Varaha Purana - Adhyaya 5
Varaha PuranaAdhyaya 555 Shlokas

Adhyaya 5: Reconciliation of Action and Knowledge: Offering All Acts to Nārāyaṇa and the Hymn to the Yajña-Puruṣa

Karma-jñāna-samuccayaḥ: Nārāyaṇa-samarpaṇaṃ yajñanara-stavaś ca

Ethical-Discourse (Liberation Hermeneutics) + Stotra (Yajña-Theology)

In Varāha–Pṛthivī’s instructional frame, the chapter presents King Aśvaśiras approaching Kapila to resolve a central soteriological doubt: whether mokṣa is attained by karma (ritual/works) or by jñāna (knowledge). Kapila answers through an embedded precedent: Raibhya asks Bṛhaspati the same question, and Bṛhaspati teaches that actions, whether good or bad, do not bind when performed by depositing them in Nārāyaṇa (nārāyaṇe nyasya). A further exemplum narrates a debate between the Vedic student Saṃyamana and the hunter Niṣṭhuraka, using a “fire and iron-net” analogy to argue that destroying the root (egoic appropriation) ends branching bondage. The chapter culminates with Aśvaśiras renouncing kingship, practicing austerity at Naimiṣa, and praising Nārāyaṇa as the cosmic Yajña-Puruṣa, dissolving his mind into that principle.

Key Concepts

karma-jñāna-samuccaya (integration of action and knowledge)nārāyaṇārpaṇa (offering of all acts to Nārāyaṇa) and akarma (non-binding action)advaita-vāsanā-siddhi (non-dual conditioning as a yogic attainment)mūla-nāśa (root-destruction of ego/appropriation) as liberation strategyyajñanara / yajñamūrti (cosmic embodiment of sacrifice)rājadharma to vānaprastha/saṃnyāsa transition (royal renunciation model)

In this adhyaya

People

  • VarahaSpeaksVarāha (in the overarching frame)
  • KapilaSpeaksas primary instructor within the chapter
  • BrihaspatiSpeaksBṛhaspati (within the embedded precedent)
  • VasuSpeaks
  • SamyamanaSpeaksSaṃyamana
  • NishthurakaSpeaksNiṣṭhuraka
  • PrithiviSpeaksListensPṛthivī (frame listener)
  • AshvashirasSpeaksListensAśvaśiras (Kapila’s interlocutor)
  • RaibhyaSpeaksListensBṛhaspati’s interlocutor

What happens

  1. How it opens

    Within the Varāha-Pṛthivī upadeśa frame, King Aśvaśiras approaches Kapila with a decisive soteriological doubt: whether mokṣa is attained by karma (works/ritual duty) or by jñāna (liberating knowledge), and how a householder-king can act without bondage.

  2. Stories within

    Aśvaśiras questions Kapila on karma vs jñāna for mokṣa; Raibhya questions Bṛhaspati; teaching of ‘nārāyaṇe nyasya’; Saṃyamana vs Niṣṭhuraka debate; fire-and-iron-net analogy for mūla-nāśa; Aśvaśiras’ abdication, tapas at Naimiṣa, and hymn to Yajña-Puruṣa

  3. The turning point

    Kapila answers by citing an authoritative precedent: Raibhya questions Bṛhaspati, who teaches that actions, good or bad, do not bind when their doership and fruits are ‘deposited in Nārāyaṇa’ (nārāyaṇe nyasya). A further exemplum stages a debate between the Vedic student Saṃyamana and the hunter Niṣṭhuraka, using the ‘fire and iron-net’ analogy to show that cutting the root (egoic appropriation/ahaṃkāra) ends the proliferating branches of karmic bondage.

  4. How it ends

    Aśvaśiras internalizes the teaching as karma-jñāna-samuccaya: he renounces kingship, installs his son Sthūlaśiras, undertakes austerity at Naimiṣa, and culminates in a stotra to Nārāyaṇa as the cosmic Yajña-Puruṣa (yajñamūrti), dissolving mind and identity into that all-sacrifice principle, thereby modeling akarma through nārāyaṇārpaṇa.

Tirthas

Bhāgīrathī (Gaṅgā) river; Dharmāraṇya (forest of dharma); Naimiṣa (Naimiṣāraṇya) sacred grove/forest; Brahmaloka/Brahmā’s abode (brahmaukas/brahmaṇaḥ sadman, as a cosmological court setting); Caitraratha (a mythic/celestial locale encountered en route).

