
Kāma–Mamatā–Upadeśa (Discourse on Desire, Possessiveness, and Ritual Duty)
Upa-parva: Āśvamedhika-upākhyāna (Counsel on Aśvamedha, desire, and non-attachment)
Vāsudeva instructs Yudhiṣṭhira on the relationship between external renunciation and inner disposition. He argues that abandoning external goods alone does not guarantee ‘siddhi’ (spiritual or practical accomplishment), and that fixation on the body or possessions can keep one within the orbit of fear and mortality. A compact linguistic-ethical contrast is introduced: ‘mama’ (mine) is presented as a marker of death-bound attachment, while ‘na mama’ (not mine) indicates the enduring principle aligned with brahman. The chapter then reframes kāma (intent/desire) as a driver of action: society does not praise uncontrolled desire, yet no activity proceeds without some motivating aim; even dāna, Vedic study, tapas, vows, and yogic disciplines are undertaken through purposive intention. A set of traditional gāthās illustrates the paradox that attempts to ‘destroy’ desire by various meritorious means can cause it to reappear in new forms, culminating in the claim that desire is difficult to eliminate and must be redirected rather than naively denied. The discourse closes with pragmatic instruction: perform the Aśvamedha and other rites with due dakṣiṇā, and do not repeatedly reopen grief over the dead; through great sacrifices and generosity, the king attains public renown and an elevated posthumous trajectory.
Chapter Arc: युद्धोत्तर शोक में डूबे युधिष्ठिर के सामने वायुदेव का उपदेश उतरता है—‘मम’ और ‘न मम’ के दो-तीन अक्षरों में ही मृत्यु और शाश्वत ब्रह्म का रहस्य छिपा है। → वायुदेव बाह्य-आंतरिक शत्रुओं (इन्द्रिय-विकार, आसक्ति, काम) का स्वभाव दिखाते हैं: बाह्य पदार्थों से अलग दिखते हुए भी देह-सुख में लिप्त मनुष्य धर्म का मर्म खो देता है। ‘काम-गीता’ का संकेत देकर वे बताते हैं कि व्रत, यज्ञ, नियम, ध्यान—सबका आरम्भ भी कामना से होता है; इसलिए काम को समझे बिना साधना भी भ्रम बन सकती है। → निर्णायक वाक्य गूंजता है—‘ममेति’ (मेरा) मृत्यु है, ‘न ममेति’ (मेरा नहीं) शाश्वत ब्रह्म। समूची पृथ्वी पा कर भी जिसमें ममता नहीं, उसके लिए राज्य भी बंधन नहीं; और जिसमें ममता है, उसके लिए धर्म भी स्वार्थ बन जाता है। → उपदेश का व्यावहारिक निष्कर्ष: युधिष्ठिर को विधिपूर्वक, पर्याप्त दक्षिणा सहित अश्वमेध और अन्य समृद्ध यज्ञ करने की प्रेरणा दी जाती है—राजधर्म का शुद्धिकरण और लोक-कल्याण शोक-ग्रस्त मन को भी धर्म-पथ पर स्थिर करता है। → वायुदेव शोक-निवारण करते हुए कहते हैं कि रण में मारे गए बंधु अब लौटकर देखे नहीं जा सकते—अब प्रश्न यह रह जाता है कि युधिष्ठिर इस वैराग्य-बोध को कर्म (यज्ञ) में कैसे रूपांतरित करेंगे।
