
Chapter 89: Bhīma dispatched to protect Ghaṭotkaca amid escalating engagements
Upa-parva: Bhīṣma-vadha Parva (contextual war-episode unit within Bhīṣma Parva)
Sañjaya reports a concentrated battlefield development: a rākṣasa combatant presses toward Duryodhana, prompting Kaurava forces to converge with heavy bows and a surrounding arrow-barrage. The rākṣasa, though struck, surges upward and emits a formidable roar that carries across directions, becoming an acoustic signal of intensified combat. Hearing this, Yudhiṣṭhira infers a serious engagement involving Dhārtarāṣṭra mahārathas; he also notes Bhīṣma’s anger toward the Pāñcālas and Arjuna’s defensive fighting on their behalf, identifying simultaneous operational pressures. He instructs Bhīma (Vṛkodara) to move quickly and protect Haiḍimba (Ghaṭotkaca), now at high risk. Bhīma advances with a lion-like shout; several Kaurava fighters pursue, while allied forces—Abhimanyu, the Draupadeyas, and others—form a protective ring around Ghaṭotkaca with elephants and chariots. The scene expands into dispersed, close-quarters engagements: mixed arms collide, dust obscures recognition, and the narration emphasizes the chaotic mechanics of battle—noise, disorientation, and the grim material consequences—while concluding that the Dhārtarāṣṭra host is largely checked and turned back in that phase.
Chapter Arc: घमासान संग्राम के बीच भीष्म शिखण्डी को आते देख क्षणभर में उसका धनुष काट देते हैं—मानो यह संकेत हो कि आज का युद्ध केवल शस्त्रों का नहीं, मर्यादा और संकल्प का भी है। → युद्ध का कोलाहल बढ़ते ही शान्तनुनन्दन भीष्म सीधे युधिष्ठिर की ओर बढ़ते हैं। पाण्डव-पक्ष के रथ, हाथी, घोड़े काँप उठते हैं; सबको लगता है मानो युधिष्ठिर मृत्यु के मुख में जा रहे हों। व्यूह टूटते हैं, पर क्षत्रिय एक-दूसरे को ललकार कर व्यक्तिगत द्वन्द्वों में उतर आते हैं। → क्रोध से भरे युधिष्ठिर भीष्म पर विषधर सर्प-सा नाराच छोड़ते हैं, पर महारथी भीष्म क्षुरप्र से उसे काट देते हैं और दबाव बनाए रखते हैं। साथ ही, भीष्म शिखण्डी को ‘स्त्रीत्व’ का स्मरण कर अनादरपूर्वक उपेक्षित करते हुए आगे बढ़ते हैं—यह उपेक्षा स्वयं एक तीखा प्रहार बन जाती है। → सृंजय-गण भीष्म के पराक्रम से हर्षित होकर शंख-नाद और सिंहनाद करते हैं। दिन भर की टक्कर के बाद दोनों सेनाएँ थककर रात्रि में विश्राम को जाती हैं; हाथी-घोड़ों से भरी वह रात युद्ध-भूमि को एक विचित्र, देखने योग्य शान्ति देती है। → रात्रि की शान्ति के भीतर अगले दिन का अनिवार्य प्रचण्ड उभार छिपा है—भीष्म का दबदबा बना रहता है, और पाण्डवों के लिए मार्ग और कठिन होने का संकेत मिलता है।
Verse 1
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके तीन श्लोक मिलाकर कुल ४३ श्लोक हैं।] - भीष्मपितामहने शिखण्डीको अपने ऊपर प्रहार करनेके लिये आया देखकर ही उसके धनुषको काट दिया था, उसके शरीरपर कोई प्रहार नहीं किया। अत: कोई दोष नहीं है। षडशीतितमो<्ध्याय: भीष्म और युधिष्ठिरका युद्ध, धृष्टद्युम्न और सात्यकिके साथ विन्द और अनुविन्दका संग्राम, द्रोण आदिका पराक्रम और सातवें दिनके युद्धकी समाप्ति संजय उवाच विरथं तं समासाद्य चित्रसेनं यशस्विनम् । रथमारोपयामास विकर्णस्तनयस्तव,संजय कहते हैं--राजन्! रथहीन हुए अपने यशस्वी भाई चित्रसेनके पास जाकर आपके पुत्र विकर्णने उसे अपने रथपर चढ़ा लिया
قال سنجيا: أيها الملك، إن ابنك فيكارنا دنا من أخيه المجيد تشيتراسينا وقد صار بلا عربة، فحمله وأركبه على عربته هو.
Verse 2
तस्मिंस्तथा वर्तमाने तुमुले संकुले भूशम् । भीष्म: शान्तनवस्तूर्ण युधिष्ठिरमुपाद्रवत्,जब इस प्रकार भयंकर और घमासान युद्ध होने लगा, उसी समय शान्तनुनन्दन भीष्मने तुरंत ही राजा युधिष्ठिरपर धावा किया
قال سنجيا: ولما اضطربت المعركة على هذا النحو، رهيبةً مختلطةً عاصفةً، عندئذٍ اندفع بهيشما ابن شانتانو مسرعًا نحو الملك يودهيشثيرا.
Verse 3
ततः सरथनागाश्वा: समकम्पन्त सूंजया: । मृत्योरास्यमनुप्राप्तं मेनिरे च युधिष्ठिरम्,यह देख सूंजयवीर रथ, हाथी और घोड़ोंसहित काँप उठे। उन्होंने युधिष्ठिरको मौतके मुखमें पड़ा हुआ ही समझा
ثم ارتجف السِّرِنْجَيَةُ مع عرباتهم وفِيَلتهم وخيلهم. وظنّوا أن يودهيشثيرا قد وقع في فم الموت نفسه.
