
Chapter 89: Bhīma dispatched to protect Ghaṭotkaca amid escalating engagements
Upa-parva: Bhīṣma-vadha Parva (contextual war-episode unit within Bhīṣma Parva)
Sañjaya reports a concentrated battlefield development: a rākṣasa combatant presses toward Duryodhana, prompting Kaurava forces to converge with heavy bows and a surrounding arrow-barrage. The rākṣasa, though struck, surges upward and emits a formidable roar that carries across directions, becoming an acoustic signal of intensified combat. Hearing this, Yudhiṣṭhira infers a serious engagement involving Dhārtarāṣṭra mahārathas; he also notes Bhīṣma’s anger toward the Pāñcālas and Arjuna’s defensive fighting on their behalf, identifying simultaneous operational pressures. He instructs Bhīma (Vṛkodara) to move quickly and protect Haiḍimba (Ghaṭotkaca), now at high risk. Bhīma advances with a lion-like shout; several Kaurava fighters pursue, while allied forces—Abhimanyu, the Draupadeyas, and others—form a protective ring around Ghaṭotkaca with elephants and chariots. The scene expands into dispersed, close-quarters engagements: mixed arms collide, dust obscures recognition, and the narration emphasizes the chaotic mechanics of battle—noise, disorientation, and the grim material consequences—while concluding that the Dhārtarāṣṭra host is largely checked and turned back in that phase.
Chapter Arc: घमासान संग्राम के बीच भीष्म शिखण्डी को आते देख क्षणभर में उसका धनुष काट देते हैं—मानो यह संकेत हो कि आज का युद्ध केवल शस्त्रों का नहीं, मर्यादा और संकल्प का भी है। → युद्ध का कोलाहल बढ़ते ही शान्तनुनन्दन भीष्म सीधे युधिष्ठिर की ओर बढ़ते हैं। पाण्डव-पक्ष के रथ, हाथी, घोड़े काँप उठते हैं; सबको लगता है मानो युधिष्ठिर मृत्यु के मुख में जा रहे हों। व्यूह टूटते हैं, पर क्षत्रिय एक-दूसरे को ललकार कर व्यक्तिगत द्वन्द्वों में उतर आते हैं। → क्रोध से भरे युधिष्ठिर भीष्म पर विषधर सर्प-सा नाराच छोड़ते हैं, पर महारथी भीष्म क्षुरप्र से उसे काट देते हैं और दबाव बनाए रखते हैं। साथ ही, भीष्म शिखण्डी को ‘स्त्रीत्व’ का स्मरण कर अनादरपूर्वक उपेक्षित करते हुए आगे बढ़ते हैं—यह उपेक्षा स्वयं एक तीखा प्रहार बन जाती है। → सृंजय-गण भीष्म के पराक्रम से हर्षित होकर शंख-नाद और सिंहनाद करते हैं। दिन भर की टक्कर के बाद दोनों सेनाएँ थककर रात्रि में विश्राम को जाती हैं; हाथी-घोड़ों से भरी वह रात युद्ध-भूमि को एक विचित्र, देखने योग्य शान्ति देती है। → रात्रि की शान्ति के भीतर अगले दिन का अनिवार्य प्रचण्ड उभार छिपा है—भीष्म का दबदबा बना रहता है, और पाण्डवों के लिए मार्ग और कठिन होने का संकेत मिलता है।
Verse 1
