Adhyaya 206
Vana ParvaAdhyaya 20629 Verses

Adhyaya 206

Vyādha–Brāhmaṇa Saṃvāda: Śāpa, Vṛtta-Dharma, and Counsel Against Viṣāda (Grief)

Upa-parva: Vyādha-Dharma Upākhyāna (The Hunter’s Discourse on Dharma)

Chapter 206 records a structured ethical exchange. The vyādha recounts being cursed by a ṛṣi and seeking appeasement; the ṛṣi confirms the curse’s inevitability yet grants anugraha: the vyādha will be dharma-knowing even in a śūdra birth, attain excellence through devoted service to aged parents, retain memory of prior lives, and eventually regain dvija status after the curse’s exhaustion. A brāhmaṇa interlocutor generalizes the teaching: humans encounter pleasure and pain; one should not succumb to longing or despair, and karmic defects can drive harsh destinies. The discourse then pivots to a normative criterion of identity: a brāhmaṇa engaging in degrading actions becomes śūdra-like, while a śūdra established in restraint, truth, and dharma is to be regarded as brāhmaṇa by conduct. The vyādha offers practical psychology: mental suffering is countered by wisdom, bodily suffering by medicine; grief is likened to a potent poison that destroys the unreflective; effective action requires non-despair, seeking remedies without fixation. The chapter closes with mutual recognition of the vyādha’s steadiness, a benediction to remain vigilant in dharma, and Mārkaṇḍeya’s summative report to Yudhiṣṭhira, who expresses admiration and continued thirst for dharmic instruction.

Chapter Arc: युधिष्ठिर, मार्कण्डेय से विनयपूर्वक पूछते हैं—पतिव्रता स्त्रियों का ‘सूक्ष्म, धर्म्य, तत्त्वतः’ माहात्म्य क्या है, और वह कैसे संभव होता है। → मार्कण्डेय उत्तर को लोक-प्रत्यक्ष प्रमाणों से दृढ़ करते हैं—सूर्य, चन्द्र, वायु, पृथ्वी, अग्नि जैसे देवतत्त्व प्रत्यक्ष हैं; वैसे ही गृह-धर्म में गुरुजन और एकपत्नी/पतिव्रता स्त्रियाँ मान्य हैं। पर युधिष्ठिर की जिज्ञासा तीखी होती जाती है: क्रूर स्वभाव वाले पतियों की सेवा जैसी ‘दुष्कर’ साधना भी स्त्रियाँ कैसे निभाती हैं? → धर्म का तीक्ष्ण निष्कर्ष उभरता है—जो माता-पिता (और व्यापक अर्थ में आश्रित-गुरुजन) की आशा को सफल करता है, वही धर्मवित् है; और पतिव्रता-धर्म की कठिनता इसी में है कि वह प्रतिकूलता में भी शुश्रूषा, सत्य और एकनिष्ठता को नहीं छोड़ती। → मार्कण्डेय पतिव्रता-धर्म को सामाजिक आदर, कीर्ति और इह-पर कल्याण से जोड़कर स्थिर करते हैं—एकपत्नी, सत्यवती, सदाचारिणी स्त्रियाँ जो महान् कार्य करती हैं, वह अत्यन्त कठिन होते हुए भी धर्म का आधार है। → युधिष्ठिर की जिज्ञासा बनी रहती है—इस सिद्धान्त का कोई ठोस उपाख्यान/दृष्टान्त सुनने की अपेक्षा अगले प्रसंग की ओर संकेत करती है।

Shlokas

Verse 1

हू... #&< (9) #ध्टज आ£5-] > यह मार्कण्डेयजीका युधिष्ठिरके प्रति द्वापरके समय कहा हुआ वचन है। उन्होंने त्रेतामें हुए कुम्भकर्णकी उपमा दी है। पज्चाधिकद्विशततमो< ध्याय: पतिव्रता स्त्री तथा पिता-माताकी सेवाका माहात्म्य वैशम्पायन उवाच ततो युधिष्छिरो राजा मार्कण्डेयं महाद्युतिम्‌ । पप्रच्छ भरतश्रेष्ठ धर्मप्रश्न॑ सुदुर्विदम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने महातेजस्वी मार्कण्डेय मुनिसे धर्मविषयक प्रश्न किया, जो समझनेमें अत्यन्त कठिन था

Vaiśampāyana berkata: Kemudian Raja Yudhiṣṭhira, yang terbaik di antara keturunan Bharata, menanyai resi Mārkaṇḍeya yang bercahaya mulia—sebuah pertanyaan tentang dharma yang halus dan amat sukar dipahami.

