
Ballava (Bhīma) Seeks Employment as Royal Cook in Virāṭa’s Court
Upa-parva: Ajñātavāsa-praveśa (Ballava’s Entry into Virāṭa’s Service)
Vaiśaṃpāyana describes a powerful newcomer approaching Virāṭa with conspicuous radiance and lion-like bearing while carrying kitchen implements, signaling a deliberate performance of humble vocation. Virāṭa publicly questions the youth’s identity, noting the mismatch between asserted occupation (sūda/cook) and visible excellence in form, vigor, and presence. Bhīma answers with controlled self-presentation: he claims the name Ballava, requests placement as an expert preparer of dishes, and emphasizes serviceability and prior culinary experience associated with royal standards. He further asserts unmatched strength and readiness to confront dangerous animals if required, reframing physical prowess as protective utility rather than political threat. Virāṭa grants him the boon of kitchen leadership, appointing him over established personnel. The chapter closes with the narrator’s note that Bhīma resides there without being recognized by the general populace or attendants, reinforcing the operational success of concealment through institutional role-assignment.
Chapter Arc: अज्ञातवास की शर्तों के बीच युधिष्ठिर ‘कंक’ नाम से विराट की राजसभा में प्रवेश करते हैं—अपने तेज को ढँककर भी राजोचित गरिमा के साथ। → सभा में विराट का यशस्वी, दुर्जेय व्यक्तित्व (तीक्ष्णविष उरग के समान) और पाण्डव की छिपी हुई प्रभा (भस्मावृत अग्नि/मेघावृत सूर्य) एक-दूसरे के सामने आती है; पहचान खुल जाने का सूक्ष्म भय और शरण-याचना की मर्यादा साथ-साथ चलती है। → युधिष्ठिर अपना आवरण स्पष्ट करते हैं—‘मैं पूर्व में पासा खेलने में कुशल था; अब ब्राह्मण-रूप में कंक नाम से प्रसिद्ध होकर आपकी सेवा में आया हूँ’—और विराट उन्हें सखा-भाव से स्वीकार कर निर्भय आश्रय का वचन देता है। → विराट कंक को वस्त्र, भोजन, पान और भीतर-बाहर निर्बाध प्रवेश का अधिकार देता है; राज्य में किसी के विरोध/अपमान पर दण्ड और संरक्षण का आश्वासन देता है—युधिष्ठिर का सुरक्षित निवास सुनिश्चित होता है। → पहचान छिपी रहते हुए भी ‘अग्नि-सा वीर्यवान’ अतिथि दरबार में टिक गया है—अब अन्य पाण्डव किस रूप में प्रवेश करेंगे और यह गोपनीयता कब तक टिकेगी?
Verse 1
#::73:.8 #::3...7 () हि 2 7 सप्तमो<्ध्याय: युधिष्ठिरका राजसभामें जाकर विराटसे मिलना और वहाँ आदरपूर्वक निवास पाना वैशम्पायन उवाच (ततस्तु ते पुण्यतमां शिवां शुभां महर्षिगन्धर्वनिषेवितोदकाम् । त्रिलोककान्तामवतीर्य जाह्ववी- मृषीश्च देवांश्व पितृनतर्पयन् ।। वैशम्पायनजी कहते है--राजन्! तदनन्तर पाण्डवोंने परम पवित्र, कल्याणमयी, मंगलस्वरूपा, त्रिभुवनकमनीया गंगामें, जिसके जलका महर्षि और गन्धर्वगण सदा सेवन करते हैं, उतरकर देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण