Adhyaya 46
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 4662 Verses

Adhyaya 46

Brahmā’s Instruction on Brahmacarya, Vānaprastha, and the Aliṅga Path (Ethics of Non-attachment)

Upa-parva: Mokṣa–Dharma Upadeśa (Renunciant Discipline Discourse)

This chapter is a prescriptive discourse attributed to Brahmā, presenting a graduated discipline across life-stages and culminating in a liberation-oriented ideal. It first defines the exemplary brahmacārin: study according to capacity, strict continence, sensory restraint, truthfulness, purity, service to the guru, regulated food with permission, daily fire offerings, simple staff and ochre-toned garments, and constant svādhyāya. It then outlines vānaprastha conduct: withdrawal to the forest, bark/skin clothing, morning ablutions, avoidance of village life, hospitality to guests, subsistence on roots, fruits, leaves, and grains, and controlled speech and appetite. The final movement describes the mokṣa-seeker’s mendicant discipline: offering fearlessness to beings, acting without possessiveness, accepting unsolicited and minimal sustenance, avoiding accumulation, maintaining equanimity in gain/loss, and practicing non-harm, truth, straightforwardness, non-anger, and non-slander. The chapter emphasizes inward withdrawal (tortoise-like retraction of senses), freedom from dualities and egoism, and the ‘aliṅga’ (non-marked, non-display) mode of practice—moving in the world without ostentation. It concludes with an analytic enumeration of constituents (senses, elements, mind, intellect, self, unmanifest) to be discerned and relinquished, resulting in release from bonds and attainment of the highest state.

Chapter Arc: ब्रह्मा महर्षियों से कहते हैं—पूर्वोक्त मार्ग के अनुसार ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासी का धर्म सुनो; मोक्ष की ओर जाने वाला पथ आचरण की सूक्ष्मताओं में छिपा है। → व्रत-जीवन की कठोरता क्रमशः तीव्र होती जाती है: गुरु-आज्ञा से भोजन, अन्न की निन्दा न करना, भिक्षा-आधारित निर्वाह, बिना याचना/संकल्प के जो मिले उसी में संतोष, स्वाद-लोलुपता का त्याग, और लोक-अपमान सहकर भी सत्धर्म की निन्दा न करना। → मोक्षविद् संन्यासी का शिखर-लक्षण उद्घोषित होता है—वह न किसी को उद्वेग देता है, न किसी से स्वयं उद्विग्न होता है; सर्वभूतों का विश्वासी बनकर, रस-आस्वाद से परे, केवल प्राणधारण हेतु यथामात्र भोजन करता है। → आचार-सम्पन्न मुनि की परिभाषा स्थिर होती है: लोक-तिरस्कार सहकर भी शान्ति, शुचिता, इन्द्रियनिग्रह, और विवेक-चिन्तन (इन्द्रिय-विषय, पंचमहाभूत, मन-बुद्धि-अहंकार, प्रकृति-पुरुष) द्वारा बन्धनों से विमुक्ति; फलस्वरूप स्वर्ग/उर्ध्वगति का आश्वासन।

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माज बछ। ःडिज षट्चत्वारिशो5 ध्याय: ब्रह्मचारी, वानप्रस्थी और संन्यासीके धर्मका वर्णन ब्रह्मोवाच एवमेतेन मार्गेण पूर्वोक्तेन यथाविधि । अधीतवान्‌ यथाशक्ति तथैव ब्रह्म॒चर्यवान्‌,ब्रह्माजीनी कहा--महर्षिगण! इस प्रकार इस पूर्वोक्त मार्गके अनुसार गृहस्थको यथावत्‌ आचरण करना चाहिये एवं यथाशक्ति अध्ययन करते हुए ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह अपने धर्ममें तत्पर रहे, विद्वान्‌ बने, सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने अधीन रखे, मुनि-व्रतका पालन करे, गुरुका प्रिय और हित करनेमें लगा रहे, सत्य बोले तथा धर्मपरायण एवं पवित्र रहे

ব্রহ্মা বললেন—হে মহর্ষিগণ! পূর্বোক্ত পথ অনুসারে এবং বিধিমতো এভাবেই আচরণ করা উচিত। যে ব্যক্তি সাধ্যানুযায়ী অধ্যয়ন করে ব্রহ্মচর্য-ব্রত পালন করে, সে যেন স্বধর্মে অবিচল থাকে; বিদ্বান হয়; সকল ইন্দ্রিয় সংযত করে; মুনিব্রত পালন করে; গুরুর প্রিয় ও হিতসাধনে নিয়োজিত থাকে; সত্য ভাষণ করে এবং ধর্মপরায়ণ ও শুচি থাকে।

Verse 2

स्वधर्मनिरतो विद्वान्‌ सर्वेन्द्रिययतो मुनि: । गुरो: प्रियहिते युक्त: सत्यधर्मपर: शुचि:,ब्रह्माजीनी कहा--महर्षिगण! इस प्रकार इस पूर्वोक्त मार्गके अनुसार गृहस्थको यथावत्‌ आचरण करना चाहिये एवं यथाशक्ति अध्ययन करते हुए ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह अपने धर्ममें तत्पर रहे, विद्वान्‌ बने, सम्पूर्ण इन्द्रियोंको अपने अधीन रखे, मुनि-व्रतका पालन करे, गुरुका प्रिय और हित करनेमें लगा रहे, सत्य बोले तथा धर्मपरायण एवं पवित्र रहे

বায়ু বললেন—মানুষ যেন স্বধর্মে নিবিষ্ট হয়ে বিদ্বান হয়। মুনির ন্যায় সংযমী হয়ে সে সকল ইন্দ্রিয় দমন করুক। গুরুর প্রিয় ও হিতসাধনে নিয়োজিত থাকুক, সত্য বলুক, ধর্মপরায়ণ থাকুক এবং শুচি থাকুক।

Verse 3

गुरुणा समनुज्ञातो भुज्जीतान्नमकुत्सयन्‌ । हविष्यभैक्ष्यभुक्‌ चापि स्थानासनविहारवान्‌,गुरुकी आज्ञा लेकर भोजन करे। भोजनके समय अन्नकी निन्दा न करे। भिक्षाके अन्नको हविष्य मानकर ग्रहण करे। एक स्थानपर रहे। एक आसनसे बैठे और नियत समयमें भ्रमण करे

গুরুর অনুমতি নিয়ে আহার করবে এবং আহারের সময় অন্নের নিন্দা করবে না। ভিক্ষালব্ধ অন্নকেও হব্য (যজ্ঞার্পিত) অন্নের ন্যায় জেনে গ্রহণ করবে। এক স্থানে অবস্থান করবে, এক আসন অবলম্বন করবে এবং নির্দিষ্ট সময়ে মাত্র বিহার (ভ্রমণ) করবে।

Verse 4

द्विकालमन्निं जुद्दान: शुचिर्भूत्वा समाहित: । धारयीत सदा दण्डं बैल्वं पालाशमेव वा,पवित्र और एकाग्रचित्त होकर दोनों समय अग्निमें हवन करे। सदा बेल या पलाशका दण्ड लिये रहे

শুচি ও সংযত হয়ে, একাগ্রচিত্তে উভয় সন্ধ্যায় পবিত্র অগ্নিতে হোম করবে। সর্বদা বিল্বকাষ্ঠের বা পলাশকাষ্ঠের দণ্ড ধারণ করবে।