Verse 4
युधिष्ठटिरो5पि कौरव्यो यमाभ्यां सहित: प्रभु: । महेष्वासं नरव्याप्र॑ भीष्मं शान्तनवं ययौ,कुरुनन्दन राजा युधिष्ठिर भी नकुल और सहदेवके साथ महाथनुर्धर पुरुषसिंह शान्तनुनन्दन भीष्मका सामना करनेके लिये आगे बढ़े
قال سنجيا: إن يودهيشثيرا أيضًا—سيد الكورافا المهيب—وقد صحبه ابنا ياما (ناكولا وسهاديفا)، تقدّم نحو بهيشما ابن شانتانو، ذلك النمر بين الرجال والرّامي العظيم، ليلاقيه في ساحة القتال. ويبرز هذا المشهد ثِقَل واجب الملوك في الحرب: فحتى البارّ لا بد أن يتقدّم حين يقتضي الدارما مقاومة الأدارما، وإن كان الخصم شيخًا جليلًا مُهابًا.
Verse 5
तत: शरसहस्राणि प्रमुड्चन् पाण्डवो युधि । भीष्म॑ं संछादयामास यथा मेघो दिवाकरम्,जैसे मेघ सूर्यको ढक लेता है, उसी प्रकार युद्धस्थलमें हजारों बाणोंकी वर्षा करते हुए पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरने भीष्मको आच्छादित कर दिया
قال سنجيا: ثم في خضمّ القتال، أطلق الباندافيُّ آلاف السهام فغطّى بهيشما، كما تحجب السحابةُ الشمسَ. وتُبرز الصورة اندفاع الحرب العنيف حين تُعدّ حربًا للحق: فحتى أوقر المحاربين سنًّا قد يُستتر لحظةً عندما يدفع الواجبُ والقتالُ إلى الأمام بلا تردّد.
Verse 6
तेन सम्यक् प्रणीतानि शरजालानि मारिष । प्रतिजग्राह गाड़ेयः शतशो5थ सहस्रश:,आर्य! उनके द्वारा अच्छी तरह चलाये हुए सैकड़ों और हजारों बाणोंके समूहको गंगानन्दन भीष्मने ग्रहण कर लिया (अपने बाणोंद्वारा विफल कर दिया)
قال سنجيا: أيها الجليل، إن بهيشما المولود من الغانغا تلقّى—بل حيّد—تلك الرشقات من السهام التي وُجِّهت بإحكام من خصمه، مئاتٍ ثم آلافًا، فلاقاها بسهامه هو وجعلها عديمة الأثر. ويبرز المشهد إتقان السلاح المنضبط في الحرب، حيث تُكبح المهارة بالواجب وتُساق وفق مقتضى ساحة القتال لا وفق غضبٍ شخصي.
Verse 7
तथैव शरजालानि भीष्मेणास्तानि मारिष | आकाशे समदृश्यन्त खगमानां व्रजा इव,आर्य! इसी प्रकार भीष्मके चलाये हुए बाणसमूह भी आकाशमें पक्षियोंके झुंडके समान दिखायी देने लगे
قال سنجيا: «وكذلك، يا عزيزي، بدت شِباك السهام التي أطلقها بهيشما في السماء كأسراب الطير في طيرانها».
Verse 8
निमेषार्थेन कौन्तेयं भीष्म: शान्तनवो युधि । अदृश्यं समरे चक्रे शरजालेन भागश:,शान्तनुनन्दन भीष्मने युद्धस्थलमें आधे निमेषमें ही पृथक्ू-पृथक् बाणोंका जाल-सा बिछाकर कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको अदृश्य कर दिया
قال سنجيا: في مقدار رمشة عين، جعل بهيشما ابن شانتانو، في ساحة القتال، ابنَ كونتي (يودهيشثيرا) يختفي عن الأنظار في المعمعة—إذ غطّاه، كأنما، بشَبَكةٍ من السهام أُلقيت على دفعاتٍ متمايزة. ويبرز المشهد فاعلية المهارة القتالية المروّعة حين تُستعمل في الحرب، حيث قد يُغلب حتى البارّ بقوةٍ محضة وتقنيةٍ صارمة.
Verse 9
ततो युधिषछिरो राजा कौरव्यस्य महात्मन: । नाराचं प्रेषयामास क्रुद्ध आशीविषोपमम्
قال سانجيا: عندئذٍ إنّ الملك يودهيشثيرا، وقد استبدّ به الغضب، أطلق سهماً من نوع «ناراجا» نحو ذلك الكوروفي العظيم النفس، كأنما هو هجوم يشبه حيّةً سامة.
Verse 10
तब क्रोधमें भरे हुए राजा युधिष्ठिरने कुरुवंशी महात्मा भीष्मपर विषधर सर्पके समान नाराचका प्रहार किया ।। असप्प्राप्तं ततस्तं तु क्षुरप्रेण महारथ: । चिच्छेद समरे राजन् भीष्मस्तस्य धनुश्ष्युतम्,राजन! परंतु महारथी भीष्मने युधिष्ठिरके धनुषसे छूटे हुए उस नाराचको अपने पास पहुँचनेसे पहले ही समरभूमिमें एक क्षुरप्रद्वारा काट गिराया
قال سانجيا: حينئذٍ إنّ الملك يودهيشثيرا، وقد امتلأ غضباً، قذف نحو بهيشما—العظيم النفس، سيّد الكورو—سهماً من نوع «ناراجا» كأنه حيّةٌ حاملة للسم. غير أنّ بهيشما، أيها الملك، وهو المقاتل العظيم على العربة، قطع ذلك السهم في ساحة القتال قبل أن يبلغَه، بسهمٍ ذي نصلٍ حادّ كالموسى.
Verse 11
त॑ तु छित्त्वा रणे भीष्मो नाराचं कालसम्मितम् | निजघ्ने कौरवेन्द्रस्य हयान् काड्चनभूषणान्,इस प्रकार रणभूमिमें कालके समान भयंकर उस नाराचको काटकर भीष्मने कौरवराज युधिष्ठिरके सुवर्णाभूषणोंसे युक्त घोड़ोंको मार डाला
قال سانجيا: وفي خضمّ القتال قطع بهيشما ذلك السهم—المروّع كالموت نفسه—ثم ضرب فقتل خيول ملك الكورو (يودهيشثيرا)، وكانت مزدانة بحُليّ من ذهب.
