Adhyaya 31
Bhishma ParvaAdhyaya 3131 Versesरण आरंभ के क्षणों में संवाद-स्थगन; युद्ध-गति कथानक में विराम लेकर आध्यात्मिक निर्णयन पर केंद्रित।

Adhyaya 31

Rāja-Vidyā Rāja-Guhya Yoga (राजविद्या राजगुह्य योग) — The Yoga of Royal Knowledge and Royal Secret

Upa-parva: Bhagavad Gītā Parva (Gītā-upākhyāna within Bhīṣma Parva)

This chapter presents Kṛṣṇa’s exposition of a “royal knowledge” (rāja-vidyā) characterized as purifying, directly verifiable in practice, consonant with dharma, and imperishable. It advances a doctrine of divine immanence and transcendence: all beings are sustained within the divine field, yet the divine is not contained by them. Cosmological governance is described through prakṛti operating under divine supervision, with periodic dissolution and re-emergence of beings. The chapter contrasts misrecognition (those who dismiss the divine when appearing in human form) with the orientation of mahātmans who worship with single-minded devotion. It systematizes devotional pathways—praise, steadfast practice, reverence, and knowledge-offerings—while asserting the divine as the ground of sacrifice, ritual elements, lineage, and cosmic functions. Practical bhakti is made accessible through simple offerings and through dedicating all actions to the divine. Ethical universality is emphasized: impartiality toward all beings, assurance of protection for devotees, and the claim that even those socially marginalized can attain the highest goal through refuge and devotion. The closing instruction condenses the discipline: fix the mind on the divine, become devoted, worship, and bow—thereby attaining union and the final destination.

Chapter Arc: कुरुक्षेत्र के रण-प्रांगण में, जहाँ शंखनाद के पीछे मृत्यु की छाया है, श्रीकृष्ण अर्जुन को एक ऐसा ज्ञान देने का वचन देते हैं जिसे जान लेने पर फिर कुछ शेष न रहे—‘ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानम्…’। → कृष्ण बताते हैं कि मनुष्य-जीवन में असंख्य भोग—स्त्री, पुत्र, धन, मान, स्वर्ग-सुख—सब ‘कर्मफल’ के भीतर समेटे जा सकते हैं, पर उनसे परे तत्त्व को जानना दुर्लभ है; हजारों में कोई सिद्धि के लिए यत्न करता है और सिद्धों में भी कोई विरला ही तत्त्वतः जान पाता है। → कृष्ण का निर्णायक उद्घोष: समस्त भूत दो प्रकृतियों से उत्पन्न हैं और वही जगत के प्रभव तथा प्रलय हैं—अर्थात् वे ही सर्वस्व, सर्वव्यापक कारण; इसी बोध में ‘वासुदेवः सर्वम्’ की पराकाष्ठा झलकती है। → कृष्ण ज्ञान के फल को स्पष्ट करते हैं—बहुत जन्मों के अंत में ज्ञानवान् शरणागति करता है; जिनका पाप क्षीण हो चुका है वे द्वंद्व-मोह से मुक्त होकर दृढ़-व्रत भक्ति करते हैं; और जो जरा-मरण से मुक्ति हेतु शरण लेते हैं वे ब्रह्म, अध्यात्म और अखिल कर्म का तत्त्व समझते हैं। → अध्याय का संकेत अगले गूढ़ प्रश्न की ओर जाता है—‘साधिभूताधिदैवं… साधियज्ञं… प्रयाणकाले’—अर्थात् अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ और मृत्यु-क्षण में स्मरण का रहस्य आगे खुलने को है।

