
अश्वत्थाम-शापः, परिक्षिद्भविष्यत्, मणि-न्यासः (Aśvatthāman’s Curse, Parikṣit’s Future, and the Mani’s Restitution)
Upa-parva: Aśvatthāman-śāpa and Parikṣit Preservation (Sauptika-parva episode)
Vaiśaṃpāyana reports Kṛṣṇa’s response upon learning of Aśvatthāman’s grievous act: Kṛṣṇa recalls a prior brahminical prediction that, when the Kurus are diminished, Uttarā will bear a son named Parikṣit who will restore the line. Aśvatthāman disputes Kṛṣṇa, insisting his weapon will strike the fetus. Kṛṣṇa affirms the weapon’s unfailing descent while declaring that the child, though struck, will live and attain long life. He then pronounces a punitive sentence upon Aśvatthāman: prolonged wandering for three thousand years, isolation from human contact, and affliction—an ethical judgment framed as consequence for repeated harmful acts. Kṛṣṇa further outlines Parikṣit’s future education under Kṛpa, mastery of arms within kṣatra discipline, and a sixty-year righteous reign as Kuru king. Vyāsa validates Kṛṣṇa’s words as certain. Aśvatthāman concedes the truthfulness of the pronouncement, gives up his innate mani to the Pāṇḍavas, and departs to the forest. The Pāṇḍavas, accompanied by Kṛṣṇa, Vyāsa, and Nārada, return to Draupadī; Bhīma presents the mani and urges her to rise from grief. Draupadī interprets the outcome as release from debt toward the guru-lineage and asks the king to bind the mani upon his head; Yudhiṣṭhira does so, and the narrative closes with Draupadī rising from sorrow and Dharma-rāja questioning Kṛṣṇa further.
Chapter Arc: रात्रि-वध के धुएँ के बीच पाण्डव-शिविर में शोक की लहर उठती है; उसी क्षण कृष्ण का वचन और शाप-सा कठोर न्याय अश्वत्थामा के भाग्य पर उतर आता है। → द्रौपदी के सामने अपमान और पुत्र-शोक की ज्वाला फिर भड़कती है; पाण्डव उसे देखते ही ‘आर्त से भी अधिक आर्त’ हो उठते हैं। स्मृति में वह पुरानी बात भी उभरती है—उपप्लव्य में विराट-कन्या (अभिमन्यु-पत्नी) के विषय में ब्राह्मण-वाणी/पूर्वसंकेत, जो आगे के राजवंश-भाग्य की छाया डालती है। → कृष्ण अश्वत्थामा को उसके पाप का फल सुनाते हैं—हजारों वर्षों तक पृथ्वी पर भटकना, रोगों से ग्रस्त रहना, जनसमुदाय से बहिष्कृत होना, देह से पीव-रक्त की दुर्गन्ध निकलना; और उसी निर्णायक क्षण में अश्वत्थामा से मणि छीन/दिलवाकर द्रौपदी के क्रोध को शान्त करने का उपाय सिद्ध होता है। → मणि द्रौपदी को देकर उसे सांत्वना मिलती है; प्रतिशोध की आग धर्म-सीमा में बाँधी जाती है। अश्वत्थामा वन/दुर्गम प्रदेशों की ओर निर्वासित-सा प्रस्थान करता है—जीवित रहते हुए भी मृतक-सा। → कथा भविष्य की ओर संकेत करती है—परीक्षित का राज्यारोहण और दीर्घकालीन धर्म-राज्य का वचन; युद्धोत्तर शून्य में एक नये युग का बीज पड़ता है, पर शापित अश्वत्थामा की भटकन की छाया बनी रहती है।
Verse 1
ऑपन-माज बछ। डे घोडशो< ध्याय: श्रीकृष्णसे शाप पाकर अश्वत्थामाका वनको प्रस्थान तथा पाण्डवोंका मणि देकर द्रौपदीको शान्त करना वैशम्पायन उवाच तदाज्ञाय हृषीकेशो विसृष्टं पापकर्मणा । हृष्यमाण इदं वाक्य द्रौणिं प्रत्यब्रवीत्तदा,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! पापी अभश्वत्थामाने अपना अस्त्र पाण्डवोंके गर्भपर छोड़ दिया, यह जानकर भगवान् श्रीकृष्णको बड़ी प्रसन्नता हुई। उस समय उन्होंने द्रोणपुत्रसे इस प्रकार कहा--
Vaiśampāyana sprach: O König, als Hṛṣīkeśa (Kṛṣṇa) erfuhr, dass die sündhafte Tat in Gang gesetzt worden war—dass Aśvatthāmā seine Waffe losgelassen hatte—empfand er eine strenge Genugtuung, denn das Verbrechen war entlarvt und musste zur Rechenschaft gezogen werden. Dann, erfreut über diese Gewissheit, wandte er sich mit folgenden Worten an Droṇas Sohn (Aśvatthāmā).
