
अध्याय २२ — अमर्याद-युद्धवर्णन (Unrestrained Battle Description and Śakuni’s Rear Assault)
Upa-parva: Yuddha-varṇana (Late-phase engagements and omens in Śalya-parva)
Sañjaya reports to Dhṛtarāṣṭra that, during a terrifying and chaotic phase of the battle, the Kaurava and Pāṇḍava forces engage without visible withdrawal, producing heavy mutual losses amid impaired visibility and noise. Yudhiṣṭhira, angered and intent on victory, strikes key opponents; Duryodhana dispatches a large ratha-force toward Yudhiṣṭhira, temporarily obscuring him with missile volleys. As the engagement intensifies, ominous phenomena arise—earth tremors, meteor-like falls, abnormal winds, and distressed elephants—yet the warriors continue, oriented toward heaven through kṣatriya ideals. Śakuni proposes a rear-strike and later executes disruptive attacks from behind with a substantial cavalry component, fracturing the Pāṇḍava host ‘like a cloud driven by wind.’ Yudhiṣṭhira orders Sahadeva, supported by Draupadeyas and combined arms (elephants, horses, infantry), to pursue and neutralize Śakuni. The chapter closes with a grim depiction of close-quarters combat, bodily devastation, and the breakdown of conventional limits (maryādā) in warfare.
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहता है कि रथस्थ दुर्योधन रुद्र के समान दुर्धर्ष हो उठा—उसका पराक्रम ऐसा कि पाण्डव-सेना के ‘सैन्यसागर’ में कोई मनुष्य, घोड़ा, हाथी या रथ बाणों से अविक्षत नहीं बचता। → दोनों पक्षों की टुकड़ियाँ अपने-अपने समकक्षों से भिड़ती हैं—मनुष्य मनुष्य से, हाथी हाथी से, घोड़े घोड़ों से, रथी रथियों से। रथचक्रों और दन्तियों के उच्छ्वास से उठी धूल संध्याकालीन मेघों-सी सूर्यपथ को ढँक देती है; दृश्य-श्रव्य कोलाहल युद्ध को घोर घमासान में बदल देता है। → उलूक (शकुनि-पुत्र) महाधनुर्धर नकुल पर टूट पड़ता है, और प्रत्युत्तर में नकुल उसे प्रचण्ड शरवर्षा से चारों ओर से अवरुद्ध कर देता है; साथ ही गौतम आदि कौरव-वीर द्रौपदीपुत्रों पर क्रुद्ध होकर धावा बोलते हैं—एक साथ कई मोर्चों पर तीव्र द्वंद्व उभर आते हैं। → कौरव-योद्धा राजा दुर्योधन को केन्द्र मानकर कवचधारी होकर चारों ओर घेरा बाँध लेते हैं; पाण्डव-आक्रमण के बीच कौरव-पक्ष अपनी रक्षा-व्यवस्था सुदृढ़ कर क्षणिक स्थिरता प्राप्त करता है। → धूल-आवरण और बहु-द्वंद्वों के बीच यह अनिश्चित रह जाता है कि नकुल-उलूक का संघर्ष किस ओर निर्णायक मोड़ लेगा और द्रौपदीपुत्रों पर टूटे आक्रमण का परिणाम क्या होगा।
Verse 1
भीकम (2 अमान द्ाविशोद्ध्याय: दुर्योधनका पराक्रम और उभयपक्षकी सेनाओंका घोर सग्राम संजय उवाच पुत्रस्तु ते महाराज रथस्थो रथिनां वर: । दुरुत्सहो बभौ युद्धे यथा रुद्र: प्रतापवान्
三阇耶说道:大王啊,你的儿子端坐战车之上,为车战勇士之最;在战场上他显得不可抵当,威光炽盛,犹如大能的鲁陀罗。
Verse 2
