Kāma–Mamatā–Upadeśa
Discourse on Desire, Possessiveness, and Ritual Duty
लब्ध्वा हि पृथ्वीं कृत्स्नां सहस्थावरजज्भमाम् | ममत्वं यस्य नैव स्यात् कि तया स करिष्यति,चराचर प्राणियोंसहित समूची पृथ्वीको पाकर भी जिसकी उसमें ममता नहीं होती, वह उसको लेकर क्या करेगा अर्थात् उस सम्पत्तिसे उसका कोई अनर्थ नहीं हो सकता
labdhvā hi pṛthivīṁ kṛtsnāṁ saha-sthāvara-jaṅgamām | mamatvaṁ yasya naiva syāt kiṁ tayā sa kariṣyati ||
风神伐由说道:“纵使一人得尽大地,连同其上一切不动与一切有情而动之物,若他心中不起‘我之’之念,他又能拿它做什么?换言之,对离于占有欲者而言,财富与王权不能成为祸患之因。”
वायुदेव उवाच