Verse 2
विराटस्य सुतां पूर्व स्नुषां गाण्डीवधन्चन: । उपप्लव्यगतां दृष्टवा व्रतवान् ब्राह्मणो5ब्रवीत्
Vaiśampāyana sprach: Als er Virāṭas Tochter sah—die einst die Schwiegertochter des Trägers des Gāṇḍīva geworden war—nun in Upaplavya weilend, erhob der gelübdetreue Brahmane seine Stimme.
Verse 3
“पहलेकी बात है, राजा विराटकी कन्या और गाण्डीवधारी अर्जुनकी पुत्रवधू जब उपप्लव्यनगरमें रहती थी, उस समय किसी व्रतवान् ब्राह्मणने उसे देखकर कहा-- ।। परिक्षीणेषु कुरुषु पुत्रस्तव भविष्यति । एतदस्य परिक्षित्त्वं गर्भस्थस्य भविष्यति,“बेटी! जब कौरववंश परिक्षीण हो जायगा, तब तुम्हें एक पुत्र प्राप्त होगा और इसीलिये उस गर्भस्थ शिशुका नाम परीक्षित् होगा”
Vaiśampāyana sprach: „Dies ist ein früheres Ereignis. Als die Tochter des Königs Virāṭa—die zur Schwiegertochter Arjunas, des Trägers des Gāṇḍīva, geworden war—in der Stadt Upaplavya lebte, sah sie ein gelübdetreuer Brahmane und weissagte: ‚Wenn das Geschlecht der Kurus erschöpft ist, wirst du einen Sohn empfangen. Und weil er in einer Zeit geboren wird, da die Kurus geschwunden sind, wird das Kind in deinem Schoß Parīkṣit heißen.‘“
Verse 4
तस्य तद् वचन साथो: सत्यमेतद् भविष्यति । परिक्षिद् भविता होषां पुनर्वशकर: सुतः,“उस साधु ब्राह्मणका वह वचन सत्य होगा। उत्तराका पुत्र परीक्षित् ही पुनः पाण्डववंशका प्रवर्तक होगा?”
Vaiśampāyana sprach: „Das Wort jenes heiligen Brahmanen wird sich gewiss als wahr erweisen. Parīkṣit, der Sohn (von Uttarā geboren), wird hervortreten und das Geschlecht der Pāṇḍavas erneut wiederherstellen und tragen.“
Verse 5
एवं ब्रुवाणं गोविन्द सात्वतां प्रवरं तदा । द्रौणि: परमसंरब्ध: प्रत्युवाचेदमुत्तरम्,सात्वतवंशशिरोमणि भगवान् श्रीकृष्ण जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय द्रोणकुमार अश्वत्थामा अत्यन्त कुपित हो उठा और उन्हें उत्तर देता हुआ बोला--
Als Govinda, der Vornehmste unter den Sātvatas, so sprach, erwiderte Droṇas Sohn Aśvatthāmā, von äußerster Wut ergriffen, mit folgenden Worten.
Verse 6
नैतदेवं यथा<55त्थ त्वं पक्षपातेन केशव । वचन पुण्डरीकाक्ष न च मद्धाक्यमन्यथा,“कमलनयन केशव! तुम पाण्डवोंका पक्षपात करते हुए इस समय जैसी बात कह गये हो, वह कभी हो नहीं सकती। मेरा वचन झूठा नहीं होगा
Vaiśampāyana sprach: „O Keśava, Lotosäugiger! Was du eben gesagt hast—aus Parteilichkeit für die Pāṇḍavas—kann niemals wirklich so sein. Und auch meine Aussage wird nicht anders ausfallen; mein Wort wird nicht falsch sein.“
Verse 7
पतिष्यति तदस्त्रं हि गर्भे तस्या मयोद्यतम् । विराटदुहितु: कृष्ण यं त्वं रक्षितुमिच्छसि
Vaiśampāyana sagte: „Jenes Geschoss, das ich entsandt habe, wird gewiss ihren Schoß treffen—o Kṛṣṇa—den Schoß der Tochter Virāṭas, die du zu schützen wünschst.“
Verse 8
“श्रीकृष्ण! मेरे द्वारा चलाया गया वह अस्त्र विराटपुत्री उत्तराके गर्भपर ही, जिसकी तुम रक्षा करना चाहते हो, गिरेगा” ।। श्रीभगवानुवाच अमोघ: परमास्त्रस्य पातस्तस्य भविष्यति । स तु गर्भो मृतो जातो दीर्घमायुरवाप्स्यति
Der Erhabene Herr sprach: „Der Niedergang dieses höchsten Geschosses wird nicht vergeblich sein; es wird gewiss fallen. Doch das Kind im Schoß wird wie tot geboren werden und danach das Leben wiedererlangen und ein langes Lebensmaß erreichen.“
Verse 9
श्रीभगवान् बोले--द्रोणकुमार! उस दिव्य अस्त्रका प्रहार तो अमोघ ही होगा। उत्तराका वह गर्भ मरा हुआ ही पैदा होगा; फिर उसे लंबी आयु प्राप्त हो जायगी ।। त्वां तु कापुरुषं पापं विदु: सर्वे मनीषिण: । असकृत्पापकर्माणं बालजीवितघातकम्