संजय कहते हैं--महाराज! रथपर बैठा हुआ रथियोंमें श्रेष्ठ आपका प्रतापी पुत्र दुर्योधन रुद्रदेवके समान युद्धमें शत्रुओंके लिये दुःसह प्रतीत होने लगा ।। तस्य बाणसहसैस्तु प्रच्छन्ना हुभवन्मही । परांश्न॒ सिषिचे बाणैर्धाराभिरिव पर्वतान्,उसके सहस्रों बाणोंसे वहाँकी सारी पृथ्वी आच्छादित हो गयी। जैसे मेघ जलकी धाराओंसे पर्वतको सींचते हैं, उसी प्रकार वह शत्रुओंको अपनी बाणधारासे नहलाने लगा
三阇耶说道:大王啊,你那英勇的儿子都利约陀那端坐战车,为车战勇士之最;在战场上他宛如鲁陀罗亲临,使敌军难以承受。他以千百箭矢遮蔽了那里的大地,又以箭流如雨倾泻于对阵之众,正如雨云以瀑落般的水帘浇灌群山。
Verse 3
न च सोड<स्ति पुमान् कश्चित् पाण्डवानां बलार्णवे । हयो गजो रथो वापि य: स्याद् बाणैरविक्षत:,पाण्डवोंके सैन्यसागरमें कोई भी ऐसा मनुष्य, घोड़ा, हाथी अथवा रथ नहीं था, जो दुर्योधनके बाणोंसे क्षत-विक्षत न हुआ हो
三阇耶说道:在那如海般浩大的般度族军阵中,没有任何一人——也没有马、象或战车——能不被都利约陀那的箭矢所伤。
Verse 4
यं यं हि समरे योध॑ प्रपश्यामि विशाम्पते । सस बाणैश्नितो<भूद् वै पुत्रेण तव भारत,प्रजानाथ! भरतनन्दन! मैं समरांगणमें जिस-जिस योद्धाको देखता था, वही-वही आपके पुत्रके बाणोंसे व्याप्त हुआ दिखायी देता था
三阇耶说道:民众之主啊,婆罗多后裔啊,在战场上,我每看见一名战士,那战士便仿佛已被你儿子的箭矢刺穿、遍体所覆。
Verse 5
यथा सैन्येन रजसा समुद्धूतेन वाहिनी । प्रत्यदृश्यत संछन्ना तथा बाणैर्महात्मन:,जैसे सैनिकोंद्वारा उड़ायी हुई धूलसे सारी सेना आच्छादित हो गयी थी, उसी प्रकार वह महामनस्वी दुर्योधनके बाणोंसे ढकी दिखायी देती थी
三阇耶说道:正如军阵行进时被士卒扬起的尘土所遮蔽,那支大军也同样仿佛蒙上帷幕——被那位大心勇士的箭矢所覆盖。
Verse 6
बाणभूतामपश्याम पृथिवीं पृथिवीपते । दुर्योधनेन प्रकृतां क्षिप्रहस्तेन धन्विना,पृथ्वीपते! हमने देखा कि शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले धनुर्धर वीर दुर्योधनने सारी रणभूमिको बाणमयी कर दिया है
三阇耶说道:大王啊,我们看见大地——确乎整个战场——被都利约陀那这位出手如电的弓手所造作,化作一片密密麻麻的箭林。
Verse 7
तेषु योधसहस्रेषु तावकेषु परेषु च । एको दुर्योधनो हयासीत् पुमानिति मतिर्मम,आपके या शत्रुपक्षके सहस्रों योद्धाओंमें मुझे एकमात्र दुर्योधन ही वीर पुरुष जान पड़ता था
三阇耶说道:在那成千上万的战士之中——无论在王军还是敌军——依我之见,唯有都利约陀那一人真正显出英雄男儿的气概。
Verse 8
तत्राद्भुतमपश्याम तव पुत्रस्य विक्रमम् । यदेक॑ सहिता: पार्था नाभ्यवर्तन्त भारत,भारत! हमने वहाँ आपके पुत्रका यह अद्भुत पराक्रम देखा कि समस्त पाण्डव एक साथ मिलकर भी उस एकाकी वीरका सामना नहीं कर सके
在那里,我们目睹了你儿子惊人的勇武:即便普利塔之子们(般度五子)合而为一,也无法推进去迎战那孤身的英雄,噢,婆罗多啊。
Verse 9
युधिष्ठिरें शतेनाजौ विव्याध भरतर्षभ । भीमसेनं च सप्तत्या सहदेवं च पठचभि:
三阇耶说道:婆罗多族中的雄牛啊,在激战之中,他以百箭贯穿坚战(Yudhiṣṭhira);又以七十箭射中怖军(Bhīmasena);并以五箭射中娑诃提婆(Sahadeva)。
Verse 10
नकुलं च चतुःषष्ट्या धृष्टद्युम्नं च पठचभि: । सप्तभिद्रौपदेयां श्र त्रिभिविव्याध सात्यकिम्
三阇耶说道:他以六十四箭射中那俱罗(Nakula),以五箭射中德里什塔丢摩那(Dhṛṣṭadyumna),以七箭射中德劳帕蒂之子们,并以三箭射中萨底耆(Sātyaki)。
Verse 11
धनुश्चिच्छेद भल्लेन सहदेवस्य मारिष | भरतश्रेष्ठ! उसने युद्धस्थलमें युधिष्ठिरको सौ, भीमसेनको सत्तर, सहदेवको पाँच, नकुलको चौंसठ, धृष्टद्युम्नको पाँच, द्रौपदीके पुत्रोंकी सात तथा सात्यकिको तीन बाणोंसे घायल कर दिया। मान्यवर! साथ ही उसने एक भल्ल मारकर सहदेवका धनुष भी काट डाला |। तदपास्य धनुश्कछिन्नं माद्रीपुत्र: प्रतापवान्
