
अध्याय १ — न्यग्रोधवनोपवेशनम् तथा द्रौणिनिश्चयः (Night at the Banyan and Drauṇi’s Resolve)
Upa-parva: Sauptika-upākhyāna (Nightfall at the Nyagrodha; Drauṇi’s Resolution)
Saṃjaya reports that the surviving Kaurava warriors move southward at sunset, release their mounts, and conceal themselves near the encampment, wounded and exhausted. Dhṛtarāṣṭra responds with disbelief and grief over his son’s death, reflecting on fate (diṣṭa), the collapse of royal authority, and the humiliation of living under Pāṇḍava rule. Saṃjaya resumes: Kṛpa, Kṛtavarmā, and Drauṇi reach a formidable forest with ponds and abundant wildlife, perform evening observances, and settle beneath a sprawling nyagrodha as night intensifies with ominous sounds. Kṛpa and Kṛtavarmā fall asleep; Drauṇi, burning with anger, remains awake and observes an owl silently killing sleeping crows on the banyan. Interpreting this as tactical instruction, he reasons that direct combat is presently infeasible, and that covert action can produce decisive results. He cites policy-like verses on striking an enemy when vulnerable (fatigued, sleeping, disordered, leaderless, divided), concludes that the time is ripe, and awakens the others to propose the course ahead, lamenting Duryodhana’s fall amid the adversary’s celebratory noise.
Chapter Arc: शल्यपर्व के समापन के बाद धृतराष्ट्र का प्रश्न उठता है—अधर्मपूर्वक मारे गए दुर्योधन के पश्चात् कृतवर्मा, कृप और द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने क्या किया? (V16) → रात के अंधकार में वे तीनों शत्रुओं की दृष्टि से बचते हुए रथ-घोड़े छोड़कर गहन देश में छिपते हैं; पास ही शिविर-प्रदेश में कटे-फटे, क्षत-विक्षत शवों का भयावह दृश्य है, और दूर से पांचालों के विजय-वाद्य, शंख-नाद और सिंहनाद वातावरण को चीरते हैं (V2, V3, V63)। → अश्वत्थामा युद्ध-नीति का कठोर निष्कर्ष निकालता है—जो सेना आधी रात में निद्रा से अचेत हो, जिसका नायक नष्ट हो, जिसमें फूट हो, वह सहज वध-योग्य है; इसी आधार पर वह सोते हुए पाण्डवों सहित पांचालों के संहार का निश्चय करता है (V543, V553)। → कृपाचार्य और कृतवर्मा उस निश्चय को सुनकर लज्जा और संकोच से मौन हो जाते हैं; निर्णय बन चुका है, पर उसका नैतिक भार तीनों के बीच भारी होकर टिक जाता है (V573)। → रात्रि-आक्रमण का संकल्प हो गया—अब प्रश्न केवल यह है कि वह किस रूप में शिविर पर टूटेगा और कौन-कौन उसकी चपेट में आएगा।
Verse 1
2 ।। शल्यपर्व सम्पूर्णम् ।। भी नस हज हि की अनुष्ट्प्ू बड़े श्लोक बड़े श्लोकोंको अनुष्ट्प् माननेपप. कुल उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये ३५३१९ (५१५५) १५८० ३६८९८ दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये ४२ (५) ६॥॥। « ४८ ॥|।« शल्यपर्वकी कुल श्लोकसंख्या ३७३८ ॥। ३० श्रीपरमात्मने नम: ।। श्रीमहाभारतम् सौप्तिकपर्व प्रथमो 5 ध्याय: तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अभ्व॒त्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् | देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ।। अन्तर्यामी नारायण भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और उनकी लीलाओंका संकलन करनेवाले महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये। संजय उवाच ततस्ते सहिता वीरा: प्रयाता दक्षिणामुखा: । उपास्तमनवेलायां शिबिराभ्याशमागता:,संजय कहते हैं--राजन्! दुर्योधनकी आज्ञाके अनुसार कृपाचार्यके द्वारा अश्वत्थामाका सेनापतिके पदपर अभिषेक हो जानेके अनन्तर वे तीनों वीर अभ्रृत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा एक साथ दक्षिण दिशाकी ओर चले और सूर्यास्तके समय सेनाकी छावनीके निकट जा पहुँचे इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिमन्त्रणायां प्रथमो5ध्याय:
Sanjaya said: Then those heroes, moving together and facing south, set out; and at the time of sunset they reached the vicinity of the army-camp. The verse quietly marks a transition from formal command to the ominous movement of the remaining warriors—an outwardly ordinary march that, in the ethical shadow of the war’s end, prepares the ground for a grievous and adharma-leaning act soon to follow.
Verse 2
विमुच्य वाहांस्त्वरिता भीता समभवंस्तदा । गहन देशमासाद्य प्रच्छन्ना न्यविशन्त ते,शत्रुओंको पता न लग जाय, इस भयसे वे सब-के-सब डरे हुए थे, अतः बड़ी उतावलीके साथ वनके गहन प्रदेशमें जाकर उन्होंने घोड़ोंकोी खोल दिया और छिपकर एक स्थानपर वे जा बैठे
Sañjaya said: Then, seized by fear and acting in haste, they unyoked their mounts. Reaching a dense and secluded tract, they concealed themselves and sat down there, anxious that the enemy might discover their whereabouts. The verse highlights the psychological aftermath of battle—fear, concealment, and the instinct for survival overriding open confrontation.
Verse 3
सेनानिवेशमभितो नातिदूरमवस्थिता: । निकृत्ता निशितै: शस्त्रै: समन्तात् क्षतविक्षता:,जहाँ सेनाकी छावनी थी, उस स्थानके पास थोड़ी ही दूरपर वे तीनों विश्राम करने लगे। उनके शरीर तीखे शस्त्रोंक आधातसे घायल हो गये थे। वे सब ओरसे क्षत-विक्षत हो रहे थे
Sañjaya said: Not far from the army’s encampment, those men halted and lay down to rest. Cut and struck by keen weapons, they were wounded and mangled on every side—bearing on their bodies the harsh aftermath of the night’s violence and the moral weight of war’s cruelty.
Verse 4
दीर्घमुष्णं च नि:श्वस्य पाण्डवानेव चिन्तयन् । श्रुत्वा च निनदं घोरं पाण्डवानां जयैषिणाम्
Sañjaya said: He heaved a long, hot sigh, his mind fixed only on the Pāṇḍavas; and he heard the dreadful roar of the Pāṇḍavas, who were intent on victory. The verse underscores how the momentum of righteous resolve on the battlefield can weigh upon an adversary’s conscience and foreboding, even before any new blow is struck.
Verse 5
ते मुहूर्तात् ततो गत्वा श्रान्तवाहा: पिपासिता:,दो ही घड़ीमें उस स्थानसे कुछ दूर जाकर क्रोध और अमर्षके वशीभूत हुए वे महाधनुर्धर योद्धा प्याससे पीड़ित हो गये। उनके घोड़े भी थक गये। उनके लिये यह अवस्था असहा हो उठी थी। वे राजा दुर्योधनके मारे जानेसे बहुत दुःखी हो एक मुहूर्ततक वहाँ चुपचाप खड़े रहे
Sañjaya sprach: Nachdem sie sich ein kurzes Stück von jenem Ort entfernt hatten, wurden jene großen Bogenschützen—von Zorn und verletztem Stolz überwältigt—von Durst gequält, und ihre Reittiere waren erschöpft. Der Zustand wurde für sie unerträglich. Vom Tod König Duryodhanas tief getroffen, standen sie dort schweigend eine Muhūrta lang, erfüllt von Schmerz und Groll.
