Adhyaya 34
Shanti ParvaAdhyaya 3432 Verses

Adhyaya 34

कालनिर्देशः शोकनिवारणं च (Instruction on Kāla and the Removal of Grief)

Upa-parva: Śoka-nivāraṇa and Kāla–Karma Upadeśa (Vyāsa’s Consolation to Yudhiṣṭhira)

Vaiśaṃpāyana reports that, after hearing Yudhiṣṭhira’s troubled words, Dvaipāyana (Vyāsa) responds with a carefully reasoned consolation. He instructs the king not to sink into despair and to remember kṣatriya-dharma: those who fell did so within their own duty and under the dispensation of kāla. Vyāsa limits personal culpability by asserting that neither Yudhiṣṭhira nor his brothers are the ultimate agents; time, operating through cyclical law and karmic witnessing, withdraws life from embodied beings. Kāla is described as the witness of merit and demerit and as the dispenser of resultant pleasure and pain. The discourse then turns to pragmatic remediation: where remorse arises from mental agitation and perceived fault, prāyaścitta is advised, specifically the aśvamedha as a royal expiation. Exempla are introduced (a prior deva–asura conflict and subsequent purgation) to normalize large-scale loss within cosmic order and to distinguish complex cases where “dharma can appear as adharma and adharma as dharma,” requiring discernment. Vyāsa concludes by urging Yudhiṣṭhira to reassure kin and subjects, install successors across realms, protect dependents, and then perform the horse-sacrifice, thereafter ruling in accordance with dharma for present stability and future welfare.

Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह से पूछते हैं—किन कर्मों से मनुष्य प्रायश्चित्त का अधिकारी बनता है, और कौन-सा प्रायश्चित्त उसे पाप से मुक्त करता है? → भीष्म ‘करने-न-करने’ की सूक्ष्म रेखा खींचते हैं: ब्रह्मचर्य-भंग के प्रसंग (सूर्योदय/सूर्यास्त तक सोना, स्वप्न-दोष), द्विज-वध, अनुचित आचरण, तीर्थ/दान में त्रुटि, और आपत्ति-काल में किए गए कर्म—इन सबमें दोष, न दोष, और शुद्धि के भेद बताकर शंका को गहरा करते हैं। → निर्णायक बिंदु यह स्थापित होता है कि ‘दोष’ केवल कर्म से नहीं, बल्कि तत्त्व-ज्ञान, उद्देश्य (काम/लोभ बनाम आवश्यकता), परिस्थिति (आपद्-धर्म), और अनजानेपन (अज्ञान) से तय होता है—जैसे आपत्काल में गुरु-कार्य हेतु किया गया स्तेय, स्वप्न में शुक्रमोक्ष पर आज्यहोम-प्रायश्चित्त, तथा सोम-विक्रय/सेवक-त्याग/गोरक्षा हेतु वनदाह जैसे कर्मों में दोष-अदोष का विवेचन। → अध्याय का निष्कर्ष यह है कि प्रायश्चित्त का विधान ‘अपराध की प्रकृति’ के साथ ‘कर्ता की चेतना’ को जोड़कर चलता है: अज्ञानजन्य त्रुटियाँ स्वतः दूषण नहीं बनतीं; कुछ कर्म आपत्ति या धर्म-रक्षा में किए जाएँ तो दोषरहित माने जाते हैं; और जहाँ दोष है वहाँ नियत शुद्धि-कर्म (जैसे आज्यहोम) से पुनः धर्म-स्थिति संभव है।

Shlokas

Verse 1

ऑपनआ कराता बछ। अर: चतुस्त्रिंशो 5 ध्याय: जिन कर्मोके करने और न करनेसे कर्ता प्रायश्षित्तका भागी होता और नहीं होता--उनका विवेचन युधिषछ्िर उवाच कानि कृत्वेह कर्माणि प्रायश्षित्तीयते नर: । कि कृत्वा मुच्यते तत्र तन्मे ब्रूहि पितामह

ယုဓိဋ္ဌိရက မေးလျှောက်သည်—«အို အဘိုးကြီး (ပိတామဟ)၊ ဤလောက၌ မည်သည့်အမှုများကို ပြုလုပ်လျှင် လူသည် ပြစ်ဒဏ်ဖြေ (ပရာယရှ္စိတ္တ) ခံယူရမည်နည်း။ ထို့ပြင် မည်သို့ပြုလုပ်လျှင် ထိုဝန်ထုပ်မှ လွတ်မြောက်နိုင်မည်နည်း။ ကျွန်ုပ်အား မိန့်ကြားပါ»။

Verse 2

युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! किन-किन कर्मोंको करनेसे मनुष्य प्रायश्चित्तका अधिकारी होता है और उनके लिये कौन-सा प्रायश्चित्त करके वह पापसे मुक्त होता है? इस विषयमें यह मुझे बतानेकी कृपा करें ।। व्यास उवाच अकुर्वन्‌ विहित॑ कर्म प्रतिषिद्धानि चाचरन्‌ | प्रायश्षित्तीयते होवं नरो मिथ्यानुवर्तयन्‌,व्यासजी बोले--राजन्‌! जो मनुष्य शास्त्रविहित कर्मोका आचरण न करके निषिद्ध कर्म कर बैठता है, वह उस विपरीत आचरणके कारण प्रायश्चित्तका भागी होता है

ဗျာသက မိန့်တော်မူသည်—«အို မင်းကြီး၊ သာသနာကျမ်းများက ချမှတ်ထားသော တာဝန်အမှုများကို မလုပ်ဘဲ၊ တားမြစ်ထားသော အမှုများကို ပြုလုပ်သူသည် ထိုမှားယွင်းသော လမ်းစဉ်ကြောင့် အပြစ်ရပြီး ပရာယရှ္စိတ္တ (ပြစ်ဒဏ်ဖြေ) ခံယူရသူ ဖြစ်လာ၏»။

Verse 3

सूर्येणा भ्युदितो यश्चव ब्रह्मचारी भवत्युत । तथा सूर्याभिनिर्मुक्त: कुनखी श्यावदन्नपि,जो ब्रह्मचारी सूर्योदय अथवा सूर्यास्तके समयतक सोता रहे तथा जिसके नख और दाँत काले हों,- उन सबको प्रायश्रित्त करना चाहिये

