
Agnibheda–Vaṃśa: Forms of Agni, Their Functions, and Progeny (अग्निभेद-वंशः)
इस अध्याय में अग्नि का तात्त्विक तथा वंशानुक्रमात्मक वर्णन है। स्वायम्भुव मन्वन्तर में ब्रह्मा के मनस-पुत्र अभिमानी का उल्लेख होकर उनका स्वाहा से संबंध बताया गया है। उनसे पावक, पवमान और शुचि—ये तीन मुख्य अग्नि उत्पन्न होते हैं, जिनका संबंध क्रमशः वैद्युत (विद्युत्), निर्मथ्य (मंथन) और सौर (सूर्य) रूपों से जोड़ा गया है। आगे देवताओं के लिए हव्यवाहन और पितरों के लिए कव्यवाहन अग्नि का कार्य-भेद से निरूपण, तथा उनकी संततियों और उपभेदों (गार्हपत्य/आहवनीय आदि) के नाम दिए गए हैं। पुराण की ‘गणना द्वारा विश्व-मानचित्र’ शैली में नाम, भूमिका और पिता–पुत्र संबंधों की सूची बनती है, और अंत में अग्निवंश का नदियों से भी संक्षिप्त संबंध बताकर यज्ञाग्नि को पवित्र भू-परिदृश्य में स्थापित किया गया है।
Verse 1
विस्तरेणानुपूर्व्याच्च अग्नेर्वक्ष्याम्यतः परम् / इति श्रीब्रह्माण्डे महापुराणे वायुप्रोक्ते पूर्वभागे द्वितीये ऽनुषङ्गपादे ऋषिसर्गवर्णनं नामैकादशो ऽध्यायः सूत उवाच यो ऽसावग्ने रभिमानी स्मृतः स्वायंभुवे ऽन्तरे / ब्रह्मणो मानसः पुत्रस्तस्मात्स्वाहा व्यजायत
अब मैं अग्नि का विस्तृत और क्रमबद्ध वर्णन आगे कहूँगा। सूत बोले—स्वायम्भुव मन्वन्तर में जो अग्नि ‘अभिमानी’ कहलाए, वे ब्रह्मा के मानस पुत्र थे; उनसे स्वाहा उत्पन्न हुई।
Verse 2
पावकं पवमानं च शुचिरग्निश्च यः स्मृतः / निर्मथ्यः पवमानस्तु वैद्युतः पावकः स्मृतः
अग्नि के तीन नाम—पावक, पवमान और शुचि—कहे गए हैं। मथन से उत्पन्न अग्नि ‘पवमान’ और विद्युत् से उत्पन्न ‘पावक’ मानी गई है।
Verse 3
शुचिः सौरस्तु विज्ञेयः स्वाहापुत्रास्तु ते त्रयः / निर्मथ्यः पवमानस्तु शुचिः सौरस्तु यः स्मृतः
‘शुचि’ को सौर (सूर्यसम्बन्धी) जानना चाहिए; वे तीनों स्वाहा के पुत्र हैं। मथन से उत्पन्न ‘पवमान’ है, और जो ‘शुचि’ स्मृत है वह सौर है।
Verse 4
अब्योनिर्वैद्युतश्चैव तेषां स्थानानि तानि वै / पवमानात्मजश्चैव कव्यवाहन उच्यते
अब्योनि और वैद्युत—ये ही उनके-उनके स्थान कहे गए हैं; तथा पवमान का पुत्र ‘कव्यवाहन’ कहलाता है।
Verse 5
पावकिः सहरक्षस्तु हव्यवाहः शुचेः सुतः / देवानां हव्यवाहो ऽग्निः पितॄणां कव्यवाहनः
पावकि, सह-रक्षस् और हव्यवाह—ये शुचि के पुत्र हैं। देवताओं के लिए अग्नि ‘हव्यवाह’ है और पितरों के लिए ‘कव्यवाहन’ है।
Verse 6
सह रक्षो ऽसुराणां तु त्रयाणां तु त्रयो ऽग्नयः / एतेषां पुत्रपौत्रास्तु चत्वारिंशन्न वैव तु
रक्षसों और असुरों सहित इन तीनों के तीन अग्नि हैं; और इनके पुत्र-पौत्र कुल मिलाकर निश्चय ही चालीस हैं।