किया। वरप्रदानं हानुचिन्त्य पार्थिवो हुताग्निहोत्र: कृतजप्यमज्ूल: । दिशं तथैन्द्रीमभित: प्रपेदिवान् कृताञ्जलिधर्धर्ममुपाह्नयच्छनै: ।। तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिर अग्निहोत्र, जप और मंगलपाठ करके धर्मराजके दिये हुए वरदानका चिन्तन करते हुए पूर्व दिशाकी ओर चले और हाथ जोड़कर धीरे-धीरे धर्मराजका स्मरण करने लगे। युधिछिर उवाच वरप्रदानं मम दत्तवान् पिता प्रसन्नचेता वरद: प्रजापति: । जलार्थिनो मे तृषितस्य सोदरा मया प्रयुक्ता विविशुर्जलाशयम् ।। युधिषछ्िर बोले--मेरे पिता प्रजापति धर्म वरदायक देवता हैं। उन्होंने प्रसन्नचित्त होकर मुझे वर दिया है। मैंने प्याससे पीड़ित हो जलकी इच्छासे अपने भाइयोंको भेजा था। मेरी प्रेरणासे ही वे एक सरोवरमें उतरे। निपातिता यक्षवरेण ते वने महाहवे वज्रभूृतेव दानवा: | मया च गत्वा वरदो5भितोषितो विवक्षता प्रश्नसमुच्चयं गुरु: ।। परंतु उस वनमें श्रेष्ठ यक्षके रूपमें आये हुए उन धर्मराजने मेरे भाइयोंको उसी प्रकार धराशायी कर दिया, जैसे वज्रधारी इन्द्र महान् संग्राममें दानवोंको मार गिराते हैं। तब मैंने वहाँ जाकर उनके प्रश्नोंका उत्तर दे उन वरदायक गुरुरूप पिताको संतुष्ट किया। स मे प्रसन्नो भगवान् वरं ददौ परिष्वजंश्लवाह तथैव सौहृदात् । वृणीष्व यद् वाउ्छसि पाण्डुनन्दन स्थितो<न्तरिक्षे वरदो5स्मि पश्यताम् ।। उस समय प्रसन्न हो भगवान् धर्मने बड़े स्नेहसे मुझे हृदयसे लगाया और वर देनेके लिये उद्यत हो मुझसे कहा--'पाण्डुनन्दन! तुम जो कुछ चाहते हो, वह मुझसे माँग लो। मैं तुम्हें वर देनेके लिये आकाशमें खड़ा हूँ। मेरी ओर देखो।' स वै मयोक्तो वरद: पिता प्रभु: सदैव मे धर्मरता मतिर्भवेत् । इमे च जीवन्तु ममानुजा: प्रभो वपुश्च॒ रूपं च बल॑ तथाप्तुयु: ।। तब मैंने अपने वरदायक पिता भगवान् धर्मराजसे कहा--'प्रभो! मेरी बुद्धि सदा धर्ममें ही लगी रहे तथा ये मेरे छोटे भाई जीवित हो जायँ और पहले-जैसा रूप, युवावस्था एवं बल प्राप्त कर लें। क्षमा च कीर्तिश्व यथेष्टतो भवेद् व्रतं च सत्यं च समाप्तिरेव च । वरो ममैषोडस्तु यथानुकीर्तितो न तन्मृषा देववरो यदब्रवीत् ।। “हमलोगोंमें इच्छानुसार क्षमा और कीर्ति हो और हम अपने सत्यव्रतको पूर्ण कर लें; यही वर हमें प्राप्त होना चाहिये।” जैसा कि मैंने बताया, वैसा ही वर उन्होंने दिया। देवेश्वर धर्मने जैसा कहा है, वह कभी मिथ्या नहीं हो सकता। वैशम्पायन उवाच इत्येवमुक््त्वा धर्मात्मा धर्ममेवानुचिन्तयन् । तदैव तत्प्रसादेन रूपमेवाभजत् स्वकम् ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ऐसा कहकर धर्मात्मा युधिष्ठिर उस समय धर्मका ही बार-बार चिन्तन करने लगे। तब धर्मदेवके प्रसादसे उन्होंने तत्काल अपने अभीष्ट स्वरूपको प्राप्त कर लिया। स वै द्विजातिस्तरुणस्त्रिदण्डधृक् कमण्डलूष्णीषधरो5न्वजायत । सुरक्तमाञ्जिष्ठवराम्बर: शिखी पवित्रपाणिर्ददृशे तदद््भुतम् ।। वे कमण्डलु और पगड़ी धारण किये त्रिदण्डधारी तरुण ब्राह्मण बन गये। उनके शरीरपर मँजीठके रंगके सुन्दर लाल वस्त्र शोभा पाने लगे तथा मस्तकपर शिखा दिखायी देने लगी। वे हाथमें कुश लिये अद्भुत