  • NaimishaMain tirthaNaimiṣa (Naimiṣāraṇya)

    Kosala/Avadh region (Gomati basin; North India sacred-forest complex)

  • Bhagirathi (Ganga) riverBhāgīrathī (Gaṅgā) river
  • DharmaranyaDharmāraṇya (forest of dharma)
  • Brahmaloka / Brahma’s abodeBrahmaloka / Brahmā’s abode (brahmaukas, brahmaṇaḥ sadman)
  • Caitrarathamythic/celestial locale
Recitation with translationVaraha Purana Adhyaya 5

Shlokas in Adhyaya 5

Verse 1

अश्वशिरा उवाच । भवन्तौ मम सन्देहमेकं छेत्तुमिहार्हतः । येन छिन्नेन जायेत मम संसारविच्युतिः ॥ ५.१ ॥

अश्वशिरा ने कहा, तुम दोनों मेरे एक सवाल का जवाब दे सकते हो। मेरे मन में एक शक है। वोह दूर कर दो। जब यह शक जाएगा, मैं इस जनम-मरण के चक्कर से आज़ाद हो जाऊँगा।

Verse 2

एवमुक्ते नृपतिना तदा योगिवरो मुनिः । कपिलः प्राह धर्मात्मा राजानं यजतां वरम् ॥ ५.२ ॥

राजा ने बात खत्म की। तब कपिल ने कहा। वोह बड़े योगी थे और धरम के पक्के थे। राजा जो यज्ञ करता था, उसमें सबसे बड़ा था। कपिल ने उससे कहा।

Verse 3

कपिल उवाच । कस्ते मनसि सन्देहो राजन् परमधार्मिक । छिन्दामि येन तच्छ्रुत्वा ब्रूहि यत्तेऽभिवाञ्छितम् ॥ ५.३ ॥

कपिल बोले, राजा, तुम धरम के काम में आगे हो। तुम्हारे मन में क्या शक है? बताओ क्या जानना चाहते हो। मैं सुन के वोह दूर कर दूँगा।

Verse 4

राजोवाच । कर्मणा प्राप्यते मोक्ष उताहो ज्ञानिना मुने । एतन्मे संशयं छिन्धि यदि मेऽनुग्रहः कृतः ॥ ५.४ ॥

राजा ने कहा, मुनि, मोक्ष कैसे मिलता है? कर्म करने से या ज्ञान से? यह मेरे मन में शक है। अगर तुम मेरी मदद करना चाहते हो, तोह यह समझा दो।

Verse 5

कपिल उवाच । इमं प्रश्नं महाराज पुरा पृष्टो बृहस्पतिः । रैभ्येण ब्रह्मपुत्रेण राज्ञा च वसुनापुराः । वसुरासीन्नृपश्रेष्ठो विद्वान् दानपतिः पुरा ॥ ५.५ ॥

कपिल ने कहा, राजा, यह सवाल पहले भी पूछा गया था। बृहस्पति से। रैभ्य ने पूछा था, वोह ब्रह्मा के बेटे थे। और वसु नाम का राजा भी पूछा था। वसु बड़ा राजा था, बहुत समझदार था, और दान देने में बड़ा था।

Verse 6

चाक्षुषस्य मनोः काले ब्रह्मणोऽन्वयवर्धनः । वसुश्च ब्रह्मणः सद्म गतवान्स्तद्दिदृक्षया ॥ ५.६ ॥

चाक्षुष मनु के टाइम पे हुआ यह। अन्वयवर्धन और वसु, दोनों ब्रह्मा की फैमिली से थे। उन्होंने ब्रह्मा के घर जाना था। उनको ब्रह्मा को देखने का मन था।

Verse 7

पथि चैत्ररथं दृष्ट्वा विद्याधरवरं नृप । अपृच्छच्च वसुः प्रीत्या ब्रह्मणोऽवसरं प्रभो ॥ ५.७ ॥

रास्ते में उन्होंने चैत्ररथ को देखा। वो विद्याधरों में बड़ा था। वसु ने प्यार से पूछा कि ब्रह्मा से मिलने का टाइम कैसे मिलेगा।

Verse 8

सोऽब्रवीद् देवसमितिर्वर्तते ब्रह्मणो गृहे । एवं श्रुत्वा वसुस् तस्थौ द्वारि ब्रह्मौकसस् तदा । तावत् तत्रैव रैभ्यस् तु आजगाम महातपाः ॥ ५.८ ॥

