
Chapter 47: Krauñca-vyūha Deployment and Conch-Signals (Kaurava–Pāṇḍava Readiness)
Upa-parva: Vyūha-nirmāṇa (Krauñca-vyūha) and Śaṅkha-nāda Episode
Sañjaya reports that on seeing a daunting Krauñca formation arranged against the Pāṇḍavas, Duryodhana approaches senior figures—Droṇa (ācārya), Kṛpa, Śalya, Saumadatti, Vikarṇa, Aśvatthāman, and his brothers and allied warriors—and delivers a timed exhortation. He asserts their individual prowess, contrasts perceived adequacy and inadequacy of forces while Bhīṣma commands, and assigns protective responsibilities: specific regional and clan contingents are positioned to guard Bhīṣma and to hold the left wing, right wing, and rear. The Kaurava command structure is then shown in motion—Droṇa and Bhīṣma advance the formation to obstruct the Pāṇḍavas, with Śakuni and others guarding supporting elements. The episode transitions into formalized acoustic signaling: Kauravas sound conches and instruments; Bhīṣma answers with a loud conch; then Kṛṣṇa and Arjuna, followed by Bhīma, Yudhiṣṭhira, Nakula, Sahadeva, and allied leaders, blow their conches. The resulting tumult symbolizes synchronized mobilization and the resumption of engagement.
Chapter Arc: रणभूमि के कोलाहल के बीच एक ओर गीता-महात्म्य की गूँज—‘गीता सर्वशास्त्रमयी’—और दूसरी ओर कौरव-पक्ष की सभा में युधिष्ठिर के नाम पर धिक्कार; धर्म और युद्ध एक ही श्वास में टकराते हैं। → कौरव-शिविर में शल्य के सामने युद्ध-नीति और निष्ठा का प्रश्न तीखा होता जाता है—‘युद्ध से अन्य क्या चाहता है?’ जैसे वाक्य शल्य को क्लीबता के आरोप से उकसाते हैं; उधर पाण्डवों की कीर्ति का वृत्तान्त दूर-दूर तक फैलकर जन-समूह को भाव-विह्वल कर देता है। → शल्य का निर्णायक कथन—‘काम योत्स्ये परस्यार्थे… बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः’—वह स्वीकार करता है कि वह कौरवों के अर्थ-बन्धन से बँधा होकर पराये पक्ष के लिए भी युद्ध करने को विवश है; इसी क्षण युद्ध का नैतिक द्वंद्व नग्न हो उठता है। → सभा में ‘साधु साधु’ की स्तुतियाँ उठती हैं, और पाण्डवों के यश का समाचार सुनकर आर्य-म्लेच्छ तक गद्गद होकर रो पड़ते हैं; महाभेरियाँ और शंखनाद वातावरण को भर देते हैं—युद्ध का निर्णय भावनाओं के ज्वार में स्थिर हो जाता है। → शंख-भेरी के उन्माद के साथ अगला प्रहार किस ओर झुकेगा—शल्य की विवश निष्ठा कौरवों को उठाएगी या भीतर का धर्म उसे किसी अप्रत्याशित मोड़ पर ले जाएगा?
Verse 1
१०), 'सो5हमस्मि”--वह ब्रह्म ही मैं हूँ, आदि महावाक्योंके अनुसार जिसकी परमात्मामें अभिन्नभावसे नित्य अटल स्थिति हो जाती है, ऐसे सांख्ययोगीका वाचक यहाँ “ब्रह्मभूत:” पद है। गीताके पाँचवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें और छठे अध्यायके सत्ताईसवें श्लोकमें भी इस स्थितिवाले योगीको “ब्रह्म भूत” कहा है। ५. जिसका मन पवित्र, स्वच्छ और शान्त हो तथा निरन्तर शुद्ध प्रसन्न रहता हो, उसे “प्रसन्नात्मा' कहते हैं। <&. ब्रह्मभूत योगीकी सर्वत्र ब्रह्मबुद्धि हो जानेके कारण संसारकी किसी भी वस्तुमें उसकी भिन्न सत्ता, रमणीय-बुद्धि और ममता नहीं रहती। अतएव शरीरादिके साथ किसीका संयोग-वियोग होनेमें उसका कुछ भी बनता-बिगड़ता नहीं; इस कारण वह किसी भी हालतमें किसी भी कारणसे किंचिन्मात्र भी चिन्ता या शोक नहीं करता और वह पूर्णकाम हो जाता है, इसलिये वह कुछ भी नहीं चाहता। ७. जो ज्ञानयोगका फल है, जिसको ज्ञानकी परा निष्ठा और तत्त्वज्ञान भी कहते हैं, उसीको “परा भक्ति” कहा है। ८. इस परा भक्तिरूप तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति होनेके साथ ही वह योगी उस तत्त्वज्ञानके द्वारा मेरे यथार्थ रूपको जान लेता है; मेरा निर्गुण-निराकार रूप क्या है तथा सगुण-निराकार और सगुण-साकार रूप क्या है, मैं निराकारसे साकार कैसे होता हूँ और पुन: साकारसे निराकार कैसे होता हूँ---इत्यादि कुछ भी जानना उसके लिये शेष नहीं रहता। ९, परमात्माके तत्त्वज्ञान और उनकी प्राप्तिमें अन्तर यानी व्यवधान नहीं होता, परमात्माके स्वरूपको यथार्थ जानना और उनमें प्रविष्ट होना--दोनों एक साथ होते हैं। परमात्मा सबके आत्मरूप होनेसे वास्तवमें किसीको अप्राप्त नहीं हैं, अतः उनके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान होनेके साथ ही उनकी प्राप्ति हो जाती है। ३. अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार जितने भी शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म हैं--जिनका वर्णन पहले “नियत कर्म” और 'स्वभावज कर्म” के नामसे किया गया है तथा जो भगवान्की आज्ञा और प्रेरणाके अनुकूल हैं--उन सबका वाचक यहाँ 'सर्वकर्माणि” पद है। २. समस्त कर्मोंका और उनके फलरूप समस्त भोगोंका आश्रय त्यागकर जो भगवानके ही आश्रित हो गया है, जो अपने मन-इन्द्रियोंसहित शरीरको, उसके द्वारा किये जानेवाले समस्त कर्मोंकोी और उनके फलको भगवानके समर्पण करके उन सबसे ममता, आसक्ति और कामना हटाकर भगवानके ही परायण हो गया है, भगवान्को ही अपना परम प्राप्य, परम प्रिय, परम हितैषी, परमाधार और सर्वस्व समझकर जो भगवानके विधानमें सदैव प्रसन्न रहता है--किसी भी सांसारिक वस्तुके संयोग-वियोगमें और किसी भी घटनामें कभी हर्ष-शोक नहीं करता, सदा भगवानपर ही निर्भर रहता है, वह भक्तिप्रधान कर्मयोगी ही भगवत्परायण है। 3. जो सदासे है और सदा रहता है, जिसका कभी अभाव नहीं होता, वह सच्चिदानन्दघन, पूर्णब्रह्म, सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार परमेश्वर परम प्राप्य है, इसलिये उसे “परम पद” के नामसे कहा गया है। इसीको पैंतालीसवें श्लोकमें 'संसिद्धि', छियालीसवेंमें 'सिद्धि" और पचपनवें श्लोकमें “माम्” पदवाच्य परमेश्वर कहा गया है। ४. सांख्ययोगी समस्त परिग्रह और समस्त भोगोंका त्याग करके एकान्त देशमें निरन्तर परमात्माके ध्यानका साधन करता हुआ जिस परमात्माको प्राप्त करता है, भगवदाश्रयी कर्मयोगी स्ववर्णाश्रमोचित समस्त कर्मोंको सदा करता हुआ भी उसी परमात्माको प्राप्त हो जाता है; दोनोंके फलमें किसी प्रकारका भेद नहीं होता। ५. अपने मन, इन्द्रिय और शरीरको, उनके द्वारा किये जानेवाले कर्मोको और संसारकी समस्त वस्तुओंको भगवान्ूकी समझकर उन सबमें ममता, आसक्ति और कामनाका सर्वथा त्याग कर देना तथा मुझमें कुछ भी करनेकी शक्ति नहीं है, भगवान् ही सब प्रकारकी शक्ति प्रदान करके मेरे द्वारा अपने इच्छानुसार समस्त कर्म करवाते हैं, मैं कुछ भी नहीं करता--ऐसा समझकर भगवान्के आज्ञानुसार उन्हींके लिये, उन्हींकी प्रेरणासे, जैसे करावें वैसे ही, निमित्तमात्र बनकर समस्त कर्मोंको कठपुतलीकी भाँति करते रहना--यही समस्त कर्मोंको मनसे भगवानमें अर्पण कर देना है। ६. सिद्धि और असिद्धिमें, सुख और दु:खमें, लाभ और हानिमें, इसी प्रकार संसारके समस्त पदार्थोंमें और प्राणियोंमें जो समबुद्धि है, उसको “बुद्धियोग” कहते हैं। ७. भगवानको ही अपना परम प्राप्य, परम गति, परम हितैषी, परम प्रिय और परमाधार मानना, उनके विधानमें सदा ही संतुष्ट रहना और उनकी प्राप्तिके साधनोंमें तत्पर रहना भगवान्के परायण होना है। ८. मन-बुद्धिको अटलभावसे भगवान्में लगा देना; भगवान्के सिवा अन्य किसीमें किंचिन्मात्र भी प्रेमका सम्बन्ध न रखकर अनन्यप्रेमपूर्वक निरन्तर भगवान्का ही चिन्तन करते रहना; क्षणमात्रके लिये भी भगवान्की विस्मृतिका असहा हो जाना; उठते-बैठते, चलते-फिरते, खाते-पीते, सोते-जागते और समस्त कर्म करते समय भी नित्य-निरन्तर मनसे भगवान्के दर्शन करते रहना--यही निरन्तर भगवानूमें चित्तवाला होना है। ९, निरन्तर मुझमें मन लगा देनेके बाद तुम्हें और कुछ भी नहीं करना पड़ेगा, मेरी दयाके प्रभावसे अनायास ही तुम्हारे इस लोक और परलोकके समस्त दुःख टल जायँगे, तुम सब प्रकारके दुर्गुण और दुराचारोंसे रहित होकर सदाके लिये जन्म-मरणरूप महान् संकटसे मुक्त हो जाओगे और मुझ नित्य- आनन्दघन परमेश्वरको प्राप्त कर लोगे। $. यद्यपि भगवान् अर्जुनसे पहले यह कह चुके हैं कि तुम मेरे भक्त हो (गीता ४।३) और यह भी कह आये हैं कि 'न मे भक्तः प्रणश्यति' अर्थात् मेरे भक्तका कभी पतन नहीं होता (गीता ९३१) और यहाँ यह कहते हैं कि तुम नष्ट हो जाओगे अर्थात् तुम्हारा पतन हो जायगा; इसमें विरोध मालूम होता है; किंतु भगवानने स्वयं ही उपर्युक्त वाक्यमें “चेत्” पदका प्रयोग करके इस विरोधका समाधान कर दिया है। अभिप्राय यह है कि भगवानके भक्तका कभी पतन नहीं होता, यह ध्रुव सत्य है और यह भी सत्य है कि अर्जुन भगवानके परम भक्त हैं; इसलिये वे भगवान्की बात न सुनें, उनकी आज्ञाका पालन न करें--यह हो ही नहीं सकता; किंतु इतनेपर भी यदि अहंकारके वशमें होकर भगवान्की आज्ञाकी अवहेलना कर दें तो फिर भगवानके भक्त नहीं समझे जा सकते, इसलिये फिर उनका पतन होना भी युक्तिसंगत ही है। २. पहले भगवानके द्वारा युद्ध करनेकी आज्ञा दी जानेपर (गीता २।३) जो अर्जुनने भगवानसे यह कहा था कि “न योत्स्ये'--मैं युद्ध नहीं करूँगा (गीता २।९), उसी बातको स्मरण कराते हुए भगवान् कहते हैं कि तुम जो यह मानते हो कि “मैं युद्ध नहीं करूँगा', तुम्हारा यह मानना केवल अहंकारमात्र है; युद्ध न करना तुम्हारे हाथकी बात नहीं है। 