Adhyaya 87
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 8743 Versesयुद्धोत्तर काल; अश्वमेध-यात्रा में पाण्डव-प्रभाव की पुनर्स्थापना और राजाओं का अधीन/समर्पण-प्रवृत्त वातावरण।

Adhyaya 87

यज्ञवाटवैभववर्णनम् / Description of the Splendour of the Sacrificial Enclosure

Upa-parva: Aśvamedha-yajña-vaiśiṣṭya (Description of the Sacrificial Arena and Abundance)

Vaiśaṃpāyana describes how, as the Aśvamedha proceeds, skilled disputants engage in reasoned debate while assembled kings observe the exemplary ritual order. The yajñavāṭa is portrayed through material and procedural markers: golden gateways, jewel-adorned resting and seating arrangements, and an array of vessels—pots, bowls, cauldrons, jars, and auspicious containers—so abundant that nothing appears non-golden. The consecrated wooden yūpas are set up according to śāstric prescription and proper timing, emphasizing correctness (vidhi) and radiance. A comprehensive gathering of beings is noted—land and aquatic animals, cattle and buffaloes, birds, wild creatures, and an encyclopedic taxonomy of life-forms—conveying the rite’s cosmological scope. The arena overflows with food-grain and wealth: mountain-like heaps of provisions, streams of curd, and lake-like expanses of ghee. The scale is such that Jambūdvīpa appears symbolically assembled in one place; numerous groups arrive, receive wealth, and depart. Kings serve eminent Brahmins in vast numbers; attendants offer diverse foods and drinks, and drums resound daily like thunder as the sacrifice continues in ordered continuity under Dharmarāja Yudhiṣṭhira.

Chapter Arc: अश्वमेध-यज्ञ के आरम्भ के पश्चात् कथा का प्रवाह युद्धोत्तर शान्ति से हटकर एक नई बेचैनी पर टिकता है—हृषीकेश कृष्ण के सामने यह प्रश्न उठता है कि सर्वविजयी अर्जुन भीतर से सुखविवर्जित क्यों रहता है। → कृष्ण के प्रति जिज्ञासा गहराती है: सुना गया है कि अनेक देशों में फिर-फिर युद्ध हुए; अर्जुन जहाँ-जहाँ गया, वहाँ धूल-धूसरित घोड़े के पीछे राजाओं की हलचल, जन-समूह की हर्षध्वनि और विजय-यात्रा का कोलाहल उठा। पर इस बाहरी जय के बीच अर्जुन के मन का भार कथा को कसता जाता है। → अर्जुन की वापसी का दृश्य चरम पर पहुँचता है—रेणु-राशि उठती है, जनों की हर्षकारी वाणी गूँजती है, और अर्जुन धर्मराज युधिष्ठिर के चरणों में प्रणाम कर भीमादि भ्राताओं का पूजन करता हुआ केशव (कृष्ण) के समीप बैठता है; विजय-समाचार के साथ ही युधिष्ठिर की आँखों में आनन्दाश्रु छलकते हैं और दूत/वृत्तान्त-निवेदक को बहुधन दान दिया जाता है। → कुरु-सभा में स्वागत-सत्कार के बाद अर्जुन थके हुए पारगामी की भाँति विश्राम पाता है; विजय-यात्रा का औपचारिक समापन और राजसभा की स्वीकृति से अश्वमेध का अभियान स्थिरता की ओर लौटता है। → बभ्रुवाहन का अपनी दोनों माताओं सहित कुरुदेश में आगमन एक नया प्रसंग खोलता है—यह आगमन केवल शुभ-संदेश है या किसी पुराने बन्धन/प्रतिज्ञा का पुनः स्मरण?