रूपमें दृष्टिगोचर होने लगे। तथैव तेषामपि धर्मचारिणां यथेप्सिता ह्वाभरणाम्बरस्रज: । क्षणेन राजन्नभवन्महात्मनां प्रशस्तधर्माग्रयफलाभिकाड्क्षिणाम् ।।) राजन! इसी प्रकार उत्तम धर्मके श्रेष्ठ फलकी अभिलाषा रखनेवाले उन सभी धर्मचारी महात्मा पाण्डवोंको क्षणभरमें उनके अभीष्ट वेशके अनुरूप वस्त्र, आभूषण और माला आदि वस्तुएँ प्राप्त हो गयीं। ततो विराट प्रथमं युधिष्ठिरो राजा सभायामुपविष्टमाव्रजत् । वैदूर्यरूपान् प्रतिमुच्य काउचना- नक्षान् स कक्षे परिगृह्म वाससा,तदनन्तर वैदूर्यके समान हरी, सुवर्णके समान पीली (त(था लाल और काली) चौसरकी गोटियोंसहित पासोंको कपड़ेमें बाँधकर बगलमें दबाये हुए राजा युधिष्ठिर सबसे पहले राजाके दरबारमें गये। उस समय राजा विराट सभामें बैठे थे
Vaiśampāyana said: Then the Pāṇḍavas descended into the most sacred Jāhnavī (the Gaṅgā)—auspicious and beneficent, whose waters are frequented by great seers and Gandharvas, and lovely to the three worlds—and there they performed libations, satisfying the Ṛṣis, the gods, and the ancestors.
Verse 2
नराधिपो राष्ट्रपतिं यशस्विनं महायशा: कौरववंशवर्धन: । महानुभावो नरराजसत्कृतो दुरासदस्तीक्षणविषो यथोरग:,वे बड़े यशस्वी और मत्स्यराष्ट्रके अधिपति थे। राजा युधिष्ठिर भी महान् यशस्वी, कौरववंशकी मर्यादाको बढ़ानेवाले तथा महानुभाव (अत्यन्त प्रभावशाली) थे। सब राजे- महाराजे उनका सत्कार करते थे। तीखे विषवाले सर्पकी भाँति वे दुर्धर्ष थे। बल और रूपकी दृष्टिसे मनुष्योंमें सबसे श्रेष्ठ और महान् थे। अपने अपूर्व रूपके कारण वे देवताके समान जान पड़ते थे। महामेघमालाओंसे आवृत सूर्य तथा राखमें छिपी हुई अग्निके समान उनका तेजस्वी रूप वेशभूषासे आच्छादित था। वे बड़े पराक्रमी थे
Vaiśaṃpāyana said: The lord of men (Yudhiṣṭhira), illustrious and of great renown, a true enhancer of the Kuru lineage, was a person of commanding presence. Honoured by kings, he was hard to assail—like a serpent with piercing venom.
Verse 3
बलेन रूपेण नरर्षभो महा- नपूर्वरूपेण यथामरस्तथा । महाभ्रजालैरिव संवृतो रवि- यथानलो भस्मवृतश्च वीर्यवान्,वे बड़े यशस्वी और मत्स्यराष्ट्रके अधिपति थे। राजा युधिष्ठिर भी महान् यशस्वी, कौरववंशकी मर्यादाको बढ़ानेवाले तथा महानुभाव (अत्यन्त प्रभावशाली) थे। सब राजे- महाराजे उनका सत्कार करते थे। तीखे विषवाले सर्पकी भाँति वे दुर्धर्ष थे। बल और रूपकी दृष्टिसे मनुष्योंमें सबसे श्रेष्ठ और महान् थे। अपने अपूर्व रूपके कारण वे देवताके समान जान पड़ते थे। महामेघमालाओंसे आवृत सूर्य तथा राखमें छिपी हुई अग्निके समान उनका तेजस्वी रूप वेशभूषासे आच्छादित था। वे बड़े पराक्रमी थे
Vaiśaṃpāyana said: In strength and in beauty he was a great bull among men. By his extraordinary appearance he seemed like a god. Yet his splendor was concealed by his disguise—like the sun veiled by vast masses of clouds, or fire hidden beneath ashes—while his inner power remained fully intact.