3. जन्म-जन्मान्तरमें किये हुए कर्मोंके संस्कार जो वर्तमान जन्ममें स्वभावरूपसे प्रादुर्भूत हुए हैं, उनके समुदायको प्रकृति यानी स्वभाव कहते हैं। इस स्वभावके अनुसार ही मनुष्यका भिन्न-भिन्न कर्मोंके अधिकारीसमुदायमें जन्म होता है और उस स्वभावके अनुसार ही भिकन्न-भिन्न मनुष्योंकी भिन्न-भिन्न कर्मोमें प्रवृत्ति हुआ करती है। अतएव यहाँ उपर्युक्त वाक्यसे भगवानने यह दिखलाया है कि जिस स्वभावके कारण तुम्हारा क्षत्रियकुलमें जन्म हुआ है, वह स्वभाव तुम्हारी इच्छा न रहनेपर भी तुमको जबर्दस्ती युद्धमें प्रवृत्त करा देगा। योग्यता प्राप्त होनेपर वीरतापूर्वक युद्ध करना, युद्धसे डरना या भागना नहीं--यह तुम्हारा सहज कर्म है; अतएव तुम इसे किये बिना रह नहीं सकोगे, तुमको युद्ध अवश्य करना पड़ेगा। यहाँ क्षत्रियके नाते अर्जुनको युद्धके विषयमें जो बात कही है, वही बात अन्य वर्णवालोंको अपने-अपने स्वाभाविक कर्मोके विषयमें समझ लेनी चाहिये। ४. अर्जुनकी माता कुन्ती बड़ी वीर महिला थी, उसने स्वयं श्रीकृष्णके हाथ सँदेशा भेजते समय पाण्डवोंको युद्धके लिये उत्साहित किया था। अतः भगवान् यहाँ अर्जुनको 'कौन्तेय” नामसे सम्बोधित करके यह भाव दिखलाते हैं कि तुम वीर माताके पुत्र हो, स्वयं भी शूरवीर हो, इसलिये तुमसे युद्ध किये बिना नहीं रहा जायगा। ५. न्यायसे प्राप्त सहजकर्मको न करनेका अविवेकके अतिरिक्त दूसरा कोई युक्तियुक्त कारण नहीं है। ६. यहाँ भगवानने यह भाव दिखलाया है कि युद्ध तो तुम्हें अपने स्वभावके वशमें होकर करना ही पड़ेगा। इसलिये यदि मेरी आज्ञाके अनुसार अर्थात् सत्तावनवें श्लोकमें बतलायी हुई विधिके अनुसार उसे करोगे तो कर्मबन्धनसे मुक्त होकर मुझे प्राप्त हो जाओगे, नहीं तो राग-द्वेषके जालमें फँसकर जन्म- मृत्युरूप संसारसागरमें गोते लगाते रहोगे। जिस प्रकार नदीके प्रवाहमें बहता हुआ मनुष्य उस प्रवाहका सामना करके नदीके पार नहीं जा सकता, वरं अपना नाश कर लेता है और जो किसी नौका या काठका आश्रय लेकर या तैरनेकी कलासे जलके ऊपर तैरता रहकर उस प्रवाहके अनुकूल चलता है, वह किनारे लगकर उसको पार कर जाता है; उसी प्रकार प्रकृतिके प्रवाहमें पड़ा हुआ जो मनुष्य प्रकृतिका सामना करता है, यानी हठसे कर्तव्यकर्मोंका त्याग कर देता है, वह प्रकृतिसे पार नहीं हो सकता, वरं उसमें अधिक फँसता जाता है और जो परमेश्वरका या कर्मयोगका आश्रय लेकर या ज्ञानमार्गके अनुसार अपनेको प्रकृतिसे ऊपर उठाकर प्रकृतिके अनुकूल कर्म करता रहता है, वह कर्मबन्धनसे मुक्त होकर प्रकृतिके पार चला जाता है अर्थात् परमात्माको प्राप्त हो जाता है। ३. यहाँ शरीरको यन्त्रका रूपक देकर भगवानने यह भाव दिखलाया है कि जैसे रेलगाड़ी आदि किन्हीं यन्त्रोंपर बैठा हुआ मनुष्य स्वयं नहीं चलता, तो भी रेलगाड़ी आदि यन्त्रके चलनेसे उसका चलना हो जाता है--उसी प्रकार यद्यपि आत्मा निश्चल है, उसका किसी भी क्रियासे वास्तवमें कुछ भी सम्बन्ध नहीं है, तो भी अनादिसिद्ध अज्ञानके कारण उसका शरीरसे सम्बन्ध होनेसे उस शरीरकी क्रिया उसकी क्रिया मानी जाती है तथा ईश्वरको सब भूतोंके हृदयमें स्थित बतलाकर यह भाव दिखलाया है कि यन्त्रको चलानेवाला प्रेरक जैसे स्वयं भी उस यन्त्रमें रहता है, उसी प्रकार ईश्वर भी समस्त प्राणियोंके अन्त:करणमें स्थित है। २. समस्त प्राणियोंको उनके पूर्वार्जित कर्म-संस्कारोंके अनुसार फल भुगतानेके लिये बार-बार नाना योनियोंमें उत्पन्न करना तथा भिन्न-भिन्न पदार्थोंसे, क्रियाओंसे और प्राणियोंसे उनका संयोग-वियोग कराना और उनके स्वभाव (प्रकृति)-के अनुसार उन्हें पुन: चेष्टा करनेमें लगाना--यही भगवान्का उन प्राणियोंको अपनी मायाद्वारा भ्रमण कराना है। यहाँ यदि कोई यह कहे कि कर्म करनेमें और न करनेमें मनुष्य स्वतन्त्र है या परतन्त्र? यदि परतन्त्र है तो किसके परतन्त्र है--प्रकृतिके या स्वभावके अथवा ईश्वरके? क्योंकि प्राणीको उनसठवें और साठवें श्लोकोंमें प्रकृतिके और स्वभावके अधीन बतलाया है तथा इस श्लोकमें ईश्वरके अधीन बतलाया है, तो कहना होगा कि कर्म करने और न करनेमें मनुष्य परतन्त्र है, इसीलिये यह कहा गया है कि कोई भी प्राणी क्षणमात्र भी बिना कर्म किये नहीं रह सकता (गीता ३।५)। मनुष्यका जो कर्म करनेमें अधिकार बतलाया गया है, उसका अभिप्राय भी उसको स्वतन्त्र बतलाना नहीं है, बल्कि परतन्त्र बतलाना ही है; क्योंकि वहाँ कर्मोके त्यागमें अशक्यता सूचित की गयी है तथा मनुष्यको प्रकृतिके अधीन बतलाना, स्वभावके अधीन बतलाना और ईश्वरके अधीन बतलाना--े तीनों बातें एक ही हैं। क्योंकि स्वभाव और प्रकृति तो पर्यायवाची शब्द हैं और ईश्वर स्वयं निरपेक्षभावसे अर्थात् सर्वथा निर्लिप्त रहते हुए ही जीवोंकी प्रकृतिके अनुरूप अपनी मायाशक्तिके द्वारा उनको कर्मोंमें नियुक्त करते हैं, इसलिये ईश्वरके अधीन बतलाना प्रकृतिके ही अधीन बतलाना है। दूसरे पक्षमें ईश्वर ही प्रकृतिके स्वामी और प्रेरक हैं, इस कारण प्रकृतिके अधीन बतलाना भी ईश्वरके ही अधीन बतलाना है। इसपर कोई यह कहे कि यदि मनुष्य सर्वथा ही परतन्त्र है तो फिर उसके उद्धार होनेका कया उपाय है और उसके लिये कर्तव्य-अकर्तव्यका विधान करनेवाले शास्त्रोंकी क्या आवश्यकता है; तो कहना होगा कि कर्तव्य-अकर्तव्यका विधान करनेवाले शास्त्र मनुष्यको उसके स्वाभाविक कर्मोंसे हटानेके लिये या उससे स्वभावविरुद्ध कर्म करवानेके लिये नहीं हैं, किंतु उन कर्मोंको करनेमें जो राग-द्वेषके वशमें होकर वह अन्याय कर लेता है, उस अन्यायका त्याग कराकर उसे न्यायपूर्वक कर्तव्यकर्मोंमें लगानेके लिये है। इसलिये मनुष्य कर्म करनेमें स्वभावके परतन्त्र होते हुए भी उस स्वभावका सुधार करनेमें परतन्त्र नहीं है। अतएव यदि वह शास्त्र और महापुरुषोंके उपदेशसे सचेत होकर प्रकृतिके प्रेरक सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी शरण ग्रहण कर ले और राग-द्वेषादि विकारोंका त्याग करके शास्त्रविधिके अनुसार न्यायपूर्वक अपने स्वाभाविक कर्मोंको निष्कामभावसे करता हुआ अपना जीवन बिताने लगे तो उसका उद्धार हो सकता है। 3. भगवानके गुण, प्रभाव, तत्त्व और स्वरूपका श्रद्धापूर्वक निश्चय करके भगवान्को ही परम प्राप्य, परम गति, परम आश्रय और सर्वस्व समझना तथा उनको अपना स्वामी, भर्ता, प्रेरक, रक्षक और परम हितैषी समझकर सब प्रकारसे उनपर निर्भर और निर्भय हो जाना एवं सब कुछ भगवान्का समझकर और भगवानको सर्वव्यापी जानकर समस्त कर्मोमें ममता, अभिमान, आसक्ति और कामनाका त्याग करके भगवानके आज्ञानुसार अपने कर्मोद्वारा समस्त प्राणियोंके हृदयमें स्थित परमेश्वरकी सेवा करना; जो कुछ भी दु:ख-सुखके भोग प्राप्त हों, उनको भगवान्का भेजा हुआ पुरस्कार समझकर सदा ही संतुष्ट रहना; भगवान्के किसी भी विधानमें कभी किंचिन्मात्र भी असंतुष्ट न होना; मान, बड़ाई और प्रतिष्ठाका त्याग करके भगवान्के सिवा किसी भी सांसारिक वस्तुमें ममता और आसक्ति न रखना; अतिशय श्रद्धा और अनन्यप्रेमपूर्वक भगवानके नाम, गुण, प्रभाव, लीला, तत्त्व और स्वरूपका नित्य-निरन्तर श्रवण, चिन्तन और कथन करते रहना--ये सभी भाव तथा क्रियाएँ सब प्रकारसे परमेश्वरकी शरण ग्रहण करनेके अन्तर्गत हैं। ३. उपर्युक्त प्रकारसे भगवान्की शरण ग्रहण करनेवाले भक्तपर परम दयालु, परम सुहृद, सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी अपार दयाका स्रोत बहने लगता है--जो उसके समस्त दुःखों और बन्धनोंको सदाके लिये बहा ले जाता है। इस प्रकार भक्तका जो समस्त दुःखोंसे और समस्त बन्धनोंसे छूटकर सदाके लिये परमानन्दसे युक्त हो जाना और सच्चिदानन्दघन पूर्णब्रह्मय सनातन परमेश्वरको प्राप्त हो जाना है, यही परमेश्वरकी कृपासे परम शान्तिको और सनातन परम धामको प्राप्त हो जाना है। २. भगवानूने गीताके दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकसे आरम्भ करके यहाँतक अर्जुनको अपने गुण, प्रभाव, तत्त्व और स्वरूपका रहस्य भलीभाँति समझानेके लिये जितनी बातें कही हैं--उस समस्त उपदेशका वाचक यहाँ 'ज्ञान' शब्द है; वह सारा-का-सारा उपदेश भगवानका प्रत्यक्ष ज्ञान करानेवाला है, इसलिये उसका नाम 'ज्ञान' रखा गया है। संसारमें और शास्त्रोंमें जितने भी गुप्त रखनेयोग्य रहस्यके विषय माने गये हैं, उन सबमें भगवानके गुण, प्रभाव और स्वरूपका यथार्थ ज्ञान करा देनेवाला उपदेश सबसे बढ़कर गुप्त रखनेयोग्य माना गया है; इसलिये इस उपदेशका महत्त्व समझानेके लिये और यह बात समझानेके लिये कि अनधिकारीके सामने इन बातोंको प्रकट नहीं करना चाहिये, इस ज्ञानको अत्यन्त गोपनीय बतलाया गया है। 3. गीताके दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श"्लोकसे उपदेश आरम्भ करके भगवान्ने अर्जुनको सांख्ययोग और कर्मयोग, इन दोनों ही साधनोंके अनुसार स्वधर्मरूप युद्ध करना जगह-जगह (गीता २।१८, ३७; ३।३०; ८।७; ११।३४) कर्तव्य बतलाया तथा अपनी शरण ग्रहण करनेके लिये कहा। इसपर भी कोई उत्तर न मिलनेसे पुनः अर्जुनको सावधान करनेके लिये परमेश्वरको सबका प्रेरक और सबके हृदयमें स्थित बतलाकर उसकी शरण ग्रहण करनेके लिये कहा। इतनेपर भी जब अर्जुनने कुछ नहीं कहा, तब इस श्लोकके पूर्वार्द्धमें उपदेशका उपसंहार करके एवं कहे हुए उपदेशका महत्त्व दिखलाकर इस वाक्यसे पुनः उसपर विचार करनेके लिये अर्जुनको सावधान करते हुए अन्तमें भगवानने यह कहा कि मैंने जो कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग आदि बहुत प्रकारके साधन बतलाये हैं, उनमेंसे तुम्हें जो साधन अच्छा मालूम पड़े, उसीका पालन करो अथवा और जो कुछ तुम ठीक समझो, वही करो। ४. भगवानने यहाँतक अर्जुनको जितनी बातें कहीं, वे सभी बातें गुप्त रखनेयोग्य हैं; अत: उनको भगवानने जगह-जगह “परम गुह्म/! और “उत्तम रहस्य” नाम दिया है। उस समस्त उपदेशमें भी जहाँ भगवानने खास अपने गुण, प्रभाव, स्वरूप, महिमा और ऐश्वर्यको प्रकट करके यानी मैं ही स्वयं सर्वव्यापी, सर्वाधार, सर्वशक्तिमान्, साक्षात् सगुण-निर्गुण परमेश्वर हूँ--इस प्रकार कहकर अर्जुनको अपना भजन करनेके लिये और अपनी शरणमें आनेके लिये कहा है, वे वचन अधिक-से-अधिक गुप्त रखनेयोग्य हैं (गीता ९।१-२)। वे पहले भी कहे जा चुके हैं (गीता ९।३४; १२।६-७; १८।५६-५७)। अत: यहाँ भगवान्के कहनेका यह अभिप्राय है कि पहले कहे हुए उपदेशमें भी जो अत्यन्त गुप्त रखनेयोग्य सबसे अधिक महत्त्वकी बात है, वह मैं तुम्हें अगले दो श्लोकोंमें फिर कहूँगा। ५. तिरसठवें श्लोकमें कही हुई बातको सुनकर भगवान्ने अर्जुनको अपने कर्तव्यका निश्चय करनेके लिये स्वतन्त्र विचार करनेको कह दिया, उसका भार उन्होंने अपने ऊपर नहीं रखा; इस बातको सुनकर जब अर्जुनके मनमें उदासी छा गयी, वे सोचने लगे कि कया मेरा भगवानपर विश्वास नहीं है, क्या मैं इनका भक्त और प्रेमी नहीं हूँ, तब अर्जुनका शोक दूर करनेके लिये उन्हें उत्साहित करते हुए भगवान् यह भाव दिखलाते हैं कि तुम मेरे अत्यन्त प्रिय हो, तुम्हारा और मेरा प्रेमका सम्बन्ध अटल है; अतः तुम किसी तरहका शोक मत करो। ३. भगवानको सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वज्ञ, सर्वान्तिर्यामी, सर्वव्यापी, सर्वेश्वर तथा अतिशय सौन्दर्य, माधुर्य और ऐश्वर्य आदि गुणोंके समुद्र समझकर अनन्य प्रेमपूर्वक निश्चलभावसे मनको भगवान्में लगा देना, क्षणमात्र भी भगवान्की विस्मृतिको न सह सकना “भगवानमें मनवाला' होना है। २. भगवानको ही एकमात्र अपना भर्ता, स्वामी, संरक्षक, परम गति और परम आश्रय समझकर सर्वथा उनके अधीन हो जाना, किंचिन्मात्र भी अपनी स्वतन्त्रता न रखना, सब प्रकारसे उनपर निर्भर रहना, उनके प्रत्येक विधानमें सदा ही संतुष्ट रहना और उनकी आज्ञाका सदा पालन करना तथा उनमें अतिशय श्रद्धापूर्वक अनन्यप्रेम करना “भगवान्का भक्त बनना' है। 