三阇耶说道:“尊者啊,他以锋利的婆罗罗箭(bhalla)斩断了萨诃提婆的弓。婆罗多族中最卓越者啊!在战场上,他以百箭射伤坚战(Yudhiṣṭhira),以七十箭射伤怖军(Bhīmasena),以五箭射伤萨诃提婆,以六十四箭射伤那俱罗(Nakula),以五箭射伤德里什塔丢姆那(Dhṛṣṭadyumna),又使德罗帕蒂之子各中七箭,并以三箭射伤萨底耆(Sātyaki)。而且,尊贵的先生啊,他又以一支婆罗罗箭将萨诃提婆的弓一并截断。萨诃提婆——那勇武的摩德利之子——抛却断弓,整备再战。”
Verse 12
अभ्यद्रवत राजानं प्रगृह्मान्यन्महद् धनुः । ततो दुर्योधन संख्ये विव्याध दशभि: शरै:
三阇耶说道:“他执起另一张大弓,径直冲向国王。随即在鏖战之中,难敌(Duryodhana)以十箭贯射于他。”
Verse 13
प्रतापी माद्रीपुत्र सहदेवने उस कटे हुए धनुषको फेंककर दूसरा विशाल धनुष हाथमें ले राजा दुर्योधनपर धावा किया और युद्धस्थलमें दस बाणोंसे उसे घायल कर दिया ।। नकुलस्तु ततो वीरो राजानं नवशभि: शरै: । घोररूपैर्महेष्वासो विव्याध च ननाद च,इसके बाद महाधनुर्धर वीर नकुलने नौ भयंकर बाणोंद्वारा राजा दुर्योधनको बींध डाला और उच्चस्वरसे गर्जना की
三阇耶说道:“摩德利之子、勇武的萨诃提婆抛却被斩断的弓,执起另一张大弓,径直扑向难敌王(Duryodhana)。在战场上,他以十箭射伤其身。继而,英勇的那俱罗——伟大的弓手——又以九支可怖之箭贯穿难敌王,并高声怒吼。”
Verse 14
सात्यकिश्लैव राजानं शरेणानतपर्वणा । द्रौपदेयास्त्रिसप्तत्या धर्मराजशक्ष॒ पठचभि:
三阇耶说道:“萨底耆(Sātyaki)以一支节处刻缺、凶猛的箭射中国王。德罗帕蒂之子七十人,以及法王(Dharmarāja,坚战 Yudhiṣṭhira)亦同五名随从,一齐逼近,合势进攻。”
Verse 15
समन्तात् कीर्यमाणस्तु बाणसंघैर्महात्मभि:
三阇耶说道:“四面八方,伟心的战士们放出密集的箭雨,将他层层笼罩。”
Verse 16
लाघवं सौष्ठवं चापि वीर्य चापि महात्मन:
三阇耶说道:“(他展现了)敏捷、精妙的卓越,以及那位大心者的英雄之力。”
Verse 17
धार्रराष्ट्रा हि राजेन्द्र योधास्तु स्वल्पमन्तरम्
三阇耶说道:“噢,诸王之最,达尔陀罗ाष्ट्र的战士们彼此仅隔着极短的距离。”
Verse 18
तेषामापततां घोरस्तुमुल: समपद्यत
三阇耶说道:当那些战士彼此猛扑而上时,一场可怖而喧腾的冲撞随之爆发。
Verse 19
क्षुब्धस्य हि समुद्रस्य प्रावृटूकाले यथा स्वन: । जैसे वर्षाकालमें विक्षुब्ध हुए समुद्रकी भीषण गर्जना सुनायी देती है, उसी प्रकार उन आक्रमणकारी कौरवोंका घोर एवं भयंकर कोलाहल प्रकट होने लगा ।। समासाद्य रणे ते तु राजानमपराजितम्
三阇耶说道:“正如雨季里翻搅的海洋发出骇人的咆哮,那些冲杀而来的俱卢军亦掀起凶猛而可怖的喧嚣。待他们在战阵中逼近那位不可征服的国王……”
Verse 20
भीमसेन रणे क्रुद्धो द्रोणपुत्रो न्यवारयत्,महाराज! रणक्षेत्रमें कुपित हुए द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने सम्पूर्ण दिशाओंमें छोड़े गये अनेक प्रकारके बाणोंद्वारा भीमसेनको आगे बढ़नेसे रोक दिया। उस समय संग्राममें न तो वीरोंकी पहचान होती थी और न दिशाओंकी, फिर अवान्तर-दिशाओं (कोणों)-की तो बात ही क्या है?
三阇耶说道:大王啊,在战斗中,怒火炽盛的毗摩塞那被阻住了。战场上,德罗那之子阿湿婆他摩亦愤怒非常,向四方射出多种箭矢,拦阻毗摩前进。那时战阵喧乱,既难辨诸勇士,也难分方位——更不用说斜向的中间方了。
Verse 21
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें सात्यकि और कृतवर्गाका युद्धविषयक इकक््कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,नानाबाणैर्महाराज प्रमुक्तै: सर्वतोदिशम् । नाज्ञायन्त रणे वीरा न दिश: प्रदिश: कुतः महाराज! रणक्षेत्रमें कुपित हुए द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने सम्पूर्ण दिशाओंमें छोड़े गये अनेक प्रकारके बाणोंद्वारा भीमसेनको आगे बढ़नेसे रोक दिया। उस समय संग्राममें न तो वीरोंकी पहचान होती थी और न दिशाओंकी, फिर अवान्तर-दिशाओं (कोणों)-की तो बात ही क्या है?
