Ayodhya KandaPrakarana 1220 Verses

Prakarana 12

यह सोपान ‘त्याग-धर्म’ का द्वार है—राज्य, सुख, और लोक-प्रतिष्ठा का स्वेच्छा-परित्याग करके ‘राम-आज्ञा’ को परम सत्य मानना। अयोध्या काण्ड में भक्ति का परिपाक करुण-रस के द्वारा होता है: वियोग, पछितावा, और लोक-हृदय का द्रवण—ये सब साधक को ‘गृह-आसक्ति’ से ‘वन-मार्ग’ (अन्तर्मार्ग) की ओर मोड़ते हैं। यहाँ राम का बनगमन केवल कथा-घटना नहीं; यह जीव का अहं-त्याग और ईश्वर-आदेश-स्वीकृति है—सीढ़ी का वह चरण जहाँ श्रद्धा ‘अनुभव-भक्ति’ बनती है।

《阿逾陀篇》的情味中心为悲悯,但此悲悯并非绝望——而是能生出离(vairāgya)的悲悯。本段(约多哈110–119)中,“众人之群”(lok-samudāy)得见罗摩—悉多—罗什曼,欢喜战栗;这是集体信爱的涌动:家务尽忘,双眼得“眼之果报”(nayanphal)。随即叙事反转:人们责怪王后与国王,谓命运残酷——此乃图罗西心理描写之精微。然而正由此失衡,义理显现:罗摩入林是“奉命”(ājñā-pālan)与“安住于法的定慧”(dharma-sthitaprajñatā)的典范。在此,有相之美的戏(形貌甘露)与无相之真(命令、界限、出离)同轴相连。行者在此阶梯学得:爱的极致,是“纵在离别中亦归顺于命令”。

Verses

Verse 225 (चौपाई)

सुनत तीरवासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी।। लखन राम सिय सुन्दरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई।। अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं।। जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने।। सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई।। सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं।। तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेजपुंज लघुबयस सुहावा।। कवि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी।।

Verse 226 (दोहा/सोरठा)

सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि। परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि।।110।।

Verse 227 (चौपाई)

राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा।। मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरे तन कह सबु कोऊ।। बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा। लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा।। पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा। जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा।। कीन्ह निषाद दंडवत तेही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही।। पिअत नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा।। ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।। राम लखन सिय रूपु निहारी। होहिं सनेह बिकल नर नारी।।

Verse 228 (दोहा/सोरठा)

तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह। राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेंइँ कीन्ह।।111।।

Verse 229 (चौपाई)

पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी।। चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कइ करत बड़ाई।। पथिक अनेक मिलहिं मग जाता। कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता।। राज लखन सब अंग तुम्हारें। देखि सोचु अति हृदय हमारें।। मारग चलहु पयादेहि पाएँ। ज्योतिषु झूठ हमारें भाएँ।। अगमु पंथ गिरि कानन भारी। तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी।। करि केहरि बन जाइ न जोई। हम सँग चलहि जो आयसु होई।। जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई।।

Verse 230 (दोहा/सोरठा)

एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन। कृपासिंधु फेरहि तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन।।112।।

Verse 231 (चौपाई)

जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं।। केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए।। जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं। तिन्ह समान अमरावति नाहीं।। पुन्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी।। जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि। सीता लखन सहित घनस्यामहि।। जे सर सरित राम अवगाहहिं। तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं।। जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई।। परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा।।

Verse 232 (दोहा/सोरठा)

छाँह करहि घन बिबुधगन बरषहि सुमन सिहाहिं। देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं।।113।।

Verse 233 (चौपाई)

सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई।। सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृहकाजु बिसारी।। राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयनफलु होहिं सुखारी।। सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा।। बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी।। एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं।। रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे।। एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी।।

Verse 234 (दोहा/सोरठा)

एक देखिं बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात। कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात।।114।।

Verse 235 (चौपाई)

एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी।। सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी।। जानी श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं।। मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा।। एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा। रामचंद्र मुख चंद चकोरा।। तरुन तमाल बरन तनु सोहा। देखत कोटि मदन मनु मोहा।। दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के।। मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा। सोहहिं कर कमलिनि धनु तीरा।।

Verse 236 (दोहा/सोरठा)

जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल। सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल।।115।।

Verse 237 (चौपाई)

बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी।। राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई।। थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से।। सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं।। बार बार सब लागहिं पाएँ। कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ।। राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं। स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवाँरी।। राजकुअँर दोउ सहज सलोने। इन्ह तें लही दुति मरकत सोने।।

Verse 238 (दोहा/सोरठा)

स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन। सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन।।116।।

Verse 239 (चौपाई)

कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे।। सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी।। तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहुँ सकोच सकुचित बरबरनी।। सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी।। सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे।। बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी।। खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि।। भइ मुदित सब ग्रामबधूटीं। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं।।

Verse 240 (दोहा/सोरठा)

अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस। सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस।।117।।

Verse 241 (चौपाई)

पारबती सम पतिप्रिय होहू। देबि न हम पर छाड़ब छोहू।। पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी।। दरसनु देब जानि निज दासी। लखीं सीयँ सब प्रेम पिआसी।। मधुर बचन कहि कहि परितोषीं। जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं।। तबहिं लखन रघुबर रुख जानी। पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी।। सुनत नारि नर भए दुखारी। पुलकित गात बिलोचन बारी।। मिटा मोदु मन भए मलीने। बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने।। समुझि करम गति धीरजु कीन्हा। सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा।।

Verse 242 (दोहा/सोरठा)

लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ। फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ।।118।।

Verse 243 (चौपाई)

फिरत नारि नर अति पछिताहीं। देअहि दोषु देहिं मन माहीं।। सहित बिषाद परसपर कहहीं। बिधि करतब उलटे सब अहहीं।। निपट निरंकुस निठुर निसंकू। जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू।। रूख कलपतरु सागरु खारा। तेहिं पठए बन राजकुमारा।। जौं पे इन्हहि दीन्ह बनबासू। कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू।। ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना। रचे बादि बिधि बाहन नाना।। ए महि परहिं डासि कुस पाता। सुभग सेज कत सृजत बिधाता।। तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा। धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा।।

Verse 244 (दोहा/सोरठा)

जौं ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुकुमार। बिबिध भाँति भूषन बसन बादि किए करतार।।119।।

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