3. गीताके नवें अध्यायके छब्बीसवें श्लोकके वर्णनानुसार पत्र-पुष्पादिसे श्रद्धा, भक्ति और प्रेमपूर्वक भगवान्के विग्रहका पूजन करना; मनसे भगवान्का आवाहन करके उनकी मानसिक पूजा करना; उनके वचनोंका, उनकी लीलाभूमिका और उनके विग्रहका सब प्रकारसे आदर-सम्मान करना तथा सबमें भगवानको व्याप्त समझकर या समस्त प्राणियोंको भगवान्का स्वरूप समझकर उनकी यथायोग्य सेवा- पूजा, आदर-सत्कार करना आदि सब “भगवान्की पूजा” करनेके अन्तर्गत हैं। ४. जिन परमेश्वरके सगुण-निर्मुण, निराकार-साकार आदि अनेक रूप हैं; जो अर्जुनके सामने श्रीकृष्णरूपमें प्रकट होकर गीताका उपदेश सुना रहे हैं; जिन्होंने रामरूपमें प्रकट होकर संसारमें धर्मकी मर्यादाका स्थापन किया और नृसिंहरूप धारण करके भक्त प्रह्नादका उद्धार किया--उन्हीं सर्वशक्तिमान्, सर्वगुणसम्पन्न, अन्तर्यामी, परमाधार, समग्र पुरुषोत्तम भगवान्के किसी भी रूपको, चित्रको, चरणचिह्लोंको या चरणपादुकाओंको तथा उनके गुण, प्रभाव और तत्त्वका वर्णन करनेवाले शास्त्रोंको साष्टांग प्रणाम करना या समस्त प्राणियोंमें उनको व्याप्त या समस्त प्राणियोंको भगवान्का स्वरूप समझकर सबको प्रणाम करना “भगवान्को नमस्कार करना है। ५. जिसमें चारों साधन पूर्णरूपसे होते हैं, उसको भगवानकी प्राप्ति हो जाय--इसमें तो कहना ही क्या है; परंतु इनमेंसे एक-एक साधनसे भी भगवान्की प्राप्ति हो सकती है; क्योंकि भगवानने स्वयं ही गीताके आठवें अध्यायके चौदहवें श्लोकमें केवल अनन्यचिन्तनसे अपनी प्राप्तिको सुलभ बतलाया है। गीताके सातवें अध्यायके तेईसवें और नवेंके पचीसवेंमें अपने भक्तको अपनी प्राप्ति बतलायी है और नवें अध्यायके छब्बीसवेंसे अट्ठाईसवेंतक एवं इस अध्यायके छियालीसवें श्लोकमें केवल पूजनसे अपनी प्राप्ति बतलायी है। ६. अर्जुन भगवानके प्रिय भक्त और सखा थे, अतएव उनपर प्रेम और दया करके उनका अपने ऊपर अतिशय दृढ़ विश्वास करानेके लिये और अर्जुनके निमित्तसे अन्य अधिकारी मनुष्योंका विश्वास दृढ़ करानेके लिये भगवान्ने कहा है कि मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ। ७. वर्ण, आश्रम, स्वभाव और परिस्थितिके अनुसार जिस मनुष्यके लिये जो-जो कर्म कर्तव्य बतलाये गये हैं, गीताके बारहवें अध्यायके छठे श्लोकमें 'सर्वाणि' विशेषणके सहित “कर्माणि' पदसे और इस अध्यायके सत्तावनवें श्लोकमें 'सर्वकर्माणि' पदसे जिनका वर्णन किया गया है, उन शास्त्रविहित समस्त कर्मोंको जो उन दोनों श्लोकोंकी व्याख्यामें बतलाये हुए प्रकारसे भगवानमें समर्पण कर देना है अर्थात् सब कुछ भगवान्का समझकर मन, इन्द्रिय और शरीरमें तथा उनके द्वारा किये जानेवाले कर्मोमें और उनके फलरूप समस्त भोगोंमें ममता, आसक्ति, अभिमान और कामनाका सर्वथा त्याग कर देना और केवल भगवानके ही लिये भगवान्की आज्ञा और प्रेरणाके अनुसार, जैसे वे करवावें, वैसे कठपुतलीकी भाँति उनको करते रहना--यही यहाँ समस्त धर्मोंका परित्याग करना है, उनका स्वरूपसे त्याग करना नहीं। ३. गीताके बारहवें अध्यायके छठे श्लोकमें, नवें अध्यायके अन्तिम श्लोकमें तथा इस अध्यायके सत्तावनवें श्लोकमें कहे हुए प्रकारसे भगवान्को ही अपना परम प्राप्य, परम गति, परमाधार, परम प्रिय, परम हितैषी, परम सुहृद, परम आत्मीय तथा भर्ता, स्वामी, संरक्षक समझकर उठते-बैठते, खाते-पीते, चलते-फिरते, सोते-जागते और हरेक प्रकारसे उनकी आज्ञाओंका पालन करते समय परम श्रद्धापूर्वक अनन्यप्रेमसे नित्य-निरन्तर उनका चिन्तन करते रहना और उनके विधानमें सदा ही संतुष्ट रहना एवं सब प्रकारसे केवलमात्र एक भगवानपर ही भक्त प्रह्मादकी भाँति निर्भर रहना एकमात्र परमेश्वरकी शरणमें चला जाना है। २. शुभाशुभ कर्मोका फलरूप जो कर्मबन्धन है--जिससे बँधा हुआ मनुष्य जन्म-जन्मान्तरसे नाना योनियोंमें घूम रहा है, उस कर्मबन्धनसे मुक्त कर देना ही पापोंसे मुक्त कर देना है। इसलिये गीताके तीसरे अध्यायके इकतीसवें श्लोकमें 'कर्मभि: मुच्यन्ते” से, बारहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें “मृत्युसंसारसागरात् समुद्धर्ता भवामि' से और इस अध्यायके अद्वावनवें श्लोकमें “मत्प्रसादात् सर्वदुर्गाणि तरिष्यसि' से जो बात कही गयी है, वही बात यहाँ “मैं तुझे सब पापोंसे मुक्त कर दूँगा" इस वाक्यसे कही गयी है। 3. गीताके दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें “अशोच्यान” पदसे जिस उपदेशका उपक्रम किया था, उसका "मा शुच:” पदसे उपसंहार करके भगवानने यह दिखलाया है कि गीताके दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें तुम मेरी शरणागति स्वीकार कर ही चुके हो, अब पूर्णरूपसे मेरे शरणागत होकर तुम कुछ भी चिन्ता न करो और शोकका सर्वथा त्याग करके सदा-सर्वदा मुझ परमेश्वरपर निर्भर हो रहो। यह शोकका सर्वथा अभाव और भगव्त्साक्षात्कार ही गीताका मुख्य तात्पर्य है। ४. इससे भगवानने यह दिखलाया है कि यह गीताशास्त्र बड़ा ही गुप्त रखनेयोग्य विषय है, तुम मेरे अतिशय प्रेमी भक्त और दैवी सम्पदासे युक्त हो, इसलिये इसका अधिकारी समझकर मैंने तुम्हारे हितके लिये तुम्हें यह उपदेश दिया है। अत: जो मनुष्य स्वधर्मपालनरूप तप करनेवाला न हो, ऐसे मनुष्यको मेरे गुण, प्रभाव और तत्त्वके वर्णनसे भरपूर यह गीताशास्त्र नहीं सुनाना चाहिये। तथा जिसका मुझ परमेश्वरमें विश्वास, प्रेम और पूज्यभाव नहीं है, जो अपनेको ही सर्वे-सर्वा समझनेवाला नास्तिक है--ऐसे मनुष्यको भी यह अत्यन्त गोपनीय गीताशास्त्र नहीं सुनाना चाहिये। इसी प्रकार यदि कोई अपने धर्मका पालनरूप तप भी करता हो; किंतु गीताशास्त्रमें श्रद्धा और प्रेम न होनेके कारण वह उसे सुनना न चाहता हो, तो उसे भी यह परम गोपनीय शास्त्र नहीं सुनाना चाहिये; क्योंकि ऐसा मनुष्य उसको ग्रहण नहीं कर सकता, इससे मेरे उपदेशका और मेरा अनादर होता है। एवं संसारका उद्धार करनेके लिये सगुणरूपसे प्रकट मुझ परमेश्वरमें जिसकी दोषदृष्टि है, जो मेरे गुणोंमें दोषारोपण करके मेरी निन्दा करनेवाला है--ऐसे मनुष्यको तो किसी भी हालतमें यह उपदेश नहीं सुनाना चाहिये; क्योंकि वह मेरे गुण, प्रभाव और ऐश्वर्यको न सह सकनेके कारण इस उपदेशको सुनकर मेरी पहलेसे भी अधिक अवज्ञा करेगा, अतः वह अधिक पापका भागी होगा। ५. यह उपदेश मनुष्यको संसारबन्धनसे छुड़ाकर साक्षात् परमेश्वरकी प्राप्ति करानेवाला होनेसे अत्यन्त ही श्रेष्ठ और गुप्त रखनेयोग्य है। ६. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि जो मुझको समस्त जगतकी उत्पत्ति, स्थिति और पालन करनेवाले, सर्वशक्तिमान् और सर्वेश्वर समझकर मुझमें प्रेम करना है; जिसके चित्तमें मेरे गुण, प्रभाव, लीला और तत्त्वकी बातें सुननेकी उत्सुकता रहती है और सुनकर प्रसन्नता होती है--वह मेरा भक्त है। उसमें पूर्वश्लोकमें वर्णित चारों दोषोंका अभाव अपने-आप हो जाता है। इसलिये जो मेरा भक्त है, वही इसका अधिकारी है तथा सभी मनुष्य--चाहे किसी भी वर्ण और जातिके क्यों न हों--मेरे भक्त बन सकते हैं (गीता ९।३२); अत: वर्ण और जाति आदिके कारण इसका कोई भी अनधिकारी नहीं है। $. स्वयं भगवान्में या उनके वचनोंमें अतिशय श्रद्धायुक्त होकर एवं भगवानके नाम, गुण, लीला, प्रभाव और स्वरूपकी स्मृतिसे उनके प्रेममें विह्लल होकर केवल भगवान्की प्रसन्नताके ही लिये निष्कामभावसे उपर्युक्त भगवद्धक्तोंमें इस गीताशास्त्रका वर्णन करना, इसके मूल श्लोकोंका अध्ययन कराना, उनकी व्याख्या करके अर्थ समझाना, शुद्ध पाठ करवाना, उनके भावोंको भलीभाँति प्रकट करना और समझाना, श्रोताओंकी शंकाओंका समाधान करके गीताके उपदेशको उनके ह्ृदयमें जमा देना और गीताके उपदेशानुसार चलनेकी उनमें दृढ़ भावना उत्पन्न कर देना आदि सभी क्रियाएँ भगवान्में परम प्रेम करके भगवानके भक्तोंमें गीताका कथन करना है। २. इससे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि गीताशास्त्रका उपर्युक्त प्रकारसे प्रचार करना--यह मेरी प्राप्तिका ऐकान्तिक उपाय है; इसलिये मेरी प्राप्ति चाहनेवाले अधिकारी भक्तोंको इस गीताशास्त्रके कथन तथा प्रचारका कार्य अवश्य करना चाहिये। 3. यहाँ भगवान् यह बतलाते हैं कि यज्ञ, दान, तप, सेवा, पूजा और जप, ध्यान आदि जितने भी मेरे प्रिय कार्य हैं, उन सबसे बढ़कर "मेरे भावोंको मेरे भक्तोंमें विस्तार करना” मुझे अधिक प्रिय है। इस कारण जो मेरा प्रेमी भक्त मेरे भावोंका श्रद्धा-भक्तिपूर्वक मेरे भक्तोंमें विस्तार करता है, वही सबसे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करनेवाला है; उससे बढ़कर दूसरा कोई नहीं। केवल इस समय ही उससे बढ़कर मेरा कोई प्रिय कार्य करनेवाला नहीं है, यही बात नहीं है; किंतु उससे बढ़कर मेरा प्यारा काम करनेवाला कोई हो सकेगा, यह भी सम्भव नहीं है। इसलिये मेरी प्राप्तिके जितने भी साधन हैं, उन सबमें यह “भक्तिपूर्वक मेरे भक्तोंमें मेरे भावोंका विस्तार करनारूप” साधन सर्वोत्तम है--ऐसा समझकर मेरे भक्तोंको यह कार्य करना चाहिये। ४. यह साक्षात् परमेश्वरके द्वारा कहा हुआ शास्त्र है; इस कारण इसमें जो कुछ उपदेश दिया गया है, वह सब-का-सब धर्मसे ओतप्रोत है। ५. गीताका मर्म जाननेवाले भगवानके भक्तोंसे इस गीताशास्त्रको पढ़ना, इसका नित्य पाठ करना, इसके अर्थका पाठ करना, अर्थपर विचार करना और इसके अर्थको जाननेवाले भक्तोंसे इसके अर्थको समझनेकी चेष्टा करना आदि सभी अभ्यास गीताशास्त्रको पढ़नेके अन्तर्गत है। श्लोकोंका अर्थ बिना समझे इस गीताको पढ़ने और उसका नित्य पाठ करनेकी अपेक्षा उसके अर्थको भी साथ-साथ पढ़ना और अर्थज्ञानके सहित उसका नित्य पाठ करना अधिक उत्तम है, तथा उसके अर्थको समझकर पढ़ते या पाठ करते समय प्रेममें विह्लल होकर भावान्वित हो जाना उससे भी अधिक उत्तम है। ६. इस गीताशास्त्रका अध्ययन करनेसे मनुष्यको मेरे सगुण-निर्गुण और साकार-निराकार तत्त्वका भलीभाँति यथार्थ ज्ञान हो जाता है। अत: इस गीताशास्त्रका अध्ययन करना ज्ञानयञ्ञके द्वारा मेरी पूजा करना है; क्योंकि सभी साधनोंका अन्तिम फल भगवानके तत्त्वको भलीभाँति जान लेना है और वह फल इस ज्ञानयज्ञसे अनायास ही मिल जाता है। ३. जिसके अंदर इस गीताशास्त्रको श्रद्धापूर्वक श्रवण करनेकी भी रुचि नहीं है, वह तो मनुष्य कहलानेयोग्य भी नहीं है; क्योंकि उसका मनुष्यजन्म पाना व्यर्थ हो रहा है। इस कारण वह मनुष्यके रूपमें पशुके ही तुल्य है। २. भगवानकी सत्तामें और उनके गुण-प्रभावमें विश्वास करके तथा यह गीताशास्त्र साक्षात् भगवान्की ही वाणी है, इसमें जो कुछ भी कहा गया है सब-का-सब यथार्थ है--ऐसा निश्चयपूर्वक मानकर और उसके वक्तापर विश्वास करके प्रेम और रुचिके साथ गीताजीके मूल श्लोकोंके पाठका या उसके अर्थकी व्याख्याका श्रवण करना, यह श्रद्धासे युक्त होकर गीताशास्त्रका श्रवण करना है और उसका श्रवण करते समय भगवानपर या भगवान्के वचनोंपर किसी प्रकारका दोषारोपण न करना--यह दोषदृष्टिसे रहित होकर उसका श्रवण करना है। 