
Nala’s Embassy to Damayantī and the Gods’ Proposal (नलस्य दूतत्वं देवप्रस्तावश्च)
Upa-parva: Nala–Damayantī Upākhyāna (Episode of Nala and Damayantī)
Bṛhadaśva narrates that Nala, having promised service, asks the visitors’ identities and the nature of his task. Indra replies, identifying himself along with Agni, Varuṇa, and Yama, stating that the lokapālas have come seeking Damayantī and instructing Nala to inform her and invite her to choose one of them as husband. Nala expresses reluctance to serve a single shared purpose that conflicts with his own inclination, but the gods insist on his prior commitment; he raises a practical concern about entering a heavily guarded palace. Indra assures him entry is possible, and Nala proceeds, entering unobserved by divine power. He sees Damayantī among companions, described with heightened radiance and composure; Nala experiences desire yet restrains it to preserve truthfulness. The women are awed and silent; Damayantī addresses Nala directly, asking who he is and how he entered unnoticed. Nala identifies himself as a divine messenger and relays the gods’ proposal, explicitly presenting her choice.
Chapter Arc: अस्त्र-विद्या के हेतु अर्जुन के इन्द्रलोक गमन के बाद, काम्यक वन में द्रौपदी सहित पाण्डवों का निवास—और एकान्त में युधिष्ठिर का भीतर-भीतर जलता शोक प्रकट होने लगता है। → एकान्त शाद्वल भूमि पर युधिष्ठिर-द्रौपदी बैठते हैं; राज्य-भ्रंश, वनवास और अर्जुन-वियोग की पीड़ा से युधिष्ठिर का मन क्षत्रिय-धर्म और राजधर्म के प्रश्नों में उलझता है। भीम का स्वर कठोर होकर उभरता है—‘राज्य ही क्षत्रिय का परम धर्म है’—और वह युधिष्ठिर को ‘धर्म’ के नाम पर निष्क्रियता से सावधान करता है। → युधिष्ठिर अर्जुन के पुनरागमन की उत्कट प्रतीक्षा व्यक्त करते हैं—‘कदा द्रक्ष्यामि बीभत्सुं कृतास्त्रं पुनरागतम्’—और उसी भाव-उभार के बीच एक आगन्तुक (बृहदश्व) उपस्थित होकर कथा-श्रवण की भूमिका बनाता है; युधिष्ठिर उससे अपने समान संकटग्रस्त राजा की कथा सुनाने का आग्रह करते हैं। → बृहदश्व युधिष्ठिर को धैर्य देता है—तुम्हारे साथ देवतुल्य भाई और ब्रह्मकल्प द्विज हैं, अतः शोक में डूबना उचित नहीं—और नलोपाख्यान का आरम्भ करता है: निषध के वीरसेन-पुत्र नल का परिचय, उसके धर्मार्थ-कोविद स्वरूप का संकेत, तथा आगे आने वाले पतन की छाया। → नल का वैभव और गुण कहकर बृहदश्व उस बिन्दु तक ले आता है जहाँ नल के जीवन में विपर्यय का बीज पड़ने वाला है—श्रोता अगले अध्याय में उसके पतन-प्रसंग की प्रतीक्षा में ठहर जाते हैं।
Verse 1
हि >> आय न [हुक है 7-2 (नलोपाख्यानपर्व) द्विपञ्चाशत्तमो<5 ध्याय: भीमसेन-युधिष्ठटिर-संवाद, बृहदश्चका आगमन तथा युधिष्ठिरके पूछनेपर बृहदश्चवके द्वारा नलोपाख्यानकी प्रस्तावना जनमेजय उवाच अस्त्रहेतोर्गते पार्थे शक्रलोक॑ महात्मनि । युधिष्ठिरप्रभूतय: किमकुर्वत पाण्डवा:,जनमेजयने पूछा--ब्रह्मन! अस्त्रविद्याकी प्राप्तिके लिये महात्मा अर्जुनके इन्द्रलोक चले जानेपर युधिष्ठिर आदि पाण्डवोंने क्या किया?
Janamejaya berkata: “Wahai brāhmaṇa, ketika Pārtha (Arjuna) yang berhati luhur pergi ke dunia Śakra demi memperoleh senjata-senjata surgawi, apakah yang dilakukan para Pāṇḍava yang dipimpin Yudhiṣṭhira?”
Verse 2
वैशम्पायन उवाच अस्त्रहेतोर्गते पार्थे शक्रलोक॑ महात्मनि । आवसन् कृष्णया सार्धथ काम्यके भरतर्षभा:,वैशम्पायनजीने कहा--राजन! अस्त्रविद्याके लिये महात्मा अर्जुनके इन्द्रलोक जानेपर भरतकुलभूषण पाण्डव द्रौपदीके साथ काम्यकवनमें निवास करने लगे
Vaiśampāyana berkata: “Wahai Raja, ketika Pārtha (Arjuna) yang berhati luhur pergi ke dunia Śakra demi memperoleh senjata-senjata surgawi, para Pāṇḍava—pahlawan agung keturunan Bharata—tinggal di hutan Kāmyaka bersama Kṛṣṇā (Draupadī).”
Verse 3
तत: कदाचिदेकान्ते विविक्त इव शाद्वले | दुःखार्ता भरतश्रेष्ठा निषेदु: सह कृष्णया,तदनन्तर एक दिन एकान्त एवं पवित्र स्थानमें, जहाँ छोटी-छोटी हरी दूर्वा आदि घास उगी हुई थी, वे भरतवंशके श्रेष्ठ पुरुष दुःखसे पीड़ित हो द्रौपदीके साथ बैठे और धनंजय अर्जुनके लिये चिन्ता करते हुए अत्यन्त दु:खमें भरे अश्रुगदूगद कण्ठसे उन्हींकी बातें करने लगे। अर्जुनके वियोगसे पीड़ित उन समस्त पाण्डवोंको शोकसागरने अपनी लहरोंमें डुबो दिया
Kemudian, pada suatu ketika, di tempat yang sunyi—di hamparan rumput yang hening—para utama keturunan Bharata, diliputi duka, duduk bersama Kṛṣṇā (Draupadī).