Verse 2

श्रोतुमिच्छामि भगवन्‌ स्त्रीणां माहात्म्यमुत्तमम्‌ | कथ्यमानं त्वया विप्र सूक्ष्मं धर्म्य च तत्त्वत:,वे बोले--“भगवन्‌! मैं आपके मुखसे (पतिव्रता) स्त्रियोंके सूक्ष्म, धर्मसम्मत एवं उत्तम माहात्म्यका यथार्थ वर्णन सुनना चाहता हूँ

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Bhagavan, aku ingin mendengar dari mulutmu kemuliaan tertinggi para perempuan. Wahai brāhmaṇa, jelaskanlah itu dengan halus, selaras dengan dharma, dan sesuai kebenaran hakikatnya.”

Verse 3

प्रत्यक्षमिह विप्रषें देवा दृश्यन्ति सत्तम | सूर्याचन्द्रमसौ वायु: पृथिवी वदह्निरेव च,“भगवन! श्रेष्ठ ब्रह्मर्ष] इस जगत्‌में सूर्य, चन्द्रमा, वायु, पृथिवी, अग्नि, पिता, माता और गुरु--ये प्रत्यक्ष देवता दिखायी देते हैं। भूगुनन्दन! इसके सिवा अन्य जो देवतारूपसे स्थापित देवविग्रह हैं, वे भी प्रत्यक्ष देवताओंकी ही कोटियें हैं"

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai brahmarṣi, wahai yang terbaik di antara orang saleh, di dunia ini para dewa tampak secara langsung: Matahari dan Bulan, Angin, Bumi, dan Api.”

Verse 4

पिता माता च भगवन्‌ गुरुरेव च सत्तम | यच्चान्यद्‌ देवविहितं तच्चापि भूगुनन्दन,“भगवन! श्रेष्ठ ब्रह्मर्ष] इस जगत्‌में सूर्य, चन्द्रमा, वायु, पृथिवी, अग्नि, पिता, माता और गुरु--ये प्रत्यक्ष देवता दिखायी देते हैं। भूगुनन्दन! इसके सिवा अन्य जो देवतारूपसे स्थापित देवविग्रह हैं, वे भी प्रत्यक्ष देवताओंकी ही कोटियें हैं"

Yudhiṣṭhira berkata: “Wahai Bhagavan, wahai yang terbaik, ayah, ibu, dan juga guru adalah dewa yang nyata. Dan wahai kebanggaan keturunan Bhṛgu, apa pun yang ditetapkan oleh ketentuan ilahi sebagai wujud para dewa, itu pun termasuk dalam golongan keilahian yang tampak.”

Verse 5

मान्या हि गुरव: सर्वे एकपत्न्यस्तथा स्त्रिय: । पतिव्रतानां शश्रूषा दुष्करा प्रतिभाति मे,“समस्त गुरुजन और पतिव्रता नारियाँ भी समादरके योग्य हैं। पतिव्रता स्त्रियाँ अपने पतिकी जैसी सेवा-शुश्रूषा करती हैं; वह दूसरे किसीके लिये मुझे अत्यन्त कठिन प्रतीत होती है

Semua guru patut dimuliakan; demikian pula para perempuan dan mereka yang setia pada satu pasangan. Namun, pengabdian dan pelayanan seorang istri yang pativrata tampak bagiku amat sukar dilakukan.