3. जो अड़सठवें श्लोकके वर्णनानुसार इस गीताशास्त्रका दूसरोंको अध्ययन कराता है तथा जो सत्तरवें श्लोकके कथनानुसार स्वयं अध्ययन करता है, उन लोगोंकी तो बात ही क्या है, पर जो इसका श्रद्धापूर्वक श्रवणमात्र भी कर पाता है, वह भी जन्म-जन्मान्तरोंमें किये हुए पशु-पक्षी आदि नीच योनियोंके और नरकके हेतुभूत पापकर्मसे छूटकर इन्द्रलोकसे लेकर भगवान्के परमधामपर्यन्त अपने-अपने प्रेम और श्रद्धाके अनुरूप भिन्न-भिन्न लोकोंको प्राप्त हो जाता है। ४. भगवानके इस प्रश्नका अभिप्राय यह है कि मेरा यह उपदेश बड़ा ही दुर्लभ है, मैं हरेक मनुष्यके सामने “मैं ही साक्षात् परमेश्वर हूँ, तू मेरी ही शरणमें आ जा' इत्यादि बातें नहीं कह सकता; इसलिये तुमने मेरे उपदेशको भलीभाँति ध्यानपूर्वक सुन तो लिया है न? क्योंकि यदि कहीं तुमने उसपर ध्यान न दिया होगा तो तुमने निःसंदेह बड़ी भूल की है। ५. भगवानके इस प्रश्नका भाव यह है कि जिस मोहसे युक्त होकर तुम धर्मके विषयमें अपनेको मूढचेता बतला रहे थे (गीता २।७) तथा अपने स्वधर्मका पालन करनेमें पाप समझ रहे थे (गीता १।३६ से ३९) और समस्त कर्तव्यकर्मोंका त्याग करके भिक्षाके अन्नसे जीवन बिताना श्रेष्ठ समझ रहे थे (गीता २।५) एवं जिसके कारण तुम स्वजन-वधके भयसे व्याकुल हो रहे थे (गीता १।४५--४७) और अपने कर्तव्यका निश्चय नहीं कर पाते थे (गीता २।६-७)--तुम्हारा वह अज्ञानजनित मोह अब नष्ट हो गया या नहीं? यदि मेरे उपदेशको तुमने ध्यानपूर्वक सुना होगा तो अवश्य ही तुम्हारा मोह नष्ट हो जाना चाहिये और यदि तुम्हारा मोह नष्ट नहीं हुआ है तो यही मानना पड़ेगा कि तुमने उस उपदेशको एकाग्रचित्तसे नहीं सुना। यहाँ भगवानके इन दोनों प्रश्नोंमें यह उपदेश भरा हुआ है कि मनुष्यको इस गीताशास्त्रका अध्ययन और श्रवण बड़ी सावधानीके साथ एकाग्रचित्तसे तत्पर होकर करना चाहिये और जबतक अज्ञानजनित मोहका सर्वथा नाश न हो जाय, तबतक यह समझना चाहिये कि अभीतक मैं भगवानके उपदेशको यथार्थ नहीं समझ सका हूँ, अत: पुन: उसपर श्रद्धा और विवेकपूर्वक विचार करना आवश्यक है। ६. अर्जुनके कहनेका अभिप्राय यह है कि आपने यह दिव्य उपदेश सुनाकर मुझपर बड़ी भारी दया की है, आपके उपदेशको सुननेसे मेरा अज्ञानजनित मोह सर्वथा नष्ट हो गया है अर्थात् आपके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और स्वरूपको यथार्थ न जाननेके कारण जिस मोहसे व्याप्त होकर मैं आपकी आज्ञाको माननेके लिये तैयार नहीं होता था (गीता २।९) और बन्धु-बान्धवोंके विनाशका भय करके शोकसे व्याकुल हो रहा था (गीता १२८ से ४७ तक)--वह सब मोह अब सर्वथा नष्ट हो गया है तथा मुझे आपके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और स्वरूपकी पूर्ण स्मृति प्राप्त हो गयी है और आपका समग्र रूप मेरे प्रत्यक्ष हो गया है--मुझे कुछ भी अज्ञात नहीं रहा है। अब आपके गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य और सगुण-निर्गुण, साकार-निराकार स्वरूपके विषयमें तथा धर्म-अधर्म और कर्तव्य-अकर्तव्य आदिके विषयमें मुझे किंचिन्मात्र भी संशय नहीं रहा है। आपकी दयासे मैं कृतकृत्य हो गया हूँ, मेरे लिये अब कुछ भी कर्तव्य शेष नहीं रहा; अतएव आपके कथनानुसार लोकसंग्रहके लिये युद्धादि समस्त कर्म जैसे आप करवायेंगे, निमित्तमात्र बनकर लीलारूपसे मैं वैसे ही करूँगा। ३. संजयके कथनका यह भाव है कि साक्षात् नर-ऋषिके अवतार महात्मा अर्जुनके पूछनेपर सबके हृदयमें निवास करनेवाले सर्वव्यापी परमेश्वर श्रीकृष्णके द्वारा यह उपदेश दिया गया है, इस कारण यह बड़े ही महत्त्वका है तथा यह उपदेश बड़ा ही आश्चर्यजनक और असाधारण है; इससे मनुष्यको भगवान्के दिव्य अलौकिक गुण, प्रभाव और एऐश्वर्ययुक्त समग्ररूपका पूर्ण ज्ञान हो जाता है तथा मनुष्य इसे जैसे-जैसे सुनता और समझता है, वैसे-ही-वैसे हर्ष और आश्चर्यके कारण उसका शरीर पुलकित हो जाता है, उसके समस्त शरीरमें रोमांच हो जाता है। २. संजयके कथनका अभिप्राय यह है कि भगवान् व्यासजीने दया करके जो मुझे दिव्य दृष्टि अर्थात् दूर देशमें होनेवाली समस्त घटनाओंको देखने, सुनने और समझने आदिकी अद्भुत शक्ति प्रदान की है, उसीके कारण आज मुझे भगवान्का यह दिव्य उपदेश सुननेके लिये मिला; नहीं तो मुझे ऐसा सुयोग कैसे मिलता! 3. भगवानकी प्राप्तिके उपायभूत कर्मयोग, ज्ञानयोग, ध्यानयोग और भक्तियोग आदि साधनोंका इसमें भलीभाँति वर्णन किया गया है तथा वह स्वयं भी अर्थात् श्रद्धापूर्वक इसका पाठ भी परमात्माकी प्राप्तिका साधन होनेसे योगरूप ही है। ४. संजयके कथनका यह भाव है कि भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनका दिव्य संवादरूप यह गीताशास्त्र अध्ययन, अध्यापन, श्रवण, मनन और वर्णन आदि करनेवाले मनुष्यको परम पवित्र करके उसका सब प्रकारसे कल्याण करनेवाला तथा भगवानके आश्वर्यमय गुण, प्रभाव, ऐश्वर्य, तत्त्व, रहस्य और स्वरूपको बतानेवाला है; अतः यह अत्यन्त ही पवित्र, दिव्य एवं अलौकिक है। इस उपदेशने मेरे हृदयको इतना आकर्षिीत कर लिया है कि अब मुझे दूसरी कोई बात ही अच्छी नहीं लगती; मेरे मनमें बार-बार उस उपदेशकी स्मृति हो रही है और उन भावोंके आवेशमें मैं असीम हर्षका अनुभव कर रहा हूँ, प्रेम और हर्षके कारण विह्नल हो रहा हूँ। ५. भगवान् श्रीकृष्णके गुण, प्रभाव, लीला, ऐश्वर्य, महिमा, नाम और स्वरूपका श्रवण, मनन, कीर्तन, दर्शन और स्पर्श आदिके द्वारा उनके साथ किसी प्रकारका भी सम्बन्ध हो जानेसे वे मनुष्यके समस्त पापोंको, अज्ञानको और दु:खको हरण कर लेते हैं तथा वे अपने भक्तोंके मनको चुरानेवाले हैं; इसलिये उन्हें 'हरि' कहते हैं। ६. जिस अत्यन्त आश्वर्यमय दिव्य विश्वरूपका भगवान्ने अर्जुनको दर्शन कराया था और जिसके दर्शनका महत्त्व भगवानने ग्यारहवें अध्यायके सैंतालीसवें और अड़तालीसमें श्लोकोंमें स्वयं बतलाया है, उसी विराट् स्वरूपको लक्ष्य करके संजय यह कह रहे हैं कि भगवान्का वह रूप मेरे चित्तसे उतरता ही नहीं, उसे मैं बार-बार स्मरण करता रहता हूँ और मुझे बड़ा आश्वर्य हो रहा है कि भगवान्के अतिशय दुर्लभ उस दिव्य रूपका दर्शन मुझे कैसे हो गया! मेरा तो ऐसा कुछ भी पुण्य नहीं था, जिससे मुझे ऐसे रूपके दर्शन हो सकते। अहो! इसमें केवलमात्र भगवानकी अहैतुकी दया ही कारण है। साथ ही उस रूपके अत्यन्त अदभुत दृश्योंको और घटनाओंको याद कर-करके भी मुझे बड़ा आश्वर्य होता है तथा उसे बार- बार याद करके मैं हर्ष और प्रेममें विह्नल भी हो रहा हूँ; मेरे आनन्दका पारावार नहीं है। ३. यहाँ संजयके कहनेका अभिप्राय यह है कि भगवान् श्रीकृष्ण समस्त योगशक्तियोंके स्वामी हैं; वे अपनी योगशक्तिसे क्षणभरमें समस्त जगतू्की उत्पत्ति, पालन और संहार कर सकते हैं; वे साक्षात् नारायण भगवान् श्रीकृष्ण जिस धर्मराज युधिष्ठिरके सहायक हैं, उसकी विजयमें क्या शंका है। इसके सिवा अर्जुन भी नर ऋषिके अवतार, भगवान्के प्रिय सखा और गाण्डीव-धनुषके धारण करनेवाले महान् वीर पुरुष हैं; वे भी अपने भाई युधिष्ठिरकी विजयके लिये कटिबद्ध हैं। अत: आज उस युधिष्ठिरकी बराबरी दूसरा कौन कर सकता है; क्योंकि जहाँ सूर्य रहता है, प्रकाश उसके साथ ही रहता है --उसी प्रकार जहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन रहते हैं, वहीं सम्पूर्ण शोभा, सारा ऐश्वर्य और अटल न्याय [(धर्म)--ये सब उनके साथ-साथ रहते हैं और जिस पक्षमें धर्म रहता है, उसीकी विजय होती है। अतः पाण्डवोंकी विजयमें किसी प्रकारकी शंका नहीं है। यदि अब भी तुम अपना कल्याण चाहते हो तो अपने पुत्रोंकी समझाकर पाण्डवोंसे संधि कर लो। (भीष्मवधपर्व) त्रिचत्वारिशो< ध्याय: गीताका माहात्म्य तथा युधिष्ठटिरका भीष्म, द्रोण, कृप और शल्यसे अनुमति लेकर युद्धके लिये तैयार होना वैशम्पायन उवाच गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै: शास्त्रसंग्रहै: । या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपदञ्माद् विनि:सृता,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! अन्य बहुत-से शास्त्रोंका संग्रह करनेकी क्या आवश्यकता है? गीताका ही अच्छी तरहसे गान (श्रवण, कीर्तन, पठन-पाठन, मनन और धारण) करना चाहिये; क्योंकि वह स्वयं पद्मनाभ भगवानके साक्षात् मुखकमलसे निकली हुई है
Vaiśampāyana berkata: “Wahai Janamejaya, apakah perlunya menghimpun begitu banyak himpunan śāstra yang lain? Bhagavad Gītā sahaja patut ‘dinyanyikan’ dengan sebaik-baiknya—yakni didengar, dilafazkan, dipelajari, direnungkan, dan disimpan dalam hati—kerana ia terpancar langsung daripada ‘mulut teratai’ Padmanābha (Tuhan sendiri).”
Verse 2
सर्वशास्त्रमयी गीता सर्वदेवमयो हरि: । सर्वतीर्थमयी गंगा सर्ववेदमयो मनु:
Vaiśampāyana berkata: Gītā merangkum inti segala śāstra; Hari (Śrī Viṣṇu) ialah kehadiran semua dewa. Gaṅgā menghimpun kesucian semua tempat ziarah, dan Manu (serta ajaran dharmanya) merangkum maksud segala Veda.
Verse 3
गीता गंगा च गायत्री गोविन्देति हृदि स्थिते । चतुर्गकारसंयुक्ते पुनर्जन्म न विद्यते
Vaiśampāyana berkata: Apabila hati teguh bersemayam pada empat nama suci yang bermula dengan bunyi “ga”—Gītā, Gaṅgā, Gāyatrī, dan Govinda—maka tiadalah lagi kelahiran semula dalam putaran dunia ini.
Verse 4
नाप () आजआसर- 'श्रीमद्भगवद्गीता”' “आनन्दचिद्धन' षडैश्वर्यपू्ण चराचरवन्दित परमपुरुषोत्तम
Sañjaya berkata: Keśava (Śrī Kṛṣṇa) mengucapkan enam ratus dua puluh rangkap; Arjuna mengucapkan lima puluh tujuh; dan aku, Sañjaya, mengucapkan enam puluh tujuh.
Verse 5
भारतामृतसर्वस्वगीताया मथितस्य च । सारमुद्धृत्य कृष्णेन अर्जुनस्य मुखे हुतम्
Vaiśampāyana berkata: Daripada Bhagavad Gītā—yang dianggap sebagai intipati kepada Mahābhārata laksana nektar amṛta—Kṛṣṇa telah “mengacau dan memerah” maknanya, mengeluarkan sari yang paling pekat, lalu mencurahkannya ke dalam mulut Arjuna; yakni, melalui ajaran, Baginda menyalurkan terus ke dalam batin dan daya budi Arjuna, agar Arjuna memperoleh kembali kejernihan tentang dharma (tanggungjawab yang benar) serta keteguhan hati di tengah krisis moral peperangan.
