Adhyaya 54
Shalya ParvaAdhyaya 5453 Versesरणभूमि से हटकर तीर्थ-परिसर में कथा; पर संकेत स्पष्ट है कि युद्ध का पलड़ा कौरव-विनाश की ओर झुक चुका है।

Adhyaya 54

गदायुद्ध-समारम्भः (Commencement of the Mace-Duel Proceedings)

Upa-parva: Gadāyuddha-prastāva (Prelude to the Mace Duel at Samantapañcaka)

Vaiśaṃpāyana introduces the aftermath of intense fighting and situates Dhṛtarāṣṭra’s grief-driven inquiry to Saṃjaya: how will Duryodhana confront Bhīma when Rāma (Balarāma) is present at the gadāyuddha? Saṃjaya reports Duryodhana’s renewed confidence upon attaining Rāma’s proximity. The narrative then shifts to logistical and sacral staging: Yudhiṣṭhira directs movement to Samantapañcaka, praised as Prajāpati’s famed altar-region and a place where death in battle is described as leading surely to heaven. The parties proceed westward to an open area south of the Sarasvatī, near the Svayana tīrtha, selecting it as the combat ground. Both duelists are described in heightened martial imagery—armored, mace-bearing, mutually appraising—while the gods and onlookers acclaim the approaching contest. Duryodhana formally announces to Yudhiṣṭhira that the duel is settled between himself and Bhīma, instructing the kings to sit and witness. Balarāma, honored among the seated royal circle, is depicted as centrally placed and luminous. The chapter closes with both combatants exchanging harsh words and standing poised like archetypal rivals, marking the transition from procession and proclamation to imminent engagement.

Chapter Arc: कुरुक्षेत्र के तीर्थ-प्रदेशों का दर्शन करते हुए सात्वतवंशी बलराम दान-धर्म से भूमि को पवित्र करते हैं और एक दिव्य, वन-समृद्ध आश्रम के रहस्य को जानने हेतु ऋषियों से प्रश्न करते हैं। → आश्रम-वैभव के पीछे छिपी तपस्या-कथा खुलती है—स्त्रियों के लिए ‘अत्यन्त दुष्कर’ घोर तप, देव-ब्राह्मणों का सम्मान, और अंततः स्वर्गगमन; इसी बीच देवर्षि नारद का आगमन कथा को तीर्थ-महिमा से युद्ध-भाग्य की ओर मोड़ देता है। → नारद के वचन बलराम के भीतर दबे क्षोभ को जगा देते हैं—कौरव-विनाश का संकेत और भीम-दुर्योधन के निर्णायक गदा-युद्ध का प्रसंग सुनकर कटु वचनों से व्यथित वीर हृदय से उठकर विशाल गदा ग्रहण करता है। → नारद की बात सुनकर बलराम अपने साथ आए श्रेष्ठ ब्राह्मणों का पूजन करते हैं और तीर्थ-यात्रा की शांति से लौटकर द्वारका-गमन का आदेश देते हैं—मानो युद्ध-धर्म से स्वयं को अलग रखते हुए भी उसके परिणाम को स्वीकार कर लेते हों। → भीम और दुर्योधन के गदा-युद्ध का अनिवार्य समागम निकट है—बलराम का मन किस ओर झुकेगा, और धर्म की कसौटी पर कौन-सा निर्णय टिकेगा?

Shlokas

Verse 1

आपय>जा>जों छा हि मा चतुष्पठ्चाशत्तमोडध्याय: प्लक्षप्रस्वण आदि तीर्थों तथा सरस्वतीकी महिमा एवं नारदजीसे कौरवोंके विनाश और भीम तथा दुर्योधनके युद्धका समाचार सुनकर बलरामजीका उसे देखनेके लिये जाना वैशम्पायन उवाच कुरुक्षेत्र ततो दृष्टवा दत्त्वा दायांश्व॒ सात्वत: । आश्रमं सुमहद्‌ दिव्यमगमज्जनमेजय

毗湿摩耶那说道:“其后,萨特瓦塔族的婆罗罗摩既已瞻礼俱卢之野,又依礼分施应施之物(布施诸份),便——噢,阇那梅阇耶——前往一处广大、光辉而神圣的隐修林。”

Verse 2

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! सात्वतवंशी बलरामजी कुरुक्षेत्रका दर्शन कर वहाँ बहुत-सा धन दान करके उस स्थानसे एक महान्‌ एवं दिव्य आश्रममें गये ।। मधूकाम्रवणोपेतं प्लक्षन्यग्रोधसंकुलम्‌ । चिरबिल्वयुतं पुण्यं पनसार्जुनसंकुलम्‌,महुआ और आमके वन उस आश्रमकी शोभा बढ़ा रहे थे। पाकड़ और बरगदके वृक्ष वहाँ अपनी छाया फैला रहे थे। चिलबिल, कटहल और अर्जुन (समूह)-के पेड़ चारों ओर भरे हुए थे। पुण्यदायक लक्षणोंसे युक्त उस पुण्यमय श्रेष्ठ आश्रमका दर्शन करके यादवश्रेष्ठ बलरामजीने उन समस्त ऋषियोंसे पूछा कि “यह सुन्दर आश्रम किसका है?”