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्चमेध-यज्ञका आरम्भविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ८६ ॥। ऑपन-आक्राा बछ। अर: सप्ताशीतितमोब ध्याय: अर्जुनके विषयमें श्रीकृष्ण और युधिछ्िरकी बातचीत, अर्जुनका हस्तिनापुरमें जाना तथा उलूपी और चित्राज्भदाके साथ बभ्रुवाहनका आगमन युधिष्ठिर उवाच श्रुतं प्रियमिदं कृष्ण यत्‌ त्वमहसि भाषितुम्‌ । तन्मे5मृतरसं पुण्यं मनो ह्लादयति प्रभो,युधिष्ठिर बोले--प्रभो! श्रीकृष्ण! मैंने यह प्रिय संदेश सुना, जिसे आप ही कहने या सुनानेके योग्य हैं। आपका यह अमृतरससे परिपूर्ण पवित्र वचन मेरे मनको आनन्दमग्न किये देता है

由提施提罗说道:“噢,奎师那,我已听闻这可喜的讯息——唯有你才真正堪当宣说。主啊,你那神圣之言,充满不死甘露,使我心神欢悦。”

Verse 2

बहूनि किल युद्धानि विजयस्य नराधिपै: । पुनरासन्‌ हषीकेश तत्र तत्र च मे श्रुतम्‌,हृषीकेश! मेरे सुननेमें आया है कि भिन्न-भिन्न देशोंमें वहाँके राजाओंके साथ अर्जुनको कई बार युद्ध करने पड़े हैं

尤提希提罗说道:“噢,赫利希凯沙啊,我听闻为了巩固胜利,阿周那在诸多地域与各国君王反复交战,经历了许多战斗。”

Verse 3

कि निमित्तं स नित्यं हि पार्थ: सुखविवर्जित: । अतीव विजयो धीमन्निति मे दूयते मनः,इसका क्या कारण है? बुद्धिमान्‌ जनार्दन! जब मैं एकान्तमें बैठकर अर्जुनके बारेमें विचार करता हूँ, तब यह जानकर मेरा मन खिन्न हो जाता है कि हमलोगोंमें वे ही सदा सबसे अधिक दु:खके भागी रहे हैं। पाण्डुनन्दन अर्जुन सुखसे वंचित क्‍यों रहते हैं? यह समझमें नहीं आता

尤提希提罗说道:“究竟因何缘故,帕尔塔(阿周那)似乎总是与快乐无缘?噢,睿智的阇那尔达那啊,纵然他屡获大胜,我心仍为此念而痛。每当我独坐沉思阿周那,便悲从中来:在我们之中,他不断承担着最大的苦难。为何般度之子阿周那总被隔绝于安逸与满足之外?”

Verse 4

संचिन्तयामि कौन्तेयं रहो जिष्णुं जनार्दन । अतीव दुःखभागी स सतत पाण्डुनन्दन:,इसका क्या कारण है? बुद्धिमान्‌ जनार्दन! जब मैं एकान्तमें बैठकर अर्जुनके बारेमें विचार करता हूँ, तब यह जानकर मेरा मन खिन्न हो जाता है कि हमलोगोंमें वे ही सदा सबसे अधिक दु:खके भागी रहे हैं। पाण्डुनन्दन अर्जुन सुखसे वंचित क्‍यों रहते हैं? यह समझमें नहीं आता

尤提希提罗说道:“噢,阇那尔达那啊,当我独处静坐,思及阿周那——昆蒂之子、不屈的英雄——我便深感忧伤。因为在我们之中,般度之子他似乎总是分担着最大的悲苦。为何阿周那屡屡被剥夺安逸与快乐?”

Verse 5

कि नु तस्य शरीरेडस्ति सर्वलक्षणपूजिते | अनिष्टं लक्षणं कृष्ण येन दुःखान्युपाश्नुते,श्रीकृष्ण! उनका शरीर तो सभी शुभलक्षणोंसे सम्पन्न है। फिर उसमें अशुभ लक्षण कौन-सा है, जिससे उन्हें अधिक दुःख उठाना पड़ता है?