Verse 4
धनंजयं शोचमाना: साश्रुकण्ठा: सुदुःखिता: । तद्वियोगार्दितान् सर्वाउ्छोक: समभिपुप्लुवे,तदनन्तर एक दिन एकान्त एवं पवित्र स्थानमें, जहाँ छोटी-छोटी हरी दूर्वा आदि घास उगी हुई थी, वे भरतवंशके श्रेष्ठ पुरुष दुःखसे पीड़ित हो द्रौपदीके साथ बैठे और धनंजय अर्जुनके लिये चिन्ता करते हुए अत्यन्त दु:खमें भरे अश्रुगदूगद कण्ठसे उन्हींकी बातें करने लगे। अर्जुनके वियोगसे पीड़ित उन समस्त पाण्डवोंको शोकसागरने अपनी लहरोंमें डुबो दिया
Mereka meratapi Dhanañjaya (Arjuna); tenggorokan mereka tersedak oleh air mata dan hati mereka amat pedih. Disiksa oleh perpisahan darinya, semuanya seakan ditenggelamkan oleh duka—laksana lautan kesedihan meluap menutupi mereka.
Verse 5
धनंजयवियोगाच्च राज्य भ्रंशाच्च दु:खिता: । अथ भीमो महाबाहुर्युधिष्ठटिमभाषत,पाण्डव राज्य छिन जानेसे तो दुःखी थे ही। अर्जुनके विरहसे वे और भी क्लेशमें पड़ गये थे। उस समय महाबाहु भीमने युधिष्ठिससे कहा--
Karena duka perpisahan dari Dhanañjaya (Arjuna) dan karena kehilangan kerajaan, para Pāṇḍava diliputi nestapa. Maka Bhīma yang berlengan perkasa pun berbicara kepada Yudhiṣṭhira.
Verse 6
निदेशात् ते महाराज गतो5सौ भरतर्षभ: । अर्जुन: पाण्डुपुत्राणां यस्मिन् प्राणा: प्रतिक्ठिता:,“महाराज! आपकी आज्ञासे भरतवंशका रत्न अर्जुन तपस्याके लिये चला गया। हम सब पाण्डवोंके प्राण उसीमें बसते हैं
Wahai Maharaja, atas titahmu, sang banteng di antara Bharata—Arjuna—telah berangkat untuk bertapa. Bagi kami, putra-putra Pāṇḍu, napas kehidupan kami bertumpu padanya.
Verse 7
यस्मिन् विनष्टे पाड्चाला: सह पुत्रैस्तथा वयम् | सात्यकिर्वासुदेवश्च विनश्येयुर्न संशय:,“यदि कहीं अर्जुनका नाश हुआ तो पुत्रोंसहित पांचाल, हम पाण्डव, सात्यकि और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण--ये सब-के-सब नष्ट हो जायँगे
Jika ia (Arjuna) binasa, maka orang-orang Pāñcāla beserta putra-putra mereka, kami para Pāṇḍava, Sātyaki, dan Kṛṣṇa putra Vāsudeva—semuanya akan hancur; tiada keraguan.
Verse 8
योडसौ गच्छति धर्मात्मा बहून् क्लेशान् विचिन्तयन् । भवतन्नियोगाद् बीभत्सुस्ततो दुःखतरं नु किम्,'जो धर्मात्मा अर्जुन अनेक प्रकारके क्लेशोंका चिन्तन करते हुए आपकी आज्ञासे तपस्याके लिये गया, उससे बढ़कर दुःख और क्या होगा?
Sang berhati dharma itu—Bībhatsu (Arjuna)—telah pergi untuk bertapa atas perintahmu, sambil memikirkan banyak kesukaran. Duka apakah yang dapat melebihi ini?
Verse 9
यस्य बाहू समाश्रित्य वयं सर्वे महात्मन: । मन्यामहे जितानाजोौ परानू प्राप्तां च मेदिनीम्,“जिस महापराक्रमी अर्जुनके बाहुबलका आश्रय लेकर हम संग्राममें शत्रुओंको पराजित और इस पृथ्वीको अपने अधिकारमें आयी हुई समझते हैं
Bersandar pada lengan perkasa sang mahatma itu, kami semua menganggap bahwa dalam perang musuh-musuh telah ditaklukkan, dan bumi ini pun telah datang ke dalam hak kami.
Verse 10
यस्य प्रभावान्न मया सभामध्ये धनुष्मत: । नीता लोकममुं सर्वे धार्तराष्ट्रा: ससौबला:,“जिस धरनुर्धर वीरके प्रभावसे प्रभावित होकर मैंने सभामें शकुनिसहित समस्त धृतराष्ट्रपुत्रोंको तुरंत ही यमलोक नहीं भेज दिया
Tergetar oleh kedahsyatan sang pahlawan pemanah itu, di tengah balairung kerajaan aku tidak serta-merta mengirim semua putra Dhṛtarāṣṭra—bersama Śakuni—ke alam Yama.
Verse 11
ते वयं बाहुबलिन: क्रोधमुत्थितमात्मन: । सहामहे भवन्न्मूलं वासुदेवेन पालिता:,“हम सब लोग बाहुबलसे सम्पन्न हैं और भगवान् वासुदेव हमारे रक्षक हैं तो भी हम आपके कारण अपने उठे हुए क्रोधको चुपचाप सह लेते हैं
Kami adalah orang-orang berlengan perkasa; amarah pun bangkit dalam diri kami karena engkau. Namun, berada dalam lindungan dan kendali Vāsudeva, kami menahannya dalam diam.