Verse 5

क्षौीमं कार्पासिकं चापि मृगाजिनमथापि वा । सर्व काषायरक्तं वा वासो वापि द्विजस्य ह,रेशमी अथवा सूती वस्त्र या मृगचर्म धारण करे। अथवा ब्राह्मणके लिये सारा वस्त्र गेरुए रंगका होना चाहिये

দ্বিজের (বিশেষত ব্রাহ্মণের) বস্ত্র ক্ষৌম, কার্পাস বা মৃগচর্ম হতে পারে; অথবা তার সমস্ত বস্ত্র কাষায়-রক্ত, অর্থাৎ গেরুয়া রঙে রঞ্জিতও হতে পারে।

Verse 6

मेखला च भवेन्मौज्जी जटी नित्योदकस्तथा । यज्ञोपवीती स्वाध्यायी अलुब्धो नियतव्रत:,ब्रह्मचारी मूँजकी मेखला पहने, जटा धारण करे, प्रतिदिन स्नान करे, यज्ञोपवीत पहने, वेदके स्वाध्यायमें लगा रहे तथा लोभहीन होकर नियमपूर्वक व्रतका पालन करे

ব্রহ্মচারী মুঞ্জঘাসের মেখলা পরিধান করবে, জটা ধারণ করবে, প্রতিদিন স্নান করবে, যজ্ঞোপবীত ধারণ করবে, বেদস্বাধ্যায়ে রত থাকবে এবং লোভহীন হয়ে নিয়তব্রত পালন করবে।

Verse 7

पूताभिश्न तथैवाद्धिः सदा दैवततर्पणम्‌ । भावेन नियत: कुर्वन्‌ ब्रह्मचारी प्रशस्यते,जो ब्रह्मचारी सदा नियमपरायण होकर श्रद्धाके साथ शुद्ध जलसे नित्य देवताओंका तर्पण करता है, उसकी सर्वत्र प्रशंसा होती है

যে ব্রহ্মচারী নিয়মনিষ্ঠ হয়ে শ্রদ্ধাভরে শুদ্ধ জলে নিত্য দেবতাদের তर्पণ করে, সে সর্বত্র প্রশংসিত হয়।

Verse 8

एवं युक्तो जयेल्लोकान्‌ वानप्रस्थो जितेन्द्रिय: । न संसरति जातीषु परमं स्थानमाश्रित:,इसी प्रकार आगे बतलाये जानेवाले उत्तम गुणोंसे युक्त जितेन्द्रिय वानप्रस्थी पुरुष भी उत्तम लोकोंपर विजय पाता है। वह उत्तम स्थानको पाकर फिर इस संसारमें जन्म धारण नहीं करता

এইরূপ উত্তম গুণে যুক্ত, ইন্দ্রিয়জয়ী বানপ্রস্থও শ্রেষ্ঠ লোকসমূহ লাভ করে। পরম স্থান আশ্রয় করে সে আর জন্মজন্মান্তরে জাতিসমূহে ঘুরে বেড়ায় না।

Verse 9

संस्कृत: सर्वसंस्कारैस्तथैव ब्रह्मचर्यवान्‌ । ग्रामान्निष्क्रम्य चारण्ये मुनि: प्रत्रजितो वसेत्‌,वानप्रस्थ मुनिको सब प्रकारके संस्कारोंके द्वारा शुद्ध होकर ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए घरकी ममता त्यागकर गाँवसे बाहर निकलकर वनमें निवास करना चाहिये

সমস্ত সংস্কারে শুদ্ধ হয়ে ব্রহ্মচর্যব্রত পালন করে, গৃহাসক্তি ত্যাগ করে গ্রাম ছেড়ে বেরিয়ে মুনির ন্যায় অরণ্যে বাস করুক।

Verse 10

चर्मवल्कलसंवासी सायं प्रातरुपस्पृशेत्‌ । अरण्यगोचरो नित्य न ग्रामं प्रविशेत्‌ पुन:,वह मृगचर्म अथवा वल्कल-वस्त्र पहने। प्रातः: और सायंकालके समय स्नान करे। सदा वनमें ही रहे। गाँवमें फिर कभी प्रवेश न करे

সে মৃগচর্ম বা বল্কলবস্ত্র পরিধান করুক। প্রভাতে ও সায়াহ্নে স্নান করে শুদ্ধি সাধন করুক। সর্বদা অরণ্যেই থাকুক; আর কখনও গ্রামে প্রবেশ না করুক।

Verse 11

अर्चयन्नतिथीन्‌ काले दद्याच्चापि प्रतिश्रयम्‌ । फलपत्रावरैर्मूले: श्यामाकेन च वर्तयन्‌,अतिथिको आश्रय दे और समयपर उनका सत्कार करे। जंगली फल, मूल, पत्ता अथवा सावाँ खाकर जीवन-निर्वाह करे

যথাসময়ে অতিথিদের সম্মান করুক এবং আশ্রয়ও দিক। বন্য ফল, পাতা, মূল এবং শ্যামাক শস্যে জীবনধারণ করুক।

Verse 12

प्रवृत्तमुदकं वायुं सर्व वानेयमाश्रयेत्‌ । प्राश्नीयादानुपूर्व्येण यथादीक्षमतन्द्रित:,बहते हुए जल, वायु आदि सब वनकी वस्तुओंका ही सेवन करे। अपने व्रतके अनुसार सदा सावधान रहकर क्रमश: उपर्युक्त वस्तुओंका आहार करे

প্রবহমান জল, বায়ু প্রভৃতি—অরণ্যের যা কিছু প্রাপ্য, তাই আশ্রয় করুক। দীক্ষাবিধি অনুসারে অলসতা ত্যাগ করে সতর্ক থেকে ক্রমান্বয়ে তা গ্রহণ করুক।

Verse 13

समूलफल;भि क्षाभिरचेंदतिथिमागतम्‌ | यद्‌ भक्ष्यं स्थात्‌ ततो दद्याद भिक्षां नित्यमतन्द्रित:,यदि कोई अतिथि आ जाय तो फल-मूलकी भिक्षा देकर उसका सत्कार करे। कभी आलस्य न करे। जो कुछ भोजन अपने पास उपस्थित हो, उसीमेंसे अतिथिको भिक्षा दे

যদি কোনো অতিথি এসে পড়ে, তবে ফল-মূলের ভিক্ষা দিয়ে তাকে সম্মান করুক। সর্বদা অলসতা ত্যাগ করুক। সেই মুহূর্তে যা খাদ্য আছে, তারই মধ্য থেকে অতিথিকে ভিক্ষা দিক।

Verse 14

देवतातिथि पूर्व च सदा प्राश्नीत वाग्यत: । अस्पर्धितमनाश्चैव लघ्वाशी देवताश्रय:,नित्य प्रति पहले देवता और अतिथियोंको भोजन दे, उसके बाद मौन होकर स्वयं अन्न ग्रहण करे। मनमें किसीके साथ स्पर्धा न रखे, हलका भोजन करे, देवताओंका सहारा ले

বায়ু বললেন—মানুষের উচিত সর্বদা প্রথমে দেবতাদের ও অতিথিদের অন্ন নিবেদন করা; তারপর মৌন ও সংযম ধারণ করে নিজে আহার করা। কারও সঙ্গে মনে প্রতিযোগিতা না রাখা, অল্পাহারী হওয়া এবং নিত্য দেবতাদের আশ্রয়ে থাকা।