毗湿摩耶那说道:“噢,阇那梅阇耶,萨特瓦塔族的婆罗罗摩瞻礼俱卢之野后,又在彼处广行布施,遂离开那里,前往一处宏大而神圣的隐修林。那隐修林有摩度迦与芒果林增其华美,遍布普拉克沙与尼耶伽罗陀(无花果与榕树)之荫,又有久立的毕尔瓦树点缀其间,并充满菠萝蜜与阿周那树——吉祥而生功德的清净道场。见此圣洁而卓绝的阿湿罗摩,雅陀婆中最尊的婆罗罗摩便问诸仙人:‘这座美丽的隐修林属于谁?’”

Verse 3

त॑ दृष्टवा यादवश्रेष्ठ: प्रवरं पुण्यलक्षणम्‌ । पप्रच्छ तानृषीन्‌ सर्वान्‌ कस्याश्रमवरस्त्वयम्‌,महुआ और आमके वन उस आश्रमकी शोभा बढ़ा रहे थे। पाकड़ और बरगदके वृक्ष वहाँ अपनी छाया फैला रहे थे। चिलबिल, कटहल और अर्जुन (समूह)-के पेड़ चारों ओर भरे हुए थे। पुण्यदायक लक्षणोंसे युक्त उस पुण्यमय श्रेष्ठ आश्रमका दर्शन करके यादवश्रेष्ठ बलरामजीने उन समस्त ऋषियोंसे पूछा कि “यह सुन्दर आश्रम किसका है?”

巴拉罗摩——雅度族中最卓越者——见到那座具足吉祥与净化之相的上妙精舍,便走近诸位仙人,问道:“这座美丽而至上的阿湿罗摩,究竟属于谁?”

Verse 4

ते तु सर्वे महात्मानमूचू राजन्‌ हलायुधम्‌ । शृणु विस्तरशो राम यस्यायं पूर्वमाश्रम:,राजन्‌! तब वे सभी ऋषि महात्मा हलधरसे बोले--“बलरामजी! पहले यह आश्रम जिसके अधिकारमें था, उसकी कथा विस्तारपूर्वक सुनिये--

毗舍波耶那说道:于是诸位大圣者对持犁者哈拉尤陀(巴拉罗摩)说道:“大王啊,罗摩啊,请细听此精舍昔日所属之人的来历。”

Verse 5

अत्र विष्णु: पुरा देवस्तप्तवांस्तप उत्तमम्‌ | अत्रास्य विधिवद्‌ यज्ञा: सर्वे वृत्ता: सनातना:,'प्राचीनकालमें यहाँ भगवान्‌ विष्णुने उत्तम तपस्या की है, यहीं उनके सभी सनातन यज्ञ विधिपूर्वक सम्पन्न हुए हैं

毗舍波耶那说道:“就在此地,远古之时,天神毗湿奴曾修行最上苦行;也正是在此,他一切恒常的祭祀皆依正法仪轨而圆满举行。”

Verse 6

अन्रैव ब्राह्मणी सिद्धा कौमारब्रह्म॒चारिणी । योगयुक्ता दिवं याता तपःसिद्धा तपस्विनी,“यहीं कुमारावस्थासे ब्रह्मचर्यका पालन करनेवाली एक सिद्ध ब्राह्मणी रहती थी, जो तपःसिद्ध तपस्विनी थी। वह योगयुक्त होकर स्वर्गलोकमें चली गयी

毗舍波耶那说道:“就在此处,曾住着一位已证成就的婆罗门女子,自幼守持梵行。她以苦行而得圆满,坚住于修行之律;入于瑜伽定中,遂升往天界。”

Verse 7

बभूव श्रीमती राजन्‌ शाण्डिल्यस्य महात्मन: । सुता धृतव्रता साध्वी नियता ब्रह्मचारिणी,“राजन! नियमपूर्वक व्रतधारण और ब्रह्मचर्यपालन करनेवाली वह तेजस्विनी साध्वी महात्मा शाण्डिल्यकी सुपुत्री थी

毗舍波耶那说道:“大王啊,她光辉而尊贵——乃大德圣者商提利耶之女——誓愿坚定,行止端正,自制严谨,专心奉持梵行。”

Verse 8

सा तु तप्त्वा तपो घोरें दुश्चरं सत्रीजनेन ह । गता स्वर्ग महाभागा देवब्राद्मणपूजिता

然而她修行了严酷而艰难的苦行——此等苦行,女子中罕有人能承受——遂得升天。她福德具足、备受尊崇,为诸天与婆罗门所敬礼;其一生昭示了由严谨自制与虔敬行持所生的道德威力。

Verse 9

'स्त्रियोंके लिये जो अत्यन्त दुष्कर था, ऐसा घोर तप करके देवताओं और ब्राह्मणोंद्वारा सम्मानित हुई वह महान्‌ सौभाग्यशालिनी देवी स्वर्गलोकको चली गयी थी” ।। श्रुत्वा ऋषीणां वचनमाश्रमं तं जगाम ह । ऋषींस्तानभिवाद्याथ पाश्वे हिमवतो5च्युत:

她行持了极其严厉的苦行——对女子而言尤为难忍——那位大福德的女神,受诸天与婆罗门礼敬,遂往天界而去。听闻诸仙之言,他便前往那处精舍;礼拜诸位仙人之后,那“不堕者”便停驻在喜马拉雅山侧。