Verse 1
ऑपन- मा बछ। अकाल त्रयोदशो<* ध्याय: श्रीकृष्णद्वारा ममताके त्यागका महत्त्व, काम-गीताका उल्लेख और युधिष्ठिरको यज्ञके लिये प्रेरणा करना वायुदेव उवाच न बाहूं द्रव्यमुत्सज्य सिद्धिर्भवति भारत । शारीर द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति वा न वा,भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं--भारत! केवल राज्य आदि बाह्ा पदार्थोंका त्याग करनेसे ही सिद्धि नहीं प्राप्त होती। शारीरिक द्रव्यका त्याग करके भी सिद्धि प्राप्त होती है अथवा नहीं भी होती है
风神伐由说道:“噢,婆罗多啊,成就(siddhi)并非仅凭舍弃王国与财物等外在之物便可获得。即便舍弃与身体相关的一切,成就也可能生起——亦可能不生起——全系于内在的心性与觉悟。”
Verse 2
बाहाद्रव्यविमुक्तस्य शारीरेषु च गृद्धयत: । यो धर्मो यत् सुखं चैव द्विषतामस्तु तत् तथा,बाह्य पदार्थोसे अलग होकर भी जो शारीरिक सुख-विलासमें आसक्त है, उसे जिस धर्म और सुखकी प्राप्ति होती है, वह तुम्हारे साथ द्वेष करनेवालोंको ही प्राप्त हो
风神伐由说道:“纵使一人外在已脱离诸般财物,若仍贪恋身躯之乐,则他所获之‘法’与所享之乐——愿同样的果报落在那些对你怀恨之人身上。”
Verse 3
द्वयक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्रयक्षरं ब्रह्म शाश्वतम् । ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम्,“मम” (मेरा) ये दो अक्षर ही मृत्युरूप हैं और “न मम” (मेरा नहीं है) यह तीन अक्षरोंका पद सनातन ब्रह्मकी प्राप्तिका कारण है। ममता मृत्यु है और उसका त्याग सनातन अमृतत्व है
风神伐由说道:“二音之念‘我之’即为死亡;三音之念‘非我之’乃永恒梵。执为己有是死;舍弃‘我之’之心,乃通向不死的无时之道。”
Verse 4
ब्रह्ममृत्यू ततो राजन्नात्मन्येव व्यवस्थितौ । अदृश्यमानौ भूतानि योधयेतामसंशयम्,राजन! इस प्रकार मृत्यु और अमृत दोनों अपने भीतर ही स्थित हैं। ये दोनों अदृश्य रहकर प्राणियोंको लड़ाते हैं अर्थात् किसीको अपना मानना और किसीको अपना न मानना यह भाव ही युद्धका कारण है, इसमें संशय नहीं है
风神伐由说道:“因此,国王啊,不死(近于梵的无死)与死亡,皆安立于自我之中。虽不可见,这二者却驱使众生陷入争斗——毫无疑问。内心将一些认作‘我之’,将另一些判作‘非我之’,正是纷争的种子。”
Verse 5
अविनाशो<स्य सत्त्वस्य नियतो यदि भारत | भित्त्वा शरीरं भूतानामहिंसां प्रतिपद्यते,भरतनन्दन! यदि इस जगत्की सत्ताका विनाश न होना ही निश्चित हो, तब तो प्राणियोंके शरीरका भेदन करके भी मनुष्य अहिंसाका ही फल प्राप्त करेगा
风神伐由说道:“婆罗多啊,若执定此世之本体必不可毁,那么依此推论,即便刺穿众生之身,人亦将获得阿希姆萨(不害)的果报。”
Verse 6
लब्ध्वा हि पृथ्वीं कृत्स्नां सहस्थावरजज्भमाम् | ममत्वं यस्य नैव स्यात् कि तया स करिष्यति,चराचर प्राणियोंसहित समूची पृथ्वीको पाकर भी जिसकी उसमें ममता नहीं होती, वह उसको लेकर क्या करेगा अर्थात् उस सम्पत्तिसे उसका कोई अनर्थ नहीं हो सकता
风神伐由说道:“纵使一人得尽大地,连同其上一切不动与一切有情而动之物,若他心中不起‘我之’之念,他又能拿它做什么?换言之,对离于占有欲者而言,财富与王权不能成为祸患之因。”
Verse 7