Verse 6
नामृष्यन्त महेष्वासा: क्रोधामर्षवशं गता: । राज्ञो वधेन संतप्ता मुहूर्त समवस्थिता:,दो ही घड़ीमें उस स्थानसे कुछ दूर जाकर क्रोध और अमर्षके वशीभूत हुए वे महाधनुर्धर योद्धा प्याससे पीड़ित हो गये। उनके घोड़े भी थक गये। उनके लिये यह अवस्था असहा हो उठी थी। वे राजा दुर्योधनके मारे जानेसे बहुत दुःखी हो एक मुहूर्ततक वहाँ चुपचाप खड़े रहे
Sañjaya sprach: Unfähig, es zu ertragen, standen jene großen Bogenschützen—von Zorn und verletztem Stolz überwältigt—einen Augenblick lang schweigend da, innerlich brennend vor Schmerz über die Tötung ihres Königs. Diese Pause war keine ruhige Selbstbeherrschung, sondern ein gespanntes, schwärendes Intervall, in dem Wut und Demütigung nach Duryodhanas Tod an Kraft gewannen und die ethische Finsternis der kommenden Vergeltungsgewalt vorbereiteten.
Verse 7
धृतराष्ट्र रवाच अश्रद्धेयमिदं कर्म कृतं भीमेन संजय । यत् स नागायुतप्राण: पुत्रो मम निपातित:,धृतराष्ट्र बोले--संजय! मेरे पुत्र दुर्योधनमें दस हजार हाथियोंका बल था तो भी उसे भीमसेनने मार गिराया। उनके द्वारा जो यह कार्य किया गया है, इसपर सहसा विश्वास नहीं होता
Dhṛtarāṣṭra sprach: „Sañjaya! Unglaublich ist diese Tat Bhīmas: Dass mein Sohn, der die Kraft von zehntausend Elefanten besaß, zu Boden gestreckt wurde!“
Verse 8
अवध्य: सर्वभूतानां वज़संहननो युवा । पाण्डवै: समरे पुत्रो निहतो मम संजय,संजय! मेरा पुत्र नवयुवक था। उसका शरीर वज्रके समान कठोर था और इसीलिये वह सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अवध्य था, तथापि पाण्डवोंने समरांगणमें उसका वध कर डाला
Dhṛtarāṣṭra sprach: „Sañjaya! Mein Sohn war jung; sein Leib war hart wie ein Vajra, und darum galt er allen Wesen als unverwundbar. Dennoch haben ihn die Pāṇḍavas im Kampf erschlagen.“
Verse 9
न दिष्टमभ्यतिक्रान्तुं शक््यं गावल्गणे नरै: । यत् समेत्य रणे पार्थ: पुत्रो मम निपातित:,गवल्गणकुमार! कुन्तीके पुत्रोंने मिलकर रणभूमिमें जो मेरे पुत्रको धराशायी कर दिया है, इससे जान पड़ता है कि कोई भी मनुष्य दैवके विधानका उल्लंघन नहीं कर सकता
Dhṛtarāṣṭra sprach: „O Sohn des Gāvalgaṇa! Kein Mensch vermag zu überschreiten, was das Schicksal verfügt hat. Denn als die Söhne Kuntīs sich im Kampf vereinten, streckte Arjuna meinen Sohn nieder—und zeigte damit, dass der Spruch des Geschicks nicht gebrochen werden kann.“
Verse 10
अद्विसारमयं नूनं हृदयं मम संजय । हत॑ पुत्रशतं श्र॒त्वा यन्न दीर्ण सहस्र्धा,संजय! निश्चय ही मेरा हृदय पत्थरके सारतत्त्वका बना हुआ है, जो अपने सौ पुत्रोंके मारे जानेका समाचार सुनकर भी इसके सहखसौरों टुकड़े नहीं हो गये
Sañjaya sprach: „Wahrlich, mein Herz muss aus einer steinernen Essenz gemacht sein, o Sañjaya; denn selbst nachdem ich hörte, dass meine hundert Söhne erschlagen wurden, ist es nicht in tausend Stücke zersprungen.“
Verse 11
कथं हि वृद्धमिथुनं हतपुत्र॑ं भविष्यति । न हाहं पाण्डवेयस्य विषये वस्तुमुत्सहे,हाय! अब हम दोनों बूढ़े पति-पत्नी अपने पुत्रोंके मारे जानेसे कैसे जीवित रहेंगे? मैं पाण्डुकुमार युधिष्ठिरके राज्यमें नहीं रह सकता
Sañjaya sprach: „Wie sollen wir denn — ein greiser Mann und eine greise Frau, der Söhne beraubt — weiterleben? Ach, ich habe nicht das Herz, im Herrschaftsgebiet des Pāṇḍava-Prinzen (Yudhiṣṭhira) zu bleiben.“
Verse 12
कथं राज्ञ: पिता भूत्वा स्वयं राजा च संजय । प्रेष्यभूत: प्रवर्तेयं पाण्डवेयस्थ शासनात्,संजय! मैं राजाका पिता और स्वयं भी राजा ही था। अब पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरकी आज्ञाके अधीन हो दासकी भाँति कैसे जीवननिर्वाह करूँगा?
Sañjaya sprach: „Wie, o Sañjaya, da ich Vater eines Königs war und selbst ein König, soll ich nun mein Leben wie ein Diener führen, unter dem Befehl des Sohnes Pāṇḍus (Yudhiṣṭhira)?“
Verse 13
अज्ञाप्य पृथिवीं सर्वा स्थित्वा मूर्थ्नि च संजय । कथमद्य भविष्यामि प्रेष्यभूतो दुरन्तकृत्
Sañjaya sprach: „Nachdem ich der ganzen Erde Befehle erteilt und meinen Fuß auf die Häupter anderer gesetzt habe — wie soll ich heute sein, zu einem bloßen Boten herabgesunken, nachdem ich Taten beging, die so schwer rückgängig zu machen sind?“
Verse 14
संजय! पहले समस्त भूमण्डलपर मेरी आज्ञा चलती थी और मैं सबका शिरमौर था; ऐसा होकर अब मैं दूसरोंका दास बनकर कैसे रहूँगा। मैंने स्वयं ही अपने जीवनकी अन्तिम अवस्थाको दुःखमय बना दिया है! ।। कथं भीमस्य वाक्यानि श्रोतुं शक्ष्यामि संजय । येन पुत्रशतं पूर्णमेकेन निहतं मम,ओह! जिसने अकेले ही मेरे पूरे-के-पूरे सौ पुत्रोंका वध कर डाला, उस भीमसेनकी बातोंको मैं कैसे सुन सकूँगा?
O Sañjaya! Einst galt mein Befehl über den ganzen Erdkreis, und ich war das Haupt über allen; wie soll ich nun als Knecht anderer leben? Mit eigener Hand habe ich den letzten Abschnitt meines Lebens in Leid verwandelt. Und wie, o Sañjaya, könnte ich die Worte Bhīmasenas ertragen—dessen, der ganz allein meine vollen hundert Söhne erschlug?
Verse 15
कृतं सत्यं वचस्तस्य विदुरस्थ महात्मन: । अकुर्वता वचस्तेन मम पुत्रेण संजय,संजय! मेरे पुत्रने मेरी बात न मानकर महात्मा विदुरके कहे हुए वचनको सत्य कर दिखाया
Sañjaya sprach: „Die Worte des großgesinnten Vidura sind wahr geworden. Weil mein Sohn seinen Rat nicht beachtete, hat er genau das herbeigeführt, was Vidura vorausgesagt hatte.“
Verse 16
अधर्मेण हते तात पुत्रे दुर्योधने मम । कृतवर्मा कृपो द्रौणि: किमकुर्वत संजय,तात संजय! अब यह बताओ कि मेरे पुत्र दुर्योधनके अधर्मपूर्वक मारे जानेपर कृतवर्मा, कृपाचार्य और अश्व॒त्थामाने क्या किया?
