Mahabharata Adhyaya 28
Ashramavasika ParvaAdhyaya 2876 Verses

Adhyaya 28

अश्रमवासिनां विषादः — Lament in Hastināpura after the Elders’ Forest Withdrawal

Upa-parva: Āśramavāsika-upākhyāna (Forest-Residence Episode: Public and Pāṇḍava Lament)

Vaiśaṃpāyana reports that once the Kuru elder (Dhṛtarāṣṭra) has gone to the forest, the Pāṇḍavas are struck by grief, especially due to their mother’s departure. The townspeople likewise remain in mourning, and Brahmins converse about the king’s condition. The chapter centers on anxious questions: how can an aged, bereaved, blind ruler endure an isolated forest; how will Gāndhārī and Kuntī manage austerity; and what becomes of Vidura and other attendants. The Pāṇḍavas stay briefly in the city but find no satisfaction in kingship, pleasures, or Vedic study, repeatedly recalling catastrophic kin-loss. Specific remembrances include Abhimanyu’s death, Karṇa’s fall, the deaths of the Draupadeyas and other allies, and the sense that the earth has become bereft of heroes and “jewels.” Draupadī and Subhadrā are depicted as subdued. The survival of the lineage is pointedly anchored in the presence of Parikṣit, whose sight sustains the elders’ will to live, linking grief to dynastic continuity.

Chapter Arc: जनमेजय जिज्ञासा से पूछते हैं—जब धृतराष्ट्र, गान्धारी, कुन्ती और पाण्डव वन-आश्रम में रहते थे, तब बान्धव-शोक से दग्ध मनों को शान्ति कैसे मिली और ‘मरे हुओं के दर्शन’ का अद्भुत प्रसंग कैसे घटित हुआ। → आश्रम-मण्डल में शोक की लहर फैलती है—विदुर की सिद्धि/अन्तर्धान का स्मरण, युद्ध में मरे पुत्रों और बान्धवों की याद, और विशेषतः गान्धारी का पुत्र-शोक तथा कुन्ती का मातृ-शोक। व्यास ‘जो आश्चर्य’ होने वाला है, उसका संकेत देकर धृतराष्ट्र के भीतर उठते संशयों को उभारते हैं—क्या मृतक सचमुच दिख सकते हैं, और क्या यह दर्शन शोक को घटाएगा या और बढ़ाएगा? → परमतेजस्वी महर्षि व्यास ‘संशयच्छेदनार्थ’ उपस्थित होकर धृतराष्ट्र को संबोधित करते हैं और युद्ध-समागम की व्यापकता का बोध कराते हैं—‘मेरे पुत्र के लिए अनेक देशों के नरेश आए और सब मृत्यु के वश हुए’; साथ ही दुर्योधन के पापपूर्ण आचरण से पृथ्वी के घातित होने का कठोर सत्य उभरता है। इसी बिन्दु पर ‘मृत-पुत्र-दर्शन’ की तैयारी/प्रतिज्ञा शोक के चरम पर पहुँचाती है। → धृतराष्ट्र कुछ क्षण विचार कर वचन आरम्भ करते हैं—अपने हृदय की दग्धता, पुत्र-शोक, और युद्ध के कारणों पर मनन करते हुए व्यास के आश्वासन से यह स्वीकार करते हैं कि यह समागम/दर्शन शोक-निवारण और संशय-भेदन के लिए है। शोक को अर्थ देने की दिशा बनती है—दोष, दैव और कर्म के त्रिकोण में। → व्यास के संकेतित ‘आश्चर्य’—मृतकों के प्रत्यक्ष दर्शन—का वास्तविक दृश्य अगले प्रसंग में पूर्ण रूप से प्रकट होने को ठहरता है।

Shlokas

Verse 1

अपन बक। ] अति्ऑशाड<ह (पुत्रदर्शनपर्व) एकोनत्रिशो<5 ध्याय: 5300 बान्धवोंके शोकसे दुखी होना तथा गान्धारी और व्यासजीसे अपने मरे हुए पुत्रोंके दर्शन करनेका अनुरोध जनमेजय उवाच वनवासं गते विप्र धृतराष्ट्रे महीपतौ । सभारयें नृपशार्दूल वध्वा कुन्त्या समन्विते

قال جَنَمِجَيَة: «أيها البراهمن، حين انطلق الملك دِهْرِتَرَاشْتْرَة—سيدُ الأرض—إلى سُكنى الغابة، مصحوبًا بزوجته غاندھاري ومنضمةً إليهما كنْتي كنّةُ البيت، فماذا جرى بعد ذلك؟ أخبرني كيف وقع ذلك الحدث العجيب الذي أنبأ به فياسا المتلألئ، إذ قال: “سأُظهر واقعةً مدهشة”—في ذلك الوقت الذي نال فيه فيدورا الكمال الروحي فدخل في شخص دهرماراجا يُدْهِشْتِهيرا، وكان أبناء باندو جميعًا مقيمين في حمى الأشرم.»

Verse 2

विदुरे चापि संसिद्धि धर्मराजं व्यपाश्रिते । वसत्सु पाण्डुपुत्रेषु सर्वेष्वाश्रममण्डले

قال جَنَمِجَيَة: «حين خرج دِهْرِتَرَاشْتْرَة، سيدُ الأرض، إلى سُكنى الغابة مع ملكته غاندھاري وكنّته كنْتي؛ وحين بلغ فيدورا الكمال الروحي فدخل في شخص دهرماراجا يُدْهِشْتِهيرا؛ وحين كان أبناء باندو جميعًا مقيمين في حمى الأشرم—كيف وقع ذلك العجب الذي أنبأ به فياسا المتلألئ قائلاً: “سأُظهر واقعةً مدهشة”؟ فحدّثني به.»