ဗျာသက မိန့်တော်မူသည်—«နေထွက်ပြီးနောက်တိုင် အိပ်နေဆဲဖြစ်သော ဘြဟ္မစာရင်၊ ထို့အတူ နေဝင်ချိန်တွင်လည်း အိပ်ရာထဲ၌ပင် ရှိနေသူ၊ ထို့ပြင် လက်သည်းပုံပျက်၍ သွားများမဲညစ်နေသူတို့သည် အပြစ်ဖြေကျင့်စဉ် (ပရာယရှ္စိတ္တ) ကို ဆောင်ရွက်သင့်၏။ ဤသင်ခန်းစာသည် ကျောင်းသား၏ စည်းကမ်းကို နိုးကြားသတိရှိမှု၊ ကိုယ်ခန္ဓာသန့်ရှင်းမှုနှင့် ထိန်းသိမ်းထားသော အကျင့်အကြံတို့ဖြင့် တိုင်းတာကြောင်း၊ ထိုကဲ့သို့ လွဲချော်မှုများကို မလျစ်လျူရှုဘဲ သတ်မှတ်ထားသော ပင်နန့်ဖြင့် ပြုပြင်ရကြောင်းကို ဖော်ပြသည်»။

Verse 4

परिवित्ति: परिवेत्ता ब्रह्मघ्नो यश्व॒ कुत्सक: । दिधिषूपपतिर्य: स्यादग्रेदिधिषुरेव च,कुन्तीनन्दन! इसके सिवा परिवेत्ता (बड़े भाईके अविवाहित रहते हुए विवाह करनेवाला छोटा भाई), परिवित्ति (परिवेत्ताका बड़ा भाई), ब्रह्महत्यारा और जो दूसरोंकी निन्दा करनेवाला है वह तथा छोटी बहिनके विवाहके बाद उसकी बड़ी बहिनसे ब्याह करनेवाला, जेठी बहिनके अविवाहित रहते हुए ही उसकी छोटी बहिनसे विवाह करनेवाला, जिसका व्रत नष्ट हो गया हो वह ब्रह्मचारी, द्विजकी हत्या करनेवाला, अपात्रको दान देनेवाला, सुपात्र ब्राह्मणको दान न देनेवाला, ग्रामका नाश करनेवाला, मांस बेचनेवाला तथा जो आग लगानेवाला है, जो वेतन लेकर वेद पढ़ानेवाला एवं स्त्री और शूद्रका वध करनेवाला है, इनमें पीछेवालोंसे पहलेवाले अधिक पापी हैं तथा पशु-वध करनेवाला, दूसरोंके घरमें आग लगानेवाला, झूठ बोलकर पेट पालनेवाला, गुरुका अपमान और सदाचारकी मर्यादाका उल्लंघन करनेवाला--ये सभी पापी माने गये हैं। इन्हें प्रायश्रित्त करना चाहिये

ဗျာသ မဟာရသီက မိန့်တော်မူသည်– «ကွန်တီ၏သားရေ၊ အပြစ်ကြီးသူတို့မှာ– အစ်ကိုမင်္ဂလာမဆောင်သေးဘဲ ‘ကျော်လွန်ခံရသူ’ (parivitti) ဖြစ်နေသော အစ်ကို၊ အစ်ကိုမင်္ဂလာမဆောင်သေးခင် မင်္ဂလာဆောင်သည့် ညီ (parivettā)၊ ဗြာဟ္မဏကို သတ်သူ၊ အမြဲတမ်း အခြားသူတို့ကို ကဲ့ရဲ့ပြစ်တင်နေသူတို့ ဖြစ်ကြသည်။ ထို့အပြင် အစ်မ မင်္ဂလာမဆောင်သေးခင် ညီမကို အရင်ယူသူ၊ သို့မဟုတ် အစ်မကို ကျော်ပြီး ညီမကို အရင်တောင်းယူလိုသူတို့လည်း အပြစ်တင်ခံရသည်။ ဤအရာတို့သည် လူမှုစည်းကမ်းနှင့် သီလဓမ္မစည်းမျဉ်းကို ချိုးဖောက်ခြင်းဖြစ်၍ ပရాయရှ္စိတ္တ (အပြစ်ဆေးကြောခြင်း) ပြုရမည်»။

Verse 5

अवकीर्णी भवेद्‌ यश्नव द्विजातिवधकस्तथा । अतीर्थ ब्राह्मणस्त्यागी तीर्थे चाप्रतिपादक:,कुन्तीनन्दन! इसके सिवा परिवेत्ता (बड़े भाईके अविवाहित रहते हुए विवाह करनेवाला छोटा भाई), परिवित्ति (परिवेत्ताका बड़ा भाई), ब्रह्महत्यारा और जो दूसरोंकी निन्दा करनेवाला है वह तथा छोटी बहिनके विवाहके बाद उसकी बड़ी बहिनसे ब्याह करनेवाला, जेठी बहिनके अविवाहित रहते हुए ही उसकी छोटी बहिनसे विवाह करनेवाला, जिसका व्रत नष्ट हो गया हो वह ब्रह्मचारी, द्विजकी हत्या करनेवाला, अपात्रको दान देनेवाला, सुपात्र ब्राह्मणको दान न देनेवाला, ग्रामका नाश करनेवाला, मांस बेचनेवाला तथा जो आग लगानेवाला है, जो वेतन लेकर वेद पढ़ानेवाला एवं स्त्री और शूद्रका वध करनेवाला है, इनमें पीछेवालोंसे पहलेवाले अधिक पापी हैं तथा पशु-वध करनेवाला, दूसरोंके घरमें आग लगानेवाला, झूठ बोलकर पेट पालनेवाला, गुरुका अपमान और सदाचारकी मर्यादाका उल्लंघन करनेवाला--ये सभी पापी माने गये हैं। इन्हें प्रायश्रित्त करना चाहिये

ဗျာသ မဟာရသီက မိန့်တော်မူသည်– «ဗြဟ္မစရိယာဝတ်ကို ချိုးဖောက်၍ ဝတ်ပျက်သွားသော ဗြဟ္မစာရင် (avakīrṇin)၊ ဒွိဇ (dvija) — နှစ်ကြိမ်မွေးဖွားသူကို သတ်သူ၊ ထောက်ပံ့သင့်သော ဗြာဟ္မဏကို စွန့်ပစ်လျစ်လျူရှုသူ၊ ထီးရ္ထ (tīrtha) သန့်မြတ်ရာနေရာ၌ ထိုက်သင့်သည့် ပူဇော်သက္ကာ/ဒါနကို မပေးသူတို့သည် အပြစ်ကြီးသူဟု မှတ်ယူရမည်။ ဝတ်ကတိဖျက်ခြင်း၊ ပညာရှိတို့အပေါ် အကြမ်းဖက်ခြင်း၊ ထိုက်သင့်သည့် ပေးကမ်းမှုကို မပြုခြင်း၊ သန့်မြတ်သည့် အခါအခွင့်ကို မလေးစားခြင်းတို့သည် ဓမ္မကို ချိုးဖောက်ခြင်းဖြစ်၍ ပရాయရှ္စိတ္တ ပြုရမည်»။