Verse 15

दान्तो मैत्र: क्षमायुक्त: केशान्‌ श्मश्रुच धारयन्‌ । जुद्दन्‌ स्वाध्यायशीलश्च सत्यधर्मपरायण:,इन्द्रियोंका संयम करे, सबके साथ मित्रताका बर्ताव करे, क्षमाशील बने और दाढ़ी-मूँछ तथा सिरके बालोंको धारण किये रहे। समयपर अग्निहोत्र और वेदोंका स्वाध्याय करे तथा सत्य-धर्मका पालन करे

বায়ু বললেন—ইন্দ্রিয়সংযমী হোক, সকলের সঙ্গে মৈত্রীভাব রাখুক, ক্ষমাশীল হোক এবং মাথার চুল ও দাড়ি-গোঁফ ধারণ করুক। যথাসময়ে অগ্নিহোত্র পালন করুক, বেদের স্বাধ্যায়ে নিবিষ্ট থাকুক এবং সত্য ও ধর্মে অবিচল থাকুক।

Verse 16

शुचिदेह: सदा दक्षो वननित्य: समाहित: । एवं युक्तो जयेत्‌ स्वर्ग वानप्रस्थो जितेन्द्रिय:,शरीरको सदा पवित्र रखे। धर्म-पालनमें कुशलता प्राप्त करे। सदा वनमें रहकर चित्तको एकाग्र किये रहे। इस प्रकार उत्तम धर्मोको पालन करनेवाला जितेन्द्रिय वानप्रस्थी स्वर्गपर विजय पाता है

বায়ু বললেন—বনবাসীর উচিত দেহকে সদা পবিত্র রাখা, ধর্মকর্মে দক্ষ ও তৎপর থাকা, নিত্য বনেই বাস করা এবং মনকে একাগ্র রাখা। এভাবে সংযত ও ইন্দ্রিয়জয়ী বাণপ্রস্থ স্বর্গলোক লাভ করে।

Verse 17

गृहस्थो ब्रह्मचारी च वानप्रस्थो5थ वा पुन: । य इच्छेन्मोक्षमास्थातुमुत्तमां वृत्तिमाश्रयेत्‌,ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ कोई भी क्‍यों न हो, जो मोक्ष पाना चाहता हो, उसे उत्तम वृत्तिका आश्रय लेना चाहिये

বায়ু বললেন—ব্রহ্মচারী হোক, গৃহস্থ হোক বা বাণপ্রস্থই হোক—যে সত্যিই মোক্ষের পথে অগ্রসর হতে চায়, তাকে উত্তম আচরণ অবলম্বন করতে হবে।

Verse 18

अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा नैष्कर्म्यमाचरेत्‌ । सर्वभूतसुखो मैत्र: सर्वेन्द्रिययतो मुनि:,(वानप्रस्थकी अवधि पूरी करके) सम्पूर्ण भूतोंको अभय-दान देकर कर्म-त्यागरूप संन्यास-धर्मका पालन करे। सब प्राणियोंके सुखमें सुख माने। सबके साथ मित्रता रखे। समस्त इन्द्रियोंका संयम और मुनि-वृत्तिका पालन करे

বায়ু বললেন—সমস্ত প্রাণীকে অভয় দান করে মানুষ নিষ্কাম কর্মত্যাগরূপ সন্ন্যাসধর্ম পালন করুক। সকল জীবের সুখেই নিজের সুখ মানুক, সবার প্রতি মৈত্রী রাখুক, সব ইন্দ্রিয় সংযত করুক এবং মুনিবৃত্তি অবলম্বন করুক।

Verse 19

अयाचितमसंक्लृप्तमुपपन्नं यदृच्छया । कृत्वा प्राह्ने चरेद्‌ भैक्ष्यं विधूमे भुक्तवज्जने

বায়ু বললেন—যা অযাচিত, অসংকল্পিত এবং যদৃচ্ছায় আপনা-আপনি আসে, কেবল তাই গ্রহণ করুক। নিত্যকর্ম সম্পন্ন করে মধ্যাহ্নে ভিক্ষার জন্য বেরোবে এবং যেখানে লোকেরা আহার সেরে ফেলেছে, সেখানে ধোঁয়াহীন—নিজের জন্য বিশেষভাবে না রান্না করা—অন্ন গ্রহণ করবে।

Verse 20

वृत्ते शरावसम्पाते भैक्ष्यं लिप्सेत मोक्षवित्‌ । बिना याचना किये, बिना संकल्पके दैवात्‌ जो अन्न प्राप्त हो जाय, उस भिक्षासे ही जीवन-निर्वाह करे। प्रातःकालका नित्यकर्म करनेके बाद जब गृहस्थोंके यहाँ रसोई-घरसे धुआँ निकलना बंद हो जाय, घरके सब लोग खा-पी चुकें और बर्तन धो-माजकर रख दिये गये हों, उस समय मोक्षधर्मके ज्ञाता संन्यासीको भिक्षा लेनेकी इच्छा करनी चाहिये ।। १९६ || लाभेन च न हृष्येत नालाभे विमना भवेत्‌ | न चातिकभिक्षां भिक्षेत केवलं प्राणयात्रिक:,भिक्षा मिल जानेपर हर्ष और न मिलनेपर विषाद न करे। (लोभवश) बहुत अधिक भिक्षाका संग्रह न करे। जितनेसे प्राण-यात्राका निर्वाह हो उतनी ही भिक्षा लेनी चाहिये

বায়ু বললেন—মোক্ষজ্ঞ সন্ন্যাসী যথাসময়ে ভিক্ষা প্রার্থনা করবে; না যাচনা করে, না কোনো কৌশল বা সংকল্প করে—ভাগ্য যা দেয় তাই দিয়ে জীবনধারণ করবে। প্রাতঃকালের নিত্যকর্ম শেষ করে, যখন গৃহস্থের রান্নাঘরের ধোঁয়া থেমে যায়, ঘরের সকলেই আহার সেরে ফেলে এবং পাত্রাদি ধুয়ে গুছিয়ে রাখা হয়, তখনই ভিক্ষার জন্য যাবে। ভিক্ষা পেলে উল্লসিত হবে না, না পেলে বিষণ্ণ হবে না। লোভে অতিরিক্ত ভিক্ষা সঞ্চয় করবে না; প্রাণযাত্রা চলার মতো যতটুকু, ততটুকুই গ্রহণ করবে।

Verse 21

यात्रार्थी कालमाकाडूक्षेश्षरेद्‌ भैक्ष्यं समाहित: । लाभं॑ साधारण नेच्छेन्न भुज्जीताभिपूजित:,संन्यासी जीवन-निर्वाहके ही लिये भिक्षा माँगे। उचित समयतक उसके मिलनेकी बाट देखे। चित्तको एकाग्र किये रहे। साधारण वस्तुओंकी प्राप्तिकी भी इच्छा न करे। जहाँ अधिक सम्मान होता हो, वहाँ भोजन न करे

বায়ুদেব বললেন—সন্ন্যাসী কেবল প্রাণযাত্রা ও জীবিকা রক্ষার জন্যই ভিক্ষা চাইবে। যথাসময় পর্যন্ত অপেক্ষা করবে, মনকে সংযত ও একাগ্র রাখবে। সাধারণ লাভের প্রতিও আকাঙ্ক্ষা করবে না, আর যেখানে অতিরিক্ত সম্মান-সম্ভ্রম দেওয়া হয় সেখানে আহার করবে না।