Verse 7
वक्ष्यामि नामभिस्तेषां प्रविभागं पृथक्पृथक् / विश्रुप्तो लौकिको ऽग्निस्तु प्रथमो ब्रह्मणः सुतः
अब मैं उनके विभाग को नामों सहित अलग-अलग बताऊँगा। ‘विश्रुप्त’ नामक लौकिक अग्नि ब्रह्मा का प्रथम पुत्र है।
Verse 8
ब्रह्मो दत्ताग्निस त्पुत्रो भरतो नाम विश्रुतः / वैश्वानरः सुतस्तस्य वहन् हव्यं समाः शतम्
ब्रह्मा का पुत्र दत्ताग्नि, ‘भरत’ नाम से प्रसिद्ध है। उसका पुत्र वैश्वानर सौ वर्षों तक हव्य वहन करता रहा।
Verse 9
संभृतो ऽथर्वणा पूर्वमेधितिः पुष्करोदधौ / सोथर्वा लौकिको ऽग्निस्तु दर्पहाथर्वणः स्मृतः
अथर्वण ऋषि पूर्वमेधिति ने पुष्कर-सरोवर के समुद्रतट पर अग्नि का संभार किया। वही अथर्वा लौकिक अग्नि है, जिसे ‘दर्पहा’ अथर्वण कहा गया है।
Verse 10
अथर्वा तु भृगुर्जज्ञे ह्यग्निराथर्वणः स्मृतः / तस्मात्स लौकिको ऽग्निस्तु दध्यङ्ङाथर्वणो मतः
अथर्वा से भृगु उत्पन्न हुए; और वही ‘आथर्वण अग्नि’ के रूप में स्मृत हैं। इसलिए वह लौकिक अग्नि ‘दध्यङ्’ आथर्वण मानी गई है।
Verse 11
आथर्वः पवमानस्तु निर्मथ्यः कविभिः स्मृतः / स ज्ञेयो गार्हपत्यो ऽग्निस्तस्य पुत्रद्वयं स्मृतम्
आथर्व पवमान को कवियों ने ‘निर्मथ्य’ (मंथन से उत्पन्न) कहा है। वही गार्हपत्य अग्नि जाननी चाहिए; उसके दो पुत्र स्मृत हैं।
Verse 12
शंस्यस्त्वाह वनीयो ऽग्नेः स्मृतो यो हव्यवाहनः / द्वितीयस्तु सुतः प्रोक्तः शुको ऽग्निर्यः प्रणीयते
शंस्य ‘वनीय’ अग्नि के रूप में स्मृत है, जो हव्यवाहन है। दूसरा पुत्र ‘शुक’ अग्नि कहा गया है, जिसे (यज्ञ में) प्रणीत किया जाता है।
Verse 13
तथा सव्यापसव्यौ च शंस्यस्याग्नेः सुतावुभौ / शंस्यस्तु षोडश नदीश्चकमे हव्यवाहनः
इसी प्रकार शंस्य अग्नि के ‘सव्य’ और ‘अपसव्य’ नामक दोनों पुत्र हैं। और हव्यवाहन शंस्य ने सोलह नदियों का वरण किया।
Verse 14
यो सावाहवनीयो ऽग्निरभिमानी द्विजैः स्मृतः / कावेरीं कृष्णवेणां च नर्मदां यमुनां तथा
जिसे द्विजों ने ‘आहवनीय अग्नि’ का अभिमानी देव कहा है, वही कावेरी, कृष्णवेणा, नर्मदा और यमुना (इन नदियों में) स्थित है।
Verse 15
गोदावरीं वितस्तां च चन्द्रभागामिरावतीम् / विपाशां कौशिकीञ्चैव शतद्रूं सरयूं तथा
तथा वह गोदावरी, वितस्ता, चन्द्रभागा, इरावती, विपाशा, कौशिकी, शतद्रु और सरयू (इन नदियों में भी) स्थित है।
Verse 16
सीतां सरस्वतीं चैव ह्रादिनीं पावनीन्तथा / तासु षोडशधामानं प्रविभज्य पृथक्पृथक्
और सीता, सरस्वती, ह्रादिनी तथा पावनी—इनमें भी, सोलह धामों को अलग-अलग बाँटकर (उसने व्यवस्था की)।
Verse 17
आत्मानं व्यदधात्तासु धिष्णीष्वथ बभूव सः / कृत्तिकाचारिणी धिष्णी जज्ञिरे ताश्च धिष्णयः