Verse 6

ग्रामघाती च कौन्तेय मांसस्य परिविक्रयी । यश्चाग्नीनपविध्येत तथैव ब्रद्मुविक्रयी,कुन्तीनन्दन! इसके सिवा परिवेत्ता (बड़े भाईके अविवाहित रहते हुए विवाह करनेवाला छोटा भाई), परिवित्ति (परिवेत्ताका बड़ा भाई), ब्रह्महत्यारा और जो दूसरोंकी निन्दा करनेवाला है वह तथा छोटी बहिनके विवाहके बाद उसकी बड़ी बहिनसे ब्याह करनेवाला, जेठी बहिनके अविवाहित रहते हुए ही उसकी छोटी बहिनसे विवाह करनेवाला, जिसका व्रत नष्ट हो गया हो वह ब्रह्मचारी, द्विजकी हत्या करनेवाला, अपात्रको दान देनेवाला, सुपात्र ब्राह्मणको दान न देनेवाला, ग्रामका नाश करनेवाला, मांस बेचनेवाला तथा जो आग लगानेवाला है, जो वेतन लेकर वेद पढ़ानेवाला एवं स्त्री और शूद्रका वध करनेवाला है, इनमें पीछेवालोंसे पहलेवाले अधिक पापी हैं तथा पशु-वध करनेवाला, दूसरोंके घरमें आग लगानेवाला, झूठ बोलकर पेट पालनेवाला, गुरुका अपमान और सदाचारकी मर्यादाका उल्लंघन करनेवाला--ये सभी पापी माने गये हैं। इन्हें प्रायश्रित्त करना चाहिये

ဗျာသ မဟာရသီက မိန့်တော်မူသည်– «ကောန္တေယ၊ ရွာကို ဖျက်ဆီးသူ၊ အသားကို ရောင်းချသူ၊ မီးရှို့သူတို့နှင့်တကွ—ဝေဒကို လစာယူ၍ သင်ကြားကာ သန့်ရှင်းသော ဗေဒပညာကို ‘ရောင်းစား’ သကဲ့သို့ ပြုသူလည်း အပြစ်ကြီးသူတို့အနက် ပါဝင်သည်။ ဤလုပ်ရပ်များသည် လူမှုအခြေခံနှင့် သာသနာဝတ္တရားကို ချိုးဖောက်သဖြင့် ပရాయရှ္စိတ္တ ပြုရမည်»။

Verse 7

स्त्रीशूद्रवधको यश्न पूर्व: पूर्वस्तु गर्हित: । यथा पशुसमालम्भी गृहदाहस्य कारक:,कुन्तीनन्दन! इसके सिवा परिवेत्ता (बड़े भाईके अविवाहित रहते हुए विवाह करनेवाला छोटा भाई), परिवित्ति (परिवेत्ताका बड़ा भाई), ब्रह्महत्यारा और जो दूसरोंकी निन्दा करनेवाला है वह तथा छोटी बहिनके विवाहके बाद उसकी बड़ी बहिनसे ब्याह करनेवाला, जेठी बहिनके अविवाहित रहते हुए ही उसकी छोटी बहिनसे विवाह करनेवाला, जिसका व्रत नष्ट हो गया हो वह ब्रह्मचारी, द्विजकी हत्या करनेवाला, अपात्रको दान देनेवाला, सुपात्र ब्राह्मणको दान न देनेवाला, ग्रामका नाश करनेवाला, मांस बेचनेवाला तथा जो आग लगानेवाला है, जो वेतन लेकर वेद पढ़ानेवाला एवं स्त्री और शूद्रका वध करनेवाला है, इनमें पीछेवालोंसे पहलेवाले अधिक पापी हैं तथा पशु-वध करनेवाला, दूसरोंके घरमें आग लगानेवाला, झूठ बोलकर पेट पालनेवाला, गुरुका अपमान और सदाचारकी मर्यादाका उल्लंघन करनेवाला--ये सभी पापी माने गये हैं। इन्हें प्रायश्रित्त करना चाहिये

ဗျာသ မဟာရသီက မိန့်တော်မူသည်– «မိန်းမနှင့် ရှူဒြ (Śūdra) ကို သတ်ခြင်းပါဝင်သော ယဇ္ဉ်သည် ရှုတ်ချခံရသည်။ ထိုကဲ့သို့ အပြစ်များအနက် အစောပိုင်းတွင် ဖော်ပြခဲ့သည့် အပြစ်သည် နောက်ပိုင်းထက် ပို၍ အပြစ်ကြီးသည်ဟု သတ်မှတ်ကြသည်။ ထို့အပြင် တိရစ္ဆာန်သတ်သူနှင့် အခြားသူ၏ အိမ်ကို မီးရှို့သူတို့လည်း အပြစ်ကြီးသူများအဖြစ် ရေတွက်ကြသည်»။

Verse 8

अनृतेनोपवर्ती च प्रतिरोद्धा गुरोस्तथा । एतान्येनांसि सर्वाणि व्युत्क्रान्तसमयश्नल यः:,कुन्तीनन्दन! इसके सिवा परिवेत्ता (बड़े भाईके अविवाहित रहते हुए विवाह करनेवाला छोटा भाई), परिवित्ति (परिवेत्ताका बड़ा भाई), ब्रह्महत्यारा और जो दूसरोंकी निन्दा करनेवाला है वह तथा छोटी बहिनके विवाहके बाद उसकी बड़ी बहिनसे ब्याह करनेवाला, जेठी बहिनके अविवाहित रहते हुए ही उसकी छोटी बहिनसे विवाह करनेवाला, जिसका व्रत नष्ट हो गया हो वह ब्रह्मचारी, द्विजकी हत्या करनेवाला, अपात्रको दान देनेवाला, सुपात्र ब्राह्मणको दान न देनेवाला, ग्रामका नाश करनेवाला, मांस बेचनेवाला तथा जो आग लगानेवाला है, जो वेतन लेकर वेद पढ़ानेवाला एवं स्त्री और शूद्रका वध करनेवाला है, इनमें पीछेवालोंसे पहलेवाले अधिक पापी हैं तथा पशु-वध करनेवाला, दूसरोंके घरमें आग लगानेवाला, झूठ बोलकर पेट पालनेवाला, गुरुका अपमान और सदाचारकी मर्यादाका उल्लंघन करनेवाला--ये सभी पापी माने गये हैं। इन्हें प्रायश्रित्त करना चाहिये