Verse 12
वयं हि सह कृष्णेन हत्वा कर्णमुखान् परान् | स्वबाहुविजितां कृत्स्नां प्रशासेम वसुन्धराम्,“भगवान् श्रीकृष्णके साथ हमलोग कर्ण आदि शत्रुओंको मारकर अपने बाहुबलसे जीती हुई सम्पूर्ण पृथ्वीका शासन कर सकते हैं
Sungguh, bersama Kṛṣṇa kami dapat menumpas para musuh yang dipimpin Karṇa, lalu memerintah seluruh bumi yang ditaklukkan oleh kekuatan lengan kami sendiri.
Verse 13
भवतो द्यूतदोषेण सर्वे वयमुपप्लुता: । अहीनपौरुषा बाला बलिभिबलवत्तरा:,“आपके जूएके दोषसे हमलोग पुरुषार्थयुक्त होकर भी दीन बन गये हैं और वे मूर्ख दुर्योधन आदि भेंटमें मिले हुए हमारे धनसे सम्पन्न हो इस समय अधिक बलशाली बन गये हैं
Karena cela perjudianmu, kami semua tertimpa bencana dan direndahkan; meski keberanian kami tak sirna, kami menjadi tak berdaya laksana anak-anak. Sedangkan mereka, setelah kaya oleh harta yang dimenangkan dari kami, kini kian bertambah kuat.
Verse 14
क्षात्रं धर्म महाराज त्वमवेक्षितुमहसि । न हि धर्मो महाराज क्षत्रियस्यथ वनाश्रय:,“महाराज! आप क्षत्रियरधर्मकी ओर तो देखिये। इस प्रकार वनमें रहना कदापि क्षत्रियोंका धर्म नहीं है
Wahai Maharaja, patutlah engkau menimbang dharma ksatria; sebab, wahai Maharaja, berlindung di hutan bukanlah dharma seorang kṣatriya.
Verse 15
राज्यमेव पर धर्म क्षत्रियस्य विदुर्बुधा: । स क्षत्रधर्मविद् राजा मा धर्म्यान्नीनश: पथ:,“विद्वानोंने राज्यको ही क्षत्रियका सर्वोत्तम धर्म माना है। आप क्षत्रियधर्मके ज्ञाता नरेश हैं। धर्मके मार्गसे विचलित न होइये
Orang bijak mengetahui bahwa dharma tertinggi seorang kṣatriya adalah memegang dan menegakkan kerajaan itu sendiri. Engkau raja yang memahami tata-dharma kṣatriya; jangan menyimpang dari jalan yang benar.
Verse 16
प्राग् द्वादशसमा राजन् धार्तराष्ट्रानू निहन्महि । निवर्त्य च वनात् पार्थमानाय्य च जनार्दनम्,“राजन्! हमलोग बारह वर्ष बीतनेके पहले ही अर्जुनको वनसे लौटाकर और भगवान् श्रीकृष्णको बुलाकर धृतराष्ट्रके पुत्रोंका संहार कर सकते हैं
Wahai Raja, bahkan sebelum genap dua belas tahun, kita dapat menumpas putra-putra Dhṛtarāṣṭra—dengan memulangkan Pārtha dari hutan dan memanggil Janārdana (Kṛṣṇa).
Verse 17
व्यूढानीकान् महाराज जवेनैव महामते । धार्तराष्ट्राममुं लोकं गमयामि विशाम्पते,“महाराज! महामते! धृतराष्ट्रके पुत्र कितनी ही सेनाओंकी मोर्चाबन्दी क्यों न कर लें, हम उन्हें शीघ्र यमलोकका पथिक बनाकर ही छोड़ेंगे। मैं स्वयं ही शकुनिसहित समस्त धृतराष्ट्रपुत्रोंको मार डालूँगा। दुर्योधन, कर्ण अथवा दूसरा जो कोई योद्धा मेरा सामना करेगा, उसे भी अवश्य मारूँगा
Wahai Maharaja, wahai yang arif—sekalipun putra-putra Dhṛtarāṣṭra menyusun bala tentara dalam formasi rapat, akan kukirim mereka dengan segera ke alam sana (alam maut), wahai pelindung rakyat.
Verse 18
सर्वानहं हनिष्यामि धार्तराष्ट्रानूस सौबलान् । दुर्योधनं च कर्ण च यो वान्य: प्रतियोत्स्यते,“महाराज! महामते! धृतराष्ट्रके पुत्र कितनी ही सेनाओंकी मोर्चाबन्दी क्यों न कर लें, हम उन्हें शीघ्र यमलोकका पथिक बनाकर ही छोड़ेंगे। मैं स्वयं ही शकुनिसहित समस्त धृतराष्ट्रपुत्रोंको मार डालूँगा। दुर्योधन, कर्ण अथवा दूसरा जो कोई योद्धा मेरा सामना करेगा, उसे भी अवश्य मारूँगा
Akan kubunuh mereka semua—putra-putra Dhṛtarāṣṭra beserta kaum Saubala; juga Duryodhana dan Karṇa; dan siapa pun yang lain yang berani maju bertempur melawanku.
Verse 19
मया प्रशमिते पश्चात् त्वमेष्यसि वनात् पुनः । एवं कृते न ते दोषा भविष्यन्ति विशाम्पते,“मेरे द्वारा शत्रुओंका संहार हो जानेपर आप फिर तेरह वर्षके बाद वनसे चले आइयेगा। प्रजानाथ! ऐसा करनेपर आपको दोष नहीं लगेगा
Setelah aku menenangkan (mengakhiri) kekuatan musuh, engkau boleh kembali lagi dari hutan. Dengan bertindak demikian, wahai pelindung rakyat, tiada cela akan melekat padamu.
Verse 20
यज्ैश्न विविधैस्तात कृतं पापमरिंदम | अवधूय महाराज गच्छेम स्वर्गमुत्तमम्,“तात! शत्रुदमन! महाराज! हम नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान करके अपने किये हुए पापको धो-बहाकर उत्तम स्वर्गलोकमें चलेंगे
Waiśampāyana berkata: “Wahai anakku—penakluk musuh, wahai Maharaja—setelah melaksanakan berbagai macam yajña, kita akan membasuh dosa yang telah kita perbuat, lalu berangkat menuju surga tertinggi.”