Verse 6
- संजय उवाच ततो धनंजयं दृष्टवा बाणगाण्डीवधारिणम् | पुनरेव महानादं व्यसृजन्त महारथा:
Sañjaya berkata: Kemudian, apabila mereka melihat Dhanañjaya (Arjuna) memegang anak panahnya dan busur Gāṇḍīva, para pahlawan kereta perang yang agung melaungkan sekali lagi sorakan yang dahsyat. Laungan yang diperbaharui itu menandakan keyakinan yang pulih dan tekad bersama, tatkala pertaruhan moral dan ketenteraan peperangan semakin memuncak.
Verse 7
पाण्डवा: सोमकाश्रैव ये चैषामनुयायिन: । दध्मुश्न मुदिता: शड्खान् वीरा: सागरसम्भवान्
Sañjaya berkata: Wahai Raja, ketika itu para Pāṇḍava, kaum Somaka, dan semua pengikut mereka—bersorak gembira melihat Arjuna memegang busur Gāṇḍīva dan anak panahnya—sekali lagi mengaum seperti singa; dan para wira itu, dalam kegirangan, meniup sangkha (siput perang) yang dikatakan lahir dari lautan. Pemandangan ini menandakan tekad yang bangkit semula dan perpaduan pihak yang mendakwa berjuang demi dharma.
Verse 8
ततो भेर्यक्ष पेश्यक्ष॒ क्रराचा गोविषाणिका: । सहसैवाभ्यहन्यन्त तत: शब्दो महानभूत्,तदनन्तर भेरी, पेशी, क्रकच और नरसिंहे आदि बाजे सहसा बज उठे। इससे वहाँ महान् शब्द गूँजने लगा
Sañjaya berkata: Kemudian gendang dan gendang besar, alat bunyi yang nyaring dan kasar, serta trompet tanduk lembu dipalu serentak secara tiba-tiba. Daripadanya bangkitlah deru bunyi yang besar—tanda yang dapat didengar tentang kesiapsiagaan bala tentera dan momentum yang tidak dapat dipatahkan menuju peperangan.
Verse 9
तथा देवा: सगन्धर्वा: पितरश्ष॒ जनाधिप । सिद्धचारणसंघाश्न समीयुस्ते दिदृक्षया
Sañjaya berkata: “Demikian juga, wahai tuan manusia, para dewa bersama para Gandharva, para Pitṛ, serta himpunan Siddha dan Cāraṇa berhimpun di sana, ingin menyaksikan pembunuhan yang mengerikan itu.”
Verse 10
ऋषयश्न महाभागा: पुरस्कृत्य शतक्रतुम् । समीयुस््तत्र सहिता द्रष्ट॑ं तद् वैशसं महत्
Sañjaya berkata: Para resi agung yang diberkati, setelah menempatkan Śatakratu (Indra) sebagai pemimpin di hadapan mereka, berhimpun di sana bersama-sama untuk menyaksikan pembantaian yang luas dan mengerikan itu. Pemandangan itu menarik bahkan para dewa, gandharva, pitara, siddha dan cāraṇa sebagai penonton, menandakan bahawa keganasan perang telah menjadi peristiwa kosmik yang menguji tertib dharma serta akibat daripada pilihan manusia.
Verse 11
ततो युधिष्ठिरो दृष्टवा युद्धाय समवस्थिते । ते सेने सागरप्रख्ये मुहुः प्रचलिते नूप
Sañjaya berkata: Kemudian Yudhiṣṭhira, melihat kedua-dua bala tentera telah tersusun untuk berperang—luas bagaikan lautan dan berulang kali bergelora dengan gerak resah—melakukan sesuatu yang menggetarkan hati, wahai raja. Pemerintah yang gagah itu menanggalkan zirahnya, meletakkan senjata-senjata pilihannya, segera turun dari keretanya, lalu dengan tangan dirapatkan penuh hormat berjalan kaki menuju kepada Datuk Bhīṣma. Dalam diam dan menghadap ke timur, Dharmarāja Yudhiṣṭhira melangkah ke arah angkatan musuh—suatu isyarat kerendahan diri dan kewajipan menurut dharma di ambang peperangan.
Verse 12
विमुच्य कवचं वीरो निक्षिप्य च वरायुधम् । अवरुह्ा रथात् क्षिप्रंं पद्भधयामेव कृतांजलि:
Sañjaya berkata: “Wahai raja, sang wira itu, setelah menanggalkan zirahnya dan meletakkan senjata-senjata terbaiknya, segera turun dari keretanya. Dengan kedua tangan dirapatkan penuh hormat, dia meneruskan langkahnya dengan berjalan kaki.” Perbuatan itu menandakan peralihan yang disengajakan daripada sikap bertempur kepada kerendahan diri dan kepatutan dharmika—mencari kelakuan yang benar serta restu sebelum keganasan perang meledak.
Verse 13
पितामहमभिप्रेक्ष्य धर्मराजो युधिष्ठिर: । वाग्यत: प्रययौ येन प्राडुमुखो रिपुवाहिनीम्
Sañjaya berkata: Melihat Datuk itu, Dharmarāja Yudhiṣṭhira—menahan tutur katanya—berangkat menuju baginda, menghadap ke timur, ke arah angkatan musuh. Saat itu menegaskan beratnya pertimbangan etika Yudhiṣṭhira: bahkan di ambang pertempuran, dia mendekati orang tua yang dimuliakan dengan diam yang berdisiplin, dipandu oleh dharma, bukan oleh dorongan nafsu.
Verse 14
त॑ प्रयान्तमभिप्रेक्ष्य कुन्तीपुत्रो धनंजय: । अवतीर्य रथात् तूर्ण भ्रातृभि: सहितो5न्वयात्
Sañjaya berkata: Melihat baginda bergerak ke hadapan menuju angkatan musuh, Dhanañjaya (Arjuna), putera Kuntī, segera turun dari keretanya dan, bersama saudara-saudaranya, mengikut di belakang. Adegan itu menonjolkan tarikan kekeluargaan dan kewajipan di tengah perang: apabila seorang yang dimuliakan melangkah ke arah bahaya, para pemimpin segera bertindak, dan berat moral saat itu memaksa tindak balas yang pantas.
Verse 15
वासुदेवश्च भगवान् पृष्ठतोडनुजगाम तम् । तथा मुख्याश्न राजानस्तच्चित्ता जग्मुरुत्सुका:
Sañjaya berkata: Tuhan Yang Maha Mulia Vāsudeva mengikuti dia dari belakang. Demikian juga raja-raja terkemuka—dengan fikiran tertumpu kepadanya—turut pergi dengan penuh ghairah. Adegan ini menegaskan bahawa gerak maju Arjuna yang tegas menarik bahkan para penguasa agung untuk sehaluan, dan iringan Kṛṣṇa yang teguh membingkai saat itu dengan bimbingan ilahi di tengah ketegangan dharma dalam peperangan.
Verse 16
अर्जुन उवाच कि ते व्यवसितं राजन् यदस्मानपहाय वै | पद्धयामेव प्रयातो5सि प्राड्मुखो रिपुवाहिनीम्
Arjuna berkata: “Wahai Raja, apakah tekad yang telah tuanku tetapkan sehingga—meninggalkan kami—tuanku berangkat berjalan kaki, menghadap ke timur, menuju bala tentera musuh? Apakah niat tuanku dengan mara seorang diri begini?”
Verse 17
भीमसेन उवाच क्व गमिष्यसि राजेन्द्र निक्षिप्तकवचायुध: । दंशितेष्वरिसैन्येषु भ्रातृनुत्सृज्य पार्थिव
Bhīmasena berkata: “Wahai raja terbaik, ke manakah tuanku pergi setelah mencampakkan baju zirah dan senjata? Wahai penguasa bumi, meninggalkan saudara-saudara lalu memasuki barisan musuh yang lengkap bersenjata—apakah jalan yang tuanku pilih ini?”
Verse 18
इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्गीतापवके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् श्रीकृष्णार्जुन-संवादमें मोक्षसंन्यासयोग नामक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ
Sañjaya berkata: Demikianlah, dalam Mahābhārata, Bhīṣma Parva—dalam bahagian yang dikenali sebagai Bhagavad Gītā—berakhirlah Upaniṣad bernama Bhagavad Gītā, ajaran tentang pengetahuan Brahman dan disiplin Yoga, dalam dialog antara Śrī Kṛṣṇa dan Arjuna; bab kelapan belas, bernama “Yoga Pembebasan melalui Pelepasan,” telah selesai. Nakula berkata: “Wahai Bhārata, engkau abang sulungku. Apabila engkau melangkah begini menuju bala tentera musuh, ketakutan besar menyeksa hatiku. Katakanlah—ke manakah sebenarnya engkau pergi?”
Verse 19
सहदेव उवाच अस्मिन् रणसमूहे वै वर्तमाने महाभये । उत्सृज्य क्व नु गन्तासि शत्रूनभिमुखो नृूप
Sahadeva berkata: “Wahai raja, ketika himpunan perang ini sedang berlangsung dan bahaya besar telah muncul, ke manakah tuanku akan pergi, meninggalkan kami, sambil menghadap musuh?”
Verse 20
संजय उवाच एवमाभाष्यमाणो<पि भ्रातृभि: कुरुनन्दन: । नोवाच वाग्यतः किंचिद् गच्छत्येव युधिछिर:
Sañjaya berkata: Wahai Raja, meskipun ditegur demikian oleh saudara-saudaranya, Yudhiṣṭhira—kebanggaan keturunan Kuru—tidak mengucapkan sepatah kata pun. Lidahnya tertahan; dia hanya meneruskan langkah dalam diam.
Verse 21
तानुवाच महाप्राज्ञो वासुदेवो महामना: । अभिप्रायो<स्य विज्ञातो मयेति प्रहसन्निव,तब परम बुद्धिमान महामना भगवान् वासुदेवने उन चारों भाइयोंसे हँसते हुए-से कहा --“ इनका अभिप्राय मुझे ज्ञात हो गया है
Sañjaya berkata: Kemudian Vāsudeva yang berhati agung lagi maha bijaksana berkata kepada mereka sambil tersenyum, seakan-akan berkelakar: “Aku telah mengetahui maksudnya.”
Verse 22
एष भीष्म तथा द्रोणं गौतमं शल्यमेव च । अनुमान्य गुरून् सर्वान् योत्स्यते पार्थिवोडरिभि:
Sañjaya berkata: “Raja ini, setelah terlebih dahulu memberi hormat dan memohon perkenan semua guru dan orang tua—Bhīṣma, Droṇa, Gautama (Kṛpa), dan Śalya—akan berperang melawan musuh-musuhnya.”
Verse 23
श्रूयते हि पुराकल्पे गुरूनननुमान्य यः । युध्यते स भवेद् व्यक्तमपध्यातो महत्तरै:
Sañjaya berkata: “Menurut tradisi purba, sesiapa yang berperang tanpa terlebih dahulu memohon izin para guru dan orang tua, pasti dipandang jatuh daripada adab di mata para mulia itu.”
Verse 24
अनुमान्य यथाशान्त्र यस्तु युध्येन्महत्तरै: । ध्रुवस्तस्य जयो युद्धे भवेदिति मतिर्मम
Sañjaya berkata: “Pada hematku, sesiapa yang berperang setelah memperoleh perkenan para mulia menurut ketetapan śāstra, pasti meraih kemenangan dalam perang itu.”
Verse 25
एवं ब्रुवति कृष्णेउत्र धार्तराष्ट्रचमूं प्रति । (नेत्रैरनिमिषै: सर्व: प्रेक्षन्ते सम युधिष्ठिरम् ।।
Sañjaya berkata: Ketika Kṛṣṇa berkata demikian, berhadapan dengan bala tentera putera-putera Dhṛtarāṣṭra, semua mata—tanpa berkelip—tertumpu pada Yudhiṣṭhira yang mara ke arah mereka. Di sesetengah tempat timbul jerit pekik yang besar, manakala di tempat lain ada yang terdiam sama sekali, tidak mampu mengucapkan sepatah kata pun.
Verse 26
दृष्टवा युधिष्ठिरं दूराद् धार्तराष्ट्रस्य सैनिका: । मिथ: संकथयाज्चक्रुरेषो हि कुलपांसन:
Melihat Yudhiṣṭhira dari jauh, para askar Dhṛtarāṣṭra berbicara sesama mereka: “Orang ini benar-benar aib yang hidup bagi keturunannya.”
Verse 27
व्यक्त भीत इवाभ्येति राजासौ भीष्ममन्तिकम् | युधिष्ठटिर: ससोदर्य: शरणार्थ प्रयाचक:
Sañjaya berkata: “Lihatlah—jelas kelihatan—raja Yudhiṣṭhira sedang menghampiri Bhīṣma seolah-olah dikuasai ketakutan. Bersama saudara-saudaranya, dia datang sebagai pemohon, mencari perlindungan.”
Verse 28
धनंजये कथं नाथे पाण्डवे च वृकोदरे | नकुले सहदेवे च भीतिरभ्येति पाण्डवम्,'पाण्डुनन्दन धनंजय, वृकोदर भीम तथा नकुल-सहदेव-जैसे सहायकोंके रहते हुए युधिष्ठिरके मनमें भय कैसे हो गया!
Sañjaya berkata: “Bagaimana mungkin rasa takut timbul dalam hati Pāṇḍava (Yudhiṣṭhira) sedangkan Dhanañjaya Arjuna berdiri sebagai pelindungnya, dan Vṛkodara Bhīma, bersama Nakula serta Sahadeva, hadir sebagai sekutu yang teguh?”
Verse 29
न नून॑ क्षत्रियकुले जात: सम्प्रथिते भुवि । यथास्य हृदयं भीतमल्पसत्त्वस्य संयुगे
Sañjaya berkata: “Sesungguhnya dia bukanlah lahir daripada keturunan Kṣatriya yang termasyhur di muka bumi; kerana pada saat pertempuran ini hatinya begitu gentar—kekuatan batinnya amatlah kecil.”
Verse 30
ततस्ते सैनिका: सर्वे प्रशंसन्ति सम कौरवान् | हृष्टा: सुमनसो भूत्वा चैलानि दुधुवुश्च ह,तदनन्तर वे सब सैनिक कौरवोंकी प्रशंसा करने लगे और प्रसन्नचित्त हो हर्षमें भरकर अपने कपड़े हिलाने लगे
Kemudian semua askar itu mula memuji kaum Kaurava. Dengan hati yang gembira dan ceria, mereka dipenuhi semangat yang meluap-luap lalu melambai-lambaikan pakaian mereka—tanda lahiriah persetujuan dan naiknya moral di tengah ketegangan perang.