Der Erhabene Herr sprach: „O Sohn Droṇas! Die Wirkung dieser göttlichen Waffe wird wahrlich unfehlbar sein. Uttaras Kind wird leblos geboren werden; doch danach wird ihm ein langes Leben gewährt. Dich aber—alle Weisen kennen dich als einen nichtswürdigen Feigling, als Sünder, der immer wieder Böses tut, und als Mörder eines Kindeslebens.“
Verse 10
तस्मात्त्वमस्य पापस्य कर्मण: फलमाप्त॒हि । त्रीणि वर्षमहस्राणि चरिष्यसि महीमिमाम्
Darum wirst du gewiss die Frucht dieser sündhaften Tat empfangen. Dreitausend Jahre wirst du über diese Erde umherwandern.
Verse 11
अप्राप्रुवन् क्वचित् काज्चित् संविदं जातु केनचित् । निर्जनानसहायस्त्वं देशान् प्रविचरिष्यसि
Niemals wirst du irgendwo und zu irgendeiner Zeit ein Gespräch mit irgendjemandem erlangen. Allein und ohne Beistand wirst du durch öde, verlassene Gegenden umherirren.
Verse 12
परंतु तुझे सभी मनीषी पुरुष कायर, पापी, बारंबार पापकर्म करनेवाला और बाल- हत्यारा समझते हैं। इसलिये तू इस पाप-कर्मका फल प्राप्त कर ले। आजसे तीन हजार वर्षोतक तू इस पृथ्वीपर भटकता फिरेगा। तुझे कभी कहीं और किसीके साथ भी बातचीत करनेका सुख नहीं मिल सकेगा। तू अकेला ही निर्जन-स्थानोंमें घूमता रहेगा ।। भवित्री न हि ते क्षुद्र जनमध्येषु संस्थिति: । पूयशोणितगन्धी च दुर्गकान्तारसंश्रय:
Vaiśampāyana sprach: «Alle Weisen halten dich für einen Feigling, einen Sünder, der immer wieder Unheil wirkt, und für einen Kindermörder. Darum empfange die Frucht dieser Schuld. Von heute an wirst du dreitausend Jahre über diese Erde irren. Niemals wirst du die Wohltat genießen, mit irgendwem zu sprechen, an keinem Ort. Allein wirst du in menschenleeren Gegenden umhergehen. Du Elender — unter den Menschen wird es keinen Platz für dich geben; nach Eiter und Blut stinkend, wirst du Zuflucht suchen in verlassenen Festungen und in weglosem Wildnisland.»
Verse 13
वय:ः प्राप्य परिक्षित् तु वेदब्रतमवाप्य च
Vaiśampāyana sprach: «Als Parīkṣit das Mannesalter erreicht hatte und auch die heilige Zucht des vedischen Studiums und der Observanz auf sich genommen hatte,»
Verse 14
कृपाच्छारद्वताच्छूर: सर्वास्त्राण्युपपत्स्यते । परीक्षित् तो दीर्घ आयु प्राप्त करके ब्रह्मचर्यपालन एवं वेदाध्ययनका व्रत धारण करेगा और वह शूरवीर बालक शरद्वानके पुत्र कृपाचार्यसे ही सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करेगा || १३ $ ।। विदित्वा परमास्त्राणि क्षत्रधर्मव्रते स्थित:
Vaiśampāyana sprach: «Jener heldenhafte Knabe wird von Kṛpa, dem tapferen Sohn Śaradvat’s, die ganze Wissenschaft der Waffen und Geschosse erlernen. Nachdem er die höchsten Waffen gemeistert hat, wird er standhaft im Gelübde des kṣatriya-dharma bleiben — nicht aus Eitelkeit üben, sondern um Ordnung und rechtmäßige Herrschaft zu schützen.»
Verse 15
इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें ब्रह्मासत्रका पाण्डवोके गर्भमें प्रवेशविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ,इतश्वोर्ध्व महाबाहु: कुरुराजो भविष्यति
So endet im Śrī Mahābhārata, innerhalb der Saauptika-Parva—genauer im Aiṣīka-Abschnitt—das fünfzehnte Kapitel, das vom Eindringen des Brahmāstra in den Schoß der Pāṇḍava-Linie handelt. Von nun an wird ein mächtigarmiger König der Kurus geboren werden.