अथवा वसतः: पार्थ वने वन्येन जीवत: । ममता यस्य द्रव्येषु मृत्योरास्ये स वर्तते,किंतु कुन्तीनन्दन! जो वनमें रहकर जंगली फल-मूलोंसे ही जीवन-निर्वाह करता है, उसकी भी यदि द्रव्योंमें ममता है तो वह मौतके मुखमें ही विद्यमान है
又者,哦,帕尔塔啊:纵使有人居于林野,只以野生果实维生,若仍以占有之心执著诸物,口口声声“这是我的”,此人已然住在死神之口中。外相的出离并不能救人;唯有内心的不执著,方能使人免于败亡。
Verse 8
बाह्यान्तराणां शत्रूणां स्वभाव॑ पश्य भारत | यज्ञ पश्यति तद् भूतं मुच्यते स महाभयात्,भारत! बाहरी और भीतरी शत्रुओंके स्वभावको देखिये-समझिये (ये मायामय होनेके कारण मभिथ्या हैं, ऐसा निश्चय कीजिये)। जो मायिक पदार्थोको ममत्वकी दृष्टिसे नहीं देखता, वह महान् भयसे छुटकारा पा जाता है
风神伐由说道:“噢,婆罗多啊,当观照并洞悉外在与内在诸敌的真实本性。能如实见一切所生之物,而不以‘这是我的’之占有之眼去看者,便能解脱于大怖畏。”
Verse 9
कामात्मान॑ न प्रशंसन्ति लोके नेहाकामा काचिदस्ति प्रवृत्ति: । सर्वे कामा मनसोज्जप्रभूता यान् पण्डित: संहरते विचिन्त्य,जिसका मन कामनाओंमें आसक्त है, उसकी संसारके लोग प्रशंसा नहीं करते हैं। कोई भी प्रवृत्ति बिना कामनाके नहीं होती और समस्त कामनाएँ मनसे ही प्रकट होती हैं। विद्वान् पुरुष कामनाओंको दुःखका कारण मानकर उनका परित्याग कर देते हैं
风神伐由说道:“世人不称赞那心为欲望所役使之人。此世间,无欲则无所起行;而一切欲望皆从心而生。故智者深思,知欲为苦之因,便加以摄持,终而舍离。”
Verse 10
भूयो भूयोजन्मनो5भ्यासयोगाद् योगी योगं सारमार्ग विचिन्त्य । दानं च वेदाध्ययनं तपश्न काम्यानि कर्माणि च वैदिकानि,योगी पुरुष अनेक जन्मोंके अभ्याससे योगको ही मोक्षका मार्ग निश्चित करके कामनाओंका नाश कर डालता है। जो इस बातको जानता है, वह दान, वेदाध्ययन, तप, वेदोक्त कर्म, व्रत, यज्ञ, नियम और ध्यान-योगादिका कामनापूर्वक अनुष्ठान नहीं करता तथा जिस कर्मसे वह कुछ कामना रखता है, वह धर्म नहीं है। वास्तवमें कामनाओंका निग्रह ही धर्म है और वही मोक्षका मूल है
风神伐由说道:“经由多生累劫的熏修与瑜伽之恒常实践,瑜伽行者反复思惟,辨明唯有瑜伽才是通向解脱(mokṣa)的精要之道。明此真义者,不以欲求私利之心去行布施、诵习吠陀、苦行,或其他吠陀仪轨;因为凡以贪求果报而作之业,皆非真实之法(dharma)。实则,摄持并熄灭欲望,正是法本身;而此摄持,乃解脱之根。”
Verse 11
व्रतं यज्ञान् नियमान् ध्यानयोगान् कामेन यो नारभते विदित्वा । यद् यच्चायं कामयते स धर्मों न यो धर्मो नियमस्तस्य मूलम्,योगी पुरुष अनेक जन्मोंके अभ्याससे योगको ही मोक्षका मार्ग निश्चित करके कामनाओंका नाश कर डालता है। जो इस बातको जानता है, वह दान, वेदाध्ययन, तप, वेदोक्त कर्म, व्रत, यज्ञ, नियम और ध्यान-योगादिका कामनापूर्वक अनुष्ठान नहीं करता तथा जिस कर्मसे वह कुछ कामना रखता है, वह धर्म नहीं है। वास्तवमें कामनाओंका निग्रह ही धर्म है और वही मोक्षका मूल है
风神伐由说道:“知此真理者,不以欲心而起誓戒、祭祀、诸般制约,或禅定瑜伽之修持——唯此人方为明了。凡人所作,若怀贪求某种果报,皆非真实之法(dharma)。实则,摄持并熄灭欲望,正是法;而此自在之主宰,乃解脱之根。瑜伽行者凭多生修习,断定唯瑜伽为通向解脱(mokṣa)之道,并摧灭诸欲。”
Verse 12