尤提希提罗说道:“噢,奎师那啊,他的身躯具足一切吉祥之相,备受敬仰。那么,他身上究竟有什么不祥之征,竟使他必须忍受如此众多的苦难?”

Verse 6

अतीवासुखभोगी स सततं कुन्तिनन्दन: । न हि पश्यामि बीभत्सोर्निन्द्य गात्रेषु किंचन । श्रोतव्यं चेन्मयैतद्‌ वै तन्मे व्याख्यातुमरहसि,कुन्तीनन्दन अर्जुन सदा अधिक कष्ट भोगते हैं; परंतु उनके अंगोंमें कहीं कोई निन्दनीय दोष नहीं दिखायी देता है। ऐसी दशामें उन्हें कष्ट भोगनेका कारण क्या है? यह मैं सुनना चाहता हूँ। आप मुझे विस्तारपूर्वक यह बात बतावें

尤提希提罗说道:“昆蒂之子阿周那似乎总在承受沉重的艰辛;然而在可畏的战士毗婆蹉(Bībhatsu)的肢体与仪容上,我看不出任何可责之处。若此事确为我应当听闻之事,请为我阐明:在并无明显过失的情况下,他为何仍要经历困苦?”

Verse 7

इत्युक्त: स हृषीकेशो ध्यात्वा सुमहदुत्तरम्‌ राजानं भोजराजन्यवर्धनो विष्णुरब्रवीत्‌,युधिष्ठिरके इस प्रकार पूछनेपर भोजवंशी क्षत्रियोंकी वृद्धि करनेवाले भगवान्‌ हृषीकेश विष्णुने बहुत देरतक उत्तम रीतिसे चिन्तन करनेके बाद राजा युधिष्ठिरसे यों कहा --

被如此问及,掌御诸根的赫利希凯沙——毗湿奴,能使婆阇族刹帝利兴盛者——沉思良久,周密权衡至善之答,随后对尤提士提罗王说道——

Verse 8

न हास्य नृपते किंचित्‌ संश्लिष्टमुपलक्षये । ऋते पुरुषसिंहस्य पिण्डिके5स्याधिके यत:,“नरेश्वर! पुरुषसिंह अर्जुनकी पिण्डलियाँ (फिल्लियाँ) औसतसे कुछ अधिक मोटी हैं। इसके सिवा और कोई अशुभ लक्षण उनके शरीरमें मुझे भी नहीं दिखायी देता है”

「大王啊,我在他身上并未察见任何凶兆或可忧之相——唯有这位人中狮子阿周那的小腿略较常人粗壮些。除此之外,我看不出他身体还有什么值得畏惧的。」

Verse 9

स ताभ्यां पुरुषव्याप्रो नित्यमध्वसु वर्तते । न चान्यदनुपश्यामि येनासौ दुःखभाजनम्‌,“उन मोटी फिल्लियोंके कारण ही पुरुषसिंह अर्जुनको सदा रास्ता चलना पड़ता है। और कोई कारण मुझे नहीं दिखायी देता, जिससे उन्हें दुःख झेलना पड़े"

「正因那两处(小腿)之故,人中狮子阿周那才不得不常年奔走在路上。我看不出还有别的缘由,会使他成为受苦之器。」

Verse 10

इत्युक्त: पुरुषश्रेष्टस्तदा कृष्णेन धीमता । प्रोवाच वृष्णिशार्टूलमेवमेतदिति प्रभो,प्रभो! बुद्धिमान्‌ श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर पुरुषश्रेष्ठ युधिष्ठिरने उन वृष्णिसिंहसे कहा --'भगवन्‌! आपका कहना ठीक है”

被睿智的黑天如此言及,尤提士提罗——人中至善者——便对那位弗利什尼族之虎答道:「主啊,主啊,确是如此;你所言无误。」

Verse 11

कृष्णा तु द्रौपदी कृष्णं तिर्यक्‌ सासूयमैक्षत । प्रतिजग्राह तस्यास्तं प्रणयं चापि केशिहा