Verse 22

अभिपूजितलाभाद्धि विजुगुप्सेत भिक्षुक: | भुक्तान्यन्नानि तिक्तानि कषायकटुकानि च,मान-प्रतिष्ठाके लाभसे संन्यासीको घृणा करनी चाहिये। वह खाये हुए तिक्त, कसैले तथा कड़वे अन्नका स्वाद न ले

বায়ু বললেন—বিশেষ সম্মান-সম্ভ্রম থেকে যে লাভ আসে, ভিক্ষুকের তা ঘৃণাই করা উচিত। সে পূর্বে ভোজিত অন্নের মধ্য থেকে তিক্ত, কষায় ও কটু স্বাদের অন্নই গ্রহণ করুক।

Verse 23

नास्वादयीत भुगज्जानो रसांश्व मधुरांस्तथा । यात्रामात्रं च भुज्जीत केवलं प्राणधारणम्‌,भोजन करते समय मधुर रसका भी आस्वादन न करे। केवल जीवन-निर्वाहके उद्देश्यसे प्राण-धारणमात्रके लिये उपयोगी अन्नका आहार करे

বায়ুদেব বললেন—আহার করতে করতেও মধুর রসের আস্বাদনে মগ্ন হবে না। কেবল প্রাণধারণ ও জীবনযাত্রা চলার মতো পরিমাণেই অন্ন গ্রহণ করবে।

Verse 24

असंरोधेन भूतानां वृत्तिं लिप्सेत मोक्षवित्‌ न चान्यमन्नं लिप्सेत भिक्षमाण: कथंचन,मोक्षके तत्त्वको जाननेवाला संन्यासी दूसरे प्राणियोंकी जीविकामें बाधा पहुँचाये बिना ही यदि भिक्षा मिल जाती हो तभी उसे स्वीकार करे। भिक्षा माँगते समय दाताके द्वारा दिये जानेवाले अन्नके सिवा दूसरा अन्न लेनेकी कदापि इच्छा न करे

বায়ু বললেন—মোক্ষপথ-জ্ঞাতা সন্ন্যাসী অন্য প্রাণীদের জীবিকায় বাধা না দিয়ে নিজের জীবিকা নির্বাহ করবে। আর ভিক্ষা করতে গেলে দাতা যে অন্ন স্বেচ্ছায় দেন, তার বাইরে অন্য কোনো অন্ন সে কোনো অবস্থাতেই কামনা করবে না।

Verse 25

न संनिकाशयेद्‌ धर्म विविक्ते चारजाश्षरेत्‌ | शून्यागारमरण्यं वा वृक्षमूलं नदीं तथा,उसे अपने धर्मका प्रदर्शन नहीं करना चाहिये। रजोगुणसे रहित होकर निर्जन स्थानमें विचरते रहना चाहिये। रातको सोनेके लिये सूने घर, जंगल, वृक्षकी जड़, नदीके किनारे अथवा पर्वतकी गुफाका आश्रय लेना चाहिये। ग्रीष्मकालमें गाँवमें एक रातसे अधिक नहीं रहना चाहिये, किंतु वर्षाकालमें किसी एक ही स्थानपर रहना उचित है

বায়ু বললেন—নিজ ধর্মের প্রদর্শন করা উচিত নয়। রজোগুণের অস্থিরতা থেকে মুক্ত হয়ে নির্জন স্থানে বিচরণ করা উচিত। আর রাত্রিবিশ্রামের জন্য শূন্য গৃহ, অরণ্য, বৃক্ষমূল বা নদীতীর—এগুলির কোনো একটির আশ্রয় নিতে পারে।

Verse 26

प्रतिश्रयार्थ सेवेत पार्वतीं वा पुनर्गुहाम्‌ ग्रामैकरात्रिको ग्रीष्मे वर्षास्वेकत्र वा वसेत्‌,उसे अपने धर्मका प्रदर्शन नहीं करना चाहिये। रजोगुणसे रहित होकर निर्जन स्थानमें विचरते रहना चाहिये। रातको सोनेके लिये सूने घर, जंगल, वृक्षकी जड़, नदीके किनारे अथवा पर्वतकी गुफाका आश्रय लेना चाहिये। ग्रीष्मकालमें गाँवमें एक रातसे अधिक नहीं रहना चाहिये, किंतु वर्षाकालमें किसी एक ही स्थानपर रहना उचित है

বায়ু বললেন—আশ্রয়ের জন্য শূন্য গৃহ গ্রহণ করুক, অথবা পর্বতের গুহাতেও থাকুক। গ্রীষ্মকালে গ্রামে এক রাত্রির বেশি না থাকুক; কিন্তু বর্ষাকালে এক স্থানে স্থির থাকা উচিত।

Verse 27

अध्वा सूर्येण निर्दिष्ट: कीटवच्च चरेन्महीम्‌ । दयार्थ चैव भूतानां समीक्ष्य पृथिवीं चरेत्‌

সূর্য যে পথ নির্দেশ করেন, সেই পথ অনুসরণ করে সে কীটের মতো পৃথিবীতে চলুক—বিনয়ী হয়ে, অহংকারহীন। আর সকল প্রাণীর প্রতি করুণার জন্য, জগতকে পর্যবেক্ষণ করতে করতে সে বিচরণ করুক।

Verse 28

पूताभिरद्धिर्नित्यं वै कार्य कुर्वीत मोक्षवित्‌

বায়ু বললেন—মোক্ষজ্ঞ সাধক শুদ্ধ উপায়ে নিত্যই কর্তব্যকর্ম সম্পাদন করবে।

Verse 29

अहिंसा ब्रह्मचर्य च सत्यमार्जवमेव च,अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, दोष-दृष्टिका त्याग, इन्द्रियसंयम और चुगली न खाना--इन आठ व्रतोंका सदा सावधानीके साथ पालन करे। इन्द्रियोंको वशमें रखे

বায়ু বললেন—অহিংসা, ব্রহ্মচর্য, সত্য ও সরলতা; আর ক্রোধহীনতা, দোষদৃষ্টি ত্যাগ, ইন্দ্রিয়সংযম এবং পরনিন্দা/চুগলি না করা—এই আটটি ব্রত। এগুলি সর্বদা সতর্কতায় রক্ষা করবে এবং ইন্দ্রিয়কে বশে রাখবে।

Verse 30

अक्रोधश्वानसूया च दमो नित्यमपैशुनम्‌ । अष्टस्वेतेषु युक्त: स्याद्‌ व्रतेषु नियतेन्द्रिय:,अहिंसा, ब्रह्मचर्य, सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, दोष-दृष्टिका त्याग, इन्द्रियसंयम और चुगली न खाना--इन आठ व्रतोंका सदा सावधानीके साथ पालन करे। इन्द्रियोंको वशमें रखे

ক্রোধহীনতা, দোষদৃষ্টি-ত্যাগ, ইন্দ্রিয়সংযম এবং চুগলি না করা—এইসহ ঐ আট ব্রতে ইন্দ্রিয়-নিয়ন্ত্রিত ব্যক্তি সর্বদা যুক্ত থাকুক।