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें श्रीकृष्ण और युधिषछिरका संवादविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ,अत्र गाथा: कामगीता: कीर्तयन्ति पुराविद: । शृणु संकीर्त्यमानास्ता अखिलेन युधिष्छिर । नाहं शक््यो<नुपायेन हन्तुं भूतेन केनचित् युधिष्ठिर! इस विषयमें प्राचीन बातोंके जानकार विद्वान् एक पुरातन गाथाका वर्णन किया करते हैं, जो कामगीता कहलाती है। उसे मैं आपको सुनाता हूँ, सुनिये। कामका कहना है कि कोई भी प्राणी वास्तविक उपाय (निर्ममता और योगाभ्यास)-का आश्रय लिये बिना मेरा नाश नहीं कर सकता है
风神伐由说道:“关于此事,通晓古老传统的贤者常诵一组古偈,名为《迦摩之歌》。尤提施提罗啊,且听我为你尽数诵出:‘若无真实之道,任何众生都不能毁灭我。’”在此,迦摩(欲望)宣称:它并非凭蛮力或寻常努力即可克服;唯有具足纪律的方法——以内在离著与瑜伽修持为标志——方能获得对它的主宰。
Verse 13
यो मां प्रयतते हन्तुं ज्ञात्वा प्रहरणे बलम् । तस्य तस्मिन् प्रहरणे पुनः प्रादुर्भवाम्पहम्,जो मनुष्य अपनेमें अस्त्रबलकी अधिकताका अनुभव करके मुझे नष्ट करनेका प्रयत्न करता है, उसके उस अस्त्रबलमें मैं अभिमानरूपसे पुनः प्रकट हो जाता हूँ इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वमेधपर्वणि कृष्णधर्मसंवादे त्रयोदशो 5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमह्ाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें श्रीकृष्ण और धर्मराज युधिष्ठिरका संवादविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ
风神伐由说道:“当一个人自恃兵器之威,认定其力胜人而欲灭我之时,我便在那兵器之力中再度显现——化作由此生起的骄矜与自负。”
Verse 14
यो मां प्रयतते हन्तुं यजैविविधदक्षिणै: । जड़मेष्विव धर्मात्मा पुन: प्रादुर्भवाम्यहम्,जो नाना प्रकारकी दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा मुझे मारनेका यत्न करता है, उसके चित्तमें मैं उसी प्रकार उत्पन्न होता हूँ, जैसे उत्तम जंगम योनियोंमें धर्मात्मा
风神伐由说道:“凡欲以备具多种祭礼布施的祭祀来‘杀’我者,我便在其心中再度生起,正如具德之者复生于更高等、能行之类。故以仪式欲缚或灭一股宇宙之力,不过是再度召唤它而已。”
Verse 15
यो मां प्रयतते नित्यं वेदैवेदान्तसाधनै: । स्थावरेष्विव भूतात्मा तस्य प्रादुर्भवाम्यहम्,जो वेद और वेदान्तके स्वाध्यायरूप साधनोंके द्वारा मुझे मिटा देनेका सदा प्रयास करता है, उसके मनमें मैं स्थावर प्राणियोंमें जीवात्माकी भाँति प्रकट होता हूँ
风神伐由说道:“凡以诵习《吠陀》与《吠檀多》之法门,恒常欲灭我者,我便在其心中显现,如同灵我(我性)在不动之类中亦自呈现。”
Verse 16
यो मां प्रयतते हन्तुं धृत्या सत्यपराक्रम: । भावो भवामि तस्याहं स च मां नावबुध्यते,जो सत्यपराक्रमी पुरुष धैर्यके बलसे मुझे नष्ट करनेकी चेष्टा करता है, उसके मानसिक भावोंके साथ मैं इतना घुल-मिल जाता हूँ कि वह मुझे पहचान नहीं पाता
风神伐由说道:“凡坚忍而真勇者,欲以定力灭我,我便与其心念与意向的流转融为一体,密不可分,以至于他不能识我为异。”
Verse 17
यो मां प्रयतते हन्तुं तपसा संशितव्रत: । ततस्तपसि तस्याथ पुन: प्रादुर्भवाम्यहम्,जो कठोर व्रतका पालन करनेवाला मनुष्य तपस्याके द्वारा मेरे अस्तित्वको मिटा डालनेका प्रयास करता है, उसकी तपस्यामें ही मैं प्रकट हो जाता हूँ
凡以苦行严守誓戒而欲以修苦行来灭我者,我便在他那苦行之中再度显现。
Verse 18