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके तीन श्लोक मिलाकर कुल ४३ श्लोक हैं।] - भीष्मपितामहने शिखण्डीको अपने ऊपर प्रहार करनेके लिये आया देखकर ही उसके धनुषको काट दिया था
سنجے نے کہا—اے راجن! رتھ سے محروم اپنے نامور بھائی چترسین کے پاس جا کر آپ کے بیٹے وِکرن نے اسے اپنے رتھ پر سوار کر لیا۔
Verse 2
तस्मिंस्तथा वर्तमाने तुमुले संकुले भूशम् । भीष्म: शान्तनवस्तूर्ण युधिष्ठिरमुपाद्रवत्,जब इस प्रकार भयंकर और घमासान युद्ध होने लगा, उसी समय शान्तनुनन्दन भीष्मने तुरंत ही राजा युधिष्ठिरपर धावा किया
جب اس طرح ہولناک اور پرآشوب گھمسان کی جنگ چھڑ گئی، تب شانتنو کے فرزند بھیشم نے فوراً ہی راجا یُدھشٹھِر پر یلغار کی۔
Verse 3
ततः सरथनागाश्वा: समकम्पन्त सूंजया: । मृत्योरास्यमनुप्राप्तं मेनिरे च युधिष्ठिरम्,यह देख सूंजयवीर रथ, हाथी और घोड़ोंसहित काँप उठे। उन्होंने युधिष्ठिरको मौतके मुखमें पड़ा हुआ ही समझा
یہ دیکھ کر سِرنجے رتھوں، ہاتھیوں اور گھوڑوں سمیت کانپ اٹھے۔ انہوں نے سمجھا کہ یُدھشٹھِر موت کے جبڑوں میں جا پڑا ہے۔
Verse 4
युधिष्ठटिरो5पि कौरव्यो यमाभ्यां सहित: प्रभु: । महेष्वासं नरव्याप्र॑ भीष्मं शान्तनवं ययौ
سنجے نے کہا—کوروؤں کے سردار، صاحبِ اقتدار یُدھِشٹھِر بھی یم کے دونوں بیٹوں (نکُل اور سہدیو) کے ساتھ، اس مہا دھنوردھر، مردوں کے شیر، شانتنو کے فرزند بھیشم کا مقابلہ کرنے کے لیے آگے بڑھے۔
Verse 5
तत: शरसहस्राणि प्रमुड्चन् पाण्डवो युधि । भीष्म॑ं संछादयामास यथा मेघो दिवाकरम्
سنجے نے کہا—پھر میدانِ جنگ میں پانڈو پُتر یُدھِشٹھِر نے ہزاروں تیر برسا کر بھیشم کو یوں ڈھانپ لیا جیسے بادل سورج کو چھپا لیتا ہے۔
Verse 6
तेन सम्यक् प्रणीतानि शरजालानि मारिष । प्रतिजग्राह गाड़ेयः शतशो5थ सहस्रश:
سنجے نے کہا—اے بزرگ! اس کے خوب نشانے سے چلائے ہوئے سینکڑوں اور ہزاروں تیروں کے جال کو گنگا کے فرزند بھیشم نے اپنے تیروں سے روک کر بے اثر کر دیا۔
Verse 7
तथैव शरजालानि भीष्मेणास्तानि मारिष | आकाशे समदृश्यन्त खगमानां व्रजा इव,आर्य! इसी प्रकार भीष्मके चलाये हुए बाणसमूह भी आकाशमें पक्षियोंके झुंडके समान दिखायी देने लगे
سنجے نے کہا—اے بزرگ! اسی طرح بھیشم کے چلائے ہوئے تیروں کے جال آسمان میں پرندوں کے غول کی مانند دکھائی دینے لگے۔
Verse 8
निमेषार्थेन कौन्तेयं भीष्म: शान्तनवो युधि । अदृश्यं समरे चक्रे शरजालेन भागश:
سنجے نے کہا—میدانِ جنگ میں شانتنو کے فرزند بھیشم نے آدھی پلک جھپکنے کے اندر اندر جدا جدا تیروں کا جال بچھا کر کنتی کے بیٹے یُدھِشٹھِر کو نگاہوں سے اوجھل کر دیا۔
Verse 9
ततो युधिषछिरो राजा कौरव्यस्य महात्मन: । नाराचं प्रेषयामास क्रुद्ध आशीविषोपमम्
تب غضب میں بھرے ہوئے راجہ یُدھِشٹھِر نے مہاتما کورَو (بھیشم) پر زہریلے سانپ کے مانند ہلاکت خیز ناراج تیر چلایا۔
Verse 10
तब क्रोधमें भरे हुए राजा युधिष्ठिरने कुरुवंशी महात्मा भीष्मपर विषधर सर्पके समान नाराचका प्रहार किया ।।