Verse 10

नातिदूरं ततो गत्वा नगं तालध्वजो बली,जिनकी ध्वजापर तालका चिह्न सुशोभित होता है, वे बलरामजी उस पर्वतपर थोड़ी ही दूर गये थे कि उनकी दृष्टि एक पुण्यमय उत्तम तीर्थपर पड़ी। वह सरस्वतीकी उत्पत्तिका स्थान प्लक्षप्रख्वण नामक तीर्थ था। उसका दर्शन करके बलरामजीको बड़ा आश्चर्य हुआ

毗湿摩波耶那说:他从那里只行不远,力大无比的婆罗罗摩——其旗帜饰以棕榈树之徽——便到了一座山前。其目光落在一处至为神圣吉祥的圣地(tīrtha)上:那是萨拉斯瓦蒂河的发源处,名为“普拉克沙—普拉斯拉瓦那”(Plakṣa-prasravaṇa)。一见此地,婆罗罗摩心生大惊异,史诗由此彰显对圣地地理的敬畏,以及在战乱之中亦能净化身心的朝圣之力。

Verse 11

पुण्यं तीर्थवरं दृष्टवा विस्मयं परमं गत: । प्रभावं च सरस्वत्या: प्लक्षप्रस्रवणं बल:,जिनकी ध्वजापर तालका चिह्न सुशोभित होता है, वे बलरामजी उस पर्वतपर थोड़ी ही दूर गये थे कि उनकी दृष्टि एक पुण्यमय उत्तम तीर्थपर पड़ी। वह सरस्वतीकी उत्पत्तिका स्थान प्लक्षप्रख्वण नामक तीर्थ था। उसका दर्शन करके बलरामजीको बड़ा आश्चर्य हुआ

毗湿摩波耶那说:见到那至为神圣卓绝的圣地(tīrtha),婆罗罗摩惊异至极。于彼处,他目睹萨拉斯瓦蒂河显现的威神——在“普拉克沙—普拉斯拉瓦那”(Plakṣa-prasravaṇa),那被奉为其发源之所的圣地——此番相遇令人于战乱喧嚣中亦生对圣地地理与朝圣净化之力的敬畏。

Verse 12

सम्प्राप्त: कारपवन प्रवरं तीर्थमुत्तमम्‌ । हलायुधस्तत्र चापि दत्त्वा दानं महाबल:,फिर वे कारपवन नामक उत्तम तीर्थमें गये। महाबली हलधरने वहाँके निर्मल, पवित्र और अत्यन्त शीतल पुण्यदायक जलमें गोता लगाकर ब्राह्मणोंको दान दे देवताओं और पितरोंका तर्पण किया। तत्पश्चात्‌ रणदुर्मद बलरामजी यतियों और ब्राह्मणोंके साथ वहाँ एक रात रहकर मित्रावरुणके पवित्र आश्रमपर गये

毗湿摩波耶那说:执犁为兵的强大婆罗罗摩,来到名为“迦罗波伐那”(Kārapavana)的最胜、最上圣地(tīrtha)。他在彼处行施布施,以施舍来礼敬此地之神圣。此段凸显在大战暴烈之中亦有合乎法(dharma)的停驻:武士之力由朝圣、清净与敬畏所调和——并通过布施以及对诸天、仙圣与祖先的仪礼义务而显现。

Verse 13

आप्लुत: सलिले पुण्ये सुशीते विमले शुचौ । संतर्पयामास पितृन्‌ देवांश्व रणदुर्मद:,फिर वे कारपवन नामक उत्तम तीर्थमें गये। महाबली हलधरने वहाँके निर्मल, पवित्र और अत्यन्त शीतल पुण्यदायक जलमें गोता लगाकर ब्राह्मणोंको दान दे देवताओं और पितरोंका तर्पण किया। तत्पश्चात्‌ रणदुर्मद बलरामजी यतियों और ब्राह्मणोंके साथ वहाँ एक रात रहकर मित्रावरुणके पवित्र आश्रमपर गये

毗舍波耶那说:他在那功德之水中沐浴——清凉、澄澈而洁净——大力的婆罗罗摩,以“罗那杜尔摩达”(意为“战中自负者”)之名著称,遂为诸天与祖灵(pitṛ)行作塔尔帕那(tarpana,供水以令其满足之礼)。此段昭示:纵是勇武无双的战士,亦以净身、布施与敬奉天神与祖先之道来护持达摩。

Verse 14

तत्रोष्यैकां तु रजनीं यतिभिर्रद्मणै: सह । मित्रावरुणयो: पुण्यं जगामाश्रममच्युत:,फिर वे कारपवन नामक उत्तम तीर्थमें गये। महाबली हलधरने वहाँके निर्मल, पवित्र और अत्यन्त शीतल पुण्यदायक जलमें गोता लगाकर ब्राह्मणोंको दान दे देवताओं और पितरोंका तर्पण किया। तत्पश्चात्‌ रणदुर्मद बलरामजी यतियों और ब्राह्मणोंके साथ वहाँ एक रात रहकर मित्रावरुणके पवित्र आश्रमपर गये