फिर उसने उन धिष्णियों में अपना स्वरूप स्थापित किया और वही उनमें प्रकट हुआ; कृतिका-चारी धिष्णी से वे धिष्णियाँ उत्पन्न हुईं।
Verse 18
धिष्णीषु जज्ञिरे यस्माद् धिष्णयस्तेन कीर्त्तिताः / इत्येते वै नदीपुत्रा धिष्णीष्वेवं विजज्ञिरे
क्योंकि वे धिष्णियों में उत्पन्न हुए, इसलिए ‘धिष्णय’ कहलाए; इस प्रकार ये नदी-पुत्र धिष्णियों में ही उत्पन्न हुए।
Verse 19
तेषां विहरणीया ये उपस्थेयाश्च ये ऽग्नयः / ताञ्शृणुध्वं समासेन कीर्त्यमानान्यथातथम्
उन अग्नियों में जो विचरणीय हैं और जो उपास्य हैं, उनका संक्षेप में यथावत् वर्णन सुनो।
Verse 20
विभुः प्रवाहणो ग्नीध्रस्तत्रस्था धिष्णयो ऽपरे / विधीयन्ते यथास्थानं सूत्याहे सवने क्रमात्
विभु, प्रवाहण, ग्नीध्र तथा वहाँ स्थित अन्य धिष्ण्य—ये सब सूत्याह के सवन में क्रम से अपने-अपने स्थान पर स्थापित किए जाते हैं।
Verse 21
अनुद्देश्य निवास्यानामग्नीनां शृणुत क्रमम् / सम्राडग्नि कृशानुर्यो द्वितीयोंऽतरवेदिकः
अब अनुद्देश्य-निवास्य अग्नियों का क्रम सुनो—सम्राडग्नि ‘कृशानु’ है और दूसरा अन्तरवेदिक है।
Verse 22
सम्राडग्नमुखानष्टौ उपतिष्ठन्ति तान् द्विजान् / परिषत्पवमानस्तु द्वितीय सो ऽनुदिश्यते
सम्राडग्नि के मुख से आठ अग्नियाँ उन द्विजों की सेवा में उपस्थित रहती हैं; ‘परिषत्पवमान’ दूसरा अनुदिश्य कहा जाता है।
Verse 23
प्रतल्कान्यो नभोनाम चत्वरेसौ विभाव्यते / हव्यस्ततो ह्यसंमृष्टः शामित्रे ऽग्नौ विभाव्यते
‘प्रतल्कान्य’ नामक ‘नभो’ इस चत्वर में स्थापित माना जाता है; फिर ‘हव्य’ नामक असंमृष्ट अग्नि शामित्र-अग्नि में स्थापित मानी जाती है।
Verse 24
ऋतुधामा च सुज्योतिरौदुंबर्यः प्रकीर्त्यते / विश्वव्यचाः समुद्रो ऽग्निर्ब्रह्मस्थाने स कीर्त्यते
उसे ‘ऋतुधामा’ और ‘सुज्योति-औदुम्बर्य’ कहा जाता है। ‘विश्वव्यचा’ नामक समुद्र-स्वरूप अग्नि ब्रह्मस्थान में कीर्तित है।
Verse 25
ब्रह्मज्योतिर्वसुर्धामा ब्रह्मस्थाने स उच्यते / अचौकपादुपस्थो यः स वै शालासुखीयकः
ब्रह्मस्थान में उसे ‘ब्रह्मज्योति’ और ‘वसुर्धामा’ कहा जाता है। जो चौक (चतुष्कोण) के पादों के समीप स्थित है, वही ‘शालासुखीयक’ कहलाता है।
Verse 26
अनुहेश्यो ह्यहिर्बुध्न्यो सो ऽग्रिर्गृहपतिः स्मृतः / शंस्यस्यैते सुताः सर्वे उपस्थेया द्विजैः स्मृताः
‘अनुहेश्य’ और ‘अहिर्बुध्न्य’—यह अग्नि ‘गृहपति’ मानी गई है। ‘शंस्य’ के ये सभी पुत्र द्विजों द्वारा उपास्य कहे गए हैं।
Verse 27
ततो विहरणीयांश्च वक्ष्याम्यष्टौ च तत्सुतान् / विभुः प्रवाहणो ऽग्नीध्रस्तेषां धिष्ण्यस्तथा परे