Dhṛtarāṣṭra sprach: „O lieber Sañjaya—als mein Sohn Duryodhana durch Adharma erschlagen wurde, was taten Kṛtavarmā, Kṛpa und Droṇas Sohn (Aśvatthāmā)?“
Verse 17
संजय उवाच गत्वा तु तावका राजन् नातिदूरमवस्थिता: । अपश्यन्त वन घोरं नानाद्रुमलतावृतम्,संजयने कहा--राजन्! आपके पक्षके वे तीनों वीर वहाँसे थोड़ी ही दूरपर जाकर खड़े हो गये। वहाँ उन्होंने नाना प्रकारके वृक्षों और लताओंसे भरा हुआ एक भयंकर वन देखा
Sañjaya sprach: „O König, jene drei Krieger deiner Seite gingen nur ein kurzes Stück von dort und hielten an. Dort erblickten sie einen schaurigen Wald, dicht bedeckt von mancherlei Bäumen und Ranken.“
Verse 18
ते मुहूर्त तु विश्रम्य लब्धतोयै्हयोत्तमै: । सूर्यास्तमनवेलायां समासेदुर्महद् वनम्,उस स्थानपर थोड़ी देरतक ठहरकर उन सब लोगोंने अपने उत्तम घोड़ोंको पानी पिलाया और सूर्यास्त होते-होते वे उस विशाल वनमें जा पहुँचे, जहाँ अनेक प्रकारके मृग और भाँति-भाँतिके पक्षी निवास करते थे, तरह-तरहके वृक्षों और लताओंने उस वनको व्याप्त कर रखा था और अनेक जातिके सर्प उसका सेवन करते थे
Sañjaya sprach: „Nachdem sie eine Weile geruht und ihre vortrefflichen Pferde getränkt hatten, erreichten sie zur Zeit des Sonnenuntergangs einen großen Wald. Es war eine Wildnis, bewohnt von vielerlei Hirschen und Vögeln, dicht durchzogen von verschiedenartigen Bäumen und Ranken und aufgesucht von Schlangen vieler Arten.“
Verse 19
नानामृगगणैर्जुष्टं नानापक्षिगणावृतम् | नानाद्रुमलताच्छन्नं नानाव्यालनिषेवितम्,उस स्थानपर थोड़ी देरतक ठहरकर उन सब लोगोंने अपने उत्तम घोड़ोंको पानी पिलाया और सूर्यास्त होते-होते वे उस विशाल वनमें जा पहुँचे, जहाँ अनेक प्रकारके मृग और भाँति-भाँतिके पक्षी निवास करते थे, तरह-तरहके वृक्षों और लताओंने उस वनको व्याप्त कर रखा था और अनेक जातिके सर्प उसका सेवन करते थे
Sañjaya sprach: „Sie gelangten in einen weiten Wald, den Herden vielerlei Wildes aufsuchten, der von Schwärmen verschiedenartiger Vögel erfüllt war, von mancherlei Bäumen und Ranken überdeckt und von Schlangen vieler Arten bewohnt.“
Verse 20
नानातोयै: समाकीर्ण नानापुष्पोपशोभितम् । पद्मिनीशतसंछन्नं नीलोत्पलसमायुतम्,उसमें जहाँ-तहाँ अनेक प्रकारके जलाशय थे, भाँति-भाँतिके पुष्प उस वनकी शोभा बढ़ा रहे थे, शत-शत रक्तकमल और असंख्य नीलकमल वहाँके जलाशयोंमें सब ओर छा रहे थे
Sañjaya schilderte die Szene als eine Waldlandschaft, die vielerorts von Gewässern verschiedenster Art durchzogen und von mannigfaltigen Blüten geschmückt war. Ihre Teiche breiteten sich aus, bedeckt von Hunderten Lotusbeeten, dicht von Lotussen überzogen und begleitet von Büscheln blauer Wasserlilien—ein Bild stiller Schönheit vor dem düsteren Nachhall des Krieges.
Verse 21
प्रविश्य तद् वन॑ घोरं वीक्षमाणा: समन्ततः । शाखासहस्रसंछन्न॑ न्यग्रोध॑ ददृशुस्तत:,उस भयंकर वनमें प्रवेश करके सब ओर दृष्टि डालनेपर उन्हें सहस्नों शाखाओंसे आच्छादित एक बरगदका वृक्ष दिखायी दिया
Sañjaya sagte: Als sie in jenen schaurigen Wald eindrangen und ringsum blickten, erblickten sie einen Nyagrodha (Banyanbaum), dessen gewaltige Ausbreitung unter Tausenden von Ästen verborgen lag—ein unheilvolles Wahrzeichen in der Dunkelheit ihres kriegsgeborenen Vorhabens.
Verse 22
उपेत्य तु तदा राजन न्यग्रोधं॑ ते महारथा: । ददृशुर्दिपदां श्रेष्ठा: श्रेष्ठ तं वै वनस्पतिम्,राजन! मनुष्योंमें श्रेष्ठ उन महारथियोंने पास जाकर उस उत्तम वनस्पति (बरगद)-को देखा
Sañjaya sagte: Dann, o König, traten jene großen Wagenkrieger an den Nyagrodha (Banyan) heran. Die Vornehmsten unter den Menschen erblickten jenen vortrefflichen Herrn der Bäume—eine unheilvoll stille Zäsur in der Nacht nach dem Krieg, während die Krieger von der Schlachtwut zu Heimlichkeit und Entschlossenheit übergehen.
Verse 23
तेडवतीर्य रथेभ्यश्व विप्रमुच्य च वाजिन: । उपस्पृश्य यथान्यायं संध्यामन्वासत प्रभो,प्रभो! वहाँ रथोंसे उतरकर उन तीनोंने अपने घोड़ोंको खोल दिया और यथोचितरूपसे स्नान आदि करके संध्योपासना की
Sañjaya sagte: Dann, o Herr, stiegen sie von ihren Wagen herab und spannten die Pferde aus. Nachdem sie die vorgeschriebenen Reinigungsriten (wie das Waschen) vollzogen hatten, verrichteten sie ordnungsgemäß die Dämmerungsverehrung (sandhyā). Selbst inmitten der Gewalt des Krieges halten sie inne, um die gewohnte Disziplin zu wahren—so zeigt sich, wie rituelle Ordnung und Selbstbeherrschung neben kriegerischer Absicht bestehen bleiben.
Verse 24
ततोऊस्तं पर्वतश्रेष्ठमनुप्राप्ते दिवाकरे । सर्वस्य जगतो धात्री शर्वरी समपद्यत,तदनन्तर सूर्यदेवके पर्वतश्रेष्ठ अस्ताचलपर पहुँच जानेपर धायकी भाँति सम्पूर्ण जगत्को अपनी गोदमें विश्राम देनेवाली रात्रिदेवीका सर्वत्र आधिपत्य हो गया
Sañjaya sagte: Dann, als die Sonne den besten der Berge bei ihrem Untergang erreichte, trat die Nacht hervor—wie eine Mutter, die die ganze Welt trägt und birgt—und gewann überall die Herrschaft, indem sie die gesamte Schöpfung zur Ruhe bettete. In der ethischen Atmosphäre der Sauptika-Episode kündigt dieses Herabsinken der Nacht den Schleier an, unter dem bald schwere Taten versucht werden, und zeigt, wie Dunkelheit zur Komplizin des Adharma werden kann, wenn Selbstzucht und Wachsamkeit versagen.
Verse 25
ग्रहनक्षत्रताराभि: सम्पूर्णाभिरलंकृतम् नभों5शुकमिवाभाति प्रेक्षणीयं समन्तत:,सम्पूर्ण ग्रहों, नक्षत्रों और ताराओंसे अलंकृत हुआ आकाश जरीकी साड़ीके समान सब ओरसे देखनेयोग्य प्रतीत होता था
Sañjaya sprach: Der Himmel, ringsum geschmückt mit der vollen Schar von Planeten, Sternbildern und Sternen, leuchtete wie ein reich besticktes Gewand, schön und aus jeder Richtung des Blickes würdig. In der düsteren Nachwirkung des Krieges steht dieser heitere, geordnete Nachthimmel in schmerzlichem Gegensatz zu der Gewalt, die sich gleich entfalten wird—als bliebe die Natur in Ordnung, während menschliches Handeln in adharma gefallen ist.
