Opening the text

Book 3 positions the Vijigīṣu’s internal sovereignty on predictable adjudication: when disputes are legible, revenue, manpower, and loyalty become governable. Chapter 13 treats bonded service and sale/redemption as a controlled labor-institution, not a private free-for-all. Kautilya’s pragmatic objective is twofold: (1) protect the realm’s core producing population by restricting who can be reduced to servitude (explicitly denying Ārya-dāsabhāva as a norm), and (2) preserve transactional certainty where service is permitted (especially among mleccha populations or in emergency pledges), by stipulating who may sell, who may redeem, what acts destroy “value,” and what penalties apply to violators. The chapter strengthens Janapada by reducing predation (kidnapping, coercive sale, sexual exploitation of service-women) and by giving the state a calibrated daṇḍa scale that converts social disorder into enforceable rule, thereby securing yogakṣema and dependable labor relations under the king’s legal monopoly.
Sutra 1
चतुर्गुणः ॥ कZ_०३.१३.०१ ॥
जब कोई गलत काम करता है, तो उसको चार गुना फाइन देना पड़ता है। यह सिंपल रूल है, जो भी कंपनसेशन होगा, वो चार टाइम्स होगा।
Sutra 2
परजनस्य पूर्वमध्यमोत्तमवधा दण्डाः क्रेतृश्रोतृऋणां च ॥ कZ_०३.१३.०२ ॥
किसी और का इंसान बेचने पे सज़ा अलग-अलग होती है, कम, बीच का, या बड़ा। यह सज़ा बेचने वाले, बीच में रहने वाले, और पैसे देने वाले सब पे लगती है।
Sutra 3
म्लेच्छानामदोषः प्रजां विक्रेतुमाधातुं वा ॥ कZ_०३.१३.०३ ॥
म्लेच्छ लोगों के लिए अपने बच्चे बेचना या गिरवी रखना कोई पाप नहीं है। उनके यहाँ यह सब अलाउड है।
Sutra 4
न त्वेवार्यस्य दासभावः ॥ कZ_०३.१३.०४ ॥
लेकिन कोई आर्य इंसान को कभी नरक या गुलाम नहीं बना सकते। यह मना है।
Sutra 15
मूल्येन चार्यत्वं गच्छेत् ॥ कZ_०३.१३.१५ ॥
जितना पैसे का डील हुआ है वो दे के कोई अपनी आज़ादी खरीद सकता है। पैसे दे दो और आज़ाद हो जाओ।
Sutra 16
तेनोदरदासाहितकौ व्याख्यातौ ॥ कZ_०३.१३.१६ ॥
इस से पता चलता है कि जो पेट भर के लिए काम करता है, उसका भी यही नियम है। जो किसी के पास पैसे रख के बंधन में है, उसका भी यही नियम है।
Sutra 17
प्रक्षेपानुरूपश्चास्य निष्क्रयः ॥ कZ_०३.१३.१७ ॥
जितना पैसा उस पर खर्चा हुआ है, उसके हिसाब से उसकी आज़ादी का पैसा लगेगा। ज़्यादा खर्चा, ज़्यादा पैसे देना पड़ेगा।
Sutra 18
दण्डप्रणीतः कर्मणा दण्डमुपनयेत् ॥ कZ_०३.१३.१८ ॥
जिस पर जुर्माना लगा है, वो काम करके उसका बदला दे सकता है। अपनी सज़ा का पैसा काम करके चुका सकता है।
Sutra 19
आर्यप्राणो ध्वजाहृतः कर्मकालानुरूपेण मूल्यार्धेन वा विमुच्येत ॥ कZ_०३.१३.१९ ॥
जो आदमी युद्ध में पकड़ा गया है, उसको आज़ाद करना है। या तो वो जितना काम किया है उसके हिसाब से छूटेगा, या आधा पैसा देके भी छूट सकता है।
Sutra 20
