त्याग और आज्ञापालन का सोपान: राजधर्म के शिखर से वनगमन का अवरोह, जहाँ ‘लोक-मान्यता’ (जन-प्रेम) और ‘आत्म-निवेदन’ (ईश्वर-इच्छा) एक हो जाते हैं। यह चरण साधक को सिखाता है कि प्रियतम-धर्म (राम) का अनुसरण बाह्य सुख-सुविधा से ऊपर है; करुणा, शील और मर्यादा ही मुक्ति-पथ की पहली वास्तविक सीढ़ी है।
《阿逾陀篇》的主味(रस)以悲悯为宗,然此悲悯并不滞于哀伤之中心,而转化为“守分之法”(मर्यादा-धर्म)的定型。在此段(多诃120—129)中,出林之行被铸成一种民间的观照:城镇乡村的男女众生,皆视罗摩—悉多—罗什曼为“现前之美”(sākṣāt saundarya)与“现前之福德”(sākṣāt puṇya)。此种民爱,正是图尔西达斯“奉爱之民本”(bhakti-लोकतंत्र)的暗示——神之降生并非只属王宫,亦为道路之主。继而至伐弥吉仙林之缘起,悲悯味转向寂静味:苦行林的清净、待客之礼、以及仙者的真义开示,使修行者悟得“林=内向”的旨趣。于此,离相不可测之罗摩(nirguṇa-agocara)藉有相行传(saguṇa-carita)而得现证;修持之所向不在外行之旅,而在“心之道场”(hṛdaya-āśrama)中安住罗摩——此即此阶(sopāna)之法义。
Verse 245 (चौपाई)
जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं।। एक कहहिं ए सहज सुहाए। आपु प्रगट भए बिधि न बनाए।। जहँ लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मन गोचर बरनी।। देखहु खोजि भुअन दस चारी। कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी।। इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा।। कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए। तेहिं इरिषा बन आनि दुराए।। एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं।। ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे।।
Verse 246 (दोहा/सोरठा)
एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर। किमि चलिहहि मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर।।120।।
Verse 247 (चौपाई)
नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकई साँझ समय जनु सोहीं।। मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी।। परसत मृदुल चरन अरुनारे। सकुचति महि जिमि हृदय हमारे।। जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा। कस न सुमनमय मारगु कीन्हा।। जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं।। जे नर नारि न अवसर आए। तिन्ह सिय रामु न देखन पाए।। सुनि सुरुप बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहाँ लगि भाई।। समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई।।
Verse 248 (दोहा/सोरठा)
अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं।। होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहँ जाहिं।।121।।
Verse 249 (चौपाई)
गाँव गाँव अस होइ अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू।। जे कछु समाचार सुनि पावहिं। ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं।। कहहिं एक अति भल नरनाहू। दीन्ह हमहि जोइ लोचन लाहू।। कहहिं परस्पर लोग लोगाईं। बातें सरल सनेह सुहाईं।। ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नगरु जहाँ तें आए।। धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ। जहँ जहँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ।। सुख पायउ बिरंचि रचि तेही। ए जेहि के सब भाँति सनेही।। राम लखन पथि कथा सुहाई। रही सकल मग कानन छाई।।
Verse 250 (दोहा/सोरठा)
एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत। जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत।।122।।
Verse 251 (चौपाई)
आगे रामु लखनु बने पाछें। तापस बेष बिराजत काछें।। उभय बीच सिय सोहति कैसे। ब्रह्म जीव बिच माया जैसे।। बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई।। उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही।। प्रभु पद रेख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता।। सीय राम पद अंक बराएँ। लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ।। राम लखन सिय प्रीति सुहाई। बचन अगोचर किमि कहि जाई।। खग मृग मगन देखि छबि होहीं। लिए चोरि चित राम बटोहीं।।
Verse 252 (दोहा/सोरठा)
जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ। भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ।।123।।
Verse 253 (चौपाई)
अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ। बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ।। राम धाम पथ पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई।। तब रघुबीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु सीतल पानी।। तहँ बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाइ चले रघुराई।। देखत बन सर सैल सुहाए। बालमीकि आश्रम प्रभु आए।। राम दीख मुनि बासु सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन।। सरनि सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले।। खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं।।
Verse 254 (दोहा/सोरठा)
सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन। सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन।।124।।
Verse 255 (चौपाई)
मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा।। देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने।। मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए। कंद मूल फल मधुर मगाए।। सिय सौमित्रि राम फल खाए। तब मुनि आश्रम दिए सुहाए।। बालमीकि मन आनँदु भारी। मंगल मूरति नयन निहारी।। तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई।। तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा।। अस कहि प्रभु सब कथा बखानी। जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी।।
Verse 256 (दोहा/सोरठा)
तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ। मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ।।125।।
Verse 257 (चौपाई)
देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे।। अब जहँ राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई।। मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं।। मंगल मूल बिप्र परितोषू। दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू।। अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ। सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ।। तहँ रचि रुचिर परन तृन साला। बासु करौ कछु काल कृपाला।। सहज सरल सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ग्यानी।। कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू।।
Verse 258 (छंद)
श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी। जो सृजति जगु पालति हरति रूख पाइ कृपानिधान की।। जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी। सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी।।
Verse 259 (दोहा/सोरठा)
राम सरुप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर। अबिगत अकथ अपार नेति नित निगम कह।।126।।
Verse 260 (चौपाई)
जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे।। तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहि को जाननिहारा।। सोइ जानइ जेहि देहु जनाई। जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई।। तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन।। चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी।। नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा।। राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे।। तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा। जस काछिअ तस चाहिअ नाचा।।
Verse 261 (दोहा/सोरठा)
पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ। जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ।।127।।
Verse 262 (चौपाई)
सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने।। बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी।। सुनहु राम अब कहउँ निकेता। जहाँ बसहु सिय लखन समेता।। जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।। भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे।। लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधर अभिलाषे।। निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी।। तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक।।
Verse 263 (दोहा/सोरठा)
जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु। मुकुताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु।।128।।
Verse 264 (चौपाई)
प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा। सादर जासु लहइ नित नासा।। तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं।। सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी।। कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदयँ नहि दूजा।। चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।। मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा।। तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना।। तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी। सकल भायँ सेवहिं सनमानी।।
Verse 265 (दोहा/सोरठा)
सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ। तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ।।129।।
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