然而黑公主(德罗帕蒂)斜睨黑天,目光里带着几分嫉意与嗔责。屠灭凯辛者黑天却领受了她这份情绪——那未出口的怨怼与同在的爱意——因为他明白:在亲密之中,纵有尖锐之情亦可生起,而不致违损达摩。

Verse 12

तत्र भीमादयस्ते तु कुरवो याजकाश्न ये

在那里,俱卢诸人——毗摩等——正从事祭祀之礼,并分食供献之物,作为参与者出席于这神圣的仪式之中。

Verse 13

तेषां कथयतामेव पुरुषो<र्जुनसंकथा:

坚战说道:“他们正相互交谈之时,话题便转向了阿周那——他的功业与事迹,竟成了众人议论的中心。”

Verse 14

सो5भिगम्य कुरुश्रेष्ठ नमस्कृत्य च बुद्धिमान्‌

那位智者走近俱卢中最尊贵者,恭敬顶礼之后方才开口——以谦卑与合乎礼法的仪度,敬奉那位可敬的长者、法之楷模。

Verse 15

उपायात॑ नरव्याप्र॑ फाल्गुनं प्रत्यवेदयत्‌ । वह बुद्धिमान्‌ दूत कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिके पास जा उन्हें नमस्कार करके बोला --'पुरुषसिंह अर्जुन निकट आ गये हैं' ।। १४ $ ।। तच्छुत्वा नृपतिस्तस्य हर्षबाष्पाकुलेक्षण:

一位明智的使者走近俱卢中最尊贵的坚战,先行礼致敬,然后禀告道:“噢,人中之狮,阿周那已至近前。”王闻此言,双目盈满喜泪——那是至亲历险尽责而安然归来时,随之而来的宽慰与合乎法度的深情。

Verse 16

ततो द्वितीये दिवसे महान्‌ शब्दो व्यवर्धत

随后到了第二日,一阵巨大的喧哗骤然兴起,并且愈发高涨——那不断扩大的民间骚动,预示着事态的转折,也映出其间纠缠的道德张力。

Verse 17

ततो रेणु: समुद्भूतो विबभौ तस्य वाजिन:

随即尘土腾起,如云般扩散开来,皆因那匹骏马奔动所激——这仿佛昭示着阿湿婆梅陀大祭正继续向前推进,而国王亦警醒不懈,细察行祭途中每一征兆与每一细节。

Verse 18

तत्र हर्षकरी वाचो नराणां शुश्रुवे&र्जुन:

在那里,阿周那在众人之间听见了令人欢欣的话语——那是于事态展开之际流露的宽慰与喜悦,也映照出民众对眼前所发生之事怀抱的希望与响应。

Verse 19

दिष्ट्यासि पार्थ कुशली धन्यो राजा युधिष्ठिर: । वहाँ अर्जुनने लोगोंके मुँहसे हर्ष बढ़ानेवाली बातें इस प्रकार सुनीं--'पार्थ! यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम सकुशल लौट आये। राजा युधिष्ठिर धन्य हैं ।। कोडन्यो हि पृथिवीं कृत्स्नां जित्वा हि युधि पार्थिवान्‌

在那里,阿周那从众人口中听到使人更添欢喜的话语:“噢,帕尔塔!你能平安归来,实乃大幸。尤提士提罗王真是有福之君。因为你在战场上战胜诸王,并征服了整个大地……”

Verse 20

ये व्यतीता महात्मानो राजान: सगरादय:

尤提士提罗说道:“往昔那些伟大的君王——自萨伽罗起——都已逝去……”

Verse 21

नैतदन्ये करिष्यन्ति भविष्या वसुधाधिपा:

尤提士提罗说道:“后世的地上君主,将不会做成此事。”