تب غصّے سے بھرے ہوئے راجہ یُدھِشٹھِر نے کُرووَںشی مہاتما بھیشم پر زہریلے سانپ کے مانند ناراج تیر چلایا۔ مگر اے راجن! یُدھِشٹھِر کے کمان سے چھوٹا ہوا وہ تیر ابھی پہنچا بھی نہ تھا کہ مہارَتھی بھیشم نے میدانِ جنگ میں خُشُرپر تیر سے اسے کاٹ کر گرا دیا۔
Verse 11
त॑ तु छित्त्वा रणे भीष्मो नाराचं कालसम्मितम् | निजघ्ने कौरवेन्द्रस्य हयान् काड्चनभूषणान्
پھر بھیشم نے میدانِ جنگ میں اس ناراج تیر کو، جو کال کے مانند ہولناک تھا، کاٹ ڈالا اور کوروَندر یُدھِشٹھِر کے سونے کے زیورات سے آراستہ گھوڑوں کو مار گرایا۔
Verse 12
(हताश्वे तु रथे तिष्ठन् शक्ति चिक्षेप धर्मराट् । तामापतन्ती सहसा कालपाशोपमां शिताम् ।।
گھوڑے مارے جانے پر بھی رتھ میں کھڑے رہ کر دھرم راج یُدھِشٹھِر نے بھیشم پر شکتی پھینکی۔ کال پاش کے مانند تیز اور ہولناک وہ ہتھیار اچانک اپنی طرف آتا دیکھ کر بھیشم نے جھکی ہوئی گانٹھوں والے تیروں سے میدانِ جنگ میں اسے کاٹ گرایا۔ پھر گھوڑوں سے خالی اس رتھ کو چھوڑ کر دھرم پُتر یُدھِشٹھِر فوراً ہی مہاتما نکُل کے رتھ پر سوار ہو گیا۔
Verse 13
यमावपि हि संक्रुद्ध: समासाद्य रणे तदा | शरै: संछादयामास भीष्म: परपुरंजय:,उस समय रणक्षेत्रमें नकुल और सहदेवको पाकर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले भीष्मने अत्यन्त कुपित हो उन्हें बाणोंसे आच्छादित कर दिया
اسی وقت میدانِ جنگ میں جب بھیشم کو یمَج نَکُل اور سہدیَو سامنے ملے تو دشمن کے قلعے فتح کرنے والے بھیشم سخت غضبناک ہوا اور انہیں تیروں کی بارش سے ڈھانپ دیا۔
Verse 14
तौ तु दृष्टवा महाराज भीष्मबाणप्रपीडितौ । जगाम परमां चिन्तां भीष्मस्य वधकाडुक्षया
اے مہاراج! بھیشم کے تیروں سے نکول اور سہ دیو کو سخت اذیت میں مبتلا دیکھ کر یدھشٹھِر بھیشم کے وध کی خواہش لیے گہری فکر و اضطراب میں ڈوب گیا اور سنجیدگی سے تدبیر کرنے لگا۔
Verse 15
ततो युधिष्छिरो वश्यान् राज्ञस्तानू समचोदयत् । भीष्मं शान्तनवं सर्वे निहतेति सुहृदूगणान्
پھر یدھشٹھِر نے اپنے تابع فرمان بادشاہوں اور اپنے خیرخواہوں کو ابھارا اور حکم دیا: “تم سب مل کر شانتنو کے فرزند بھیشم کو گرا دو، اسے ہلاک کرو۔”
Verse 16
ततस्ते पार्थिवा: सर्वे श्र॒ुत्वा पार्थस्य भाषितम् । महता रथवंशेन परिवद्रु: पितामहम्,तब कुन्तीपुत्र युधिष्ठिका यह कथन सुनकर समस्त राजाओंने विशाल रथसमूहके द्वारा पितामह भीष्मको चारों ओरसे घेर लिया
پارتھ کے کہے ہوئے الفاظ سن کر وہ سب بادشاہ عظیم رتھوں کے جھنڈ کے ساتھ پِتامہ بھیشم کو چاروں طرف سے گھیرنے لگے۔
Verse 17
स समन्तात् परिवृत: पिता देवव्रतस्तव । चिक्रीड धनुषा राजन् पातयानो महारथान्,राजन्! सब ओरसे घिरे हुए आपके ताऊ देवव्रत सब महारथियोंको धराशायी करते हुए अपने धनुषके द्वारा क्रीड़ा करने लगे
اے راجن! چاروں طرف سے گھِرے ہوئے تمہارے پِترویہ دیوورت (بھیشم) نے کمان کے ساتھ گویا کھیلتے ہوئے بڑے بڑے مہارَتھیوں کو گرانا شروع کر دیا۔
Verse 18
त॑ चरन्तं रणे पार्था ददृशु: कौरवं युधि । मृगमध्यं प्रविश्येव यथा सिंहशिशुं वने
جیسے جنگل میں ہرنوں کے ریوڑ کے بیچ شیر کا بچہ گھس کر بےخوف گھومتا ہو، ویسے ہی پرتھا کے بیٹوں نے میدانِ جنگ میں گردش کرتے کورووَںشی بھیشم کو دیکھا۔