ဗျာသ မဟာရသီက မိန့်တော်မူသည်– «ကွန်တီ၏သားရေ၊ မုသာဖြင့် အသက်မွေးသူ၊ မိမိဆရာကို တားဆီးကာ ဆန့်ကျင်သူ—ဤအရာတို့နှင့် ထိုသို့သော အပြုအမူအားလုံးသည် အပြစ်ဖြစ်သည်။ ထို့အပြင် သင့်လျော်သော အကျင့်အကြံနှင့် အတည်ပြုထားသော စည်းကမ်းသတ်မှတ်ချက်များ၏ အကန့်အသတ်ကို ကျော်လွန်သူ မည်သူမဆို အပြစ်ရှိသူဟု ရေတွက်ကြသည်»။

Verse 9

अकार्याणि तु वक्ष्यामि यानि तानि निबोध मे । लोकवेदविरुद्धानि तान्येकाग्रमना: शृणु,इनके सिवा, जो लोक और वेदसे विरुद्ध न करनेयोग्य कर्म हैं, उन्हें भी बताता हूँ। तुम एकाग्रचित होकर सुनो और समझो

ဗျာသက «ယခု ငါသည် မလုပ်သင့်သော အမှုများကို ပြောမည်။ ငါ့ထံမှ နားလည်ယူလော့။ ထိုအမှုများသည် လောက၏ သာမန်သီလစည်းကမ်းနှင့် ဝေဒ၏ အာဏာတို့နှစ်ပါးလုံးကို ဆန့်ကျင်သဖြင့် စိတ်တစ်ချက်တည်း စူးစိုက်၍ နားထောင်လော့» ဟု ဆို၏။

Verse 10

स्वधर्मस्य परित्याग: परधर्मस्य च क्रिया । अयाज्ययाजनं चैव तथाभक्ष्यस्य भक्षणम्‌

ဗျာသက «မိမိ၏ သင့်လျော်သော တာဝန်(သွဓမ္မ)ကို စွန့်၍ အခြားသူ၏ တာဝန်(ပရဓမ္မ)ကို လုပ်ခြင်း၊ မထိုက်တန်သော ယဇ္ဉပိုင်ရှင်များအတွက် ယဇ္ဉကို အမှုထမ်းပေးခြင်း၊ ထို့အပြင် မစားသင့်သော အစာကို စားခြင်း—ဤတို့သည် ဓမ္မမှ ပြင်းထန်စွာ လွဲချော်ခြင်းများ ဖြစ်သည်» ဟု ဆို၏။

Verse 12

आधानादीनि कर्माणि शक्तिमान्न करोति यः । अप्रयच्छंश्व॒ सर्वाणि नित्यदेयानि भारत

ဗျာသက «အို ဘာရတ၊ အင်အားနှင့် အရင်းအနှီးရှိသော်လည်း အိမ်ထောင်ရေး သံစကာရများမှ စ၍ သတ်မှတ်ထားသော ကర్మများကို မလုပ်သူ၊ ထို့ပြင် အမြဲပေးရမည့် ဒါနများအားလုံးကို မပေးဘဲ တားဆီးထားသူသည် မိမိတာဝန်၌ ချို့ယွင်းကာ သီလတရားမှ လျော့နည်းသွားသည်» ဟု ဆို၏။

Verse 13

शरणागतसंत्यागो भृत्यस्यथाभरणं तथा । रसानां विक्रयश्षापि तिर्यग्योनिवधस्तथा,दक्षिणानामदानं च ब्राह्मणस्वाभिमर्शनम्‌ । सर्वाण्येतान्यकार्याणि प्राहुर्धमविदो जना:

ဗျာသက «ခိုလှုံလာသူကို စွန့်ပစ်ခြင်း၊ မိမိအပေါ် မူတည်နေသော အလုပ်သမား/ကျွန်ကို သင့်တော်သလို မထောက်ပံ့ မကာကွယ်ခြင်း၊ မူးယစ်စေသော သို့မဟုတ် အာရုံခံစားမှုကို လှုံ့ဆော်သော အရည်အမျိုးမျိုးကို ရောင်းဝယ်ခြင်း၊ တိရစ္ဆာန်လောကရှိ သတ္တဝါများကို သတ်ဖြတ်ခြင်း၊ ထုံးတမ်းအရ ပေးရမည့် ဒါနများ (အထူးသဖြင့် ယဇ္ဉတွင် ပေးရမည့်) ကို မပေးခြင်း၊ ဗြာဟ္မဏကို ထိပါးစော်ကားခြင်း—ဓမ္မကို အမှန်တကယ် သိသူတို့က ဤအရာအားလုံးကို မလုပ်သင့်သော အမှုများဟု ကြေညာကြသည်» ဟု ဆို၏။

Verse 14

भारत! अपने धर्मको त्याग देना और दूसरेके धर्मका आचरण करना, यज्ञके अनधिकारीको यज्ञ कराना तथा अभक्ष्य भक्षण करना, शरणागतका त्याग करना और भरण करने योग्य व्यक्तियोंका भरण-पोषण न करना, एवं रसोंको बेचना, पशु-पक्षियोंको मारना और शक्ति रहते हुए भी अग्न्याधान आदि कर्मोको न करना, नित्य देने योग्य गोग्रास आदि को न देना, ब्राह्मणोंको दक्षिणा न देना और उनका सर्वस्व छीन लेना, धर्मतत्त्वके जाननेवालोंने ये सभी कर्म न करने योग्य बताये हैं ।। पित्रा विवदते पुत्रो यश्व स्थाद्‌ गुरुतल्पग: । अप्रजायन्‌ नरव्याप्र भवत्यधार्मिको नर:,राजन! जो पुरुष पिताके साथ झगड़ा करता है, गुरुकी शय्यापर सोता है, ऋतुकालमें भी अपनी पत्नीके साथ समागम नहीं करता है, वह मनुष्य अधार्मिक होता है

ဗျာသက «အို ဘာရတ၊ မိမိ၏ သွဓမ္မကို စွန့်၍ ပရဓမ္မကို ကျင့်ခြင်း၊ အခွင့်မရှိသူကို ယဇ္ဉလုပ်စေခြင်း၊ မစားသင့်သော အစာကို စားခြင်း၊ ခိုလှုံလာသူကို စွန့်ပစ်ခြင်း၊ ထောက်ပံ့ရမည့်သူတို့ကို မထောက်ပံ့ခြင်း၊ မူးယစ်ရည်နှင့် ထိုကဲ့သို့သော အရည်များကို ရောင်းဝယ်ခြင်း၊ တိရစ္ဆာန်နှင့် ငှက်တို့ကို သတ်ခြင်း၊ အင်အားရှိသော်လည်း အဂ္နိအာဓာန စသည့် မီးတည်ထောင်ရာ အခမ်းအနားများကို မလုပ်ခြင်း၊ နေ့စဉ်ပူဇော်ရမည့် ‘နွား၏ အပိုင်း’ စသည့် ပူဇော်သက္ကာများကို မပေးခြင်း၊ ဗြာဟ္မဏတို့အား ဒက္ခိဏာ(ယဇ္ဉခ) မပေးခြင်းနှင့် သူတို့၏ အသက်မွေးဝမ်းကျောင်းကိုတောင် လုယူခြင်း—ဓမ္မတရား၏ သဘောတရားကို သိသူတို့က ဤအရာအားလုံးကို မလုပ်သင့်သော အမှုများဟု ဆိုကြသည်။ ထို့ပြင် အို မင်းကြီး၊ ဖခင်နှင့် အငြင်းပွားသူ၊ ဆရာ၏ အိပ်ရာကို ဖောက်ပြန်သူ(ဂုရုတလ္ပဂ)၊ သင့်တော်သော ကာလရောက်သော်လည်း သားသမီးရရန် မိမိဇနီးထံ မချဉ်းကပ်သူ—ထိုသူသည် အဓမ္မသော လူဖြစ်လာသည်» ဟု ဆို၏။