गृहेजातदायागतलब्धक्रीतानामन्यतमं दासमूनाष्टवर्षं विबन्धुमकामं नीचे कर्मणि विदेशे दासीं वा सगर्भामप्रतिविहितगर्भभर्मण्यां विक्रयाधानं नयतः पूर्वः साहसदण्डः क्रेतृश्रोतृऋणां च ॥ कZ_०३.१३.२० ॥
जो किसी छोटे बच्चे को, जिसका कोई अपना नहीं, बेच दाले या गिरवी रखे, उसको सज़ा मिलेगी। जो किसी औरत को, जो प्रेग्नेंट है, बिना उसकी केयर के बेच दाले, उसको भी सज़ा मिलेगी। खरीदने वाला, बेचने वाला, सबको सज़ा मिलेगी।
Sutra 21
दासमनुरूपेण निष्क्रयेणार्यमकुर्वतो द्वादशपणो दण्डः संरोधश्चाकरणात् ॥ कZ_०३.१३.२१ ॥
अगर किसी ने दास के लिए पैसे ले लिए और फिर उसे आज़ाद नहीं किया। तो बारह पण जुर्माना लगेगा। और क़ैद भी करेंगे जब तक काम न करे।
Sutra 22
दासद्रव्यस्य ज्ञातयो दायादाः तेषामभावे स्वामी ॥ कZ_०३.१३.२२ ॥
दास की संपत्ति उसके रिश्तेदारों को मिलती है। अगर कोई रिश्तेदार नहीं है तो मालिक को मिल जाएगी।
Sutra 23
स्वामिनः स्वस्यां दास्यां जातं समातृकमदासं विद्यात् ॥ कZ_०३.१३.२३ ॥
अगर मालिक की अपनी दासी से कोई बेटा पैदा हो। तो वो बेटा और उसकी माँ दोनों आज़ाद माने जाएंगे, दास नहीं।
Sutra 24
गृह्या चेत्कुटुम्बार्थचिन्तनी माता भ्राता भगिनी चास्या अदासाः स्युः ॥ कZ_०३.१३.२४ ॥
अगर मकान मालिक उसे घर में लाए और वो घर का काम संभाले। तो उसकी माँ, भाई और बहन भी आज़ाद हो जाएंगे।
Sutra 25
दासं दासीं वा निष्क्रीय पुनर्विक्रयाधानं नयतो द्वादशपणो दण्डः अन्यत्र स्वयं वादिभ्यः । इति दासकल्पः ॥ कZ_०३.१३.२५ ॥
अगर कोई नौकर या दासी को आज़ाद कर दिया जाए, और फिर उसको वापस लेकर बेचने की कोशिश की जाए, तो फाइन लगेगा। फाइन होगा बारह पान। लेकिन अगर खुद केस फाइल किया हो, तो अलग बात है। यह था नौकरों के बारे में पूरा सेक्शन।
Sutra 26
कर्मकरस्य कर्मसम्बन्धमासन्ना विद्युः ॥ कZ_०३.१३.२६ ॥
जब कोई मज़दूर काम पे लगता है, उसकी ज़िम्मेदारी सीधा उस काम से जुड़ी होती है। यह बात समझने में आसान है, जो काम दिया गया है, उसी से वादा जुड़ा है।
Sutra 27
यथासम्भाषितं वेतनं लभेत कर्मकालानुरूपमसम्भाषितवेतनः ॥ कZ_०३.१३.२७ ॥
अगर पैसे पहले से तय हैं, तो वही मिलेगा। लेकिन अगर बात नहीं हुई, तो जो टाइम लगा है उसके हिसाब से पैसे मिलेंगे।
Sutra 28
कर्षकः सस्यानां गोपालकः सर्पिषां वैदेहकः पण्यानामात्मना व्यवहृतानां दशभागमसम्भाषितवेतनो लभेत ॥ कZ_०३.१३.२८ ॥
जब पैसे का कोई डील नहीं हुआ, तो हिसाब ऐसे चलता है। किसान को फसल का दसवा हिस्सा मिलता है। ग्वाला को घी का दसवा हिस्सा मिलता है। और जो व्यापारी माल बेचता है, उसको भी माल का दसवा हिस्सा मिलता है।
Sutra 29
अथवार्यमाधाय कुलबन्धन आर्याणामापदि निष्क्रयं चाधिगम्य बालं साहाय्यदातारं वा पूर्वं निष्क्रीणीरन् ॥ कZ_०३.१३.०५ ॥
लेकिन अगर पैसे की बात पक्की हो गई है, तो वही पैसे मिलेंगे। जो तय हुआ है, वही चलेगा।
Sutra 30
सकृदात्माधाता निष्पतितः सीदेत्द्विरन्येनाहितकः सकृदुभौ परविषयाभिमुखौ ॥ कZ_०३.१३.०६ ॥