Verse 12
(हताश्वे तु रथे तिष्ठन् शक्ति चिक्षेप धर्मराट् । तामापतन्ती सहसा कालपाशोपमां शिताम् ।। चिच्छेद समरे भीष्म: शरै: संनतपर्वभि: ।।) घोड़ोंके मारे जानेपर भी उसी रथमें खड़े हुए धर्मराज युधिष्ठिरने भीष्मपर शक्ति चलायी। कालपाशके समान तीखी एवं भयंकर उस शक्तिको सहसा अपनी ओर आती देख भीष्मने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उसे रणभूमिमें काट गिराया। हताश्चृं तु रथं त्यक्त्वा धर्मपुत्रो युधिष्ठिर: । आरुरोह रथं तूर्ण नकुलस्य महात्मन:,तदनन्तर जिसके घोड़े मारे गये थे, उस रथको त्यागकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर तुरंत ही महामना नकुलके रथपर आरूढ़ हो गये
ولمّا قُتلت خيوله، ظلّ الملك يودهيشثيرا ثابتاً على عربته ورمى على بهيشما رمحاً (śakti). فلمّا رأى بهيشما ذلك السلاح—حادّاً مروّعاً كحبل الموت—ينقضّ عليه بغتةً، قطعه في ساحة القتال بسهامٍ معقوفة المفاصل. ثم ترك يودهيشثيرا، ابن الدharma، العربة التي قُتلت خيولها، واعتلى سريعاً عربة ناكولا النبيل.
Verse 13
यमावपि हि संक्रुद्ध: समासाद्य रणे तदा | शरै: संछादयामास भीष्म: परपुरंजय:,उस समय रणक्षेत्रमें नकुल और सहदेवको पाकर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले भीष्मने अत्यन्त कुपित हो उन्हें बाणोंसे आच्छादित कर दिया
قال سانجيا: ثم في خضمّ المعركة، استشاط بهيشما—قاهر حصون الأعداء—غضباً، ولما دنا من التوأمين ناكولا وسهاديفا غمرهما بوابلٍ من السهام.
Verse 14
तौ तु दृष्टवा महाराज भीष्मबाणप्रपीडितौ । जगाम परमां चिन्तां भीष्मस्य वधकाडुक्षया,महाराज! नकुल और सहदेवको भीष्मके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित देख युधिष्ठिर अपने मनमें भीष्मके वधकी इच्छा लेकर गहन विचार करने लगे
قال سانجيا: أيها الملك، لما رأى يودهيشثيرا ناكولا وسهاديفا وقد أنهكتهما سهام بهيشما إعياءً شديدًا، استولى عليه قلقٌ عميق؛ وبنزوعٍ إلى إسقاط بهيشما، أخذ يتدبّر الأمر تدبيرًا بالغًا.
Verse 15
ततो युधिष्छिरो वश्यान् राज्ञस्तानू समचोदयत् । भीष्मं शान्तनवं सर्वे निहतेति सुहृदूगणान्,तदनन्तर युधिष्ठटिरने अपने वशवर्ती नरेशों तथा सुहृद्गणोंको यह आदेश दिया कि सब लोग मिलकर शान्तनुनन्दन भीष्मको मार डालो
ثم حثّ يودهيشثيرا الملوك الخاضعين لأمره، وأوصى خاصته من الموالين قائلاً: «اجتمعوا كلكم معًا—واضربوا بهيشما، ابن شانتانو، حتى يسقط!»
Verse 16
ततस्ते पार्थिवा: सर्वे श्र॒ुत्वा पार्थस्य भाषितम् । महता रथवंशेन परिवद्रु: पितामहम्,तब कुन्तीपुत्र युधिष्ठिका यह कथन सुनकर समस्त राजाओंने विशाल रथसमूहके द्वारा पितामह भीष्मको चारों ओरसे घेर लिया
قال سانجيا: عندئذٍ، لما سمع أولئك الملوك كلام بارثا، أحاطوا بالجدّ بهيشما من كل جانب بصفوفٍ عظيمة من المركبات الحربية.
Verse 17
स समन्तात् परिवृत: पिता देवव्रतस्तव । चिक्रीड धनुषा राजन् पातयानो महारथान्,राजन्! सब ओरसे घिरे हुए आपके ताऊ देवव्रत सब महारथियोंको धराशायी करते हुए अपने धनुषके द्वारा क्रीड़ा करने लगे
قال سانجيا: يا ملك، وقد أُحيط جدّك ديفافراتا (بهیشما) من كل جانب، أخذ «يلاعب» قوسه، وهو يُسقط كبار فرسان المركبات صرعى.
Verse 18
त॑ चरन्तं रणे पार्था ददृशु: कौरवं युधि । मृगमध्यं प्रविश्येव यथा सिंहशिशुं वने,जैसे सिंहका बच्चा वनके भीतर मृगोंके झुंडमें घुसकर खेल कर रहा हो, उसी प्रकार कुन्तीकुमारोंने युद्धमें विचरते हुए कुरुवंशी भीष्मको वहाँ देखा
قال سانجيا: لقد رأى أبناء بريثا بهيشما من سلالة الكورو يجول في غمار القتال. كان كأنه شبلُ أسدٍ يدخل إلى وسط قطيعٍ من الظباء في الغابة—لا يهاب ولا يضطرب—وهكذا رآه الباندافا يطوف في ساحة الحرب.
Verse 19
तर्जयानं रणे वीरांस्त्रासयानं च सायकै: । दृष्टवा त्रेसुर्महाराज सिंहं मृगगणा इव,महाराज! वे रणभूमिमें वीरोंको डाँटते और बाणोंके द्वारा उन्हें त्रास देते थे। जैसे मृगोंके समूह सिंहको देखकर डर जाते हैं, उसी प्रकार सब राजा भीष्मको देखकर भयभीत हो गये
قال سنجيا: أيها الملك، إذ كان يوبّخ الأبطال في ساحة القتال ويُرهبهم بسهامه، فإن الملوك لما رأوه استولى عليهم الخوف—كما ترتعد قطعان الظباء عند رؤية الأسد.