Verse 26
इच्छया ते प्रवल्गन्ति ये सत्त्वा रात्रिचारिण: । दिवाचराश्ष ये सत्त्वास्ते निद्रावशमागता:,रात्रिमें विचरनेवाले प्राणी अपनी इच्छाके अनुसार उछल-कूद मचाने लगे और जो दिनमें विचरनेवाले जीव-जन्तु थे, वे निद्राके अधीन हो गये
Sañjaya sprach: „Die Wesen, die nachts umhergehen, begannen nach Belieben zu streifen und zu springen; und die Wesen, die tagsüber umhergehen, gerieten unter die Herrschaft des Schlafes.“ In der Nachwirkung des Krieges markiert dieser Vers die moralische und erzählerische Wendung in die Dunkelheit—wenn die gewöhnliche Ordnung sich umkehrt und die Nacht zur Bühne des Kommenden wird.
Verse 27
रात्रिंचराणां सत्त्वानां निर्घोषो$भूत् सुदारुण: । क्रव्यादाश्व प्रमुदिता घोरा प्राप्ता च शर्वरी,रात्रिमें घूमने-फिरनेवाले जीवोंका अत्यन्त भयंकर शब्द प्रकट होने लगा। मांसभक्षी प्राणी प्रसन्न हो गये और वह भयंकर रात्रि सब ओर व्याप्त हो गयी
Sañjaya sprach: „Unter den nachtstreifenden Wesen erhob sich ein überaus schrecklicher Lärm. Fleischfressende Bestien gerieten in Jubel, und jene furchtbare Nacht schien sich überall auszubreiten.“
Verse 28
तस्मिन् रात्रिमुखे घोरे दु:ः:खशोकसमन्विता: । कृतवर्मा कृपो द्रौणिरुपोपविविशु: समम्
Sañjaya sprach: Beim schrecklichen Anbruch der Nacht traten Kṛtavarmā, Kṛpa und Droṇas Sohn (Aśvatthāmā), von Kummer und Schmerz bedrückt, gemeinsam ein und setzten sich nieder.
Verse 29
रात्रिका प्रथम प्रहर बीत रहा था। उस भयंकर वेलामें दुःख और शोकसे संतप्त हुए कृतवर्मा, कृपाचार्य तथा अश्वत्थामा एक साथ ही आस-पास बैठ गये ।। तत्रोपविष्टा: शोचन्तो न्यग्रोधस्य समीपत: । तमेवार्थमतिक्रान्तं कुरुपाण्डवयो: क्षयम्,वटवृक्षके समीप बैठकर कौरवों तथा पाण्डव-योद्धाओंके उसी विनाशकी बीती हुई बातके लिये शोक करते हुए वे तीनों वीर निद्रासे सारे अंग शिथिल हो जानेके कारण पृथ्वीपर लेट गये। उस समय वे भारी थकावटसे चूर-चूर हो रहे थे और नाना प्रकारके बाणोंसे उनके सारे अंग क्षत-विक्षत हो गये थे
Die erste Nachtwache verging. In jener schrecklichen Stunde setzten sich Kṛtavarmā, der Lehrer Kṛpa und Aśvatthāmā—von Kummer und Schmerz verzehrt—gemeinsam in der Nähe nieder. Beim Banyanbaum sitzend, beklagten sie die bereits vollzogene Vernichtung der Kuru- und Pāṇḍava-Krieger; dann, als der Schlaf ihre Glieder erschlaffen ließ, legten sie sich auf die Erde. Zu jener Zeit waren sie von Erschöpfung zermalmt, und ihre Körper waren von vielerlei Pfeilen zerrissen und verwundet—ein Bild der Nachkriegszeit, in der der Sieg nur Öde hinterlässt und der Geist über den Untergang grübelt.
Verse 30
निद्रया च परीताड्ा निषेदुर्धरणीतले । श्रमेण सुदृढं युक्ता विक्षता विविधै: शरै:,वटवृक्षके समीप बैठकर कौरवों तथा पाण्डव-योद्धाओंके उसी विनाशकी बीती हुई बातके लिये शोक करते हुए वे तीनों वीर निद्रासे सारे अंग शिथिल हो जानेके कारण पृथ्वीपर लेट गये। उस समय वे भारी थकावटसे चूर-चूर हो रहे थे और नाना प्रकारके बाणोंसे उनके सारे अंग क्षत-विक्षत हो गये थे
Sañjaya sprach: Vom Schlaf überwältigt setzten sie sich nieder und legten sich dann auf den Boden. Von schwerster Erschöpfung zermürbt und am ganzen Leib von mancherlei Pfeilen zerfetzt, brachen jene Krieger—voll Trauer über das Unheil, das Kauravas wie Pāṇḍavas getroffen hatte—auf der Erde zusammen.
Verse 31
ततो निद्रावशं प्राप्ती कृपभोजी महारथौ । सुखोचितावदुःखाहौं निषण्णौ धरणीतले,तदनन्तर कृपाचार्य और कृतवर्मा--इन दोनों महारथियोंको गाढ़ी नींद आ गयी। वे सुख भोगनेके योग्य थे, दुःख पानेके योग्य कदापि नहीं थे, तो भी धरतीपर ही सो गये थे
Sañjaya sprach: Daraufhin wurden die beiden großen Wagenkämpfer—Kṛpa und Kṛtavarmā, der Sohn Bhojas—vom Schlaf überwältigt und sanken in tiefen Schlummer. Obwohl sie des Komforts würdig und keineswegs des Leidens schuldig waren, lagen sie dennoch auf der bloßen Erde.
Verse 32
तौ तु सुप्ती महाराज श्रमशोकसमन्वितौ । महाहशयनोपेतौ भूमावेव हाूनाथवत्,महाराज! बहुमूल्य शय्या एवं सुखसामग्रीसे सम्पन्न होनेपर भी उन दोनों वीरोंको परिश्रम और शोकसे पीड़ित हो अनाथकी भाँति पृथ्वीपर ही पड़ा देख द्रोणपुत्र अश्वत्थामा क्रोध और अमर्षके वशीभूत हो गया। भारत! उस समय उसे नींद नहीं आयी। वह सर्पके समान लंबी साँस खींचता रहा
Sañjaya sprach: „Doch jene beiden, o König, von Mühsal und Kummer überwältigt, lagen—obwohl ihnen ein prächtiges Lager bereitet war—auf der bloßen Erde wie verlassene, hilflose Männer. Als Droṇas Sohn Aśvatthāmā sie so sah, packten ihn Zorn und bitterer Groll; und in jener Stunde kam kein Schlaf über ihn—wie eine Schlange zog er lange Atemzüge.“
Verse 33
क्रोधामर्षवशं प्राप्तो द्रोणपुत्रस्तु भारत | न वै सम स जगामाथ निद्रां सर्प इव श्वसन्,महाराज! बहुमूल्य शय्या एवं सुखसामग्रीसे सम्पन्न होनेपर भी उन दोनों वीरोंको परिश्रम और शोकसे पीड़ित हो अनाथकी भाँति पृथ्वीपर ही पड़ा देख द्रोणपुत्र अश्वत्थामा क्रोध और अमर्षके वशीभूत हो गया। भारत! उस समय उसे नींद नहीं आयी। वह सर्पके समान लंबी साँस खींचता रहा
Sañjaya sprach: Von Zorn und verletztem Stolz überwältigt, o Bhārata, vermochte Droṇas Sohn Aśvatthāmā keineswegs Schlaf zu finden. Wie eine Schlange lag er da und stieß lange, heiße Atemzüge aus—sein Geist aufgewühlt beim Anblick der beiden Krieger, die erschöpft und voll Trauer auf der Erde lagen, obwohl kostbare Lager und Bequemlichkeiten vorhanden waren.
Verse 34
न लेभे स तु निद्रां वै दहमानो हि मन्युना । वीक्षाज्चक्रे महाबाहुस्तद् वनं घोरदर्शनम्,क्रोधसे जलते रहनेके कारण नींद उसके पास फटकने नहीं पाती थी। उस महाबाहु वीरने भयंकर दिखायी देनेवाले उस वनकी ओर बारंबार दृष्टिपात किया
Sañjaya sprach: Von brennendem Zorn verzehrt, vermochte er keinen Schlaf zu finden. Der mächtigarme Krieger ließ seinen Blick immer wieder zu jenem Wald schweifen, der furchtbar anzusehen war.