Shlokas

Verse 1

#सस्न्म+ () असजमसस- 3. स्त्री, पुत्र, धन, मान और बड़ाई आदि इस लोकके और स्वर्गसुखादि परलोकके जितने भी भोग हैं, उन सभीका समावेश “कर्मफल' में कर लेना चाहिये। साधारण मनुष्य जो कुछ भी कर्म करता है, किसी- न-किसी फलका आश्रय लेकर ही करता है। इसलिये उसके कर्म उसे बार-बार जन्म-मरणके चक्‍्करमें गिरानेवाले होते हैं। अतएव इस लोक और परलोकके सम्पूर्ण भोगोंको अनित्य, क्षणभंगुर और दु:खोंमें हेतु समझकर समस्त कर्मोमें ममता, आसक्ति और फलेच्छाका सर्वथा त्याग कर देना ही कर्मफलके आश्रयका त्याग करना है। २. अपने-अपने वर्णाश्रमके अनुसार जितने भी शास्त्रविहित नित्य-नैमित्तिक यज्ञ, दान, तप, शरीरनिर्वाह-सम्बन्धी तथा लोकसेवा आदिके लिये किये जानेवाले शुभ कर्म हैं, वे सभी करनेयोग्य कर्म हैं। उन सबको यथाविधि तथा यथायोग्य आलस्यरहित होकर अपनी शक्तिके अनुसार कर्व॑व्यबुद्धिसे उत्साहपूर्वक सदा करते रहना ही उनका करना है। 3. ऐसा कर्मयोगी पुरुष समस्त संकल्पोंका त्यागी होता है और उस यथार्थ ज्ञानको प्राप्त हो जाता है जो सांख्ययोग और कर्मयोग दोनों ही निष्ठाओंका चरम फल है, इसलिये वह “संन्यासित्व” और “योगित्व/ दोनों ही गुणोंसे युक्त माना जाता है। ४. जिसने अग्निको त्यागकर संन्यास-आश्रमका तो ग्रहण कर लिया है; परंतु जो ज्ञानयोग (सांख्ययोग)-के लक्षणोंसे युक्त नहीं है, वह वस्तुतः संन्यासी नहीं है, क्योंकि उसने केवल अग्निका ही त्याग किया है, समस्त क्रियाओंमें कर्तापनके अभिमानका त्याग तथा ममता, आसक्ति और देहाभिमानका त्याग नहीं किया। ५. जो सब क्रियाओंका त्याग करके ध्यान लगाकर तो बैठ गया है, परंतु जिसके अन्त:ःकरणमें अहंता, ममता, राग, द्वेष, कामना आदि दोष वर्तमान हैं, वह भी वास्तवमें योगी नहीं है; क्योंकि उसने भी केवल बाहरी क्रियाओंका ही त्याग किया है, ममता, अभिमान, आसक्ति, कामना और क्रोध आदिका त्याग नहीं किया। $. यहाँ संन्यास शब्दका अर्थ है--शरीर, इन्द्रिय और मनद्वारा होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाओंमें कर्तापनका भाव मिटाकर केवल परमात्मामें ही अभिन्नभावसे स्थित हो जाना। यह सांख्ययोगकी पराकाष्ठा है तथा 'योग' शब्दका अर्थ है--ममता, आसक्ति और कामनाके त्यागद्वारा होनेवाली “कर्मयोग” की पराकाष्ठारूप नैष्कर्म्य-सिद्धि। दोनोंमें ही संकल्पोंका सर्वयधा अभाव हो जाता है और सांख्ययोगी जिस परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होता है, कर्मयोगी भी उसीको प्राप्त होता है। इस प्रकार दोनोंमें ही समस्त संकल्पोंका त्याग है और दोनोंका एक ही फल है; इसलिये दोनोंकी एकता की गयी है। २. अपने वर्ण, आश्रम, अधिकार और स्थितिके अनुकूल जिस समय जो कर्तव्यकर्म हों, फल और आसक्तिका त्याग करके उनका आचरण करना योगारूढ-अवस्थाकी प्राप्तिमें हेतु है--इसीलिये गीताके तीसरे अध्यायके चौथे श्लोकमें भी कहा है कि कर्मोंका आरम्भ किये बिना मनुष्य नैष्कर्म्य अर्थात्‌ योगारूढ-अवस्थाको नहीं प्राप्त हो सकता। ३. मन वशमें होकर शान्त हो जानेपर ही संकल्पोंका सर्वथा अभाव होता है। इसके अतिरिक्त कर्मोंका स्वरूपत: सर्वथा त्याग हो भी नहीं सकता। अतएव यहाँ “शम:” का अर्थ सर्वसंकल्पोंका अभाव माना गया है। ४. यहाँ 'संकल्पोंके त्याग” का अर्थ स्फुरणामात्रका सर्वथा त्याग नहीं है, यदि ऐसा माना जाय तो योगारूढ-अवस्थाका वर्णन ही असम्भव हो जाय। इसके अतिरिक्त गीताके चौथे अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भगवानने स्पष्ट ही कहा है कि “जिस महापुरुषके समस्त कर्म कामना और संकल्पके बिना ही भलीभाँति होते हैं, उसे पण्डित कहते हैं।! और वहाँ जिस महापुरुषकी ऐसी प्रशंसा की गयी है, वह योगारूढ नहीं है--ऐसा नहीं कहा जा सकता। ऐसी अवस्थामें यह नहीं माना जा सकता कि संकल्परहित पुरुषके द्वारा कर्म नहीं होते। इससे यही सिद्ध होता है कि संकल्पोंके त्यागका अर्थ स्फुरणा या वृत्तिमात्रका त्याग नहीं है। ममता, आसक्ति और द्वेषपूर्वक जो सांसारिक विषयोंका चिन्तन किया जाता है, उसे 'संकल्प' कहते हैं। ऐसे संकल्पोंका पूर्णतया त्याग ही 'सर्वसंकल्पसंन्यास' है। ५. मानव-जीवनके दुर्लभ अवसरको व्यर्थ न खोकर कर्मयोग, सांख्ययोग तथा भक्तियोग आदि किसी भी साधनमें लगकर अपने जन्मको सफल बना लेना ही अपने द्वारा अपना उद्धार करना है। राग-द्वेष, काम-क्रोध और लोभ-मोह आदि दोषोंमें फैसकर भाँति- भाँतिके, दुष्कर्म करना और उनके फलस्वरूप मनुष्य-शरीरके परमफल भगवत्प्राप्तिसे वंचित रहकर पुन: शूकर-कूकरादि योनियोंमें जानेका कारण बनना अपनेको अधोगतिमें ले जाना है। मनुष्यको कभी भी यह नहीं समझना चाहिये कि प्रारब्ध बुरा है, इसलिये मेरी उन्नति होगी ही नहीं; उसका उत्थान-पतन प्रारब्धके अधीन नहीं है, उसीके हाथमें है। मनुष्य अपने स्वभाव और कर्मोंमें जितना ही अधिक सुधार कर लेता है, वह उतना ही उन्नत होता है। स्वभाव और कर्मोंका सुधार ही उन्नति या उत्थान है तथा इसके विपरीत स्वभाव और कर्मोमें दोषोंका बढ़ना ही अवनति या पतन है। ६. जो अपने उद्धारके लिये चेष्टा करता है, वह आप ही अपना मित्र है और जो इसके विपरीत करता है, वही अपना शत्रु है। इसलिये अपनेसे भिन्न दूसरा कोई भी अपना मित्र या शत्रु नहीं है। $. परमात्माकी प्राप्तिके लिये मनुष्य जिन साधनोंमें अपने शरीर, इन्द्रिय और मनको लगाना चाहे, उनमें जब वे अनायास ही लग जायेँ और उनके लक्ष्यसे विपरीत मार्गकी ओर ताकें ही नहीं, तब समझना चाहिये कि ये वशरमें हो चुके हैं। २. असंयमी मनुष्य स्वयं मन, इन्द्रिय आदिके वश होकर कुपथ्य करनेवाले रोगीकी भाँति अपने ही कल्याणसाधनके विपरीत आचरण करता है। वह अहंता, ममता, राग-द्वेष, काम-क्रोध-लोभ-मोह आदिके कारण प्रमाद, आलस्य और विषयभोगोंमें फँसकर पाप-कर्मोंके कठिन बन्धनमें पड़ जाता है एवं अपने- आपको बार-बार नरकादिमें डालकर और नाना प्रकारकी योनियोंमें भटकाकर अनन्तकालतक भीषण दुःख भोगनेके लिये बाध्य करता है। यही शत्रुकी भाँति शत्रुतका आचरण करना है। 3. जो पुरुष तरह-तरहके बड़े-से-बड़े दुःखोंके आ पड़नेपर भी अपनी स्थितिसे तनिक भी विचलित नहीं होता, जिसके अन्तःकरणमें जरा भी विकार उत्पन्न नहीं होता और जो सदा-सर्वदा अचलभावसे परमात्माके स्वरूपमें स्थित रहता है, उसे “कूटस्थ” कहते हैं। ४. सम्बन्ध और उपकार आदिकी अपेक्षा न करके बिना ही कारण स्वभावत: प्रेम और हित करनेवाले 'सुहृद” कहलाते हैं तथा परस्पर प्रेम और एक-दूसरेका हित करनेवाले “मित्र” कहलाते हैं। किसी निमित्तसे बुरा करनेकी इच्छा या चेष्टा करनेवाला “वैरी” है और स्वभावसे ही प्रतिकूल आचरण करनेके कारण जो द्वेषका पात्र हो, वह 'द्वेष्य" कहलाता है। परस्पर झगड़ा करनेवालोंमें मेल करानेकी चेष्टा करनेवालेको और पक्षपात छोड़कर उनके हितके लिये न्याय करनेवालेको “मध्यस्थ” कहते हैं तथा उनसे किसी प्रकारका भी सम्बन्ध न रखनेवालेको 'उदासीन” कहते हैं। ५. उपर्युक्त अत्यन्त विलक्षण स्वभाववाले मित्र, वैरी, साधु और पापी आदिके आचरण, स्वभाव और व्यवहारके भेदका जिसपर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता, जिसकी बुद्धिमें किसी समय, किसी भी परिस्थितिमें, किसी भी निमित्तसे राग-द्वेषपूर्वक भेदभाव नहीं आता, वही समबुद्धियुक्त पुरुष है। ६. भोग-सामग्रीके संग्रहका नाम परिग्रह है, जो उससे रहित हो उसे “अपरिग्रह” कहते हैं। वह यदि गृहस्थ हो तो किसी भी वस्तुका ममतापूर्वक संग्रह न रखे और यदि ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ या संन्‍्यासी हो तो स्वरूपसे भी किसी प्रकारका शास्त्रप्रतिकूल संग्रह न करे। ऐसे पुरुष किसी भी आश्रमवाले हों “अपरिग्रह' ही हैं। ३. ध्यानयोगका साधन करनेके लिये ऐसा स्थान होना चाहिये, जो स्वभावसे ही शुद्ध हो और झाड़- बुहारकर, लीप-पोतकर अथवा धो-पोंछकर स्वच्छ और निर्मल बना लिया गया हो। गंगा, यमुना या अन्य किसी पवित्र नदीका तीर, पर्वतकी गुफा, देवालय, तीर्थस्थान अथवा बगीचे आदि, पवित्र वायुमण्डलयुक्त स्थानोंमेंसे जो सुगमतासे प्राप्त हो सकता हो और स्वच्छ, पवित्र तथा एकान्त हो--ध्यानयोगके लिये साधकको ऐसा ही कोई एक स्थान चुन लेना चाहिये। २. यहाँ जंघासे ऊपर और गलेसे नीचेके स्थानका नाम “काया” है, गलेका नाम “ग्रीवा' है और उससे ऊपरके अंगका नाम “सिर” है। कमर या पेटको आगे-पीछे या दाहिने-बायें किसी ओर भी न झुकाना अर्थात्‌ रीढ़की हड्डीको सीधी रखना, गलेको भी किसी ओर न झुकाना और सिरको भी इधर-उधर न घुमाना--इस प्रकार तीनोंको एक सूतमें सीधा रखते हुए किसी भी अंगको जरा भी न हिलने-डुलने देना-- यही इन सबको 'सम” और “अचल” धारण करना है। ध्यानयोगके साधनमें निद्रा, आलस्य, विक्षेप एवं शीतोष्णादि द्वन्द्व विध्न माने गये हैं। इन दोषोंसे बचनेका यह बहुत ही अच्छा उपाय है। काया, सिर और गलेको सीधा तथा नेत्रोंको खुला रखनेसे आलस्य और निद्राका आक्रमण नहीं हो सकता। नाककी नोकपर दृष्टि लगाकर इधर-उधर अन्य वस्तुओंको न देखनेसे बाह्य विक्षेपोंकी सम्भावना नहीं रहती और आसनके दृढ़ हो जानेसे शीतोष्णादि द्वन्दोंसे भी बाधा होनेका भय नहीं रहता; इसलिये ध्यानयोगका साधन करते समय इस प्रकार आसन लगाकर बैठना बहुत ही उपयोगी है। 