Verse 3

यत्‌ तदाश्चर्यमिति वै करिष्यामीत्युवाच ह । व्यास: परमतेजस्वी महर्षिस्तद्‌ वदस्व मे

قال جاناميجايا: «إن الحكيم الجليل فياسا، المتلألئ بأسمى نور، قد أعلن من قبل: “سأُظهر أمرًا عجيبًا.” فحدّثني، أيها المبجَّل، كيف وقع ذلك الحدث المدهش—في الوقت الذي خرج فيه الملك دِهريتاراشترا، سيدُ الأرض، إلى سكنى الغابة مع زوجته الشرعية غاندھاري وكنّته كونتي؛ وحين نال فيدورا الكمال ودخل جسدَ دارماراجا يودهيشثيرا؛ وحين أقام جميعُ الباندافا داخل حمى الأشرم.»

Verse 4

वनवासे च कौरव्य: कियन्तं कालमच्युत: । युधिष्ठिरो नरपति्यवसत्‌ सजनस्तदा,अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले कुरुवंशी राजा युधिष्ठिर कितने दिनोंतक सब लोगोंके साथ वनमें रहे थे?

وسأل جاناميجايا: «يا سليلَ آلِ كورو، أخبرني: كم لبث الملك يودهيشثيرا—الثابت الذي لا يحيد عن حدود الحق—مقيمًا في الغابة آنذاك مع قومه؟»

Verse 5

किमाहाराश्ष ते तत्र ससैन्या न्यवसन्‌ प्रभो | सान्तःपुरा महात्मान इति तद्‌ ब्रूहि मेडनघ,प्रभो! निष्पाप मुने! सैनिकों और अन्तःपुरकी स्त्रियोंके साथ वे महात्मा पाण्डव क्या आहार करके वहाँ निवास करते थे?

قال جاناميجايا: «يا مولاي، ما الطعام الذي كان يتناوله أولئك العظام من آل باندافا هناك، وهم مقيمون مع جندهم ونساء الحريم؟ أيها الطاهر من الإثم، أخبرني بذلك.»

Verse 6

वैशम्पायन उवाच ते<नुज्ञातास्तदा राजन्‌ कुरुराजेन पाण्डवा: । विविधान्यन्नपानानि विश्राम्यानुभवन्ति ते

قال فايشامبايانا: «أيها الملك، لما نال الباندافا إذ ذاك إذنَ ملكِ كورو، استراحوا هناك وتناولوا ألوانًا شتّى من الطعام والشراب. ويُبرز هذا المشهد لحظةَ ضيافةٍ على سنن الدارما ومصالحةٍ؛ إذ حتى بعد صراعٍ عظيم تُراعى الموافقةُ الواجبة، وضبطُ النفس، ورعايةُ الضيف.»

Verse 7

मासमेकं विजहुस्ते ससैन्यान्तःपुरा वने । अथ तत्रागमद्‌ व्यासो यथोक्त ते मयानघ

قال فايشامبايانا: «أقاموا في الغابة شهرًا كاملًا، ومعهم جندهم ونساء الحريم. ثم، أيها الطاهر، كما أخبرتك، قدم فياسا إلى هناك.»

Verse 8

तथा च तेषां सर्वेषां कथाभिन्‌पसंनिधौ । व्यासमन्वास्यतां राजन्नाजम्मुर्मुन॒यो परे

قال فايشَمبايانا: وبينما كانت تلك الأحاديث جاريةً على مسمعٍ من الجميع، أيها الملك، إذ كانوا جالسين خلف فياسا، قدم إلى ذلك الموضع حكماءُ آخرون أيضًا.

Verse 9

नारद: पर्वतश्चैव देवलश्न महातपा: । विश्वावसुस्तुम्बुरुश्न चित्रसेनश्व भारत,भारत! उनमें नारद, पर्वत, महातपस्वी देवल, विश्वावसु, तुम्बुरु तथा चित्रसेन भी थे

قال فايشَمبايانا: «يا بهاراتا، كان فيهم نارادا وبارفاتا، والناسِك العظيم ديفالا، وكذلك الغندهرفا: فيشفافاسو، وتومبورو، وتشيتراسينا».

Verse 10

तेषामपि यथान्यायं पूजां चक्रे महातपा: । धृतराष्ट्राभ्यनुज्ञात: कुरुराजो युधिष्ठिर:,धृतराष्ट्रकी आज्ञासे महातपस्वी कुरुराज युधिष्ठिरने उन सबकी भी यथोचित पूजा की

قال فايشَمبايانا: وبحسب ما يقتضيه الأدب والشرع، قام يودهيشثيرا—ملك الكورو وصاحب الزهد العظيم—وبعد أن استأذن دريتاراشترا أولًا، فأكرمهم هم أيضًا بما يليق من التعظيم.

Verse 11

निषेदुस्ते ततः सर्वे पूजां प्राप्प युधिष्ठिरात्‌ । आसजनेषु च पुण्येषु बर्हिणेषु वरेषु च,युधिष्ठिससे पूजा ग्रहण करके वे सब-के-सब मोरपंखके बने हुए पवित्र एवं श्रेष्ठ आसनोंपर विराजमान हुए

قال فايشَمبايانا: ثم إنهم جميعًا، بعدما نالوا التكريم من يودهيشثيرا، جلسوا على مقاعد مقدسة رفيعة—مواضع جلوس فاخرة مزينة بريش الطاووس.

Verse 12

तेषु तत्रोपविष्टेषु स तु राजा महामति: । पाण्डुपुत्रै: परिवृतो निषसाद कुरूद्गह,कुरुश्रेष्ठ! उन सबके बैठ जानेपर पाण्डवोंसे घिरे हुए परम बुद्धिमान्‌ राजा धुृतराष्ट्र बैठे

فلما جلسوا جميعًا هناك، جلس الملك دريتاراشترا، ذو الرأي الراجح، محاطًا بأبناء باندو، يا خيرَ الكورو.