उसने कहा कि देवता लोग ब्रह्मा के घर में बैठे हैं। यह सुन के वसु ब्रह्मा के दरवाज़े पर खड़ा हो गया। तभी वहाँ रैभ्य आए। वो बड़े तपस्वी थे।

Verse 9

स राजा प्रीतमनसा वसुः सम्पूर्णमानसः । उवाच पूजयित्वाग्रे क्व प्रयातोऽसि वै मुने ॥ ५.९ ॥

राजा वसु खुश था। उसने रैभ्य की पूजा की और पूछा कि आप कहाँ जा रहे हो मुनिजी।

Verse 10

रैभ्य उवाच । अहं बृहस्पतेः पार्श्वे आगतोऽस्मि महानृप । किञ्चित्कार्यान्तरं प्रष्टुमहं देवपुरोहितम् ॥ ५.१० ॥

रैभ्य ने कहा कि मैं बृहस्पति के पास गया था। वो देवता का गुरु है। मैं उनसे एक काम पूछने गया था।

Verse 11

एवं वदति रैभ्ये तु ब्रह्मणस्तन्महासदः । उत्तस्थौ स्वानि धिष्ण्यानि गता देवगणाः प्रभो ॥ ५.११ ॥

रैभ्य के बोलने के बाद ब्रह्मा की बड़ी सभा उठ गई। देवी लोग अपने-अपने घर चले गए।

Verse 12

तावद् बृहस्पतिस्तत्र रैभ्येण सह संविदम् । कृत्वा स्वधिष्ण्यमगमद् वसुनाच सुपूजितः ॥ ५.१२ ॥

बृहस्पति ने वहाँ रैभ्य से बात की। फिर वो अपने घर गया। वसु ने उसकी अच्छी तरह पूजा की थी।

Verse 13

रैभ्य आङ्गिरसो राजा वसुश्चोपाविवेश ह । उपविष्टेषु राजेन्द्र तेषु तेष्वपि सोऽब्रवीत् ॥ ५.१३ ॥

राजा रैभ्य और वसु दोनों बैठ गए। जब वो सब बैठ गए, तब उसने उनसे भी बात की।

Verse 14

बृहस्पतिर्देवगुरू रैभ्यं वचनमन्तिके । किं करोमि महाभाग वेदवेदाङ्गपारग ॥ ५.१४ ॥

बृहस्पति, जो देवी लोगों का गुरु है, उसने रैभ्य से पास जाके पूछा। बोला, मैं क्या करूँ? तम तो वेदों के बड़े जानक हो।

Verse 15

रैभ्य उवाच । बृहस्पते कर्मणा किं प्राप्यते ज्ञानिना । अथवा । मोक्ष एतन्ममाचक्ष्व पृच्छतः संशयं प्रभो ॥ ५.१५ ॥

रैभ्य ने कहा, बृहस्पति, कोई इंसान जो सब जानता है, वो अपने करम से क्या पा सकता है? या फिर बताओ, मोक्ष कैसे मिलता है? मेरा सवाल का जवाब दो।

Verse 16

बृहस्पतिरुवाच । यत्किञ्चित् कुरुते कर्म पुरुषः साध्वसाधु वा । सर्वं नारायणे न्यस्य कुर्वन् नैव च लिप्यते ॥ ५.१६ ॥

बृहस्पति ने कहा कि इंसान जो भी काम करे, अच्छा हो या बुरा। अगर वो सब नारायण को समर्पित करके करे, तो उसका पास नहीं लगता। वो उस काम में नहीं फंशता।

Verse 17

श्रूयते च द्विजश्रेष्ठ संवादो विप्रलुब्धयोः । आत्रेयो ब्राह्मणः कश्चिद् वेदाभ्यासरतो मुनिः ॥ ५.१७ ॥

अब सुनो एक बात, ब्राह्मणों में बड़े। दो ब्राह्मणों की बात सुनने में आयी है, दोनों को धोखा हुआ था। उनमें एक अत्रि गोत्र का ब्राह्मण था, जो वेद पढ़ने में लगा रहता था।

Verse 18

वसत्यविरतं प्रातःस्नायी त्रिषवणे रतः । नाम्ना संयमनः पूर्वमेकस्मिन् दिवसे नदीम् । धर्मारण्ये गतः स्नातुं धन्यां भागीरथीं शुभाम् ॥ ५.१८ ॥