Verse 4
तमापतत्तं प्रसमीक्ष्य पाण्डवं विराटराडिन्दुमिवा भ्रसंवृतम् । समागतं पूर्णशशिप्रभाननं महानुभावं न चिरेण दृष्टवान्,उनका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहा था। बादलोंसे ढके हुए चन्द्रमाकी भाँति शोभायमान महानुभाव पाण्डुनन्दनको आते देख राजा विराटकी दृष्टि सहसा उनकी ओर आकृष्ट हो गयी। निकट आनेपर शीघ्र ही उन्होंने बड़े गौरसे उनकी ओर देखा
Vaiśampāyana said: Seeing the Pāṇḍava approaching, King Virāṭa’s gaze was at once drawn to him—like the moon shining though veiled by clouds. As the great-souled man came nearer, his face radiant like the full moon, the king soon looked upon him closely and with careful attention.
Verse 5
मन्त्रिद्विजान् सूतमुखान् विशस्तथा ये चापि केचित् परित: समासते । पप्रच्छ को<यं प्रथमं समेयिवान् नृपोपमो<यं समवेक्षते सभाम्,मन्त्री, ब्राह्मण, सूत-मागध आदि, वैश्यगण तथा अन्य जो कोई भी सभासद् उनके दायें-बायें सब ओर बैठे थे, उन सबसे राजाने पूछा--“ये कौन हैं? जो पहले-पहल यहाँ पधारे हैं? ये तो किसी राजाकी भाँति मेरी सभाको निहार रहे हैं!
Vaiśampāyana said: The king questioned all those seated around him—his ministers, the Brahmins, the bards and heralds (sūtas and the like), the Vaiśyas, and any others present: “Who is this man who has arrived here first? He looks like a king, and he surveys my assembly as though it were his own.”
Verse 6
इस प्रकार श्रीमह्याभारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें दुगस्तोत्रविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ,नतु द्विजो5यं भविता नरोत्तम: पति: पृथिव्या इति मे मनोगतम् । न चास्य दासो न रथो न कुण्जर: समीपतो भ्राजति चायमिन्द्रवत् इनका वेश तो ब्राह्मणका-सा है, किंतु ये ब्राह्मण नहीं हो सकते। ये नरश्रेष्ठ तो कहींके भूपति ही होंगे; ऐसा विचार मेरे मनमें उठ रहा है। परंतु इनके साथ दास, रथ और हाथी- घोड़े आदि कुछ भी नहीं हैं। फिर भी ये निकटसे इन्द्रके समान सुशोभित हो रहे हैं
Vaiśampāyana said: “Yet this man cannot be a brahmin, though his appearance resembles one. In my mind arises the thought that this best of men must be a ruler of the earth. And still, he has neither attendant, nor chariot, nor elephant nearby; nevertheless, standing close, he shines with a splendor like Indra.”
Verse 7
शरीरलिज़्ैरुपसूचितो हाय॑ मूर्द्धाभिषिक्त इति मे मनोगतम् | समीपमायाति च मे गतव्यथो यथा गजस्तामरसीं मदोत्कट:,“इनके शरीरमें जो लक्षण दृष्टिगोचर हो रहे हैं, उनसे यह सूचित होता है कि ये मूद्धाभिषिक्त सम्राट् हैं। मेरे मनमें तो यही बात आती है। जैसे मतवाला हाथी बेखटके किसी कमलिनीके पास जाता हो, उसी प्रकार ये बिना किसी संकोचके--व्यथारहित होकर मेरी सभामें आ रहे हैं! इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि युधिष्ठिरप्रवेशो नाम सप्तमो5ध्याय:
Vaiśaṃpāyana said: “From the bodily marks visible on him, it is clearly indicated that this man is a consecrated sovereign king. That is the conclusion that forms in my mind. And he approaches close to me, free from anxiety—just as a rut-maddened elephant goes straight to a lotus-pond without hesitation. In the same way, he is entering my hall without any embarrassment or fear.”
Verse 8
वितर्कयन्तं तु नरर्षभस्तथा युधिष्ठिरो$भ्येत्य विराटमब्रवीत् । सम्राड्विजानात्विह जीवनार्थिन विनष्टसर्वस्वमुपागतं द्विजम्,इस प्रकार तर्क-वितर्कमें पड़े हुए राजा विराटके पास आकर नरश्रेष्ठ युधिष्ठिरने कहा --“महाराज! आपको विदित हो; मैं एक ब्राह्मण हूँ, मेरा सर्वस्व नष्ट हो गया है; अतः मैं आपके यहाँ जीवननिर्वाहके लिये आया हूँ
Seeing King Virāṭa absorbed in anxious deliberation, Yudhiṣṭhira, the best of men, approached and spoke: “O sovereign, know this: I am a brāhmaṇa who has lost all his possessions. Seeking only the means to live, I have come here to you.”
