
नारदेन दिव्यसभाः कथितुं प्रतिज्ञा (Nārada’s Prelude to Describing the Divine Assemblies)
Upa-parva: Sabhā-Varṇana / Deva-Sabhā-Kathana (Narration of Divine Assemblies)
Vaiśaṃpāyana reports that Yudhiṣṭhira, having honored a sage’s counsel, responds in an ordered and deferential manner, emphasizing adherence to dharma according to capacity and proper procedure. Observing the appropriate moment, he approaches Nārada seated at ease amid the assembled kings and inquires about comparable or superior assemblies Nārada has witnessed across the many worlds he traverses. Nārada replies that among humans he has neither seen nor heard of an assembly like Yudhiṣṭhira’s jeweled hall, yet he offers to describe, in sequence, the divine sabhās of Yama (Pitṛrāja), Varuṇa, Indra, Kubera, Śiva (Kailāsa-dweller), and Brahmā, provided Yudhiṣṭhira wishes to listen. Yudhiṣṭhira, with brothers and attending rulers, requests comprehensive details: the substances, dimensions, and the principal figures who attend those courts. Nārada agrees to narrate the divine assemblies systematically, establishing the chapter as a formal prologue to a comparative cosmological account.
Chapter Arc: धर्मराज युधिष्ठिर, नारद के मुख से राजधर्म और धर्म-निश्चय की यथार्थता सुनकर, उससे भी आगे दिव्य लोकों की अद्भुत सभाओं का रहस्य जानने को उत्कंठित हो उठते हैं। → युधिष्ठिर प्रश्नों को क्रमशः तीक्ष्ण करते हैं—वे सभाएँ किस द्रव्य से बनीं, उनका विस्तार-आयाम क्या है, और उनमें किन-किन देवों तथा महापुरुषों का आसन-पर्युपासन होता है; पाण्डवों और उपस्थित ब्राह्मणों का कौतूहल सामूहिक रूप से बढ़ता जाता है। → नारद घोषणा करते हैं कि वे क्रम से पितृराज, वरुण, इन्द्र (कैलास-निलय सहित) आदि की दिव्य सभाओं का वर्णन करेंगे—और सभा-वैभव का द्वार खुलने ही वाला है। → युधिष्ठिर हाथ जोड़कर, भ्राताओं और द्विजोत्तमों सहित, विनयपूर्वक श्रवण-याचना करते हैं; नारद उत्तर देने को प्रस्तुत होकर वर्णन की रूपरेखा बाँध देते हैं। → नारद कहते हैं—“क्रमेण… दिव्यास्ता: सभा:”—अब अगली कड़ी में उन सभाओं का वास्तविक, विस्तृत चित्रण आरम्भ होगा।
Verse 1
शी मी, (9) भ्ीक्श्ना ता 3. परस्पर विरुद्ध प्रतीत होनेवाले वेदके वचनोंकी एकवाक्यता। ४. एकमें मिले हुए वचनोंको प्रयोगके अनुसार अलग-अलग करना। ५. यज्ञके अनेक कर्मोंके एक साथ उपस्थित होनेपर अधिकारके अनुसार यजमानके साथ कर्मका जो सम्बन्ध होता है, उसका नाम समवाय है। > दूसरेको किसी वस्तुका बोध करानेके लिये प्रवृत्त हुआ पुरुष जिस अनुमानवाक्यका प्रयोग करता है, उसमें पाँच अवयव होते हैं--प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन। जैसे किसीने कहा--'इस पर्वतपर आग है” यह वाक्य प्रतिज्ञा है। “क्योंकि वहाँ धूम है” यह हेतु है। 