毗舍波耶那说:他与苦行者与婆罗门同住一夜之后,阿周多(婆罗罗摩)便前往密多罗与伐楼那的神圣道场。此段彰显战士的克制与敬畏:纵在时代的杀伐之中,他仍为朝圣、为与持戒之人相伴、为亲近圣地而驻足——表明行为之清净与尊崇圣教机构,乃安定其心、护持达摩之责。

Verse 15

इन्द्रोडग्निरर्यमा चैव यत्र प्राक्‌ प्रीतिमाप्रुवन्‌ त॑ देशं कारपवनाद्‌ यमुनायां जगाम ह,उपविष्ट: कथा: शुभ्रा: शुश्राव यदुपुड्रवः । जहाँ पूर्वकालमें इन्द्र, अग्नि और अर्यमाने बड़ी प्रसन्नता प्राप्त की थी, वह स्थान यमुनाके तटपर है। कारपवनसे उस तीर्थमें जाकर महाबली धर्मात्मा बलरामने स्नान करके बड़ा हर्ष प्राप्त किया। फिर वे यदुपुंगव बलभद्र ऋषियों और सिद्धोंके साथ बैठकर उत्तम कथाएँ सुनने लगे

毗舍波耶那说:“在阎牟那河畔,有一处古昔因陀罗、阿耆尼与阿利耶曼曾得大欢喜之地——从迦罗波伐那出发,耶度族之雄便前往那里。于那圣渡沐浴之后,正直而大力的婆罗提婆心生深喜;继而与诸仙与成就者(悉地者,siddha)同坐,聆听高贵而净化人心的故事。”

Verse 16

स्‍्नात्वा तत्र च धर्मात्मा परां प्रीतिमवाप्य च । ऋषिभिश्नैव सिद्धैश्न सहितो वै महाबल:

他在彼处沐浴之后,那位具正法之心的大力者得大欢喜;并与诸仙及成就者(悉地者)相与为伴而住。此偈昭示:内在清净与顺达摩之性,自然引人趋向圣贤之交与深沉的满足,即便置身战争叙事的动荡之中亦然。

Verse 17

तथा तु तिष्ठतां तेषां नारदो भगवानृषि:

当他们仍如此停立之时,尊贵的仙人那罗陀(Nārada)到来——他是具权威的圣者,其出现往往预示劝诫、义理的澄明,或凭更高洞见而引发事势转折。

Verse 18

जटामण्डलसंवीत: स्वर्णचीरो महातपा:,राजन्‌! महातपस्वी नारद जटामण्डलसे मण्डित हो सुनहरा चीर धारण किये हुए थे। उन्होंने कमण्डलु, सोनेका दण्ड तथा सुखदायक शब्द करनेवाली कच्छपी नामक मनोरम वीणा भी ले रखी थी

毗湿摩波耶那说道:大王啊,大苦行者那罗陀现身而来,头戴盘结的结发之环,身披灿然金衣。他携带水罐(kamaṇḍalu)与金杖,又持名为“迦遮毗”(Kacchapī)的妙音维那琴,其声和婉安神——此乃圣者之相:在战乱喧腾之中,带来劝诫、克制与吉祥的指引。

Verse 19

हेमदण्डथरो राजन्‌ कमण्डलुधरस्तथा । कच्छपीं सुखशब्दां तां गृह्द वीणां मनोरमाम्‌,राजन्‌! महातपस्वी नारद जटामण्डलसे मण्डित हो सुनहरा चीर धारण किये हुए थे। उन्होंने कमण्डलु, सोनेका दण्ड तथा सुखदायक शब्द करनेवाली कच्छपी नामक मनोरम वीणा भी ले रखी थी

毗湿摩波耶那说道:“大王啊,大苦行者那罗陀现身,手持金杖与水罐(kamaṇḍalu);又执名为‘迦遮毗’(Kacchapī)的妙音维那琴,其声悦耳。”此景彰显圣者威仪:其修持与圣乐并举,昭示将以箴言安定人心,令其在战乱喧嚣中不致动摇。

Verse 20

नृत्ये गीते च कुशलो देवब्राह्मणपूजित: । प्रकर्ता कलहानां च नित्यं च कलहप्रिय:,वे नृत्य-गीतमें कुशल, देवताओं तथा ब्राह्मणोंसे सम्मानित, कलह करानेवाले तथा सदैव कलहके प्रेमी हैं

毗湿摩波耶那说道:他精于舞与歌,受诸天与婆罗门敬奉;然而他亦是挑起争端之人,且恒常嗜好纷争。此偈凸显道德上的反差:精雅的才艺与宗教/社会的尊荣,竟可与好斗扰乱的性情并存。

Verse 21

त॑ देशमगमद्‌ यत्र श्रीमान्‌ रामो व्यवस्थित: । प्रत्युत्थाय च त॑ सम्पक्‌ पूजयित्वा यतव्रतम्‌

毗湿摩波耶那说道:他前往吉祥威严的罗摩驻扎之处。罗摩起身相迎,并依礼敬奉那位自律之人——表明即便在战争重压之下,德行与克制仍当受应有的尊崇。

Verse 22

ततो<5स्याक थयदू राजन्‌ नारद: सर्वधर्मवित्‌

于是,那罗陀——通晓一切法(dharma)者——向他陈述其事,大王啊;他以正法与其果报为准绳,铺陈始末。

Verse 23

ततोअब्रवीद्‌ रोहिणेयो नारदं दीनया गिरा

于是,罗希涅耶以哀伤的声音对那罗陀说道。

Verse 24

किमवस्थं तु तत्‌ क्षत्रं ये तु तत्राभवन्‌ नृपा: । श्रुतमेतन्मया पूर्व सर्वमेव तपोधन