Verse 22

इत्येवं वदतां तेषां पुंसां कर्णसुखा गिर:

尤提希提罗说道:“就这样,当那些人说话之时,他们的言辞悦耳动听。”

Verse 23

ततो राजा सहामात्य: कृष्णश्न॒ यदुनन्दन:

随后,国王在群臣随侍之下,又有克里希纳——雅度族之欢悦——同在,便继续前行。

Verse 24

सो5भिवाद्य पितु: पादौ धर्मराजस्य धीमत:

他恭敬地礼拜父王——睿智的达摩罗阇——的双足,然后才继续前行。

Verse 25

तैः समेत्यार्चितस्तांश्ष प्रत्यर्च्याथ यथाविधि

他与众人相会,受其依礼敬奉;尤提希提罗亦按仪轨回敬,以礼还礼。

Verse 26

एतस्मिन्नेव काले तु स राजा बभ्रुवाहन:

尤提希提罗说道:“就在那一刻,那位国王——跋布卢瓦诃那——现身在场。”

Verse 27

तत्र वृद्धान्‌ यथावत्‌ स कुरूनन्यांश्व पार्थिवान्‌,वहाँ पहुँचकर वह महाबाहु नरेश कुरुकुलके वृद्ध पुरुषों तथा अन्य राजाओंको विधिवत्‌ प्रणाम करके स्वयं भी उनके द्वारा सत्कार पाकर बहुत प्रसन्न हुआ। इसके बाद वह अपनी पितामही कुन्तीके सुन्दर महलमें गया

到达那里后,那位臂力雄伟的国王依礼向俱卢族的长者以及诸王恭敬致礼;又蒙众人礼遇款待,心中甚为欢喜。随后,他进入祖母昆蒂那座华美的宫邸。

Verse 28

अभिवाद्य महबाहुस्तैश्वापि प्रतिनन्दित: । प्रविवेश पितामहय॒ा: कुन्त्या भवनमुत्तमम्‌,वहाँ पहुँचकर वह महाबाहु नरेश कुरुकुलके वृद्ध पुरुषों तथा अन्य राजाओंको विधिवत्‌ प्रणाम करके स्वयं भी उनके द्वारा सत्कार पाकर बहुत प्रसन्न हुआ। इसके बाद वह अपनी पितामही कुन्तीके सुन्दर महलमें गया

他既已致礼,那位臂力雄伟的国王也为众人所称许迎接。因所受礼敬而欣然,他便进入祖母昆蒂那座上妙的居所。

Verse 87

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अर्जुनप्रत्यागमने सप्ताशीतितमो<ध्याय:

如是,在《圣摩诃婆罗多》中,属“马祭篇”(Aśvamedhika Parva)之“随歌篇”(Anugītā)内,关于阿周那归来的第八十七章至此终了。

Verse 113

सख्यु: सखा हृषीकेश: साक्षादिव धनंजय: । उस समय द्रुपदकुमारी कृष्णाने भगवान्‌ श्रीकृष्णकी ओर तिरछी चितवनसे ईर्ष्यापूर्वक देखा। केशिहन्ता श्रीकृष्णने द्रौपदीके उस प्रेमपूर्ण उपालम्भको सानन्द ग्रहण किया; क्योंकि उसकी दृष्टिमें सखा अर्जुनके मित्र भगवान्‌ हृषीकेश साक्षात्‌ अर्जुनके ही समान थे

尤提史提罗说道:“赫利希凯沙(圣克里希纳)确是友之友;对檀那阇耶(阿周那)而言,他宛如阿周那自身。”当时,德鲁帕达之女德劳帕迪(克里希娜)带着妒意,斜睨着薄伽梵圣克里希纳。诛凯西者圣克里希纳欣然领受她那含情的嗔责,因为在她眼中,这位主宰——阿周那的至交——几乎与阿周那无二。