Verse 35
वीक्षमाणो वनोद्देशं नानासत्त्वैर्निषेवितम् । अपश्यत महाबाहुर्न्यग्रोधं वायसैर्युतम्,नाना प्रकारके जीव-जन्तुओंसे सेवित वनस्थलीका निरीक्षण करते हुए महाबाहु अश्व॒ृत्थामाने कौओंसे भरे हुए वटवृक्षपर दृष्टिपात किया
Sañjaya sprach: Als Aśvatthāmā, der Mächtigarmige, einen Waldsaum musterte, den vielerlei Geschöpfe aufsuchten, erblickte er einen Banyanbaum, dicht von Krähen besetzt. In der unheilvollen Stille nach dem Krieg rahmt dieser Anblick das nächtliche Entfesseln der Gewalt mit Zeichen von Raub und Vorbedeutung, als spiegelte die Natur selbst die moralische Finsternis, die herabsinken will.
Verse 36
तत्र काकसहस््राणि तां निशां पर्यणामयन् | सुखं स्वपन्ति कौरव्य पृथक् पृथगुपाश्रया:,कुरुनन्दन! उस वृक्षपर सहस्रों कौए रातमें बसेरा ले रहे थे। वे पृथक्ू-पृथक् घोंसलोंका आश्रय लेकर सुखकी नींद सो रहे थे
Sañjaya sprach: Dort verbrachten Tausende von Krähen jene Nacht, in ihren Ruheplätzen niedergelassen. O Nachkomme der Kuru, jede suchte für sich einen eigenen Sitz und schlief behaglich — ein Bild gewöhnlicher Geschöpfe in Sicherheit, im Gegensatz zur unheilvollen Stille vor der nächtlichen Gewalt.
Verse 37
सुप्तेषु तेषु काकेषु विश्रब्धेषु समन््ततः । सो<5पश्यत् सहसा यान्तमुलूकं घोरदर्शनम्,उन कौओंके सब ओर निर्भय होकर सो जानेपर अभश्रवत्थामाने देखा कि सहसा एक भयानक उल्लू उधर आ निकला
Sañjaya sprach: Als jene Krähen schliefen, ringsum in völliger Sorglosigkeit und ohne Furcht, sah er plötzlich eine schrecklich anzusehende Eule herannahen. Die Szene deutet einen moralischen Gegensatz an: achtlose Sicherheit und Selbstzufriedenheit laden Gefahr ein, während der Schlag des Räubers von der Nachlässigkeit anderer lebt — ein unheilvolles Vorspiel zur nächtlichen Treulosigkeit im Krieg.
Verse 38
महास्वनं महाकायं हर्यक्ष॑ं बभ्रुपिड्गलम् सुदीर्घधघोणानखरं सुपर्णमिव वेगितम्,उसकी बोली बड़ी भयंकर थी। डील-डौल भी बड़ा था। आँखें काले रंगकी थीं, उसका शरीर भूरा और पिंगलवर्णका था। उसकी चोंच और पंजे बहुत बड़े थे और वह गरुड़के समान वेगशाली जान पड़ता था
Sañjaya sprach: „Seine Stimme dröhnte wie Donner, und sein Leib war gewaltig; die Augen waren fahlgelb, der Körper braun mit rötlich-goldenem Schimmer. Schnabel und Klauen waren überaus lang, und er schien schnell wie Garuḍa.“ Die Schilderung verdichtet die unheilvolle Stimmung des nächtlichen Überfalls und zeigt eine furchterregende Räuberpräsenz, die Adharma und Schrecken des bevorstehenden Gemetzels spiegelt.
Verse 39
सो<थ शब्दं मृदुं कृत्वा लीयमान इवाण्डज: । न्यग्रोधस्य ततः शाखां प्रार्थथामास भारत,भरतनन्दन! वह पक्षी कोमल बोली बोलकर छिपता हुआ-सा बरगदकी उस शाखापर आनेकी इच्छा करने लगा
Sañjaya sprach: Dann machte der Vogel seine Stimme leise, als wolle er sich verbergen, und begann, o Bhārata, einen Sitz auf einem Ast des Banyanbaums zu suchen. Die Szene betont Heimlichkeit und Furcht nach dem Krieg, wenn selbst kleinste Regungen von Vorsicht und dem Drang bestimmt sind, ungesehen zu bleiben.
Verse 40
संनिपत्य तु शाखायां न्यग्रोधस्य विहड्भम: । सुप्ताञ्जघान सुबहून् वायसान् वायसान्तक:,कौओंके लिये कालरूपधारी उस विहंगमने वटवृक्षकी उस शाखापर बड़े वेगसे आक्रमण किया और सोये हुए बहुत-से कौओंको मार डाला
Sañjaya said: Then, swooping down upon a branch of the banyan tree, that bird—like Death itself to the crows—struck down many crows as they lay asleep. The scene underscores how vulnerability and heedlessness in a time of violence can invite sudden destruction, and how war’s cruelty extends even to the unsuspecting.
Verse 41
केषांचिदच्छिनत् पक्षान् शिरांसि च चकर्त ह । चरणांश्वैव केषांचिद्ू बभज्ज चरणायुध:,उसने अपने पंजोंसे ही अस्त्रका काम लेकर किन््हीं कौओंके पंख नोच डाले, किन्हींके सिर काट लिये और किन्हींके पैर तोड़ डाले
Sañjaya said: Using his very feet as weapons, he tore off the wings of some, severed the heads of others, and broke the legs of still others. The scene underscores how, in the wake of war, violence spills into indiscriminate cruelty—power turning even natural limbs into instruments of harm.
Verse 42
क्षणेनाहन् स बलवान ये<स्य दृष्टिपथे स्थिता: । तेषां शरीरावयवै: शरीरैश्व विशाम्पते
Sañjaya said: In a single moment that mighty warrior struck down all who came within his line of sight, O lord of men—so that their bodies, and even the severed limbs of their bodies, lay strewn about. The scene underscores how, when violence is unleashed without restraint, strength becomes mere slaughter rather than a dharmic use of power.
Verse 43
तांस्तु हत्वा ततः काकान् कौशिको मुदितो5भवत्
Having slain those crows, the owl (Kauśika) thereafter became delighted—an image of grim satisfaction after violence, foreshadowing the nocturnal cruelty that will characterize the Sauptika narrative.
Verse 44
तद् दृष्टवा सोपधं कर्म कौशिकेन कृतं निशि
Sañjaya said: Seeing that deed—done with a deceitful stratagem—carried out by Kauśika in the night, (the mind of the observer is stirred by the moral weight of an act that violates open, righteous conduct and relies instead on concealment and trickery).