Verse 20
रणे भारतसिंहस्य ददृशु: क्षत्रिया गतिम् । अग्नेर्वायुसहायस्य यथा कक्ष॑ दिधक्षत:,जैसे वायुकी सहायतासे घास-फूसको जलानेकी इच्छावाली अग्नि अत्यन्त प्रज्वलित हो उठती है, उसी प्रकार भरतवंशके सिंह भीष्मके स्वरूपको रफणक्षेत्रमें क्षत्रियोंने अत्यन्त तेजस्वी देखा
وفي ساحة القتال رأى الكشاتريا سَيرَ «أسدِ آلِ بهاراتا» بهيشما، متألقًا أشدّ التألق—كالنار يعينها الريح فتشتعل لتلتهم الحشيش والهشيم.
Verse 21
शिरांसि रथिनां भीष्म: पातयामास संयुगे । तालेभ्य: परिपक्वानि फलानि कुशलो नर:,भीष्म उस युद्धस्थलमें रथियोंके मस्तक काट-काटकर उसी प्रकार गिराने लगे, जैसे कोई कुशल मनुष्य ताड़के वृक्षोंसे पके हुए फलोंको गिरा रहा हो
قال سنجيا: في خضمّ القتال كان بهيشما يواصل إسقاط رؤوس فرسان العربات، فتتهاوى تباعًا—كما يُسقط رجلٌ ماهرٌ الثمارَ الناضجة من نخيلٍ باسق.
Verse 22
पतद्धिश्न महाराज शिरोभिर्धरणीतले । बभूव तुमुल: शब्द: पततामश्मनामिव,महाराज! भूतलपर पटापट गिरते हुए मस्तकोंका आकाशसे पृथ्वीपर पड़नेवाले पत्थरोंके समान भयंकर शब्द हो रहा था
قال سنجيا: أيها الملك العظيم، حين كانت الرؤوس تهوي على وجه الأرض ارتفع دويٌّ هائل—كقعقعة الحجارة إذا سقطت وارتطمت. وهكذا دوّى ميدان القتال بصوتٍ مرعبٍ متتابع.
Verse 23
तस्मिन् सुतुमुले युद्धे वर्तमाने भयानके । सर्वेषामेव सैन्यानामासीद् व्यतिकरो महान्,उस भयानक तुमुल युद्धके होते समय सभी सेनाओंका आपसमें भारी संघर्ष हो गया
قال سنجيا: وبينما كانت تلك المعركة الرهيبة، العاصفة الصاخبة، دائرةً على أشدّها، وقع اختلاطٌ عظيمٌ وصدامٌ جسيمٌ بين جميع الجيوش، إذ تكسّرت الصفوف واندفع المقاتلون بعضهم في بعض وسط الفوضى.
Verse 24
भिन्नेषु तेषु व्यूहेषु क्षत्रिया इतरेतरम् । एकमेकं समाहूय युद्धायैवावतस्थिरे,उन सबका व्यूह भंग हो जानेपर भी सम्पूर्ण क्षत्रिय परस्पर एक-एकको ललकारते हुए युद्धके लिये डटे ही रहे
قال سنجيا: مع أنّ صفوفهم القتالية قد تكسّرت وتبعثرت، لم يتراجع محاربو الكشترية. كانوا يتحدّى بعضهم بعضًا واحدًا واحدًا، ويثبتون في مواقعهم، عازمين على القتال وحده.
Verse 25
शिखण्डी तु समासाद्य भरतानां पितामहम् | अभिदुद्राव वेगेन तिष्ठ तिछेति चाब्रवीत्,शिखण्डी भरतवंशके पितामह भीष्मके पास पहुँचकर उनकी ओर बड़े वेगसे दौड़ा और बोला--'खड़ा रह, खड़ा रह”
قال سنجيا: ثم إنّ شيخَنْدي، وقد دنا من بهيشما—جدّ آل بهاراتا—اندفع نحوه بأقصى سرعة وصاح: «اثبت! اثبت!»
Verse 26
अनादृत्य ततो भीष्मस्तं शिखण्डिनमाहवे । प्रययौ सूंजयान क्रुद्धः स्त्रीत्वं चिन्त्य शिखण्डिन:,किंतु भीष्मने शिखण्डीके स्त्रीत्वका चिन्तन करके युद्धमें उसकी अवहेलना कर दी और सूंजयवंशी क्षत्रियोंपर क्रोधपूर्वक आक्रमण किया
قال سنجيا: غير أنّ بهيشما، في ساحة القتال، أعرض عن شيخَنْدين—إذ تذكّر أنوثته—ثم تقدّم غاضبًا وهاجم محاربي السِّرِنْجَيا.
Verse 27
सृंजयास्तु ततो दृष्ट्वा हृष्टं भीष्मं महारणे । सिंहनादांश्व विविधांश्वक्रु: शड्खविमिश्रितान्,तब सूंजयगण उस महायुद्धमें हर्ष और उत्साहसे भरे हुए भीष्मको देखकर शंखध्वनिके साथ नाना प्रकारसे सिंहनाद करने लगे
قال سنجيا: ثم إنّ السِّرِنْجَيا، إذ رأوا بهيشما مبتهجًا في تلك المعركة العظمى، أطلقوا شتّى زئيراتٍ كالأسود، ممزوجةً بدويّ الأبواق الصدفية.
Verse 28
ततः प्रववृते युद्ध व्यतिषक्तरथद्विपम् | पश्चिमां दिशमासाद्य स्थिते सवितरि प्रभो,प्रभो! जब सूर्य पश्चिम दिशामें ढलने लगे, उस समय युद्धका रूप और भी भयंकर हो गया। रथ-से-रथ और हाथी-से-हाथी भिड़ गये
قال سنجيا: ثم اندفعت المعركة من جديد؛ فاشتَبكت العجلات بالعجلات، وتداخلت الفيلة بالفيلة. وحين بلغَت الشمسُ جهةَ الغرب وبدأت تميل إلى الغروب، يا مولاي، ازداد القتال هولًا وشدّة.