Verse 16
अहं त॑ जीवयिष्यामि दग्धं शस्त्राग्नितेजसा । पश्य मे तपसो वीर्य सत्यस्य च नराधम,नराधम! तेरी शस्त्राग्निके तेजसे दग्ध हुए उस बालकको मैं जीवित कर दूँगा। उस समय तू मेरे तप और सत्यका प्रभाव देख लेना इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि द्रौपदीसान्त्वनायां षोडशो< ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपववके अन्तर्गत ऐषीकपवर्ें द्रौपदीकी सानत्वनाविषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ
Vaiśampāyana sprach: „Ich werde jenes Kind wieder zum Leben erwecken, das von der feurigen Macht deiner Waffe verbrannt wurde. O du Niedrigster der Menschen, sieh die Kraft meiner Askese und die Macht meiner Wahrheit!“
Verse 17
व्यास उवाच यस्मादनादृत्य कृतं त्वयास्मान् कर्म दारुणम् । ब्राह्मणस्य सतश्वैव यस्मात् ते वृत्तमीदूशम्
Vyāsa sprach: Weil du, ohne jede Achtung, eine grausame Tat gegen uns begangen hast; und weil du ein solches Verhalten sogar gegenüber einem rechtschaffenen Brāhmaṇa angenommen hast—darum ist dein Wandel so geworden.
Verse 18
तस्माद् यद् देवकीपुत्र उत्तवानुत्तमं वच: । असंशयं ते तद् भावि क्षत्रधर्मस्त्वया55श्रित:
Darum, o Sohn der Devakī, werden die vortrefflichen Worte, die du gesprochen hast, gewiss in Erfüllung gehen. Ohne Zweifel hast du Zuflucht zur Pflicht des Kṣatriya genommen—zum Kriegerkodex, der Entschlossenheit, Schutz und die harten Forderungen der Schlacht trägt.
Verse 19
व्यासजीने कहा--द्रोणकुमार! तूने हमलोगोंका अनादर करके यह भयंकर कर्म किया है, ब्राह्मण होनेपर भी तेरा आचार ऐसा गिर गया है और तूने क्षत्रियरर्मको अपना लिया है; इसलिये देवकीनन्दन श्रीकृष्णने जो उत्तम बात कही है, वह सब तेरे लिये होकर ही रहेगी, इसमें संशय नहीं है ।। अश्वत्थामोवाच सहैव भवता ब्रह्मन् स्थास्यामि पुरुषेष्विह । सत्यवागस्तु भगवानयं च पुरुषोत्तम:,अश्वत्थामा बोला--ब्रह्मन! अब मैं मनुष्योंमें केवल आपके ही साथ रहूँगा। इन भगवान् पुरुषोत्तमकी बात सत्य हो
Vyāsa sprach: „O Sohn Droṇas! Indem du uns verachtet hast, begingst du diese schreckliche Tat. Obwohl du von Geburt ein Brāhmaṇa bist, ist dein Wandel tief gesunken, und du hast den Weg des Kṣatriya ergriffen. Darum wird die edle Verkündigung Śrī Kṛṣṇas, des Sohnes Devakīs, an dir gewiss in Erfüllung gehen—daran besteht kein Zweifel.“ Aśvatthāmā erwiderte: „O Brahmane, unter den Menschen werde ich fortan nur in deiner Gemeinschaft hier verbleiben. Möge dieses Wort des erhabenen Herrn, des Puruṣottama, wahr werden.“
Verse 20
वैशम्पायन उवाच प्रदायाथ मर्णिं द्रौणि: पाण्डवानां महात्मनाम् । जगाम विमनास्तेषां सर्वेषां पश्यतां वनम्
Vaiśampāyana sprach: Daraufhin übergab Droṇi, der Sohn Droṇas, den Edelstein den hochgesinnten Pāṇḍavas und ging—niedergeschlagenen Herzens—vor aller Augen in den Wald davon.