पहले एक आदमी था, नाम था संयमन। वो रोज़ सुबह नहाता था, तीन टाइम पूजा करता था। एक दिन वो धरम-अरण्य गया, गंगा में नहन्ने के लिए।

Verse 19

तत्रासीनं महायूथं हरिणानां विचक्षणः । लुब्धो निष्ठुरको नाम धनुःपाणिः कृतान्तवत् । आययौ तं जिघांसुः स धनुष्यायोज्य सायकम् ॥ ५.१९ ॥

वहाँ बहुत सारे डीर बैठे थे। एक शिकारी आया, निष्ठुर नाम का, हाथ में धनुष। वो मारना चाहता था, तीर धनुष पे लगा के।

Verse 20

ततः संयमनो विप्रो दृष्ट्वा तं मृगयारतम् । वारयामास मा भद्र जीवघातमिमं कुरु ॥ ५.२० ॥

संयमन ने देखा कि शिकारी शिकार करने में लगा है। उसने रोका और बोला, भाई, मत मारो इन जानवरों को। यह गलत काम मत करो।

Verse 21

एतच्छ्रुत्वा वचो व्याधः स्मितपूर्वमिदं वचः । उवाच नाहं हिंसामि पृथग्जीवं द्विजोत्तम ॥ ५.२१ ॥

शिकारी ने यह बात सुनी। वो मुस्कुरा के बोला। बोला, मैं किसी जानवर को अलग से नहीं मारता। भगवान सब में है।

Verse 22

परमात्मा त्वयं भूतैः क्रीडते भगवान् स्वयम् । क्रीता मृदा बलीवर्द्धास्तद्वदेतन्न संशयः ॥ ५.२२ ॥

तुम वो मुख्य आत्मा हो। भगवान खुद सब जीवों के साथ खेलता है। जैसे कोई मिट्टी के टुकड़े के बदले बैल खरीद लेता है, वैसे ही यहाँ भी होता है। इसमें कोई शक नहीं।

Verse 23

अहे भावः सदा ब्रह्मन्नविद्येयं मुमुक्षुणाम् । यात्राप्राणरतं सर्वं जगदेतद्विचेष्टितम् । तत्राहमिति यः शब्दः स साधुत्वं न गच्छति ॥ ५.२३ ॥

ब्राह्मण, मुक्ति चाहने वालों के लिए यह सब जाहिलपन है। सारी दुनिया अपनी रोटी-पेली में लगी है। जो कहता है मैं, वो सच्चा नहीं हो सकता।

Verse 24

इत्याकर्ण्य स विप्रेन्द्रो द्विजः संयमनस्तदा । विस्मयेनाब्रवीद्वाक्यं लुब्धं निष्ठुरकं द्विजः ॥ ५.२४ ॥

यह सुन के ब्राह्मण हैरान रह गया। लेकिन उसका मन भी लालच में था। उसने बात तो आगे बढ़ाई, पर तीखी और लालच भरी थी।

Verse 25

किमेतदुच्यते भद्र प्रत्यक्षं हेतुमद्वचः । ततः श्रुत्वा मुनेर्विप्रं लुब्धकः प्राह धर्मवित् । कृत्वा लोहमयं जालं तस्याधो ज्वलनं ददौ ॥ ५.२५ ॥

ब्राह्मण ने पूछा, भाई यह क्या बोल रहा है? सामने साफ दिख रहा है। शिकारी ने सुना। वो धरम जानता था। उसने लोहे का जाल बनाया और नीचे आग लगा दी।

Verse 26

दत्त्वा वह्निं द्विजं प्राह ज्वाल्यतां काष्ठसचयः । ततो विप्रो मुखेनाग्निं प्रज्वाल्य विरराम ह ॥ ५.२६ ॥

उसने आग दे दी और ब्राह्मण को बोला, "लकड़ी का ढेर जला दो।" ब्राह्मण ने मुँह से आग जलाई और फिर शांत हो गया।

Verse 27

ज्वलिते तु पुनर्वह्नौ तं जालं लोहसम्भवम् । पृथक्पृथक् सहस्राणि निन्येऽन्तर्जालकैर्द्विज । एकस्थानगतस्यापि वह्नेरायसजालकैः ॥ ५.२७ ॥

जब आग फिर से भड़क उठी, वो लोहे का जाल पकड़ के अलग-अलग हिस्सों में बाँट दिया। आग एक जगह थी, लेकिन लोहे की जाली से बाँध दी गई।