Verse 6

पतिव्रतानां माहात्म्यं वक्तुमहसि न: प्रभो । निरुद्धय चेन्द्रियग्रामं मन: संरुध्य चानघ,'प्रभो! आप अब हमें पतिव्रता स्त्रियोंकी महिमा सुनावें। निष्पाप सहर्ष] जो अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखती हुई मनको वशमें करके अपने पतिका देवताके समान ही चिन्तन करती रहती हैं, वे नारियाँ धन्य हैं। प्रभो! भगवन्‌! उनका वह त्याग और सेवाभाव मुझे तो अत्यन्त कठिन जान पड़ता है

Wahai Tuan, Engkaulah yang patut menuturkan kepada kami kebesaran para istri pativrata. Wahai yang tanpa cela, mereka mengekang segenap indera dan menundukkan batin—jelaskanlah kemuliaan mereka.

Verse 7

पतिं दैवतवच्चापि चिन्तयन्त्य: स्थिता हि या: । भगवन्‌ दुष्करं त्वेतत्‌ प्रतिभाति मम प्रभो,'प्रभो! आप अब हमें पतिव्रता स्त्रियोंकी महिमा सुनावें। निष्पाप सहर्ष] जो अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखती हुई मनको वशमें करके अपने पतिका देवताके समान ही चिन्तन करती रहती हैं, वे नारियाँ धन्य हैं। प्रभो! भगवन्‌! उनका वह त्याग और सेवाभाव मुझे तो अत्यन्त कठिन जान पड़ता है

Para perempuan yang teguh, yang senantiasa memandang dan merenungkan suaminya laksana dewa—wahai Yang Mulia, wahai Tuan—hal itu tampak bagiku amat sukar.

Verse 8

मातापित्रोश्व शुश्रूषा स्त्रीणां भर्तरि च द्विज । स्त्रीणां धर्मात्‌ सुघोराद्धि नान्‍्यं पश्यामि दुष्करम्‌,“ब्रह्मन! पुत्रोंद्वारा माता-पिताकी सेवा तथा स्त्रियोंद्वारा की हुई पतिकी सेवा बहुत कठिन है। स्त्रियोंक इस कठोर धर्मसे बढ़कर और कोई दुष्कर कार्य मुझे नहीं दिखायी देता है

Wahai dwija, bakti seorang anak kepada ibu dan ayah, dan bakti seorang istri kepada suaminya—sungguh berat. Aku tidak melihat tugas yang lebih sukar daripada dharma yang begitu keras yang dipikul para perempuan.

Verse 9

साध्वाचारा: स्त्रियो ब्रह्मन्‌ यत्‌ कुर्वन्ति सदा55दृता: । दुष्करं खलु कुर्वन्ति पितरं मातरं च वै

Wahai Brāhmaṇa, para perempuan yang berperilaku luhur, yang senantiasa bertindak dengan hormat, sesungguhnya melakukan pekerjaan yang amat sukar—mereka menanggung dan melayani ayah dan ibu sekaligus.

Verse 10

कुक्षिणा दश मासांश्व गर्भ संधारयन्ति या:

Waiśampāyana berkata: “Para perempuan yang mengandung anak di dalam rahim selama sepuluh bulan…”

Verse 11

संशयं परम॑ प्राप्प वेदनामतुलामपि,“भगवन्‌! अपनेको भारी प्राणसंकटमें डालकर और अतुल वेदनाको सहकर नारियाँ बड़े कष्टसे संतान उत्पन्न करती हैं! विप्रवर! फिर बड़े स्नेहले उनका पालन भी करती हैं

Setelah jatuh ke dalam keraguan yang paling dalam, (muncul renungan): “Wahai Yang Mulia! Perempuan, dengan menjerumuskan diri ke dalam bahaya nyawa yang berat dan menanggung derita yang tak terukur, melahirkan anak dengan kesukaran besar; lalu, wahai brahmana terbaik, mereka pun membesarkan mereka dengan kasih sayang yang amat dalam.”