Verse 29
धृष्टद्युम्नो5थ पाज्चाल्य: सात्यकिश्न महारथ: । पीडयन्तौ भृशं सैन्यं शक्तितोमरवृष्टिभि:,पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्मन तथा महारथी सात्यकि--ये दोनों शक्ति और तोमरोंकी वर्षसे कौरव-सेनाको अत्यन्त पीड़ा देने लगे
قال سنجيا: ثم إن دْهْرِشْتَدْيُومْنَ، أمير البانچالا، ومعه ساتْيَكِي، ذلك المحارب العظيم على العربة، شرعا يرهقان جيش الكورافا إرهاقًا شديدًا، يمطرانه بوابلٍ من الرماح والمزاريق. وفي المناخ الأخلاقي للحرب تبدو بسالتهما واجبًا قتاليًا منضبطًا—قوة تُستعمل بقصدٍ مركز وسط الصراع الأكبر على النظام الحقّ.
Verse 30
शस्त्रैश्न बहुभी राजन् जध्नतुस्तावकान् रणे । ते हन्यमाना: समरे तावका भरतर्षभ,राजन! उन दोनोंने युद्धमें अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा आपके सैनिकोंका संहार करना आरम्भ किया। भरतश्रेष्ठ) उनके द्वारा समरमें मारे जाते हुए आपके सैनिक युद्धविषयक श्रेष्ठ बुद्धिका सहारा लेकर ही संग्राम छोड़कर भाग नहीं रहे थे। आपके योद्धा भी रफक्षेत्रमें पूर्ण उत्ताहके साथ शत्रुओंका संहार करते थे
قال سنجيا: أيها الملك، وبشتى أصناف السلاح شرع هذان في قطع جنودك وإسقاطهم في المعركة. ومع ذلك، حتى وهم يُقتلون في القتال، لم يترك محاربوك—يا ثور آل بهاراتا—ساحة الوغى ولم يفرّوا؛ بل اعتمدوا على أصفى حكمةٍ حربيةٍ وانضباطٍ راسخ فثبتوا. ومحاربوك أيضًا، بحماسةٍ تامة في الميدان، كانوا يصرعون العدو.
Verse 31
आर्या युद्धे मतिं कृत्वा न त्यजन्ति सम संयुगम् यथोत्साहं तु समरे निजघ्नुस्तावका रणे,राजन! उन दोनोंने युद्धमें अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा आपके सैनिकोंका संहार करना आरम्भ किया। भरतश्रेष्ठ) उनके द्वारा समरमें मारे जाते हुए आपके सैनिक युद्धविषयक श्रेष्ठ बुद्धिका सहारा लेकर ही संग्राम छोड़कर भाग नहीं रहे थे। आपके योद्धा भी रफक्षेत्रमें पूर्ण उत्ताहके साथ शत्रुओंका संहार करते थे
قال سنجيا: «إن المحاربين النبلاء، إذا عقدوا عزمهم على القتال، لا يتركون النزال المتكافئ. غير أنّه، أيها الملك، في تلك المعركة كان رجالُك يُضرَبون ويُصرَعون في الميدان على قدر حماسة المهاجمين الكاملة. ومع أنهم كانوا يسقطون، لم يفرّ جنودك من القتال؛ بل اعتمدوا على أصفى تقديرٍ حربيٍّ مُدرَّب فثبتوا، بينما كان أبطالُك أيضًا، بغيرةٍ تامة في ساحة الوغى، يواصلون قتل العدو.»
Verse 32
तत्राक्रन्दो महानासीत् तावकानां महात्मनाम् | वध्यतां समरे राजन् पार्षतेन महात्मना,राजन! महामना धृष्टद्युम्न समरांगणमें जब आपके योद्धाओंका वध कर रहे थे, उस समय उन महामनस्वी वीरोंका आर्तक्रन्दन बड़े जोरसे सुनायी देता था
قال سنجيا: «هناك، أيها الملك، ارتفع صراخٌ عظيمٌ من اللوعة بين محاربيك ذوي النفوس السامية، إذ كانوا يُقتلون في المعركة على يد ابن بْرِشَتَ (دْهْرِشْتَدْيُومْنَ) العظيم النفس.»
Verse 33
त॑ श्रुत्वा निनदं घोरं तावकानां महारथौ | विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पार्षतं प्रत्युपस्थितौ,आपके सैनिकोंका वह घोर आर्तनाद सुनकर अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्द धृष्टद्यम्मनका सामना करनेके लिये उपस्थित हुए
قال سنجيا: لما سمعا ذلك الزئير المروّع من النواح بين جنودك، تقدّم المحاربان العظيمان على العربة—وِندَا وأَنُوْوِندَا، أميرا أَوَنْتِي—ليواجها ابن بْرِشَتَ (دْهْرِشْتَدْيُومْنَ). ويُبرز هذا المشهد كيف أنّ نخبة المحاربين، وسط الفوضى الأخلاقية للحرب، تستجيب لصرخات أهلها بالتقدّم إلى قتالٍ مباشر، مدفوعةً بالولاء وواجب الفروسية.
Verse 34
तौ तस्य तुरगान् हत्वा त्वरमाणौ महारथौ । छादयामासतुरुभौ शरवर्षेण पार्षतम्
قال سانجيا: إنَّ هذين الفارسين العظيمين على العربة، السريعين في الاندفاع، لما قتلا خيوله، غمرا بارشاتا (Pārṣata) بوابلٍ من السهام، يضغطان الهجوم في زخم المعركة القاسي.
Verse 35
उन दोनों महारथियोंने बड़ी उतावलीके साथ धृष्टद्युम्नके घोड़ोंको मारकर उन्हें भी अपने बाणोंकी वर्षासे ढक दिया ।। अवलप्लुत्याथ पाज्चाल्यो रथात् तूर्ण महाबल: । आरुरोह रथं तूर्ण सात्यकेस्तु महात्मन:,तब महाबली धृष्टद्युम्न तुरंत ही अपने रथसे कूदकर महामना सात्यकिके रथपर शीघ्रतापूर्वक चढ़ गये
قال سانجيا: إنَّ المحاربين العظيمين على العربة، وقد أسرعا غاية الإسراع، قتلا خيول دِهْرِشْتَدْيُومْنَ (Dhrishtadyumna) ثم غمراه بوابلٍ كثيف من السهام. فلما رأى ابنُ بانشالا (Pañcāla) القوي أن عربته قد عُطِّلت، قفز حالاً وصعد سريعاً إلى عربة ساتياكي (Satyaki) ذي النفس السامية.