Verse 9
इहाहमिच्छामि तवानघान्तिके वस्तुं यथा कामचरस्तथा विभो । तमब्रवीत् स्वागतमित्यनन्तरं राजा प्रह्ृष्ट: प्रतिसंगृहाण च,“अनघ! मैं यहाँ आपके समीप रहना चाहता हूँ। प्रभो! जैसी आपकी इच्छा होगी, उसी प्रकार सब कार्य करते हुए मैं यहाँ रहूँगा।' युधिष्ठिरकी बात सुनकर राजा विराट बहुत प्रसन्न हुए और बोले--“ब्रह्मनन्! आपका स्वागत है।” तदनन्तर उन्होंने राजाओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरको सादर ग्रहण किया। ग्रहण करके राजा विराटने प्रसन्न मनसे उनसे इस प्रकार कहा--“तात! मैं प्रेमपूर्वक्कत आपसे पूछता हूँ, आप इस समय किस राजाके राज्यसे यहाँ आये हैं?
Vaishampayana said: “I wish to dwell here near you, O blameless one. O lord, I shall act in every matter exactly as you desire.” Hearing this, King Virata was greatly delighted and said at once, “Welcome!” Then the king respectfully received Yudhishthira, best among rulers, and, with a pleased heart, addressed him further with affectionate inquiry about the kingdom from which he had come.
Verse 10
तं॑ राजसिंहं प्रतिगृह्य राजा प्रीत्या55त्मना चैनमिदं बभाषे | कामेन ताताभिवदाम्यहं त्वां कस्यासि राज्ञो विषयादिहागत:,“अनघ! मैं यहाँ आपके समीप रहना चाहता हूँ। प्रभो! जैसी आपकी इच्छा होगी, उसी प्रकार सब कार्य करते हुए मैं यहाँ रहूँगा।' युधिष्ठिरकी बात सुनकर राजा विराट बहुत प्रसन्न हुए और बोले--“ब्रह्मनन्! आपका स्वागत है।” तदनन्तर उन्होंने राजाओंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरको सादर ग्रहण किया। ग्रहण करके राजा विराटने प्रसन्न मनसे उनसे इस प्रकार कहा--“तात! मैं प्रेमपूर्वक्कत आपसे पूछता हूँ, आप इस समय किस राजाके राज्यसे यहाँ आये हैं?
Vaiśampāyana said: Having respectfully received that lion among kings, King Virāṭa—his heart filled with affection—addressed him thus: “Dear sir, I ask you with goodwill: from which king’s realm have you come here?”
Verse 11
गोत्र च नामापि च शंस तत्त्वतः कि चापि शिल्पं तव विद्यते कृतम्,“अपने गोत्र और नाम भी ठीक-ठीक बताइये। साथ ही यह भी कहें कि आपने किस विद्या या कलामें कुशलता प्राप्त की है
Vaiśampāyana said: “State truthfully your lineage (gotra) and your name as well; and also tell what craft or skill you have mastered.”
Verse 12
युधिष्ठटिर उवाच युधिष्ठिरस्पासमहं पुरा सखा वैयाप्रपद्य: पुनरस्मि विप्र: । अक्षान् प्रयोक्तुं कुशलो$स्मि देविनां कड्केति नाम्नास्मि विराट विश्रुत:,युधिष्ठिरने कहा--महाराज विराट! मैं वैयाप्रपद-गोत्रमें उत्पन्न हुआ ब्राह्मण हूँ। लोगोंमें “कंक” नामसे मेरी प्रसिद्धि है। मैं पहले राजा युधिष्ठिरके साथ रहता था। वे मुझे अपना सखा मानते थे। मैं चौसर खेलनेवालोंके बीच पासे फेंकनेकी कलामें कुशल हूँ
Yudhiṣṭhira said: “O King Virāṭa, I am a brāhmaṇa born in the Vaiyāprapadya lineage. Formerly I lived with King Yudhiṣṭhira, who regarded me as his friend. I am skilled in casting the dice among players; in this land I am well known by the name ‘Kaṅka.’”