3. ब्रह्मचर्यका तात्त्विक अर्थ दूसरा होनेपर भी वीर्यधारण उसका एक प्रधान अर्थ है और यहाँ वीर्यधारण अर्थ ही प्रसंगानुकूल भी है। मनुष्यके शरीरमें वीर्य ही एक ऐसी अमूल्य वस्तु है, जिसका भलीभाँति संरक्षण किये बिना शारीरिक, मानसिक अथवा आध्यात्मिक--किसी प्रकारका भी बलन तो प्राप्त होता है और न उसका संचय ही होता है; इसीलिये ब्रह्मचारीके व्रतमें स्थित होनेके लिये कहा गया है। ४. ध्यान करते समय साधकको निर्भय रहना चाहिये। मनमें जरा भी भय रहेगा तो एकान्त और निर्जन स्थानमें स्वाभाविक ही चित्तमें विक्षेप हो जायगा। इसलिये साधकको उस समय मनमें यह दृढ़ सत्य धारणा कर लेनी चाहिये कि परमात्मा सर्वशक्तिमान्‌ हैं और सर्वव्यापी होनेके कारण यहाँ भी सदा हैं ही, उनके रहते किसी बातका भय नहीं है। यदि कदाचित प्रारब्धवश ध्यान करते-करते मृत्यु हो जाय तो उससे भी परिणाममें परम कल्याण ही होगा। ५. ध्यान करते समय मनसे राग-द्वेष, हर्ष-शोक और काम-क्रोध आदि दूषित वृत्तियोंको तथा सांसारिक संकल्प-विकल्पोंको सर्वथा दूर कर देना एवं वैराग्यके द्वारा मनको सर्वथा निर्मल और शान्त कर देना-- यही 'प्रशान्तात्मा' होना है। ६. ध्यान करते समय साधकको निद्रा, आलस्य और प्रमाद आदि विषघ्नोंसे बचनेके लिये खूब सावधान रहना चाहिये। ऐसा न करनेसे मन और इन्द्रियाँ उसे धोखा देकर ध्यानमें अनेक प्रकारके विघ्न उपस्थित कर सकती हैं। इसी बातको दिखलानेके लिये *युक्त* विशेषण दिया गया है। ७. एक जगह न रुकना और रोकते-रोकते भी बलात्‌ विषयोंमें चले जाना मनका स्वभाव है। इस मनको भलीभाँति रोके बिना ध्यानयोगका साधन नहीं बन सकता। इसलिये ध्यानयोगीको चाहिये कि वह ध्यान करते समय मनको बाह्य विषयोंसे भलीभाँति हटाकर परम हितैषी, परम सुहृद, परम प्रेमास्पद परमेश्वरके गुण, प्रभाव, तत््व और रहस्यको समझकर, सम्पूर्ण जगत्से प्रेम हटाकर, एकमात्र उन्हींको अपना ध्येय बनावे और अनन्यभावसे चित्तको उन्हींमें लगानेका अभ्यास करे। ३. इस कथनसे भगवानने यह भाव दिखलाया है कि मुझको ही परम गति, परमध्येय, परम आश्रय और परम महेश्वर तथा सबसे बढ़कर प्रेमास्पद मानकर निरन्तर मेरे ही आश्रित रहना और मुझीको अपना एकमात्र परम रक्षक, सहायक, स्वामी तथा जीवन, प्राण और सर्वस्व मानकर मेरे प्रत्येक विधानमें परम संतुष्ट रहना--यही मेरे (भगवानके) परायण होना है। २. उपर्युक्त प्रकारसे मन-बुद्धिके द्वारा निरन्तर तैलधाराकी भाँति अविच्छिन्नभावसे भगवानके स्वरूपका चिन्तन करना और उसमें अटलभावसे तन्मय हो जाना ही आत्माको परमेश्वरके स्वरूपमें लगाना है। ३. जिसे नैप्ठिकी शान्ति (गीता ५।१२), शाश्वती शान्ति (गीता ९।३१) और परा शान्ति (गीता १८।६२) कहते हैं और जिसका परमेश्वरकी प्राप्ति, परम दिव्य पुरुषकी प्राप्ति, परम गतिकी प्राप्ति आदि नामोंसे वर्णन किया जाता है, वह शान्ति अद्वितीय, अनन्त आनन्दकी अवधि है और परम दयालु, परम सुहृद्‌, आनन्दनिधि, आनन्दस्वरूप भगवानमें नित्य-निरन्तर अचल और अटलभावसे निवास करती है। ध्यानयोगका साधक उसी शान्तिको प्राप्त करता है। ४. “योग” शब्द उस “ध्यानयोग” का वाचक है, जो सम्पूर्ण दुःखोंका आत्यन्तिक नाश करके परमानन्द और परम शान्तिके समुद्र परमेश्वरकी प्राप्ति करा देनेवाला है। ५. उचित मात्रामें नींद ली जाय तो उससे थकावट दूर होकर शरीरमें ताजगी आती है; परंतु वही नींद यदि आवश्यकतासे अधिक ली जाय तो उससे तमोगुण बढ़ जाता है, जिससे अनवरत आलस्य घेरे रहता है और स्थिर होकर बैठनेमें कष्ट मालूम होता है। इसके अतिरिक्त अधिक सोनेमें मानवजीवनका अमूल्य समय भी नष्ट होता है। इसी प्रकार सदा जागते रहनेसे थकावट बनी रहती है। कभी ताजगी नहीं आती। शरीर, इन्द्रिय और प्राण शिथिल हो जाते हैं, शरीरमें कई प्रकारके रोग उत्पन्न हो जाते हैं। ६. खाने-पीनेकी वस्तुएँ ऐसी होनी चाहिये जो अपने वर्ण और आश्रमधर्मके अनुसार सत्य और न्यायके द्वारा प्राप्त हों, शास्त्रानुकूल, सात््विक हों (गीता १७।८), रजोगुण और तमोगुणको बढ़ानेवाली न हों, पवित्र हों, अपनी प्रकृति, स्थिति और रुचिके प्रतिकूल न हों तथा योगसाधनमें सहायता देनेवाली हों। उनका परिमाण भी उतना ही परिमित होना चाहिये, जितना अपनी शक्ति, स्वास्थ्य और साधनकी दृष्टिसे हितकर एवं आवश्यक हो। इसी प्रकार घूमना-फिरना भी उतना ही चाहिये, जितना अपने लिये आवश्यक और हितकर हो। ७. वर्ण, आश्रम, अवस्था, स्थिति और वातावरण आदिके अनुसार जिसके लिये शास्त्रमें जो कर्तव्यकर्म बतलाये गये हैं, उन्हींका नाम कर्म है। उन कर्मोंका उचित स्वरूपमें और उचित मात्रामें यथायोग्य सेवन करना ही कर्मोमें युक्त चेष्टा करना है। जैसे ईश्वर-भक्ति, देवपूजन, दीन-दुःखियोंकी सेवा, माता-पिता- आचार्य आदि गुरुजनोंका पूजन, यज्ञ, दान, तप तथा जीविकासम्बन्धी कर्म यानी शिक्षा, पठन-पाठन- व्यापार आदि कर्म और शौच-स्नानादि क्रियाएँ--ये सभी कर्म वे ही करने चाहिये, जो शास्त्रविहित हों, साधुसम्मत हों, किसीका अहित करनेवाले न हों, स्वावलम्बनमें सहायक हों, किसीको कष्ट पहुँचाने या किसीपर भार डालनेवाले न हों और ध्यानयोगमें सहायक हों तथा इन कर्मोका परिमाण भी उतना ही होना चाहिये, जितना जिसके लिये आवश्यक हो, जिससे न्यायपूर्वक शरीरनिर्वाह होता रहे और ध्यानयोगके लिये भी आवश्यकतानुसार पर्याप्त समय मिल जाय। ऐसा करनेसे शरीर, इन्द्रिय और मन स्वस्थ रहते हैं और ध्यानयोग सुगमतासे सिद्ध होता है। ८. दिनके समय जागते रहना, रातके समय पहले तथा पिछले पहरमें जागना और बीचके दो पहरोंमें सोना--साधारणतया इसीको उचित सोना-जागना माना जाता है। १. यहाँ “दीप” शब्द प्रकाशमान दीपशिखाका वाचक है। दीपशिखा चित्तकी भाँति प्रकाशभान और चंचल है, इसलिये उसीके साथ मनकी समानता है। जैसे वायु न लगनेसे दीपशिखा हिलती-डुलती नहीं, उसी प्रकार वशमें किया हुआ चित्त भी ध्यानकालमें सब प्रकारसे सुरक्षित होकर हिलता-डुलता नहीं, वह अविचल दीपशिखाकी भाँति समभावसे प्रकाशित रहता है। २. जिस समय योगीका चित्त परमात्माके स्वरूपमें सब प्रकारसे निरुद्ध हो जाता है, उसी समय उसका चित्त संसारसे सर्वथा उपरत हो जाता है; फिर उसके अन्त:करणमें संसारके लिये कोई स्थान ही नहीं रह जाता। 3. एक विज्ञान-आनन्दघन पूर्णब्रह्म परमात्मा ही है। उसके सिवा कोई वस्तु है ही नहीं, केवल एकमात्र वही परिपूर्ण है। उसका यह ज्ञान भी उसीको है; क्योंकि वही ज्ञानस्वरूप है। वह सनातन, निर्विकार, असीम, अपार, अनन्त, अकल और अनवचद्य है। मन, बुद्धि, अहंकार, द्रष्टा, दर्शन, दृश्य आदि जो कुछ भी हैं, सब उस ब्रह्ममें ही आरोपित हैं और वस्तुत: ब्रह्मस्वरूप ही हैं। वह आनन्दमय है और अवर्णनीय है। उसका वह आनन्दमय स्वरूप भी आनन्दमय है। वह आनन्दस्वरूप पूर्ण है, नित्य है, सनातन है, अज है, अविनाशी है, परम है, चरम है, सत्‌ है, चेतन है, विज्ञानमय है, कूटस्थ है, अचल है, ध्रुव है, अनामय है, बोधमय है, अनन्त है और शान्त है। इस प्रकार उसके आनन्दस्वरूपका चिन्तन करते हुए बार-बार ऐसी दृढ़ धारणा करते रहना चाहिये कि उस आनन्दस्वरूपके अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। यदि कोई संकल्प उठे तो उसे भी आनन्दमयसे ही निकला हुआ, आनन्दमय ही समझकर आनन्दमयमें ही विलीन कर दे। इस प्रकार धारणा करते-करते जब समस्त संकल्प आनन्दमय बोधस्वरूप परमात्मामें विलीन हो जाते हैं और एक आनन्दघन परमात्माके अतिरिक्त किसी भी संकल्पका अस्तित्व नहीं रह जाता, तब साधककी आनन्दमय परमात्मामें अचल स्थिति हो जाती है। इस प्रकार नित्य-नियमित ध्यान करते-करते अपनी और संसारकी समस्त सता जब ब्रह्मसे अभिन्न हो जाती है, जब सभी कुछ परमानन्द और परम-शान्तिस्वरूप ब्रह्म बन जाता है, तब साधकको परमात्माका वास्तविक साक्षात्कार सहज ही हो जाता है। ४. परमात्माके ध्यानसे होनेवाला सात्त्विक सुख भी इन्द्रियोंसे अतीत, बुद्धिग्राह्म और अक्षय सुखमें हेतु होनेसे अन्य सांसारिक सुखोंकी अपेक्षा अत्यन्त विलक्षण है, किंतु वह केवल ध्यानकालमें ही रहता है, सदा एकरस नहीं रहता और वह चित्तकी ही एक अवस्थाविशेष होती है, इसलिये उसे '“आत्यन्तिक' या “अक्षय सुख' नहीं कहा जा सकता। परमात्माका स्वरूपभूत यह सुख तो उस ध्यानजनित सुखका फल है। अतएव यह उससे अत्यन्त विलक्षण है। १. इस स्थितिमें योगीको परमानन्द और परमशान्तिके निधान परमात्माकी प्राप्ति हो जानेसे वह पूर्णकाम हो जाता है। उसकी दृष्टिमें इस लोक और परलोकके सम्पूर्ण भोग, त्रिलोकीका राज्य और ऐश्वर्य, विश्वव्यापी मान और बड़ाई आदि जितने भी सांसारिक सुखके साधन हैं, सभी क्षणभंगुर, अनित्य, रसहीन, हेय, तुच्छ और नगण्य हो जाते हैं। अत: वह संसारकी किसी भी वस्तुको प्राप्त करनेयोग्य ही नहीं मानता, फिर अधिक माननेकी तो गुंजाइश ही कहाँ है। २. शस्त्रोंद्वारा शरीरका काटा जाना, अत्यन्त दुः:सह सरदी-गरमी, वर्षा और बिजली आदिसे होनेवाली शारीरिक पीड़ा, अति उत्कट रोगजनित व्यथा, प्रियसे भी प्रिय वस्तुका अचानक वियोग और संसारमें अकारण ही महान्‌ अपमान, तिरस्कार और निन्दा आदि जितने भी महान्‌ दुःखोंके कारण हैं, सब एक साथ उपस्थित होकर भी उसको अपनी स्थितिसे जरा भी नहीं डिगा सकते। 