Verse 31
व्यनिन्दश्न॒ तथा सर्वे योधास्तव विशाम्पते । युधिष्ठिरं ससोदर्य सहितं केशवेन हि,प्रजानाथ! आपके वे सब योद्धा भाइयों तथा श्रीकृष्णसहित युधिष्ठिरकी विशेषरूपसे निन््दा करते थे
Sanjaya berkata: Wahai tuan rakyat, wahai raja manusia, semua pahlawanmu juga demikian—mereka melontarkan celaan, mengecam Yudhiṣṭhira bersama saudara-saudaranya, bahkan dengan Keśava (Kṛṣṇa) di sisinya.
Verse 32
ततस्तत् कौरवं सैन्यं धिक्कृत्वा तु युधिष्ठिरम् नि:शब्दम भवत् तूर्ण पुनरेव विशाम्पते,राजन! इस प्रकार युधिष्ठिरको धिक्कार देकर सारी कौरव-सेना पुनः शीघ्र ही चुप हो गयी
Sañjaya berkata: Kemudian bala tentera Kaurava, setelah mencerca Yudhiṣṭhira dengan kata-kata penghinaan, segera kembali diam, wahai tuan rakyat.
Verse 33
कि नु वक्ष्यति राजासौ कि भीष्म: प्रतिवक्ष्यति । कि भीम: समरश्लाघी कि नु कृष्णार्जुनाविति
Sañjaya berkata: “Apakah yang akan dikatakan raja itu? Apakah jawapan Bhīṣma? Apakah yang akan dikatakan Bhīma—yang bermegah dalam peperangan? Dan apakah pula kata Kṛṣṇa dan Arjuna?” Maka semua yang hadir berfikir dalam hati, menanti kata-kata dan nasihat yang akan membentuk haluan perang serta tuntutan dharma.
Verse 34
विवक्षितं किमस्येति संशय: सुमहान भूत् । उभयो: सेनयो राजन् युधिष्िरकृते तदा
Sañjaya berkata: “Timbul keraguan yang amat besar: ‘Apakah yang hendak dikatakannya?’ Wahai Raja. Pada ketika itu, dalam kedua-dua bala tentera, ketidakpastian tentang Yudhiṣṭhira pun merebak, kerana semua tertanya-tanya apakah yang ingin diisytiharkan oleh raja yang berpegang pada dharma itu.”
Verse 35
सो<वगाहा चमूं शत्रो: शरशक्तिसमाकुलाम् | भीष्ममेवाभ्ययात् तूर्ण भ्रातृभि: परिवारित:,बाण और शक्तियोंसे भरी हुई शत्रुकी सेनामें घुसकर भाइयोंसे घिरे हुए युधिष्छिर तुरंत ही भीष्मजीके पास जा पहुँचे
Sañjaya berkata: Setelah menerjah masuk ke dalam bala tentera musuh yang padat dengan anak panah dan lembing, Yudhiṣṭhira—dikelilingi oleh saudara-saudaranya—dengan pantas mara terus menuju Bhīṣma. Detik itu menonjolkan ketegangan dharma: sang raja, terikat oleh kewajipan melindungi pihaknya dan menegakkan tertib yang benar, namun tetap dipaksa berhadapan dengan seorang tua yang dimuliakan, pelindung garis Kuru, di tengah keperluan perang yang kejam.
Verse 36
तमुवाच तत:ः पादौ कराभ्यां पीड्य पाण्डव: । भीष्मं शान्तनवं राजा युद्धाय समुपस्थितम्
Sañjaya berkata: Kemudian raja Pāṇḍava, sambil menekan kaki datuk agung itu dengan kedua-dua tangan sebagai tanda hormat, berbicara kepada Bhīṣma, putera Śantanu, yang berdiri siap untuk berperang. Adegan ini menegaskan ketegangan etika perang: walau pertikaian tidak dapat dielakkan, raja-pejuang tetap memelihara dharma melalui kerendahan hati, penghormatan kepada orang tua, serta memohon izin atau restu sebelum menumpahkan kekerasan.
Verse 37
॥6५ ५4 बट .$| /५ | पु सन धप बज ५ ; कक १५. सी लि लॉ टि्ट ्िि ह/ हट 22205 ५ डे युधिष्ठिर उदाच आमन्त्रये त्वां दुर्धर्ष त्वया योत्स्यामहे सह । अनुजानीहि मां तात आशिषश्ल प्रयोजय
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai datuk agung yang tidak terkalahkan, aku memohon izin daripadamu. Kini kami harus berperang denganmu. Wahai bapa yang dimuliakan, izinkanlah aku, dan kuatkanlah aku dengan restumu.”
Verse 38
भीष्म उवाच यद्येवं नाभिगच्छेथा युधि मां पृथिवीपते । शपेयं त्वां महाराज पराभावाय भारत
Bhīṣma berkata: “Wahai tuan bumi, wahai keturunan Bharata, wahai raja agung—jika dalam peperangan ini engkau tidak datang menemuiku dengan cara demikian, nescaya aku akan melafazkan sumpah kutukan agar engkau ditimpa kekalahan.”
Verse 39
प्रीतो&हं पुत्र युध्यस्व जयमाप्रुहि पाण्डव । यत् तेडभिलषितं चान्यत् तदवाप्रुहि संयुगे
Bhīṣma berkata: “Anakku, aku berkenan. Berperanglah, wahai Pāṇḍava, dan capailah kemenangan. Dan apa jua hasrat lain yang engkau dambakan, penuhilah juga di sini, di medan laga—wahai kebanggaan keturunan Pāṇḍu.”
Verse 40
व्रियतां च वर: पार्थ किमस्मत्तो5भिकड्क्षसि । एवंगते महाराज न तवास्ति पराजय:,पार्थ! वर माँगो। तुम मुझसे क्या चाहते हो? महाराज! ऐसी स्थितिमें तुम्हारी पराजय नहीं होगी
Bhīṣma berkata: “Wahai Pārtha, pilihlah suatu anugerah—apakah yang engkau inginkan daripadaku? Wahai raja agung, setelah perkara sampai ke tahap ini, tiada lagi kekalahan bagimu.”
Verse 41
अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थों न कस्यचित् । इति सत्यं महाराज बद्धो<स्म्यर्थेन कौरवै:,महाराज! पुरुष अर्थका दास है, अर्थ किसीका दास नहीं है। यह सच्ची बात है। मैं कौरवोंके द्वारा अर्थसे बँधा हुआ हूँ
Bhīṣma berkata: “Manusia menjadi hamba kepada harta; harta pula bukan hamba kepada sesiapa. Wahai raja agung, itulah kebenaran. Aku terikat oleh harta—oleh budi dan naungan kaum Kaurava.”
Verse 42
भीष्मपर्वणि तु द्विचत्वारिंशोडध्याय:
Sañjaya berkata: “Wahai kebanggaan kaum Kuru, hari ini aku menuturkan kata-kata yang tidak layak—seperti kata-kata seorang pengecut. Wahai putera Kuru, aku telah dipelihara oleh kaum Kaurava dengan harta mereka; maka selain berperang di pihak mereka, apakah lagi yang engkau mahu aku lakukan? Katakanlah.”
Verse 43
धृतराष्ट्र: श्लोकमेकं॑ गीताया मानमुच्यते । इस गीतामें छः सौ बीस श्लोक भगवान् श्रीकृष्णने कहे हैं
Vaiśampāyana berkata: “Dalam ukuran bilangan śloka Gītā, satu śloka Dhṛtarāṣṭra turut dihitung.” Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai yang berlengan perkasa, yang sentiasa menghendaki kebaikanku, nasihatilah aku tanpa henti; dan berperanglah demi pihak Kaurava (Duryodhana). Inilah anugerah yang kuinginkan sepanjang masa.”
Verse 44
भीष्म उवाच राजन् किमत्र साहां ते करोमि कुरुनन्दन । काम योत्स्ये परस्यार्थे ब्रूहि यत् ते विवक्षितम्
Bhīṣma berkata: “Wahai raja, wahai kebanggaan Kuru, apakah bantuan yang dapat aku lakukan di sini untukmu? Aku akan berperang menurut kehendakku, demi pihak musuhmu; maka katakanlah, apakah yang hendak engkau sampaikan?”
Verse 45
युधिछिर उवाच कथं जयेय॑ संग्रामे भवनन््तमपराजितम् । एतन्मे मन्त्रय हित॑ यदि श्रेय: प्रपश्यसि
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Datuk Agung (Pitāmaha)! Tuanku tidak mungkin ditewaskan oleh sesiapa; maka bagaimana mungkin aku dapat menewaskan Tuanku di medan perang? Jika Tuanku melihat kebaikan dan kesejahteraan bagiku, berilah nasihat yang bermanfaat untukku.”
Verse 46
भीष्म उवाच नैनं पश्यामि कौन्तेय यो मां युध्यन्तमाहवे । विजयेत पुमान् कश्रित् साक्षादपि शतक्रतु:
Bhīṣma berkata: “Wahai putera Kuntī, aku tidak melihat seorang pun yang mampu menewaskan aku ketika aku bertempur di medan laga. Pada saat perang, tiada sesiapa dapat mengatasi aku—bahkan Śatakratu (Indra) sendiri sekalipun berdiri di hadapanku.”
Verse 47
युधिछिर उवाच हन्त पृच्छामि तस्मात् त्वां पितामह नमोस्तु ते । वधोपायं ब्रवीहि त्वमात्मन: समरे परै:
Yudhiṣṭhira berkata: “Maka sebab itu aku bertanya kepada Tuanku, wahai Pitāmaha; sembah sujudku kepada Tuanku. Nyatakanlah cara bagaimana, di medan perang, musuh dapat menjatuhkan Tuanku.”
Verse 48
भीष्म उवाच न सम तं तात पश्यामि समरे यो जयेत माम् | न तावन्मृत्युकालो5पि पुनरागमनं कुरु
Bhīṣma berkata: “Wahai anakku, aku tidak melihat seorang pun di medan perang yang dapat menewaskan aku. Dan saat kematianku yang ditetapkan juga belum tiba; maka datanglah lagi kemudian untuk memperoleh jawapan bagi pertanyaanmu.”
Verse 49
संजय उवाच ततो युधिष्ठिरो वाक््यं भीष्मस्य कुरुनन्दन । शिरसा प्रतिजग्राह भूयस्तमभिवाद्य च
Sañjaya berkata: Maka Yudhiṣṭhira, wahai kebanggaan kaum Kuru, menerima kata-kata Bhīṣma dengan kepala tertunduk. Setelah sekali lagi memberi hormat, baginda meneruskan langkah—dengan rendah hati dan berdisiplin, meletakkan dharma dan kewajipan mengatasi keangkuhan, meski di tengah tekanan perang.
Verse 50
प्रायात् पुनर्महाबाहुराचार्यस्य रथं प्रति । पश्यतां सर्वसैन्यानां मध्येन भ्रातृभि: सह
Sañjaya berkata: Kemudian raja yang berlengan perkasa itu berangkat sekali lagi menuju kereta Sang Guru (Droṇa). Ketika seluruh bala tentera memandang, baginda melintasi tengah-tengah mereka bersama saudara-saudaranya—suatu perbuatan yang menzahirkan di hadapan umum kerendahan hati serta kepatuhan kepada dharma, meskipun perang sudah di ambang.
Verse 51
स द्रोणमभिवाद्याथ कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् । उवाच राजा दुर्धर्षमात्मनि:श्रेयसं वच:
Sañjaya berkata: Lalu raja mendekati Droṇa, memberi sembah hormat dan mengelilinginya sebagai tanda takzim. Setelah memuliakan guru persenjataan yang sukar ditundukkan itu, baginda mengucapkan kata-kata untuk memohon nasihat tentang apa yang benar-benar bermanfaat bagi kebaikan tertinggi dirinya—meletakkan dharma dan tata laku benar mengatasi keangkuhan meski di tengah desakan perang.
Verse 52
# 2 (से ही पर हिल /[]00 ५५५ ' आमन्त्रये त्वां भगवन् योत्स्ये विगतकल्मष: । कथं जये रिपून् सर्वाननुज्ञातस्त्वया द्विज
Sañjaya berkata: “Wahai Yang Mulia, aku memohon nasihatmu. Bagaimanakah aku harus berperang, bebas daripada noda dan kesalahan? Wahai Brahmana yang utama, setelah diizinkan olehmu, bagaimana aku dapat menewaskan dan menundukkan semua musuh ini?”
Verse 53
द्रोण उवाच यदि मां नाभिगच्छेथा युद्धाय कृतनिश्चय: । शपेयं त्वां महाराज पराभावाय सर्वश:
Droṇa berkata: “Wahai raja agung, jika setelah bertekad untuk berperang engkau tidak datang kepadaku, nescaya aku akan menjatuhkan sumpahan atasmu, sehingga engkau kalah sepenuhnya.”
Verse 54
तत् युधिष्ठिर तुष्टोडस्मि पूजितश्न त्वयानघ । अनुजानामि युध्यस्व विजयं समवाप्रुहि
Droṇa berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira yang tidak bercela, aku berkenan kepadamu. Engkau telah memuliakanku dengan besar. Aku mengizinkanmu—pergilah berperang; capailah kemenangan. Wahai Yudhiṣṭhira yang suci daripada dosa.”
Verse 55
करवाणि च ते काम ब्रूहि त्वमभिकड्क्षितम् । एवंगते महाराज युद्धादन्यत् किमिच्छसि
Droṇa berkata: “Aku akan menunaikan hasratmu—katakanlah apa yang benar-benar kau dambakan. Setelah perkara sampai begini, wahai Maharaja, aku tidak dapat berperang bagi pihakmu; ketepikan dahulu peperangan, katakanlah apa lagi yang kau inginkan.”
Verse 56
अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थों न कस्यचित् । इति सत्यं महाराज बद्धो<स्म्यर्थेन कौरवै:,पुरुष अर्थका दास है, अर्थ किसीका दास नहीं है। महाराज! यह सच्ची बात है। मैं कौरवोंके द्वारा अर्थसे बँधा हुआ हूँ
Droṇa berkata: “Manusia menjadi hamba kepada harta; tetapi harta tidak menjadi hamba kepada sesiapa. Itulah kebenaran, wahai Maharaja. Dengan harta—dengan ikatan kewajipan yang ditimbulkannya—aku telah terbelenggu oleh kaum Kaurava.”