Verse 31

अपापमशतं वृत्तमजिद्दां नित्यमाचरेत्‌ । जोषयेत सदा भोज्यं ग्रासमागतमस्पृह:,उसे सदा पाप, शठता और कुटिलतासे रहित होकर बर्ताव करना चाहिये। नित्यप्रति जो अन्न अपने-आप प्राप्त हो जाय, उसको ग्रहण करना चाहिये, किंतु उसके लिये भी मनमें इच्छा नहीं रखनी चाहिये

বায়ুদেব বললেন—মানুষের আচরণ সর্বদা পাপহীন, ছলহীন ও কুটিলতাহীন হওয়া উচিত। যে অন্নকণা আপনিই এসে জোটে, তা গ্রহণ করে ভোগ করবে; কিন্তু তার প্রতিও লালসা রাখবে না।

Verse 32

यात्रामात्रं च भुज्जीत केवल प्राणयात्रिकम्‌ | धर्मलब्धमथाश्रीयान्न काममनुवर्तयेत्‌,प्राणयात्राका निर्वाह करनेके लिये जितना अन्न आवश्यक है, उतना ही ग्रहण करे। धर्मतः प्राप्त हुए अन्नका ही आहार करे। मनमाना भोजन न करे

বায়ুদেব বললেন—জীবনধারণের জন্য যতটুকু প্রয়োজন, ততটুকুই আহার করবে—শুধু প্রাণযাত্রার জন্য। ধর্মসম্মতভাবে প্রাপ্ত অন্নই গ্রহণ করবে; আহারে কামনা ও স্বেচ্ছাচার অনুসরণ করবে না।

Verse 33

ग्रासादाच्छादनादन्यन्न गृह्लीयात्‌ कथंचन । यावदाहारयेत्‌ तावत्‌ प्रतिगृह्लीत नाधिकम्‌,खानेके लिये अन्न और शरीर ढकनेके लिये वस्त्रके सिवा और किसी वस्तुका संग्रह न करे। भिक्षा भी, जितनी भोजनके लिये आवश्यक हो, उतनी ही ग्रहण करे, उससे अधिक नहीं

বায়ুদেব বললেন—খাদ্যের জন্য অন্ন এবং দেহ আচ্ছাদনের জন্য বস্ত্র—এ দুটির বাইরে কোনো কিছুই কখনও গ্রহণ বা সঞ্চয় করবে না। ভিক্ষাও যতটুকু আহারের জন্য দরকার, ততটুকুই নেবে—তার বেশি নয়।

Verse 34

परेभ्यो न प्रतिग्राह्मूं न च देयं कदाचन । दैन्यभावाच्च भूतानां संविभज्य सदा बुध:,बुद्धिमान्‌ संन्यासीको चाहिये कि दूसरोंके लिये भिक्षा न माँगे तथा सब प्राणियोंके लिये दयाभावसे संविभागपूर्वक कभी कुछ देनेकी इच्छा भी न करे

বায়ু বললেন—বুদ্ধিমান সন্ন্যাসী অন্যের কাছ থেকে দান গ্রহণ করবে না, আর কখনও দান দেওয়ার বাসনাও করবে না। তবে দুঃখী প্রাণীদের প্রতি করুণাবশে, যা কিছু তার কাছে আসে, তা সে সর্বদা যথাযথভাবে ভাগ করে দেবে—স্বার্থ, প্রদর্শন বা আসক্তি ছাড়া।

Verse 35

नाददीत परस्वानि न गृह्नीयादयाचित: । न किंचिद्‌ विषयं भुक्त्वा स्पृहयेत्‌ तस्य वै पुन:,दूसरोंके अधिकारका अपहरण न करे। बिना प्रार्थनाके किसीकी कोई वस्तु स्वीकार न करे। किसी अच्छी वस्तुका उपभोग करके फिर उसके लिये लालायित न रहे

বায়ু বললেন—অন্যের অধিকারের বস্তু হরণ করবে না। না চাইলে কারও বস্তু গ্রহণ করবে না। আর কোনো ভোগ্য বিষয় উপভোগ করার পর, তার জন্য পুনরায় লালসা করবে না।

Verse 36

मृदमापस्तथाजन्नानि पत्रपुष्पफलानि च | असंवृतानि गृह्नीयात्‌ प्रवृत्तानि च कार्यवान्‌,मिट्टी, जल, अन्न, पत्र, पुष्प और फल--ये वस्तुएँ यदि किसीके अधिकारमें न हों तो आवश्यकता पड़नेपर क्रियाशील संन्यासी इन्हें काममें ला सकता है

বায়ু বললেন—মাটি, জল, অন্ন, আর পাতা, ফুল ও ফল—যদি এগুলি কারও রক্ষিত অধিকারের অন্তর্গত না হয়, তবে প্রয়োজনীয় কর্তব্যে নিয়োজিত সন্ন্যাসী প্রয়োজনে তা নিতে ও ব্যবহার করতে পারে। এটাই ধর্মসম্মত।

Verse 37

न शिल्पजीविकां जीवेद्धिरण्यं नोत कामयेत्‌ । न द्वेष्ठा नोपदेष्टा च भवेच्च निरुपस्कृत:,वह शिल्पकारी करके जीविका न चलावे, सुवर्णकी इच्छा न करे। किसीसे द्वेष न करे और उपदेशक न बने तथा संग्रहरहित रहे

বায়ু বললেন—সে শিল্পকর্ম বা বাণিজ্য করে জীবিকা নির্বাহ করবে না, এবং সোনার কামনাও করবে না। কারও প্রতি বিদ্বেষ রাখবে না, উপদেশক সেজে খ্যাতি চাইবে না। সে নিরুপস্কৃত—সঞ্চয় ও আড়ম্বরহীন—জীবন যাপন করবে।

Verse 38

श्रद्धापूतानि भुज्जीत निमित्तानि च वर्जयेत्‌ । सुधावृत्तिरसक्तश्न सर्वभूतैरसंविदम्‌,श्रद्धासे प्राप्त हुए पवित्र अन्नका आहार करे। मनमें कोई निमित्त न रखे। सबके साथ अमृतके समान मधुर बर्ताव करे, कहीं भी आसक्त न हो और किसी भी प्राणीके साथ परिचय न बढ़ावे

বায়ু বললেন—শ্রদ্ধায় প্রাপ্ত পবিত্র অন্নই গ্রহণ করবে, এবং মনে কোনো কূট-নিমিত্ত (চালাকি-পরিকল্পনা) রাখবে না। সকলের সঙ্গে অমৃতসম মধুর আচরণ করবে; কোথাও আসক্ত হবে না; এবং কোনো প্রাণীর সঙ্গে অপ্রয়োজনীয় ঘনিষ্ঠতা বাড়াবে না।

Verse 39

आशीर्युक्तानि सर्वाणि हिंसायुक्तानि यानि च । लोकसंग्रहधर्म च नैव कुर्यान्न कारयेत्‌,जितने भी कामना और हिंसासे युक्त कर्म हैं, उन सबका एवं लौकिक कर्मोंका न स्वयं अनुष्ठान करे और न दूसरोंसे करावे

যে সকল কর্ম ফল-আশাযুক্ত এবং যে সকল কর্ম হিংসাযুক্ত, আর যে সকল কর্ম কেবল লোক-সংগ্রহ (লোক-রক্ষা/লোক-প্রসন্নতা) উদ্দেশ্যে—সেগুলি না নিজে করবে, না অন্যকে করাবে।