三阇耶说道:“大王啊,当无数各式箭矢向四面八方齐发时,战场陷入极度混乱,勇士们彼此难以辨认,方位也无法分清——更不用说斜向的中间方了。在那片混沌之中,德罗那之子阿湿婆他摩怒火炽盛,以遍覆诸方的箭雨遏止了毗摩塞那的推进。”
Verse 22
तावुभौ क्रूरकर्माणावुभौ भारत दुःसहौ । घोररूपमयुध्येतां कृतप्रतिकृतेषिणा,भारत! वे दोनों वीर क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले और शत्रुओंके लिये दुःसह थे। अतः एक-दूसरेके प्रहारका भरपूर जवाब देनेकी इच्छा रखकर वे घोर युद्ध करने लगे इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे द्वाविंशो5ध्याय:
三阇耶说道:“婆罗多啊,那两位勇士行事皆极其凶烈,令敌人难以承受。怀着以满满反击偿还每一次打击的心意,他们展开了阴森而可怖的厮杀。”
Verse 23
त्रासयन्तौ दिश: सर्वा ज्याक्षेपकठिनत्वचौ । शकुनिस्तु रणे वीरो युधिष्ठिरमपीडयत्,प्रत्यंचा खींचनेसे उनके हाथोंकी त्वचा बहुत कठोर हो गयी थी और वे सम्पूर्ण दिशाओंको आतंकित कर रहे थे। दूसरी ओर वीर शकुनि रणभूमिमें युधिष्ठिरको पीड़ा देने लगा
三阇耶说道:“那些战士因反复用力拉弓弦,双手皮肤早已磨砺得坚硬如革,威势震慑四方。与此同时,勇猛的沙昆尼在战阵之中开始逼迫并折磨由提施提罗。”
Verse 24
तस्याश्चांश्व॒तुरो हत्वा सुबलस्य सुतो विभो । नादं चकार बलवत् सर्वसैन्यानि कोपयन्,प्रभो! सुबलके उस पुत्रने युधिष्ठिरके चारों घोड़ोंको मारकर सम्पूर्ण सेनाओंका क्रोध बढ़ाते हुए बड़े चोरसे सिंहनाद किया
三阇耶说道:“大能者啊,苏婆罗之子杀死了那战车的四匹马,随即发出一声震天长吼,激起诸军的怒火。”
Verse 25
एतस्मिन्नन्तरे वीरं राजानमपराजितम् । अपोवाह रथेनाजौ सहदेव: प्रतापवान्,इसी बीचमें प्रतापी सहदेव युद्धमें किसीसे परास्त न होनेवाले वीर राजा युधिष्ठिरको अपने रथपर बिठाकर दूर हटा ले गये
三阇耶说道:“就在那一刻,英勇的萨诃提婆威光赫赫,以战车将那位不可战胜的英雄之王由提施提罗载走,离开战场,退至更为安全的距离。”
Verse 26
अथान्यं रथमास्थाय थधर्मपुत्रो युधिष्ठिर: । शकुनिं नवभिर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध पञ्चभि:,तदनन्तर धर्मपुत्र युधिष्ठिरने दूसरे रथपर आरूढ़ हो पुनः धावा किया और शकुनिको पहले नौ बाणोंसे घायल करके फिर पाँच बाणोंसे बींध डाला
三阇耶说道:于是,法子犹提施提罗登上另一辆战车,再度冲锋。他以九箭射中沙昆尼,又复以五箭贯穿——以坚决之志推进战局,直面那位煽动非义(adharma)的主要祸首之一。
Verse 27
ननाद च महानादं प्रवर: सर्वधन्विनाम् । तद् युद्धमभवच्चित्रं घोररूपं च मारिष
三阇耶说道:诸弓手之最杰者发出一声震天长啸。于是战斗变得奇观可观,却又形貌狰狞可怖——既令人敬畏,又显露战争骇人的代价,噢,尊者。
Verse 28
उलूकस्तु महेष्वासं नकुलं युद्धदुर्मदम्
三阇耶说道:随后,乌卢迦迎战那俱罗——这位大弓手在战阵之中,傲气与凶猛的自信更被激起。
Verse 29
तथैव नकुल: शूर: सौबलस्य सुतं रणे
三阇耶说道:同样地,英勇的那俱罗在战阵之中迎上了苏婆罗之子——继续那不容停歇、以职责为纲的厮杀,在其中勇气与决心时时受试炼。
Verse 30
तौ तत्र समरे वीरौ कुलपुत्रौ महारथौ
三阇耶说道:就在那战场上,那两位英雄——出身高贵的名门之子、伟大的车战勇士(摩诃罗陀)——挺身而立,在兵戈交击之中,体现其家族所期许的武士之责与荣耀。
Verse 31
तथैव कृतवर्माणं शैनेय: शत्रुतापन:
萨ंज耶说道:同样地,善涅耶——素以“焚灼仇敌者”闻名——也迎战了克利多伐摩。叙述凸显战阵中无休止的相互应对:每一位武士都遭逢回响般的挑战,而勇力则在愈加升级的暴烈之中,以坚忍不移来衡量。
Verse 32
दुर्योधनो धनुश्कछित्त्वा धृष्टद्युम्नस्य संयुगे