Verse 126

रेमु: श्रुत्वा विचित्रां तां धनंजयकथां शुभाम्‌ । उस समय भीमसेन आदि कौरव और यज्ञ करानेवाले ब्राह्मणलोग अर्जुनके सम्बन्धमें यह शुभ एवं विचित्र बात सुनकर बहुत प्रसन्न हो रहे थे

尤提史提罗说道:“听闻那关于檀那阇耶(阿周那)的吉祥而奇妙的叙述,他们都欢喜踊跃。”当时,毗摩塞那等亲族,以及主持祭祀的婆罗门们,听到这有关阿周那的吉庆而异闻之事,也都欣然不已。

Verse 133

उपायाद्‌ वचनाद्‌ दूतो विजयस्य महात्मन: । उन लोगोंमें अर्जुनके सम्बन्धमें इस तरहकी बातें हो ही रही थीं कि महात्मा अर्जुनका भेजा हुआ दूत वहाँ आ पहुँचा

正当众人如此相互议论阿周那之时,那位以胜利著称、心怀伟大的阿周那所遣使者,已抵达彼处。

Verse 163

आगच्छति नरव्याप्रे कौरवाणां धुरंधरे । तदनन्तर दूसरे दिन कौरव-धुरंधर नरव्यात्र अर्जुके आते समय नगरमें महान्‌ कोलाहल बढ़ गया

坚战说道:“噫,人中之虎!那位为俱卢族担负重任的首要勇士正向此而来。”随后,次日他入城之时,城中喧嚣大作,声浪震天。

Verse 173

अभितो वर्तमानस्य यथोच्चै:श्रवसस्तथा । उच्चै:श्रवाके समान वेगवान्‌ और पास ही विद्यमान उस यज्ञसम्बन्धी घोड़ेकी टापसे उड़ी हुई धूल आकाशमें अद्भुत शोभा पा रही थी

坚战说道:“那匹祭马在近旁往来奔驰,奋跃之速可比优钵罗婆娑(Uccaiḥśravas)。它蹄下扬起的尘土漫布长空,呈现出奇异的光彩。”

Verse 193

चारयित्वा हयश्रेष्ठमुपागच्छेदृते3$र्जुनात्‌ । 'अर्जुनके सिवा दूसरा कौन ऐसा वीर पुरुष है जो समूची पृथ्वीको जीतकर युद्धमें राजाओंको परास्त करके और अपने श्रेष्ठ अश्वको सर्वत्र घुमाकर उसके साथ सकुशल लौट आ सके

坚战说道:“既已放出那匹最上等的骏马任其周游,除阿周那之外,谁还能征服四海、战场上挫败诸王,并护送这匹神骏遍行诸方而安然归来?”

Verse 206

तेषामपीदृशं कर्म न कदाचन शुश्रुम । “अतीतकालमें जो सगर आदि महामनस्वी राजा हो गये हैं, उनका भी कभी ऐसा पराक्रम हमारे सुननेमें नहीं आया था

坚战说道:“即便是往昔诸王,我们也未曾听闻有如此作为;这般神勇,纵在萨伽罗(Sagara)等胸怀宏大的明君传说中,也不曾为我们所知。”

Verse 213

यत्‌ त्वं कुरुकुलश्रेष्ठ दुष्करं कृतवानसि । “कुरुकुलश्रेष्ठी आपने जो दुष्कर पराक्रम कर दिखाया है, उसे भविष्यमें होनेवाले दूसरे भूपाल नहीं कर सकेंगे”

尤提士提罗说道:“噢,俱卢族中最卓越者!你所成就的这般艰难壮举,艰深至极,后世诸王也无法与之比肩。”

Verse 226

शृण्वन्‌ विवेश धर्मात्मा फाल्गुनो यज्ञसंस्तरम्‌ । इस प्रकार कहते हुए लोगोंकी श्रवणसुखद बातें सुनते हुए धर्मात्मा अर्जुनने यज्ञमण्डपमें प्रवेश किया