Verse 40

सर्वभावानतिक्रम्य लघुमात्र: परिव्रजेत्‌ सम: सर्वेषु भूतेषु स्थावरेषु चरेषु च,सब प्रकारके पदार्थोकी आसक्तिका उल्लंघन करके थोड़ेमें संतुष्ट हो सब ओर विचरता रहे। स्थावर और जंगम सभी प्राणियोंके प्रति समान भाव रखे

সকল ভাব ও বিষয়ের আসক্তি অতিক্রম করে, অল্পতেই সন্তুষ্ট হয়ে পরিব্রাজকের ন্যায় বিচরণ করুক। স্থাবর ও জঙ্গম—সমস্ত প্রাণীর প্রতি সমদৃষ্টি রাখুক।

Verse 41

परं नोद्वेजयेत्‌ काचिन्न च कस्यचिद॒द्विजेत्‌ । विश्वास्य: सर्वभूतानामग्रयो मोक्षविदुच्यते,किसी दूसरे प्राणीको उद्वेगमें न डाले और स्वयं भी किसीसे उद्विग्न न हो। जो सब प्राणियोंका विश्वासपात्र बन जाता है, वह सबसे श्रेष्ठ और मोक्ष-धर्मका ज्ञाता कहलाता है

কোনো প্রাণীকেই উদ্বিগ্ন করবে না, আর নিজেও কারও দ্বারা উদ্বিগ্ন হবে না। যে সর্বভূতের বিশ্বাসভাজন হয়, তাকেই শ্রেষ্ঠ বলা হয় এবং সে মোক্ষধর্মের জ্ঞাতা।

Verse 42

अनागतं च न ध्यायेन्नातीतमनुचिन्तयेत्‌ । वर्तमानमुपेक्षेत कालाकाड्क्षी समाहित:,संन्यासीको उचित है कि भविष्यके लिये विचार न करे, बीती हुई घटनाका चिन्तन न करे और वर्तमानकी भी उपेक्षा कर दे। केवल कालकी प्रतीक्षा करता हुआ चित्तवृत्तियोंका समाधान करता रहे

সন্ন্যাসীর উচিত—না ভবিষ্যৎ নিয়ে ধ্যান করা, না অতীত নিয়ে অনুচিন্তা করা; বর্তমানকেও উপেক্ষায় রাখা। কালের প্রতীক্ষায়, সমাহিতচিত্ত হয়ে থাকা।

Verse 43

न चक्षुषा न मनसा न वाचा दूषयेत्‌ क्वचित्‌ | न प्रत्यक्ष परोक्षं वा किंचिद्‌ दुष्ट समाचरेत्‌,नेत्रसे, मनसे और वाणीसे कहीं भी दोषदृष्टि न करे। सबके सामने या दूसरोंकी आँख बचाकर कोई बुराई न करे

কখনও চোখে, মনে বা বাক্যে কাউকে কলুষিত করবে না—দোষদৃষ্টি বা কুটিল ভাব পোষণ করবে না। প্রকাশ্যে বা গোপনে—কোনো দুষ্কর্মই করবে না।

Verse 44

इन्द्रियाण्युपसंहृत्य कूर्मोडड्रानीव सर्वश: । क्षीणेन्द्रियमनोबुद्धिर्निरीह: सर्वतत्त्ववित्‌,जैसे कछुआ अपने अंगोंको सब ओरसे समेट लेता है, उसी प्रकर इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे हटा ले। इन्द्रिय, मन और बुद्धिको दुर्बल करके निश्वेष्ट हो जाय। सम्पूर्ण तत्त्वोंका ज्ञान प्राप्त करे

বায়ু বললেন—যেমন কচ্ছপ চারদিক থেকে নিজের অঙ্গসমূহ গুটিয়ে নেয়, তেমনি সর্বতোভাবে ইন্দ্রিয়সমূহকে বিষয় থেকে প্রত্যাহার কর। ইন্দ্রিয়, মন ও বুদ্ধিকে বাহ্যবস্তুর প্রতি নিস্তব্ধ ও ক্ষীণ করে নিরীহ হয়ে থাক; তত্ত্বসমূহের সর্বজ্ঞ হও।

Verse 45

निर्द्धदद्ों निर्ममस्कारो निःस्वाहाकार एव च | निर्ममो निरहंकारो निर्योगक्षेम आत्मवान्‌,द्वन्दोंसे प्रभावित न हो, किसीके सामने माथा न टेके। स्वाहाकार (अग्निहोत्र आदि)- का परित्याग करे। ममता और अहंकारसे रहित हो जाय, योगक्षेमकी चिन्ता न करे। मनपर विजय प्राप्त करे

বায়ু বললেন—দ্বন্দ্বসমূহে অচঞ্চল হও; কারও সামনে দাসসুলভ প্রণাম করো না। ‘স্বাহা’ উচ্চারণসহ অগ্নিহোত্রাদি হোমকর্ম ত্যাগ করো। মমতা ও অহংকারশূন্য, লাভ-রক্ষার চিন্তামুক্ত, আত্মসংযমী হও।

Verse 46

निराशीर्निर्गुण: शान्तो निरासक्तो निराश्रय: । आत्मसज्जी च तत्त्वज्ञो मुच्यते नात्र संशय:,जो निष्काम, निर्गुण, शान्त, अनासक्त, निराश्रय, आत्मपरायण और तत्त्वका ज्ञाता होता है, वह मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि गुरुशिष्यसंवादे षट्चत्वारिंशो5ध्याय:

বায়ুদেব বললেন—যে আকাঙ্ক্ষাহীন, গুণাতীত, অন্তঃশান্ত, অনাসক্ত, নিরাশ্রয়, আত্মনিষ্ঠ এবং তত্ত্বজ্ঞ—সে মুক্ত হয়; এতে কোনো সংশয় নেই।

Verse 47

अपादपाणिपृष्ठं तदशिरस्कमनूदरम्‌ । प्रहीणगुणकर्माणं केवलं विमलं स्थिरम्‌,जो मनुष्य आत्माको हाथ, पैर, पीठ, मस्तक और उदर आदि अंगोंसे रहित, गुण- कर्मोंसे हीन, केवल, निर्मल, स्थिर, रूप-रस-गन्ध-स्पर्श और शब्दसे रहित, ज्ञेय, अनासक्त, हाड़-मांसके शरीरसे रहित, निश्चिन्त, अविनाशी, दिव्य और सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित सदा एकरस रहनेवाला जानते हैं, उनकी कभी मृत्यु नहीं होती

বায়ু বললেন—সেই আত্মাকে পদ, হস্ত, পৃষ্ঠ, শির ও উদরহীন বলে জানো; সে গুণ ও কর্মের ক্রিয়াকলাপ থেকে মুক্ত, একাকী, নির্মল ও অচঞ্চল। যে এভাবে আত্মাকে জানে—অনাসক্ত, ইন্দ্রিয়গুণাতীত, নশ্বর দেহে আবদ্ধ নয়—সে প্রকৃতপক্ষে মরে না; কারণ এই জ্ঞান অবিনশ্বর, দিব্য সত্যে প্রতিষ্ঠিত, যা সকল প্রাণীতে সমভাবে বিরাজমান।