इसके बाद मैं ‘विहरणीय’ तथा उसके आठ पुत्रों का वर्णन करूँगा। उनमें ‘विभु’, ‘प्रवाहण’ और ‘अग्नीध्र’ हैं; तथा अन्य भी उनके धिष्ण्य (आसन/स्थान) हैं।
Verse 28
विधीयन्ते यथास्थानं सौत्ये ऽह्नि सवने क्रमात् / होत्रीयस्तु स्मृते ह्यग्निर्वह्निर्यो हव्यवाहनः
सौत्य-अह्नि में सवन के क्रम से वे यथास्थान नियोजित किए जाते हैं। होत्रीय अग्नि वही मानी गई है जो ‘वह्नि’—हव्यवाहन है।
Verse 29
प्रशान्तो ऽग्निः प्रचेतास्तु द्वितीयश्चात्र नामकः / ततो ऽग्निर्वैश्वदेवस्तु ब्राह्मणाच्छंसिरुच्यते
यहाँ दूसरा अग्नि ‘प्रचेताः’ नाम से कहा गया है, और ‘प्रशान्त’ भी कहलाता है। इसके बाद ‘वैश्वदेव’ अग्नि को ‘ब्राह्मणाच्छंसि’ कहा जाता है।
Verse 30
उशिगग्निः कविर्यस्तु पोतो ऽग्निः स विभाव्यते / आवारिरग्निर्वाभारिर्वैष्ठीयः स विभाव्यते
‘उशिग्’ अग्नि ‘कवि’ कहलाता है और ‘पोत’ नामक अग्नि भी प्रसिद्ध है। ‘आवारि’ तथा ‘आभारि’ अग्नि को ‘वैष्ठीय’ भी माना जाता है।
Verse 31
अवस्फूर्जो विवस्वांस्तु आस्थांश्चैव स उच्यते / अष्टमः सुध्युरग्निर्योमार्जालीयः स उच्यन्ते
‘अवस्फूर्ज’ अग्नि को ‘विवस्वान्’ और ‘आस्थांश्च’ भी कहा जाता है। आठवाँ अग्नि ‘सुध्युः’ नाम से, तथा ‘योमार्जालीय’ भी कहलाता है।
Verse 32
धिष्ण्यावाहरणा ह्येते सौत्येह्नीज्यन्त वै द्विजैः / अपां योनिः स्मृतो ऽसौ स ह्यप्सुनामा विभाव्यते
ये ‘धिष्ण्यावाहरण’ अग्नि सौत्य-दिवस में द्विजों द्वारा पूजे जाते हैं। वह ‘अपां योनिः’ स्मृत है और ‘अप्सुनामा’ भी माना जाता है।
Verse 33
ततो यः पावको नाम्ना अब्जो यो गर्भ उच्यते / अग्निः सो ऽवभृथे ज्ञेयो वरुणेन सहेज्यते
इसके बाद ‘पावक’ नामक अग्नि ‘अब्ज-गर्भ’ भी कहलाता है। वह ‘अवभृथ’ में जानने योग्य है और वरुण के साथ उसकी पूजा होती है।
Verse 34
त्दृच्छयस्तत्सुतो ह्यग्निर्जठरे यो नृणां पचन् / मृत्युमाञ् जाठरस्याग्नेर्विद्वानाग्निः सुतः स्मृतः
संयोगवश उसका पुत्र वही अग्नि है जो मनुष्यों के जठर में रहकर अन्न को पचाती है। उस जाठराग्नि को ‘मृत्युमान’ कहा गया है, और ‘विद्वान्-अग्नि’ उसका पुत्र माना गया है।
Verse 35
परस्परोत्थितः सो ऽग्निर्भूतानीह विनिर्दहेत् / पुत्रस्त्वग्नेर्मन्युमतो घोरः संवर्तकः स्मृतः
परस्पर से उत्पन्न वह अग्नि यहाँ समस्त भूतों को भस्म कर देती है। क्रोधयुक्त अग्नि का पुत्र ‘संवर्तक’ अत्यन्त घोर माना गया है।
Verse 36
पिबन्नवः स वसति समुद्रे वडवामुखः / समुद्रवासिनः पुत्रः साहरक्षो विभाव्यते
वह वडवामुख अग्नि समुद्र में निवास करता है और जल को पीता रहता है। समुद्र में रहने वाले का पुत्र ‘साहरक्ष’ माना जाता है।
Verse 37