Verse 13

गान्धारी चैव कुन्ती च द्रौपदी सात्वती तथा । स्त्रियश्लान्यास्तथान्याभि: सहोपविविशुस्तत:,गान्धारी, कुन्ती, द्रौपदी, सुभद्रा तथा दूसरी स्त्रियाँ अन्य स्त्रियोंके साथ आस-पास ही एक साथ बैठ गयीं

قال فايشامبايانا: إن غاندھاري وكونتي ودراوبدي وساتفاتي (سوبهادرا)، مع سائر النساء، جلسنَ معًا قريبًا من ذلك الموضع.

Verse 14

तेषां तत्र कथा दिव्या धर्मिष्ठा श्ना भवन्‌ नूप । ऋषीणां च पुराणानां देवासुरविमिश्रिता:

قال فايشامبايانا: هناك، فيما بينهم، نشأت أحاديث مقدّسة راسخة في الدارما، أيها الملك. وابتدأت كذلك مناقشات عن الرِّشيّين الأقدمين والتقاليد العتيقة، متشابكةً مع أخبار الآلهة والأسورا.

Verse 15

ततः कथान्ते व्यासस्तं प्रज्ञाचक्षुषमी श्वरम्‌ । प्रोवाच वदतां श्रेष्ठ; पुनरेव स तद्‌ वच:

ثم لما بلغ السردُ ختامه، خاطب فياسا—وهو أبرع المتكلمين—ذلك السيدَ الذي يُبصر بعين الحكمة، وعاد فقال له هذه الكلمات.

Verse 16

विदितं मम राजेन्द्र यत्‌ ते हृदि विवक्षितम्‌

قال فايشامبايانا: «يا خيرَ الملوك، إنّي أعلم سلفًا ما تنوي أن تُفصح عنه في قلبك.»

Verse 17

गान्धार्याश्वैव यद दुःखं हृदि तिष्ठति नित्यदा

قال فايشامبايانا: «وأمّا حزنُ غاندھاري—أيًّا كان الأسى المقيم في قلبها—فإنه يلازمها على الدوام.»

Verse 18

कुन्त्याश्व यन्महाराज द्रौपद्याश्व हृदि स्थितम्‌ “महाराज! गान्धारी, कुन्ती और द्रौपदीके हृदयमें भी जो दुःख सदा बना रहता है, वह भी मुझे ज्ञात है ।। यच्च धारयते तीव्र दु:खं पुत्रविनाशजम्‌

قال فايشَمبايانا: «أيها الملك العظيم، إنّي أعلم الحزن القائم في قلب كونتي، وكذلك في قلب دروبدي—ذلك الأسى الشديد الذي ما زلن يحملنه، الناشئ عن هلاك أبنائهنّ.»

Verse 19

श्रुत्वा समागममिमं सर्वेषां वस्तुतो नूप

قال فايشَمبايانا: «فلما سمع خبر هذا اللقاء الذي جرى بينهم جميعًا على حقيقته، أيها الملك، …»

Verse 20

इमे च देवगन्धर्वा: सर्वे चेमे महर्षय:

قال فايشَمبايانا: «هؤلاء هم الغندرفات الإلهيون، وهنا أيضًا جميع هؤلاء المَهارِشيّين.» ويؤكد السرد أن المشهد تُشاهده وتُقرّه كائنات سامية، مما يضفي على ما يجري ثِقَلًا أخلاقيًا وكونيًا.

Verse 21

तदुच्यतां महाप्राज्ञ कं काम॑ प्रददामि ते

«فقل لي إذن، أيها الحكيم العظيم: أيَّ رغبةٍ لك أهبُها لك؟»

Verse 22

एवमुक्त: स राजेन्द्रो व्यासेनामितबुद्धिना

وهكذا، لما خاطبه فياسا ذو الحكمة التي لا تُحدّ، أصغى ذلك الملكُ الأوّل بين الملوك—متهيئًا لأن يجيب وفق الدارما، ووفق مشورة رِشيٍّ تتجاوز بصيرتُه أحكام الناس المألوفة.

Verse 23

धन्यो>स्म्यनुगृहीतश्व सफलं जीवितं च मे

قال فايشَمبايانا: «طوبى لي؛ لقد نلتُ النعمة، وقد أثمرت حياتي أيضًا.»

Verse 24

अद्य चाप्यवगच्छामि गतिमिष्टामिहात्मन:

«واليوم أيضًا أدرك بوضوح المسار المحبوب والمصير الذي أرتضيه لنفسي هنا.»

Verse 25

दर्शनादेव भवतां पूतो<हं नात्र संशय:

قال فايشَمبايانا: «بمجرد رؤيتكم تطهّرتُ—ولا شك في ذلك.»

Verse 26

किं तु तस्य सुदुर्बुद्धेर्मन्दस्यापनयैर्भूशम्‌

أما ذلك الرجل البليد، ذو الفهم المنحرف غاية الانحراف، فقد ابتُلي ابتلاءً شديدًا بنكباتٍ وإهاناتٍ متتابعة؛ فبدل أن يُقوَّم عقله، ازداد اضطرابًا وحيرة.

Verse 27

अपापा: पाण्डवा येन निकृता: पापबुद्धिना

قال فايشَمبايانا: إن الباندافا—وهم رجال لا إثم عليهم—قد خُدعوا وظُلِموا على يد من كان عقله غارقًا في نيةٍ شريرة.