Verse 48

अगन्धमरसस्पर्शमरूपाशब्दमेव च । अनुगम्यमनासक्तममांसमपि चैव यत्‌,जो मनुष्य आत्माको हाथ, पैर, पीठ, मस्तक और उदर आदि अंगोंसे रहित, गुण- कर्मोंसे हीन, केवल, निर्मल, स्थिर, रूप-रस-गन्ध-स्पर्श और शब्दसे रहित, ज्ञेय, अनासक्त, हाड़-मांसके शरीरसे रहित, निश्चिन्त, अविनाशी, दिव्य और सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित सदा एकरस रहनेवाला जानते हैं, उनकी कभी मृत्यु नहीं होती

বায়ু বললেন—সেই আত্মা গন্ধ, রস ও স্পর্শহীন; রূপহীন এবং শব্দহীনও বটে। অন্তর্মুখ সাধনায় উপলব্ধিযোগ্য, অনাসক্ত এবং মাংসহীন। যে তাকে এভাবে জানে—ইন্দ্রিয়বিষয়াতীত, গুণ-কর্মশূন্য, নির্মল, স্থির, অবিনশ্বর, দিব্য এবং সকল প্রাণীতে সমরূপে প্রতিষ্ঠিত—সে মৃত্যুর মুখে পড়ে না।

Verse 49

निश्चिन्तमव्ययं दिव्यं कूटस्थमपि सर्वदा | सर्वभूतस्थमात्मानं ये पश्यन्ति न ते मृता:,जो मनुष्य आत्माको हाथ, पैर, पीठ, मस्तक और उदर आदि अंगोंसे रहित, गुण- कर्मोंसे हीन, केवल, निर्मल, स्थिर, रूप-रस-गन्ध-स्पर्श और शब्दसे रहित, ज्ञेय, अनासक्त, हाड़-मांसके शरीरसे रहित, निश्चिन्त, अविनाशी, दिव्य और सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित सदा एकरस रहनेवाला जानते हैं, उनकी कभी मृत्यु नहीं होती

যাঁরা আত্মাকে নির্ভয়, অবিনশ্বর, দিব্য, সর্বদা কূটস্থ (অপরিবর্তনীয়) এবং সর্বভূতে অধিষ্ঠিত বলে প্রত্যক্ষ করেন—তাঁরা মৃত্যুর দ্বারা পরাভূত হন না।

Verse 50

न तत्र क्रमते बुद्धिर्नेन्द्रियाणि न देवता: । वेदा यज्ञाक्ष लोकाक्ष न तपो न व्रतानि च,उस आत्मतत्त्वतक बुद्धि, इन्द्रिय और देवताओंकी भी पहुँच नहीं होती। जहाँ केवल ज्ञानवान्‌ महात्माओंकी ही गति है, वहाँ वेद, यज्ञ, लोक, तप और व्रतका भी प्रवेश नहीं होता; क्योंकि वह बाह्य चिह्लसे रहित मानी गयी है। इसलिये बाह्य चिह्नोंसे रहित धर्मको जानकर उसका यथार्थरूपसे पालन करना चाहिये

সেই পরম তত্ত্বে না বুদ্ধি পৌঁছায়, না ইন্দ্রিয়, না দেবতাগণ। সেখানে বেদের প্রবেশ নেই, যজ্ঞেরও নয়, লোকাচারেরও নয়—তপস্যা নেই, ব্রতও নেই; কারণ তা বাহ্য চিহ্নের অতীত বলে মানা হয়। অতএব বাহ্য লক্ষণহীন ধর্মকে জেনে তার সত্যরূপে আচরণ করা উচিত।

Verse 51

यत्र ज्ञानवतां प्राप्तिरलिड्रग्रहणा स्मृता । तस्मादलिड्जधर्मज्ञो धर्मतत्त्वमुपाचरेत्‌,उस आत्मतत्त्वतक बुद्धि, इन्द्रिय और देवताओंकी भी पहुँच नहीं होती। जहाँ केवल ज्ञानवान्‌ महात्माओंकी ही गति है, वहाँ वेद, यज्ञ, लोक, तप और व्रतका भी प्रवेश नहीं होता; क्योंकि वह बाह्य चिह्लसे रहित मानी गयी है। इसलिये बाह्य चिह्नोंसे रहित धर्मको जानकर उसका यथार्थरूपसे पालन करना चाहिये

যে অবস্থায় জ্ঞানীদের গতি, তা ‘বাহ্য চিহ্নহীন’ বলে স্মৃত। অতএব যে আলিঙ্গ (বাহ্য-লক্ষণরহিত) ধর্ম জানে, সে ধর্মতত্ত্বেরই অনুশীলন করুক।

Verse 52

गूढधर्माश्रितो विद्वान्‌ विज्ञानचरितं चरेत्‌ । अमूढो मूढरूपेण चरेद्‌ धर्ममदूषयन्‌,गुहा धर्ममें स्थित विद्वान्‌ पुरुषको उचित है कि वह विज्ञानके अनुरूप आचरण करे। मूढ़ न होकर भी मूढ़के समान बर्ताव करे, किंतु अपने किसी व्यवहारसे धर्मको कलंकित न करे

গূঢ় (সূক্ষ্ম) ধর্মের আশ্রয় নেওয়া বিদ্বান পুরুষ জ্ঞান-বিবেচনা অনুযায়ী আচরণ করুক। তিনি নিজে অমূঢ় হয়েও মূঢ়ের ন্যায় বিচরণ করতে পারেন—তবে কোনো কর্মে ধর্মকে কলুষিত করবেন না।

Verse 53

तथैनमवमन्येरन्‌ परे सततमेव हि । यथावृत्तश्नरेच्छान्त: सतां धर्मानकुत्सयन्‌

তখন অন্যেরা তাকে সর্বদাই তুচ্ছ জ্ঞান করবে। কিন্তু যে ব্যক্তি যা স্বাভাবিক ক্রমে আসে তাই গ্রহণ করে সন্তুষ্ট থাকে, এবং সজ্জনদের ধর্মকে নিন্দা করে না—সে শান্ত ও স্থির থাকে।

Verse 54

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्ष महाभूतानि पडच च,ततः स्वर्गमवाप्रोति विमुक्त: सर्वबन्धनै: | जो मनुष्य इन्द्रिय, उनके विषय, पठचमहाभूत, मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति और पुरुष --इन सबका विचार करके इनके तत्त्वका यथावत्‌ निश्चय कर लेता है, वह सम्पूर्ण बन्धनोंसे मुक्त होकर स्वर्गको प्राप्त कर लेता है

যে ব্যক্তি ইন্দ্রিয়, ইন্দ্রিয়বিষয় এবং পঞ্চ মহাভূতের তত্ত্ব যথাযথভাবে বিচার করে তাদের সত্য স্বরূপ নির্ণয় করে, সে সকল বন্ধন থেকে মুক্ত হয়ে স্বর্গ লাভ করে।

Verse 55

मनो बुद्धिरहंकारमव्यक्तं पुरुषं तथा । एतत्‌ सर्व प्रसंख्याय यथावत्‌ तत्त्वनिश्चयात्‌

মন, বুদ্ধি, অহংকার, অব্যক্ত এবং পুরুষ—এ সকলকে যথাক্রমে গণনা ও বিচার করলে তত্ত্বের দৃঢ় নির্ণয় হয়।

Verse 56

एतावदन्तवेलायां परिसंख्याय तत्त्ववित्‌,जो तत्त्ववेत्ता अन्त समयमें इन तत्त्वोंका ज्ञान प्राप्त करके एकान्तमें बैठकर परमात्माका ध्यान करता है, वह आकाशमें विचरनेवाले वायुकी भाँति सब प्रकारकी आसक्तियोंसे छूटकर पञ्चकोशोंसे रहित, निर्भय तथा निराश्रय होकर मुक्त एवं परमात्माको प्राप्त हो जाता है