Verse 15

उक्तान्येतानि कर्माणि विस्तरेणेतरेण च । यानि कुर्वन्नकुर्वश्च प्रायश्षित्तीयते नर:,इस प्रकार संक्षेप और विस्तारसे जो ये कर्म बताये गये हैं, उनमेंसे कुछको करनेसे और कुछको न करनेसे मनुष्य प्रायश्चित्तका भागी होता है

ဗျာသက ပြောသည်– «ဤအကျင့်ကိစ္စများကို တချို့ကို အသေးစိတ်၊ တချို့ကို အကျဉ်းချုပ်၍ ဖော်ပြပြီးပြီ။ ထိုအရာများထဲမှ တချို့ကို ပြုလုပ်ခြင်းနှင့် တချို့ကို ရှောင်ကြဉ်ခြင်းကြောင့် လူသည် “ပရာယရှ္စိတ္တ” (prāyaścitta) ဟူသော အပြစ်ဖြေသန့်စင်မှုကို လိုအပ်လာသူ ဖြစ်လာသည်—ဓမ္မအတိုင်း အပြစ်ဖြေ၍ သန့်စင်ရမည့် အကြောင်း ဖြစ်ပေါ်လာသည်»။

Verse 16

एतान्येव तु कर्माणि क्रियमाणानि मानवा: । येषु येषु निमित्तेषु न लिप्यन्तेडथ तान्‌ शृणु,अब जिन-जिन कारणोंके होनेपर इन कर्मोौंको करते रहनेपर भी मनुष्य पापसे लिप्त नहीं होते, उनका वर्णन सुनो

«ဤအကျင့်ကိစ္စများကိုပင် လူတို့က ပြုလုပ်သော်လည်း အချို့သော သီးသန့်အခြေအနေများတွင် အပြစ်အညစ်မကပ်တတ်။ ယခု ငါရှင်းပြမည့် အကြောင်းရင်းများကို နားထောင်လော့—ဤကိစ္စများကို ဆက်လက်ပြုလုပ်နေသော်လည်း အပြစ်မစွဲကပ်သည့် အခြေခံများပင် ဖြစ်သည်»။

Verse 17

प्रगृह् शस्त्रमायान्तमपि वेदान्तगं रणे | जिघांसन्तं जिघांसीयाजन्न तेन ब्रह्महा भवेत्‌,यदि युद्धस्थलमें वेदवेदान्तोंका पारगामी दिद्वान्‌ ब्राह्मण भी हाथमें हथियार लेकर मारनेके लिये आवे तो स्वयं भी उसको मार डालनेकी चेष्टा करे। इससे ब्रह्महत्याका पाप नहीं लगता है

ဗျာသက ပြောသည်– «ဗေဒနှင့် ဝေဒန္တကို ကျွမ်းကျင်သိမြင်သော ဗြာဟ္မဏတစ်ဦးပင် စစ်မြေပြင်သို့ လက်နက်ကိုင်ကာ သတ်လိုစိတ်ဖြင့် လာလျှင်လည်း၊ မိမိဘက်မှလည်း သူ့ကို သတ်ရန် ကြိုးပမ်းရမည်။ စစ်ပွဲနှင့် ကိုယ်ကာကွယ်ရေး၏ အခြေအနေ၌ ထိုသို့ပြုခြင်းကြောင့် ဗြာဟ္မဏသတ်မှု (brahmahatyā) ၏ အပြစ် မတင်ရ။»

Verse 18

इति चाप्यत्र कौन्तेय मन्त्रो वेदेषु पठ्यते । वेदप्रमाणविद्ितं धर्म च प्रत्रवीमि ते,कुन्तीनन्दन! इस विषयमें वेदका एक मन्त्र भी पढ़ा जाता है। मैं तुमसे उसी धर्मकी बात कहता हूँ, जो वैदिक प्रमाणसे विहित है

ဗျာသက ပြောသည်– «ကွန်တီ၏သားရေ၊ ဤအကြောင်းအရာ၌ ဗေဒများအတွင်း ဖတ်ရွတ်ကြသော မန္တရတစ်ပုဒ်လည်း ရှိသည်။ ငါသည် ဗေဒအာဏာပိုင် သက်သေပြချက်ဖြင့် သတ်မှတ်ထားသော ဓမ္မကို သင့်အား ကြေညာမည်။»

Verse 19

अपेतं ब्राह्मण वृत्ताद्‌ यो हन्यादाततायिनम्‌ | न तेन ब्रह्महा स स्यान्मन्युस्तन्मन्युमृच्छति,जो ब्राह्मणोचित आचारसे भ्रष्ट होकर आततायी बन गया हो--हाथमें हथियार लेकर मारने आ रहा हो, ऐसे ब्राह्मणको मारनेसे ब्रह्महत्याका पाप नहीं लगता। क्रोध ही उसके क्रोधका सामना करता है

ဗျာသက ပြောသည်– «ဗြာဟ္မဏအကျင့်မှ လွဲချော်ကာ ātatāyin—လက်နက်ကိုင်၍ သတ်ရန် လာသော ရန်ပြုသူ—ဖြစ်သွားသော ဗြာဟ္မဏကို လူတစ်ဦးက သတ်လျှင်၊ ထိုသူသည် brahmahatyā (ဗြာဟ္မဏသတ်မှု) ၏ အပြစ် မတင်ရ။ ဤကိစ္စ၌ ဒေါသသည် ဒေါသကိုသာ ဆုံတွေ့သည်—ရန်ပြုသူ၏ အကြမ်းဖက်လိုစိတ်ကို တားဆီးရန် လိုအပ်သော အင်အားဖြင့် တုံ့ပြန်ခြင်းပင် ဖြစ်သည်»။