Verse 28

ततो लुब्धोऽब्रवीद्विप्रं एकां ज्वालां महामुने । गृहाण येन शेषाणां करिष्यामीह नाशनम् ॥ ५.२८ ॥

फिर वो लालच वाला शख्स ब्राह्मण से बोला, "महा मुनि, यह एक ज्वाला ले लो। इससे मैं बाकी सब का नाश कर दूंगा।"

Verse 29

एवमुक्त्वा हुताशे तु तोयपूर्णं घटं द्रुतम् । चिक्षेप सहसा वह्निः प्रशशामाशु पूर्ववत् ॥ ५.२९ ॥

यह कह के उसने पानी भरा घड़ा आग में फेंक दिया। आग अचानक बुझ गई और पहले जैसी शांत हो गई।

Verse 30

ततोऽब्रवील्लुब्धकस्तु ब्राह्मणं तं तपोधनम् । भगवन् या त्वया ज्वाला गृहोतासीद्धुताशनात् । प्रयच्छ येन मार्गाणि मांसान्यानाय्य भक्षये ॥ ५.३० ॥

फिर शिकारी ने उस ब्राह्मण से कहा, "भगवान, वो ज्वाला जो आपके घर में आग से निकली थी, उसका तरीका बताओ। मैं उससे माँस ला के खाना चाहता हूँ।"

Verse 31

एवमुक्तस्तदा विप्रो यावदायसजालकम् । पश्यत्येव न तत्राग्निर्मूलनाशे गतः क्षयम् ॥ ५.३१ ॥

जब शिकारी ने यह कहा, ब्राह्मण ने उस फांसले दरवाज़े को देखा। उसमें आग नहीं थी। जब जड़ ही खत्म हो गई, तो वो भी खत्म हो गया।

Verse 32

ततो विलक्षणभावेन ब्राह्मणः शंसितव्रतः । तूष्णीम्भूतस्थितस्तावल्लुब्धको वाक्यमब्रवीत् ॥ ५.३२ ॥

फिर ब्राह्मण का मूड बदल गया। वो व्रत कर रहा था जो सबने सराहा था। थोड़ी देर चुप खड़ा रहा। तब शिकारी ने बात करनी शुरू की।

Verse 33

एतस्मिञ्ज्वलितो वह्निर्बहुशाखश्च सत्तम । मूलनाशे भवेन्नाशस्तद्वदेतदपि द्विज ॥ ५.३३ ॥

देखो, आग जल रही है और कई तरफ फैल रही है। जब जड़ खत्म हो जाती है, तो पूरा पेड़ खत्म हो जाता है। यहाँ भी वही बात है, ब्राह्मण।

Verse 34

आत्मा स प्रकृतिस्थश्च भूतानां संश्रयो भवेत् । भूय एषा जगत्सृष्टिस्तत्रैव जगतो भवेत् ॥ ५.३४ ॥

वो आत्मा प्रकृति में रहता है और सब जीवों को संभालता है। फिर से दुनिया बनती है और उसमें सब कुछ होता है।

Verse 35

पिण्डग्रहणधर्मेण यदस्य विहितं व्रतम् । तत्तदात्मनि संयोज्य कुर्वाणो नावसीदति ॥ ५.३५ ॥

जब कोई पिंड दान का व्रत करता है, वो अपने आप में उसका ध्यान लगाता है। ऐसा करने वाला कभी दुख में नहीं पड़ता।

Verse 36

एवमुक्ते तु व्याधेन ब्राह्मणे राजसत्तम । पुष्पवृष्टिरथाकाशात् तस्योपरि पपात ह ॥ ५.३६ ॥

जब शिकारी ने यह बात कही, तो आसमान से फूल बरसने लगे। वो सब उस ब्राह्मण के ऊपर गिरने लगे।

Verse 37

विमानानि च दिव्यानि कामगानि महान्ति च । बहुरत्नानि मुख्यानि ददृशे ब्राह्मणोत्तमः ॥ ५.३७ ॥

उस ब्राह्मण ने वहाँ उड़ने वाले बड़े-बड़े विमान देखे। जो मर्ज़ी वहाँ जा सकते थे। बहुत सारे क़ीमत के रत्न और खज़ाने भी दिखे।

Verse 38

तेषु निष्ठुरकं लुब्धं सर्वेषु समवस्थितम् । ददृशे ब्राह्मणस्तत्र कामरूपिणमुत्तमम् ॥ ५.३८ ॥