Verse 21
एवमेतद् भवेद् राजन् यदि राजा न बालिश: । अस्माकं दीर्घसूत्र: स्याद् भवान् धर्मपरायण:,“राजन! यदि ऐसा हो तो आप हमारे धर्मपरायण राजा अविवेकी और दीर्घसूत्री नहीं समझे जायूँगे
“Demikianlah seharusnya, wahai Raja—jika sang raja tidak bodoh. Maka engkau, yang berpegang pada dharma, tidak akan kami nilai sebagai orang yang lamban bertindak dan gemar menunda-nunda.”
Verse 22
निकृत्या निकृतिप्रज्ञा हन्तव्या इति निश्चय: । न हि नैकृतिकं हत्वा निकृत्या पापमुच्यते,'शठता करने या जाननेवाले शत्रुओंको शठताके द्वारा ही मारना चाहिये, यह एक सिद्धान्त है। जो स्वयं दूसरोंपर छल-कपटका प्रयोग करता है, उसे छलसे भी मार डालनेमें पाप नहीं बताया गया है
Ini adalah ketetapan: mereka yang berbuat tipu daya atau mahir dalam tipu daya patut dibunuh dengan tipu daya; sebab membinasakan si penipu dengan kelicikan tidak disebut dosa.
Verse 23
तथा भारत धर्मेषु धर्मज्शैरिह दृश्यते । अहोरात्रं महाराज तुल्यं संवत्सरेण ह,“भरतवंशी महाराज! धर्मशास्त्रमें इसी प्रकार धर्मपरायण धर्मज्ञ पुरुषोंद्वारा यहाँ एक दिन-रात एक संवत्सरके समान देखा जाता है
“Demikianlah, wahai keturunan Bharata: dalam perkara dharma, orang bijak yang teguh pada dharma memandangnya demikian—wahai Maharaja, satu siang dan satu malam dianggap setara dengan satu tahun penuh.”
Verse 24
तथैव वेदवचन श्रूयते नित्यदा विभो । संवत्सरो महाराज पूर्णो भवति कृच्छृत:,'प्रभो! महाराज! इसी प्रकार सदा यह वैदिक वचन सुना जाता है कि कृच्छृव्रतके अनुष्ठानसे एक वर्षकी पूर्ति हो जाती है
“Demikian pula, wahai yang perkasa—wahai Maharaja—sabda Weda ini senantiasa terdengar: dengan menjalankan tapa Kṛcchra, seakan-akan genaplah satu tahun penuh (dalam pahala).”
Verse 25
यदि वेदा: प्रमाणास्ते दिवसादूर्ध्वमच्युत । त्रयोदश समा: कालो ज्ञायतां परिनिष्ठित:,“अच्युत! यदि आप वेदको प्रमाण मानते हैं तो तेरहवें दिनके बाद ही तेरह वर्षोंका समय बीत गया, ऐसा समझ लीजिये
Waiśampāyana berkata: “Wahai Acyuta, jika engkau menerima Weda sebagai otoritas, maka ketahuilah dengan pasti: setelah hari ketiga belas selesai, genaplah masa tiga belas tahun itu.”
Verse 26
कालो दुर्योधन हन्तुं सानुबन्धमरिंदम । एकाग्रां पृथिवीं सर्वा पुरा राजन् करोति सः:,'शत्रुदमन! यह दुर्योधनको उसके सगे-सम्बन्धियों-सहित मार डालनेका अवसर आया है। राजन्! वह सारी पृथ्वीको जबतक एक सूत्रमें बाँध ले, उसके पहले ही यह कार्य कर लेना चाहिये
Waiśampāyana berkata: “Wahai penakluk musuh, inilah saatnya menumbangkan Duryodhana beserta seluruh sekutu dan kerabatnya. Wahai Raja, hal ini harus dilakukan sebelum ia berhasil menyatukan seluruh bumi di bawah satu kekuasaan.”
Verse 27
द्यूतप्रियेण राजेन्द्र तथा तद् भवता कृतम् | प्रायेणाज्ञातचर्यायां वयं सर्वे निपातिता:,'राजेन्द्र! जूएके खेलमें आसक्त होकर आपने ऐसा अनर्थ कर डाला कि प्राय: हम सब लोगोंको अज्ञातवासके संकटमें लाकर पटक दिया
Waiśampāyana berkata: “Wahai raja terbaik, karena engkau gemar berjudi, engkau bertindak demikian. Akibatnya, hampir kita semua terjerumus ke dalam bahaya hidup dalam penyamaran (incognito).”
Verse 28
नतं देशं प्रपश्यामि यत्र सो5स्मान् सुदुर्जन: । न विज्ञास्यति दुष्टात्मा चारैरिति सुयोधन:,“मैं ऐसा कोई देश या स्थान नहीं देखता, जहाँ अत्यन्त दुष्टचित्त, दुरात्मा दुर्योधन अपने गुप्तचरोंद्वारा हमलोगोंका पता न लगा ले। वह नीच नराधम हम सब लोगोंका गुप्त निवास जान लेनेपर पुनः अपनी कपटपूर्ण नीतिद्वारा हमें इस वनवासमें ही डाल देगा
Waiśampāyana berkata: “Aku tidak melihat negeri mana pun di mana Su-yodhana, si durjana berhati jahat itu, tidak akan menemukan kita melalui para mata-matanya.”
Verse 29
अधिगम्य च सर्वान् नो वनवासमिमं ततः । प्रत्राजयिष्यति पुनर्निकृत्याधमपूरुष:,“मैं ऐसा कोई देश या स्थान नहीं देखता, जहाँ अत्यन्त दुष्टचित्त, दुरात्मा दुर्योधन अपने गुप्तचरोंद्वारा हमलोगोंका पता न लगा ले। वह नीच नराधम हम सब लोगोंका गुप्त निवास जान लेनेपर पुनः अपनी कपटपूर्ण नीतिद्वारा हमें इस वनवासमें ही डाल देगा
Waiśampāyana berkata: “Setelah mengetahui segala hal tentang pembuangan kita di hutan ini, si hina dan licik itu akan kembali, dengan tipu daya, mendorong kita lagi ke dalam pengasingan yang sama.”