Verse 45
उपदेश: कृतो5नेन पक्षिणा मम संयुगे
Sañjaya sprach: „Mitten in meiner Schlacht hat mir dieser Vogel eine Lehre erteilt — eine Unterweisung über rechtes Handeln und kluge Vorsicht, selbst im Getümmel des Konflikts.“
Verse 46
शत्रूणां क्षपणे युक्त: प्राप्त: कालश्न मे मतः । “इस पक्षीने युद्धमें क्या करना चाहिये, इसका उपदेश मुझे दे दिया। मैं समझता हूँ कि मेरे लिये इसी प्रकार शत्रुओंके संहार करनेका समय प्राप्त हुआ है ।। नाद्य शक््या मया हन्तुं पाण्डवा जितकाशिन:
Sañjaya sprach: „Ich bin auf die Vernichtung meiner Feinde ausgerichtet; nach meinem Urteil ist die bestimmte Stunde nun gekommen. Dieser Vogel hat mich gelehrt, was im Krieg zu tun ist. Ich erkenne, dass für mich der Augenblick gekommen ist, die Gegner auf eben diese Weise zu vernichten. Doch heute vermag ich die Pāṇḍavas nicht zu erschlagen, die die Ermattung überwunden haben.“
Verse 47
बलवन्त: कृतोत्साहा: प्राप्तलक्ष्या: प्रहारिण: । 'पाण्डव इस समय विजयसे उल्लसित हो रहे हैं। वे बलवान, उत्साही और प्रहार करनेमें कुशल हैं। उन्हें अपना लक्ष्य प्राप्त हो गया है। ऐसी अवस्थामें आज मैं अपनी शक्तिसे उनका वध नहीं कर सकता ।। राज्ञ: सकाशात् तेषां तु प्रतिज्ञातो वधो मया,“इधर मैंने राजा दुर्योधनके समीप पाण्डवोंके वधकी प्रतिज्ञा कर ली है। परंतु यह कार्य वैसा ही है, जैसा पतिंगोंका आगमें कूद पड़ना। मैंने जिस वृत्तिका आश्रय लेकर पूर्वोक्त प्रतिज्ञा की है, वह मेरा ही विनाश करनेवाली है। इसमें संदेह नहीं कि यदि मैं न््यायके अनुसार युद्ध करूँगा तो मुझे अपने प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा
Sañjaya sprach: „Sie sind stark, ihr Eifer ist voll entflammt, ihr Ziel ist erreicht, und im Schlag sind sie geübt. In diesem Augenblick jubeln die Pāṇḍavas über den Sieg; in solcher Verfassung kann ich sie heute nicht aus eigener Kraft erschlagen.“
Verse 48
पतड्डग्निसमां वृत्तिमास्थायात्मविनाशिनीम् । न्यायतो युध्यमानस्य प्राणत्यागो न संशय:,“इधर मैंने राजा दुर्योधनके समीप पाण्डवोंके वधकी प्रतिज्ञा कर ली है। परंतु यह कार्य वैसा ही है, जैसा पतिंगोंका आगमें कूद पड़ना। मैंने जिस वृत्तिका आश्रय लेकर पूर्वोक्त प्रतिज्ञा की है, वह मेरा ही विनाश करनेवाली है। इसमें संदेह नहीं कि यदि मैं न््यायके अनुसार युद्ध करूँगा तो मुझे अपने प्राणोंका परित्याग करना पड़ेगा
Einen Weg einschlagend wie der Nachtfalter, der ins Feuer stürzt — einen Weg, der meine eigene Vernichtung herbeiführt — besteht kein Zweifel: Kämpfe ich nach Gerechtigkeit und den Regeln des Krieges, werde ich mein Leben hingeben müssen.
Verse 49
छटद्मना च भवेत् सिद्धि: शत्रूणां च क्षयो महान् | तत्र संशयितादर्थाद् यो<र्थों निः:संशयो भवेत्
Sañjaya sprach: „Durch eine solche List kann der Erfolg tatsächlich errungen werden, und eine große Vernichtung der Feinde mag darauf folgen. Doch in dieser Sache wird das Ziel, das zuvor zweifelhaft war, — wenn es sich wirklich erfüllt — zu einem, das jenseits allen Zweifels steht.“
Verse 50
तं जना बहु मन्यन्ते ये च शास्त्रविशारदा: । “यदि छलसे काम लूँ तो अवश्य मेरे अभीष्ट मनोरथकी सिद्धि हो सकती है। शत्रुओंका महान् संहार भी तभी सम्भव होगा। जहाँ सिद्धि मिलनेमें संदेह हो, उसकी अपेक्षा उस उपायका अवलम्बन करना उत्तम है, जिसमें संशयके लिये स्थान न हो। साधारण लोग तथा शास्त्रज्ञ पुछष भी उसीका अधिक आदर करते हैं ।। यच्चाप्यत्र भवेद् वाच्यं गर्हितं लोकनिन्दितम्
Sañjaya sprach: „Viele, auch die in den Lehrschriften (śāstra) Bewanderten, vertreten diese Ansicht: ‚Wenn ich zur Erreichung meines Ziels zur Täuschung greife, kann mein ersehnter Zweck gewiss gelingen. Nur dann wird auch ein großes Abschlachten der Feinde möglich sein. Wo Zweifel am Gelingen besteht, ist es besser, sich an das Mittel zu halten, das keinen Raum für Ungewissheit lässt. Sowohl gewöhnliche Menschen als auch gelehrte Autoritäten erweisen einem solchen Weg größere Achtung.‘ Und doch: In dieser Sache, was immer sich sagen ließe, das tadelnswert und von der Welt verurteilt ist…“
Verse 51
निन्दितानि च सर्वाणि कुत्सितानि पदे पदे
Und auf Schritt und Tritt gab es Taten, die zu tadeln waren — verwerflich und in jeder Hinsicht verurteilt.
Verse 52
अस्मिन्नर्थे पुरा गीता श्रूयन्ते धर्मचिन्तकैः
Gerade zu diesem Punkt wird ein alter Spruch überliefert — von denen erinnert, die über Dharma nachsinnen — als moralischer Maßstab, um die vorliegende Sache zu beurteilen.
Verse 53
परिश्रान्ते विदीर्णे वा भुज्जाने वापि शत्रुभि:
Sañjaya sprach: „Ob er erschöpft war, oder verwundet und zerrissen, oder gar von Feinden hart bedrängt…“
Verse 54
प्रस्थाने वा प्रवेशे वा प्रहर्तव्यं रिपोर्बलम् । 'शत्रुओंकी सेना यदि बहुत थक गयी हो, तितर-बितर हो गयी हो, भोजन कर रही हो, कहीं जा रही हो अथवा किसी स्थानविशेषमें प्रवेश कर रही हो तो भी विपक्षियोंको उसपर प्रहार करना ही चाहिये ।। ५३ ई || निद्रार्तमर्धरात्रे च तथा नष्टप्रणायकम्
Sañjaya sprach: „Ob die feindlichen Heere aufbrechen oder einen Ort betreten — man soll sie schlagen. Ebenso, wenn sie mitten in der Nacht vom Schlaf überwältigt sind und wenn sie führerlos und in Unordnung geraten, sind sie anzugreifen.“
Verse 55
इत्येवं निश्चयं चक्रे सुप्तानां निशि मारणे
Sañjaya sprach: So fasste er einen festen Entschluss — Menschen in der Nacht zu töten, während sie schliefen.
Verse 56
स क्रूरां मतिमास्थाय विनिश्ित्य मुहुर्मुहु:
Sañjaya sprach: Nachdem er einen grausamen Entschluss gefasst und ihn immer wieder erwogen hatte, machte er seine Entscheidung fest und richtete den Geist auf einen harten Weg.
Verse 57
सुप्तौ प्राबोधयत् तौ तु मातुलं भोजमेव च । क्रूरतापूर्ण बुद्धिका आश्रय ले बारंबार उपर्युक्त निश्चय करके अभश्वत्थामाने सोये हुए अपने मामा कृपाचार्यको तथा भोजवंशी कृतवर्माको भी जगाया ।। तो प्रबुद्धो महात्मानौ कृपभोजी महाबलौ
Sañjaya sprach: Mit einem von Grausamkeit verhärteten Sinn und nachdem er seinen Entschluss immer wieder bekräftigt hatte, weckte Aśvatthāmā aus dem Schlaf sowohl seinen Onkel mütterlicherseits, Kṛpa, als auch den Bhoja-Krieger Kṛtavarmā. Als sie erwachten, erhoben sich jene beiden großherzigen, mächtigen Männer — Kṛpa und der Bhoja — aufmerksam.
Verse 58
स मुहूर्तमिव ध्यात्वा बाष्पविह्नलमब्रवीत्,तब अभ्व॒त्थामा दो घड़ीतक चिन्तामग्न रहकर अश्रु-गद्गद वाणीमें इस प्रकार बोला --'संसारका अद्वितीय वीर महाबली राजा दुर्योधन मारा गया, जिसके लिये हमलोगोंने पाण्डवोंके साथ वैर बाँध रखा था
Sañjaya sprach: Nachdem er einen Augenblick nachgesonnen hatte, redete er, die Stimme von Tränen erstickt. Da sagte Aśvatthāmā, nachdem er kurze Zeit in sorgenvoller Grübelei versunken war, mit bebender, tränenreicher Stimme: „König Duryodhana — ein unvergleichlicher Held in der Welt, von großer Macht — ist erschlagen worden. Um seinetwillen banden wir uns an die Feindschaft mit den Pāṇḍavas.“
Verse 59
हतो दुर्योधनो राजा एकवीरो महाबल: । यस्यार्थे वैरमस्माभिरासक्तं पाण्डवै: सह,तब अभ्व॒त्थामा दो घड़ीतक चिन्तामग्न रहकर अश्रु-गद्गद वाणीमें इस प्रकार बोला --'संसारका अद्वितीय वीर महाबली राजा दुर्योधन मारा गया, जिसके लिये हमलोगोंने पाण्डवोंके साथ वैर बाँध रखा था
König Duryodhana ist erschlagen — ein einzelner Held von großer Kraft. Um seinetwillen banden wir uns an die Feindschaft mit den Pāṇḍavas.