Verse 57
ब्रवीम्येतत् क्लीबवत् त्वां युद्धादन्यत् किमिच्छसि । योत्स्ये5हं कौरवस्यार्थ तवाशास्यो जयो मया
Droṇa berkata: “Aku berkata kepadamu—seakan-akan menyoal orang yang tidak berdaya: selain peperangan, apa lagi yang kau inginkan? Aku akan bertempur demi pihak Kaurava; namun kemenangan yang kuharapkan ialah kemenanganmu.”
Verse 58
युधिषछ्िर उवाच जयमाशास्व मे ब्रह्मन् मन्त्रयस्व च मद्धितम् । युद्धयस्व कौरवस्यार्थे वर एब वृतो मया
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Brahmana, doakanlah kemenangan untukku dan teruslah menasihati apa yang membawa manfaat kepadaku. Namun bertempurlah di pihak Kaurava—itulah satu-satunya anugerah yang kupilih daripadamu.”
Verse 59
द्रोण उवाच ध्रुवस्ते विजयो राजन् यस्य मन्त्री हरिस्तव । अहं त्वामभिजानामि रणे शत्रून् विमोक्ष्यसे
Droṇa berkata: “Wahai Raja, kemenanganmu pasti, kerana Hari (Śrī Kṛṣṇa) sendiri ialah penasihatmu. Aku mengenal keteguhanmu yang sebenar; di medan perang engkau akan melepaskan musuh-musuhmu daripada nyawa.”
Verse 60
यतो धर्मस्तत: कृष्णो यतः कृष्णस्ततो जय: । युद्धयस्व गच्छ कौन्तेय पृच्छ मां कि ब्रवीमि ते
Di mana dharma tegak, di situlah Kṛṣṇa berdiri; dan di mana Kṛṣṇa berdiri, di situlah kemenangan. Maka, wahai putera Kuntī, pergilah dan bertempurlah. Jika engkau mahu bertanya lagi, bertanyalah—apa lagi yang dapat kukatakan kepadamu?
Verse 61
युधिछिर उवाच पृच्छामि व्वां द्विजश्रेष्ठ शृणु यन्मेडभिकाड्क्षितम् । कथं जयेय॑ संग्रामे भवन्तमपराजितम्
Yudhiṣṭhira berkata: “Aku bertanya kepadamu, wahai yang terbaik antara yang dua kali lahir; dengarkan apa yang amat ingin kuketahui. Oleh sebab engkau tidak dapat dikalahkan oleh sesiapa pun, bagaimana mungkin aku dapat menewaskanmu dalam peperangan?”
Verse 62
द्रोण उवाच न ते5स्ति विजयस्तावद् यावत् युद्धयाम्यहं रणे । ममाशु निधने राजन् यतस्व सह सोदरै:
Droṇa berkata: “Wahai Raja, selagi aku terus bertempur di medan perang, kemenangan tidak akan menjadi milikmu. Maka, bersama saudara-saudaramu, berusahalah sedemikian rupa agar kematianku datang dengan segera.”
Verse 63
युधिषछ्िर उवाच हन्त तस्मान्महाबाहो वधोपायं वदात्मन: । आचार्य प्रणिपत्यैष पृच्छामि त्वां नमो<स्तु ते
Yudhiṣṭhira berkata: “Jika demikian, wahai guru yang berlengan perkasa, katakanlah kepadaku cara bagaimana engkau dapat dibunuh. Salam hormat kepadamu; setelah bersujud di kakimu barulah aku mengajukan pertanyaan ini.”
Verse 64
द्रोण उदाच न शत्रुं तात पश्यामि यो मां हन्याद् रथे स्थितम् | युध्यमानं सुसंरब्धं शरवर्षोघवर्षिणम्
Droṇa berkata: “Wahai anakku, aku tidak melihat seorang musuh pun yang dapat membunuhku ketika aku berdiri di atas kereta perangnya—sedang bertempur dengan amarah yang menyala, dan mencurahkan hujan anak panah bagaikan ribut taufan.”
Verse 65
ऋते प्रायगतं राजन् न्यस्तशस्त्रमचेतनम् । हन्यान्मां युधि योधानां सत्यमेतद् ब्रवीमि ते
Wahai Raja, kecuali ketika aku telah mengambil nazar berpuasa hingga mati—meletakkan senjata dan duduk seakan tidak sedarkan diri—selain keadaan itu, tiada siapa dapat membunuhku. Hanya dalam keadaan demikianlah seorang pahlawan terunggul dapat menewaskanku di medan perang. Inilah kebenaran yang aku sampaikan kepadamu, wahai Raja.
Verse 66
शस्त्र चाहं रणे जहां श्रुत्वा तु महदप्रियम् । श्रद्धेयवाक्यात् पुरुषादेतत् सत्यं ब्रवीमि ते
Yudhiṣṭhira berkata: “Jika di medan perang aku mendengar khabar yang amat tidak menyenangkan daripada seorang yang kata-katanya boleh dipercayai, aku akan meletakkan senjata. Ini aku katakan kepadamu sebagai kebenaran.”
Verse 67
संजय उवाच एतच्छुत्वा महाराज भारद्वाजस्य धीमत: । अनुमान्य तमाचार्य प्रायाच्छारद्वतं प्रति
Sañjaya berkata: Wahai Raja, setelah mendengar kata-kata putera Bhāradvāja yang bijaksana (Droṇa), sang guru menyetujuinya dengan penuh hormat, lalu pergi menuju Śāradvata (Kṛpa).
Verse 68
सो5भिवाद्य कृपं राजा कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् । उवाच दुर्धर्षतमं वाक््यं वाक्यविदां वर:
Raja itu memberi salam hormat kepada Kṛpa dan mengelilinginya (pradakṣiṇa); kemudian Yudhiṣṭhira—yang terunggul dalam seni bicara—berkata kepada Kṛpācārya, pahlawan yang sukar ditandingi, dengan kata-kata yang berat untuk ditolak.
Verse 69
है! ५! ).04 अनुमानये त्वां योत्स्येडहं गुरो विगतकल्मष: । जयेयं च रिपून् सर्वाननुज्ञातस्त्वयानघ
“Wahai Guru, aku memohon keizinanmu agar aku dapat berperang tanpa tercemar oleh noda dosa. Wahai yang tidak bercela, jika engkau mengizinkan, aku akan mampu menewaskan semua musuh di medan laga.”
Verse 70
कृप उवाच यदि मां नाभिगच्छेथा युद्धाय कृतनिश्चय: । शपेयं त्वां महाराज पराभावाय सर्वश:
Kṛpa berkata: “Wahai raja agung, jika setelah bertekad untuk berperang engkau tidak datang kepadaku, nescaya aku akan menyumpahmu agar mengalami kekalahan yang menyeluruh.”
Verse 71
अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् | इति सत्यं महाराज बद्धो<स्म्यर्थेन कौरवै:,पुरुष अर्थका दास है, अर्थ किसीका दास नहीं है। महाराज! यह सच्ची बात है। मैं कौरवोंके द्वारा अर्थसे बँधा हुआ हूँ
Kṛpa berkata: “Manusia menjadi hamba kepada kekayaan; tetapi kekayaan tidak menjadi hamba kepada sesiapa. Wahai raja agung, itulah kebenaran. Aku terikat oleh harta—dipegang oleh Kaurava melalui naungan dan kewajipan—maka aku tidak dapat bertindak sesuka hatiku.”
Verse 72
तेषामर्थ महाराज योद्धव्यमिति मे मतिः । अतत्त्वां क्लीबवद् ब्रूयां युद्धादन््यत् किमिच्छसि
“Wahai raja agung, pertimbanganku telah tetap: aku mesti berperang demi mereka. Maka aku bertanya kepadamu—hampir seperti seorang pengecut—apakah lagi yang engkau kehendaki daripadaku, selain bantuan dalam perang ini?”
Verse 73
युधिछिर उवाच हन्त पृच्छामि ते तस्मादाचार्य शृणु मे वच: । इत्युक्त्वा व्यथितो राजा नोवाच गतचेतन:
Yudhiṣṭhira berkata: “Maka kerana itu, wahai guru, aku bertanya kepadamu—dengarkanlah kata-kataku.” Setelah berkata demikian, raja yang digoncang dukacita, seakan hilang sedar, tidak mampu berkata lagi.
Verse 74
संजय उवाच त॑ गौतम: प्रत्युवाच विज्ञायास्य विवक्षितम् । अवध्यो5हं महीपाल युद्धयस्व जयमाप्रुहि
Sañjaya berkata: Gautama, yakni Kṛpa, memahami apa yang hendak diucapkan Yudhiṣṭhira, lalu menjawab raja demikian: “Wahai raja, aku tidak dapat dibunuh. Pergilah, berperanglah, dan raihlah kemenangan.”
Verse 75
प्रीतस्तेडभिगमेनाहं जयं तव नराधिप । आशासिष्ये सदोत्थाय सत्यमेतद् ब्रवीमि ते
Sañjaya berkata: “Wahai raja, aku amat gembira dengan kedatanganmu. Setiap hari, setelah bangkit, aku akan terus-menerus memanjatkan berkat dan doa bagi kemenanganmu. Inilah yang kukatakan kepadamu dengan sebenar-benarnya.”
Verse 76
एतच्छुत्वा महाराज गौतमस्य विशाम्पते | अनुमान्य कृपं राजा प्रययौ येन मद्रराट्,महाराज! प्रजानाथ! कृपाचार्यकी यह बात सुनकर राजा युधिष्ठिर उनकी अनुमति ले जहाँ मद्रराज शल्य थे, उस ओर चले गये
Sañjaya berkata: “Wahai raja agung, wahai tuan rakyat jelata, setelah mendengar kata-kata Gautama itu, Raja Yudhiṣṭhira—sesudah dengan hormat memperoleh persetujuan Kṛpa—berangkat menuju tempat Raja Madra, Śalya, berada.”
Verse 77
स शल्यमभिवाद्याथ कृत्वा चाभिप्रदक्षिणम् । उवाच राजा दुर्धर्षमात्मनि:श्रेयसं वच:,दुर्जय वीर शल्यको प्रणाम करके उनकी परिक्रमा करनेके पश्चात् राजा युधिष्ठिरने उनसे अपने हितकी बात कही--
Sañjaya berkata: Setelah memberi salam hormat kepada Śalya dan kemudian mengelilinginya sebagai tanda takzim, Raja Yudhiṣṭhira berbicara kepada wira yang sukar ditundukkan itu dengan kata-kata yang ditujukan kepada kebaikan tertinggi bagi dirinya sendiri.
Verse 78
9॥ 00 )५200 0 30, :॥2:9 07 छल हम करन 477 | हा कि १ एू हक्छा अनुमानये त्वां दुर्धर्ष योत्स्ये विगतकल्मष: । जयेयं नु परान् राजन्ननुज्ञातस्त्वया रिपून्,“दुर्धर्ष वीर! मैं पापरहित एवं निरपराध रहकर आपके साथ युद्ध करूँगा; इसके लिये आपकी अनुमति चाहता हूँ। राजन! आपकी आज्ञा पाकर मैं समस्त शत्रुओंको युद्धमें परास्त कर सकता हूँ
Sañjaya berkata: “Wahai wira yang tidak tertundukkan, aku memohon izinmu: tanpa dosa dan tanpa cela, aku akan berperang. Wahai raja, setelah mendapat perkenanmu, aku yakin dapat menewaskan musuh-musuh di medan laga.”
Verse 79
शल्य उवाच यदि मां नाभिगच्छेथा युद्धाय कृतनिश्चय: । शपेयं त्वां महाराज पराभावाय वै रणे
Śalya berkata: “Wahai raja agung, jika setelah bertekad untuk berperang engkau tidak datang kepadaku, nescaya aku akan melafazkan sumpah kutuk agar engkau mengalami kekalahan di medan laga.”
Verse 80
तुष्टोडस्मि पूजितश्लास्मि यत् काड्क्षसि तदस्तु ते । अनुजानामि चैव त्वां युध्यस्व जयमाप्नुहि
Śalya berkata: “Aku berpuas hati dan berasa dimuliakan oleh penghormatan yang engkau tunjukkan kepadaku. Semoga apa jua yang engkau inginkan menjadi kenyataan bagimu. Aku mengizinkanmu—pergilah, berperanglah, dan capailah kemenangan.”
Verse 81
ब्रूहि चैव परं वीर केनार्थ: कि ददामि ते । एवंगते महाराज युद्धादन््यत् किमिच्छसि
Śalya berkata: “Katakanlah dengan jelas, wahai wira—apakah yang engkau cari, dan apakah yang harus aku berikan kepadamu? Wahai raja agung, setelah perkara sampai begini, selain bantuan dalam peperangan, apakah lagi yang engkau inginkan daripadaku?”
Verse 82
अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थों न कस्यचित् । इति सत्यं महाराज बद्धो<स्म्यर्थेन कौरवै:,पुरुष अर्थका दास है, अर्थ किसीका दास नहीं है। महाराज! यह सच्ची बात है। कौरवोंके द्वारा मैं अर्थसे बँधा हुआ हूँ
Śalya berkata: “Manusia menjadi hamba kepada harta; harta pula tidak menjadi hamba kepada sesiapa. Wahai raja agung, itulah kebenaran. Dengan harta jugalah aku terikat—oleh kaum Kaurava.”
Verse 83
करिष्यामि हि ते काम॑ भागिनेय यथेप्सितम् । ब्रवीम्यत: क्लीबवत् त्वां युद्धादन्यत् किमिच्छसि
Śalya berkata: “Wahai anak saudaraku, aku benar-benar akan menunaikan kehendakmu sebagaimana yang engkau inginkan. Namun aku berkata kepadamu seolah-olah kepada seorang pengecut: selain bantuan dalam peperangan ini, apakah lagi yang engkau pinta? Katakanlah—hajatmu akan dikabulkan.”
Verse 84
युधिछिर उवाच मन्त्रयस्व महाराज नित्यं मद्धितमुत्तमम् । काम युद्धय परस्यार्थे वरमेतं वृणोम्पहम्
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai raja agung, nasihatilah aku setiap hari dengan yang terbaik demi kesejahteraanku. Dan jika engkau berkehendak, berperanglah demi kepentingan orang lain; itulah anugerah yang kupilih.”
Verse 85
शल्य उवाच किमत्र ब्रूहि साहां ते करोमि नृपसत्तम । काम योत्स्ये परस्यार्थे बद्धो<5स्म्यर्थेन कौरवै:
Śalya berkata: “Katakanlah—apakah bantuan yang dapat aku berikan di sini kepadamu, wahai raja yang termulia? Walau hatiku mungkin menginginkan sebaliknya, aku terikat oleh kaum Kaurava melalui harta dan kewajipan; maka aku akan berperang, menurut pilihanku, bagi pihak lawanmu.”