'जैसे रसोईघरमें धूआँ दीखनेपर वहाँ आग देखी जाती है” यह दृष्टान्त ही उदाहरण है। “चूँकि इस पर्वतपर धूआँ दिखायी देता है” हेतुकी इस उपलब्धिका नाम उपनय है। “इसलिये वहाँ आग है” यह निश्चय ही निगमन है। इस वाक्यमें अनुकूल तर्कका होना गुण है और प्रतिकूल तर्कका होना दोष है, जैसे “यदि वहाँ आग न होती, तो धूआँ भी नहीं उठता” यह अनुकूल तर्क है। जैसे कोई तालाबसे भाप उठती देखकर यह कहे कि इस तालाबमें आग है, तो उसका वह अनुमान आश्रयासिद्धरूप हेत्वाभाससे युक्त होगा। $. दक्षस्मृतिमें त्रिवर्ससेवनका काल-विभाग इस प्रकार बताया गया है-- पूर्वह्ने त्वाचरेद् धर्म मध्याह्लै&र्थमुपार्जयेत् | सायाह्लै चाचरेत् काममित्येषा वैदिकी श्रुति: ।। पूर्वाह्नकालमें धर्मका आचरण करे, मध्याह्नके समय धनोपार्जनका काम देखे और सायाह्न (रात्रि)-के समय कामका सेवन करे। यह वैदिक श्रुतिका आदेश है। (नीलकण्ठीसे उद्धृत) २. राजाओंमें छः गुण होने चाहिये--व्याख्यानशक्ति, प्रगल्भता, तर्ककुशलता, भूतकालकी स्मृति, भविष्यपर दृष्टि तथा नीतिनिपुणता। 3. सात उपाय ये हैं--मन्त्र, औषध, इन्द्रजाल, साम, दान, दण्ड और भेद। ४. परीक्षाके योग्य चौदह स्थान या व्यक्ति नीतिशास्त्रमें इस प्रकार बताये गये हैं-- देशो दुर्ग रथो हस्तिवाजियोधाधिकारिण: । अन्तः:पुरान्नगणनाशास्त्रलेख्यधनासव: ।। देश, दुर्ग, रथ, हाथी, घोड़े, शूर सैनिक, अधिकारी, अन्तःपुर, अन्न, गणना, शास्त्र, लेखय, धन और असु (बल), इनके जो चौदह अधिकारी हैं, राजाओंको उनकी परीक्षा करते रहना चाहिये। ५. राजाके कोष और धनकी वृद्धिके लिये आठ कर्म ये हैं-- कृषिर्वणिकृपथो दुर्ग सेतु: कुडजरबन्धनम् | खन््याकरकरादानं शून्यानां च निवेशनम् ।। अष्ट संधानकर्माणि प्रयुक्तानि मनीषिभि: ।। खेतीका विस्तार, व्यापारकी रक्षा, दुर्गकी रचना एवं रक्षा, पुलोंका निर्माण और उनकी रक्षा, हाथी बाँधना, सोने-हीरे आदिकी खानोंपर अधिकार करना, करकी वसूली और उजाड़ प्रान्तोंमें लोगोंको बसाना --मनीषी पुरुषोंद्वारा ये आठ संधानकर्म बताये गये हैं। <£. स्वामी, मन्त्री, मित्र, कोष, राष्ट्र, दुर्ग तथा सेना एवं पुरवासी--ये राज्यके सात अंग ही सात प्रकृतियाँ हैं। अथवा-दुर्गाध्यक्ष, बलाध्यक्ष, धर्माध्यक्ष, सेनापति, पुरोहित, वैद्य और ज्योतिषी--ये भी सात प्रकृतियाँ कही गयी हैं। > स्मृतिमें कहा है कि--'ब्राहों मुहूर्त चोत्थाय चिन्तयेदात्मनो हितम् । अर्थात् ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर अपने हितका चिन्तन करे। (नीलकण्ठी टीकासे उद्धृत) $. शत्रुपक्षके मन््त्री, पुरोहित, युवराज, सेनापति, द्वारपाल, अन्तर्वेशिक (अन्तः:पुरका अध्यक्ष), कारागाराध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, यथायोग्य कार्योंमें धनको व्यय करनेवाला सचिव, प्रदेष्टा (पहरेदारोंको काम बतानेवाला), नगराध्यक्ष (कोतवाल), कार्यनिर्माणकर्ता (शिल्पियोंका परिचालक), धर्माध्यक्ष, सभाध्यक्ष, दण्डपाल, दुर्गपाल, राष्ट्रसीमापाल तथा वनरक्षक--ये अठारह तीर्थ हैं, जिनपर राजाको दृष्टि रखनी चाहिये। २. उपर्युक्त टिप्पणीमें अठारह तीर्थोमेंसे आदिके तीनको छोड़कर शेष