Verse 30
यद्यस्मानभिगच्छेत पाप: स हि कथंचन । अज्ञातचर्यामुत्तीर्णान् दृष्टवा च पुनराह्ययेत्,“यदि वह पापी किसी प्रकार यह समझ ले कि हम अज्ञातवासकी अवधि पार कर गये हैं, तो वह उस दशामें हमें देखकर पुनः आपको ही जूआ खेलनेके लिये बुलायेगा
Waiśampāyana berkata: “Jika orang jahat itu entah bagaimana mengetahui bahwa masa penyamaran kami telah selesai, maka setelah melihat kami, ia akan kembali memanggilmu untuk bermain dadu.”
Verse 31
द्यूतेन ते महाराज पुनर्दययूतमवर्तत । भवांश्व पुनराहूतो द्यूते नैवापनेष्यति,“महाराज! आप एक बार जूएके संकटसे बचकर दुबारा द्यूतक्रीडामें प्रवृत्त हो गये थे, अतः मैं समझता हूँ, यदि पुनः आपका द्यूतके लिये आवाहन हो तो आप उससे पीछे न हटेंगे
Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, setelah sekali diselamatkan dari bahaya perjudian, engkau kembali berpaling kepada dadu. Karena itu kupahami: bila engkau dipanggil lagi ke permainan, engkau tidak akan mundur darinya.”
Verse 32
स तथाक्षेषु कुशलो निश्चितो गतचेतन: । चरिष्यसि महाराज वनेषु वसती: पुनः
Waiśampāyana berkata: “Demikianlah, meski engkau mahir dalam permainan dadu, kini tekadmu telah mantap dan pikiranmu tak lagi diguncang oleh keterikatan itu. Karena itu, wahai raja agung, engkau akan kembali tinggal di hutan, menjalani pembuangan.”
Verse 33
“नरेश्वर! वह विवेकशून्य शकुनि जूआ फेंकनेकी कलामें कितना कुशल है, यह आप अच्छी तरह जानते हैं, फिर तो उसमें हारकर आप पुनः वनवास ही भोगेंगे ।। यद्यस्मान् सुमहाराज कृपणान् कर्तुमर्हसि । यावज्जीवमतवेक्षस्व वेदधर्माश्व कृत्सनश:,“महाराज! यदि आप हमें दीन, हीन, कृपण ही बनाना चाहते हैं तो जबतक जीवन है, तबतक सम्पूर्ण वेदोक्त धर्मोंके पालनपर ही दृष्टि रखिये
Waiśampāyana berkata: “Wahai raja! Engkau tahu benar betapa Śakuni yang tak berakal itu amat mahir melempar dadu. Jika engkau kalah olehnya, engkau akan kembali dipaksa menanggung hidup di hutan. Dan wahai raja agung, bila engkau sungguh hendak menjadikan kami papa, maka selama hayat masih ada, arahkanlah pandanganmu hanya pada pelaksanaan sempurna seluruh dharma yang diperintahkan oleh Weda.”
Verse 34
निकृत्या निकृतिप्रज्ञो हन्तव्य इति निश्चय: । अनुज्ञातस्त्वया गत्वा यावच्छक्ति सुयोधनम्,“अपना निश्चय तो यही है कि कपटीको कपटसे ही मारना चाहिये। यदि आपकी आज्ञा हो तो जैसे तृणकी राशिमें डाली हुई आग हवाका सहारा पाकर उसे भस्म कर डालती है, वैसे ही मैं जाकर अपनी शक्तिके अनुसार उस मूढ़ दुर्योधनका वध कर डालूँ, अतः आप मुझे आज्ञा दीजिये
Waiśampāyana berkata: “Keyakinanku telah mantap: seorang penipu yang cerdik dalam tipu daya patut dibinasakan dengan tipu daya itu sendiri. Jika engkau mengizinkan, aku akan pergi dan, sejauh kekuatanku, membunuh Suyodhana (Duryodhana)—seperti api yang dilemparkan ke tumpukan rumput kering, dengan bantuan angin, menjadikannya abu.”
Verse 35
यथैव कक्षमुत्सृष्टो दहेदनिलसारथि: । हनिष्यामि तथा मन्दमनुजानातु मे भवान्,“अपना निश्चय तो यही है कि कपटीको कपटसे ही मारना चाहिये। यदि आपकी आज्ञा हो तो जैसे तृणकी राशिमें डाली हुई आग हवाका सहारा पाकर उसे भस्म कर डालती है, वैसे ही मैं जाकर अपनी शक्तिके अनुसार उस मूढ़ दुर्योधनका वध कर डालूँ, अतः आप मुझे आज्ञा दीजिये
Tekadku begini: si licik patut ditundukkan dengan kelicikan. Jika tuanku mengizinkan, maka sebagaimana api yang disulut pada tumpukan semak kering—ditunggangi angin—membakarnya hingga jadi abu, demikian pula aku akan pergi dan, sejauh dayaku, menewaskan Duryodhana yang dungu itu. Mohon berikan izin kepadaku.
Verse 36
वैशम्पायन उवाच एवं ब्रुवाणं भीम॑ तु धर्मराजो युधिष्ठिर: । उवाच सान्त्वयन् राजा मूर्ध्न्युपात्राय पाण्डवम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराज राजा युधिष्ठिरने उपर्युक्त बातें कहनेवाले पाण्डुनन्दन भीमसेनका मस्तक सूँधकर उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा --
Vaiśampāyana berkata: Wahai Janamejaya! Ketika Bhīma berbicara demikian, Dharma-rāja Yudhiṣṭhira menenangkannya; sang raja, dengan kasih sayang, menunduk mencium (menghirup harum) kepalanya lalu berkata.