萨ंज耶说道:在鏖战之中,杜律约陀那斩断了提利湿多优摩那的弓,意在摧折对手的战力,并以武艺确立压倒之势。这一刻昭示:在战争里,使敌人失去作战之具乃是决胜之策;同时也映照出战场阴冷的伦理——胜利靠强力优势追逐,而非以和解求成。
Verse 33
अथैनं छिन्नथन्वानं विव्याध निशितै: शरै: । दुर्योधनने युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्मका धनुष काट दिया और धनुष कट जानेपर उन्हें पैने बाणोंसे बींध डाला ।। धृष्टद्युम्नो5पि समरे प्रगृह् परमायुधम्
萨anj耶说道:随后,杜律约陀那见提利湿多优摩那的弓已被斩断,便以锐利之箭在战场上将他射穿。既在交锋之际截断其弓,又以锋矢再度加击。提利湿多优摩那亦在此战中握起一件至上兵器(准备回击)。
Verse 34
तयोर्युद्धं महच्चासीत् संग्रामे भरतर्षभ
萨ंज耶说道:噢,婆罗多族中的雄牛啊,在那战场上,他们二人的交战变得极其宏大——于战争之中爆发的激烈冲撞,伴随着可怖的奋力与不断升级的暴烈。
Verse 35
गौतमस्तु रणे क्रुद्धो द्रौषदेयान् महाबलान्
萨ंज耶说道:在战阵深处,乔多摩——怒火已然尽起——转而攻向德劳帕蒂那几位力大无比的儿子。此句揭示:战场上的愤怒驱使即便名震一时的武士也将矛头指向卓绝的对手,使暴力与复仇的循环愈加炽烈,显出这场战争的道德悲剧。
Verse 36
तस्य तैरभवद् युद्धमिन्द्रियेरिव देहिन:
三阇耶说道:对他而言,与他们骤起的战斗,犹如有情与诸根之争——一场内在的较量;在外在冲突之中,克制、约束与决断皆受考验。
Verse 37
ते च सम्पीडयामासुरिन्द्रियाणीव बालिशम्
他们又猛力逼迫他,碾压并压制他——正如诸根压倒愚昧而无自律之人。叙述由此点明:缺乏自制便易受制于人,正如战士若无援助,亦可在战阵中被淹没。
Verse 38
एवं चित्रमभूद् युद्ध तस्य तैः सह भारत
三阇耶说道:“噢,婆罗多啊,如此一来,他与他们的战斗便显得奇异而非凡。”此句强调:战争虽根植于暴力,但当叙事充满惊人的壮举时,仍会呈现出“瑰奇可观”的面貌——引人反思英雄景观与屠戮之沉重伦理之间的张力。
Verse 39
नराश्नैव नरै: सार्धथ दन्तिनो दन्तिभिस्तथा
三阇耶说道:人被人踏碎,象亦被象踏碎——在战阵的拥挤中,各各相逢其匹,屠戮遂化作同归于尽的毁灭。
Verse 40
हया हयै: समासक्ता रथिनो रथिभि: सह । संकुलं चाभवद् भूयो घोररूपं विशाम्पते
三阇耶说道:马与马纠缠在一起,车战之士也与敌方车战之士相搏。战场再度化为稠密而混乱的拥塞——形貌可怖啊,人中之主——显见当狂怒与争胜汹涌而起,秩序便崩塌,厮杀遂成盲目而险恶的挤压。
Verse 41
प्रजानाथ! उस समय मनुष्य मनुष्योंसे, हाथी हाथियोंसे, घोड़े घोड़ोंसे और रथी रथियोंसे भिड़ गये थे। फिर उनमें अत्यन्त घोर घमासान युद्ध होने लगा ।। इदं चित्रमिदं घोरमिदं रौद्रमिति प्रभो । युद्धान्यासन् महाराज घोराणि च बहूनि च,प्रभो! महाराज! यह विचित्र, यह घोर, यह रौद्र युद्ध--इस प्रकार बहुत-से भीषण युद्ध चलने लगे
三阇耶说道:“噢,万民之主!那时,人与人相搏,象与象相撞,马与马相冲,战车武士与战车武士相接。随即在他们之间爆发出极其可怖而混乱的大战。‘此乃奇异!此乃可怖!此乃狂烈!’——大王啊,种种骇人的交锋正接连上演。”
Verse 42
ते समासाद्य समरे परस्परमरिंदमा: । व्यनदंश्वैव जघ्नुश्न समासाद्य महाहवे,शत्रुओंका दमन करनेवाले वे समस्त योद्धा समरांगणमें एक-दूसरेसे भिड़कर उस महायुद्धमें परस्पर टक्कर लेते हुए प्रहार और सिंहनाद करने लगे
三阇耶说道:那些降伏仇敌的勇士在战场上彼此逼近,迎面相逢。于那场大决战中,他们互相击打,齐声发出战吼,在相互攻伐中纠缠不休。
Verse 43
तेषां पत्रसमुद्भूतं रजस्तीव्रमदृश्यत । वातेन चोद्धतं राजन् धावदभिश्नाश्वसादिभि:,राजन! उनके वाहनोंसे, हवासे और दौड़ते हुए घुड़सवारोंसे उड़ायी गयी भयंकर धूल सब ओर व्याप्त दिखायी देती थी
三阇耶说道:大王啊,只见从他们的战车间腾起一团猛烈的尘云;又被狂风与奔突的战马、骑士搅动,四散弥漫,遮蔽战场,使战阵愈加纷乱。
Verse 44
रथनेमिसमुद्धूतं नि:श्वासैश्वापि दन्तिनाम् । रज: संध्याभ्रकलिलं दिवाकरपथं ययौ,रथके पहियों और हाथियोंके उच्छवासोंसे ऊपर उठायी हुई धूल संध्याकालके मेघोंके समान सूर्यके मार्गमें छा गयी थी