Verse 12

प्रजायते सुतान्‌ नार्यो दुःखेन महता विभो । पुष्णन्ति चापि महता स्नेहेन द्विजपुज्रव,“भगवन्‌! अपनेको भारी प्राणसंकटमें डालकर और अतुल वेदनाको सहकर नारियाँ बड़े कष्टसे संतान उत्पन्न करती हैं! विप्रवर! फिर बड़े स्नेहले उनका पालन भी करती हैं

Waiśampāyana berkata: “Wahai yang perkasa, perempuan melahirkan putra-putra hanya melalui penderitaan besar. Dan wahai brahmana utama, kemudian mereka memelihara dan membesarkan mereka dengan kasih sayang yang amat besar.”

Verse 13

याक्ष क्र्रेषु सत्त्वेषु वर्तमाना जुगुप्सिता: | स्वकर्म कुर्वन्ति सदा दुष्करं तच्च मे मतम्‌,“जो सती-साध्वी स्त्रियाँ क्रूर स्वभावके पतियोंकी सेवामें रहकर उनके तिरस्कारका पात्र बनकर भी सदा अपने सती-धर्मका पालन करती रहती हैं, वह तो मुझे और भी अत्यन्त कठिन प्रतीत होता है

Waiśampāyana berkata: “Para perempuan berbudi yang hidup bersama suami bersifat kejam—meski menjadi sasaran hinaan—namun senantiasa menjalankan kewajiban mereka sebagai istri setia; menurutku, itulah yang lebih sukar lagi.”

Verse 14

क्षत्रधर्मसमाचारतत्त्वं व्याख्याहि मे द्विज । धर्म: सुदुर्लभो विप्र नृशंसेन महात्मनाम्‌,“ब्रह्म! आप मुझे क्षत्रियोंके धर्म और आचारका तत्त्व भी विस्तारपूर्वक बताइये। विप्रवर! जो क्रूर स्वभावके मनुष्य हैं, उनके लिये महात्माओंका धर्म अत्यन्त दुर्लभ है

“Wahai dwija, jelaskan kepadaku hakikat dharma dan tata laku para kṣatriya. Wahai brahmana, bagi manusia yang berhati kejam, dharma para mahātmā sungguh amat sukar diperoleh.”

Verse 15

एतदिच्छामि भगवनू प्रश्न॑ प्रश्नविदां वर | श्रीतुं भूुगुकुलश्रेष्ठ शुश्रूषे तव सुव्रत,भगवन्‌! भृूगुकुलशिरोमणे! आप उत्तम व्रतके पालक और प्रश्नका समाधान करनेवाले दिद्वानोंमें श्रेष्ठ हैं। मैंने जो प्रश्न आपके सम्मुख उपस्थित किया है, उसीका उत्तर मैं आपसे सुनना चाहता हूँ

Wahai Yang Mulia, terbaik di antara para pemecah persoalan; wahai yang terdepan dari garis Bhṛgu; wahai pemegang tapa-brata yang luhur—aku ingin mendengar tepat hal ini. Wahai Bhagavan, permata mahkota kaum Bhṛgu, jawaban atas pertanyaan yang telah kuajukan di hadapanmu itulah yang ingin kudengar darimu; aku siap mendengarkan dan melayanimu.

Verse 16

मार्कण्डेय उवाच हन्त ते5हं समाख्यास्ये प्रश्नमेतं सुदुर्वचम्‌ । तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ गदतस्तन्निबोध मे,मार्कण्डेयजी बोले--भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे इस प्रश्चका विवेचन करना यद्यपि बहुत कठिन है, तो भी मैं अब इसका यथावत्‌ समाधान करूँगा। तुम मेरे मुखसे सुनो

Mārkaṇḍeya berkata: “Baiklah—akan kujelaskan kepadamu pertanyaan ini, meski amat sukar dijawab. Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, pahamilah hakikatnya dari ucapanku ketika aku menerangkannya.”