सहरक्षसुतः क्षामो गृहाणां दहते नृणाम् / क्रव्यादग्निः सुतस्तस्य पुरुषानत्ति यो मृतान्
साहरक्ष का पुत्र ‘क्षाम’ मनुष्यों के घरों को जला देता है। उसका पुत्र ‘क्रव्याद-अग्नि’ है, जो मृत पुरुषों के मांस को भक्षण करता है।
Verse 38
इत्येते पावकस्याग्नेः पुत्रा एव प्रकीर्त्तिताः / ततः शुचिस्तु वै सौरो गन्धर्वैरायुराहुतः
इस प्रकार पावक अग्नि के ये पुत्र ही वर्णित किए गए हैं। इसके बाद सूर्यसम्बन्धी ‘शुचि’ है, जिसे गन्धर्वों ने ‘आयु’ नाम से आहुत किया।
Verse 39
मथितो यस्त्वरण्यां च सो ऽग्निरग्निं समिन्धति / आयुर्नाम्ना तु भगवानसौ यस्तु प्रणीयते
जो अग्नि अरण्य में मथकर उत्पन्न होता है, वही अग्नि को प्रज्वलित करता है। वह भगवान् ‘आयु’ नाम से प्रसिद्ध है, जिसे विधिपूर्वक आगे ले जाया जाता है।
Verse 40
आयुषो महिषः पुत्रः सहसो नाम तत्सुतः / पाकयज्ञेष्वभीमानी सोग्निस्तु सहसः स्मृतः
आयु के पुत्र महिष हैं और उनके पुत्र का नाम सहस है। पाकयज्ञों में अभिमानी (अधिष्ठाता) वही अग्नि ‘सहस’ कहलाती है।
Verse 41
पुत्रश्च सहसस्याग्नेरद्भुतः स महायशाः / विविधिश्चाद्भुतस्यापि पुत्रो ऽग्नेस्तुमाहान्स्मृतः
सहस नामक अग्नि के पुत्र अद्भुत हैं, जो महायशस्वी हैं। और अद्भुत के भी पुत्र ‘विविधि’ हैं, जिन्हें अग्नि का महान् पुत्र कहा गया है।
Verse 42
प्रायश्चित्तेष्वभीमानी हुतं भुङ्क्ते हविः सदा / विविधेस्तु सुतो ह्यर्क्क स्तस्य चाग्नेः सुता इमे
प्रायश्चित्त कर्मों में अभिमानी (अधिष्ठाता) होकर वह सदा हुत हवि का भोग करता है। और विविधि का पुत्र ‘अर्क’ है; उस अग्नि के ये पुत्र (आगे) हैं।
Verse 43
अनीकवान् वाजसृक् च रक्षोहा चष्टिकृत्तथा / सुरभिर्वसुरन्नादो प्रविष्टो यः स रुकमराट्
अनीकवान्, वाजसृक्, रक्षोहा और चष्टिकृत—तथा सुरभि, वसुर, अन्नाद; जो इनमें प्रविष्ट है, वह ‘रुकमराट्’ कहलाता है।
Verse 44
शुचेरग्नेः प्रजा ह्येषा वह्नयश्च चतुर्द्दश / इत्येते चाग्नयः प्रोक्ताः प्रणीयन्तेध्वरेषु वै
शुचि अग्नि की यह प्रजा है और चौदह वह्नि हैं; ये अग्नि ऐसे कहे गए हैं और यज्ञों में विधिपूर्वक स्थापित किए जाते हैं।
Verse 45
आदिसर्गे व्यतीता वै यामैः सह सुरोत्तमैः / स्वायंभुवे ऽन्तरे पूर्वमग्नयस्तेभिमानिनः
आदि-सृष्टि में वे श्रेष्ठ देवों के साथ यामों सहित व्यतीत हुए; स्वायंभुव मन्वंतर के पूर्व वे अग्नि अपने-अपने अभिमान (अधिष्ठान) वाले थे।
Verse 46
एते विहरणीयेषु चेतनाचेतनेषु वै / स्थानाभिमानिनो लोके प्रागासन्हव्यवाहनाः
ये चल-अचल, चेतन-अचेतन सभी लोकों में विचरण करने योग्य स्थानों में थे; पहले ये हव्यवाहन अग्नि लोक में अपने-अपने स्थान के अभिमानी थे।