3. द्रष्टा और दृश्यका संयोग अर्थात्‌ दृश्यप्रपंचसे आत्माका जो अज्ञानजनित अनादि सम्बन्ध है, वही बार-बार जन्म-मरणरूप दु:खकी प्राप्तिमें मूल कारण है। इस योगके द्वारा उसका अभाव हो जानेपर ही दुःखोंका भी सदाके लिये अभाव हो जाता है, अतः “यत्रोपरमते चित्तम” (गीता ६२०) से लेकर यहाँतक जिस स्थितिका वर्णन किया गया है, उसे प्राप्त करनेके लिये सिद्ध महात्मा पुरुषोंक पास जाकर एवं शास्त्रका अभ्यास करके उसके स्वरूप, महत्त्व और साधनकी विधिको भलीभाँति जानना चाहिये। ४. साधनका फल प्रत्यक्ष न होनेके कारण थोड़ा-सा साधन करनेके बाद मनमें जो ऐसा भाव आया करता है कि “न जाने यह काम कबतक पूरा होगा, मुझसे हो सकेगा या नहीं'--उसीका नाम “निर्विण्णता' अर्थात्‌ साधनसे ऊब जाना है। ऐसे भावसे रहित जो धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त है, उसे “अनिर्विण्णचित्त' कहते हैं, अतः साधकको अपने चित्तसे निर्विण्णताका दोष सर्वथा दूर कर देना चाहिये। ५. निश्चय” यहाँ विश्वास और श्रद्धाका वाचक है। योगीको योगसाधनमें, उसका विधान करनेवाले शास्त्रोंमें, आचार्योमें और योगसाधनके फलनें पूर्णरूपसे श्रद्धा और विश्वास रखना चाहिये। ६. सम्पूर्ण कामनाओंके नि:शेषरूपसे त्यागका अर्थ है--किसी भी भोगमें किसी प्रकारसे भी जरा भी वासना, आसक्ति, स्पृहा, इच्छा, लालसा, आशा या तृष्णा न रहने देना। बरतनमेंसे घी निकाल लेनेपर भी जैसे उसमें घीकी चिकनाहट शेष रह जाती है, अथवा डिबियामेंसे कपूर, केसर या कस्तूरी निकाल लेनेपर भी जैसे उसमें उसकी गनन्‍्ध रह जाती है, वैसे ही कामनाओंका त्याग कर देनेपर भी उसका सूक्ष्म अंश शेष रह जाता है। उस शेष बचे हुए सूक्ष्म अंशका भी त्याग कर देना “कामनाका निःशेषत:ः त्याग” है। ७. ग्यारहवेंसे लेकर तेरहवें श्लोकके वर्णनके अनुसार ध्यानयोगके साधनके लिये आसनपर बैठकर योगीको यह चाहिये कि वह विवेक और वैराग्यकी सहायतासे मनके द्वारा समस्त इन्द्रियोंको सम्पूर्ण बाह्य विषयोंसे सब प्रकारसे सर्वथा हटा ले, किसी भी इन्द्रियको किसी भी विषयमें जरा भी न जाने देकर उन्हें सर्वथा अन्तर्मुखी बना दे। यही मनके द्वारा इन्द्रियसमुदायका भलीभाँति रोकना है। ८. जैसे छोटा बच्चा हाथमें कैंची या चाकू पकड़ लेता है तब माता समझा-बुझाकर और आवश्यक होनेपर डाँट-डपटकर भी धीरे-धीरे उसके हाथसे चाकू या कैंची छीन लेती है, वैसे ही विवेक और वैराग्यसे युक्त बुद्धिके द्वारा मनको सांसारिक भोगोंकी अनित्यता और क्षणभंगुरता समझाकर और भोगोंमें फँस जानेसे प्राप्त होनेवाले बन्धन और नरकादि यातनाओंका भय दिखलाकर उसे विषय-चिन्तनसे सर्वथा रहित कर देना चाहिये। यही शनै:-शनै: उपरतिको प्राप्त होना है। १. साधक जब ध्यान करने बैठे और अभ्यासके द्वारा जब उसका मन परमात्मामें स्थिर हो जाय, तब फिर ऐसा सावधान रहे कि जिसमें मन एक क्षणके लिये भी परमात्मासे हटकर दूसरे विषयमें न जा सके। साधककी यह सजगता अभ्यासकी दृढ़तामें बड़ी सहायक होती है। प्रतिदिन ध्यान करते-करते ज्यों-ज्यों अभ्यास बढ़े, त्यों-ही-त्यों ममको और भी सावधानीके साथ कहीं न जाने देकर विशेषरूपसे विशेष कालतक परमात्मामें स्थिर रखे। फिर मनमें जिस किसी वस्तुकी प्रतीति हो, उसको कल्पनामात्र जानकर तुरंत ही त्याग दे। इस प्रकार चित्तमें स्फुरित वस्तुमात्रका त्याग करके क्रमश: शरीर, इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी सत्ताका भी त्याग कर दे। सबका अभाव करते-करते जब समस्त दृश्य पदार्थ चित्तसे निकल जायूँगे, तब सबके अभावका निश्चय करनेवाली एकमात्र वृत्ति रह जायगी। यह वृत्ति शुभ और शुद्ध है, परंतु दृढ़ धारणाके द्वारा इसका भी बाध करना चाहिये या समस्त दृश्य-प्रपंचका अभाव हो जानेके बाद यह अपने-आप ही शान्त हो जायगी; इसके बाद जो कुछ बच रहता है, वही अचिन्त्य तत्त्व है। वह केवल है और समस्त उपाधियोंसे रहित अकेला ही परिपूर्ण है। उसका न कोई वर्णन कर सकता है, न चिन्तन। अतएव इस प्रकार दृश्य-प्रपंच और शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और अहंकारका अभाव करके तथा अभाव करनेवाली वृत्तिका भी अभाव करके अचिन्त्य-तत्त्वमें स्थित हो जाना ही परमात्मामें मनको स्थितकर अचिन्त्य होना है। २. ध्यानके समय साधकको ज्यों ही पता चले कि मन अन्यत्र विषयोंमें गया, त्यों ही बड़ी सावधानी और दृढ़ताके साथ उसे रोककर तुरंत परमात्मामें लगावे। यों बार-बार विषयोंसे हटा-हटाकर उसे परमात्मामें लगानेका अभ्यास करे। 3. विवेक और वैराग्यके प्रभावसे विषय-चिन्तन छोड़कर और चंचलता तथा विक्षेपसे रहित होकर जिसका चित्त सर्वथा स्थिर और सुप्रसन्न हो गया है, ऐसे योगीको “प्रशान्तमना:” कहते हैं। ४. आसक्ति, स्पृहा, कामना, लोभ, तृष्णा और सकामकर्म--इन सबकी रजोगुणसे ही उत्पत्ति होती है (गीता १४।७, १२) और यही रजोगुणको बढ़ाते भी हैं। अतएव जो पुरुष इन सबसे रहित है, उसीका वाचक 'शान्तरजसम' पद है। ५. मैं देह नहीं, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म हँ--इस प्रकारका अभ्यास करते-करते साधककी सच्चिदानन्दघन परमात्मामें दृढ़ स्थिति हो जाती है। इस प्रकार अभिन्नभावसे ब्रह्ममें स्थित पुरुषको “ब्रह्मभूत” कहते हैं। ६. जब साधकमें देहाभिमान नहीं रहता, उसकी ब्रह्मके स्वरूपमें अभेदरूपसे स्थिति हो जाती है, तब उसको ब्रह्मकी प्राप्ति सुखपूर्वक होती ही है। ७. इसी अनन्त आनन्दको इस अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें “आत्यन्तिक सुख” और गीताके पाँचवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें "अक्षय सुख” बतलाया गया है। $. सच्चिदानन्द, निर्मुण-निराकार ब्रह्ममें जिसकी अभिन्नभावसे स्थिति हो गयी है, ऐसे ही ब्रह्मभूत योगीका वाचक यहाँ “योगयुक्तात्मा” पद है। इसीका वर्णन गीताके पाँचवें अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें “ब्रह्मयोगयुक्तात्मा” के नामसे तथा पाँचवेंके चौबीसवें, छठेके सत्ताईसवें और अठारहवेंके चौवनवें श्लोकमें “ब्रह्म भूत” के नामसे हुआ है। २. गीताके पाँचवें अध्यायके अठारहवें और इसी अध्यायके बत्तीसवें श्लोकोंमें ज्ञानी महात्माके समदर्शनका वर्णन आया है, उसी प्रकारसे यह योगी सबके साथ शास्त्रानुकूल यथायोग्य सद॒व्यवहार करता हुआ नित्य-निरन्तर सभीमें अपने स्वरूपभूत एक ही अखण्ड चेतन आत्माको देखता है। यही उसका सबमें समभावसे देखना है। 3. एक अद्वितीय सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा ही सत्य तत्त्व हैं, उनसे भिन्न यह सम्पूर्ण जगत्‌ कुछ भी नहीं है। इस रहस्यको भलीभाँति समझकर उनमें अभिन्नभावसे स्थित होकर जो स्वप्नके दृश्यवर्गमें स्वप्नद्रष्टा पुरुषकी भाँति चराचर सम्पूर्ण प्राणियोंमें एक अद्वितीय आत्माको ही अधिष्ठानरूपमें परिपूर्ण देखना है अर्थात्‌ 'एक अद्वितीय आत्मा ही इन सबके रूपमें दीख रहा है, वास्तवमें उनके सिवा अन्य कुछ है ही नहीं।” इस बातको जो भलीभाँति अनुभव करना है, यही सम्पूर्ण भूतोंमें आत्माको देखना है। इसी तरह जो समस्त चराचर प्राणियोंको आत्मामें कल्पित देखना है, यानी जैसे स्वप्नसे जगा हुआ मनुष्य स्वप्रके जगत्‌को या नाना प्रकारकी कल्पना करनेवाला मनुष्य कल्पित दृश्योंको अपने ही संकल्पके आधारपर अपनेमें देखता है वैसे ही देखना, सम्पूर्ण भूतोंको आत्मामें कल्पित देखना है। इसी भावको स्पष्ट करनेके लिये भगवानने आत्माके साथ 'सर्वभूतस्थम” विशेषण देकर आत्माको भूतोंमें स्थित देखनेकी बात कही, किंतु भूतोंको आत्मामें स्थित देखनेकी बात न कहकर केवल देखनेके लिये ही कहा। ४. जैसे बादलमें आकाश और आकाशमें बादल है, वैसे ही सम्पूर्ण भूतोंमें भगवान्‌ वासुदेव हैं और वासुदेवमें सम्पूर्ण भूत हैं--इस प्रकार अनुभव करना सम्पूर्ण भूतोंमें वासुदेवको और वासुदेवमें सम्पूर्ण भूतोंको देखना है; क्योंकि सम्पूर्ण चराचर जगत उन्हींसे उत्पन्न होता है, अतएव वे ही इसके महाकारण हैं तथा जैसे बादलोंका आधार आकाश है, आकाशके बिना बादल रहें ही कहाँ? एक बादल ही क्यों--वायु, तेज, जल आदि कोई भी भूत आकाशके आश्रय बिना नहीं ठहर सकता, वैसे ही इस सम्पूर्ण चराचर विश्वके एकमात्र परमाधार परमेश्वर ही हैं (गीता १०।