Verse 17

मातृस्तु गौरवादन्ये पितृनन्ये तु मेनिरे । दुष्करं कुरुते माता विवर्धयति या प्रजा:,कुछ लोग माताओंको गौरवकी दृष्टिसे बड़ी मानते हैं। दूसरे लोग पिताको महत्त्व देते हैं। परंतु माता जो अपनी संतानोंको पाल-पोसकर बड़ा बनाती है, वह उसका कठिन कार्य है

Sebagian orang memandang ibu lebih mulia, sementara yang lain menempatkan ayah lebih utama. Namun ibulah—yang mengasuh dan membesarkan anak-anak hingga dewasa—yang sesungguhnya menanggung pekerjaan paling berat.

Verse 18

तपसा देवतेज्याभिवन्दनेन तितिक्षया । सुप्रशस्तैरुपायैश्वापीहन्ते पितर: सुतान्‌,माता-पिता तपस्या, देवपूजा, वन्दना, तितिक्षा तथा अन्य श्रेष्ठ उपायोंद्वारा भी पुत्रोंको प्राप्त करना चाहते हैं

Dengan tapa, dengan pemujaan kepada para dewa dan penghormatan yang khidmat, dengan kesabaran yang tabah—bahkan dengan berbagai cara lain yang dipuji—orang tua berusaha memperoleh putra.

Verse 19

एवं कृष्छेण महता पुत्र प्राप्य सुदुर्लभम्‌ । चिन्तयन्ति सदा वीर कीदृशो5यं भविष्यति,वीर! इस प्रकार बड़ी कठिनाईसे परम दुर्लभ पुत्रको पाकर लोग सदा इस चिन्तामें डूबे रहते हैं कि न जाने यह किस तरहका होगा

Wahai pahlawan, setelah dengan susah payah yang besar memperoleh seorang putra yang amat sukar didapat, orang-orang senantiasa tenggelam dalam kegelisahan: “Akan menjadi seperti apakah dia kelak?”

Verse 20

आशंसते हि पुत्रेषु पिता माता च भारत । यश: कीर्तिमथैश्वर्य प्रजा धर्म तथैव च,भारत! पिता और माता अपने पुत्रोंके लिये यश, कीर्ति और ऐश्वचर्य, संतान तथा धर्मकी शुभकामना करते हैं

Wahai Bhārata! Seorang ayah dan ibu, mengenai putra-putranya, senantiasa menaruh harapan yang baik: semoga mereka meraih kehormatan dan kemasyhuran, kemakmuran dan kewibawaan, keturunan, serta keteguhan dalam dharma.

Verse 21

तयोराशां तु सफलां यः करोति स धर्मवित्‌ । पिता माता च राजेन्द्र तुष्पतो यस्य नित्यश:

Dialah yang sungguh mengetahui dharma, yang membuat harapan kedua orang tua itu berbuah; wahai raja terbaik, karena dirinya ayah dan ibu senantiasa merasa puas.

Verse 22

नैव यज्ञक्रिया: क॒श्रिन्न श्राद्ध नोपवासकम्‌

Di sini tak seorang pun melaksanakan upacara yajña; tidak pula ada persembahan śrāddha bagi para leluhur; bahkan laku puasa pun tidak dijalankan.

Verse 23

या तु भर्तरि शुश्रूषा तया स्वर्ग जयत्युत । नारीके लिये किसी यज्ञकर्म, श्राद्ध और उपवासकी आवश्यकता नहीं है। वह जो पतिकी सेवा करती है, उसीके द्वारा स्वर्गलोकपर विजय प्राप्त कर लेती है ।। एतत्‌ प्रकरणं राजन्नधिकृत्य युधिष्ठिर,राजा युधिष्छिर! इसी प्रकरणमें पतिव्रताओंके नियत धर्मका वर्णन किया जायगा। तुम सावधान होकर सुनो

Seorang perempuan yang dengan setia melayani suaminya, dengan itulah ia menaklukkan surga; baginya tidak diperlukan lagi secara terpisah upacara yajña, persembahan śrāddha, ataupun tapa seperti berpuasa.