वहाँ उसने एक ऐसी शक्ति देखी जो बहुत कठोर और लालची थी। वो सब जगह फैली हुई थी। उसने वहाँ एक ऐसा बड़ा पुरुष भी देखा जो कोई भी रूप ले सकता था।

Verse 39

अद्वैतवासना सिद्धं योगाद् बहुशरीरकम् । दृष्ट्र्वा विप्रो मुदा युक्तः प्रययौ निजमाश्रमम् ॥ ५.३९ ॥

योग से उसने एक ऐसी अवस्था देखी जहाँ सिर्फ एक ही सच है। वो खुश हो गया और अपने आश्रम वापस चला गया।

Verse 40

एवं ज्ञानवतः कर्म कुर्वतोऽपि स्वजातिकम् । भवेन्मुक्तिर्द्विजश्रेष्ठ रैभ्य राजन् वसो ध्रुवम् ॥ ५.४० ॥

इसलिए जो ज्ञान रखता है, वो अपना काम करता रहे। अपनी जाति के धरम को फॉलो करता रहे। उसको मिलती है। यह पक्का है रैभ्य और राजा वसु।

Verse 41

एवं तौ संशयच्छेदं प्राप्तौ रैभ्यवसू नृप । बृहस्पतेस्ततो धिष्ण्याज्जग्मतुर्निजमाश्रमम् ॥ ५.४१ ॥

राजा, रैभ्य और वसु का डाउट खत्म हो गया। उन्होंने बृहस्पति के यहाँ से निकल के अपने आश्रम जाना शुरू किया।

Verse 42

तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र देवं नारायणं प्रभुम् । अभेदेन स्वदेहस्थं पश्यन्नाराधय प्रभुम् ॥ ५.४२ ॥

तो राजा, तुम भी नारायण भगवान को पूजो। वो तुम्हारे ही शरीर में है, अलग नहीं है। उसी को अपना भगवान मान के पूजा करो।

Verse 43

कपिलस्य वचः श्रुत्वा स राजाऽश्वशिरा विभुः । ज्येष्ठं पुत्रं समाहूय धन्यं स्थूलशिराह्वयम् । अभिषिच्य निजे राज्ये स राजा प्रययौ वनम् ॥ ५.४३ ॥

राजा अश्वशिरा ने कपिल जी की बात सुन ली। उसने अपने बड़े बेटे स्थूलशिरा को बुलाया। उसे अपने राज्य का राजा बना के, वो खुद जंगल चला गया।

Verse 44

नैमिषाख्यं वरारोहे तत्र यज्ञतनुं गुरुम् । तपसाराधयामास यज्ञमूर्तिं स्तवेन् च ॥ ५.४४ ॥

वो नैमिष नाम की जगह गया। वहाँ उसने तपस्या की और भगवान की प्रार्थना की। भगवान यज्ञ रूप में वहाँ थे।

Verse 45

धरण्युवाच । कथं यज्ञतनॊः स्तोत्रं राज्ञा नारायणस्य ह । स्तुतिः कृता महाभाग पुनरेतच्च शंस मे ॥ ५.४५ ॥

धरणी ने पूछा कि राजा ने नारायण की स्तुति कैसे की? नारायण तो यज्ञ के रूप में थे। यह पूरा बाता दो मुझे।

Verse 46

श्रीवराह उवाच । नमामि याज्यं त्रिदशाधिपस्य भवस्य सूर्यस्य हुताशनस्य । सोमस्य राज्ञो मरुतामनेक-रूपं हरिं यज्ञनरं नमस्ये ॥ ५.४६ ॥

मैं हरि को नमस्ते करता हूँ। वो सबकी पूजा के लायक हैं। देवताओं के स्वामी के रूप में हैं, भव के रूप में हैं, सूरज के रूप में हैं। अग्नि के रूप में भी हैं, सोम राजा के रूप में भी हैं। मरुत देवता अनेक रूप में हैं। मैं हरि को यज्ञ पुरुष मानके नमस्ते करता हूँ।

Verse 47

सुभीमदंष्ट्रं शशिसूर्यनेत्रं संवत्सरे छायनयुग्मकुक्षम् । दर्भाङ्गरोमाणमतैध्मशक्तिं सनातनं यज्ञनरं नमामि ॥ ५.४७ ॥