他聆听着众人悦耳的言辞,具德之阿周那(法尔古那)便步入祭祀之围场——以契合正法的心志,循着仪式庄严的秩序前行。

Verse 236

धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य त॑ प्रत्युद्ययतुस्तदा । उस समय मन्त्रियोंसहित राजा युधिष्ठिर तथा यदुनन्दन श्रीकृष्ण धृतराष्ट्रको आगे करके उनकी अगवानीके लिये आगे बढ़ आये थे

当时,尤提士提罗与群臣一道,及“雅度族之欢悦”奎师那,前去迎接他,并让持国王(德里达罗湿多罗)走在最前。此景彰显王者礼法与合乎正法的恭敬:纵在战后余波之中,长者仍受尊崇,迎接之礼亦以克制与敬意而行。

Verse 243

भीमादीं श्वापि सम्पूज्य पर्यष्वजत केशवम्‌ । अर्जुनने पिता धृतराष्ट्र और बुद्धिमान्‌ धर्मराज युधिष्ठिरके चरणोंमें प्रणाम करके भीमसेन आदिका भी पूजन किया और श्रीकृष्णको हृदयसे लगाया

尤提士提罗说道:“他也依礼敬奉了毗摩等人,随后拥抱了凯沙瓦(奎师那)。”此景昭示战后和合的复归:对长者的敬礼与对奎师那的深情,皆为正法之标记——谦卑、感恩,以及以敬重维系人伦的凝聚之力。

Verse 253

विशश्राम महाबाहुस्तीरं लब्ध्वेव पारग: । उन सबने मिलकर अर्जुनका बड़ा स्वागत-सत्कार किया। महाबाहु अर्जुनने भी उनका विधिपूर्वक आदर-सत्कार करके उसी तरह विश्राम किया, जैसे समुद्रके पार जानेकी इच्छावाला पुरुष किनारेपर पहुँचकर विश्राम करता है

尤提士提罗说道:那位臂力无双者既至岸边,便安然歇息——如同欲渡大海的旅人,忽得坚实陆地,遂在宽慰中停步。亦复如是,众人齐心对阿周那热诚迎接、致以礼敬之后,阿周那也依礼回敬众人,继而休憩,体现了艰难劳作之后相互礼让与合乎正法的行止。

Verse 263

मातृभ्यां सहितो धीमान्‌ कुरूनेव जगाम ह | इसी समय बुद्धिमान्‌ राजा बश्रुवाहन अपनी दोनों माताओंके साथ कुरुदेशमें जा पहुँचा

尤提士提罗说道:“那位智者偕同两位母亲启程,果然抵达了俱卢之地。”在叙事脉络中,这标志着巴卜鲁瓦诃那尽其孝责,随母亲护持而归俱卢国土,强调家族责任、和解,以及战后正当关系的恢复。

Verse 1536

प्रियाख्याननिमित्तं वै ददौ बहुधनं तदा । यह शुभ समाचार सुनकर राजा युधिष्ठिरकी आँखोंमें आनन्दके आँसू छलक आये और यह प्रिय वृत्तान्त निवेदन करनेके कारण उस दूतको पुरस्काररूपमें उन्होंने बहुत-सा धन दिया

听闻这令人欣悦的禀报,尤提士提罗当即以丰厚财宝赐予为赏——以此嘉奖那位带来吉祥消息的使者,并以慷慨施与表达感念之心。

Frequently Asked Questions

It emphasizes dharmic administration through ritual correctness and public generosity: abundance is presented as structured provisioning governed by śāstric procedure and service to guests and Brahmins.

The enumeration functions as a cosmological register, portraying the sacrifice as symbolically comprehensive—an arena where the social and natural worlds are conceptually gathered under a single ordered rite.

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s meta-significance lies in demonstrating how post-war sovereignty is ethically narrated through vidhi (procedure), dāna (distribution), and public witness.