Verse 28

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्रमवासिकपर्वके अन्तर्गत आश्रमवासपर्वमें व्यासवाक्यविषयक अद्वाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ,राजानश्न महात्मानो नानाजनपदेश्वरा:

وهكذا، في «شري مهابهاراتا»، ضمن «بارفا الإقامة في الأشرم» (Āśramavāsika Parvan)—وخاصة في قسم «الإقامة في الأشرم» (Āśramavāsa)—يُختَتم الفصل الثاني والعشرون المتعلّق بكلمات الحكيم فياسا. وهو يستحضر حضور ملوك عظام النفوس، حكّام أقاليم شتّى، مؤكِّدًا اتساع اللوحة الأخلاقية والسياسية التي تُؤطَّر فيها المشورة والزهد وما بعد الحرب.

Verse 29

ये ते पितृश्च दारांश्व प्राणांक्ष मनसः प्रियान्‌,इति श्रीमहाभारते आश्रमवासिके पर्वणि पुत्रदर्शनपर्वणि धृतराष्ट्रादिकृतप्रार्थने एकोनत्रिंशो5ध्याय:

قال فايشَمبايانا: «أولئك الآباء لكم، وتلك الزوجات، بل حتى الأرواح ذاتها—نعم، كل ما هو عزيز على قلوبكم…» (وهكذا يبدأ في تعداد أحبّ الروابط وأساسيات الحياة، ممهدًا الأرض العاطفية والأخلاقية للدعاء الآتي وللشوق إلى اللقاء/الرؤية من جديد، في سياق الزهد وما بعد الحرب.)

Verse 30

का नु तेषां गतिर्ब्रह्यन्‌ मित्रार्थे ये हता मूृथे

قال فايشَمبايانا: «يا براهمن، أيَّ مصيرٍ يناله أولئك الذين قُتلوا في المعركة من أجل صديق؟»

Verse 31

दूयते मे मनो5भीक्ष्णं घातयित्वा महाबलम्‌

قال فايشَمبايانا: «إن قلبي يُعذَّب مرارًا بالحزن، لأني كنتُ سببًا في قتل ذلك الجبّار.»

Verse 32

मम पुत्रेण मूढेन पापेनाकृतबुद्धिना

«على يد ابني—الضالّ، الآثم، الخالي من صواب الرأي—…»

Verse 33

एतत्‌ सर्वमनुस्मृत्य दहमानो दिवानिशम्‌

قال فايشَمبايانا: «إذ أتذكّر كلَّ هذا، أحترق ليلًا ونهارًا. وقد صُرِعتُ بالحزن والأسى فلا أجد سلامًا قط. يا أبتِ، إذ سقطتُ في هذه الهموم بعينها، لا أنال سكينة أبدًا».

Verse 34

न शान्तिमधिगच्छामि दुःखशोकसमाहत: । इति मे चिन्तयानस्य पित: शान्तिर्न विद्यते

قال فايشَمبايانا: «مضروبًا بالحزن والأسى لا أنال السلام. وإذ أظلّ أقلب هذه الأمور في خاطري، يا أبتِ، لا يُوجَد لي سلام».

Verse 35

वैशम्पायन उवाच तच्छुत्वा विविध तस्य राजर्षे: परिदेवितम्‌ । पुनर्नवीकृत: शोको गान्धार्या जनमेजय

قال فايشَمبايانا: «يا جاناميجايا، لما سمعَت غاندھاري نواحَ ذلك الحكيم الملك، دْهريتاراشترا، على وجوهٍ شتّى، تجدد حزنُها وهاج من جديد، كأنما أُعيد إيقاظه.»

Verse 36

कुन्त्या द्रुपदपुत्र्या श्न सुभद्रायास्तथैव च । तासां च वरनारीणां वधूनां कौरवस्य ह,कुन्ती, दौपदी, सुभद्रा तथा कुरुरगाजकी उन सुन्दरी बहुओंका शोक भी फिरसे उमड़ आया

قال فايشَمبايانا: «وفاض الحزن من جديد في قلب كونتي، وفي قلب ابنة دروبادا (دراوبدي)، وكذلك في قلب سوبهادرا—تلك النسوة النبيلات، عرائس سلالة الكورو.»

Verse 37

पुत्रशोकसमाविष्टा गान्धारी त्विदमब्रवीत्‌ । श्वशुरं बद्धनयना देवी प्राज्जलिरुत्थिता,आँखोंपर पट्टी बाँधे गान्धारी देवी श्वशुरके सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गयीं और पुत्रशोकसे संतप्त होकर इस प्रकार बोलीं

وقد غمرها حزنُ الأبناء، قالت غاندھاري هذه الكلمات. فالملكة، وعيناها معصوبتان بقطعة قماش، نهضت ووقفت بين يدي حميها وقد ضمّت كفّيها إجلالًا؛ ثم—وهي تتقد ألمًا—شرعت تخاطبه.

Verse 38

षोडशेमानि वर्षाणि गतानि मुनिपुज्भव । अस्य राज्ञो हतान्‌ पुत्रान शोचतो न शमो विभो,मुनिवर! प्रभो! इन महाराजको अपने मरे हुए पुत्रोंक लिये शोक करते आज सोलह वर्ष बीत गये; किंतु अबतक इन्हें शान्ति नहीं मिली

قال فايشَمبايانا: «يا خيرَ الحكماء، لقد مضت ستَّ عشرةَ سنة، ومع ذلك فإن هذا الملك—وهو ينوح على أبنائه الذين قُتلوا—لم يجد سكينة. لم يهدأ حزنه، مُظهِرًا كيف يمكن للتعلّق بالأهل ولجراح الحرب أن تظل تُقيِّد العقل طويلًا بعد أن يمضي الزمان.»