毗舍波耶那说道:“然而,那些刹帝利武士与当时在场的诸王后来如何了?我先前已听闻此事,苦行功德之宝啊,请你详尽道来。”

Verse 25

विस्तरश्रवणे जातं कौतूहलमतीव मे । तब रोहिणीनन्दन बलरामने दीनवाणीमें नारदजीसे पूछा--“तपोधन! जो राजा लोग वहाँ उपस्थित हुए थे, उन सब क्षत्रियोंकी क्या अवस्था हुई है, यह सब तो मैंने पहले ही सुन लिया था। इस समय कुछ विशेष और विस्तृत समाचार जाननेके लिये मेरे मनमें अत्यन्त उत्सुकता हुई है' ।। नारद उवाच पूर्वमेव हतो भीष्मो द्रोण: सिन्धुपतिस्तथा

因渴望听得更为详尽,罗希尼之子婆罗摩以凄然之声问那罗陀:“苦行功德之富者啊!当时在场的诸王与那些刹帝利究竟落得何等境地?先前之事我已听过;如今我心中极其好奇,愿闻更特别、更详尽的消息。”那罗陀说道:“先前,毗湿摩已被诛;德罗纳亦然,辛度之主也同样倒下。”

Verse 26

हतो वैकर्तन: कर्ण: पुत्राश्नास्य महारथा: । भूरिश्रवा रौहिणेय मद्रराजश्न वीर्यवान्‌

那罗陀说道:“瓦伊迦尔塔那·迦尔纳已被杀;他的诸子——皆为大车战士——亦同样殒命。布胡里施罗婆斯也已倒下,罗希涅耶(萨底耶迦)亦然,还有那勇武的摩陀罗王。”

Verse 27

नारदजीने कहा--रोहिणीनन्दन! भीष्मजी तो पहले ही मारे गये। फिर सिंधुराज जयद्रथ, द्रोण, वैकर्तन कर्ण तथा उसके महारथी पुत्र भी मारे गये हैं। भूरिश्रवा तथा पराक्रमी मद्रराज शल्य भी मार डाले गये ।। एते चान्ये च बहवस्तत्र तत्र महाबला: । प्रियान्‌ प्राणान्‌ परित्यज्य जयार्थ कौरवस्य वै

那罗陀说道:“罗希尼之子啊!毗湿摩早已被杀。其后,辛度王阇耶陀罗他、德罗纳、瓦伊迦尔塔那·迦尔纳及其大车战士之子也都被诛。布胡里施罗婆斯与勇武的摩陀罗王沙利耶亦被杀戮。并且还有许多大力勇士,在那战场的此处彼处,舍弃了他们珍爱的性命——确是为求考罗婆一方的胜利。”

Verse 28

अहतांस्तु महाबाहो शृणु मे तत्र माधव,महाबाहु माधव! जो वहाँ नहीं मारे गये हैं, उनके नाम भी मुझसे सुन लो। दुर्योधनकी सेनामें कृपाचार्य, कृतवर्मा और पराक्रमी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा-ये शत्रुदलका मर्दन करनेवाले तीन ही वीर शेष रह गये हैं

那罗陀说道:“噢,臂力无双的摩陀婆啊,请听我说那些在彼处未被杀戮之人;也请从我这里听他们的名号。在都利约陀那的军中,只剩三位英雄——克利帕阿阇黎、克利多跋摩,以及勇猛的德罗那之子阿湿婆他摩——皆以摧折敌军行列而闻名。”

Verse 29

धार्तराष्ट्रबले शेषास्त्रयः समितिमर्दना: । कृपश्च कृतवर्मा च द्रोणपुत्रश्न वीर्यवान्‌,महाबाहु माधव! जो वहाँ नहीं मारे गये हैं, उनके नाम भी मुझसे सुन लो। दुर्योधनकी सेनामें कृपाचार्य, कृतवर्मा और पराक्रमी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा-ये शत्रुदलका मर्दन करनेवाले तीन ही वीर शेष रह गये हैं

那罗陀说道:“噢,臂力无双的摩陀婆啊,也请从我这里听那些在彼处未被杀戮之人的名号。在都利约陀那的军中,只剩三位英雄——克利帕、克利多跋摩,以及德罗那之勇子阿湿婆他摩——皆为凶猛的敌阵摧破者。”

Verse 30

ते5पि वै विद्रुता राम दिशो दश भयात्‌ तदा | दुर्योधने हते शल्ये विद्रुतेषु कृपादिषु

那罗陀说道:“噢,罗摩啊,当时他们也因恐惧而奔逃,四散向十方——当都利约陀那已被诛杀,当沙利耶已倒下,而克利帕等人亦已遁走之时。”

Verse 31

शयान धार॑राष्ट्र तु सलिले स्तम्भिते तदा

随后,持国王(Dhātarāṣṭra)卧于其处,水流被遏止而归于寂静。在那罗陀的叙述中,此景昭示:纵然君王有权势与血统,也不能阻止肉身在命运与自身抉择的果报之前变得无助。