Verse 20

प्राणात्यये तथाज्ञानादाचरन्मदिरामपि । आदेशितो धर्मपरै: पुन: संस्कारमरहति,अनजानमें अथवा प्राणसंकटके समय भी यदि मदिरापान कर ले तो बादमें धर्मात्मा पुरुषोंकी आज्ञाके अनुसार उसका पुनः संस्कार होना चाहिये

ဗျာသက မိန့်ကြားသည်– မသိမသာကြောင့်ဖြစ်စေ၊ အသက်အန္တရာယ်ကြီးမားသည့်အခိုက်အတန့်၌ဖြစ်စေ မူးယစ်သောက်ရည်ကို သောက်မိသော်လည်း၊ နောက်တစ်ဖန် သာသနာဓမ္မကိုလိုက်နာသော သမာဓိရှိသူတို့၏ အမိန့်ညွှန်ကြားချက်အတိုင်း ပြန်လည်သန့်စင်အောင် “ပြန်လည်သက္ကာရ” (re-sanctification) ကို ခံယူရန် အရည်အချင်းရှိနေသေးသည်။ ဤသင်ခန်းစာသည် အပြစ်တင်ခြင်းသည် စိတ်ရည်ရွယ်ချက်နှင့် အခြေအနေအပေါ် မူတည်ကြောင်း၊ ထို့ပြင် သတ်မှတ်ထားသော အပြစ်ဖြေ (prāyaścitta) အခမ်းအနားများဖြင့် ညွှန်ကြားမှုအောက်တွင် သီလဓမ္မကို ပြန်လည်တည်ဆောက်နိုင်ကြောင်းကို ဖော်ပြသည်။

Verse 21

एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं कौन्तेयाभक्ष्यभक्षणम्‌ । प्रायश्षित्तविधानेन सर्वमेतेन शुद्धयति,कुन्तीनन्दन! यही बात अन्य सब अभक्ष्यभक्षणोंके विषयमें भी कही गयी है। प्रायश्रित्त कर लेनेसे सब शुद्ध हो जाता है

ဗျာသက မိန့်ကြားသည်– “ကွန်တီ၏သားရေ၊ မစားသင့်သောအရာကို စားသုံးခြင်းအကြောင်းကို သင့်အား အပြည့်အစုံ ရှင်းပြပြီးပြီ။ သတ်မှတ်ထားသော အပြစ်ဖြေ (prāyaścitta) နည်းလမ်းအတိုင်း ဆောင်ရွက်လျှင် ထိုအပြစ်အနာအဆာအားလုံး သန့်စင်သွားသည်။ မစားသင့်သောအရာကို စားသုံးခြင်းအခြားကိစ္စများတွင်လည်း ဤတရားတော်တူညီသည်—သင့်တော်သော အပြစ်ဖြေကို ပြုလုပ်ပြီးလျှင် ပြန်လည်သန့်ရှင်းလာသည်။”

Verse 22

गुरुतल्पं हि गुर्वर्थ न दूषयति मानवम्‌ | उद्दालक: श्वेतकेतुं जनयामास शिष्यत:,गुरुकी आज्ञासे उन्हींके प्रयोजनकी सिद्धिके लिये गुरुकी शय्यापर शयन करना मनुष्यको दूषित नहीं करता है। उद्दालकने अपने पुत्र श्वेतकेतुको शिष्यद्वारा उत्पन्न कराया था

ဗျာသက မိန့်ကြားသည်– ဆရာ၏အကျိုးအတွက်၊ ဆရာ၏အမိန့်ဖြင့် ဆရာ၏အိပ်ရာ (gurūtālpa) ပေါ်တွင် လဲလျောင်းခြင်းသည် လူကို မညစ်ညမ်းစေ။ ထို့ကြောင့်ပင် ဥဒ္ဒာလကသည် မိမိ၏သား ရွှေတကေတုကို တပည့်တစ်ဦးအားဖြင့် မွေးဖွားစေခဲ့သည်ဟု ဆိုကြသည်—ဂုရု၏ ရည်ရွယ်ချက်နှင့် အာဏာအမိန့်အတိုင်း ဖြစ်သည်။

Verse 23

स्तेय॑ कुर्वश्न गुर्वर्थमापत्सु न निषिध्यते । बहुश: कामकारेण न चेद्‌ यः सम्प्रवर्तते

ဗျာသက မိန့်ကြားသည်– အရေးပေါ်အခက်အခဲကာလ၌ ဆရာ၏အကျိုးအတွက် (ခိုးယူခြင်းဖြစ်စေ) ယူဆောင်ခြင်းကို မကန့်ကွက်ကြ။ သို့သော် ကိုယ်လိုချင်စိတ်နှင့် ကိုယ်အလိုအလျောက်ကြောင့် ထိုကဲ့သို့သော အမှုများကို အကြိမ်ကြိမ် မစတင်မလုပ်ဆောင်သူသည် စည်းကမ်းမဲ့သူအဖြစ် အမြဲတမ်းကျင့်သုံးသူနှင့် ကွဲပြားသည်။

Verse 24

अन्यत्र ब्राह्मणस्वेभ्य आददानो न दुष्यति । स्वयमप्राशिता यश्ष न स पापेन लिप्यते

ဗျာသက မိန့်ကြားသည်– “ဗြာဟ္မဏတို့၏ ပိုင်ဆိုင်မှုကို မဟုတ်သရွေ့၊ ပစ္စည်းကို ယူဆောင်သူသည် ဓမ္မအညစ်အကြေး မတင်မိ။ ထို့ပြင် ထိုအစားအစာကို ကိုယ်တိုင် မစားသုံးခဲ့သူသည် အပြစ်ဖြင့် မလိမ်းကျံမိ။”

Verse 25

(चोरी सर्वथा निषिद्ध है) किंतु आपत्तिकालमें कभी गुरुके लिये चोरी करनेवाला पुरुष दोषका भागी नहीं होता है। यदि मनमें कामना रखकर बारंबार उस चौर्य-कर्ममें वह प्रवृत्त न होता हो तो आपत्तिके समय ब्राह्मणके सिवा किसी दूसरेका धन लेनेवाला मनुष्य पापका भागी नहीं होता है। जो स्वयं उस चोरीका अन्न नहीं खाता, वह भी चौर्यदोषसे लिप्त नहीं होता है ।। प्राणत्राणेडनृतं वाच्यमात्मनो वा परस्य च । गुर्वर्थे स्त्रीषु चैव स्‍्पाद्‌ विवाहकरणेषु च,अपने या दूसरेके प्राण बचानेके लिये, गुरुके लिये, एकान्तमें अपनी स्त्रीके पास विनोद करते समय अथवा विवाहके प्रसड़में झूठ बोल दिया जाय तो पाप नहीं लगता है