Verse 21
वैशम्पायनजी कहते हैं-राजन्! इसके बाद महात्मा पाण्डवोंको मणि देकर द्रोणकुमार अश्वत्थामा उदास मनसे उन सबके देखते-देखते वनमें चला गया ।। पाण्डवाश्चापि गोविन्द पुरस्कृत्य हतद्विष: । कृष्णद्वैपायनं चैव नारदं च महामुनिम्,इधर जिनके शत्रु मारे गये थे, वे पाण्डव भी भगवान् श्रीकृष्ण, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास तथा महामुनि नारदजीको आगे करके द्रोणपुत्रके साथ ही उत्पन्न हुई मणि लिये आमरण अनशनका निश्चय किये बैठी हुई मनस्विनी द्रौपदीके पास पहुँचनेके लिये शीघ्रतापूर्वक चले
Vaiśampāyana sprach: „O König! Danach zog Aśvatthāmā, der Sohn Droṇas, nachdem er den Edelstein den großherzigen Pāṇḍavas übergeben hatte, mit niedergeschlagenem Sinn—vor aller Augen—in den Wald davon. Und auch die Pāṇḍavas, deren Feinde nun erschlagen waren, stellten Govinda (Śrī Kṛṣṇa) an die Spitze, zusammen mit Kṛṣṇa-Dvaipāyana Vyāsa und dem großen Weisen Nārada; den Edelstein, der im Zusammenhang mit Droṇas Sohn entstanden war, bei sich tragend, eilten sie, um die entschlossene Draupadī zu erreichen, die sich mit dem Gelübde eines Fastens bis zum Tod niedergesetzt hatte. Die Szene macht die moralische Last von Gewalt und Vergeltung sichtbar: Selbst nach dem Sieg bleiben Trauer und Verantwortung, und die Gemeinschaft wendet sich Rat und Selbstbeherrschung zu statt weiterer Rache.“
Verse 22
द्रोणपुत्रस्य सहजं मणिमादाय सत्वरा: । द्रौपदीमभ्यधावन्त प्रायोपेतां मनस्विनीम्,इधर जिनके शत्रु मारे गये थे, वे पाण्डव भी भगवान् श्रीकृष्ण, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास तथा महामुनि नारदजीको आगे करके द्रोणपुत्रके साथ ही उत्पन्न हुई मणि लिये आमरण अनशनका निश्चय किये बैठी हुई मनस्विनी द्रौपदीके पास पहुँचनेके लिये शीघ्रतापूर्वक चले
Eilig nahmen sie den Edelstein an sich, der zusammen mit Droṇas Sohn (Aśvatthāman) geboren war, und hasteten zu der hochgesinnten Draupadī, die sich zum prāya—zum Fasten bis zum Tod—entschlossen hatte. Der Vers betont die gespannte moralische Nachwirkung der Gräuel: Die Gemeinschaft bewegt sich rasch mit dem Zeichen des Täters, um Draupadīs Schmerz, ihr Gelübde und die Forderungen der Gerechtigkeit zu beantworten—doch gezügelt durch Selbstbeherrschung.
Verse 23
वैशम्पायन उवाच ततस्ते पुरुषव्याप्रा: सदश्वैरनिलोपमै: । अभ्ययु: सहदाशार्हा: शिबिरं पुनरेव हि,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! भगवान् श्रीकृष्ण-सहित वे पुरुषसिंह पाण्डव वहाँसे वायुके समान वेगशाली उत्तम घोड़ोंद्वारा पुन: अपने शिविरमें आ पहुँचे
Vaiśampāyana sprach: Da ritten jene tatkräftigen Helden, begleitet von Dāśārha (Śrī Kṛṣṇa), auf vortrefflichen Pferden, schnell wie der Wind, wieder zurück in ihr Lager. In der düsteren Nachwirkung nächtlicher Gewalt betont der Vers die zielgerichtete Rückkehr und Wachsamkeit—Handeln mit Entschlossenheit unter der moralischen Last des Krieges.
Verse 24
अवतीर्य रथेभ्यस्तु त्वरमाणा महारथा: । ददृशुद्रौपदीं कृष्णामार्तामार्ततरा: स्वयम्
Nachdem sie hastig von ihren Wagen abgestiegen waren, erblickten die großen Krieger Draupadī—Kṛṣṇā—von Kummer überwältigt; und bei diesem Anblick wurden sie selbst noch bekümmerter als sie. Der Vers macht deutlich, dass die Nachwirkungen der Gewalt nicht mit Sieg oder bloßem Überleben enden: Leid breitet sich durch Mitgefühl, Verwandtschaft und moralisches Entsetzen aus.