मैं उस यज्ञ पुरुष को नमस्ते करता हूँ जो सनातन हैं। उनके दाँत बड़े ज़बरदस्त हैं। उनकी आँखें चाँद और सूरज जैसी हैं। उनका पेट साल भर का है, ढाई के साथ। उनके बाल दर्भा घास जैसे हैं। उनकी शक्ति यज्ञ की लकड़ी है जो आग जलती है।

Verse 48

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं शरीरेण दिशश्च सर्वाः । तमीद्यामीशं जगतां प्रसूतिं जनार्दनं तं प्रणतोऽस्मि नित्यम् ॥ ५.४८ ॥

धरती और आसमान के बीच का पूरा खाली हिस्सा उनके शरीर में है। चारों दिशाओं भी उनमें हैं। मैं उस भगवान को प्रणाम करता हूँ जो सबके लिए प्रशंसनीय हैं। वो सब दुनिया का कारण हैं। जनार्दन के रूप में मैं उनको हमेशा नमस्ते करता हूँ।

Verse 49

सुरासुराणां च जयाजयाय युगे युगे यः स्वशरीरमाद्यम् । सृजत्यनादिः परमेश्वरो य- स्तं यज्ञमूर्तिं प्रणतोऽस्मि नाथम् ॥ ५.४९ ॥

मैं उस भगवान को नमस्ते करता हूँ जिसका रूप यज्ञ जैसा है। वो शुरू से हैं, कोई अंत नहीं। वो हर युग में अपना आदिम शरीर बनाते हैं। इससे देवता और असुरों में जीत और हार दोनों होती है। वो सबके ऊपरी हैं।

Verse 50

दधार मायामयमुग्रतेजा जयाय चक्रं त्वमलांशुशुभ्रम् । गदासिशार्ङ्गादिचतुर्भुजोऽयं तं यज्ञमूर्तिं प्रणतोऽस्मि नित्यम् ॥ ५.५० ॥

आपका तेज बड़ा ज़बरदस्त है। आपने जीत के लिए चक्र धारण किया। वो चक्र बिल्कुल साफ है, चमक रहा है। आप चार हाथ वाले हैं। आपके हाथ में गदा, तलवार, धनुष है। मैं उस यज्ञ रूप वाले भगवान को हमेशा नमस्ते करता हूँ।

Verse 51

क्वचित् सहस्रं शिरसां दधार क्वचिन्महापर्वततुल्यकायम् । क्वचित् स एव त्रसरेणुतुल्यो यस्तं सदा यज्ञनरं नमामि ॥ ५.५१ ॥

कभी वो हज़ार सर लेके आता है। कभी उसका बड़े पहाड़ जैसा हो जाता है। कभी वो ही इतना छोटा हो जाता है जैसे धूल का कण। मैं उस यज्ञ-पुरुष को हमेशा प्रणाम करता हूँ।

Verse 52

चतुर्मुखो यः सृजते समग्रं रथाङ्गपाणिः प्रतिपालनाय । क्षयाय कालानलसन्निभो य-स्तं यज्ञमूर्तिं प्रणतोऽस्मि नित्यम् ॥ ५.५२ ॥

वो यज्ञ स्वरूप है। चार मुँह लेकर वो सब पैदा करता है। हाथ में चक्र लेकर वो सबको बचाता है। और जब खत्म होने का टाइम आता है, वो काल-अग्नि जैसा लगता है। मैं उस यज्ञ-मूर्ति को हमेशा प्रणाम करता हूँ।

Verse 53

संसारचक्रक्रमणक्रियायै य इज्यते सर्वगतः पुराणः । यो योगिभिर्ध्यायते चाप्रमेयस् तं यज्ञमूर्तिं प्रणतोऽस्मि नित्यम् ॥ ५.५३ ॥

वो यज्ञ-मूर्ति बहिन पुराना है और सब जगह है। वो इस दुनिया के चक्को को चलाता है। योगी लोग उसे ध्यान में देखते हैं। कोई उसको नाप नहीं सकता। मैं उसे हमेशा प्रणाम करता हूँ।

Verse 54

सम्यङ्मनस्यर्पितवानहं ते यदा सुदृश्यं स्वतनौ नु तत्त्वम् । न चान्यदस्तॊति मतिः स्थिरा मे यतस्ततो मावतु शुद्धभावम् ॥ ५.५४ ॥

जब मैंने अपना मन पूरा तुम्हे दिया, तब सच्चाई साफ दिखने लगी। मेरे अंदर ही वो तत्व नज़र आया। अब मेरी समझ पक्की हो गई है कि और कुछ नहीं है। इसलिए वो समझ मुझे हर तरफ से बचाए।