पंद्रह तीर्थ अपने पक्षके भी सदा परीक्षणीय हैं। > विजयके इच्छुक राजाके आगे खड़े होनेवाले उसके शत्रुके शत्रु २, उन शत्रुओंके मित्र २, उन मित्रोंके मित्र २-ये छः व्यक्ति युद्धमें आगे खड़े होते हैं। विजिगीषुके पीछे पार्ण्णिग्राह (पृष्ठरक्षक) और आक्रन्द (उत्साह दिलानेवाला)--ये दो व्यक्ति खड़े होते हैं। इन दोनोंकी सहायता करनेवाले एक-एक व्यक्ति इनके पीछे खड़े होते हैं, जिनकी आसार संज्ञा है। ये क्रमशः पार्ष्णिग्राहासार और आक्रन्दासार कहे जाते हैं। इस प्रकार आगेके छः: और पीछेके चार मिलकर दस होते हैं। विजिगीषुके पार्श्रभागमें मध्यम और उसके भी पार्श्रभागमें उदासीन होता है। इन दोनोंको जोड़ लेनेसे इन सबकी संख्या बारह होती है। इन्हींको द्वादश राजमण्डल अथवा :पा्णिमूल' कहते हैं। अपने और शत्रुपक्षके इन व्यक्तियोंको जानना चाहिये। ३. नीतिशास्त्रके अनुसार विजयकी इच्छा रखनेवाले राजाको चाहिये कि वह शत्रुपक्षके सैनिकोंमेंसे जो लोभी हो, किंतु जिसे वेतन न मिला हो, जो मानी हो किंतु किसी तरह अपमानित हो गया हो, जो क्रोधी हो और उसे क्रोध दिलाया गया हो, जो स्वभावसे ही डरनेवाला हो और उसे पुन: डरा दिया गया हो--इन चार प्रकारके लोगोंको फोड़ ले और अपने पक्षमें ऐसे लोग हों, तो उन्हें उचित सम्मान देकर मिला ले। २. व्यसन दो प्रकारके हैं--दैव और मानुष। दैव व्यसन पाँच प्रकारके हैं--अग्नि, जल, व्याधि, दुर्भिक्ष और महामारी। मानुष व्यसन भी पाँच प्रकारका है-मूर्ख पुरुषोंसे, चोरोंसे, शत्रुओंसे, राजाके प्रिय व्यक्तिसे तथा राजाके लोभसे प्रजाको प्राप्त भय। (नीलकंठी टीकाके अनुसार) 3. आठ अंग और चार बल भारतकौमुदीटीकाके अनुसार लिये गये हैं। १. सीमावर्ती गाँवका अधिपति अपने यहाँका राजकीय कर एकत्र करके ग्रामाधिपतिको दे, ग्रामाधिपति नगराधिपतिको, वह देशाधिपतिको और देशाधिपति साक्षात् राजाको वह धन अर्पित करे। २. नाड़ी, मल, मूत्र, जिह्ना, नेत्र, रूप, शब्द तथा स्पर्श--ये आठ चिकित्साके प्रकार कहे जाते हैं। ३. लोहेकी बनी हुई उन मशीनोंको, जिनके द्वारा बारूदके बलसे शीशे, काँसे और पत्थरकी गोलियाँ चलायी जाती हैं--यन्त्र कहते हैं। उन यन्त्रोंके प्रयोगकी विधिके प्रतिपादक संक्षिप्त वाक्य ही यन्त्रसूत्र हैं। २. नगरकी रक्षा तथा उन्नतिके साधनोंको बतानेवाले संक्षिप्त वाक््योंको ही यहाँ नागरिक सूत्र कहा गया है। षष्ठो5 ध्याय: युधिष्ठिरकी दिव्य सभाओंके विषयमें जिज्ञासा वैशम्पायन उवाच सम्पूज्याथाभ्यनुज्ञातो महर्षेवचनात् परम् । प्रत्युवाचानुपूर्व्येण धर्मराजो युधिष्िर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! देवर्षि नारदका यह उपदेश पूर्ण होनेपर धर्मराज युधिष्ठिने भलीभाँति उनकी पूजा की; तदनन्तर उनसे आज्ञा लेकर उनके प्रश्नका उत्तर दिया
Vaiśampāyana said: When the great sage’s instruction had concluded, Dharma-king Yudhiṣṭhira duly honored him. Then, having received permission, Yudhiṣṭhira replied in proper order—responding thoughtfully and respectfully to the matter that had been asked.