ဗျာသက ဆိုသည်—အရေးပေါ်အခြေအနေများနှင့် လူမှုရေးလိုအပ်ချက်အချို့တွင်သာ မုသားစကားကို ပြောလျှင် အပြစ်မဖြစ်နိုင်သည်။ မိမိအသက် သို့မဟုတ် အခြားသူ၏အသက်ကို ကယ်ရန်၊ ဂုရု (ဆရာ) အကျိုးအတွက်၊ မိမိဇနီးနှင့် သီးသန့်အတွင်း ရယ်မောကစားသည့် ချစ်ခင်ရင်းနှီးမှုတွင်၊ သို့မဟုတ် မင်္ဂလာအိမ်ထောင်ရေး စီစဉ်ရာတွင် မုသားပြောရလျှင် အပြစ်မတင်။ ဓမ္မ၏အဓိပ္ပါယ်မှာ—ရည်ရွယ်ချက်နှင့် အခြေအနေကို ချိန်ဆ၍ ဆုံးဖြတ်ခြင်းဖြစ်သည်။ သစ္စာပြောခြင်းသည် စံနမူနာဖြစ်သော်လည်း အသက်ကယ်ခြင်း၊ ဂုရုအပေါ် တာဝန်နှင့် လူမှုစည်းကမ်းကို ကာကွယ်ခြင်းကဲ့သို့ မြင့်မားသောကောင်းကျိုးများ ရှိလာသည့်အခါ ထိုစံကို ခဏလျော့နိုင်သည်။

Verse 26

नावर्तते व्रतं स्वप्ने शुक्रमोक्षे कथंचन । आज्यहोम: समिद्धे्ग्नौ प्रायक्षित्तं विधीयते,यदि किसी कारणसे स्वप्रमें वीर्य स्खलित हो जाय तो इससे ब्रह्मचारीके लिये दुबारा व्रत लेने--उपनयन-संस्कार करानेकी आवश्यकता नहीं है। इसके लिये प्रज्वलित अग्निमें घीका हवन करना प्रायश्चित्त बताया गया है

ဗျာသက မိန့်သည်—အိပ်မက်အတွင်း မလိုလားအပ်ဘဲ သုက်ထွက်သွားလျှင်ပင် ဗြဟ္မစရိယ (brahmacarya) ဝတ်ကို မည်သို့မျှ မဖောက်ဖျက်သကဲ့သို့ မထင်ရ၊ ထို့ကြောင့် ဝတ်ကို ပြန်လည်ခံယူရန် မလို။ ထိုကိစ္စအတွက် ပြာယရှ္စိတ္တ (အပြစ်ဖြေ) အဖြစ် မီးကို သင့်တော်စွာ ထွန်းညှိပြီး ဂhee (နွားနို့ဆီ) ကို မီးထဲသို့ ဟောမ (ပူဇော်) ရန် သတ်မှတ်ထားသည်။

Verse 27

पारिवित्त्यं तु पतिते नास्ति प्रव्रजिते तथा । भिक्षिते पारदार्य च तद्‌ धर्मस्य न दूषकम्‌

ဗျာသက မိန့်သည်—“‘ပါရိဝိတ္တျ’ ဟုခေါ်သော အပြစ်သည် သီလမှန်ကန်မှုမှ ကျဆုံးသူအပေါ် မသက်ရောက်၊ ထို့အတူ လောကကို စွန့်ခွာသွားသူ (ပရဝ္ရဇိတ) အပေါ်လည်း မသက်ရောက်။ ထို့ပြင် ဆင်းရဲကျပ်တည်း၍ တောင်းစားရသည့်အခါတွင် အသက်ရှင်ရန်အတွက် အခြားသူ၏ မယားကို ယူခြင်းပင်လျှင် ဓမ္မကို မညစ်ညမ်းစေဟု မယူဆကြ” ဟု။

Verse 28

यदि बड़ा भाई पतित हो जाय या संन्यास ले ले तो उसके अविवाहित रहते हुए भी छोटे भाईका विवाह कर लेना दोषकी बात नहीं है। संतान-प्राप्तिके लिये स्त्रीद्वारा प्रार्थना करनेपर यदि कभी परस्त्रीसंगम किया जाय तो वह धर्मका लोप करनेवाला नहीं होता है ।। वृथा पशुसमालम्भं नैव कुर्यान्न कारयेत्‌ । अनुग्रह: पशूनां हि संस्कारो विधिनोदित:,मनुष्यको चाहिये कि वह व्यर्थ ही पशुओंका वध न तो करे और न करावे। विधिपूर्वक किया हुआ पशुओंका संस्कार उनपर अनुग्रह है

ဗျာသက ရှင်းလင်းသည်—အစ်ကိုကြီးသည် သီလမှန်ကန်မှုမှ ကျဆုံးသွားလျှင် သို့မဟုတ် သံန്യാസယူ၍ လောကကို စွန့်ခွာသွားလျှင်၊ အစ်ကိုကြီး မင်္ဂလာမဆောင်ရသေးသော်လည်း ညီငယ်သည် မင်္ဂလာဆောင်နိုင်ပြီး အပြစ်မရှိ။ ထို့အတူ သားသမီးရရန် မယားက တောင်းပန်သဖြင့် အထူးအခြေအနေတစ်ရပ်အဖြစ် အခြားမိန်းမနှင့် ဆက်ဆံရခြင်းသည် ဓမ္မကို ဖျက်ဆီးသည်ဟု မဆို။ ထို့နောက် သူက တားမြစ်ချက်တစ်ရပ် ထပ်မံဆိုသည်—အကျိုးမဲ့သက်သက် တိရစ္ဆာန်များကို မသတ်သင့်၊ မသတ်ခိုင်းသင့်။ စည်းကမ်းနည်းလမ်းအတိုင်း ရိုးရာပူဇော်သန့်စင်ခြင်း (saṃskāra) ဖြင့် ပြုလုပ်သောအခါ ထိုသည် တိရစ္ဆာန်အပေါ် အနုဂ्रहတစ်ရပ်၊ စည်းကမ်းတကျ ခွင့်ပြုထားသော ပြုမူမှုဖြစ်ပြီး ရက်စက်ကြမ်းကြုတ်မှုသာ မဟုတ်။

Verse 29

अनरहें ब्राह्मणे दत्तमज्ञानात्‌ तन्न दूषकम्‌ | सत्काराणां तथा तीर्थ नित्यं वाप्रतिपादनम्‌,यदि अनजानमें किसी अयोग्य ब्राह्मणको दान दे दिया जाय अथवा योग्य ब्राह्मणको सत्कारपूर्वक दान न दिया जा सके तो वह दोषकारक नहीं होता