তত্ত্বজ্ঞ ব্যক্তি অন্তিম ক্ষণে এই তত্ত্বসমূহ যথাযথভাবে গণনা করে জেনে একান্তে বসে পরমাত্মার ধ্যান করে। আকাশে বিচরণকারী বায়ুর ন্যায় সে সকল আসক্তি থেকে মুক্ত হয়; পঞ্চকোষ অতিক্রম করে নির্ভয় ও নিরাশ্রয় হয়ে মুক্তিলাভ করে পরমাত্মাকে প্রাপ্ত হয়।

Verse 57

ध्यायेदेकान्तमास्थाय मुच्यते5थ निराश्रय: । निर्मुक्त: सर्वसड्रेभ्यो वायुराकाशगो यथा,जो तत्त्ववेत्ता अन्त समयमें इन तत्त्वोंका ज्ञान प्राप्त करके एकान्तमें बैठकर परमात्माका ध्यान करता है, वह आकाशमें विचरनेवाले वायुकी भाँति सब प्रकारकी आसक्तियोंसे छूटकर पञ्चकोशोंसे रहित, निर्भय तथा निराश्रय होकर मुक्त एवं परमात्माको प्राप्त हो जाता है

একান্ত আশ্রয় করে ধ্যান করা উচিত; তাতে সে নিরাশ্রয় হয়ে মুক্তি লাভ করে। আকাশগামী বায়ুর ন্যায় সে সকল সঙ্গ-আসক্তি থেকে সম্পূর্ণ মুক্ত হয়।

Verse 58

क्षीणकोशो निरातड्कस्तथेदं प्राप्तुयात्‌ परम्‌,जो तत्त्ववेत्ता अन्त समयमें इन तत्त्वोंका ज्ञान प्राप्त करके एकान्तमें बैठकर परमात्माका ध्यान करता है, वह आकाशमें विचरनेवाले वायुकी भाँति सब प्रकारकी आसक्तियोंसे छूटकर पञ्चकोशोंसे रहित, निर्भय तथा निराश्रय होकर मुक्त एवं परमात्माको प्राप्त हो जाता है

তার পঞ্চকোষ ক্ষয়প্রাপ্ত হয় এবং সে ভয়শূন্য হয়; এইভাবে সে পরম পদ লাভ করে।

Verse 273

संचयांश्व न कुर्वीत स्नेहवासं च वर्जयेत्‌ । जबतक सूर्यका प्रकाश रहे तभीतक संन्यासीके लिये रास्ता चलना उचित है। वह कीड़ेकी तरह धीरे-धीरे समूची पृथ्वीपर विचरता रहे और यात्राके समय जीवोंपर दया करके पृथ्वीको अच्छी तरह देख-भालकर आगे पाँव रखे। किसी प्रकारका संग्रह न करे और कहीं भी आसक्तिपूर्वक निवास न करे

বায়ু বললেন—সন্ন্যাসীর সঞ্চয় করা উচিত নয়, আর আসক্তিবশে কোথাও স্থায়ীভাবে বাস করাও বর্জনীয়। যতক্ষণ সূর্যের আলো থাকে, ততক্ষণই পথ চলা ভ্রাম্যমাণ তপস্বীর পক্ষে যথোচিত। ক্ষুদ্র কীটের মতো ধীরে ধীরে সে সমগ্র পৃথিবী পরিভ্রমণ করবে; আর যাত্রাপথে জীবের প্রতি দয়া করে ভূমি ভালোভাবে দেখে সতর্কভাবে পা ফেলবে। কোনো প্রকার সঞ্চয় করবে না এবং কোথাও আসক্তিসহ বাস করবে না।

Verse 286

उपस्पृशेदुद्धृताभिरद्धिश्व॒ पुरुष: सदा । मोक्ष-धर्मके ज्ञाता संन्यासीको उचित है कि सदा पवित्र जलसे काम ले। प्रतिदिन तुरंत निकाले हुए जलसे स्नान करे (बहुत पहलेके भरे हुए जलसे नहीं)

বায়ুদেব বললেন—মানুষের উচিত সর্বদা সদ্য তোলা জল দিয়ে শুদ্ধিকর্ম করা। বিশেষ করে মোক্ষধর্ম-জ্ঞ সন্ন্যাসীর পক্ষে শুদ্ধ জলেরই আশ্রয় নেওয়া উচিত এবং প্রতিদিন সেই জলেই স্নান করা উচিত যা তৎক্ষণাৎ তোলা হয়েছে—দীর্ঘদিন আগে সঞ্চিত জলে নয়।

Verse 533

य एवं वृत्तसम्पन्न: स मुनि: श्रेष्ठ उच्यते । जिस कामके करनेसे समाजके दूसरे लोग अनादर करें, वैसा ही काम शान्त रहकर सदा करता रहे, किंतु सत्पुरुषोंके धर्मकी निन्‍दा न करे। जो इस प्रकारके बर्तावसे सम्पन्न है, वह श्रेष्ठ मुनि कहलाता है

বায়ু বললেন—যে এইরূপ সংযত আচরণে সম্পন্ন, সেই মুনিই শ্রেষ্ঠ বলে কথিত। যে কাজ করলে সমাজের অন্য লোকেরা অবজ্ঞা করে, তবু সে শান্তচিত্তে সর্বদা ধর্মসম্মত কাজই করে যাবে; কিন্তু সৎপুরুষদের ধর্মকে কখনো নিন্দা করবে না। এইরূপ আচরণে যিনি পরিপূর্ণ, তিনিই প্রকৃত শ্রেষ্ঠ মুনি।

Verse 556

ततः स्वर्गमवाप्रोति विमुक्त: सर्वबन्धनै: | जो मनुष्य इन्द्रिय, उनके विषय, पठचमहाभूत, मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति और पुरुष --इन सबका विचार करके इनके तत्त्वका यथावत्‌ निश्चय कर लेता है, वह सम्पूर्ण बन्धनोंसे मुक्त होकर स्वर्गको प्राप्त कर लेता है

তখন সে সকল বন্ধন থেকে মুক্ত হয়ে স্বর্গ লাভ করে। যে ব্যক্তি ইন্দ্রিয় ও তাদের বিষয়, পঞ্চ মহাভূত, মন, বুদ্ধি, অহংকার, এবং প্রকৃতি ও পুরুষ—এসব সকলের উপর বিচার করে তাদের তত্ত্ব যথাযথভাবে নির্ণয় করে, সে সমস্ত আসক্তির বন্ধন ছিন্ন করে স্বর্গীয় অবস্থায় উপনীত হয়।

Frequently Asked Questions

The chapter addresses how to pursue liberation without social disruption: it resolves the tension by prescribing minimal dependence, non-harm, truthful restraint, and a non-ostentatious (aliṅga) practice that avoids seeking status through visible piety.

Liberation is framed as a practical discipline of restraint and relinquishment: equanimity, non-attachment, and discernment of the constituents of experience culminate in freedom from bonds rather than in external accomplishment.

Yes. The chapter asserts that one who maintains these disciplines—especially non-attachment, sense-withdrawal, and relinquishment of constituents—does not cycle through births and attains the highest state, described as liberation from all bonds.