Verse 86
युधिछिर उवाच स एव मे वर: शल्य उद्योगे यस्त्वया कृत: । सूतपुत्रस्य संग्रामे कार्यस्तेजोवधस्त्वया,(त्वां हि योक्ष्यति सूतत्वे सूतपुत्रस्य मातुल । दुर्योधनो रणे शूरमिति मे नैष्ठिकी मति: ।।
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Śalya, bapa saudara sebelah ibu! Anugerah yang engkau berikan kepadaku ketika persiapan perang dahulu—itulah juga yang aku perlukan sekarang. Apabila putera kusir memasuki pertempuran, engkau mesti melemahkan semangatnya. Kerana aku yakin teguh, wahai bapa saudara, bahawa dalam peperangan itu Duryodhana akan melantik seorang wira sepertimu menjadi kusir kepada putera kusir itu.”
Verse 87
शल्य उवाच सम्पत्स्यत्येष ते काम: कुन्तीपुत्र यथेप्सितम् । गच्छ युध्यस्व विश्रब्ध: प्रतिजाने वचस्तव
Śalya berkata: “Wahai putera Kuntī, hasratmu pasti akan terlaksana tepat seperti yang engkau kehendaki. Pergilah—berperanglah dengan hati yang tenang dan yakin. Aku berikrar akan menunaikan kata-katamu.”
Verse 88
संजय उवाच अनुमान्याथ कौन्तेयो मातुलं मद्रकेश्वरम् । निर्जगाम महासैन्याद् भ्रातृभि: परिवारित:
Sañjaya berkata: “Wahai Raja, setelah memperoleh keizinan daripada bapa saudara sebelah ibunya, Śalya—penguasa Madra—Yudhiṣṭhira, putera Kuntī, dikelilingi saudara-saudaranya, pun keluar dari bala tentera yang besar itu.”
Verse 89
वासुदेवस्तु राधेयमाहवेडभिजगाम वै | तत एनमुवाचेदं पाण्डवार्थ गदाग्रज:,इसी समय भगवान् श्रीकृष्ण उस युद्धमें राधानन्दन कर्णके पास गये। वहाँ जाकर उन गदाग्रजने पाण्डवोंके हितके लिये उससे इस प्रकार कहा--
Pada saat itu Vāsudeva (Śrī Kṛṣṇa) mendekati Rādheya (Karna) di medan perang. Setelah tiba di sisinya, adinda kepada pemegang gada (Balarāma), demi kesejahteraan pihak Pāṇḍava, berkata kepadanya dengan kata-kata berikut.
Verse 90
श्रुतं मे कर्ण भीष्मस्य द्वेषात् किल न योत्स्यसे । अस्मान् वरय राधेय यावद् भीष्मो न हन्यते
Sañjaya berkata: “Wahai Karna, aku telah mendengar bahawa kerana permusuhan terhadap Bhīṣma, engkau tidak akan bertempur. Wahai putera Rādhā (Rādheya), maka pilihlah pihak kami—sekurang-kurangnya sehingga Bhīṣma ditewaskan.”
Verse 91
हते तु भीष्मे राधेय पुनरेष्यसि संयुगम् । धार्तराष्ट्रस्य साहाय्यं यदि पश्यसि चेत् समम्,'राधेय! जब भीष्म मारे जाय, उसके बाद तुम यदि ठीक समझो तो युद्धमें पुनः दुर्योधनकी सहायताके लिये चले आना”
Sañjaya berkata: “Namun apabila Bhīṣma telah ditewaskan, wahai Rādheya, engkau boleh kembali ke medan perang—jika pada pandanganmu itu wajar dan patut untuk memberi bantuan kepada putera Dhṛtarāṣṭra.”
Verse 92
कर्ण उवाच न विप्रियं करिष्यामि धार्तराष्ट्रस्य केशव । त्यक्तप्राणं हि मां विद्धि दुर्योधनहितैषिणम्
Karna berkata: “Wahai Keśava, aku tidak akan melakukan sesuatu yang tidak menyenangkan putera Dhṛtarāṣṭra. Ketahuilah aku seolah-olah telah menyerahkan nyawaku—seorang yang sepenuhnya berbakti demi kesejahteraan Duryodhana.”
Verse 93
संजय उवाच तच्छुत्वा वचन कृष्ण: संन्यवर्तत भारत | युधिष्ठिरपुरोगैश्व पाण्डवै:ः सह संगत:,संजय कहते हैं--भारत! कर्णकी यह बात सुनकर श्रीकृष्ण लौट आये और युधिष्छिर आदि पाण्डवोंसे जा मिले
Sañjaya berkata: “Wahai Bharata, setelah mendengar kata-kata Karna, Krishna berpaling kembali lalu bergabung dengan para Pāṇḍava, dengan Yudhiṣṭhira di hadapan mereka.”
Verse 94
अथ सैन्यस्य मध्ये तु प्राक्रोशत् पाण्डवाग्रज: । यो<स्मान् वृणोति तमहं वरये साह्कारणात्
Kemudian, berdiri di tengah-tengah bala tentera, yang sulung antara Pāṇḍava berseru lantang: “Sesiapa yang memilih untuk berpihak kepada kami, dialah yang aku terima dan aku pilih kembali—sebagai sekutu dan sokongan.”
Verse 95
अथ तान् समभिप्रेक्ष्य युयुत्सुरिदमब्रवीत् । प्रीतात्मा धर्मराजानं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम्
Kemudian, setelah meneliti mereka (para Pāṇḍava), Yuyutsu—dengan hati yang dipenuhi kegembiraan—berkata demikian kepada Dharmaraja Yudhiṣṭhira, putera Kuntī.
Verse 96
अहं योत्स्यामि भवत: संयुगे धृतराष्ट्रजान् । युष्मदर्थ महाराज यदि मां वृणुषेडनघ,“महाराज! निष्पाप नरेश! यदि आप मुझे स्वीकार करें तो मैं आपलोगोंके लिये युद्धमें धृतराष्ट्रके पुत्रोंसे युद्ध करूँगा'
“Wahai Maharaja, jika tuanku yang tidak bernoda sudi menerima aku, maka demi tuanku aku akan turun ke medan perang dan bertempur melawan putera-putera Dhṛtarāṣṭra.”
Verse 97
युधिछिर उवाच एह्ीहि सर्वे योत्स्यामस्तव भ्रातृनपण्डितान् । युयुत्सो वासुदेवश्न वयं च ब्रूम सर्वश:
Yudhiṣṭhira berkata: “Datanglah, datanglah. Kita semua akan bersama-sama berperang melawan saudara-saudaramu yang tidak bijaksana. Inilah yang Yuyutsu, Vāsudeva (Kṛṣṇa), dan kami semua nyatakan dengan terbuka.”
Verse 98
वृणोमि त्वां महाबाहो युद्धयस्व मम कारणात् । त्वयि पिण्डश्न तन्तुश्न धृतराष्ट्रस्य दृश्यते
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai yang berlengan perkasa, aku menerimamu—berperanglah demi aku. Kerana tampaknya kelangsungan keturunan Dhṛtarāṣṭra serta pelaksanaan upacara leluhur (persembahan piṇḍa dan air) bergantung padamu.”
Verse 99
भजस्वास्मान् राजपुत्र भजमानान् महाद्ुते । न भविष्यति दुर्बुद्धिर्धार्तराष्ट्रोत्यमर्षण:
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai putera raja yang bercahaya wibawa, terimalah kami yang sedia menerimamu; dan engkau pun terimalah kami. Dhārtarāṣṭra yang berakal gelap—Duryodhana—yang tidak tahan menahan amarahnya, tidak akan terus hidup di dunia ini.”
Verse 100
संजय उवाच ततो युयुत्सु: कौरव्यान् परित्यज्य सुतांस्तव । (स सत्यमिति मन्वानो युधिष्ठिरवचस्तदा ।) जगाम पाण्डुपुत्राणां सेनां विश्राव्य दुन्दुभिम्
Sañjaya berkata: Maka Yuyutsu, setelah meninggalkan pihak Kaurava—yakni putera-putera tuanku—telah berpaling kepada bala tentera putera-putera Pāṇḍu. Dengan meyakini kata-kata Yudhiṣṭhira sebagai benar, pada saat itu juga ia melangkah masuk ke dalam barisan Pāṇḍava sambil membunyikan gendang perang—suatu pengisytiharan terbuka bahawa ia memilih kebenaran dan dharma mengatasi kesetiaan kepada kaum kerabat.
Verse 101
(अवसद् धार्तराष्ट्रस्य कुत्सयन् कर्म दुष्कृतम् सेनामध्ये हि तैः साक॑ युद्धाय कृतनिश्चय: ।।
Sañjaya berkata: Sambil mengecam perbuatan jahat putera Dhṛtarāṣṭra, dia tetap berada dalam bala tentera itu, setelah bertekad untuk berperang bersama pihak Pāṇḍava. Kemudian Raja Yudhiṣṭhira, amat bersukacita bersama adik-adiknya, sekali lagi mengambil dan menyarungkan baju zirah yang bercahaya, berkilau dengan sinar keemasan.
Verse 102
प्रत्यपद्यन्त ते सर्वे स्वरथान् पुरुषर्षभा: । ततो व्यूहं यथापूर्व प्रत्यव्यूहन्त ते पुन:
Sañjaya berkata: Kemudian semua wira perkasa itu, gagah laksana lembu jantan, kembali menaiki kereta perang masing-masing. Sesudah itu, sekali lagi mereka menyusun semula formasi tempur untuk menghadapi musuh, seperti sebelumnya—kembali kepada tertib dan disiplin di tengah himpitan perang.
Verse 103
अवादयन दुन्दुभी श्र शतशश्वैव पुष्करान् । सिंहनादांश्व विविधान् विनेदु: पुरुषर्षभा:,उन श्रेष्ठ पुरुषोंने सैकड़ों दुन्दुभियाँ और नगारे बजाये तथा अनेक प्रकारसे सिंह- गर्जनाएँ कीं
Sañjaya berkata: Lalu para lelaki terunggul membunyikan ratusan gendang kettledrum dan gendang perang besar, serta melaungkan pelbagai raungan laksana singa—gemuruh yang membangkitkan semangat, menguatkan tekad, dan mengisytiharkan kesiapsiagaan untuk bertempur.
Verse 104
रथस्थान् पुरुषव्याप्रान् पाण्डवानू प्रेक्ष्य पार्थिवा: । धृष्टद्युम्नादय: सर्वे पुनर्जहषिरे तदा,पुरुषसिंह पाण्डवोंको पुनः रथपर बैठे देख धृष्टद्युम्मन आदि राजा बड़े प्रसन्न हुए
Sañjaya berkata: Melihat para Pāṇḍava—lelaki laksana singa—sekali lagi duduk di atas kereta perang, siap untuk bertindak, semua raja bermula dengan Dhṛṣṭadyumna bersukacita semula. Saat itu menandakan kebangkitan kembali keberanian dan keteguhan di pihak dharma, tatkala para pahlawan kembali kepada tugas yang telah ditetapkan dalam peperangan.
Verse 105
गौरवं पाण्डुपुत्राणां मान्यान् मानयतां च तान् | दृष्टवा महीक्षितस्तत्र पूजयाउ्चक्रिरे भूशम्,माननीय पुरुषोंका सम्मान करनेवाले पाण्डवोंके उस गौरवको देखकर सब भूपाल उनकी बड़ी प्रशंसा करने लगे
Sañjaya berkata: Melihat kewibawaan putera-putera Pāṇḍu—mereka yang memuliakan orang yang patut dimuliakan—raja-raja yang hadir di situ pun mula memuji mereka dengan besar-besaran dan memberikan penghormatan yang nyata.
Verse 106
सौद्दं च कृपां चैव प्राप्तकालं महात्मनाम् । दयां च ज्ञातिषु परां कथयाज्चक्रिरे नूपा:
Sañjaya berkata: Para raja mula memperkatakan keluhuran budi dan belas kasihan para jiwa agung itu—tentang kebijaksanaan mereka menimbang apa yang wajar dilakukan pada waktunya, serta kebaikan tertinggi mereka terhadap kaum kerabat sendiri.
Verse 107
साधु साध्विति सर्वत्र निश्चेरु: स्तुतिसंहिता: । वाच: पुण्या: कीर्तिमतां मनोहदयहर्षणा:
Sañjaya berkata: Di mana-mana meledaklah kata-kata pujian—“Bagus! Bagus!”—ucapan yang sarat sanjungan. Itulah tutur yang membawa berkat dan pahala, dilafazkan oleh mereka yang termasyhur, yang menggembirakan minda dan hati, memuliakan para Pāṇḍava yang gemilang.
Verse 108
म्लेच्छाश्चार्याश्व ये तत्र ददृशु: शुश्रुवुस्तथा । वृत्तं तत् पाण्डुपुत्राणां रुरुदुस्ते सगद्गदा:,वहाँ जिन-जिन म्लेच्छों और आर्योंने पाण्डवोंका वह बर्ताव देखा तथा सुना, वे सब गद्गदकण्ठ होकर रोने लगे
Sañjaya berkata: Mereka yang berada di situ—baik kaum mleccha mahupun ārya—yang menyaksikan dan juga mendengar tentang perilaku putera-putera Pāṇḍu itu, semuanya menangis teresak-esak, suara tersekat oleh emosi.
Verse 109
ततो जघ्नुर्महाभेरी: शतशश्न सहस्रश: | शड्खांश्व॒ गोक्षीरनिभान् दश्मुरईष्टा मनस्विन:
Sañjaya berkata: Sesudah itu, para lelaki bersemangat tinggi, dipenuhi kegirangan, memalu gendang perang besar beratus-ratus dan beribu-ribu, serta meniup sangkakala putih laksana susu lembu, hingga bergema riuh rendah.
The implicit dilemma is leadership under contested legitimacy: Duryodhana must project certainty and unity while acknowledging risk, using rhetoric and role assignments to stabilize morale—illustrating how duty-bound action can proceed amid strategic and ethical ambiguity.
The chapter instructs that large-scale action requires disciplined coordination: clear command communication, defined protective roles (front, wings, rear), and shared signaling protocols that convert individual prowess into organized collective capacity.
No explicit phalaśruti appears here; the chapter functions as archival narrative and strategic description, contributing to the epic’s broader didactic frame by modeling how authority, morale, and coordination operate within kṣatriya institutions.
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