Verse 39

पुत्रशोकसमाविष्टो नि:श्वसन्‌ होष भूमिप: । न शेते वसती: सर्वा धृतराष्ट्रो महामुने

قال فايشَمبايانا: «يا أيها الحكيم العظيم، لقد غمر حزنُ الأبناء الملكَ دِهْرِتَراشْتْرَة، فكان يطلق الزفرات الطويلة ويُكثر النواح. طوال الليل لم يجد راحة؛ ولم يأتِه النوم.»

Verse 40

लोकानन्यान्‌ समर्थो5सि स्रष्टं सर्वास्तपोबलात्‌ | किमु लोकान्तरगतान्‌ राज्ञो दर्शयितुं सुतान्‌

قال فايشَمبايانا: «إنك بقوة نسكك قادرٌ على أن تُنشئ عوالمَ أخرى بأسرها. فإذا كان الأمر كذلك، فأيُّ مشقّةٍ عليك أن تُريَ الملك—ولو مرةً واحدة—أبناءه الذين مضوا إلى عالمٍ آخر؟»

Verse 41

इयं च द्रौपदी कृष्णा हतज्ञातिसुता भृशम्‌ । शोचत्यतीव सर्वासां स्नुषाणां दयिता स्नुषा

قال فايشَمبايانا: «وهذه دروبدي، كِرِشْنا—وقد قُتل أقاربُها وأبناؤها قتلاً فادحًا—تغرق في حزنٍ شديد. وهي أحبُّ الكنائن جميعًا.»

Verse 42

तथा कृष्णस्य भगिनी सुभद्रा भद्रभाषिणी । सौभद्रवधसंतप्ता भृशं॑ शोचति भाविनी

قال فايشَمبايانا: «وكذلك سوبهادرا—أخت كِرِشْنا، رقيقةُ القول كريمةُ الفؤاد—قد أضناها مقتلُ ساوبهادرا (أبهيمانيو) وأغرقتها لوعةٌ شديدة.»

Verse 43

“सदा मंगलमय वचन बोलनेवाली श्रीकृष्णकी बहन भाविनी सुभद्रा सर्वदा अपने पुत्र अभिमन्युके वधसे संतप्त हो निरन्तर शोकमें ही डूबी रहती है ।।

قال فايشَمبايانا: إن سوبهادرا—أخت شري كريشنا، الرقيقة التي لا تفتأ تنطق بالكلمات المباركة—تظلّ على الدوام محترقة القلب بموت ابنها أبهيمانيو، غارقةً في الحزن بلا انقطاع. وها هنا تجلس زوجة بهوريشرافاس المحبوبة غاية المحبة، قد أذهلها رزء وفاة زوجها، وهي تندب ندبًا شديدًا. وقد قُتل حموها الحكيم باهليكا—أشرف رجال الكورو—كما قُتل سوماداتا والد بهوريشرافاس، وقد لقي مع أبيه حتفَ الأبطال في تلك المعركة العظمى.

Verse 44

यस्यास्तु श्वशुरो धीमान्‌ बाह्विक: स कुरूद्गवह: । निहतः सोमदत्तश्न पित्रा सह महारणे

قال فايشَمبايانا: «لقد قُتل حموها الحكيم باهليكا—أشرف رجال الكورو. وقُتل سوماداتا أيضًا، مع أبيه، في تلك المعركة العظمى».

Verse 45

श्रीमतो<5स्य महाबुद्धे: संग्रामेष्वपलायिन: । पुत्रस्य ते पुत्रशतं निहतं यद्‌ रणाजिरे

قال فايشَمبايانا: «أيها الناسك العظيم، هؤلاء هنّ مئة كنّةٍ يلازمن خدمتي—وهنّ زوجات ابنكم، الملك الجليل، بالغ الحكمة، الذي لم يكن ليولي الأدبار في القتال—وقد قُتل مئةٌ من أبنائه في ساحة الحرب. وقد صُعقن بحزنٍ عظيم لتلك النازلة الجسيمة، ومع ذلك بقين مواظبات على خدمتي، وإن كان أساهنّ يزيد مرارًا وتكرارًا من نواحنا، نواح الملك ونواحي أنا أيضًا.»

Verse 46

तस्य भार्याशतमिदं दुःखशोकसमाहतम्‌ । पुन: पुनर्वर्धयानं शोकं राज्ञो ममैव च

قال فايشَمبايانا: «إن هذا الجمع من زوجاته، وقد صُرعن بالحزن والأسى، ظللن مرارًا وتكرارًا يزدن النواح—نواح الملك ونواحي أنا كذلك.»

Verse 47

ये च शूरा महात्मान: श्वशुरा मे महारथा:

قال فايشَمبايانا: «وكذلك أولئك الرجال الأبطال، العظام النفوس—أحمائي—وكانوا من فرسان العجلات الحربية الأقوياء…»

Verse 48

तव प्रसादाद्‌ भगवन्‌ विशोको<यं महीपति:

قال فايشامبايانا: «بفضل نعمتك، أيها المبارك، قد تحرّر هذا الملك من الحزن».

Verse 49

इत्युक्तवत्यां गान्धार्या कुन्ती व्रतकृशानना

فلما قالت غاندھاري ذلك، كانت كونتي—وقد نحل وجهها من النذور والتقشف—(تجيب/حاضرة)، في مشهدٍ تُهذَّب فيه اللوعة بضبط النفس، ويُحمَل ثقل الأفعال الماضية في صمتٍ ونذر.

Verse 50

तामृषिर्वरदो व्यासो दूरश्रवणदर्शन:

ثم إن الحكيم فياسا—المشهور بكونه واهبَ النِّعَم، والممنوحَ قدرة السمع والبصر من بعيد—تناول ذلك الأمر ببصيرته البعيدة، إذ تميل الحكاية إلى الإرشاد والتدخل الرحيم.

