Bala KandaPrakarana 375 Verses

Prakarana 37

सोपान-प्रवेश: ‘भक्ति का जन्म’ और ‘मंगल के संस्कार’ का द्वार। बालकाण्ड में रामकथा केवल कथानक नहीं, साधक के चित्त में ‘श्रद्धा–प्रेम–मंगल’ की प्रथम स्थापना है। यहाँ विवाह-उत्सव जैसे सामाजिक संस्कार भी ‘ईश्वर-सान्निध्य’ में रूपान्तरित होकर साधना बनते हैं—सुनना/गाना/स्मरण करना ही सीढ़ी का पहला पायदान है।

या खंड-खंडिकेत रस-प्रधानता ‘मंगल’ व ‘उत्साह’ (आनंद-रस) यांची आहे; आणि त्यात करुण-कोमल विनय (दास्य-भाव) याची धारा वाहते. दृश्य-स्तरावर राजा दशरथांचा अनुराग, परिवारासह चरणांवर पडणे, आणि विश्वामित्रांचे प्रसन्न होणे—हे सर्व ‘राजधर्म’ व ‘भक्ती-धर्म’ यांचा संगम घडवतात. तुलसीचे काव्य-शिल्प येथे कथेपेक्षा अधिक ‘अनुभव-प्रमाण’ बनते: “निज गिरा पावनि करन कारन” असे म्हणत ते वाणीला तीर्थ करतात. विवाह-उत्सवाचा नाद ते साधकासाठी साधना-नियमात रूपांतरित करतात—जो सादर गातो/ऐकतो, त्याला ‘सदा सुख’चे आश्वासन. म्हणून बालकाण्डाचा हा अंश सोपान-यात्रेत ‘श्रवण-कीर्तन’ला मूल साधन घोषित करतो आणि राम-सीय-यशाला ‘मंगलायतन’ (कल्याण-आश्रय) म्हणून प्रतिष्ठित करतो.

Verses

Verse 756 (चौपाई)

सुदिन सोधि कल कंकन छौरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे।। नित नव सुखु सुर देखि सिहाहीं। अवध जन्म जाचहिं बिधि पाहीं।। बिस्वामित्रु चलन नित चहहीं। राम सप्रेम बिनय बस रहहीं।। दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ। देखि सराह महामुनिराऊ।। मागत बिदा राउ अनुरागे। सुतन्ह समेत ठाढ़ भे आगे।। नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवकु समेत सुत नारी।। करब सदा लरिकनः पर छोहू। दरसन देत रहब मुनि मोहू।। अस कहि राउ सहित सुत रानी। परेउ चरन मुख आव न बानी।। दीन्ह असीस बिप्र बहु भाँती। चले न प्रीति रीति कहि जाती।। रामु सप्रेम संग सब भाई। आयसु पाइ फिरे पहुँचाई।।

Verse 757 (दोहा/सोरठा)

राम रूपु भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु। जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु।।360।।

Verse 758 (चौपाई)

बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी।। सुनि मुनि सुजसु मनहिं मन राऊ। बरनत आपन पुन्य प्रभाऊ।। बहुरे लोग रजायसु भयऊ। सुतन्ह समेत नृपति गृहँ गयऊ।। जहँ तहँ राम ब्याहु सबु गावा। सुजसु पुनीत लोक तिहुँ छावा।। आए ब्याहि रामु घर जब तें। बसइ अनंद अवध सब तब तें।। प्रभु बिबाहँ जस भयउ उछाहू। सकहिं न बरनि गिरा अहिनाहू।। कबिकुल जीवनु पावन जानी।।राम सीय जसु मंगल खानी।। तेहि ते मैं कछु कहा बखानी। करन पुनीत हेतु निज बानी।।

[मूळ पाठ उपलब्ध नाही — “Content Filtered”. कृपया संबंधित चौपाई पाठवा.]

Verse 759 (छंद)

निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसी कह्यो। रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौनें लह्यो।। उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं। बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्बदा सुखु पावहीं।।

[मूळ पाठ उपलब्ध नाही — “Content Filtered”. कृपया छंदाचा मूळ मजकूर द्या, म्हणजे छंदोबद्ध/काव्यात्म लय जपत मराठी अनुवाद करता येईल.]

Verse 760 (दोहा/सोरठा)

सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं। तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु।।361।।

[मूळ पाठ उपलब्ध नाही — “Content Filtered”. कृपया संबंधित दोहा/सोरठा पाठवा.]