三阇耶说道:尘土被战车轮缘卷起,又被群象的喘息吹扬,浓厚如暮色云团,竟铺展到太阳行经之路上。
Verse 45
रजसा तेन सम्पृक्तो भास्करो निष्प्रभ: कृत: । संछादिताभवद् भूमिस्ते च शूरा महारथा:,उस धूलके सम्पर्कमें आकर सूर्य प्रभाहीन हो गये थे तथा पृथ्वी और वे महारथी शूरवीर भी ढक गये थे
三阇耶说道:与那尘土相杂,连太阳也黯然失辉。大地被遮蔽,那些英勇的伟大战车武士亦被尘埃覆盖——战阵所扬起的尘土竟浓厚至此。
Verse 46
मुहूर्तादिव संवृत्तं नीरजस्क॑ समन्ततः । वीरशोणितसिक्तायां भूमौ भरतसत्तम,भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर दो ही घड़ीमें वीरोंके रक्तसे धरती सिंच उठी और सब ओरकी धूल बैठ जानेके कारण रणक्षेत्र निर्मल हो गया
三阇耶说道:“顷刻之间,整个战场仿佛变了模样——四方尘埃尽息。噢,婆罗多族中最卓越者,大地被勇士之血浸透。”
Verse 47
उपाशाम्यत् ततस्तीव्रं तद् रजो घोरदर्शनम् । ततो<पश्यमहं भूयो द्न्द्युद्धानि भारत,वह भयंकर दिखायी देनेवाली तीव्र धूलि सर्वथा शान्त हो गयी। भारत! राजेन्द्र! तब मैं फिर उस दारुण मध्याह्नकालमें अपने बल और श्रेष्ठताके अनुसार अनेक द्वन्द्युद्ध देखने लगा। योद्धाओंके कवचोंकी प्रभा वहाँ अत्यन्त उज्ज्वल दिखायी देती थी
三阇耶说道:“随后,那可怖而猛烈的尘雾完全平息。于是,噢,婆罗多啊,我又看见许多单骑对决——各自依其力量与卓绝而奋战;在战争酷烈的正午,甲胄的光辉闪耀夺目。”
Verse 48
यथाप्राणं यथाश्रेष्ठं मध्याद्ले वै सुदारुणे वर्मणां तत्र राजेन्द्र व्यदृश्यन्तोज्ज्वला: प्रभा:,वह भयंकर दिखायी देनेवाली तीव्र धूलि सर्वथा शान्त हो गयी। भारत! राजेन्द्र! तब मैं फिर उस दारुण मध्याह्नकालमें अपने बल और श्रेष्ठताके अनुसार अनेक द्वन्द्युद्ध देखने लगा। योद्धाओंके कवचोंकी प्रभा वहाँ अत्यन्त उज्ज्वल दिखायी देती थी
三阇耶说道:“在那惨烈的正午时分,众人各随其气力与卓越,我又见到许多单独决斗。噢,大王,那里的武士甲胄之光辉,显得格外耀眼。”
Verse 49
शब्दश्न तुमुल: संख्ये शराणां पततामभूत् । महावेणुवनस्येव दह्यमानस्य पर्वते,जैसे पर्वतपर जलते हुए विशाल बाँसोंके वनसे प्रकट होनेवाला चटचट शब्द सुनायी देता है, उसी प्रकार युद्धस्थलमें बाणोंके गिरनेका भयंकर शब्द वहाँ गूँज रहा था
三阇耶说道:“在那战阵之中,箭雨坠落,轰然喧腾——宛如山上大片竹林燃烧时爆裂噼啪、回响震荡的声响。”
Verse 143
अशीत्या भीमसेनश्व शरै राजानमार्पयन् | फिर सात्यकिने भी झुकी हुई गाँठवाले एक बाणसे राजाको घायल कर दिया। तदनन्तर द्रौपदीके पुत्रोंने राजा दुर्योधनको तिहत्तर, धर्मराजने पाँच और भीमसेनने अस्सी बाण मारे
三阇耶说道:“毗摩塞那以八十支箭射击国王,在战阵中央紧逼不舍。随后,德劳帕蒂之子以七十三箭射向都利约陀那王;达摩罗阇以五箭;而毗摩塞那又以八十箭加之。”
Verse 156
न चचाल महाराज सर्वसैन्यस्य पश्यत: । महाराज! वे महामनस्वी वीर सारी सेनाके देखते-देखते दुर्योधनपर चारों ओरसे बाणसमूहोंकी वर्षा कर रहे थे तो भी वह विचलित नहीं हुआ
三阇耶说道:“大王啊,在全军注视之下,他丝毫不曾动摇。纵然那些胸怀宏大的勇士从四面八方以箭雨齐射杜尔约陀那,他仍岿然不动——临危而不惧,体现了在战争的道德幽暗中支撑武士的冷峻决意。”
Verse 163
अति सर्वाणि भूतानि ददृशु: सर्वमानवा: । उस महामनस्वी वीरकी फुर्ती, अस्त्र-संचालनका सुन्दर ढंग तथा पराक्रम--इन सबको सब लोगोंने सम्पूर्ण प्राणियोंसे बढ़-चढ़कर देखा