Verse 2
युधिछिर उवाच भगवन् न्याय्यमाहैतं यथावद् धर्मनिश्चयम् । यथाशक्ति यथान्यायं क्रियते5यं विधिर्मया,युधिष्ठिर बोले--भगवन्! आपने जो यह राजधर्मका यथार्थ सिद्धान्त बताया है, वह सर्वथा न्यायोचित है। मैं आपके इस न्यायानुकूल आदेशका यथाशक्ति पालन करता हूँ
Yudhiṣṭhira said: “O venerable one, the true determination of royal dharma that you have set forth rightly is wholly just. In accordance with my strength and with what is proper, I follow this command of yours that accords with justice.”
Verse 3
राजभिर्यद् यथा कार्य पुरा वै तन्न संशय: । यथान्यायोपनीतार्थ कृत॑ हेतुमदर्थवत्,इसमें संदेह नहीं कि प्राचीन कालके राजाओंने जो कार्य जैसे सम्पन्न किया, वह प्रत्येक न्यायोचित, सकारण और किसी विशेष प्रयोजनसे युक्त होता था
Yudhiṣṭhira said: “There is no doubt that whatever deeds the kings of old undertook, and in whatever manner they carried them out, were actions grounded in justice—supported by sound reasons and directed toward a definite purpose.”
Verse 4
वयं तु सत्पथथं तेषां यातुमिच्छामहे प्रभो । न तु शक््यं तथा गन्तुं यथा तैर्नियतात्मभि:,प्रभो! हम भी उन्हींके उत्तम मार्गसे चलना चाहते हैं, परंतु उस प्रकार (सर्वथा) चल नहीं पाते; जैसे वे नियतात्मा महापुरुष चला करते थे
Yudhiṣṭhira said: “O lord, we too wish to follow the noble path that they followed; yet we are not able to walk in that same manner, as those great men of disciplined self once did.”
Verse 5
वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा स धर्मात्मा वाक््यं तदभिपूज्य च । मुहूर्तात् प्राप्तकालं च दृष्टवा लोकचरं मुनिम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर धर्मात्मा युधिष्ठिरने नारदजीके पूर्वोक्त प्रवचनकी बड़ी प्रशंसा की। फिर सम्पूर्ण लोकोंमें विचरनेवाले नारद मुनि जब शन्तिपूर्वक बैठ गये, तब दो घड़ीके बाद ठीक अवसर जानकर महातेजस्वी पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर भी उनके निकट आ बैठे और सम्पूर्ण राजाओंके बीच वहाँ उनसे इस प्रकार पूछने लगे
Vaiśampāyana said: Having spoken thus, that righteous-souled king duly honored Nārada’s words. Then, after a short while, seeing that the proper moment had arrived and observing the sage Nārada—who roams through all the worlds—he prepared to approach him with reverence, to inquire further in the midst of the assembled kings.