४२)। अतएव जिस प्रकार एक ही चतुर बहुरूपिया नाना प्रकारके वेष धारण करके आता है और जो उस बहुरूपियेसे और उसकी बोलचाल आदिसे परिचित है, वह सभी रूपोंमें उसे पहचान लेता है, वैसे ही समस्त जगत्‌में जितने भी रूप हैं, सब श्रीभगवानके ही वेष हैं। इस प्रकार जो समस्त जगत्‌के सब प्राणियोंमें उनको पहचान लेते हैं, वे चाहे वेष-भेदके कारण बाहरसे व्यवहारमें भेद रखें, परंतु हृदयसे तो उनकी पूजा ही करते हैं। ५. अभिप्राय यह है कि सौन्दर्य, माधुर्य, ऐश्वर्य, औदार्य आदिके अनन्त समुद्र, रसमय और आनन्दमय भगवानके देवदुर्लभ सच्चिदानन्दस्वरूपके साक्षात्‌ दर्शन हो जानेके बाद भक्त और भगवान्‌का संयोग सदाके लिये अविच्छिन्न हो जाता है। ६. सर्वदा और सर्वत्र अपने एकमात्र इष्टदेव भगवानका ध्यान करते-करते साधक अपनी भिन्न स्थितिको सर्वथा भूलकर इतना तन्मय हो जाता है कि फिर उसके ज्ञानमें एक भगवान्‌के सिवा और कुछ रह ही नहीं जाता। भगवत्प्राप्ति रूप ऐसी स्थितिको भगवान्‌में एकीभावसे स्थित होना कहते हैं। ३. जैसे भाप, बादल, कुहरा, बूँद और बर्फ आदिदमें सर्वत्र जल भरा है, वैसे ही सम्पूर्ण चराचर विश्वमें एक भगवान्‌ ही परिपूर्ण हैं--इस प्रकार जानना और प्रत्यक्ष देखना ही सब भूतोंमें स्थित भगवान्‌को भजना है। २. जिस पुरुषको भगवान्‌ श्रीवासुदेवकी प्राप्ति हो गयी है, उसको प्रत्यक्षरूपसे सब कुछ वासुदेव ही दिखलायी देता है। ऐसी अवस्थामें उस भक्तके शरीर, वचन और मनसे जो कुछ भी क्रियाएँ होती हैं, उसकी दृष्टिमें सब एकमात्र भगवानके ही साथ होती हैं। वह हाथोंसे किसीकी सेवा करता है तो वह भगवान्‌की ही सेवा करता है, किसीको मधुर वाणीसे सुख पहुँचाता है तो वह भगवानको ही सुख पहुँचाता है, किसीको देखता है तो वह भगवान्‌को ही देखता है, किसीके साथ कहीं जाता है तो वह भगवान्‌के साथ भगवान्‌की ओर ही जाता है। इस प्रकार वह जो कुछ भी करता है, सब भगवान्‌में ही और भगवानके ही साथ करता है। इसीलिये यह कहा गया है कि वह सब प्रकारसे बरतता हुआ (सब कुछ करता हुआ) भी भगवानमें ही बरतता है। 3. जैसे मनुष्य अपने सारे अंगोंमें अपने आत्माको समभावसे देखता है, वैसे ही सम्पूर्ण चराचर संसारमें अपने-आपको समभावसे देखना--अपनी भाँति सम्पूर्ण भूतोंमें सम देखना है। ४. सर्वत्र आत्मदृष्टि हो जानेके कारण समस्त विराट विश्व उपर्युक्त योगीका स्वरूप बन जाता है। जगत्‌में उसके लिये दूसरा कुछ रहता ही नहीं। इसलिये जैसे मनुष्य अपने-आपको कभी किसी प्रकार जरा भी दुःख पहुँचाना नहीं चाहता तथा स्वाभाविक ही निरन्तर सुख पानेके लिये ही अथक चेष्टा करता रहता है और ऐसा करके न वह कभी अपनेपर अपनेको कृपा करनेवाला मानकर बदलेमें कृतज्ञता चाहता है, न कोई अहसान करता है और न अपनेको “कर्तव्यपरायण” समझकर अभिमान ही करता है, वह अपने सुखकी चेष्टा इसीलिये करता है कि उससे वैसा किये बिना रहा ही नहीं जाता, यह उसका सहज स्वभाव होता है; ठीक वैसे ही वह योगी समस्त विश्वको कभी किसी प्रकार किंचित्‌ भी दुःख न पहुँचाकर सदा उसके सुखके लिये सहज स्वभावसे ही चेष्टा करता है। ५. कर्मयोग, भक्तियोग, ध्यानयोग या ज्ञानयोग आदि साधनोंकी पराकाष्ठारूप समताको ही यहाँ 'योग' कहा गया है। ६. “चंचलता' चित्तके विक्षेपको कहते हैं। विक्षेपमें प्रधान कारण हैं--राग-द्वेष। जहाँ राग-द्वेष हैं, वहाँ “समता” नहीं रह सकती; क्योंकि 'राग-द्वेष” से “समता' का अत्यन्त विरोध है। इसीलिये 'समता' की स्थितिमें मनकी चंचलताको बाधक माना गया है। ७. मन दीपशिखाकी भाँति चंचल तो है ही, परंतु मथानीके सदृश प्रमथनशील भी है। जैसे दूध-दहीको मथानी मथ डालती है, वैसे ही मन भी शरीर और इन्द्रियोंको बिलकुल क्षुब्ध कर देता है। ८. यह चंचल, प्रमाथी और बलवान्‌ मन तन्‍्तुनाग (गोह)-के सदृश अत्यन्त दृढ़ भी है। यह जिस विषयमें रमता है, उसको इतनी मजबूतीसे पकड़ लेता है कि उसके साथ तदाकार-सा हो जाता है। इसको “दृढ़” बतलानेका यही भाव है। ९, जैसे बड़े पराक्रमी हाथीपर बार-बार अंकुश-प्रहार होनेपर भी कुछ असर नहीं होता, वह मनमानी करता ही रहता है, वैसे ही विवेकरूपी अंकुशके द्वारा बार-बार प्रहार करनेपर भी यह बलवान्‌ मन विषयोंके बीहड़ वनसे निकलना नहीं चाहता। $. जैसे शरीरमें निरन्तर चलनेवाले श्वासोच्छवासरूपी वायुके प्रवाहको हठ, विचार, विवेक और बल आदि साथधनोंके द्वारा रोक लेना अत्यन्त कठिन है, उसी प्रकार विषयोंमें निरन्तर विचरनेवाले, चंचल, प्रमथनशील, बलवान्‌ और दृढ़ मनको रोकना भी अत्यन्त कठिन है। २. मनको किसी लक्ष्य विषयमें तदाकार करनेके लिये, उसे अन्य विषयोंसे खींच-खींचकर बार-बार उस विषयमें लगानेके लिये किये जानेवाले प्रयत्नका नाम ही अभ्यास है। यह प्रसंग परमात्मामें मन लगानेका है, अतएव परमात्माको अपना लक्ष्य बनाकर चित्तवृत्तियोंके प्रवाहको बार-बार उन्हींकी ओर लगानेका प्रयत्न करना यहाँ “अभ्यास” है। इसका विस्तार गीताके बारहवें अध्यायके नवें श्लोकमें देखना चाहिये। 3. इस लोक और परलोकके सम्पूर्ण पदार्थोमेंसे जब आसक्ति और समस्त कामनाओं का पूर्णतया नाश हो जाता है, तब उसे “वैराग्य” कहते हैं। वैराग्यकी प्राप्तिके लिये अनेकों साधन हैं, उनमेंसे कुछ ये हैं-- (१) संसारके पदार्थोंमें विचारके द्वारा रमणीयता, प्रेम और सुखका अभाव देखना। (२) उन्हें जन्म-मृत्यु, जरा-व्याधि आदि दुःख-दोषोंसे युक्त, अनित्य और भयदायक मानना। (३) संसारके और भगवान्‌के यथार्थ तत्त्वका निरूपण करनेवाले सत्‌-शास्त्रोंका अध्ययन करना। (४) परम वैराग्यवान्‌ पुरुषोंका संग करना, संगके अभावमें उनके वैराग्यपूर्ण चित्र और चरित्रोंका स्मरण, मनन करना। (५) संसारके टूटे हुए विशाल महलों, वीरान हुए नगरों और गाँवोंके खँँडहरोंको देखकर जगत्‌को क्षणभंगुर समझना। (६) एकमात्र ब्रह्मकी ही अखण्ड, अद्वितीय सत्ताका बोध करके अन्य सबकी भिन्न सत्ताका अभाव समझना। (७) अधिकारी पुरुषोंके द्वारा भगवानके अकथनीय, गुण, प्रभाव, तत्त्व, प्रेम, रहस्य तथा उनके लीला- चरित्रोंका एवं दिव्य सौन्दर्य-माधुर्यका बार-बार श्रवण करना, उन्हें जानना और उनपर पूर्ण श्रद्धा करके मुग्ध होना। ४. जो अभ्यास और वैराग्यके द्वारा अपने मनको वशमें नहीं कर लेते, उनके मनपर राग-द्वेषका अधिकार रहता है और राग-द्वेषकी प्रेरणासे वह बंदरकी भाँति संसारमें ही इधर-उधर उछलता-कूदता रहता है। जब मन भोगोंमें इतना आसक्त होता है, तब उसकी बुद्धि भी बहुशाखावाली और अस्थिर ही बनी रहती है (गीता २।४१-४४)। ऐसी अवस्थामें उसे “समत्वयोग” की प्राप्ति नहीं हो सकती। ५. वशमें हो जानेपर चित्तकी चंचलता, प्रमथनशीलता, बलवत्ता और कठिन आग्रहकारिता दूर हो जाती है। वह सीधा, सरल और शान्त हो जाता है; फिर उसे जब, जहाँ और जितनी देरतक लगाया जाय, चुपचाप लगा रहता है। यही मनके वशमें हो जानेकी पहचान है। ६. मनके वशमें हो जानेके बाद भी यदि प्रयत्न न किया जाय--उस मनको परमात्मामें पूर्णतया लगानेका तीव्र साधन न किया जाय तो उससे समत्वयोगकी प्राप्ति अपने-आप नहीं हो जाती। अतः 'प्रयत्न” की आवश्यकता सिद्ध करनेके लिये ही प्रयत्नशील पुरुषद्वारा साधनसे योगका प्राप्त होना सहज बतलाया गया है। १. पिछले श्लोकमें जिसका मन वशमें नहीं है, उस “असंयतात्मा” के लिये योगका प्राप्त होना कठिन बतलाया गया है। वही बात अर्जुनके इस प्रश्नका बीज है। इस कारण “जिसका मन जीता हुआ नहीं है' ऐसे साधकके लक्ष्यसे 'अयति:” पदका “असंयमी' अर्थ किया गया है। २. सब प्रकारके योगोंके परिणामरूप समभावका फल जो परमात्माकी प्राप्ति है, उसका वाचक यहाँ 'योग-संसिद्धिम्‌' पद है। 