Verse 32

स तुद्यमानो बलवान्‌ वाग्भी राम समन्ततः

纵使四面八方皆以尖刻刺人的言辞相攻,强大的罗摩仍忍受这口舌之击,屹立于周遭责难之中——显出力量不仅在战场,更在受激而能自持的克制。

Verse 33

स चाप्युपगतो योद्धुं भीमेन सह साम्प्रतम्‌,इस समय वह भीमके साथ युद्ध करनेके लिये उनके पास जा पहुँचा है। राम! आज उन दोनोंमें बड़ा भयंकर युद्ध होगा, माधव! यदि तुम्हारे मनमें भी उसे देखनेका कौतूहल हो तो शीघ्र जाओ। यदि ठीक समझो तो अपने दोनों शिष्योंका वह महाभयंकर युद्ध अपनी आँखोंसे देख लो

那罗陀说道:“他如今也已出发,要与毗摩交战,并已来到他们面前。罗摩啊,今日这二人之间将有一场极其惨烈的大战。摩陀婆啊,若你心中也想亲眼一观,便速速前往。若你以为合宜,就用你自己的双眼去看你那两位弟子之间这场可怖的搏战。”

Verse 34

भविष्यति तयोरद्य युद्ध राम सुदारुणम्‌ । यदि कौतूहलं ते$स्ति ब्रज माधव मा चिरम्‌ | पश्य युद्ध महाघोरं शिष्ययोर्यदि मनन्‍्यसे,इस समय वह भीमके साथ युद्ध करनेके लिये उनके पास जा पहुँचा है। राम! आज उन दोनोंमें बड़ा भयंकर युद्ध होगा, माधव! यदि तुम्हारे मनमें भी उसे देखनेका कौतूहल हो तो शीघ्र जाओ। यदि ठीक समझो तो अपने दोनों शिष्योंका वह महाभयंकर युद्ध अपनी आँखोंसे देख लो

那罗陀说道:“罗摩啊,今日这二人之间必有一场极其残酷的战斗。摩陀婆啊,若你想亲眼见证,便立刻前往——莫要迟延。若你以为相宜,就用你自己的双眼去看你那两位弟子之间这场极端可怖的搏战。”

Verse 35

वैशम्पायन उवाच नारदस्य वच: श्रुत्वा तानभ्यर्च्य द्विजर्षभान्‌ । सर्वान्‌ विसर्जयामास ये तेनाभ्यागता: सह

毗湿摩波耶那说道:听罢那罗陀之言,他依礼敬奉那些如雄牛般卓越的婆罗门,随后又恭敬地遣散了随那罗陀同来的众人。

Verse 36

सो<वतीर्याचलश्रेष्ठात्‌ प्लक्षप्रस्रनणाच्छुभात्‌,फिर वे प्लक्षप्रसवण नामक शुभ पर्वतशिखरसे नीचे उतर आये और तीर्थ-सेवनका महान्‌ फल सुनकर प्रसन्नचित्त हो अच्युत बलरामने ब्राह्मणोंके समीप इस श्लोकका गान किया--

毗湿摩波耶那说道:他从群山之最胜者、吉祥的“普拉克沙·普拉斯拉瓦那”山巅下行;阿周多·婆罗罗摩听闻巡礼圣渡(tīrtha)所获的大功德,心中欢喜,便走近诸婆罗门,吟唱了这一偈。

Verse 37

ततः प्रीतमना राम: श्र॒ुत्वा तीर्थफलं महत्‌ | विप्राणां संनिधौ "लोकमगायदिममच्युत:,फिर वे प्लक्षप्रसवण नामक शुभ पर्वतशिखरसे नीचे उतर आये और तीर्थ-सेवनका महान्‌ फल सुनकर प्रसन्नचित्त हो अच्युत बलरामने ब्राह्मणोंके समीप इस श्लोकका गान किया--

于是罗摩(婆罗罗摩)听闻巡礼圣渡(tīrtha)所获的大功德,心生欢喜,便在婆罗门面前吟唱了这一偈。

Verse 38

सरस्वतीवाससमा कुतो रति: सरस्वतीवाससमा: कुतो गुणा: । सरस्वतीं प्राप्प दिवं गता जना: सदा स्मरिष्यन्ति नदीं सरस्वतीम्‌,“सरस्वती नदीके तटपर निवास करनेमें जो सुख और आनन्द है, वह अन्यत्र कहाँसे मिल सकता है? सरस्वतीतटपर निवास करनेमें जो गुण हैं, वे अन्यत्र कहाँ हैं? सरस्वतीका सेवन करके स्वर्गलोकमें पहुँचे हुए मनुष्य सदा सरस्वती नदीका स्मरण करते रहेंगे!

毗湿摩波耶那说道:“还有哪里能找到与居住在萨拉斯瓦蒂河岸同等的欢悦?还有哪里能得与在彼处居住所获相当的德行?凡亲近萨拉斯瓦蒂,并凭其净化之力而升至天界者,必将永远忆念萨拉斯瓦蒂之河。”

Verse 39

सरस्वती सर्वनदीषु पुण्या सरस्वती लोकशुभावहा सदा । सरस्वती प्राप्प जना: सुदुष्कृतं सदा न शोचन्ति परत्र चेह च,“सरस्वती सब नदियोंमें पवित्र है। सरस्वती सदा सम्पूर्ण जगत्‌का कल्याण करनेवाली है। सरस्वतीको पाकर मनुष्य इहलोक और परलोकमें कभी पापोंके लिये शोक नहीं करते हैं!