Verse 6
नारदं सुस्थमासीनमुपासीनो युधिष्ठिर: । अपृच्छत् पाण्डवस्तत्र राजमध्ये महाद्युति:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर धर्मात्मा युधिष्ठिरने नारदजीके पूर्वोक्त प्रवचनकी बड़ी प्रशंसा की। फिर सम्पूर्ण लोकोंमें विचरनेवाले नारद मुनि जब शन्तिपूर्वक बैठ गये, तब दो घड़ीके बाद ठीक अवसर जानकर महातेजस्वी पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर भी उनके निकट आ बैठे और सम्पूर्ण राजाओंके बीच वहाँ उनसे इस प्रकार पूछने लगे इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि युधिष्ठिरसभाजिज्ञासायां षष्ठो5ध्याय:
Vaiśampāyana said: When Nārada, seated calmly and at ease, had taken his place, Yudhiṣṭhira—the radiant son of Pāṇḍu—sat near him in attendance. Then, in the midst of the assembled kings, he respectfully questioned the sage.
Verse 7
युधिछिर उवाच भवान् संचरते लोकान् सदा नानाविधान् बहून् । ब्रह्मणा निर्मितान् पूर्व प्रेक्षमाणो मनोजव:,युधिष्ठिरे पूछा--मुनिवर! आप मनके समान वेगशाली हैं, अतः ब्रह्माजीने पूर्वकालमें जिनका निर्माण किया है, उन अनेक प्रकारके बहुत-से लोकोंका दर्शन करते हुए आप उनमें सदा बेरोक-टोक विचरते रहते हैं
Yudhiṣṭhira said: “Revered sir, you move freely at all times through many worlds of diverse kinds. Swift as the mind, you behold those realms that were fashioned long ago by Brahmā.”
Verse 8
ईदृशी भवता काचिद् दृष्टपूर्वा सभा क्वचित् | इतो वा श्रेयसी ब्रह्मंस्तन्ममाचक्ष्व पृच्छत:,ब्रह्मन! क्या आपने पहले कहीं ऐसी या इससे भी अच्छी कोई सभा देखी है? मैं जानना चाहता हूँ, अतः आप मुझसे यह बात बतावें
Yudhiṣṭhira said: “Have you ever seen anywhere a hall like this before, or even one superior to it? O Brāhmaṇa, since I ask, tell me truly.”
Verse 9
वैशम्पायन उवाच तच्छुत्वा नारदस्तस्य धर्मराजस्य भाषितम् | पाण्डवं प्रत्युवाचेदं स्मयन् मधुरया गिरा,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! धर्मराज युधिष्ठिरका यह प्रश्न सुनकर देवर्षि नारदजी मुसकराने लगे और उन पाण्डुकुमारको इसका उत्तर देते हुए मधुर वाणीमें बोले
Vaiśampāyana said: Hearing what Dharmarāja Yudhiṣṭhira had spoken, the divine seer Nārada smiled, and in a sweet voice replied to the son of Pāṇḍu.
Verse 10
नारद उवाच मानुषेषु न मे तात दृष्टपूर्वा न च श्रुता । सभा मणिमयी राजन् यथेयं तव भारत,नारदजीने कहा--तात! भरतवंशी नरेश! मणि एवं रत्नोंकी बनी हुई जैसी तुम्हारी यह सभा है, ऐसी सभा मैंने मनुष्यलोकमें न तो पहले कभी देखी है और न कानोंसे ही सुनी है
Nārada said: “Dear child—O king of Bharata’s line—among human beings I have neither seen before nor even heard of an assembly hall like this one of yours, fashioned of gems.”
Verse 11
सभां तु पितराजस्य वरुणस्य च धीमतः । कथयिष्ये तथेन्द्रस्य कैलासनिलयस्य च,भरतश्रेष्ठ) यदि तुम्हारा मन दिव्य सभाओंका वर्णन सुननेको उत्सुक हो तो मैं तुम्हें पितृराज यम, बुद्धिमान् वरुण, स्वर्गवासी इन्द्र, कैलासनिवासी कुबेर तथा ब्रह्माजीकी दिव्य सभाका वर्णन सुनाऊँगा, जहाँ किसी प्रकारका क्लेश नहीं है एवं जो दिव्य और अदिव्य भोगोंसे सम्पन्न तथा संसारके अनेक रूपोंसे अलंकृत है। वह देवता, पितृगण, साध्यगण, याजक तथा मनको वशमें रखनेवाले शान्त मुनिगणोंसे सेवित है। वहाँ उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त वैदिक यज्ञोंका अनुष्ठान होता रहता है
Nārada said: “I shall describe to you the divine assembly-halls—of Yama, the king of the Pitṛs; of the wise Varuṇa; likewise of Indra; and also of the lord who dwells on Kailāsa.”