Verse 60
एकाकी बहुभि: क्षुद्रैराहवे शुद्धविक्रम: । पातितो भीमसेनेन एकादशचमूपति:,“जो किसी दिन ग्यारह अक्षौहिणी सेनाओंका स्वामी था, वह राजा दुर्योधन विशुद्ध पराक्रमका परिचय देता हुआ अकेला युद्ध कर रहा था; किंतु बहुत-से नीच पुरुषोंने मिलकर युद्धस्थलमें उसे भीमसेनके द्वारा धराशायी करा दिया
Sañjaya sprach: Obwohl er allein auf dem Schlachtfeld kämpfte und makellosen Heldenmut zeigte—er, der einst Herr von elf Heeren gewesen war—wurde Duryodhana dort von Bhīmasena zu Boden gestreckt, als viele niederträchtige Männer sich gegen ihn zusammenschlossen. Die Zeile betont den moralischen Stachel: Der Fall eines Helden wirkt umso tragischer, wenn die Niederlage als gemeinschaftlich und unehrenhaft geschildert wird.
Verse 61
वृकोदरेण क्षुद्रेण सुनुशंसमिदं कृतम् । मूर्धाभिषिक्तस्य शिर: पादेन परिमृदूनता,“एक मूर्धाभिषिक्त सम्राट्के मस्तकपर लात मारते हुए नीच भीमसेनने यह बड़ा ही क्रूरतापूर्ण कार्य कर डाला है
Sañjaya sprach: „Diese überaus grausame Tat hat der niederträchtige Vṛkodara begangen. Indem er mit dem Fuß auf den Kopf dessen trat, der zum König geweiht worden war, hat er ihn niedergewalzt.“ Die Zeile bringt den moralischen Schock über die Demütigung eines gekrönten Herrschers zum Ausdruck: nicht bloß Gewalt, sondern ein vorsätzlicher Bruch königlicher Würde und anerkannter Kampfregeln.
Verse 62
विनर्दन्ति च पञ्चाला: क्ष्वेलन्ति च हसन्ति च । धमन्ति शड्खान् शतशो द्ृष्टा घ्नन्ति च दुन्दुभीन्
Sañjaya sprach: „Die Pāñcālas erheben laute Rufe; sie pfeifen und lachen dazu. Als sie es sahen, bliesen sie zu Hunderten die Muschelhörner und schlugen die Kriegstrommeln.“
Verse 63
'पांचालयोद्धा हर्षमें भरकर सिंहनाद करते, हल्ला मचाते, हँसते, सैकड़ों शंख बजाते और डंके पीटते हैं ।। वादित्रघोषस्तुमुलो विमिश्र: शड्खनि:स्वनै: । अनिलेनेरितो घोरो दिश: पूरयतीव ह,'शंखध्वनिसे मिला हुआ नाना प्रकारके वाद्योंका गम्भीर एवं भयंकर घोष वायुसे प्रेरित हो सम्पूर्ण दिशाओंको भरता-सा जान पड़ता है
Sañjaya sprach: Die panchālischen Krieger, von Freude erfüllt, stießen Löwenrufe aus, machten Lärm, lachten, bliesen zu Hunderten die Muschelhörner und schlugen die Trommeln. Ein tumultuöses, vermischtes Dröhnen—von vielen Instrumenten samt dem Schmettern der Muscheln—tief und furchterregend, vom Wind getragen, schien alle Himmelsrichtungen zu erfüllen.
Verse 64
अश्वानां हेषमाणानां गजानां चैव बृंहताम् । सिंहनादश्न शूराणां श्रूयते सुमहानयम्,'हींसते हुए घोड़ों और चिग्घाड़ते हुए हाथियोंकी आवाजके साथ शूरवीरोंका यह महान् सिंहनाद सुनायी दे रहा है
Sañjaya sprach: „Zusammen mit dem Wiehern der Pferde und dem Trompeten der Elefanten ist dieses gewaltige Löwengebrüll der Helden zu hören—ein unheilvoller Schwall von Kriegsstolz und Gewalt, der in der Nacht anschwillt.“
Verse 65
दिशं प्राचीं समाश्रित्य हृष्टानां गच्छतां भृशम् । रथनेमिस्वनाश्रैव श्रूयन्ते लोमहर्षणा:,/हर्षमें भरकर पूर्व दिशाकी ओर वेगपूर्वक जाते हुए पाण्डव-योद्धाओंके रथोंके पहियोंके ये रोमांचकारी शब्द कानोंमें पड़ रहे हैं
Sañjaya sprach: «Dem Osten zugewandt ziehen die Krieger der Pāṇḍavas, von Hochgefühl erfüllt und in großer Eile dahin; man vernimmt das schauererregende Dröhnen der Räder ihrer Streitwagen.»
Verse 66
पाण्डवैर्धार्तराष्ट्राणां यदिदं कदनं कृतम् । वयमेव त्रय: शिष्टा अस्मिन् महति वैशसे,“हाय! पाण्डवोंने धृतराष्ट्रके पुत्रों और सैनिकोंका जो यह विनाश किया है, इस महान् संहारसे हम तीन ही बच पाये हैं
Sañjaya sprach: «Weh uns! Die Pāṇḍavas haben dieses Gemetzel an den Söhnen Dhṛtarāṣṭras angerichtet. Aus diesem gewaltigen Unheil und Blutbad sind nur wir drei am Leben geblieben.»
Verse 67
केचिन्नागशतप्राणा: केचित् सर्वास्त्रकोविदा: । निहता: पाण्डवेयैस्ते मन््ये कालस्य पर्ययम्,“कितने ही वीर सौ-सौ हाथियोंके बराबर बलशाली थे और कितने ही सम्पूर्ण अस्त्र- शस्त्रोंकी संचालन-कलामें कुशल थे; किंतु पाण्डवोंने उन सबको मार गिराया। मैं इसे समयका ही फेर समझता हूँ
Sañjaya sprach: «Manche unter ihnen besaßen die Kraft von hundert Elefanten; andere waren Meister im Gebrauch jeder Waffe. Und doch wurden sie von den Söhnen Pāṇḍus erschlagen. Ich halte dies für nichts anderes als die Wendung der Zeit — ein Umsturz durch das Geschick, nicht bloß durch menschliche Tapferkeit.»
Verse 68
एवमेतेन भाव्यं॑ हि नूनं कार्येण तत्त्वतः । यथा हास्येदृशी निष्ठा कृतकार्येडपि दुष्करे,“निश्चय ही इस कार्यसे ठीक ऐसा ही परिणाम होनेवाला था। हमलोगोंके द्वारा अत्यन्त दुष्कर कार्य किया गया तो भी इस युद्धका अन्तिम फल इस रूपमें प्रकट हुआ
Sañjaya sprach: «Gewiss, in Wahrheit war dies als das eigentliche Ergebnis dieses Unternehmens vorherbestimmt. Denn obgleich eine überaus schwere Tat vollbracht wurde, hat sich der letzte Ausgang des Krieges in eben dieser Gestalt gezeigt — so war der feste Lauf der Dinge.»