Inside Prakarana 37

Bhakti highlights

मुख्य भक्ति-शिक्षा: (1) श्रवण-कीर्तन को साधना का ‘पहला पायदान’—उत्सव की ध्वनि/गीत साधक के लिए नियम बनते हैं; जो सादर गाते-सुनते हैं, उन्हें ‘सदा सुख’ का आश्वासन। (2) राजधर्म का भक्ति-धर्म से संगम—दशरथ का अनुराग और चरणों में गिरना बताता है कि सत्ता/गौरव का शोधन विनय से होता है। (3) गुरु-प्रसाद की केंद्रीयता—विश्वामित्र की प्रसन्नता अनुग्रह का संकेत, जिससे मंगल संस्कार सिद्ध होता है। (4) ‘नित नव सुख’—नाम/लीला का रस नित्य नवीन है; भक्ति में पुनरावृत्ति जड़ता नहीं, नवता है। (5) वाणी-तीर्थ—कथा-वाचन/काव्य को ‘पावनि’ मानकर तुलसी श्रवण को ही शुद्धि-मार्ग बनाते हैं; सामाजिक संस्कार ईश्वर-सान्निध्य में साधना बनकर चित्त में श्रद्धा–प्रेम–मंगल की स्थापना करता है।

Compositional abstract

इस खंड-खंडिका में रस-प्रधानता ‘मंगल’ और ‘उत्साह’ (आनन्द-रस) की है, जिसके भीतर करुण-कोमल विनय (दास्य-भाव) की धारा बहती है। दृश्य-स्तर पर राजा दशरथ का अनुराग, परिवार सहित चरणों में गिरना, और विश्वामित्र का प्रसन्न होना—ये सब ‘राजधर्म’ और ‘भक्ति-धर्म’ का संगम रचते हैं। तुलसी का काव्य-शिल्प यहाँ कथा से अधिक ‘अनुभव-प्रमाण’ बन जाता है: “निज गिरा पावनि करन कारन” कहकर वे वाणी को तीर्थ बनाते हैं। विवाह-उत्सव की ध्वनि को वे साधक के लिए साधना-नियम में बदलते हैं—जो सादर गाते/सुनते हैं, उन्हें ‘सदा सुख’ का आश्वासन। इस प्रकार बालकाण्ड का यह अंश सोपान-यात्रा में ‘श्रवण-कीर्तन’ को मूल साधन घोषित करता है और राम-सीय-यश को ‘मंगलायतन’ (कल्याण-आश्रय) के रूप में प्रतिष्ठित करता है।

The emotional arc

आरम्भ ‘मंगल’ की उद्घोषणा से होता है—सुदिन-शोधन, कंकण-छोरने और गृह-आँगन में उत्सव-ध्वनि से आनन्द-रस जागता है। इसके बाद रस ‘उत्साह’ में गाढ़ा होता है: नित्य-नव सुख की तरंग, देवताओं तक का विस्मय/हर्ष (सुर देखि सिहाह) और समूचे नगर-परिवार का सामूहिक उल्लास। मध्य में एक कोमल ‘विनय’/दास्य-भाव की धारा बहती है—राजा दशरथ का अनुराग, परिवार सहित चरणों में गिरना, और गुरु/ऋषि के प्रति नम्र समर्पण; यहाँ आनन्द के भीतर शील-गौरव नहीं, भक्त-भाव का झुकाव है। अंततः भाव ‘प्रसाद’ में स्थिर होता है: विश्वामित्र का प्रसन्न होना, मंगल का संस्कार बन जाना, और श्रवण-कीर्तन को साधक के लिए ‘सदा-सुख’ का आश्वासन—उत्सव से साधना तक का रूपान्तरण।

The dialogue

  • तुलसीदास (कवि-वाचक; ‘निज गिरा पावनि’ के रूप में आत्म-प्रस्ताव)सज्जन श्रोता/सत्संगी (आंतरिक ‘मन’ सहित) · नैमिक-घाट (कवि-उपदेश/फलश्रुति-ध्वनि): यहाँ कथा-प्रवाह में कवि का प्रत्यक्ष ‘फलश्रुति’ और ‘श्रवण-कीर्तन’ का महात्म्य उभरता है, जो मानस-झील के ‘सत्संग-तट’ का संकेत है।

Frequently Asked Questions

छंद/दोहा 361 की वाणी के अनुसार जो लोग विवाह-उत्सव का मंगल ‘सादर’ सुनते-गाते हैं, वे ‘बैदेहि-राम प्रसाद’ से ‘सर्बदा सुखु’ पाते हैं—अर्थात् चित्त में स्थायी उत्साह, मंगल-बुद्धि, और भक्ति-वृद्धि।

परम्परा में विवाह-प्रसंग/मंगल-गान के साथ ‘सीता-राम’ नाम-स्मरण का सम्पुट प्रचलित है—उदा. ‘सियावर रामचंद्र की जय’ या ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ को कीर्तन-आवृत्ति के रूप में जोड़ा जाता है (स्थानीय संप्रदायानुसार भेद संभव)।

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