जो लोग काम करके अपना काम दिखाते हैं, जैसे कारीगर, डॉक्टर, बोलने वाले, नौकर, उनका पैसे का हिसाब ऐसे चलता है। जो दूसरा ऐसा ही काम करने वाला लेता है, वही रेट चलू है। या फिर जो लोग इस काम को समझते हैं, वो बता देंगे कि कितना सही है।
Sutra 31
वित्तापहारिणो वा दासस्यार्यभावमपहरतोऽर्धदण्डः ॥ कZ_०३.१३.०७ ॥
सबूत सिर्फ गवाह की बात पे चलेगा। गवाह जो बोलेगा, वही माना जाएगा।
Sutra 32
निष्पतितप्रेतव्यसनिनामाधाता मूल्यं भजेत ॥ कZ_०३.१३.०८ ॥
अगर गवाह नहीं है, तो जहाँ काम हुआ वहाँ जाके चेक करो। वहाँ के लोगों से पूछो, जगह देखो, पता लगाओ।
Sutra 33
प्रेतविण्मूत्रोच्छिष्टग्राहणमाहितस्य नग्नस्नापनं दण्डप्रेषणमतिक्रमणं च स्त्रीणां मूल्यनाशकरं धात्रीपरिचारिकार्धसीतिकोपचारिकाणां च मोक्षकरम् ॥ कZ_०३.१३.०९ ॥
जब कोई मजदूरी का पैसा नहीं देता, तो सज़ा ये है। दस दिन की जेल, या छह पण जुर्माना।
Sutra 34
सिद्धमुपचारकस्याभिप्रजातस्यापक्रमणम् ॥ कZ_०३.१३.१० ॥
अगर कोई पैसा या माल गलत काम में लगा दे, तो सज़ा ये है। बारह पण जुर्माना, या पाँच दिन की जेल।
Sutra 35
धात्रीमाहितिकां वाकामां स्ववशां गच्छतः पूर्वः साहसदण्डः परवशां मध्यमः ॥ कZ_०३.१३.११ ॥
कोई आदमी अगर नदी की धार, आग, चोर या जानवर से फंसा हो। वो बचने के लिए रेस्क्यूअर को बोल दे कि मैं तुम्हे सब कुछ दे दूंगा, मेरा बेटा, मेरी बीवी, या खुद भी। पर बचने के बाद वो रेस्क्यूअर को सिर्फ़ इतना पैसा देगा जितना जजेस ठीक लगाए।
Sutra 36
कन्यामाहितिकां वा स्वयमन्येन वा दुषयतो मूल्यनाशः शुल्कं तद्द्वुगुणश्च दण्डः ॥ कZ_०३.१३.१२ ॥
इस एक रूल से यह समझ आ जाता है। जब कोई मुसीबत में कुछ गिफ्ट करे या वादा करे, और बाद में उसे बदलना हो, तो यह हर जगह सेम प्रिंसिपल पे हैंडल होगा।
Sutra 37
आत्मविक्रयिणः प्रजामार्यां विद्यात् ॥ कZ_०३.१३.१३ ॥
कोई भी औरत अपनी खुशी से किसी के साथ क्लोज़ हो कर फायदा उठा सकती है। यह सब उसकी मर्ज़ी का काम है, किसी ज़बरदस्ती नहीं।
Sutra 38
आत्माधिगतं स्वामिकर्माविरुद्धं लभेत पित्र्यं च दायम् ॥ कZ_०३.१३.१४ ॥
वो अपनी मेहनत से जो कमाता है, वो उसके पास रह सकता है, जब तक वो मालिक के काम में न आए। और उसको बाप की तरफ से भी हिस्सा मिलता है।
It prevents predatory enslavement and sexual coercion, preserves household productivity through clear redemption/value rules, and keeps the king’s courts as the sole legitimate authority over status disputes—raising social trust and economic continuity in the Janapada.
Penalties are graded (pūrva/madhyama/uttama; sometimes caturguṇa). Examples in this chapter include: half-penalty for theft that strips a slave’s Ārya-status claim; sāhasa-daṇḍa grades for illicitly taking a nurse/servant woman depending on consent/compulsion; and compensatory sanctions such as mūlyanāśa, śulka, and a daṇḍa of twice the śulka for defilement of a pledged maiden.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.
Read Arthashastra in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.