Verse 37
असंशयं महाबाहो हनिष्यसि सुयोधनम् । वर्षात् त्रयोदशादूर्ध्व सह गाण्डीवधन्चना,“महाबाहो! इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि तुम तेरहवें वर्षके बाद गाण्डीवधारी अर्जुनके साथ जाकर युद्धमें सुयोधनको मार डालोगे
Wahai yang berlengan perkasa, tak ada keraguan sedikit pun: setelah tahun ketiga belas berlalu, engkau akan pergi berperang bersama pemegang Gāṇḍīva dan menewaskan Suyodhana.
Verse 38
यत् त्वमाभाषसे पार्थ प्राप्त: काल इति प्रभो । अनृतं नोत्सहे वक्तुं न होतन्मम विद्यते,'किंतु शक्तिशाली वीर कुन्तीकुमार! तुम जो यह कहते हो कि सुयोधनके वधका अवसर आ गया है, वह ठीक नहीं है। मैं झूठ नहीं बोल सकता, मुझमें यह आदत नहीं है
Namun, wahai Pārtha yang perkasa, apa yang kau katakan—“waktunya telah tiba untuk membunuh Suyodhana”—tidaklah tepat. Aku tak sanggup mengucapkan dusta; kecenderungan demikian tidak ada padaku.
Verse 39
अन्तरेणापि कौन्तेय निकृतिं पापनिश्चयम् । हन्ता त्वमसि दुर्धर्ष सानुबन्धं सुयोधनम्,“कुन्तीनन्दन! तुम दुर्धर्ष वीर हो, छल-कपटका आश्रय लिये बिना भी पापपूर्ण विचार रखनेवाले सुयोधनको सगे-सम्बन्धियोंसहित नष्ट कर सकते हो”
Wahai putra Kuntī, engkau pahlawan yang tak tertandingi; bahkan tanpa bersandar pada tipu daya, engkau mampu menewaskan Suyodhana yang tekadnya terpancang pada dosa, beserta semua yang terikat padanya.
Verse 40
एवं ब्रुवति भीम॑ तु धर्मराजे युधिष्ठिरे । आजगाम महाभागो बृहदश्वो महानृषि:,धर्मराज युधिष्ठिर जब भीमसेनसे ऐसी बातें कह रहे थे, उसी समय महाभाग महर्षि बृहदश्व वहाँ आ पहुँचे
Ketika Bhima berbicara demikian kepada Dharmaraja Yudhisthira, pada saat itu juga resi agung Bṛhadaśva yang mulia tiba di sana.
Verse 41
तमभिप्रेक्ष्य धर्मात्मा सम्प्राप्तं धर्मचारिणम् । शास्त्रवन्मधुपर्केण पूजयामास धर्मराट्,धर्मात्मा धर्मराज युधिष्ठिरने धर्मानुष्ठान करनेवाले उन महात्माको आया देख शास्त्रीय विधिके अनुसार मधुपर्कद्वारा उनका पूजन किया
Melihat orang saleh yang menapaki dharma itu telah tiba, Raja Yudhisthira yang berjiwa dharma menghormatinya menurut tuntunan śāstra dengan mempersembahkan madhuparka.
Verse 42
आश्चस्तं चैनमासीनमुपासीनो युधिष्ठिर: । अभिप्रेक्ष्य महाबाहुः कृपणं बह्वदभाषत,जब वे आसनपर बैठकर थकावटसे निवृत्त हो चुके अर्थात् विश्राम कर चुके, तब महाबाहु युधिष्ठिर उनके पास ही बैठकर उन्हींकी ओर देखते हुए अत्यन्त दीनतापूर्ण वचन बोले--
Setelah sang resi duduk dan pulih dari lelahnya, Yudhisthira yang berlengan perkasa duduk dekat beliau; menatapnya, ia mengucapkan banyak kata dengan nada amat pilu.
Verse 43
अक्षद्यूते च भगवन् धन राज्यं च मे हृतम् | आहूय निकृतिप्रज्जै: कितवैरक्षकोविदै:,“भगवन्! पासे फेंककर खेले जानेवाले जूएके लिये मुझे बुलाकर छल-कपटमें कुशल तथा पासा डालनेकी कलामें निपुण धूर्त जुआरियोंने मेरे सारे धन तथा राज्यका अपहरण कर लिया है
“Wahai Bhagavan, dalam permainan dadu hartaku dan kerajaanku dirampas. Aku dipanggil, lalu para penjudi licik—cerdik dalam tipu daya dan mahir melempar dadu—merampok seluruh milikku.”
Verse 44
अनक्षज्ञस्य हि सतो निकृत्या पापनिश्चयै: । भार्या च मे सभां नीता प्राणेभ्योडपि गरीयसी,“मैं जूएका मर्मज्ञ नहीं हूँ। फिर भी पापपूर्ण विचार रखनेवाले उन दुष्टोंके द्वारा मेरी प्राणोंसे भी अधिक गौरवशालिनी पत्नी द्रौपदी केश पकड़कर भरी सभामें लायी गयी
“Aku bukan ahli dalam seluk-beluk permainan dadu; namun dengan tipu daya, orang-orang yang berketetapan dosa itu menyeret istriku—yang lebih berharga bagiku daripada nyawaku—ke balairung sidang.”
Verse 45
पुनर्ययतेन मां जित्वा वनवासं सुदारुणम् । प्रावत्राजयन् महारण्यमजिनै: परिवारितम्,“एक बार जूएके संकटसे बच जानेपर पुनः द्यूतका आयोजन करके उन्होंने मुझे जीत लिया और मृगचर्म पहनाकर वनवासका अत्यन्त दारुण कष्ट भोगनेके लिये इस महान् वनमें निर्वासित कर दिया
Sekali lagi mereka mengadakan permainan dadu dan mengalahkanku; lalu mereka memakaikanku kulit rusa dan mengusirku ke rimba raya ini untuk menanggung pembuangan yang amat kejam.