Verse 55

इतीरितस्तस्य हुताशनार्चिः प्रख्यं तु तेजः पुरतो बभूव । तस्मिन् स राजा प्रविवेश बुद्धिं कृत्वा लयं प्राप्तवान् यज्ञमूर्तौ ॥ ५.५५ ॥

यह बात सुनके आग की लौंदिया जैसी चमक उसके सामने प्रकट हुई। राजा ने अपनी बुद्धि उस चमक में लगा दी। और उस यज्ञ-मूर्ति में मिल गया।

Inside Adhyaya 5

Tirtha focus

  • Pilgrimage MeritMerit is implied through the narrative logic: Naimiṣa functions as a siddhi-field for tapas and mind-dissolution into Nārāyaṇa; the forest–river setting (Dharmāraṇya–Bhāgīrathī) frames ethical restraint and purification, suggesting that pilgrimage supports non-binding action when joined to nārāyaṇārpaṇa and ego-root destruction.

Ritual instructions

  • Primary RitualNārāyaṇārpaṇa (offering/depositing all acts in Nārāyaṇa) integrated with daily purity rites and contemplative stotra to the Yajña-Puruṣa.
  • BenefitKarma becomes akarma (non-binding action) when stripped of egoic authorship; knowledge functions as the root-cure (mūla-nāśa) that prevents bondage. The integrated practice yields inner purification, ethical restraint, and steady movement toward mokṣa through devotion to Nārāyaṇa as the cosmic sacrifice.

The narrative frame

  • Dialogue ToneDidactic, reconciliatory, and exemplum-driven—resolving a sharp karma-vs-jñāna doubt by authoritative citation, analogy, and ethical confrontation.

The emotional journey

  • Dominant RasaŚānta (tranquil, liberative) with undertones of Vīra (renunciatory resolve) and Karuṇa (ethical sensitivity around jīvaghāta).
  • Emotional ProgressionFrom intellectual anxiety (how to be free while acting) → reassurance through authoritative teaching → moral friction in the hunter debate (testing the doctrine against violence/agency) → inward turning and renunciatory clarity → devotional absorption in the Yajña-Puruṣa stotra.

Planning a pilgrimage

  • Visit FeasibilityHighly feasible: Naimiṣāraṇya is a living pilgrimage center with established access, temples, and ritual services; the chapter’s practice can be adapted as a reflective visit focused on surrender-of-action and stotra recitation.
  • Best SeasonOctober–March (cooler months for forest-grove pilgrimage and extended japa/tapas)
  • Modern Location NameNaimisharanya (Nimsar), Sitapur district, Uttar Pradesh, India
  • Related FestivalKartik Purnima (regional pilgrimage peak); also major Vishnu-related observances such as Vaikuntha Ekadashi are commonly significant for Nārāyaṇa-focused vows.

Frequently Asked Questions

The text frames liberation as compatible with action when action is performed without possessive appropriation and is ‘deposited’ in Nārāyaṇa (nārāyaṇe nyasya). Knowledge functions as the root-level correction—removing the ‘I’-claim (ahaṃ-śabda/ahaṃkāra) that generates binding consequences—so karma becomes non-binding when integrated with this orientation.

No explicit tithi, nakṣatra, or month is specified. The narrative mentions daily-regimen markers: the Brahmin Saṃyamana bathes in the morning (prātaḥ-snānī) and is devoted to the three daily rites (triṣavaṇa). A single ‘one day’ (ekasmin divase) episode is used to situate the exemplum.

Environmental concern appears indirectly through the Dharmāraṇya–Bhāgīrathī setting and the ethical confrontation over hunting. The text recasts harm and agency through a metaphysical lens (critiquing egoic authorship), yet it still foregrounds restraint and reflection on ‘jīvaghāta’ (killing of living beings). For digital stewardship themes, the chapter can be read as regulating human conduct in forest–river ecologies by linking ethical action to non-possessive, non-exploitative intention.

The chapter references Kapila; Bṛhaspati (devaguru); Raibhya (identified as a Brahmaputra and as Āṅgirasa); King Vasu (a learned donor-king); Cākṣuṣa Manu as a genealogical/chronological marker; and the king Aśvaśiras with his son Sthūlaśiras (installed as successor). It also includes the exemplum figures Saṃyamana (a Vedic practitioner) and Niṣṭhuraka (a hunter) to stage doctrinal instruction.

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