ဗျာသက ရှင်းပြသည်—မသိနားမလည်မှုကြောင့် မထိုက်တန်သော ဗြာဟ္မဏတစ်ဦးထံသို့ ဒါနပေးမိလျှင် ထိုဒါနသည် အကျင့်စာရိတ္တအပြစ် မဖြစ်စေ။ ထို့အတူ သင့်တော်သူများကိုလည်းကောင်း၊ သန့်ရှင်းသော တီర్థ (သီရ္ထ) နှင့် ပူဇော်ပွဲအခမ်းအနားများနှင့် ဆက်စပ်၍လည်းကောင်း အမြဲတစေ ဂုဏ်ပြုကာ ဒါနမပေးနိုင်ခြင်းသည် မရည်ရွယ်ဘဲ အခြေအနေကြောင့် ကန့်သတ်ခံရခြင်းသာ ဖြစ်လျှင် အပြစ်တင်မခံရ။ ဓမ္မ၏အလေးထားချက်မှာ ဒါန၏ လမ်းလွဲမှုထက် ရည်ရွယ်ချက်နှင့် သိမြင်မှုကို ပိုမိုချိန်ဆခြင်း ဖြစ်သည်။

Verse 30

स्त्रियास्तथापचारिण्या निष्कृति: स्याददूषिका । अपि सा पूयते तेन न तु भर्ता प्रदुष्पति,यदि व्यभिचारिणी स्त्रीका तिरस्कार किया जाय तो वह दोषकी बात नहीं है। उस तिरस्कारसे स्त्रीकी तो शुद्धि होती है और पति भी दोषका भागी नहीं होता

ဗျာသက မိန့်ကြားသည်– မသင့်လျော်စွာ ပြုမူခဲ့သော မိန်းမတစ်ဦးအတွက် ခွဲခွာပယ်ချခြင်း သို့မဟုတ် လူမှုရေးအပြစ်တင်ခြင်းသည် အပြစ်မရှိသော ပြစ်ဒဏ်ဖြေ (ပရာယရှ္စိတ္တ) တစ်ရပ် ဖြစ်သည်။ ထိုအပြစ်တင်ခြင်းကြောင့်ပင် သူမသည် သန့်စင်သွားသည်ဟု ယူဆကြပြီး၊ ခင်ပွန်းသည်လည်း သူမ၏ လွန်ကျူးမှုကြောင့် မညစ်ညမ်းမဖြစ်ပေ။

Verse 31

तत्त्वं ज्ञात्वा तु सोमस्य विक्रय: स्याददोषवान्‌ | असमर्थस्य भृत्यस्य विसर्ग: स्याददोषवान्‌ | वनदाहो गवामर्थे क्रियमाणो न दूषक:

ဗျာသက မိန့်ကြားသည်– အကြောင်းအရာ၏ အမှန်တရားကို သိမြင်လျှင် ဆိုမ (Soma) ကို ရောင်းချခြင်းပင် အပြစ်ကင်းနိုင်သည်။ ထို့အတူ မစွမ်းဆောင်နိုင်သော အလုပ်သမား/ကျွန်ကို ထုတ်ပယ်ခြင်းလည်း အပြစ်ကင်းနိုင်သည်။ ထို့ပြင် နွားများ၏ အကျိုးအတွက် ရည်ရွယ်၍ တောမီးတင်ခြင်းသည် ထိုရည်ရွယ်ချက်အတွက် ပြုလုပ်လျှင် အပြစ်တင်စရာ မဟုတ်။

Verse 32

सोमरसके तत्त्वको जानकर यदि उसका विक्रय किया जाय तो बेचनेवाला दोषका भागी नहीं होता। जो सेवक काम करनेमें असमर्थ हो जाय, उसे छोड़ देनेसे भी दोष नहीं लगता। गौओंकी सुविधाके लिये यदि जंगलमें आग लगायी जाय तो उससे पाप नहीं होता है।। उक्तान्येतानि कर्माणि यानि कुर्वन्न दुष्यति । प्रायक्षित्तानि वक्ष्यामि विस्तरेणैव भारत,भरतनन्दन! ये सब तो मैंने वे कर्म बताये हैं, जिन्हें करनेवाला दोषका भागी नहीं होता है। अब मैं विरतारपूर्वक प्रायश्ित्तोंका वर्णन करूँगा

ဗျာသက မိန့်ကြားသည်– ဆိုမရည်၏ အနှစ်သာရကို သိမြင်ပြီး ရောင်းချလျှင် ရောင်းသူသည် အပြစ်မခံရ။ ထို့အတူ တာဝန်ထမ်းဆောင်ရန် မစွမ်းနိုင်တော့သော ကျွန်/အလုပ်သမားကို လွှတ်ပေးခြင်းလည်း အပြစ်မရှိ။ နွားများ၏ အကျိုးချမ်းသာအတွက် တောကို မီးရှို့လျှင်လည်း ထိုလုပ်ရပ်ကြောင့် အပြစ်မဖြစ်။ ဤတို့သည် အို ဘာရတ၊ ပြုလုပ်သော်လည်း လူကို အပြစ်တင်မစေသော လုပ်ရပ်များ ဖြစ်သည်။ အပြစ်မဖြစ်စေသော လုပ်ရပ်များကို ဤသို့ ဖော်ပြပြီးနောက် ယခုမှစ၍ ကဖျက်ဖြေခြင်း (prāyaścitta) များကို အသေးစိတ် ရှင်းလင်းမည်။

Verse 34

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि प्रायश्षित्तीये चतुस्त्रिंशो 5ध्याय:

ဤသို့ဖြင့် သီရိမဟာဘာရတ၏ ရှာန္တိပရဝ၌ ရာဇဓမ္မ အနုရှာသနပရဝ အတွင်းရှိ ပြစ်ဒဏ်ဖြေ (prāyaścitta) ဆိုင်ရာ အခန်း ၃၄ ပြီးဆုံး၏။

Frequently Asked Questions

Yudhiṣṭhira’s dilemma is self-attribution of blame for mass death versus the demands of kṣatriya-duty; Vyāsa resolves this by distinguishing immediate instrumental action from ultimate causality (kāla/karma) while still prescribing responsible restitution through rājadharma.

The chapter teaches a dual register: accept the impersonal operation of kāla as karmic witness and result-giver, yet do not abandon duty—transform grief into disciplined governance, social reassurance, and ethically framed remedial action.

A formal phalaśruti is not explicit; the functional equivalent is prescriptive closure—Vyāsa links correct understanding of kāla–karma to psychological steadiness, legitimate rule, and purification through aśvamedha, implying beneficial outcomes in both political order and the ruler’s moral trajectory.