Verse 25
वहाँ रथोंसे उतरकर वे महारथी वीर बड़ी उतावलीके साथ आकर शोकपीड़ित द्रपदकुमारी कृष्णासे मिले। वे स्वयं भी शोकसे अत्यन्त व्याकुल हो रहे थे ।। तामुपेत्य निरानन्दां दुःखशोकसमन्विताम् | परिवार्य व्यतिष्ठन्त पाण्डवा: सहकेशवा:,दुःख-शोकमें डूबी हुई आनन्दशून्य द्रौपदीके पास पहुँचकर श्रीकृष्णसहित पाण्डव उसे चारों ओरसे घेरकर बैठ गये
Dort stiegen jene großen Wagenkämpfer ab und eilten, von Unruhe getrieben, zu Kṛṣṇā, der Tochter Drupadas—Draupadī—die vom Kummer gepeinigt war; und auch sie selbst waren von Trauer zutiefst erschüttert. Als sie zu der freudlosen, von Leid und Schmerz erfüllten Draupadī traten, umringten die Pāṇḍavas sie zusammen mit Keśava (Kṛṣṇa) und blieben dicht bei ihr, in solidarischer Nähe. Die Szene betont die ethische Pflicht von Verwandten und Verbündeten: Gegenwart zu schenken, Schutz zu bieten und die Trauer zu teilen nach einer Gräueltat.
Verse 26
ततो राज्ञाभ्यनुज्ञातो भीमसेनो महाबल: । प्रददौ त॑ मर्णिं दिव्यं वचन चेदमब्रवीत्
Daraufhin, nachdem er die Erlaubnis des Königs empfangen hatte, übergab der überaus mächtige Bhīmasena jenes göttliche Juwel und sprach diese Worte. Der Augenblick betont die Zucht selbst im Nachhall der Gewalt: Macht wird durch rechtmäßige Autorität gebändigt, und kostbare Beute wird mit gebührender Zustimmung übergeben, nicht bloß mit roher Kraft an sich gerissen.
Verse 27
तब राजाकी आज्ञा पाकर महाबली भीमसेनने वह दिव्य मणि द्रौपदीके हाथमें दे दी और इस प्रकार कहा-- ।। अयं भद्रे तव मणि: पुत्रहन्तुर्जित: स ते । उत्तिष्ठ शोकमुत्सृज्य क्षात्रधर्ममनुस्मर,भद्रे! यह तुम्हारे पुत्रोंका वध करनेवाले अश्वत्थामा-की मणि है। तुम्हारे उस शत्रुको हमने जीत लिया। अब शोक छोड़कर उठो और क्षत्रियधर्मका स्मरण करो
Nachdem er den Befehl des Königs empfangen hatte, legte der mächtige Bhīmasena das göttliche Juwel in Draupadīs Hand und sprach: „Edle Frau, dies ist dein Juwel — errungen von Aśvatthāmā, dem Mörder deiner Söhne. Jenen Feind, der der deine ist, haben wir bezwungen. Nun steh auf, wirf die Trauer ab und gedenke des Kṣatriya-Dharma.“
Verse 28
प्रयाणे वासुदेवस्य शमार्थमसितेक्षणे । यान्युक्तानि त्वया भीरु वाक्यानि मधुघातिनि
Vaiśampāyana sprach: „O Dunkeläugige, o scheue Frau, o Bezwingerin Madhus — jene Worte, die du um der Versöhnung willen sprachst, als Vāsudeva aufbrach (zu seiner Sendung)…“
Verse 29
“कजरारे नेत्रोंवाली भोली-भाली कृष्णे! जब मधुसूदन श्रीकृष्ण कौरवोंके पास संधि करानेके लिये जा रहे थे, उस समय तुमने इनसे जो बातें कही थीं, उन्हें याद तो करो ।। नैव मे पतय: सन्ति न पुत्रा भ्रातरो न च । न वै त्वमिति गोविन्द शममिच्छति राजनि,“जब राजा युधिष्छिर शान्तिके लिये संधि कर लेना चाहते थे, उस समय तुमने पुरुषोत्तम श्रीकृष्णसे बड़े कठोर वचन कहे थे--“गोविन्द! (मेरे अपमानको भुलाकर शत्रुओंके साथ संधि की जा रही है, इसलिये मैं समझती हूँ कि) न मेरे पति हैं, न पुत्र हैं, न भाई हैं और न तुम्हीं हो'। क्षत्रियरर्मके अनुसार कहे गये उन वचनोंको तुम्हें आज स्मरण करना चाहिये
Vaiśampāyana sprach: „Zu Govinda sagte sie: ‘Ich habe weder Gatten noch Söhne noch Brüder — nicht einmal dich.’“ Als der König Frieden suchte und einen Vergleich schließen wollte, hatte die Königin, getrieben vom Kṣatriya-Kodex und vom Stachel der Demütigung, Kṛṣṇa einst mit diesen harten Worten angefahren und gemahnt, dass Frieden ohne Gerechtigkeit einer Auslöschung von Familie und Ehre gleichkäme. Nun wird sie aufgefordert, jener Worte zu gedenken und die sittliche Forderung zu wahren, die sie trugen: dass Versöhnung nicht zur Mitschuld am Unrecht werde.