Verse 51

तामुवाच ततो व्यासो यत्‌ ते कार्य विवक्षितम्‌

ثم قال فياسا لها: «أخبريني بما تريدين أن يُفعل—وما الغاية التي تنوين إظهارها».

Verse 52

श्वशुराय तत: कुन्ती प्रणम्य शिरसा तदा,तब कुन्तीने मस्तक झुकाकर श्वशुरको प्रणाम किया और लज्जित हो प्राचीन गुप्त रहस्यको प्रकट करते हुए कहा

قال فايشامبايانا: ثم إن كونتي طأطأت رأسها وقدّمت السجود لحمِيها. وبحياءٍ متحفظ شرعت تكشف سرًّا عتيقًا طال كتمانه—في لحظةٍ تُقدَّم فيها التواضعُ وصدقُ القول على خجل النفس، ابتغاءَ خدمة الدارما.

Verse 53

उवाच वाक्‍्यं सत्रीडा विवृण्वाना पुरातनम्‌,तब कुन्तीने मस्तक झुकाकर श्वशुरको प्रणाम किया और लज्जित हो प्राचीन गुप्त रहस्यको प्रकट करते हुए कहा

قال فايشامبايانا: وبحياءٍ وتردّدٍ مهذّب بدأت تكشف أمرًا عتيقًا. ثم إن كونتي، مطأطئة الرأس، أدّت التبجيل لحمِيها؛ وعلى الرغم من خجلها، وبعزمٍ ثابت، أفصحت عن سرٍّ قديم طال كتمانه وتكلّمت.

Verse 153

प्रीयमाणो महातेजा: सर्ववेदविदां वर: । बातचीतके अनन्‍्तमें सम्पूर्ण वेदवेत्ताओं और वक्ताओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी महर्षि व्यासजीने प्रसन्न होकर प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्रसे पुन: वही बात कही

قال فايشامبايانا: وقد سُرَّ قلبُ الحكيم العظيم فياسا—المتألّق بقوةٍ روحية، والمتقدّم على جميع عارفي الفيدا—فعاد فكرّر تلك الكلمات نفسها للملك دريتاراشترا، الذي أفاق بصرُه الباطن بالحكمة.

Verse 186

सुभद्रा कृष्णभगिनी तच्चापि विदितं मम | “श्रीकृष्णकी बहन सुभद्रा अपने पुत्र अभिमन्युके मारे जानेका जो दुःसह दुःख हृदयमें धारण करती है, वह भी मुझसे अज्ञात नहीं है

قال فايشامبايانا: «سوبهادرا، أخت كريشنا—هذا أيضًا معلومٌ لديّ: إن الحزن الذي لا يُحتمل، الذي تحمله في قلبها على مقتل ابنها أبهيمانيو، ليس بخافٍ عليّ.»

Verse 193

संशयच्छेदनार्थाय प्राप्त: कौरवनन्दन । “कौरवनन्दन! नरेश्वर! वास्तवमें तुम सब लोगोंका यह समागम सुनकर तुम्हारे मानसिक संदेहोंका निवारण करनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ

قال فايشامبايانا: «يا فخر سلالة الكورو، أيها الملك! لقد جئتُ إلى هنا لقطع الشك. ولما سمعتُ بهذا الاجتماع، حضرتُ لأبدّد ما في ذهنك من تردّدٍ وارتياب.»

Verse 203

पश्यन्तु तपसो वीर्यमद्य मे चिरसम्भूतम्‌ । 'ये देवता, गन्धर्व और महर्षि सब लोग आज मेरी चिरसंचित तपस्याका प्रभाव देखें

قال فايشامبايانا: «فليشهدوا اليوم القوة المولودة من زهدي المتراكم منذ أمدٍ بعيد؛ ولْيَرَ الآلهةُ والغاندهرفا والريشي العظام أثرَ توبتي ونسكي الذي جُمع عبر الزمن.»

Verse 213

प्रवणो5स्मि वरं दातुं पश्य मे तपस: फलम्‌ । “महाप्राज्ञ नरेश! बोलो, मैं तुम्हें कौन-सा अभीष्ट मनोरथ प्रदान करूँ? आज मैं तुम्हें मनोवाञ्छित वर देनेको तैयार हूँ। तुम मेरी तपस्याका फल देखो”

قال فايشامبايانا: «إنّي مستعدّ لمنحِ نعمةٍ. فانظر ثمرةَ تقشّفي. تكلّمْ، أيّها الملكُ الحكيم: أيُّ رغبةٍ عزيزةٍ تريدني أن أُتمّها لك؟»

Verse 233

यन्मे समागमोउद्येह भवद्धिः सह साधुभि: । 'भगवन्‌! आज मैं धन्य हूँ, आपलोगोंकी कृपाका पात्र हूँ तथा मेरा यह जीवन भी सफल है; क्योंकि आज यहाँ आप-जैसे साधु-महात्माओंका समागम मुझे प्राप्त हुआ है

قال فايشامبايانا: «إنّي اليومَ مباركٌ—مستحقٌّ لرحمتكم—وقد أثمرت حياتي؛ لأنّي هنا والآن نلتُ صحبةَ أمثالكم من الأخيار والقدّيسين، من العظماء ذوي الأرواح السامية.»

Verse 246

ब्रह्मकल्पैर्भवद्धिर्यत्‌ समेतो5हं तपोधना: । “तपोधनो! आप ब्रह्मतुल्य महात्माओंका जो संग मुझे प्राप्त हुआ उससे मैं समझता हूँ कि यहाँ अपने लिये अभीष्ट गति मुझे प्राप्त हो गयी

قال فايشامبايانا: «يا أهلَ الزهدِ الغنيّين بالتقشّف! ما دمتُ قد اجتمعتُ بكم—وأنتم في المنزلة كبرهمَا—فإنّي أعدّ أنّي هنا والآن قد بلغتُ الغاية التي طالما اشتقتُ إليها. إنّ صحبةَ العظماء الشبيهين ببراهما تصير بذاتها طريقًا وغايةً: تُطهِّر، وترفع، وتُثبّت خيرَ الإنسان الأعلى.»