Verse 36
ततो युधिष्ठिरो राजा महत्या सेनया वृतः । आवन्त्यौ समरे क्रुद्धावभ्ययात् स परंतपौ,तदनन्तर विशाल सेनासे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरने शत्रुओंको तपानेवाले और क्रोधमें भरे हुए विन्द-अनुविन्दपर आक्रमण किया
ثم إن الملك يودهيشثيرا (Yudhiṣṭhira)، وقد أحاطت به جموعٌ عظيمة، تقدّم في ساحة القتال نحو أميري أفانتي (Avanti) — فيندا (Vindā) وأنوفيندا (Anuvindā) — وهما ممتلئان غضباً، مشهوران بإيلام الأعداء وإتعابهم.
Verse 37
तथैव तव पुत्रो5पि सर्वोद्योगेन मारिष । विन्दानुविन्दौ समरे परिवार्यावतस्थिवान्,आर्य! इसी प्रकार आपका पुत्र दुर्योधन भी सम्पूर्ण उद्योगसे समरभूमिमें विन्द और अनुविन्दकी रक्षाके लिये उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़ा हो गया
قال سانجيا: «وكذلك ابنُك أيضاً، أيها السيد الجليل، وقد بذل غاية الجهد، ثبت في ساحة القتال مُحيطاً بفيندا (Vindā) وأنوفيندا (Anuvindā) من كل جانب، عازماً على حمايتهما.»
Verse 38
अर्जुनश्वापि संक्रुद्धः क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभ: । अयोधयत संग्रामे वज़्रपाणिरिवासुरान्,क्षत्रियशिरोमणि अर्जुन भी अत्यन्त कुपित होकर क्षत्रियोंके साथ संग्रामभूमिमें उसी प्रकार युद्ध करने लगे, जैसे वज्रधारी इन्द्र असुरोंके साथ करते हैं
قال سانجيا: وأرجونا (Arjuna) أيضاً، وقد اشتعل بغضبٍ مُحقّ، ذلك الثور بين الكشاتريا، قاتل محاربي الكشاتريا في ساحة الوغى، كما يقاتل إندرا (Indra) حامل الصاعقة (vajra) جموعَ الأسورا (asura).
Verse 39
द्रोणस्तु समरे क्रुद्धः पुत्रस्य प्रियकृत् तव । व्यधमत् सर्वपज्चालांस्तूलराशिमिवानल:,आपके पुत्रका प्रिय करनेवाले द्रोणाचार्य भी युद्धमें कुपित होकर समस्त पांचालोंका विनाश करने लगे, मानो आग रूईके ढेरको जला रही हो
قال سانجيا: إنّ درونا، وقد استبدّ به الغضب في خِضَمّ المعركة، وقاصدًا أن يفعل ما يُرضي ابنَك، شرع يسحق جيشَ البانچالا بأسره—كما تلتهم النارُ كومةَ القطن.
Verse 40
दुर्योधनपुरोगास्तु पुत्रास्तव विशाम्पते । परिवार्य रणे भीष्म युयुधु: पाण्डवै: सह,प्रजानाथ! आपके दुर्योधन आदि पुत्र रणक्षेत्रमें भीष्मको घेरकर पाण्डवोंके साथ युद्ध करने लगे
قال سانجيا: يا سيّدَ الرعيّة، إنّ أبناءك—يتقدّمهم دوريودھانا—أحاطوا ببهِيشما في ساحة القتال، واشتبكوا مع الباندافا في المعركة.
Verse 41
ततो दुर्योधनो राजा लोहितायति भास्करे । अब्रवीत् तावकान् सर्वास्त्वरध्वमिति भारत,भारत! तदनन्तर जब सूर्यदेवपर संध्याकी लाली छाने लगी, तब राजा दुर्योधनने आपके सभी योद्धाओंसे कहा--जल्दी करो
ثمّ لما أخذت الشمس تحمرّ وهي تميل إلى الشفق، خاطب الملك دوريودھانا جميعَ محاربي جانبك قائلاً: «أسرِعوا، يا بهاراتا».
Verse 42
युध्यतां तु तथा तेषां कुर्वतां कर्म दुष्करम् । अस्तं गिरिमथारूढे अप्रकाशति भास्करे,फिर तो वे सब योद्धा वेगसे युद्ध करते हुए दुष्कर पराक्रम प्रकट करने लगे। उसी समय सूर्य अस्ताचलको चले गये और उनका प्रकाश लुप्त हो गया। इस प्रकार संध्या होते- होते क्षणभरमें रक्तके प्रवाहसे परिपूर्ण भयानक नदी बह चली और उसके तटपर गीदड़ोंकी भीड़ जमा हो गयी
قال سانجيا: وبينما كان أولئك المحاربون يقاتلون على تلك الحال، مُظهرين مآثرَ من بأسٍ عسير، صعدت الشمسُ جبلَ المغيب وكفّت عن الإشعاع. ومع انحسار ضوء النهار وإقبال المساء، ازداد رعبُ ساحة القتال عمقًا—فأخذ الدم يجري كأنه نهرٌ مهيب، وعلى ضفافه تجمّعت جماعاتُ بناتِ آوى، تستدرجها المذبحة.
Verse 43
प्रावर्तत नदी घोरा शोणितौघतरड्रिणी । गोमायुगणसंकीर्णा क्षणेन क्षणदामुखे,फिर तो वे सब योद्धा वेगसे युद्ध करते हुए दुष्कर पराक्रम प्रकट करने लगे। उसी समय सूर्य अस्ताचलको चले गये और उनका प्रकाश लुप्त हो गया। इस प्रकार संध्या होते- होते क्षणभरमें रक्तके प्रवाहसे परिपूर्ण भयानक नदी बह चली और उसके तटपर गीदड़ोंकी भीड़ जमा हो गयी
قال سانجيا: وفي لحظةٍ واحدة اندفع نهرٌ مروّع—سيلُه من الدم—يزأر ويجتاح طريقه. وعلى ضفافه تجمّعت جماعاتُ بناتِ آوى، تستدرجها المذبحة.