Verse 30
उक्तवत्यसि तीव्राणि वाक््यानि पुरुषोत्तमम् । क्षत्रधर्मानुरूपाणि तानि संस्मर्तुमहसि,“जब राजा युधिष्छिर शान्तिके लिये संधि कर लेना चाहते थे, उस समय तुमने पुरुषोत्तम श्रीकृष्णसे बड़े कठोर वचन कहे थे--“गोविन्द! (मेरे अपमानको भुलाकर शत्रुओंके साथ संधि की जा रही है, इसलिये मैं समझती हूँ कि) न मेरे पति हैं, न पुत्र हैं, न भाई हैं और न तुम्हीं हो'। क्षत्रियरर्मके अनुसार कहे गये उन वचनोंको तुम्हें आज स्मरण करना चाहिये
Vaiśampāyana sprach: „Einst hast du Puruṣottama (Śrī Kṛṣṇa) harte Worte gesagt. Diese Worte entsprachen dem Kṣatriya-Dharma; du sollst ihrer jetzt gedenken.“
Verse 31
हतो दुर्योधन: पापो राज्यस्य परिपन्थिक: । दुःशासनस्य रुधिरं पीत॑ विस्फुरतो मया,“हमारे राज्यका लुटेरा पापी दुर्योधन मारा गया और छटपटाते हुए दुःशासनका रक्त भी मैंने पी लिया। वैरका भरपूर बदला चुका लिया गया। अब कुछ कहनेकी इच्छावाले लोग हमलोगोंकी निनन््दा नहीं कर सकते। हमने द्रोणपुत्र अश्वत्थामाको जीतकर केवल ब्राह्मण और गुरुपुत्र होने-के कारण ही उसे जीवित छोड़ दिया है
Vaiśampāyana sprach: „Der sündige Duryodhana—Feind und Hemmnis unseres Reiches—ist erschlagen. Und als Duḥśāsana sich windend rang, trank ich sein Blut. So ist die Rache vollends vergolten. Nun können jene, die reden wollen, uns nicht länger tadeln. Nachdem wir Aśvatthāman, Droṇas Sohn, bezwungen hatten, ließen wir ihn allein deshalb am Leben, weil er ein Brāhmaṇa und der Sohn unseres Lehrers ist.“
Verse 32
वैरस्य गतमानृण्यं न सम वाच्या विवक्षताम् | जित्वा मुक्तो द्रोणपुत्रो ब्राह्मण्याद् गौरवेण च,“हमारे राज्यका लुटेरा पापी दुर्योधन मारा गया और छटपटाते हुए दुःशासनका रक्त भी मैंने पी लिया। वैरका भरपूर बदला चुका लिया गया। अब कुछ कहनेकी इच्छावाले लोग हमलोगोंकी निनन््दा नहीं कर सकते। हमने द्रोणपुत्र अश्वत्थामाको जीतकर केवल ब्राह्मण और गुरुपुत्र होने-के कारण ही उसे जीवित छोड़ दिया है
Vaiśampāyana sprach: „Unsere Feindschaft ist vollends beglichen; die Schuld der Rache ist getilgt. Wer reden will, kann nun keinen gleichwertigen Vorwurf mehr gegen uns erheben. Nachdem wir Droṇas Sohn (Aśvatthāman) überwunden hatten, ließen wir ihn lebend frei—aus Achtung vor seinem Brāhmaṇa-Stand und weil er der Sohn unseres Lehrers ist.“
Verse 33
यशोअस्य पतितं देवि शरीरं त्ववशेषितम् । वियोजितश्व मणिना भ्रेशितश्नायुधं भुवि
Vaiśampāyana sprach: „O Göttin, sein einst ruhmreicher Leib liegt nun gefallen da, nur ein kümmerlicher Rest. Man hat ihm sein Juwel entrissen, und auch seine Waffe ist ihm entglitten und liegt auf der Erde.“
Verse 34
“देवि! उसका सारा यश धूलमें मिल गया। केवल शरीर शेष रह गया है। उसकी मणि भी छीन ली गयी और उससे पृथ्वीपर हथियार डलवा दिया गया है' ।। द्रौपहुुवाच केवलानृण्यमाप्तास्मि गुरुपुत्रो गुरुर्मम । शिरस्यथेतं मर्णिं राजा प्रतिबध्नातु भारत,द्रौपदी बोली--भरतनन्दन! गुरुपुत्र तो मेरे लिये भी गुरुके ही समान हैं। मैं तो केवल पुत्रोंके वधका प्रतिशोध लेना चाहती थी, वह पा गयी। अब महाराज इस मणिको अपने मस्तकपर धारण करें
Vaiśampāyana sprach: „O Königin! All sein Ruhm ist zu Staub geworden; nur der Leib ist geblieben. Sein Juwel wurde ihm genommen, und man ließ ihn seine Waffen auf die Erde werfen.“ Draupadī sprach: „Ich bin nur von der Schuld der Vergeltung frei geworden. Der Sohn des Lehrers ist auch mir ein Lehrer. Ich begehrte allein Sühne für die Ermordung meiner Söhne, und ich habe sie erlangt. Nun soll der König, o Nachkomme Bharatas, dieses Juwel an sein eigenes Haupt binden.“
Verse 35
त॑ गृहीत्वा ततो राजा शिरस्येवाकरोत् तदा । गुरोरुच्छिष्टमित्येव द्रौपद्या वचनादपि,तब राजा युधिष्ठिरने वह मणि लेकर द्रौपदीके कथनानुसार उसे अपने मस्तकपर ही धारण कर लिया। उन्होंने उस मणिको गुरुका प्रसाद ही समझा
Da nahm der König das Juwel und setzte es sogleich auf sein eigenes Haupt. Selbst auf Draupadīs Drängen betrachtete er es als einen Rest der Gnade des Guru—nicht als Kriegstrophäe, sondern als geheiligte Gabe, die man in Demut und Zucht zu tragen hat.