Verse 46
अहं वने दुर्वसतीर्वसन् परमदु:खित: । अक्षद्यूताधिकारे च गिर: शृण्वन् सुदारुणा:,“मैं अत्यन्त दुःखी हो बड़ी कठिनाईसे वनमें निवास करता हूँ। जिस सभामें जूआ खेलनेका आयोजन किया गया था, वहाँ प्रतिपक्षी पुरुषोंके मुखसे मुझे अत्यन्त कठोर बातें सुननी पड़ी हैं। इसके सिवा द्यूत आदि कार्योंका उल्लेख करते हुए मेरे दुःखातुर सुहृदोंने जो संतापसूचक बातें कही हैं, वे सब मेरे हृदयमें स्थित हैं। मैं उन सब बातोंको याद करके सारी रात चिन्तामें निमग्न रहता हूँ
Aku tinggal di hutan dalam keadaan yang keras, diliputi duka yang terdalam. Dan di balairung tempat permainan dadu itu berlangsung, aku harus mendengar kata-kata yang amat kejam dari pihak lawan. Sengat kenangan itu tertancap di hatiku; mengingatnya, sepanjang malam aku tenggelam dalam kegelisahan.
Verse 47
आततंतानां सुहृदां वाचो द्यूतप्रभूति शंसताम् । अहं हदि श्रिता: स्मृत्वा सर्वरात्रीविचिन्तयन्,“मैं अत्यन्त दुःखी हो बड़ी कठिनाईसे वनमें निवास करता हूँ। जिस सभामें जूआ खेलनेका आयोजन किया गया था, वहाँ प्रतिपक्षी पुरुषोंके मुखसे मुझे अत्यन्त कठोर बातें सुननी पड़ी हैं। इसके सिवा द्यूत आदि कार्योंका उल्लेख करते हुए मेरे दुःखातुर सुहृदोंने जो संतापसूचक बातें कही हैं, वे सब मेरे हृदयमें स्थित हैं। मैं उन सब बातोंको याद करके सारी रात चिन्तामें निमग्न रहता हूँ
Kata-kata para sahabatku—yang diucapkan dalam kepedihan, mengenang malapetaka yang bermula dari permainan dadu—kusimpan di dalam hati. Mengingatnya berulang-ulang, sepanjang malam aku tenggelam dalam renungan yang gelisah.
Verse 48
यस्मिंश्नैव समस्तानां प्राणा गाण्डीवधन्चनि । विना महात्मना तेन गतसत्त्व इवाभवम्,“इधर जिस गाण्डीव धनुषधारी अर्जुनमें हम सबके प्राण बसते हैं, वह भी हमसे अलग है। महात्मा अर्जुनके बिना मैं निष्प्राण-सा हो गया हूँ
Dia yang menjadi tempat bersemayamnya napas hidup kami semua—Arjuna, sang mahatma, pemegang busur Gāṇḍīva—telah terpisah dari kami. Tanpa Arjuna yang mulia itu, aku seakan kehilangan daya hidup.
Verse 49
कदा द्रक्ष्यामि बीभत्सुं कृतास्त्रं पुनरागतम् । प्रियवादिनमक्षुद्रं दयायुक्तमतन्द्रित:,“मैं सदा निरालस्यभावसे यही सोचा करता हूँ कि श्रेष्ठ, दयालु और प्रियवादी अर्जुन कब अस्त्रविद्या सीखकर फिर यहाँ आयेगा और मैं उसे भर आँख देखूँगा
Kapan aku akan melihat Bībhatsu (Arjuna) kembali—setelah menuntaskan ilmu senjata—lembut tutur katanya, luhur dan tak picik, penuh welas asih, serta senantiasa waspada? Kerinduan itu terus kupikirkan tanpa henti.
Verse 50
अस्ति राजा मया कश्चिदल्पभाग्यतरो भुवि | भवता दृष्टपूर्वो वा श्रुतपूर्वोडपि वा क्वचित् | न मत्तो दुःखिततर: पुमानस्तीति मे मति:,“क्या मेरे-जैसा अत्यन्त भाग्यहीन राजा इस पृथ्वीपर कोई दूसरा भी है? अथवा आपने कहीं मेरे-जैसे किसी राजाको पहले कभी देखा या सुना है। मेरा तो यह विश्वास है कि मुझसे बढ़कर अत्यन्त दुःखी मनुष्य दूसरा कोई नहीं है”
Vaiśampāyana berkata: “Di bumi ini aku mengenal seorang raja yang amat malang. Pernahkah engkau di mana pun melihat atau bahkan mendengar seseorang seperti dia? Sebab keyakinanku telah mantap: tiada seorang pun lebih dilanda duka daripada aku.”
Verse 51
इस प्रकार श्रीमह्ा भारत वनपवके अन्तर्गत इन्रलोकाभिगमनपर्वमें धृतराष्टरविलापविषयक इकक््यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ,ब॒हृदश्चव उवाच यद् ब्रवीषि महाराज न मनत्तो विद्यते क्वचित् | अल्पभाग्यतर: कश्रित् युमानस्तीति पाण्डव बृहदश्वच बोले--महाराज पाण्डुनन्दन! तुम जो यह कह रहे हो कि मुझसे बढ़कर अत्यन्त भाग्यहीन कोई पुरुष कहीं भी नहीं है, उसके विषयमें मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा। अनघ! पृथ्वीपते! यदि तुम सुनना चाहो तो मैं उस व्यक्तिका परिचय दूँगा, जो इस पृथ्वीपर तुमसे भी अधिक दुःखी राजा था
Bṛhadaśva berkata: “Wahai Maharaja Pāṇḍava, engkau berkata bahwa tiada seorang pun di mana pun lebih malang darimu. Jika engkau menganggap dirimu yang paling celaka, akan kuceritakan kepadamu sebuah kisah purba—tentang seorang raja di bumi ini yang bahkan lebih dilanda duka daripada engkau.”