Verse 256

विद्यते न भयं चापि परलोकान्ममानघा: । “इसमें संदेह नहीं कि मैं आपलोगोंके दर्शनमात्रसे पवित्र हो गया। निष्पाप महर्षियो! अब मुझे परलोकसे कोई भय नहीं है

قال فايشامبايانا: «يا أيّها الحكماءُ الأطهارُ الذين لا إثمَ فيهم، لا خوفَ عندي البتّة من العالم الآخر. حقًّا، بمجردِ رؤيتكم قد تطهّرتُ؛ ولذلك فلا شكّ أنّ الآخرة لا تحمل لي رهبةً.»

Verse 266

दूयते मे मनो नित्यं स्मरत: पुत्रगृद्धिन: । 'परन्तु अत्यन्त खोटी बुद्धिवाले उस मन्दमति दुर्योधनके अन्यायोंसे जो मेरे सारे पुत्र मारे गये हैं

قال فايشامبايانا: «غير أنّ قلبي يُعذَّب على الدوام؛ فأنا—المتعلّق بأبنائي—لا أكفّ عن تذكّر كيف قُتل أبنائي جميعًا بسبب مظالمِ دوريودhana، ذلك الرجلِ شديدِ الضلال. لذلك يثقل على فؤادي حزنٌ عظيم.»

Verse 283

आगम्य मम पुत्रार्थे सर्वे मृत्युवशं गता: । अनेक देशोंके स्वामी महामनस्वी नरेश मेरे पुत्रकी सहायताके लिये आकर सब-के-सब मृत्युके अधीन हो गये

قال فايشَمبايانا: «لقد جاؤوا من أجل ابني، فإذا بهم جميعًا يقعون تحت سلطان الموت. ملوكٌ عظام الهمم—سادةُ أقاليمَ كثيرة—قدموا لنصرة ابني، غير أنّ كلَّ واحدٍ منهم، بلا استثناء، صار خاضعًا للفناء.»

Verse 296

परित्यज्य गता: शूरा: प्रेतराजनिवेशनम्‌ । वे सब शूरवीर भूपाल अपने पिताओं, पत्नियों, प्राणों और मनको प्रिय लगनेवाले भोगोंका परित्याग करके यमलोकको चले गये

قال فايشَمبايانا: «بعد أن نبذوا كلَّ ما كان يقيّدهم بالحياة الدنيوية، مضى الأبطال إلى دار سيّد الراحلين، يَما. أي إنّ أولئك الملوك المحاربين تركوا التعلّق بالآباء والزوجات، بل وبالحياة نفسها، وباللذّات المحبّبة إلى النفس، ثم انطلقوا إلى عالم يَما.»

Verse 303

तथैव पुत्रपौत्राणां मम ये निहता युधि । “ब्रह्मन्‌! जो मित्रके लिये युद्धमें मारे गये उन राजाओंकी क्‍या गति हुई होगी? तथा जो रणभूमिमें वीरगतिको प्राप्त हुए हैं

قال فايشَمبايانا: «وكذلك، أيُّ مصيرٍ ناله أبنائي وأحفادي الذين قُتلوا في القتال؟ “يا براهمن! ما عاقبةُ أولئك الملوك الذين سقطوا في الحرب من أجل صديق؟ وأبنائي وأحفادي الذين نالوا ميتةَ الأبطال في ساحة الوغى—إلى أيِّ منزلةٍ انتهوا؟”»

Verse 313

भीष्मं शान्तनवं वृद्ध द्रोणं च द्विजसत्तमम्‌ । “महाबली शान्तनुनन्दन भीष्म तथा वृद्ध ब्राह्मणप्रवर द्रोणाचार्यका वध कराकर मेरे मनको बारंबार दुःसह संताप प्राप्त होता है

قال فايشَمبايانا: «إنّ مقتلَ بهيشما، ابنِ شانتانو الشيخ، ومقتلَ درونا، أرفعِ “ثنائيّي الميلاد” من البراهمة، يعاودان مرارًا أن يُنزلا بقلبي كمدًا لا يُحتمل.»

Verse 323

क्षयं नीत॑ कुलं दीप्तं पृथिवीराज्यमिच्छता । “अपवित्र बुद्धिवाले मेरे पापी एवं मूर्ख पुत्रने समस्त भूमण्डलके राज्यका लोभ करके अपने दीप्तिमान्‌ कुलका विनाश कर डाला

قال فايشَمبايانا: «مدفوعًا بالطمع في السيادة على الأرض كلّها، أوقع ابني الآثم الأحمق—ذو العقل الدنِس—سلالةً متألّقة في الخراب.»

Verse 466

तेनारम्भेण महता मामुपास्ते महामुने । “आपके पुत्र

قال فايشَمبايانا: «يا أيها الحكيم العظيم، بتلك المبادرة الجليلة ما زال يكرّمني ويلازمني خدمةً ورعاية. ‘هؤلاء الملوك الأجلّاء—أبنائي—الذين لم يولّوا الأدبار قط في القتال وكانوا في غاية الحكمة: تجلس هنا مئةٌ من زوجاتهم، لأن أبناءهم المئة قد قُتلوا في ساحة الحرب. وهؤلاء كنّاتي، وهنّ يتحمّلن صدمات الحزن والأسى، يزدن مرارًا لوعةَ حدادي وحدادَ الملك. يا أيها الحكيم العظيم، إنهن جميعًا، وهنّ يبكين تحت موجٍ عاتٍ من النواح، يجلسن مطوّقاتٍ بي وحدي.’»