三阇耶说道:“众人都看见他仿佛超越一切有情——昂扬的迅捷、运使兵器时优雅的娴熟,以及他的勇武。此景昭示:武艺之卓绝一旦在众目之下显现,便成了在战争道德重压中评判武士的尺度。”
Verse 193
प्रत्युद्ययुर्महेष्वासा: पाण्डवानाततायिन: । वे महाधनुर्धर कौरवयोद्धा रणभूमिमें अपराजित राजा दुर्योधनके पास पहुँचकर आततायी पाण्डवोंपर जा चढ़े
三阇耶说道:“考罗婆军中的大弓手们上前迎击般度族,并将其斥为‘ātatāyin’——罪恶的侵害者。待他们抵近战场上未尝败绩的杜尔约陀那王身旁,便猛然突进,凶猛地扑向般度族。此偈不仅叙述军势推进,更提出一种道德宣称:以‘ātatāyin’之名定罪敌方,从而为攻伐张本。”
Verse 273
प्रेक्षतां प्रीतिजननं सिद्धचारणसेवितम् । इसके बाद सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरने बड़े जोरसे सिंहनाद किया। मान्यवर! उनका वह युद्ध विचित्र, भयंकर, सिद्धों और चारणोंद्वारा सेवित तथा दर्शकोंका हर्ष बढ़ानेवाला था
三阇耶说道:“那是一幕令观者欢悦的景象,诸悉达(Siddha)与迦罗那(Cāraṇa)亦来随侍观礼。”随后,诸弓手之首的坚战(Yudhiṣṭhira)发出震天的狮子吼。尊者啊,他的战斗奇异而可怖,却又振奋观者之心,仿佛有高等灵众在旁见证并称许。
Verse 286
अभ्यद्रवदमेयात्मा शरवर्षै: समन्तत: । दूसरी ओर अमेय आत्मबलसे सम्पन्न उलूकने महाधनुर्धर रणदुर्मद नकुलपर चारों ओरसे बाणोंकी वर्षा करते हुए धावा किया
三阇耶说道:“乌卢迦怀有不可测度的气魄与力量,猛然冲杀而来,从四面八方倾泻箭雨——以密集的飞矢与战场的悍勇,欲凭声势与数量压垮敌军。”
Verse 306
योधयन्तावपश्येतां कृतप्रतिकृतैषिणौ । वे दोनों वीर महारथी उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए थे! अतः समरांगणमें एक-दूसरेके प्रहारका प्रतीकार करनेकी इच्छा रखकर जूझते दिखायी देते थे
三阇耶说道:当他们交战之时,人们看见他们宛如两位武士,一心要以击还击、以报还报——各自都在寻求对既成之事作出相称的回应。他们出身高贵门第,受训为伟大的战车勇士,于战场上奋力拼杀,立誓以对方之击为己之答,以此体现战斗中严酷的互报之律:当荣誉与复仇成为眼前的准则,刀兵便不容退让。
Verse 316
योधयन् शुशुभे राजन् बलिं शक्र इवाहवे । राजन्! इसी तरह शत्रुसंतापी सात्यकि कृतवर्माके साथ युद्ध करते हुए युद्धस्थलमें उसी प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे इन्द्र बलिके साथ
三阇耶说道:大王啊,他在战斗之时,萨底耶吉在战场上熠熠生辉——如同因陀罗(释迦罗)与婆梨交锋——一面令敌军痛苦,一面与克利多伐摩展开不息的鏖战。
Verse 333
राजानं योधयामास पश्यतां सर्वधन्विनाम् | तब धृष्टद्युम्न भी दूसरा उत्तम धनुष लेकर समरभूमिमें सम्पूर्ण धनुर्थरोंके देखते-देखते राजा दुर्योधनके साथ युद्ध करने लगे
三阇耶说道:在众弓手的注视之下,他与国王交锋。随后,持起另一张上等良弓的德利什塔丢摩那,也在战场上、在聚集的弓手们眼前,与都利约陀那王展开厮杀——在这场战争的高潮处,个人的勇武与众目睽睽的见证,使每一场决斗都更添道义的分量。
Verse 343
प्रभिन्नयोर्यथा सक्तं मत्तयोर्वरहस्तिनो: । भरतश्रेष्ठ) रणभूमिमें उन दोनोंका महान् युद्ध ऐसा जान पड़ता था, मानो मदकी धारा बहानेवाले दो उत्तम मतवाले हाथी आपसमें जूझ रहे हों
三阇耶说道:婆罗多族中最卓越者啊,他们二人在战场上的大战,宛如两头上等醉象相撞,鬓间流淌着发情的汁液,紧紧抵住彼此不放。此喻正显出武怒的盲目奔势——力对力——当技艺、傲气与愤怒驱使交锋越过一切节制之时,战斗便如洪流难遏。
Verse 353
विव्याध बहुभि: शूर: शरै: संनतपर्वभि: । दूसरी ओर शूरवीर कृपाचार्यने रणभूमिमें कुपित हो महाबली द्रौपदीपुत्रोंको झुकी हुई गाँठवाले बहुत-से बाणोंद्वारा घायल कर दिया