3. यहाँ “योग” शब्द परमात्माकी प्राप्तिके उद्देश्यसे किये जानेवाले सांख्ययोग, भक्तियोग, ध्यानयोग, कर्मयोग आदि सभी साधनोंसे होनेवाले समभावका वाचक है। शरीरसे प्राणोंका वियोग होते समय जो समभावसे या परमात्माके स्वरूपसे मनका विचलित हो जाना है, यही मनका योगसे विचलित हो जाना है और इस प्रकार मनके विचलित होनेमें मनकी चंचलता, आसक्ति, कामना, शरीरकी पीड़ा और बेहोशी आदि बहुत-से कारण हो सकते हैं। ४. यहाँ अर्जुनका अभिप्राय यह है कि जीवनभर फलेच्छाका त्याग करके कर्म करनेसे स्वर्गादि भोग तो उसे मिलते नहीं और अन्त समयमें परमात्माकी प्राप्तिके साधनसे मन विचलित हो जानेके कारण भगवत्प्राप्ति भी नहीं होती। अतएव जैसे बादलका एक टुकड़ा उससे पृथक्‌ होकर पुनः दूसरे बादलसे संयुक्त न होनेपर नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है, वैसे ही वह साधक स्वर्गादि लोक और परमात्मा--दोनोंकी प्राप्तिसे वंचित होकर नष्ट तो नहीं हो जाता यानी उसकी कहीं अधोगति तो नहीं होती? ५. यहाँ अर्जुन भगवान्‌में अपना विश्वास प्रकट करते हुए प्रार्थना कर रहे हैं कि आप सर्वान्तिर्यामी, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्‌, सम्पूर्ण मर्यादाओंके निर्माता और नियन्त्रणकर्ता साक्षात्‌ परमेश्वर हैं। अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके अनन्त जीवोंकी समस्त गतियोंके रहस्यका आपको पूरा पता है और समस्त लोक- लोकान्तरोंकी त्रिकालमें होनेवाली समस्त घटनाएँ आपके लिये सदा ही प्रत्यक्ष हैं। ऐसी अवस्थामें योग भ्रष्ट पुरुषोंकी गतिका वर्णन करना आपके लिये बहुत ही आसान बात है। जब आप स्वयं यहाँ उपस्थित हैं, तब मैं और किससे पूछँ और वस्तुत: आपके सिवा इस रहस्यको दूसरा बतला ही कौन सकता है? अतएव कृपापूर्वक आप ही इस रहस्यको खोलकर मेरे संशयजालका छेदन कीजिये। ६. जो साधक अपनी शक्तिके अनुसार श्रद्धापूर्वक कल्याणका साधन करता है, उसकी किसी भी कारणसे कभी शूकर, कूकर, कीट, पतंग आदि नीच योनियोंकी प्राप्तिरूप या कुम्भीपाक आदि नरकोंकी प्राप्तिरूप दुर्गति नहीं हो सकती। ७. ज्ञानयोग, भक्तियोग, ध्यानयोग और कर्मयोग आदिका साधन करनेवाले जिस पुरुषका मन विक्षेप आदि दोषोंसे या विषयासक्ति अथवा रोगादिके कारण अन्तकालमें लक्ष्यसे विचलित हो जाता है, उसे 'योगभ्रष्ट' कहते हैं। $. योगश्रष्ट पुरुषोंमेंसे जिनके मनमें विषयासक्ति होती है, वे तो स्वर्गादि लोकोंमें जाते हैं और पवित्र धनियोंके घरोंमें जन्म लेते हैं; परंतु जो वैराग्यवान्‌ पुरुष होते हैं, वे न तो किसी लोकमें जाते हैं और न उन्हें धनियोंके घरोंमें ही जन्म लेता पड़ता है। वे तो सीधे ज्ञानवान्‌ सिद्ध योगियोंके घरोंमें ही जन्म लेते हैं। पूर्ववर्णित योगश्रष्टोंसे इन्हें पृथक्‌ करनेके लिये “अथवा” का प्रयोग किया गया है। २. परमार्थसाधन (योगसाधन)-की जितनी सुविधा योगियोंके कुलमें जन्म लेनेपर मिल सकती है, उतनी स्वर्गमें, श्रीमानोंके घरमें अथवा अन्यत्र कहीं भी नहीं मिल सकती। योगियोंके कुलमें तदनुकूल वातावरणके प्रभावसे मनुष्य प्रारम्भिक जीवनमें ही योगसाधनमें लग सकता है। दूसरी बात यह है कि ज्ञानीके कुलमें जन्म लेनेवाला अज्ञानी नहीं रहता, यह सिद्धान्त श्रुतियोंसे भी प्रमाणित है। इसीलिये ऐसे जन्मको अत्यन्त दुर्लभ बतलाया गया है। 3. जो योगका जिज्ञासु है, योगमें श्रद्धा रखता है और उसे प्राप्त करनेकी चेष्टा करता है, वह मनुष्य भी वेदोक्त सकामकर्मके फलस्वरूप इस लोक और परलोकके भोगजनित सुखको पार कर जाता है तो फिर जन्म-जन्मान्तरसे योगका अभ्यास करनेवाले योगश्रष्ट पुरुषोंके विषयमें तो कहना ही क्या है? ४. तैंतालीसवें श्लोकमें यह बात कही गयी है कि योगियोंके कुलमें जन्म लेनेवाला योगगश्रष्ट पुरुष उस जन्ममें योगसिद्धिकी प्राप्तिके लिये अधिक प्रयत्न करता है। इस श्लोकमें उसी योगीको परमगतिकी प्राप्ति बतलायी जाती है, इसी बातको स्पष्ट करनेके लिये यहाँ “योगी” को “प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करनेवाला” बतलाया गया है; क्योंकि उसके प्रयत्नका फल वहाँ उस श्लोकमें नहीं बतलाया गया था, उसे यहाँ बतलाया गया है। ५. पिछले अनेक जन्मोंमें किया हुआ अभ्यास और इस जन्मका अभ्यास दोनों ही उसे योगसिद्धिकी प्राप्ति करानेमें अर्थात्‌ साधनकी पराकाष्ठातक पहुँचानेमें हेतु हैं, क्योंकि पूर्वसंस्कारोंक बलसे ही वह विशेष प्रयत्नके साथ इस जन्ममें साधनका अभ्यास करके साधनकी पराकाष्ठाको प्राप्त करता है। ६. सकामभावसे यज्ञ-दानादि शास्त्रविहित क्रिया करनेवालेका नाम ही “कर्मी” है। इसमें क्रियाकी बहुलता है। तपस्वीमें क्रियाकी प्रधानता नहीं, मन और इन्द्रियके संयमकी प्रधानता है और शास्त्रज्ञानीमें शास्त्रीय बौद्धिक आलोचनाकी प्रधानता है। इसी विलक्षणताको ध्यानमें रखकर कर्मी, तपस्वी और शास्त्रज्ञानगाका अलग-अलग निर्देश किया गया है। $. गीताके चौथे अध्यायमें चौबीसवेंसे तीसवें श्लोकतक भगवत्प्राप्तिके जितने भी साधन यज्ञके नामसे बतलाये गये हैं, उनके अतिरिक्त और भी भगवत्प्राप्तिके जिन-जिन साधनोंका अबतक वर्णन किया गया है, उन सबकी पराकाष्ठाका नाम “योग” होनेके कारण विभिन्न साधन करनेवाले बहुत प्रकारके “योगी” हो सकते हैं। उन सभी प्रकारके योगियोंका लक्ष्य करानेके लिये यहाँ 'योगिनाम' पदके साथ “अपि” पदका प्रयोग करके “सर्वेषाम” विशेषण दिया गया है। २. इससे भगवान्‌ यह दिखलाते हैं कि मुझको ही सर्वश्रेष्ठ, सर्वगुणाधार, सर्वशक्तिमान्‌ और महान्‌ प्रियतम जान लेनेसे जिसका मुझमें अनन्यप्रेम हो गया है और इसलिये जिसका मन-बुद्धिरूप अन्तःकरण अचल, अटल और अनन्यभावसे मुझमें ही स्थित हो गया है, उसके अन्त:करणको “मद्‌गत अन्तरात्मा” या मुझमें लगा हुआ अन्तरात्मा कहते हैं। 3. जो भगवानकी सत्तामें, उनके अवतारोंमें, उनके वचनोंमें, उनके अचिन्त्यानन्त दिव्य गुणोंमें तथा नाम और लीलामें एवं उनकी महिमा, शक्ति, प्रभाव और ऐश्वर्य आदियें प्रत्यक्षेके सदृश पूर्ण और अटल विश्वास रखता हो, उसे *“श्रद्धावान” कहते हैं। ४. सब प्रकार और सब ओरसे अपने मन-बुद्धिको भगवान्‌में लगाकर परम श्रद्धा और प्रेमके साथ चलते-फिरते, उठते-बैठते, खाते-पीते, सोते-जागते, प्रत्येक क्रिया करते अथवा एकान्तमें स्थित रहते, निरन्तर श्रीभगवान्‌का भजन-ध्यान करना ही 'भजते” का अर्थ है। ५. यहाँ “माम्‌” पद निरतिशय ज्ञान, शक्ति, ऐश्वर्य, वीर्य और तेज आदिके परम आश्रय, सौन्दर्य, माधुर्य और औदार्यके अनन्त समुद्र, परम दयालु, परम सुहृद, परम प्रेमी, दिव्य अचिन्त्यानन्दस्वरूप, नित्य, सत्य, अज और अविनाशी, सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्‌, सर्वदिव्यगुणालंकृत, सर्वात्मा, अचिन्त्य महत्त्वसे महिमान्वित, चित्र-विचित्र लीलाकारी, लीलामात्रसे प्रकृतिद्वारा सम्पूर्ण जगत्‌की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाले तथा रससागर, रसमय, आनन्दकन्द, सगुण-निर्मुणरूप समग्र ब्रह्म पुरुषोत्तमका वाचक है। ६. श्रीभगवान्‌ यहाँपर अपने प्रेमी भक्तोंकी महिमाका वर्णन करते हुए मानो कहते हैं कि यद्यपि मुझे तपस्वी, ज्ञानी और कर्मी आदि सभी प्यारे हैं और इन सबसे भी वे योगी मुझे अधिक प्यारे हैं, जो मेरी ही प्राप्तिके लिये साधन करते हैं, परंतु जो मेरे समग्ररूपको जानकर मुझसे अनन्यप्रेम करता है, केवल मुझको ही अपना परम प्रेमास्पद मानकर, किसी बातकी अपेक्षा, आकांक्षा और परवा न रखकर अपने अन्तरात्माको दिन-रात मुझमें ही लगाये रखता है, वह मेरा अपना है, मेरा ही है, उससे बढ़कर मेरा प्रियतम और कौन है? जो मेरा प्रियतम है, वही तो श्रेष्ठ है; इसलिये मेरे मनमें वही सर्वोत्तम भक्त है और वही सर्वोत्तम योगी है। एकत्रिशो< ध्याय: (श्रीमद्भगवद्गीतायां सप्तमो<ध्याय:) ज्ञान-विज्ञान, भगवानकी व्यापकता, अन्य देवताओंकी उपासना एवं भगवान्‌को प्रभावसहित न जाननेवालोंकी निन्दा और जाननेवालोंकी महिमाका कथन सम्बन्ध-- छठे अध्यायके अन्तिम श्लोकमें भगवान्‌ने कहा कि-- अन्तरात्माको मुझमें लगाकर जो श्रद्धा और प्रेमके साथ मुझको भजता है, वह सब प्रकारके योगियोंगें उत्तम योगी है।” परंतु भगवान्‌के स्वरूप, गुण और प्रभावकों मनुष्य जबतक नहीं जान पाता, तबतक उसके द्वारा अन्तरात्मासे निरन्तर भजन होना बहुत कठिन है? साथ ही भजनका प्रकार जानना भी आवश्यक है। इसलिये अब भगवान्‌ अपने गुण; प्रभावके सहित समग्र स्वरूपका तथा अनेक प्रकारोंसे युक्त भक्तियोयका वर्णन करनेके लिये सातवें अध्यायका आरम्भ करते हैं और सबसे पहले दो शलोकोमें अर्जुनको उसे सावधानीके साथ युननेके लिये प्रेरणा करके ज्ञान-विज्ञानके कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं-- श्रीभगवानुवाच मय्यासक्तमना:* पार्थ योगं युज्जन्‌ मदाश्रय: | असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृूणु,श्रीभगवान्‌ बोले--हे पार्थ! अनन्यप्रेमसे मुझमें आसक्तचित्त तथा अनन्यभावसे मेरे परायण होकर योगमें लगा हुआः तू जिस प्रकारसे सम्पूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्यादि गुणोंसे युक्त, सबके आत्मरूप मुझको संशयरहित जानेगा,< उसको सुन