Verse 476

सोमदत्तप्रभृतय: का नु तेषां गति: प्रभो | 'प्रभो! जो मेरे महामनस्वी श्वशुर शूरवीर महारथी सोमदत्त आदि मारे गये हैं, उन्हें कौन-सी गति प्राप्त हुई है?

قال فايشَمبايانا: «يا مولاي، أيُّ مصيرٍ—وأيُّ حالٍ بعد الموت—نالَه أولئك، وفي مقدّمتهم سُومَدَتّا؟»

Verse 483

यथा स्याद्‌ भविता चाहं कुन्ती चेयं वधूस्तव । “भगवन्‌! आपके प्रसादसे ये महाराज, मैं और आपकी बहू कुन्ती--ये सब-के-सब जैसे भी शोकरहित हो जाय, ऐसी कृपा कीजिये

قال فايشَمبايانا: «ليكن الأمر كذلك: ليصِر هذا الملك، وأنا، وكُنتي—كنّتك—جميعًا بمنأى عن الحزن. أيها المبارك، بفضلك، امنحْ رحمةً كهذه.»

Verse 493

प्रच्छन्नजातं पुत्र तं सस्मारादित्यसंनिभम्‌ | जब गान्धारीने इस प्रकार कहा, तब व्रतसे दुर्बल मुखवाली कुन्तीने गुप्तरूपसे उत्पन्न हुए अपने सूर्यतुल्य तेजस्वी पुत्र कर्णका स्मरण किया

قال فايشَمبايانا: لما تكلمت غاندھاري على هذا النحو، تذكّرت كُنتي—وقد أوهنت التقشّفات وجهها—ابنها كَرْنَة سرًّا؛ ذاك الذي وُلد في خفاء وكان يشعّ بضياء كالشمس.

Verse 503

अपश्यद्‌ दु:खितां देवीं मातरं सव्यसाचिन: । दूरतककी देखने-सुनने और समझनेवाले वरदायक ऋषि व्यासने अर्जुनकी माता कुन्तीदेवीको दु:खमें डूबी हुई देखा

قال فايشَمبايانا: من بعيدٍ أبصر الحكيم فياسا—واهبَ النِّعَم، الموهوبَ بصرًا وسمعًا وفهمًا بعيدَ المدى—كُنتي ديفي، الأمَّ الإلهية لأرجونا، غارقةً في الحزن.

Verse 516

तद्‌ ब्रूहि त्वं महाभागे यत्‌ ते मनसि वर्तते । तब भगवान्‌ व्यासने उनसे कहा--“महाभागे! तुम्हें किसी कार्यके लिये यदि कुछ कहनेकी इच्छा हो, तुम्हारे मनमें यदि कोई बात उठी हो तो उसे कहो

قال فايشَمبايانا: «أيتها السيدة النبيلة، أخبريني بما في قلبك. إن كان لكِ أن تقولي شيئًا لغرضٍ ما، فقوليها صراحةً.»

Verse 1636

दह्यमानस्य शोकेन तव पुत्रकृतेन वै । राजेन्द्र! तुम्हारे हृदयमें जो कहनेकी इच्छा हो रही है, उसे मैं जानता हूँ। तुम निरन्तर अपने मरे हुए पुत्रोंक शोकसे जलते रहते हो

قال فايشَمبايانا: «يا خيرَ الملوك، إنّي أعلم ما يتوق قلبك إلى قوله. فأنت تُستهلَك بالحزن—تحترق بلا انقطاع بسبب أبنائك، وتنوح على من مضوا إلى الموت.»

Verse 2236

मुहूर्तमिव संचिन्त्य वचनायोपचक्रमे । अमित बुद्धिमान्‌ महर्षि व्यासके ऐसा कहनेपर महाराज धृतराष्ट्रने दो घड़ीतक विचार करके इस प्रकार कहना आरम्भ किया

وبعد أن تفكّر هنيهةً، شرع في الكلام. ثم مضى الحكيم العظيم فياسا، ذو العقل الذي لا يُحدّ، في حديثه. (وفي السياق، يتوقّف دِهرتَراشترا لحظةً ليتروّى، ثم يتهيّأ للردّ بتدبّر لا باندفاع، مُبرزًا الثقل الأخلاقي للكلمة والقرار.)

Verse 2736

घातिता पृथिवी येन सहया सनरद्विपा । पापपूर्ण विचार रखनेवाले उस दुर्योधनने निरपराध पाण्डवोंको सताया तथा घोड़ों, मनुष्यों और हाथियोंसहित इस सारी पृथ्वीके वीरोंका विनाश करा डाला

قال فايشَمبايانا: «به صارت الأرضُ مذبحةً—بخيولها ورجالها وفِيَلتها. ذلك دُريودَهَنَ، الذي امتلأ فكره بمقاصد آثمة، آذى الباندافا الأبرياء وتسبّب في هلاك أبطال الدنيا كلّها.»

Frequently Asked Questions

The dilemma is how to inhabit rightful rule after mass kin-loss: the Pāṇḍavas possess sovereignty yet cannot convert it into inner stability, while elders choose austere withdrawal—both responses testing the boundaries of duty and detachment.

The text presents victory and prosperity as insufficient remedies for ethical rupture; remembrance of harm persists, and mature dharma includes acknowledging grief, limiting attachment, and honoring renunciatory paths when worldly aims fail to heal.

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter functions as reflective historiography, positioning grief and renunciation as interpretive lenses for understanding the epic’s moral universe and its movement toward cessation and release.

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