Verse 13
विराट उवाच ददामि ते हन्त वरं यमिच्छसि प्रशाधि मत्स्यान् वशगो हाहं तव । प्रियाश्न धूर्ता मम देविन: सदा भवांश्व देवोपम राज्यमहति,विराट बोले--ब्रह्मन! मैं आपको वर देता हूँ; आप जो चाहें, माँग लें। समूचे मत्स्यदेशपर शासन करें। मैं आपके वशमें हूँ; क्योंकि द्यूतक्रीडामें निपुण, चतुर, चालाक मनुष्य मुझे सदा प्रिय हैं। देवोपम ब्राह्मण! आप तो राज्य पानेके योग्य हैं
Virāṭa said: “Come, I grant you a boon—ask whatever you wish. Rule over the Matsya realm. I am under your control, for I have always been fond of clever, crafty men skilled in the play of dice. O godlike brāhmaṇa, you are worthy even of kingship.”
Verse 14
युधिछिर उवाच प्राप्तो विवाद: प्रथमं विशाम्पते न विद्यते कं च न मत्स्य हीनतः । न मे जितः कश्नन धारयेद् धनं वरो ममैषो<स्तु तव प्रसादज:,युधिष्ठिरने कहा--मत्स्यराज! नरनाथ! मुझे किसी हीन वर्णके मनुष्यसे विवाद न करना पड़े, यह मैं पहला वर माँगता हूँ तथा मुझसे पराजित होनेवाला कोई भी मनुष्य हारे हुए धनको अपने पास न रखे (मुझे दे दे)। आपकी कृपासे यह दूसरा वर मुझे प्राप्त हो जाय, तो मैं रह सकता हूँ
Yudhiṣṭhira said: “O lord of the people, O king of Matsya! First, I ask this boon: let it not happen that I must enter into a dispute with anyone of inferior standing in your realm. And secondly, let no one whom I defeat keep the wealth that has been won; let the forfeit be duly handed over. If, by your favor, these boons are granted, then I can remain here.”
Verse 15
विराट उवाच हन्यामवश्यं यदि ते5प्रियं चरेत् प्रत्राजयेयं विषयाद् द्विजांस्तथा । शृण्वन्तु मे जानपदा: समागता: कड्को यथाहं विषये प्रभुस्तथा,विराट बोले--ब्रह्मन्! यदि कोई ब्राह्मणेतर मनुष्य आपका अप्रिय करेगा तो उसे मैं निश्चय ही प्राण-दण्ड दूँगा। यदि ब्राह्मणोंने आपका अपराध किया तो उन्हें देशसे निकाल दूँगा। [युधिष्ठिससे ऐसा कहकर राजा विराट अन्य सभासदोंसे बोले--] मेरे राज्यमें निवास करनेवाले और इस सभामें आये हुए लोगो! मेरी बात सुनो, जैसे मैं इस मत्स्यदेशका स्वामी हूँ, वैसे ही ये कंक भी हैं
Virāṭa said: “If anyone acts against you in a way that displeases you, I shall certainly put him to death; and if Brahmins commit an offence against you, I shall have them expelled from my realm. Let the people of my country who are assembled here hear me: just as I am the sovereign in this Matsya kingdom, so is this Kaṅka as well.”
Verse 16
समानयानो भवितासि मे सखा प्रभूतवस्त्रो बहुपानभोजन: । पश्येस्त्वमन्तश्न बहिश्न सर्वदा कृतं च ते द्वारमपावृतं मया,[फिर वे युधिष्ठिससे बोले--] कंक! आजसे आप मेरे सखा हैं। जैसी सवारीमें मैं चलता हूँ, वैसी ही आपको भी मिलेगी। पहननेके वस्त्र और भोजन-पान आदिका प्रबन्ध भी आपके लिये पर्याप्त मात्रामें रहेगा। बाहरके राज्य-कोश, उद्यान और सेना आदि तथा भीतरके धन-दारा आदिकी भी देख-भाल आप ही करें। मेरे आदेशसे आपके लिये राजमहलका द्वार सदा खुला रहेगा; आपसे कोई परदा नहीं रखा जायगा
Virāṭa said: “From today you shall be my friend and companion, riding as I ride. You will have abundant clothing and ample provisions of drink and food. You shall oversee matters both within and without at all times; and by my command the palace gate for you has been kept open—nothing will be concealed from you.”