Verse 47
काम्यनै मित्तिका यज्ञेष्वेते कर्मस्ववस्थिताः / पूर्वमन्वतंरे ऽतीताः शुकैर्यागैश्च तैः सह
काम्य और नैमित्तिक यज्ञों में ये अग्नि अपने-अपने कर्मों में स्थित रहे; पूर्व मन्वंतर में वे शुक (शुद्ध) यागों के साथ ही व्यतीत हो गए।
Verse 48
देवैर्महात्मभिः पुण्यैः प्रथमस्यान्तरे मनोः / इत्येतानि मजोक्तानि स्थानानि स्थानिनश्च ह
प्रथम मनु के अंतर में पुण्यात्मा महात्मा देवों के द्वारा—ये स्थान और उनके अधिष्ठाता—ऐसे मैंने कहे हैं।
Verse 49
तैरेव तु प्रसंख्यातमतीतानागतेष्विह / सन्वन्तरेषु सर्वेषु लक्षणं जातवेदसाम्
इन्हीं के द्वारा यहाँ अतीत और भविष्य के सभी मन्वन्तरों में जातवेद (अग्नियों) के लक्षण गिने गए हैं।
Verse 50
सर्वे तपस्विनो ह्येते सर्वे ब्रह्मभृतस्तथा / प्रजानां पतयः सर्वे ज्योतिष्मन्तश्च ते स्मृताः
ये सभी तपस्वी हैं, सभी ब्रह्म-धारण करने वाले हैं; ये सब प्रजाओं के स्वामी हैं और तेजस्वी माने गए हैं।
Verse 51
स्वारोचिषादिषु ज्ञेयाः सावर्ण्यं तेषु सप्तसु / मन्वन्तरेषु सर्वेषु नामरूपप्रयोजनैः
स्वारोचिष आदि सात मन्वन्तरों में उन्हें ‘सावर्ण्य’ नाम से, उनके नाम-रूप और प्रयोजन के अनुसार जानना चाहिए।
Verse 52
वर्त्तन्ते वर्त्तमानैश्च यामैदेवैः सहाग्नयः / अनागतैः सुरैः सार्द्धं वर्त्स्यन्ते ऽनागताग्नयः
वर्तमान याम-देवों के साथ ये अग्नियाँ वर्तमान में प्रवृत्त हैं; और भविष्य की देवताओं के साथ भविष्य की अग्नियाँ प्रवृत्त होंगी।
Verse 53
इत्येष निचयो ऽग्नीनामनुक्रान्तो यथाक्रमम् / विस्तरेणानुपुर्व्या च पितॄणां वक्ष्यते पुनः
इस प्रकार अग्नियों का यह समूह क्रम से बताया गया; अब पितरों का भी विस्तारपूर्वक और क्रमशः फिर से वर्णन किया जाएगा।
A genealogical chain centered on Agni: Abhimānī (as Brahmā’s mind-born son in the Svāyaṃbhuva Manvantara) linked with Svāhā, producing the triad Pāvaka–Pavamāna–Śuci, followed by further named descendants and specialized fires aligned to ritual functions.
Havyavāha is identified as the fire that conveys offerings (havya) to the Devas, while Kavyavāhana is associated with offerings (kavya) for the Pitṛs, expressing a cosmological division of sacrificial transmission by recipient domain.
No. The sampled content is a ritual-cosmological and genealogical taxonomy of Agni and related fires; Lalitopākhyāna themes (vidyā/yantra, Śrīvidyā theology, Bhaṇḍāsura narrative) belong to later sections of the Brahmāṇḍa Purāṇa’s overall structure.