Arjuna said: (introducing his forthcoming question/statement in the dialogue).

Verse 2

ज्ञानं तेडहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषत: । यज्ज्ञात्वा नेह भूयोअन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते,मैं तेरे लिये इस विज्ञानसहित तत्त्वज्ञानको” सम्पूर्णतया कहूँगा, जिसको जानकर संसारमें फिर और कुछ भी जाननेयोग्य शेष नहीं रह जाता?

I shall declare to you, in full, this knowledge together with its realized understanding. When it is truly known, nothing else remains here in this world that must still be known—no further pursuit is left that can bind or bewilder the mind.

Verse 3

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्‌ यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां वल्िन्मां वेत्ति तत्त्तत:

Among thousands of human beings, only someone rare strives for spiritual perfection. And even among those who strive and attain such perfection, only a rare one truly knows Me in reality (as I am).

Verse 4

हजारों मनुष्योंमें कोई एक मेरी प्राप्तिके लिये यत्न करता हैः और उन यत्न करनेवाले योगियोंमें भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्त्वसे अर्थात्‌ यथार्थरूपसे जानता है ।। भूमिरापो5नलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा,पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार भी--इस प्रकार यह आठ प्रकारसे विभाजित मेरी प्रकृति है। यह आठ प्रकारके भेदोंवाली तो अपरार अर्थात्‌ मेरी जड प्रकृति है और हे महाबाहो! इससे दूसरीको, जिससे यह सम्पूर्ण जगत्‌ धारण किया जाता है, मेरी जीवरूपा परा अर्थात्‌ चेतन प्रकृति जान

The Blessed Lord explains that His material nature is eightfold, divided into earth, water, fire, wind, space, mind, intellect, and ego-sense. By listing these constituents, He frames the ethical vision of the Gītā: the embodied world and the instruments of experience are part of prakṛti, while true understanding requires seeing beyond mere material composition toward the higher principle that sustains life and guides right action.

Verse 5

अपरेयमितत्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्‌ । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्‌,पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार भी--इस प्रकार यह आठ प्रकारसे विभाजित मेरी प्रकृति है। यह आठ प्रकारके भेदोंवाली तो अपरार अर्थात्‌ मेरी जड प्रकृति है और हे महाबाहो! इससे दूसरीको, जिससे यह सम्पूर्ण जगत्‌ धारण किया जाता है, मेरी जीवरूपा परा अर्थात्‌ चेतन प्रकृति जान

This (eightfold) is My lower nature; but know, O mighty-armed one, that there is another nature of Mine, higher than this—living in essence—by which this entire world is sustained and held together. The teaching turns Arjuna’s attention from inert material constituents to the conscious principle that supports life and moral agency.

Verse 6

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्‌गीतापवके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशासत्ररूप श्रीमद्भगवद्‌गीतोपनिषद्‌, श्रीकृष्णारजुनसंवादमें आत्मसंयमयोग नामक छठा अध्याय पूरा हुआ,एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगत: प्रभव: प्रलयस्तथा

Verse 7

हे अर्जुन! तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियोंसे ही उत्पन्न होनेवाले हैं* और मैं सम्पूर्ण जगत्‌का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात्‌ सम्पूर्ण जगत्‌का मूल कारण हूँ? ।। मत्त: परतरं नान्यत्‌ किंचिदस्ति धनंजय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव,हे धनंजय! मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत्‌ सूत्रमें सूत्रके मनियोंके सदृश मुझमें गुँथा हुआ है?

Krishna declares to Arjuna that there is no reality higher than Him as the ultimate cause. All beings and the entire cosmos depend upon Him and are held together in Him—just as many beads are strung and supported by a single thread. Ethically, the teaching grounds devotion and duty in a unified vision: one should act without confusion or divided loyalties, recognizing the one sustaining source behind all names and forms, even amid the pressures of war.

Verse 8

रसो5हमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययो: । प्रणव: सर्ववेदेषु शब्द: खे पौरुषं नूषु,हे अर्जुन! मैं जलमें रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्यमें प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदोंमें ओंकार हूँ, आकाशमें शब्द और पुरुषोंमें पुरुषत्व हूँ

The Blessed Lord declares to Arjuna that His presence is to be recognized in the most essential qualities of things: He is the taste in water, the radiance in the moon and the sun, the sacred syllable Oṁ throughout all the Vedas, sound in the sky, and manliness in men. The ethical thrust is to train perception toward the Divine as the inner reality behind ordinary experience, fostering reverence, steadiness, and right orientation of action amid the impending war.

Verse 9

पुण्यो गन्ध: पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । जीवन सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु

Verse 10

मैं पृथिवीमें पवित्र: गन्ध और अग्निमें तेज हूँ तथा सम्पूर्ण भूतोंमें उनका जीवन हूँ और तपस्वियोंमें तप हूँ ।। बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्‌ । बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्‌,हे अर्जुन! तू सम्पूर्ण भूतोंका सनातन बीज मुझको ही जानः! मैं बुद्धिमानोंकी बुद्धि और तपस्वियोंका तेज हूँ

Krishna declares that the pure fragrance in the earth and the radiance in fire are expressions of him; likewise, the very life that sustains all beings and the austerity of ascetics are his presence. He then instructs Arjuna to recognize him as the eternal seed—the originating principle—of all creatures, and as the discerning intelligence in the intelligent and the splendor in the splendid. Ethically, the teaching redirects Arjuna’s attention from mere battlefield outcomes to the divine ground of all vitality, excellence, and disciplined striving, urging reverence and responsibility toward life itself.

Verse 11

बल॑ बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्‌ | धर्माविरुद्धो भूतेषु कामो5स्मि भरतर्षभ,हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानोंका आसक्ति और कामनाओंसे रहित बल अर्थात्‌ सामर्थ्य हूँ और सब भूतोंमें धर्मके अनुकूल अर्थात्‌ शास्त्रके अनुकूल काम हूँ

I am the strength of the strong—strength that is free from craving and attachment. And among living beings, O bull of the Bharatas, I am desire that does not oppose dharma: desire aligned with what is right and sanctioned by sacred law.

Verse 12

सम्बन्ध-- इस प्रकार प्रधान-प्रधान वस्चुओंगें सार-रूपसे अपनी व्यापकता बतलाते हुए भगवान्‌ने प्रकारान्‍्तरसे समस्त जगत्‌र्ें अपनी सर्वव्यापकता और सर्वस्वरूपता सिद्ध कर दी, अब अपनेको ही त्रिगुणमय जगत्‌का मूल कारण बतलाकर इस प्रसंगका उपसंद्ार करते हैं-- ये चैव साच्चिका भावा राजसास्तामसाशक्ष ये । मत्त एवेति तान्‌ विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि

Whatever states of being arise from clarity (sattva), from passion (rajas), or from inertia and darkness (tamas)—know all of them to proceed from Me alone. Yet I am not confined within those qualities; rather, those qualities exist within Me. In this way, the Lord affirms Himself as the source of the world’s threefold conditioning while remaining ethically and metaphysically unbound by it.

Verse 13

१२ ।। सम्बन्ध-- भगवान्‌ने यह दिखलाया कि समस्त जयत्‌ मेरा ही स्वरूप है और मुझसे ही व्याप्त है। यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि इस प्रकार सर्वत्र परिपूर्ण और अत्यन्त समीप होनेपर भी लोग भगवान्‌को क्यों नहीं पहचानते: इसपर भगवान्‌ कहते हैं-- त्रिभिर्गुणमयैभविरेभि: सर्वमिदं जगत्‌ | मोहितं नाभिजानाति मामेभ्य: परमव्ययम्‌,गुणोंके कार्यरूप सात््विक, राजस और तामस--इन तीनों प्रकारके भावोंसे यह सब संसार--प्राणिसमुदाय मोहित हो रहा है, इसीलिये इन तीनों गुणोंसे परे मुझ अविनाशीको नहीं जानताः

The entire world is deluded by these three states born of the guṇas—sattva, rajas, and tamas. Therefore, people fail to recognize Me, the Supreme, imperishable Reality that transcends these guṇas. Ethically, the verse explains that moral and spiritual blindness is not merely ignorance but a bondage created by one’s own conditioned tendencies; liberation begins when one sees beyond these habitual modes and seeks the unchanging ground of truth.

Verse 14

दैवी होषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते

This power of Mine—divine and woven of the three guṇas—is exceedingly hard to cross. Yet those who take refuge in Me alone pass beyond this māyā. In the moral crisis of the battlefield, the teaching directs Arjuna away from self-reliance and confusion toward wholehearted surrender to the Supreme as the sure means to transcend delusion and act rightly.