Verse 12
ब्रहद्मणश्न सभां दिव्यां कथयिष्ये गतक्लमाम् । दिव्यादिव्यैरभिप्रायैरुपेतां विश्वरूपिणीम्,भरतश्रेष्ठ) यदि तुम्हारा मन दिव्य सभाओंका वर्णन सुननेको उत्सुक हो तो मैं तुम्हें पितृराज यम, बुद्धिमान् वरुण, स्वर्गवासी इन्द्र, कैलासनिवासी कुबेर तथा ब्रह्माजीकी दिव्य सभाका वर्णन सुनाऊँगा, जहाँ किसी प्रकारका क्लेश नहीं है एवं जो दिव्य और अदिव्य भोगोंसे सम्पन्न तथा संसारके अनेक रूपोंसे अलंकृत है। वह देवता, पितृगण, साध्यगण, याजक तथा मनको वशमें रखनेवाले शान्त मुनिगणोंसे सेवित है। वहाँ उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त वैदिक यज्ञोंका अनुष्ठान होता रहता है
Nārada said: “If your mind is eager to hear of the celestial assemblies, I shall describe that divine hall of Brahmā—free from all weariness—adorned with manifold forms and endowed with intentions and enjoyments both heavenly and beyond the heavenly. I will relate the splendid courts associated with Yama, the lord of the Pitṛs; the wise Varuṇa; Indra who dwells in heaven; Kubera who abides on Kailāsa; and Brahmā himself—places frequented by gods, ancestors, Sādhyas, sacrificers, and tranquil sages who have mastered their minds, where Vedic sacrifices with excellent gifts (dakṣiṇā) are continually performed.”
Verse 13
देवैः पितृगणै: साध्यैर्यज्वभिर्नियतात्मभि: । जुष्टां मुनिगणै: शान्तैर्वेदयज्ञै: सदक्षिणै: । यदि ते श्रवणे बुद्धिर्वर्तते भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ) यदि तुम्हारा मन दिव्य सभाओंका वर्णन सुननेको उत्सुक हो तो मैं तुम्हें पितृराज यम, बुद्धिमान् वरुण, स्वर्गवासी इन्द्र, कैलासनिवासी कुबेर तथा ब्रह्माजीकी दिव्य सभाका वर्णन सुनाऊँगा, जहाँ किसी प्रकारका क्लेश नहीं है एवं जो दिव्य और अदिव्य भोगोंसे सम्पन्न तथा संसारके अनेक रूपोंसे अलंकृत है। वह देवता, पितृगण, साध्यगण, याजक तथा मनको वशमें रखनेवाले शान्त मुनिगणोंसे सेवित है। वहाँ उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त वैदिक यज्ञोंका अनुष्ठान होता रहता है
Nārada said: “That divine assembly is frequented by the gods, the hosts of Pitṛs, and the Sādhyas; by sacrificers of disciplined mind; and by peaceful companies of sages. There Vedic sacrifices, complete with worthy gifts (dakṣiṇā), are continually performed. O bull among the Bharatas, if your understanding is inclined to listen, I shall describe it to you.”
Verse 14
नारदेनैवमुक्तस्तु धर्मराजो युधिष्ठिर: । प्राउ्जलि र्भ्रातृभि: सार्ध तैश्व सर्वेर्द्धिजोत्तमै:,नारदजीके ऐसा कहनेपर भाइयों तथा सम्पूर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ महामनस्वी धर्मराज युधिष्ठिरने हाथ जोड़कर उनसे इस प्रकार कहा--“महर्ष! हम सभी दिव्य सभाओंका वर्णन सुनना चाहते हैं। आप उनके विषयमें सब बातें बताइये
Thus addressed by Nārada, Dharma-rāja Yudhiṣṭhira—joining his palms in reverence, accompanied by his brothers and by all the foremost Brahmins—spoke to the sage: “O great ṛṣi, we all wish to hear a full account of the divine assemblies. Tell us everything about them.”