Verse 52
अत्र ते वर्णयिष्यामि यदि शुश्रूषसे5नघ । यस्त्वत्तो दु:खिततरो राजा55सीत् पृथिवीपते,बृहदश्वच बोले--महाराज पाण्डुनन्दन! तुम जो यह कह रहे हो कि मुझसे बढ़कर अत्यन्त भाग्यहीन कोई पुरुष कहीं भी नहीं है, उसके विषयमें मैं तुम्हें एक प्राचीन इतिहास सुनाऊँगा। अनघ! पृथ्वीपते! यदि तुम सुनना चाहो तो मैं उस व्यक्तिका परिचय दूँगा, जो इस पृथ्वीपर तुमसे भी अधिक दुःखी राजा था इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि द्विपञ्चाशत्तमो5ध्याय:
Jika engkau berkenan mendengarkan, wahai yang tanpa cela, akan kuuraikan di sini: pernah ada seorang raja, wahai penguasa bumi, yang lebih dilanda duka daripada engkau.
Verse 53
वैशम्पायन उवाच अथैनमब्रवीद् राजा ब्रवीतु भगवानिति | इमामवस्थां सम्प्राप्तं श्रोतुमिच्छामि पार्थिवम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तब राजा युधिष्ठिरने मुनिसे कहा--“भगवन्! अवश्य कहिये। जो मेरी-जैसी संकटपूर्ण स्थितिमें पहुँचा हुआ हो, उस राजाका चरित्र मैं सुनना चाहता हूँ
Vaiśampāyana berkata: Lalu sang raja berkata kepadanya, “Wahai Bhagavān, silakan bertutur. Aku ingin mendengar kisah penguasa yang telah jatuh ke dalam keadaan sengsara seperti ini.”
Verse 54
ब॒हृदश्च उवाच शृणू राजन्नवहित: सह भ्रातृभिरच्युत । यस्त्वत्तो द:खिततरो राजा55सीत् पृथिवीपते,बृहदश्वने कहा--राजन्! अपने धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले भूपाल! तुम भाइयोंसहित सावधान होकर सुनो। इस पृथ्वीपर जो तुमसे भी अधिक दुःखी राजा था, उसका परिचय देता हूँ
Bṛhadaśva berkata: “Dengarkan dengan saksama, wahai Raja, bersama saudara-saudaramu, wahai yang tak menyimpang dari dharma. Di bumi ini pernah ada seorang raja, wahai penguasa negeri, yang lebih dilanda duka daripada engkau; akan kukatakan siapa dia.”
Verse 55
निषधेषु महीपालो वीरसेन इति श्रुत: । तस्य पुत्रो5भवन्नाम्ना नलो धर्मार्थकोविद:,निषधदेशमें वीरसेन नामसे प्रसिद्ध एक भूपाल हो गये हैं। उन्हींके पुत्रका नाम नल था। जो धर्म और अर्थके तत्त्वज्ञ थे
Di negeri Niṣadha ada seorang raja termasyhur bernama Vīrasena. Putranya bernama Nala, masyhur sebagai orang yang memahami hakikat dharma dan artha—kebajikan dan tata kelola yang bijak.
Verse 56
स निकृत्या जितो राजा पुष्करेणेति न: श्रुतम् वनवासं सुदुःखार्तों भार्यया न्यवसत् सह,हमने सुना है कि राजा नलको उनके भाई पुष्करने छलसे ही जूएके द्वारा जीत लिया था और वे अत्यन्त दुःखसे आतुर हो अपनी पत्नीके साथ वनवासका दुःख भोगने लगे थे
Kami mendengar bahwa Raja Nala dikalahkan oleh Puṣkara dengan tipu daya dalam permainan dadu. Diliputi duka yang amat berat, ia pun menanggung derita pengasingan di hutan bersama istrinya.
Verse 57
न तस्य दासा न रथो न भ्राता न च बान्धवा: । वने निवसतो राजज्ल्िष्यन्ते सम कदाचन,राजन्! उनके साथ न सेवक थे न रथ, न भाई थे न बान्धव। वनमें रहते समय उनके पास ये वस्तुएँ कदापि शेष नहीं थीं
Wahai Raja, ia tidak memiliki pelayan, tidak pula kereta, tidak ada saudara, dan tiada kerabat. Selama tinggal di hutan, penopang-penopang semacam itu tak pernah tersisa padanya.
Verse 58
भवान् हि संवृतो वीरैर्भ्रातृभिदेवसम्मितै: । ब्रह्मकल्पैर्द्धिजाग्रयैश्व तस्मान्नाहसि शोचितुम्
Engkau dikelilingi oleh saudara-saudara pahlawan yang setara para dewa, dan juga ditopang oleh para brāhmaṇa utama yang laksana Brahmā. Karena itu, engkau tidak patut berduka.
Verse 59
तुम तो देवतुल्य पराक्रमी वीर भाइयोंसे घिरे हुए हो। ब्रह्माजीके समान तेजस्वी श्रेष्ठ ब्राह्मण तुम्हारे चारों ओर बैठे हुए हैं। अतः तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ।। युधिछिर उवाच विस्तरेणाहमिच्छामि नलस्य सुमहात्मन: । चरितं वदतां श्रेष्ठ तन्ममाख्यातुमहसि,युधिष्ठिर बोले--वक्ताओंमें श्रेष्ठ मुने! मैं उत्तम महामना राजा नलका चरित्र विस्तारके साथ सुनना चाहता हूँ। आप मुझे बतानेकी कृपा करें
Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai yang terbaik di antara para penutur, aku ingin mendengar dengan rinci riwayat Raja Nala yang berhati agung. Berkenanlah engkau menuturkannya kepadaku.”
Nala must honor a prior promise to act as messenger for divine suitors while personally experiencing attraction to Damayantī; the dilemma is how to execute dūta-duty truthfully without manipulating her choice or violating self-restraint.
The chapter models that ethical action is defined by fidelity to truth and role-obligation under internal pressure; desire is acknowledged as a force but is governed through restraint and transparent communication.
No explicit phalaśruti appears in the provided verses; the meta-significance is implicit—this unit functions as an exemplum within the parva, illustrating how satya and disciplined agency stabilize narrative and moral order.