Verse 69
भवतोस्तु यदि प्रज्ञा न मोहादपनीयते । व्यापन्नेडस्मिन् महत्यर्थ यन्नः श्रेयस्तदुच्यताम्,“यदि आप दोनोंकी बुद्धि मोहसे नष्ट न हो गयी हो तो इस महान् संकटके समय अपने बिगड़े हुए कार्यको बनानेके उद्देश्यसे हमारे लिये क्या करना श्रेष्ठ होगा? यह बताइये”
Sañjaya sprach: «Wenn euer Urteilsvermögen nicht vom Wahn hinweggerissen ist, dann sagt uns in dieser großen Krise — da unsere Sache fehlgeschlagen ist — was für uns das Beste zu tun wäre, damit unser zerrüttetes Vorhaben wieder zurechtgebracht werde.»
Verse 423
न्यग्रोधमण्डलं सर्व संछन्न॑ सर्वतो5भवत् | प्रजानाथ! उस बलवान् उल्लूने, जो-जो कौए उसकी दृष्टिमें आ गये, उन सबको क्षणभरमें मार डाला। इससे वह सारा वटवृक्ष कौओंके शरीरों तथा उनके विभिन्न अवयवोंद्वारा सब ओरसे आच्छादित हो गया
Sañjaya sprach: „O Herr der Menschen, die ganze Ausbreitung des Banyanbaums war ringsum bedeckt. Jene mächtige Eule tötete in einem Augenblick alle Krähen, die in ihr Blickfeld gerieten, und so war der ganze Banyan ringsum mit Krähenleibern und ihren verstreuten Gliedern behangen.“
Verse 433
प्रतिकृत्य यथाकामं शत्रूणां शत्रुसूदन: । वह शत्रुओंका संहार करनेवाला उलूक उन कौओंका वध करके अपने शत्रुओंसे इच्छानुसार भरपूर बदला लेकर बहुत प्रसन्न हुआ
Sañjaya sprach: „Nachdem er nach Herzenslust Vergeltung an seinen Feinden geübt hatte, tötete Ulūka — der Feindbezwinger — jene Krähen; und da er nach seinem Willen volle Rache genommen hatte, war er überaus zufrieden.“
Verse 436
अनुसारभयाद् भीता: प्राड्मुखा: प्राद्रवन् पुनः । वे गरम-गरम लंबी साँस खींचते हुए पाण्डवोंकी ही चिन्ता करने लगे। इतनेहीमें विजयाभिलाषी पाण्डवोंकी भयंकर गर्जना सुनकर उन्हें यह भय हुआ कि पाण्डव कहीं हमारा पीछा न करने लगें; अतः वे पुनः घोड़ोंको रथमें जोतकर पूर्व दिशाकी ओर भाग चले
Sañjaya sprach: „Aus Furcht, verfolgt zu werden, flohen sie abermals, das Gesicht nach Osten gewandt. Als sie das schreckliche Brüllen der siegverlangenden Pāṇḍavas hörten, meinten sie, die Pāṇḍavas könnten ihnen nachsetzen; daher spannten sie die Pferde erneut an den Wagen und jagten ostwärts davon.“
Verse 443
तद्भावकृतसंकल्पो द्रौणिरेकोडन्चचिन्तयत् । रात्रिमें उल्लूके द्वारा किये गये उस कपटपूर्ण क्रूर कर्मको देखकर स्वयं भी वैसा ही करनेका संकल्प लेकर अश्व॒त्थामा अकेला ही विचार करने लगा--
Sañjaya sprach: „Von eben jener Gesinnung bewegt, fasste Dronas Sohn — Aśvatthāmā — seinen Entschluss und begann allein nachzusinnen. Als er die trügerische und grausame Tat sah, die Ulūka in der Nacht verübt hatte, beschloss auch er, ebenso zu handeln, und überlegte für sich, wie er vorgehen solle.“
Verse 503
कर्तव्यं तन्मनुष्येण क्षत्रधर्मेण वर्तता । “इस लोकमें जिस कार्यको गर्हणीय समझा जाता हो, जिसकी सब लोग भरपेट निन्दा करते हों, वह भी क्षत्रिय-धर्मके अनुसार बर्ताव करनेवाले मनुष्यके लिये कर्तव्य माना गया है
Sañjaya sprach: „Für einen Menschen, der nach dem Dharma des Kṣatriya lebt, gilt jene Tat als Pflicht — selbst wenn sie in dieser Welt als verwerflich angesehen und von allen rundweg verurteilt wird.“
Verse 516
सोपधानि कृतान्येव पाण्डवैरकृतात्मभि: । “अपवित्र अन्तःकरणवाले पाण्डवोंने भी तो पद-पदपर ऐसे कार्य किये हैं, जो सब-के- सब निन्दा और घृणाके योग्य रहे हैं। उनके द्वारा भी अनेक कपटपूर्ण कर्म किये ही गये हैं
Sañjaya sprach: „Selbst die Pāṇḍavas — Männer mit ungezügelter und ungeschliffener innerer Zucht — haben in der Tat Taten mit verborgenem Zweck vollbracht. Auf Schritt und Tritt taten auch sie Werke, die Tadel und Abscheu hervorrufen, und viele ihrer Handlungen waren von Trug geprägt.“
Verse 523
श्लोका न्यायमवेक्षद्धिस्तत्त्वार्थास्तत््वदर्शिभि: । “इस विषयमें न््यायपर दृष्टि रखनेवाले धर्मचिन्तक एवं तत्त्वदर्शी पुरुषोंने प्राचीन कालमें ऐसे श्लोकोंका गान किया है, जो ताच्चिक अर्थका प्रतिपादन करनेवाले हैं। वे श्लोक इस प्रकार सुने जाते हैं--
„In dieser Sache haben die Denker des Dharma und die Schauenden der Wahrheit, die mit dem Blick der Gerechtigkeit prüfen, seit uralter Zeit Ślokas gesungen, die den wahren Sinn darlegen. Diese Ślokas werden so vernommen—“
Verse 543
भिन्नयोधं बल॑ यच्च द्विधा युक्त च यद् भवेत् “जो सेना आधी रातके समय नींदमें अचेत पड़ी हो, जिसका नायक नष्ट हो गया हो, जिसके योद्धाओंमें फ़ूट हो गयी हो और जो दुविधामें पड़ गयी हो, उसपर भी शत्रुको अवश्य प्रहार करना चाहिये”
„Selbst wenn ein Heer um Mitternacht im Schlaf bewusstlos daliegt, selbst wenn sein Anführer vernichtet ist, selbst wenn Zwietracht unter seinen Kämpfern ausgebrochen ist und selbst wenn es in Verwirrung und Unentschlossenheit geraten ist — dennoch soll man den Feind schlagen.“
Verse 553
पाण्डूनां सह पज्चालैद्रोणपुत्र: प्रतापवान् । इस प्रकार विचार करके प्रतापी द्रोणपुत्रने रातको सोते समय पांचालोंसहित पाण्डवोंको मार डालनेका निश्चय किया
Sañjaya sprach: „Nachdem er so nachgedacht hatte, fasste der tapfere Sohn Droṇas den Entschluss, die Pāṇḍavas zusammen mit den Pāñcālas in der Nacht zu töten, während sie schliefen.“
Verse 573
नोत्तरं प्रतिपद्येतां तत्र युक्त हिया वृतौ । जागनेपर महामनस्वी महाबली कृपाचार्य और कृतवर्माने जब अभश्रृत्थामाका निश्चय सुना, तब वे लज्जासे गड़ गये और उन्हें कोई उचित उत्तर नहीं सूझा
Sañjaya sprach: „Dort, mit aufgewühltem Geist und in ihrem Verhalten gehemmt, fanden sie keine Antwort. Als der großherzige, mächtige Kripa und Kritavarman Aśvatthāmas Entschluss vernahmen, überkam sie Scham; sie verstummten, unfähig, eine angemessene Erwiderung zu finden.“
Whether crisis-driven strategy can override the norms of regulated combat: Drauṇi argues for covert action against a vulnerable opponent, while the narrative foregrounds the moral instability produced by grief and defeat.
The text demonstrates how observation becomes policy: natural analogies are used to rationalize human decision-making, illustrating the epic’s scrutiny of how “reason” can be mobilized to legitimate extreme choices.
No explicit phalaśruti appears here; the chapter functions instead as causal setup, establishing motives, justifications, and strategic premises that shape the ensuing narrative consequences.