Verse 24

पतिव्रतानां नियतं धर्म चावहित: शूणु,राजा युधिष्छिर! इसी प्रकरणमें पतिव्रताओंके नियत धर्मका वर्णन किया जायगा। तुम सावधान होकर सुनो

Wahai Raja Yudhiṣṭhira, dengarkan dengan saksama dharma yang tetap bagi para pativratā; dalam bagian ini kewajiban yang telah ditetapkan bagi istri-istri yang setia akan diuraikan, maka simaklah dengan penuh perhatian.

Verse 106

नार्य: कालेन सम्भूय किमद्धभततरं ततः । 'स्त्रियाँ अपने उदरमें दस महीनेतक जो गर्भ धारण करती हैं और यथासमय उसको जन्म देती हैं, इससे अद्भुत कार्य और कौन होगा?

Waiśampāyana berkata: “Para perempuan, pada waktunya, mengandung dan pada saat yang tepat melahirkan kehidupan—perbuatan apakah yang lebih menakjubkan daripada ini?”

Verse 204

इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपवके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें धुन्धुमारोपाख्यानविषयक दो सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-204 dalam Vana Parva Mahābhārata, pada bagian ringkasan Mārkaṇḍeya, yang memuat kisah Dhundhumāra.

Verse 205

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि पतिव्रतोपाख्याने पज्चाधिकद्विशततमो 5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेययमास्यापर्वमें पतिव्रतोपाख्यानविषयक दो सौ पॉचवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-205 dalam Vana Parva Mahābhārata, pada bagian ringkasan Mārkaṇḍeya, yakni kisah ‘Pativratā’ (Tale of the Chaste Wife).

Verse 216

इह प्रेत्य च तस्याथ कीर्तिर्धिर्मश्न शाश्वत: । राजेन्द्र! जो उन दोनोंकी आशाको सफल करता है, वही पुत्र धर्मज्ञ है। जिसके माता- पिता उससे सदा संतुष्ट रहते हैं, उसे इहलोक और परलोकमें भी अक्षय कीर्ति और शाश्वत धर्मकी प्राप्ति होती है

Mārkaṇḍeya berkata: “Di dunia ini dan sesudah kematian pun, baginya timbul kemasyhuran yang kekal dan dharma yang lestari. Wahai raja terbaik, putra yang memahami dharma ialah dia yang memenuhi harapan kedua orang tuanya. Ia yang senantiasa membuat ayah dan ibunya puas memperoleh nama baik yang tak binasa serta bagian dharma, di sini maupun di alam sana.”

Verse 963

एकपनन्‍न्यश्न या नार्यों याश्व॒ सत्यं वदन्त्युत । “ब्रह्मम! समाजमें सदा आदर पानेवाली सदाचारिणी स्त्रियाँ जो महान्‌ कार्य करती हैं वह अत्यन्त कठिन है। जो लोग पिता-माताकी सेवा करते हैं उनका कर्म भी बहुत कठिन है। पतिव्रता तथा सत्यवादिनी स्त्रियाँ अत्यन्त कठोर धर्मका पालन करती हैं

Waiśampāyana berkata: “Perempuan yang mengekang diri dalam makan dan laku, serta mereka yang berkata benar, menegakkan disiplin yang berat. Perempuan-perempuan saleh yang dihormati di masyarakat itu melakukan hal yang amat sukar; sebagaimana mereka yang melayani ayah dan ibu pun memikul kewajiban yang berat. Seorang istri yang setia dan perempuan yang jujur, dengan teguh menapaki dharma, menjalankan jalan moral yang keras.”

Frequently Asked Questions

The chapter interrogates whether ethical worth is anchored in birth-status or in lived conduct, while also addressing how one should respond to karmic suffering without collapsing into despair.

Dharma is operationalized as disciplined behavior—truth, restraint, duty, and service—while grief is treated as cognitively corrosive; wise agency seeks remedies and acts without fixation, accepting karma’s unfolding.

A direct phalaśruti is not stated; instead, the meta-commentary is embedded in Mārkaṇḍeya’s closing summary to Yudhiṣṭhira, presenting the episode as an exemplary dharma-upākhyāna whose comprehension supports steadiness and vigilance in dharma.