Verse 17
ये त्वानुवादे<युरवृत्तिकर्शिता ब्रूयाश्व तेषां वचनेन मां सदा । दास्यामि सर्व तदहं न संशयो न ते भयं विद्यति संनिधौ मम,जो लोग जीविकाके अभावमें कष्ट पा रहे हों और अनुवादके लिये अर्थात् पहलेके स्थायी तौरपर दिये हुए खेत और बगीचे आदिको पुनः उपयोगमें लानेके निमित्त नूतन राजाज्ञा प्राप्त करनेके लिये आपके पास आवें, उनके अनुरोधपूर्ण वचनसे आप सदा उनकी प्रार्थना मुझे सुना सकते हैं। विश्वास रखिये, आपके कथनानुसार उन याचकोंको मैं सब कुछ दूँगा; इसमें संशय नहीं है। आपको मेरे पास आने या कुछ कहनेमें भयभीत होनेकी आवश्यकता नहीं है
Virāṭa said: “If people, distressed by lack of livelihood, come to you in connection with the renewal of earlier grants—seeking a fresh royal order so that previously allotted fields and gardens may again be put to use—then, at their request, you may always convey their petition to me. Trust this: in accordance with your word I shall grant them whatever is needed; there is no doubt. You need not fear to approach me or to speak in my presence.”
Verse 18
वैशम्पायन उवाच (एवं तु राज्ञ: प्रथम: समागमो बभूव मात्स्यस्य युधिष्ठिरस्य च । विराटराजस्य हि तेन संगमो बभूव विष्णोरिव वज्पाणिना ।। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार वहाँ राजा युधिष्ठिर तथा मत्स्यनरेशकी प्रथम भेंट हुई। जैसे भगवान् विष्णुका वज्रधारी इन्द्रसे मिलन हुआ हो, उसी प्रकार विराटनरेशका राजा युधिष्ठिरके साथ समागम हुआ। तमासनस्थं प्रियरूपदर्शनं निरीक्षमाणो न ततर्प भूमिप: । सभां च तां प्रज्वलयन् युधिष्ठिर: श्रिया यथा शक्र इव त्रिविष्टपम् ।।) युधिष्ठिरके स्वरूपका दर्शन विराटराजको बहुत प्रिय लगा। जब वे आसनपर बैठ गये, तब राजा विराट उन्हें एकटक निहारने लगे। उनके दर्शनसे वे तृप्त ही नहीं होते थे। जैसे इन्द्र अपनी कान्तिसे स्वर्गकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार राजा युधिष्ठिर उस सभाको प्रकाशित कर रहे थे। एवं स लब्ध्वा तु वरं समागमं विराटराजेन नरर्षभस्तदा | उवास धीर: परमार्चित: सुखी न चापि वक्िच्चरितं बुबोध तत्,धीर स्वभाववाले नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर उस समय राजा विराटके साथ इस प्रकार अच्छे ढंगसे मिलकर और उनके द्वारा परम आदर-सत्कार पाकर वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे। उनका वह चरित्र किसीको भी मालूम नहीं हुआ
Vaiśampāyana said: Thus occurred the first meeting between King Yudhiṣṭhira and the ruler of the Matsyas. Virāṭa’s encounter with him was like Indra, the wielder of the thunderbolt, meeting Viṣṇu. When Yudhiṣṭhira had taken his seat—his appearance pleasing and auspicious—King Virāṭa kept gazing at him and could not feel satisfied by the sight. Yudhiṣṭhira seemed to illumine that royal hall with his splendor, just as Indra adorns and brightens heaven. Having gained this excellent association with King Virāṭa, that best of men, steady by nature, lived there happily, honored with the highest respect; and yet no one came to know his true story (his concealed identity and past).
The dilemma is maintaining vowed concealment while interacting with authority figures who perceive inconsistencies; Bhīma must communicate truthfully within constraints, avoiding disclosures that would endanger the vow’s conditions.
Competence can be ethically aligned with humility: excellence may be redirected into service roles when circumstances require restraint, and identity can be managed as a dharmic strategy rather than mere deception.
No explicit phalaśruti is stated; the meta-commentary is narrative: the concluding observation that Bhīma remains unrecognized functions as validation of the concealment framework within the broader ajñātavāsa design.