यो मां प्रयतते हन्तुं मोक्षमास्थाय पण्डित: । तस्य मोक्षरतिस्थस्य नृत्यामि च हसामि च । अवध्य: सर्वभूतानामहमेक: सनातन:,जो विद्वान् पुरुष मोक्षका सहारा लेकर मेरे विनाशका प्रयत्न करता है, उसकी जो मोक्षविषयक आसक्ति है, उसीसे वह बँधा हुआ है। यह विचारकर मुझे उसपर हँसी आती है और मैं खुशीके मारे नाचने लगता हूँ। एकमात्र मैं ही समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य एवं सदा रहनेवाला हूँ
若有智者依凭解脱之说而欲杀我,他其实正被对解脱的执著所系缚。见此情状,我便嗤笑于他,欢喜之余甚至起舞。因为唯我永恒,诸有情之中无一能杀我。
Verse 19
तस्मात्त्वमपि तं काम॑ यज्ैविविधदक्षिणै: । धर्मे कुरु महाराज तत्र ते स भविष्यति,अतः महाराज! आप भी नाना प्रकारकी दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा अपनी उस कामनाको धर्ममें लगा दीजिये। वहाँ आपकी वह कामना सफल होगी
因此,大王啊,你也当以诸多祭礼、以种种供施(达克希那)奉与祭官,将你的愿望导入法(dharma)之中;在那里,于正道之内,你的所愿必得成就。
Verse 20
यजस्व वाजिमेधेन विधिवद् दक्षिणावता । अन्यैश्न विविधैर्यज्जै: समृद्धैराप्तदक्षिणै:
伐由说道:“当依正法仪轨举行阿湿婆梅陀(马祭),并具足按规所施予祭官的供赐;又当举行其他种种祭祀,资具丰备,酬施周全,使你的祭礼既合仪亦慷慨。”
Verse 21
मा ते व्यथास्तु निहतान् बन्धून् वीक्ष्य पुनः पुनः । न शक्यास्ते पुनर्द्र्ट ये हता5स्मिन् रणाजिरे
伐由说道:“莫要一再凝望你那被杀的亲族而悲恸。凡在此战场上倒下者,已不可再见。”
Verse 22
विधिपूर्वक दक्षिणा देकर आप अभश्वमेधका तथा पर्याप्त दक्षिणावाले अन्यान्य समृद्धिशाली यज्ञोंका अनुष्ठान कीजिये। अपने मारे गये भाई-बन्धुओंको बारंबार याद करके आपके मनमें व्यथा नहीं होनी चाहिये। इस समरांगणमें जिनका वध हुआ है, उन्हें आप फिर नहीं देख सकते ।। स त्वमिष्टवा महायज्जै: समृद्धैराप्तदक्षिणै: । कीर्ति लोके परां प्राप्प गतिमग्रयां गमिष्यसि,इसलिये आप पर्याप्त दक्षिणावाले समृद्धिशाली महायज्ञोंका अनुष्ठान करके इस लोकमें उत्तम कीर्ति और परलोकमें श्रेष्ठ गति प्राप्त करेंगे
风神伐由说道:“当依仪轨奉上所规定的布施(达克希那,dakṣiṇā)之后,当行马祭(Aśvamedha)以及其他兴盛富足、酬施丰厚的大祭。你不应因反复追忆被杀的兄弟与亲族而令悲痛在心中滋生。凡在此战场上被诛者,已不可复见。故而,若能举行繁荣昌盛、达克希那充足的诸大祭祀,你将在此世获得卓越声名,并于来世得至最高归趣。”
The dilemma is whether ethical and spiritual success comes from external renunciation (discarding possessions/conditions) or from transforming inner attachment and intention; the chapter argues that inner mamatā can negate outward austerity or achievement.
Desire cannot be treated as absent from action; it must be regulated and redirected toward dharmic ends. Non-possessiveness (‘na mama’) is presented as a stabilizing orientation that reduces fear and supports responsible rule and ritual efficacy.
A practical outcome statement functions as a phala-oriented closure: by performing great sacrifices with proper dakṣiṇā and maintaining mental steadiness (including restraint in grief), the king gains lasting renown (kīrti) and an elevated ‘gati’ (destiny/attainment).