Ayodhya KandaPrakarana 420 Verses

Prakarana 4

त्याग-दीक्षा का सोपान: जहाँ ‘राज्य’ (भोग-धर्म) का मोह टूटकर ‘वन’ (वैराग्य-धर्म) का द्वार खुलता है। अयोध्या काण्ड साधक को यह सिखाता है कि धर्म केवल शुभ-घटना नहीं, बल्कि पीड़ा में सत्य-पालन, वचन-रक्षा, और ईश्वर-आज्ञा-स्वीकार की तपस्या है—यही मुक्ति-सीढ़ी का निर्णायक मोड़ है।

《阿逾陀篇》的主味为悲悯,但此悲悯并非单纯哀伤——乃“法之裁决”的悲悯。本段中,凯凯伊的刻薄(含忿怒之种)与达沙罗陀的真实誓愿(法之坚忍)相对峙,遂成悲悯与忿怒的强烈交融。达沙罗陀“真实不二”(satyasaṅdh)——王法的尊严——与他对罗摩的深恋——信爱的凡人侧面——同时回响。图罗西的法义构造在此分明:言诺(真)即“祭”(yajña),守诺即“苦行”(tap),纵使舍命亦然。由此叙事阶梯上升:阿逾陀的吉庆盛会在内里悄然化作出离之旅。本段告诫行者:解脱阶梯上最艰难的台阶,并非“爱别离”,而是舍弃“我执迷情”,并为真理而自愿献身。

Verses

Verse 62 (चौपाई)

एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माखा।। भरतु कि राउर पूत न होहीं। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही।। जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचनु सँभारे।। देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं।। देन कहेहु अब जनि बरु देहू। तजहुँ सत्य जग अपजसु लेहू।। सत्य सराहि कहेहु बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना।। सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा।। अति कटु बचन कहति कैकेई। मानहुँ लोन जरे पर देई।।

Verse 63 (दोहा/सोरठा)

धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ। सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ।।30।।

Verse 64 (चौपाई)

आगें दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी।। मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई।। लखी महीप कराल कठोरा। सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा।। बोले राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती।। प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती। भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती।। मोरें भरतु रामु दुइ आँखी। सत्य कहउँ करि संकरू साखी।। अवसि दूतु मैं पठइब प्राता। ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता।। सुदिन सोधि सबु साजु सजाई। देउँ भरत कहुँ राजु बजाई।।

Verse 65 (दोहा/सोरठा)

लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति। मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति।।31।।

Verse 66 (चौपाई)

राम सपथ सत कहुउँ सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ।। मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें। तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें।। रिस परिहरू अब मंगल साजू। कछु दिन गएँ भरत जुबराजू।। एकहि बात मोहि दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा।। अजहुँ हृदय जरत तेहि आँचा। रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा।। कहु तजि रोषु राम अपराधू। सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू।। तुहूँ सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि भयउ संदेहू।। जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला।।

Verse 67 (दोहा/सोरठा)

प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु। जेहिं देखाँ अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु।।32।।

Verse 68 (चौपाई)

जिऐ मीन बरू बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना।। कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं।। समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना। जीवनु राम दरस आधीना।। सुनि म्रदु बचन कुमति अति जरई। मनहुँ अनल आहुति घृत परई।। कहइ करहु किन कोटि उपाया। इहाँ न लागिहि राउरि माया।। देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं। मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं। रामु साधु तुम्ह साधु सयाने। राममातु भलि सब पहिचाने।। जस कौसिलाँ मोर भल ताका। तस फलु उन्हहि देउँ करि साका।।

Verse 69 (दोहा/सोरठा)

होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं। मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं।।33।।

Verse 70 (चौपाई)

अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी।। पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई।। दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भवँर कूबरी बचन प्रचारा।। ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनुकूला।। लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची।। गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी।। मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही।। राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती।।

Verse 71 (दोहा/सोरठा)

देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ। कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ।।34।।

Verse 72 (चौपाई)

ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता।। कंठु सूख मुख आव न बानी। जनु पाठीनु दीन बिनु पानी।। पुनि कह कटु कठोर कैकेई। मनहुँ घाय महुँ माहुर देई।। जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ। मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ।। दुइ कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाउब गाला।। दानि कहाउब अरु कृपनाई। होइ कि खेम कुसल रौताई।। छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करुना करहू।। तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी।।

Verse 73 (दोहा/सोरठा)

मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर। लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर।।35।।

Verse 74 (चौपाई)

चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें।। सो सबु मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू।। सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुन धाम राम प्रभुताई।। करिहहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई।। तोर कलंकु मोर पछिताऊ। मुएहुँ न मिटहि न जाइहि काऊ।। अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठु मुहु गोई।। जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी। तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी।। फिरि पछितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ नहारु लागी।।

Verse 75 (दोहा/सोरठा)

परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु। कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु।।36।।

Verse 76 (चौपाई)

राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू।। हृदयँ मनाव भोरु जनि होई। रामहि जाइ कहै जनि कोई।। उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर। अवध बिलोकि सूल होइहि उर।। भूप प्रीति कैकइ कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई।। बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा। बीना बेनु संख धुनि द्वारा।। पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक। सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक।। मंगल सकल सोहाहिं न कैसें। सहगामिनिहि बिभूषन जैसें।। तेहिं निसि नीद परी नहि काहू। राम दरस लालसा उछाहू।।

Verse 77 (दोहा/सोरठा)

द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि। जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि।।37।।

Verse 78 (चौपाई)

पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा।। जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिअ काजु रजायसु पाई।। गए सुमंत्रु तब राउर माही। देखि भयावन जात डेराहीं।। धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा। मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा।। पूछें कोउ न ऊतरु देई। गए जेंहिं भवन भूप कैकैई।। कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। दैखि भूप गति गयउ सुखाई।। सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ।। सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी। बोली असुभ भरी सुभ छूछी।।

Verse 79 (दोहा/सोरठा)

परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु। रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु।।38।।

Verse 80 (चौपाई)

आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई।। चलेउ सुमंत्र राय रूख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी।। सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ।। उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूछँहिं सकल देखि मनु मारें।। समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका।। रामु सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा।। निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई।। रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं।।

Verse 81 (दोहा/सोरठा)

जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु।। सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु।।39।।

Inside Prakarana 4

The dialogue

  • गोस्वामी तुलसीदास (कथावाचक-रूप; अंतर्ध्वनि में ‘मानस-चेतना’)

Frequently Asked Questions

परंपरागत मान्यता में यह खंड ‘सत्य-पालन’ और ‘राम-नाम-स्मरण’ की सिद्धि देता है: वचन-बंधन, गृहस्थ-धर्म, और विषाद में भी राम-आश्रय की शिक्षा से श्रोता/पाठक के भीतर धैर्य, वैराग्य और शरणागति बढ़ती है—विशेषतः संकट-काल में ‘राम राम’ का जप स्वाभाविक बनता है।

सामान्य सत्संग-परंपरा में ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘राम राम’ का नाम-संपुट (विशेषकर दोहा-स्थलों पर) जोड़ा जाता है; कुछ परंपराओं में ‘सियाराममय सब जग जानी’ को भाव-संपुट की तरह लिया जाता है—पर यह स्थान-विशेष/आचार्य-परंपरा पर निर्भर है।

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