Verse 36
ततो दिव्यं मणिवरं शिरसा धारयन् प्रभु: । शुशुभे स तदा राजा सचन्द्र इव पर्वत:,उस दिव्य एवं उत्तम मणिको मस्तकपर धारण करके शक्तिशाली राजा युधिष्ठिर चन्द्रोदयकी शोभासे युक्त उदयाचलके समान सुशोभित हुए
Da trug der mächtige König jenes göttliche, erlesene Juwel auf seinem Haupt und erstrahlte—wie ein Berg, vom Mond gekrönt.
Verse 37
उत्तस्थौ पुत्रशोकार्ता ततः कृष्णा मनस्विनी । कृष्णं चापि महाबाहु: परिपप्रच्छ धर्मराट्,तब पुत्रशोकसे पीड़ित हुई मनस्विनी कृष्णा अनशन छोड़कर उठ गयी और महाबाहु धर्मराजने भगवान् श्रीकृष्णसे एक बात पूछी
Darauf erhob sich Kṛṣṇā (Draupadī), im Geist standhaft, doch vom Schmerz um ihre Söhne gepeinigt, und brach ihr Fasten ab. Da befragte auch der starkarmige Dharmarāja (Yudhiṣṭhira) Kṛṣṇa und suchte Führung.
Verse 126
विचरिष्यसि पापात्मन् सर्वव्याधिसमन्वित: । ओ नीच! तू जनसमुदायमें नहीं ठहर सकेगा। तेरे शरीरसे पीव और लोहूकी दुर्गन््ध निकलती रहेगी; अतः तुझे दुर्गम स्थानोंका ही आश्रय लेना पड़ेगा। पापात्मन्! तू सभी रोगोंसे पीड़ित होकर इधर-उधर भटकेगा
Vaiśampāyana sprach: „O du sündhaft Gesinnter, du wirst umherirren, von allen Krankheiten befallen. Unfähig, unter Menschen zu bleiben, wirst du in öde und schwer zugängliche Gegenden getrieben werden, denn aus deinem Leib wird unaufhörlich der Gestank von Eiter und Blut dringen.“
Verse 1436
षष्टिं वर्षाणि धर्मात्मा वसुधां पालयिष्यति । इस प्रकार उत्तम अस्त्रोंका ज्ञान प्राप्त करके क्षत्रियधर्ममें स्थित हो साठ वर्षोतक इस पृथ्वीका पालन करेगा
Vaiśampāyana sprach: „Jener von rechtschaffener Seele wird die Erde sechzig Jahre lang schützen und regieren.“
Verse 1536
परिक्षिन्नाम नृपतिर्मिषतस्ते सुदुर्मते । दुर्मते! इसके बाद तेरे देखते-देखते महाबाहु कुरुराज परीक्षित् ही इस भूमण्डलका सम्राट् होगा
Vaiśampāyana sprach: „Ein König namens Parīkṣit wird erstehen—während du, o völlig Verblendeter, hilflos zusehen musst. Ja, vor deinen Augen wird der starkarmige Kuruprinz Parīkṣit zum Herrscher über diese ganze Erde werden.“
The chapter confronts whether retaliatory force can be justified when it targets a protected life (the unborn heir). The narrative resolves this by treating such action as a severe dharmic violation warranting condemnation and punitive consequence.
Power and technical capability (astra) do not confer moral legitimacy; truthful authority and restraint govern rightful action. Even amid political ruin, dharma operates through accountability, restitution, and the safeguarding of future social order.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-commentary is functional and ethical—Vyāsa’s confirmation of Kṛṣṇa’s pronouncement and the narrative’s linkage of adharma to tangible consequence and of protection to dynastic continuity.