟବର୍ତ୍ତୀ ହେଲେ। ନଗରରେ ପ୍ରବେଶ କଲା ମାତ୍ରେ ଅଶୁଭ ଲକ୍ଷଣ ଦେଖା ଦିଲା, କୁଖ୍ୟାତ ସ୍ଥାନରେ ଦୁଷ୍ଟ ପ୍ରାଣୀମାନେ ଭୟଙ୍କର ରୀତିରେ ଡାକୁଛନ୍ତି। ଗଧିଆ ଓ ଶିଆଳ ଅମଙ୍ଗଳ ସ୍ୱରରେ ଡାକୁଛନ୍ତି, ବାରବାର ଶୁଣି ଭରତଙ୍କ ମନ ବେଦନାରେ ବିଦ୍ଧ ହେଲା। ହ୍ରଦ, ନଦୀ, ବନ ଓ ଉଦ୍ୟାନ ସୌନ୍ଦର୍ଯ୍ୟ ହରାଇଲା, ନଗର ବିଶେଷ ଭାବେ ଭୟଙ୍କର ମନେ ହେଲା। ପକ୍ଷୀ, ହରିଣ, ଅଶ୍ୱ ଓ ଗଜ ଦର୍ଶନରେ ଦୁଃଖଜନକ, ରାମ ବିରହର କୁରୋଗରେ ସେମାନେ ନଷ୍ଟ ହୋଇଗଲେ। ନଗରର ନାରୀ ଓ ପୁରୁଷ ଚରମ ଦୁଃଖିତ, ଯେନ ସମସ୍ତେ ସମସ୍ତ ସମ୍ପଦ ହରାଇଛନ୍ତି।

ଦୋହା 158

पुरजन मिलिहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं।भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं।।⁠158।।

purajana milihiṁ na kahahiṁ kachu gavãhiṁ johārahiṁ jāhiṁ |bharata kusala pū̃chi na sakahiṁ bhaya biṣāda mana māhiṁ ||⁠158||

ନଗରବାସୀମାନେ ମିଳିତ ହେଲେ କିନ୍ତୁ କିଛି କହିଲେ ନାହିଁ; ହାତ ଜୋଡ଼ କରି ପ୍ରଣାମ କରି ସେମାନେ ଚାଲିଗଲେ। ଭରତ, ମନରେ ଭୟ ଓ ଶୋକ ଧରି, କୁଶଳ ପଚାରିବାକୁ ସକିଲେ ନାହିଁ।

ଚୌପାଈ 159.1-4

हाट बाट नहिं जाइ निहारी।जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी।।

आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि।हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि।।

सजि आरती मुदित उठि धाई।द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई।।

भरत दुखित परिवारु निहारा।मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा।।

कैकेई हरषित एहि भाँति।मनहुँ मुदित दव लाइ किराती।।

सुतहि ससोच देखि मनु मारें।पूँछति नैहर कुसल हमारें।।

सकल कुसल कहि भरत सुनाई।पूँछी निज कुल कुसल भलाई।।

कहु कहँ तात कहाँ सब माता।कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता।।