毗湿摩波耶那说道:“诸河之中,萨拉斯瓦蒂最为圣洁;萨拉斯瓦蒂恒常为世间带来吉祥安宁。凡抵达(或沐浴于)萨拉斯瓦蒂者,无论此世或彼世,都不再为自己沉重的恶业而悲叹。”

Verse 40

ततो मुहुर्मुहुः प्रीत्या प्रेक्षमाण: सरस्वतीम्‌ । हयैर्युक्ते रथं शुभ्रमातिषछ्ठत परंतप:,तदनन्तर शत्रुओंको संताप देनेवाले बलरामजी बारंबार प्रेमपूर्वक सरस्वती नदीकी ओर देखते हुए घोड़ोंसे जुते उज्ज्वल रथपर आरूढ़ हुए

随后,他怀着亲爱之喜,一次又一次地回望萨拉斯瓦蒂河。继而,那位灼敌者登上了以骏马驾驭的明辉战车。

Verse 41

स शीघ्रगामिना तेन रथेन यदुपुड्भव: । दिदृक्षुरभिसम्प्राप्त: शिष्ययुद्धमुपस्थितम्‌,उसी शीघ्रगामी रथके द्वारा तत्काल उपस्थित हुए दोनों शिष्योंका युद्ध देखनेके लिये यदुपुंगव बलरामजी उनके पास जा पहुँचे

毗湿摩波耶那说道:于是,雅度族之最胜者婆罗罗摩乘那疾驰战车立刻赶到,只为亲眼见证两位弟子之间已然兴起的决斗。

Verse 53

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापव॑नमें बलदेवजीकी तीर्थयात्रा और सारस्वतोपाख्यानके प्रसंगमें कुरुक्षेत्रकी महिमाका वर्णनविषयक तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ

至此,《圣摩诃婆罗多》“沙利耶篇”之中、关于钉锤之章的第五十三章告终:在婆罗提婆的朝圣与“萨拉斯瓦塔”故事的脉络里,叙述了俱卢之地(库鲁克舍特罗)的荣耀与威德。

Verse 54

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने चतुष्पञ्चाशत्तमो<ध्याय:

至此,在《圣摩诃婆罗多》中,于《沙利耶篇》之内——尤指《杵斗篇》——在婆罗提婆(巴拉罗摩)巡礼诸圣渡口(tīrtha)之际,于名为《萨拉斯瓦塔传说》(Sārasvata Upākhyāna)这一段落中,第五十四章告终。此句为正式的卷末题记(colophon),将叙事安置于更宏阔的伦理框架:在战争的暴烈之中,追念诸圣地与典范故事,乃自制、反省与趋向达摩之源。

Verse 96

संध्याकार्याणि सर्वाणि निर्वत्यरुरुहेड्चलम्‌ । ऋषियोंका वचन सुनकर अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले बलरामजी उस आश्रममें गये। वहाँ हिमालयके पार्श्रभागमें उन ऋषियोंको प्रणाम करके संध्या-वन्दन आदि सब कार्य करनेके अनन्तर वे हिमालयपर चढ़ने लगे

毗湿摩波耶那曰:既已如法完成一切暮时祭仪(sandhyā),巴拉罗摩——其神圣威德从不稍减——听从诸仙之言,前往那处精舍。其后在喜马拉雅山的山麓,他向诸圣者稽首;又行暮礼(sandhyā-vandana)及诸般所规定的修持,然后便开始登上喜马拉雅山。

Verse 163

उपविष्ट: कथा: शुभ्रा: शुश्राव यदुपुड्रवः । जहाँ पूर्वकालमें इन्द्र, अग्नि और अर्यमाने बड़ी प्रसन्नता प्राप्त की थी, वह स्थान यमुनाके तटपर है। कारपवनसे उस तीर्थमें जाकर महाबली धर्मात्मा बलरामने स्नान करके बड़ा हर्ष प्राप्त किया। फिर वे यदुपुंगव बलभद्र ऋषियों और सिद्धोंके साथ बैठकर उत्तम कथाएँ सुनने लगे

毗湿摩波耶那曰:雅度族之雄杰端坐其处,聆听清净吉祥之谈。彼地在阎牟那河畔——古时因陀罗、阿耆尼与阿利耶曼曾于此得大欢喜。大力而持法的巴拉罗摩循迦罗波伐那(Kārapavana)之路抵达此圣渡(tīrtha),沐浴其间,心生极乐。继而,雅度之长巴拉婆陀罗与诸仙及诸成就者(siddha)同坐,聆听上妙故事。

Verse 216

देवर्षि पर्यपृच्छत्‌ स यथा वृत्तं कुरून्‌ प्रति । वे उस स्थानपर गये, जहाँ तेजस्वी बलराम बैठे हुए थे। उन्होंने उठकर नियम और व्रतका पालन करनेवाले देवर्षिका भलीभाँति पूजन करके उनसे कौरवोंका समाचार पूछा