Verse 44
शिवाभिरशिवाभ्ि श्व रुवद्धिरभैरवं रवम् । घोरमायोधन जज्ञे भूतसंघै: समाकुलम्,भैरव रव फैलानेवाली अमंगलमयी सियारिनों तथा भूतगणोंसे व्याप्त होकर वह युद्धका मैदान अत्यन्त भयानक हो गया
قال سنجيا: امتلأ ميدان القتال بقطعان بنات آوى—وهي نُذُر شؤم—وبجماعات من الأرواح، فغدا ساحةً مروِّعةً تَدوّي فيها صرخاتٌ مخيفةٌ ذات طالعٍ نحس. ويُنبئ هذا المشهد بأن ظلمةً أخلاقيةً تهبط على المعركة: فالحربُ التي تُساق بالأدهرما والغضب تُصاحبها علاماتٌ مشؤومة تُنذر بالخراب والعذاب.
Verse 45
राक्षसाश्ष पिशाचाश्न तथान्ये पिशिताशिन: । समन्ततो व्यदृश्यन्त शतशो5थ सहस्रश:,चारों ओर राक्षस, पिशाच तथा अन्य मांसाहारी जन्तु सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें दिखायी देने लगे
قال سنجيا: «في كل ناحية بدأت تظهر الرّاكشاسات والبيشاشات، وسائر الكائنات الآكلة للّحم—مئاتٍ ثم آلافًا». وتدلّ هذه الرؤيا على انحدار الحرب إلى جوٍّ مرعبٍ مشوبٍ بالأدهرما، حيث يبدو العنف كأنه يستدعي قوىً ونُذُرًا مشؤومة.
Verse 46
अर्जुनो5थ सुभशर्मादीन् राज्ञस्तान् सपदानुगान् | विजित्य पृतनामध्ये ययौ स्वशिबिरं प्रति
قال سنجيا: ثم إن أرجونا، بعدما غلب أولئك الملوك ابتداءً بسوبهاشارمان مع أتباعهم في قلب ساحة القتال، انصرف من وسط الصفوف المتلاحمة وعاد قاصدًا معسكره.
Verse 47
तदनन्तर अर्जुन राजा दुर्योधनके पीछे चलनेवाले सुशर्मा आदिको सेनामें पराजित करके अपने शिविरको चले गये ।। युधिष्ठिरो5पि कौरव्यो भ्रातृभ्यां सहितस्तथा । ययौ स्वशिबिरं राजा निशायां सेनया वृत:,तथा सेनासे घिरे हुए कुरुकुलनन्दन राजा युधिष्ठिर भी दोनों भाई नकुल-सहदेवके साथ रातमें अपने शिविरमें पधारे
قال سنجيا: بعد ذلك عاد الملك أرجونا إلى معسكره، بعدما هزم في القتال سوشارما ومن معه ممن كانوا يتبعون دوريوذانا. وكذلك الملك يودهيشثيرا، أمير آل كورو، إذ مضى ليلًا إلى معسكره مع أخويه ناكولا وسهاديفا، تحيط به قواته من كل جانب.
Verse 48
भीमसेनो<पि राजेन्द्र दुर्योधनमुखान् रथान् । अवजित्य तत: संख्ये ययौ स्वशिबिरं प्रति,राजेन्द्र! तब भीमसेन भी दुर्योधन आदि रथियोंको युद्धमें जीतकर अपने शिविरको लौट गये
قال سنجيا: أيها الملك، إن بهيماسينا أيضًا، بعدما قهر في القتال فرسان المركبات يتقدمهم دوريوذانا، انصرف من ساحة المعركة وعاد إلى معسكره.
Verse 49
दुर्योधनो5पि नृपति: परिवार्य महारणे । भीष्म॑ शान्तनवं तूर्ण प्रयात: शिबिरं प्रति,राजा दुर्योधन भी महायुद्धमें शान्तनुनन्दन भीष्मको घेरकर तुरंत ही अपने शिविरको लौट गया
قال سانجيا: إنّ الملك دوريودhana أيضًا، بعدما أحاط ببهِيشما—ابن شانتانو—في خضمّ المعركة العظمى، انسحب سريعًا وعاد متجهًا إلى معسكره.
Verse 50
दोणो द्रौणि: कृप: शल्य: कृतवर्मा च सात्वत: । परिवार्य चमूं सर्वा प्रययु: शिबिरं प्रति,द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, शल्य तथा यदुवंशी कृतवर्मा--ये सारी सेनाको घेरकर अपने शिविरकी ओर चल दिये
قال سانجيا: إنّ درونا، وابنه أشوَتثاما، وكريبا، وشاليا، وكريتافَرما من سلالة الساتفَتا، بعدما أقاموا طوقًا واقيًا حول الجيش كلّه، انطلقوا متجهين إلى معسكرهم.
Verse 51
तथैव सात्यकी राजन धृष्टय्रुम्नश्न पार्षत: । परिवार्य रणे योधान् ययतु: शिबिरं प्रति,राजन! इसी प्रकार सात्यकि और ट्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न भी युद्धमें अपने योद्धाओंको घेरकर शिविरकी ओर प्रस्थित हुए
قال سانجيا: «وكذلك، أيها الملك، فإن ساتياكي ودهريشتاديومنَة، ابن بارشَتا (دروبادا)، بعدما أحاطا بمحاربيهما في ساحة القتال، انطلقا نحو المعسكر.»
Verse 52
एवमेते महाराज तावका: पाण्डवै: सह । पर्यवर्तन्त सहिता निशाकाले परंतप,शत्रुओंको संताप देनेवाले महाराज! इस प्रकार रातके समय आपके योद्धा पाण्डवोंके साथ अपने-अपने शिविरमें लौट आये
قال سانجيا: «أيها الملك العظيم، يا مُحْرِقَ الأعداء، هكذا في جوف الليل، إنّ محاربيك، بعدما لاقَوا الباندافا، انسحبوا مجتمعين وعاد كلٌّ إلى معسكره.»
