Kāma–Mamatā–Upadeśa
Discourse on Desire, Possessiveness, and Ritual Duty
इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें श्रीकृष्ण और युधिषछिरका संवादविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ,अत्र गाथा: कामगीता: कीर्तयन्ति पुराविद: । शृणु संकीर्त्यमानास्ता अखिलेन युधिष्छिर । नाहं शक््यो<नुपायेन हन्तुं भूतेन केनचित् युधिष्ठिर! इस विषयमें प्राचीन बातोंके जानकार विद्वान् एक पुरातन गाथाका वर्णन किया करते हैं, जो कामगीता कहलाती है। उसे मैं आपको सुनाता हूँ, सुनिये। कामका कहना है कि कोई भी प्राणी वास्तविक उपाय (निर्ममता और योगाभ्यास)-का आश्रय लिये बिना मेरा नाश नहीं कर सकता है
atra gāthāḥ kāmagītāḥ kīrtayanti purāvidaḥ | śṛṇu saṅkīrtyamānās tā akhilena yudhiṣṭhira | nāhaṃ śakyo'nupāyena hantuṃ bhūtena kenacit ||
风神伐由说道:“关于此事,通晓古老传统的贤者常诵一组古偈,名为《迦摩之歌》。尤提施提罗啊,且听我为你尽数诵出:‘若无真实之道,任何众生都不能毁灭我。’”在此,迦摩(欲望)宣称:它并非凭蛮力或寻常努力即可克服;唯有具足纪律的方法——以内在离著与瑜伽修持为标志——方能获得对它的主宰。
वायुदेव उवाच