三阇耶说道:那位勇士以许多关节下弯的箭矢刺穿了他们。另一边,克利帕阿阇梨在战场上怒起,便以无数带有下弯结节的箭矢射伤了强悍的德劳帕蒂诸子,使战争残酷的势头愈加凶猛。
Verse 366
घोररूपमसंवार्य निर्मर्यादमवर्तत । जैसे देहधारी जीवात्माका पाँचों इन्द्रियोंके साथ युद्ध हो रहा हो, उसी प्रकार उन पाँचों भाइयोंके साथ कृपाचार्यका युद्ध हो रहा था। धीरे-धीरे वह युद्ध अत्यन्त घोर, अनिवार्य और अमर्यादित हो गया
三阇耶说道:战斗变得骇人——势不可当,越出一切界限。仿佛具身之灵与五根相争一般,克利帕阿阇梨与那五兄弟鏖战不休;而战事渐渐愈发惨烈,无法回避,毫无节制,显出战争如何侵蚀克制与达摩的边界。
Verse 373
सच तान् प्रति संरब्ध: प्रत्ययोधयदाहवे । जैसे इन्द्रियाँ मूढ़ मनुष्यको पीड़ा देती हैं, उसी प्रकार वे पाँचों भाई कृपाचार्यको पीड़ित करने लगे। कृपाचार्य भी अत्यन्त रोषमें भरकर रणक्षेत्रमें उन सबके साथ युद्ध कर रहे थे
三阇耶说道:他怒火中烧,迎向他们,在战阵中与之相抗。正如诸根折磨迷妄之人,那五兄弟也开始逼迫克利帕阿阇梨;而克利帕阿阇梨同样满怀盛怒,在战场上以一敌五,与他们一齐厮杀。
Verse 383
उत्थायोत्थाय हि यथा देहिनामिन्द्रियर्विंभो । भारत! उनका जन द्रौपदीपुत्रोंके साथ ऐसा विचित्र युद्ध होने लगा, जैसे बारंबार उठ- उठकर विषयोंकी ओर प्रवृत्त होनेवाली इन्द्रियोंक साथ देहधारियोंका युद्ध होता रहता है
三阇耶说道:噢,婆罗多啊,那些战士与德劳帕蒂之子之间,展开了一场奇异而不息的鏖战——正如具身众生的内在争斗:诸根屡屡起动,奔逐其境,迫使自我一次又一次与之对抗。
Verse 1736
अपश्यमाना राजानं पर्यवर्तन्त दंशिता: । राजेन्द्र! आपके योद्धा थोड़ा-सा भी अन्तर न देखकर कवच आदिसे सुसज्जित हो राजा दुर्योधनको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये
三阇耶说道:不见君王,那些披甲的勇士便回旋转阵,重新聚拢。阵列不留丝毫空隙,他们四面环立,将杜尤陀那王团团护住——这是战场上的忠诚之举,欲在混乱之中为主君遮蔽锋芒。
Verse 2936
शरवर्षेण महता समन्तात् पर्यवारयत् | इसी प्रकार शूरवीर नकुलने रणभूमिमें शकुनिके पुत्रको बड़ी भारी बाणवर्षाके द्वारा सब ओरसे अवरुद्ध कर दिया
三阇耶说道:他以滂沱箭雨从四面将其围困。于是,战场上英勇的那俱罗也以密集而压倒性的矢雨,四方封锁了沙昆尼之子——这正是武士决意的写照:技艺与职责在战争中以冷峻的精确被贯彻到底。
The chapter frames a dharma-sankat between martial duty and restraint: commanders pursue victory amid confusion and mass casualties, while tactics such as rear attacks and overwhelming volleys raise questions about proportionality and the erosion of maryādā (limits).
The narrative emphasizes that crisis conditions magnify the ethical weight of leadership: choices made under fear and fatigue still generate consequences, and disciplined command decisions (delegation, protection of the center, containment of disruption) are portrayed as crucial when norms destabilize.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is historiographic and ethical—using portents, imagery, and escalating disorder to mark a threshold where war becomes ‘amaryāda,’ thereby signaling intensified karmic and social fallout within the epic’s broader moral architecture.