Verse 15
नारदं प्रत्युवाचेदं धर्मराजो महामना: । सभा: कथय ता: सर्वा: श्रोतुमिच्छामहे वयम्,नारदजीके ऐसा कहनेपर भाइयों तथा सम्पूर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके साथ महामनस्वी धर्मराज युधिष्ठिरने हाथ जोड़कर उनसे इस प्रकार कहा--“महर्ष! हम सभी दिव्य सभाओंका वर्णन सुनना चाहते हैं। आप उनके विषयमें सब बातें बताइये
In reply to Nārada, the high-minded Dharmarāja (Yudhiṣṭhira) spoke: “O sage, please describe all those celestial assembly-halls. We wish to hear about them in full.”
Verse 16
किंद्रव्यास्ता: सभा ब्रह्मन् किंविस्तारा: किमायता: । पितामहं च के तस्यां सभायां पर्युपासते,“ब्रह्म! उन सभाओंका निर्माण किस द्रव्यसे हुआ है? उनकी लंबाई-चौड़ाई कितनी है? ब्रह्माजीकी उस दिव्य-सभामें कौन-कौन सभासद् उन्हें चारों ओरसे घेरकर बैठते हैं?
Nārada said: “O Brahman, of what materials are those assembly-halls made? What are their dimensions—how broad and how long are they? And in that divine hall of Pitāmaha (Brahmā), who are the members that sit around him in attendance?”
Verse 17
वासवं देवराजं च यम॑ वैवस्वतं च के । वरुणं च कुबेरं च सभायां पर्युपासते,“इसी प्रकार देवराज इन्द्र, वैवस्वत यम, वरुण तथा कुबेरकी सभामें कौन-कौन लोग उनकी उपासना करते हैं?
Nārada said: “Who are the beings that attend upon and render homage in the assembly-halls of Vāsava (Indra), the king of the gods; of Yama Vaivasvata; of Varuṇa; and of Kubera?”
Verse 18
एतत् सर्व यथान्यायं ब्रद्मर्षे वदतस्तव । श्रोतुमिच्छाम सहिता: परं कौतूहलं हि नः,“ब्रह्मर्ष! हम सब लोग आपके मुखसे ये सब बातें यथोचित रीतिसे सुनना चाहते हैं। हमारे मनमें उसके लिये बड़ा कौतूहल है”
Nārada said: “O brahmarṣi, we all wish to hear from your mouth, in a manner proper and in accordance with right order, everything you are describing. Indeed, we are filled with great curiosity about it.”
Verse 19
एवमुक्त: पाण्डवेन नारद: प्रत्यभाषत । क्रमेण राजन् दिव्यास्ता: श्रूयन्तामिह न: सभा:,पाण्डुकुमार युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर नारदजीने उत्तर दिया--“राजन्! तुम हमसे यहाँ उन सभी दिव्य सभाओंका क्रमश: वर्णन सुनो”
Thus addressed by the Pāṇḍava, Nārada replied: “O King, listen here from us, in due order, to the account of those wondrous, divine assembly-halls.”
A practical dharma tension: Yudhiṣṭhira expresses commitment to the ‘satpatha’ (righteous path) of earlier rulers while acknowledging constraints of capability and circumstance, prompting him to seek authoritative benchmarks.
Governance is strengthened by disciplined inquiry: a ruler should honor counsel, ask precise questions, and compare institutional ideals to lived practice, thereby aligning power with reflective ethical standards.
No explicit phalaśruti appears here; the meta-function is structural—establishing the listener’s readiness (śravaṇa-buddhi) and authorizing Nārada’s sequential narration as a knowledge framework within the parva.