毗湿摩波耶那曰:天仙(devarṣi)详加询问有关俱卢一族所发生的一切。于是众人前往光辉的巴拉罗摩所坐之处;他们起身,依礼敬奉那位坚守誓戒与行持的天仙,并向他询问俱卢诸子(考罗婆)的消息,欲在战争的道德重压之下得闻真实的经过。

Verse 226

सर्वमेतद्‌ यथावृत्तमतीव कुरुसंक्षयम्‌ | राजन! तब सम्पूर्ण धर्मोके ज्ञाता नारदजीने उनसे यह सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे बता दिया कि कुरुकुलका अत्यन्त संहार हो गया है

毗湿摩波耶那曰:“大王啊,通达一切达摩教义的那罗陀,如实无差地将全部经过尽数告知,并以真言宣示:俱卢宗族已遭极其惨烈、几近覆灭的毁灭。”

Verse 273

राजानो राजपुत्राश्व॒ समरेष्वनिवर्तिन: । ये तथा और भी बहुत-से महाबली राजा और राजकुमार जो युद्धसे पीछे हटनेवाले नहीं थे, कुरुराज दुर्योधनकी विजयके लिये अपने प्यारे प्राणोंका परित्याग करके स्वर्गलोकमें चले गये हैं

那罗陀说道:“诸王与王子——战阵之中不肯退却——以及许多其他强大的君主与皇族子弟,都未曾从战斗中回身退避。为了俱卢王杜尤陀那的胜利,他们舍弃了自己珍爱的生命,前往天界。”

Verse 303

हृदं द्वैघायनं नाम विवेश भूशदु:खित: । परंतु बलरामजी! जब शल्य मारे गये, तब ये तीनों भी भयके मारे सम्पूर्ण दिशाओंमें पलायन कर गये थे। शल्यके मारे जाने और कृप आदिके भाग जानेपर दुर्योधन बहुत दुःखी हुआ और भागकर द्वैपायनसरोवरमें जा छिपा

那罗陀说道:“他被忧愁与苦恼所压倒,便进入名为‘德瓦伊伽耶那’的湖中。噢,婆罗罗摩啊,当沙利耶被诛之时,那三人也因恐惧而向四方逃散。沙利耶既亡,克利波等又离去,杜尤陀那悲痛至极,遂奔逃而去,藏身于德瓦伊帕耶那湖中。”

Verse 313

पाण्डवा: सह कृष्णेन वाग्भिरुग्राभिरार्दयन्‌ । जब दुर्योधन जलको स्तम्भित करके उसके भीतर सो रहा था, उस समय पाण्डवलोग भगवान्‌ श्रीकृष्णके साथ वहाँ आ पहुँचे और अपनी कठोर बातोंसे उसे कष्ट पहुँचाने लगे

那罗陀说道:“般度五子与克利须那同行,以严厉之言攻逼于他。彼时杜尤陀那凝止水势,藏身其中沉睡;般度诸子与圣者室利·克利须那来到那里,便以峻厉之语使他痛苦。”

Verse 323

उत्थितः स हृदाद्‌ वीर: प्रगृह् महतीं गदाम्‌ | बलराम! जब सब ओरसे कड़वी बातोंद्वारा उसे व्यथित किया जाने लगा, तब वह बलवान्‌ वीर विशाल गदा हाथमें लेकर सरोवरसे उठ खड़ा हुआ

那罗陀说道:“那位勇士自湖中起身,执起他那巨大的钉锤。噢,婆罗罗摩啊,当四面八方的刻薄言辞开始刺痛并扰乱他时,那强悍的战士便从水中挺立而出,紧握沉重的巨棒。”

Verse 356

गम्यतां द्वारकां चेति सोडन्वशादनुयायिन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! नारदजीकी बात सुनकर बलरामजीने अपने साथ आये हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें विदा कर दिया और सेवकोंको आज्ञा दे दी कि तुम लोग द्वारका चले जाओ

毗湿摩波耶那说道:“大王啊,听罢那罗陀之言,婆罗罗摩礼敬并供养随行而来的尊贵婆罗门,继而恭敬送别他们。又命侍从道:‘你们回德瓦罗迦去。’”

Verse 1736

आजगामाथ तं॑ देशं यत्र रामो व्यवस्थित: । इस प्रकार वे लोग वहीं ठहरे हुए थे, तबतक देवर्षि भगवान्‌ नारद भी उनके पास उसी स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ बलरामजी विराजमान थे

毗湿摩波耶那说道:随后,他来到了罗摩(婆罗罗摩)驻留的那片地域。众人仍停留其间时,天界圣仙那罗陀也抵达此处,趋近婆罗罗摩——仿佛昭示:纵在战争的喧嚣动荡之中,更高的劝诫与道德的眼光亦会降临,引导事态的走向。

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns legitimacy in terminal conflict: whether decisive violence can remain within publicly recognized rules (witnessed duel, chosen ground, acknowledged umpire-like presence) even as grief and desperation intensify.

The text implies that actions gain ethical weight through context—place, procedure, and public accountability—suggesting that dharma is not only intention but also the regulated form in which power is exercised.

A direct phalaśruti is not presented; however, the chapter includes a normative claim that death in battle at the highly sanctified Samantapañcaka leads surely to heaven, functioning as an embedded moral framing of the chosen venue.