Verse 15

क्योंकि यह अलौकिक अर्थात्र अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है; परंतु जो पुरुष केवल मुझको ही निरन्तर भजते हैं, वे इस मायाको उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात्‌ संसारसे तर जाते हैं? ।। सम्बन्ध-- भगवान्‌ने मायाकी दुस्तरता दिखलाकर अपने भजनको उससे तरनेका उपाय बतलाया। इसपर यह प्रश्न उठता है कि जब ऐसी बात है, तब सब लोग निरन्तर आपका भजन क्यों नहीं करते! इसपर भगवान्‌ कहते हैं-- न मां दुष्कृतिनो मूढा: प्रपद्यन्ते नराधमा: । माययापद्वतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिता:,मायाके द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है ऐसे आसुरस्वभावको धारण किये हुए, मनुष्योंमें नीच, दूषित कर्म करनेवाले मूढलोग मुझको नहीं भजते

The Lord explains why not everyone takes refuge in Him: those who persist in wrongdoing, who are deluded and morally fallen among humans, do not surrender to Him. Their discernment is stolen away by Māyā, and they cling to an asuric (anti-divine) disposition—therefore they turn away from devotion that alone can carry one beyond the world’s bondage.

Verse 16

चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोअ<र्जुनर | आर्तों जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ,किंतु हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम कर्म करनेवाले अर्थार्थिर्ड, आर्त,+ जिज्ञासुरई और ज्ञानी२--ऐसे चार प्रकारके भक्तजन मुझको भजते हैं

Arjuna, four kinds of virtuous people turn to Me in devotion: the distressed, the seeker of knowledge, the seeker of worldly gain, and the wise one—O best of the Bharatas. In the moral landscape of the Gītā, this classifies devotion not by social status but by inner motive, showing that even need-driven worship can be a legitimate beginning, while wisdom-based devotion is the most mature form.

Verse 17

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोउत्यर्थमहं स च मम प्रिय:,उनमें नित्य मुझमें एकीभावसे स्थित अनन्य प्रेमभक्तिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है; क्योंकि मुझको तत्त्वसे जाननेवाले ज्ञानीको मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय हैः

Among all such devotees, the wise one—ever steadfast in disciplined union and devoted with single-minded love—stands out as the best. For I am supremely dear to the knower of truth, and that knower is supremely dear to me. The teaching highlights an ethical ideal of unwavering inner commitment: devotion grounded in true understanding, not merely in need or fear.

Verse 18

सम्बन्ध-- भगवान्‌ने ज्ञानी भक्तको सबसे श्रेष्ठ और अत्यन्त प्रिय बतलाया। इसपर यह शंका हो सकती है कि क्या दूसरे भक्त श्रेष्ठ और प्रिय नहीं हैं; इसपर भगवान्‌ कहते हैं-- उदारा: सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्‌ आस्थित: स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्‌,ये सभी उदार हैं, परंतु ज्ञानी तो साक्षात्‌ मेरा स्वरूप ही है*--ऐसा मेरा मत है; क्योंकि वह मद्गत मन-बुद्धिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम गतिस्वरूप मुझमें ही अच्छी प्रकार स्थित है

The Blessed Lord says: “All these devotees are noble indeed; yet the knower is, in my judgment, none other than my very Self. For that steadfast, disciplined soul—whose mind and understanding are fixed in me—abides well in me alone as the unsurpassed goal.” Ethically, the verse ranks devotion by inner transformation: devotion that culminates in clear knowledge and unwavering integration with the Highest is presented as the most intimate form of love and the highest human attainment.

Verse 19

बहूनां जन्मनामन्ते” ज्ञानवान्‌ः मां प्रपद्यते । वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:,बहुत जन्मोंके अन्तके जन्ममें तत्त्वज्ञानको प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही है--इस प्रकार मुझको भजता है;* वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है

At the end of many births, a person endowed with true knowledge surrenders to Me, realizing, “Vāsudeva is everything.” Such a great-souled one—whose insight culminates in wholehearted refuge and devotion—is exceedingly rare.

Verse 20

कामैस्तैस्तै््वतज्ञाना: प्रपद्यन्तेडन्यदेवता: । तं त॑ं नियममास्थाय प्रकृत्या नियता: स्वया,उन-उन भोगोंकी कामनाद्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, वे लोग अपने स्वभावसे प्रेरित होकर८ उस-उस नियमको धारण करके अन्य देवताओंको भजते हैं अर्थात्‌ पूजते हैं;

Those whose discernment has been stolen away by their various desires take refuge in other deities. Driven by their own nature, they adopt this or that prescribed observance and worship those gods, seeking the particular enjoyments they crave.

Verse 21

योयोयां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विद्धाम्पहम्‌,जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवताके स्वरूपको श्रद्धासे पूजना चाहता है, उस- उस भक्तकी श्रद्धाको मैं उसी देवताके प्रति स्थिर करता हूँ

Arjuna said: “Whatever form a devoted worshipper wishes to honor with faith, I make that very person’s faith steady and unwavering toward that chosen form.”

Verse 22

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च तत: कामान्‌ मयैव विहितान्‌ हि तान्‌,वह पुरुष उस श्रद्धासे युक्त होकर उस देवताका पूजन करता है और उस देवतासे मेरे द्वारा ही विधान किये हुए उन इच्छित भोगोंको नि:संदेह प्राप्त करता है

Endowed with that faith, a person strives to worship that deity; and from that deity he indeed obtains the desired enjoyments—yet those enjoyments are, in truth, ordained by Me alone. The ethical point is that devotion may be directed to many forms, but the fruits of action are ultimately governed by the supreme order, not by mere preference or impulse.

Verse 23

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्‌ भवत्यल्पमेधसाम्‌ | देवान्‌ देवयजो यान्ति मद्धक्ता यान्ति मामपि,परंतु उन अल्प बुद्धिवालोंकाः वह फल नाशवान्‌ है तथा वे देवताओंको पूजनेवाले देवताओंको प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अन्तमें वे मुझको ही प्राप्त होते हैं:

Verse 24

सम्बन्ध-- जब भगवान्‌ इतने प्रेमी और दयासागर हैं कि जिस-किसी प्रकारसे भी भजनेवालेको अपने स्वरूपकी प्राप्ति करा ही देते हैं. तो फिर सभी लोग उनको क्यों नहीं भजते, इस जिज्ञासापर कहते हैं अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धय: । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्‌

Verse 25

२४ ।। नाहं प्रकाश: सर्वस्य योगमायासमावृत: । मूढो5यं नाभिजानाति लोकोः मामजमव्ययम्‌,क्योंकि अपनी योगमायासे छिपा हुआः मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, इसलिये यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझ जन्मरहित अविनाशी परमेश्वरको नहीं जानता अर्थात्‌ मुझको जन्मने-मरनेवाला समझता है

I am not manifest to everyone, being veiled by My yogic power (yogamāyā). Therefore this deluded world does not recognize Me as the unborn and imperishable Lord—mistaking Me for one who is subject to birth and death.

Verse 26

वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन । भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन,हे अर्जुन! पूर्वमें व्यतीत हुए और वर्तमानमें स्थित तथा आगे होनेवाले सब भूतोंको मैं जानता हूँ, परंतु मुझको कोई भी श्रद्धा-भक्तिरहित पुरुष नहीं जानता

The Blessed Lord declares: “O Arjuna, I know all beings and events—those that have passed, those that are present, and those yet to come. Yet no one truly knows Me as I am, for My reality is not grasped by those devoid of faith and devotion.”

Verse 27

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्रमोहेन भारत । सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परंतप,क्योंकि हे भरतवंशी अर्जुन! संसारमें इच्छा और द्वेषसे उत्पन्न सुख-दु:खादि द्वन्द्धरूप मोहसे* सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त अज्ञताको प्राप्त हो रहे हैं

Arjuna said: O Bhārata, because of the delusion born from the pair of opposites—arising from desire and aversion—all beings, at the very time of their coming into existence, fall into bewilderment. This confusion binds them to misjudgment and suffering, obscuring right discernment and ethical clarity.

Verse 28

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्‌ । ते द्व्द्धमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढब्रता:

Arjuna said: Those people of righteous conduct whose sin has come to an end—freed from the delusion born of the pairs of opposites—worship Me with steadfast vows and unwavering resolve.

Verse 29

२८ ।। जरामरणमोक्षाय मामश्रित्य यतन्ति ये । ते ब्रह्म तद्‌ विदु: कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्‌,जो मेरे शरण होकर जरा और मरणसे छूटनेके लिये यत्न करते हैं,* वे पुरुष उस ब्रह्मको, सम्पूर्ण अध्यात्मको और सम्पूर्ण कर्मको जानते हैं

Those who take refuge in Me and strive for liberation from old age and death come to know that Brahman in its fullness—along with the entire inner spiritual reality (adhyātma) and the complete truth of action (karma). The verse frames liberation not as mere theory but as an ethical-spiritual pursuit grounded in surrender and disciplined effort.

Verse 30

भीष्मपर्वणि तु त्रिंशो5ध्याय:,भीष्मपर्वमें तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदु: । प्रयाणकाले$पि च मां ते विदुर्युक्तचेतस: एवं जो पुरुष अधिभूत और अधिदैवके सहित तथा अधियज्ञके सहित (सबके आत्मरूप) मुझे अन्तकालमें भी जानते हैं, वे युक्तचित्तवाले पुरुष मुझे जानते हैं* अर्थात्‌ प्राप्त हो जाते हैं

Those who, with a disciplined and integrated mind, truly know Me together with the realm of perishable beings (adhibhūta), the divine governing principle (adhidaiva), and the sacrificial principle (adhiyajña)—they know Me even at the time of death. Such persons do not lose their orientation in the final hour; they reach Me, the inner Self of all these domains.

Verse 31

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतापर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमो<5ध्याय: ।। ७ || भीष्मपर्वणि तु एकत्रिंशो5ध्याय:

Thus, in the Śrī Mahābhārata, within the Bhīṣma Parva—specifically in the Bhagavad Gītā section, regarded as an Upaniṣad teaching of Brahma-knowledge and a treatise on yoga—ends the seventh chapter of the dialogue between Śrī Kṛṣṇa and Arjuna, called “The Yoga of Knowledge and Realization.” Here, within the Bhīṣma Parva, this corresponds to the thirty-first chapter. (This is a colophon marking the close of the chapter rather than a spoken verse.)

Frequently Asked Questions

The dilemma is how to act within unavoidable public duty while avoiding bondage to outcomes: the text answers by prescribing dedication of all acts (eating, giving, austerity, ritual) as an offering, thereby reframing agency and responsibility.

Stabilize practice through integrated discipline: understand the divine as the sustaining ground of beings, recognize prakṛti’s operations under oversight, and cultivate single-minded devotion that converts ordinary conduct into a liberating path.

Yes: assurances are explicitly stated—devotees are not lost (“na me bhaktaḥ praṇaśyati”), the divine bears their welfare (“yogakṣemaṃ vahāmyaham”), and even those of stigmatized social standing can attain the highest goal through refuge and devotion.