hāṭa bāṭa nahiṁ jāi nihārī |janu pura dahã disi lāgi davārī ||

āvata suta suni kaikayanaṁdini |haraṣī rabikula jalaruha caṁdini ||

saji āratī mudita uṭhi dhāī |dvārehiṁ bheṁṭi bhavana lei āī ||

bharata dukhita parivāru nihārā |mānahũ tuhina banaja banu mārā ||

kaikeī haraṣita ehi bhā̃ti |manahũ mudita dava lāi kirātī ||

sutahi sasoca dekhi manu māreṁ |pū̃chati naihara kusala hamāreṁ ||

sakala kusala kahi bharata sunāī |pū̃chī nija kula kusala bhalāī ||

kahu kahã tāta kahā̃ saba mātā |kahã siya rāma lakhana priya bhrātā ||

ହାଟ ଓ ରାସ୍ତିଗୁଡ଼ିକ ଏତେ ନିର୍ଜନ ଯେ ସେଦିଗକୁ ଦୃଷ୍ଟି ଦେଇ ହୁଏ ନାହିଁ; ମନେ ହୁଏ ଯେନ ନଗରର ଦଶ ଦିଗରେ ବନଦାହ ଲାଗିଛି। ପୁତ୍ର ଆସୁଛନ୍ତି ଶୁଣି କୈକେୟୀ, କେକୟ ରାଜାଙ୍କ କନ୍ୟା, ଆନନ୍ଦିତ ହେଲେ, ସୂର୍ଯ୍ୟବଂଶର କମଳ ପ୍ରତି ଚନ୍ଦ୍ରିକା ପରି। ସେ ଆରତୀ ସଜାଇ ଆନନ୍ଦରେ ଉଠି ଦୌଡ଼ିଲେ; ଦ୍ୱାରରେ ଭେଟି ତାଙ୍କୁ ଘରକୁ ଆଣିଲେ। ଭରତ ଦେଖିଲେ ସମସ୍ତ ପରିବାର ଶୋକାହତ, ଯେନ ତୁଷାରରେ କମଳବନ ନଷ୍ଟ ହୋଇଛି। କୈକେୟୀ ଏହିଭଳି ଆନନ୍ଦିତ ଥିଲେ, ଯେନ ବନରେ ଅଗ୍ନି ଲଗାଇ ଏକ ବନ୍ୟ ପାର୍ବତ୍ୟ ନାରୀ ଆନନ୍ଦିତ। ପୁତ୍ରକୁ ଚିନ୍ତିତ ଓ ମନୋବିହ୍ୱଳ ଦେଖି ସେ ପଚାରିଲେ, ମୋ' ପିତୃଗୃହରେ ସବୁ କୁଶଳ? ଭରତ ସବୁ କୁଶଳ କହି ଶୁଣାଇଲେ, ତା'ପରେ ନିଜ କୁଳର କୁଶଳ ଓ ମଙ୍ଗଳ ପଚାରିଲେ। କୁହ ମାତା, ପିତା କେଉଁଠାରେ, ଆଉ ସମସ୍ତ ମାତାମାନେ କେଉଁଠାରେ? ସୀତା, ରାମ ଓ ଲକ୍ଷ୍ମଣ, ମୋ' ପ୍ରିୟ ଭ୍ରାତାମାନେ କେଉଁଠାରେ?

ଦୋହା 159

सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन।भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन।।⁠159।।

suni suta bacana sanehamaya kapaṭa nīra bhari naina |bharata śravana mana sūla sama pāpini bolī baina ||⁠159||

ପୁତ୍ରର ସ୍ନେହମୟ ବଚନ ଶୁଣି, ଆଖି ଭରି କପଟ ଅଶ୍ରୁ ଧରି, ପାପିନୀ ସ୍ତ୍ରୀଲୋକଟି ଏପରି କଥା କହିଲେ ଯାହା ଭରତଙ୍କ କର୍ଣ ଓ ମନରେ ଶୂଳ ସଦୃଶ ବିଦ୍ଧ ହେଲା।

Frequently Asked Questions

परंपरा में अयोध्या काण्ड के इस विरह-प्रसंग का पाठ ‘धीरज-प्राप्ति’ और ‘नाम-निष्ठा’ बढ़ाने वाला माना जाता है—विशेषतः पारिवारिक शोक, वियोग, और निर्णय-काल में। दशरथ के ‘राम-नाम’ उच्चारण का स्मरण ‘अंतकाल-नाम’ की प्रेरणा देता है।

सामान्य वैष्णव-परंपरा में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम राम रटत…’ प्रकार का नाम-संपुट जोड़ा जाता है; इस खंड के लिए विशेषतः ‘राम राम’ (दोहा 155 की ध्वनि) को संपुट रूप में लेना प्रचलित है।

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