Verse 53
ततः स्वशिबिरं गत्वा पाण्डवा: कुरवस्तथा । न्यवसन्त महाराज पूजयन्त: परस्परम्,महाराज! तत्पश्चात् पाण्डव तथा कौरव अपने शिविरमें जाकर आपसमें एक-दूसरेकी प्रशंसा करते हुए विश्राम करने लगे
قال سانجيا: ثم إنّ الباندافا والكرُو كذلك، يا ملك، لما بلغوا معسكراتهم، آوَوا إلى الراحة وهم يتبادلون الثناء والتكريم فيما بينهم.
Verse 54
रक्षां कृत्वा ततः शूरान्यस्य गुल्मान् यथाविधि । अपनीय च शल्यानि स्नात्वा च विविधैर्जलै:,तदनन्तर उभय पक्षके शूरवीरोंने सब ओर सैनिक गुल्मोंको- नियुक्त करके विधिपूर्वक अपने-अपने शिविरोंकी रक्षाकी व्यवस्था की। फिर अपने शरीरसे बाणोंको निकालकर भाँति-भाँतिके जलसे स्नान करके स्वस्तिवाचन करानेके अनन्तर बन्दीजनोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए वे सभी यशस्वी वीर गीत और वाद्योंके शब्दोंसे क्रीड़ा-विनोद करने लगे
قال سنجيا: ثم إنهم، بعد أن رتّبوا على الوجه اللائق حماية معسكراتهم، فنصبوا الشجعان في مفارز عسكرية من كل جانب، نزعوا السهام المغروسة في أجسادهم واغتسلوا بمياه شتّى. وبعد أن تُليت طقوس التفاؤل والبركات لسلامتهم، أخذ أولئك الأبطال ذوو الصيت—وهم يصغون إلى المدّاحين ينشدون ثناءهم—يمضون الوقت في لهوٍ واستجمام بين الغناء ورنين الآلات.
Verse 55
कृतस्वस्त्ययना: सर्वे संस्तूयन्तश्न वन्दिभि: । गीतवादित्रशब्देन व्यक्रीडन्त यशस्विन:,तदनन्तर उभय पक्षके शूरवीरोंने सब ओर सैनिक गुल्मोंको- नियुक्त करके विधिपूर्वक अपने-अपने शिविरोंकी रक्षाकी व्यवस्था की। फिर अपने शरीरसे बाणोंको निकालकर भाँति-भाँतिके जलसे स्नान करके स्वस्तिवाचन करानेके अनन्तर बन्दीजनोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए वे सभी यशस्वी वीर गीत और वाद्योंके शब्दोंसे क्रीड़ा-विनोद करने लगे
قال سنجيا: لما أُقيمت للجميع على وجهها طقوسُ اليُمن والبركات، وبينما كان المدّاحون ينشدون ثناءهم، أقبل أولئك المحاربون ذوو الصيت على الترويح عن النفس وسط أصوات الغناء ورنين الآلات. ويُبرز هذا المشهد إيقاعًا لافتًا لمعسكر الحرب: فحتى عشية العنف تعود المعسكرات إلى نظام الطقوس، وإلى الشرف المعلن، وإلى متعةٍ مضبوطة بميزان الدارما.
Verse 56
मुहूर्तादिव तत् सर्वमभवत् स्वर्गसंनिभम् । न हि युद्धकथां कांचित् तत्राकुर्वन् महारथा:,दो घड़ीतक वहाँका सब कुछ स्वर्गसदृश जान पड़ा। उस समय वहाँ महारथियोंने युद्धकी कोई बातचीत नहीं की
قال سنجيا: «وفي برهةٍ يسيرة بدا كلّ ما هناك كأنه السماء نفسها. وفي ذلك الحين لم يتحدث أصحاب المركبات العظام في شيءٍ من حديث الحرب.»
Verse 57
ते प्रसुप्ते बले तत्र परिश्रान्तजने नृप । हस्त्यश्वबहुले रात्रौ प्रेक्षणीये बभूवतु:,नरेश्वर! जिनमें हाथी और घोड़ोंकी अधिकता थी, उन दोनों पक्षकी सेनाओंमें सब लोग परिश्रमसे चूर-चूर हो रहे थे। रातके समय जब दोनों सेनाएँ सो गयीं, उस समय वे देखनेयोग्य हो गयीं
قال سنجيا: «يا أيها الملك! في الجيشين كليهما، حيث كثرت الفيلة والخيول، كان الناس جميعًا قد أنهكهم التعب. وفي الليل، حين نام الجيشان، غدا المنظر جديرًا بالمشاهدة.»
Verse 85
इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वरमें सातवें दिनके युद्धरे सम्बन्ध रखनेवाला पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ
قال سنجيا: وهكذا، في المهابهارتا الموقَّرة، ضمن «بهِشما بارفا»—وخاصة في القسم المتعلق بسقوط بهِشما—يُختَتم الفصل الخامس والثمانون، المتصل بأحداث اليوم السابع من الحرب.
Verse 86
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि सप्तमदिवसयुद्धावहारे षडशीतितमो<ध्याय:
وهكذا، في «المهابهارتا» المباركة، ضمن «بارفا بهيشما»، في القسم المتعلّق بسقوط بهيشما، وفي سرد وقائع قتال اليوم السابع، تنتهي هنا الفصل السادس والثمانون. إن هذا الخاتمة التوثيقية تُثبّت موضع الحكاية داخل الإطار الأخلاقي للحرب: حيث يتجلّى القضاء والواجب (الدارما) عبر الحركة المتصاعدة نحو سقوط بهيشما، مع الإشارة إلى تقدّم صراع كوروكشيترا يومًا بعد يوم.
A triage dilemma under simultaneous threats: Yudhiṣṭhira must allocate Bhīma to protect a vulnerable key ally (Ghaṭotkaca) while other fronts remain active, balancing protection, urgency, and limited attention.
Effective leadership is shown as inference-based decision-making: interpreting signals (sound, troop movement), identifying the highest-risk node, and acting quickly to prevent local danger from becoming systemic loss.
No explicit phalaśruti appears in this chapter; its meta-level function is descriptive and diagnostic—illustrating fog-of-war conditions and how dharma is operationalized through protective action and disciplined response.