Verse 19
तर्जयानं रणे वीरांस्त्रासयानं च सायकै: । दृष्टवा त्रेसुर्महाराज सिंहं मृगगणा इव
اے مہاراج! میدانِ جنگ میں وہ بہادروں کو ڈانٹتا اور اپنے تیروں سے انہیں دہشت زدہ کرتا تھا۔ اسے دیکھ کر سب راجے یوں خوف زدہ ہو گئے جیسے شیر کو دیکھ کر ہرنوں کے غول کانپ اٹھتے ہیں۔
Verse 20
रणे भारतसिंहस्य ददृशु: क्षत्रिया गतिम् । अग्नेर्वायुसहायस्य यथा कक्ष॑ दिधक्षत:
جس طرح ہوا کی مدد سے گھاس پھونس کو جلانے والی آگ نہایت بھڑک اٹھتی ہے، اسی طرح میدانِ جنگ میں کشتریوں نے بھرت وَنش کے شیر بھیشم کی چال اور ہیبت کو بے حد درخشاں دیکھا۔
Verse 21
शिरांसि रथिनां भीष्म: पातयामास संयुगे । तालेभ्य: परिपक्वानि फलानि कुशलो नर:
جنگ میں بھیشم رتھی یودھاؤں کے سر کاٹ کاٹ کر یوں گراتا تھا جیسے کوئی ماہر آدمی تاڑ کے درختوں سے پکے ہوئے پھل گرا دے۔
Verse 22
पतद्धिश्न महाराज शिरोभिर्धरणीतले । बभूव तुमुल: शब्द: पततामश्मनामिव,महाराज! भूतलपर पटापट गिरते हुए मस्तकोंका आकाशसे पृथ्वीपर पड़नेवाले पत्थरोंके समान भयंकर शब्द हो रहा था
اے مہاراج! زمین پر گرتے ہوئے سروں سے ایسا ہولناک شور اٹھا گویا آسمان سے پتھر گر رہے ہوں۔
Verse 23
तस्मिन् सुतुमुले युद्धे वर्तमाने भयानके । सर्वेषामेव सैन्यानामासीद् व्यतिकरो महान्,उस भयानक तुमुल युद्धके होते समय सभी सेनाओंका आपसमें भारी संघर्ष हो गया
اس ہولناک اور نہایت ہنگامہ خیز جنگ کے جاری رہتے ہوئے تمام لشکر آپس میں گڈمڈ ہو گئے اور زبردست ٹکراؤ برپا ہو گیا۔
Verse 24
भिन्नेषु तेषु व्यूहेषु क्षत्रिया इतरेतरम् । एकमेकं समाहूय युद्धायैवावतस्थिरे,उन सबका व्यूह भंग हो जानेपर भी सम्पूर्ण क्षत्रिय परस्पर एक-एकको ललकारते हुए युद्धके लिये डटे ही रहे
ان کے تمام جنگی صف بندیاں ٹوٹ جانے کے باوجود بھی سب کے سب کشتریہ ایک دوسرے کو ایک ایک کر کے للکارتے ہوئے صرف جنگ ہی کے لیے ڈٹے رہے۔
Verse 25
शिखण्डी तु समासाद्य भरतानां पितामहम् | अभिदुद्राव वेगेन तिष्ठ तिछेति चाब्रवीत्,शिखण्डी भरतवंशके पितामह भीष्मके पास पहुँचकर उनकी ओर बड़े वेगसे दौड़ा और बोला--'खड़ा रह, खड़ा रह”
پھر شکھنڈی بھرتوں کے پِتامہ بھیشم کے پاس پہنچ کر بڑی تیزی سے ان کی طرف لپکا اور پکارا—“ٹھہرو، ٹھہرو!”
Verse 26
अनादृत्य ततो भीष्मस्तं शिखण्डिनमाहवे । प्रययौ सूंजयान क्रुद्धः स्त्रीत्वं चिन्त्य शिखण्डिन:
مگر بھیشم نے میدانِ جنگ میں شکھنڈی کی عورت ہونے کی بات ذہن میں رکھ کر اسے نظرانداز کیا اور غضب میں سُرنجَیَہ کے کشتریوں پر ٹوٹ پڑا۔
Verse 27
सृंजयास्तु ततो दृष्ट्वा हृष्टं भीष्मं महारणे । सिंहनादांश्व विविधांश्वक्रु: शड्खविमिश्रितान्
تب اس عظیم معرکے میں بھیشم کو جوش و خروش میں دیکھ کر سُرنجَیَہ کے لوگ شنکھوں کی آواز کے ساتھ طرح طرح کے شیرانہ نعرے لگانے لگے۔
Verse 28
ततः प्रववृते युद्ध व्यतिषक्तरथद्विपम् | पश्चिमां दिशमासाद्य स्थिते सवितरि प्रभो,प्रभो! जब सूर्य पश्चिम दिशामें ढलने लगे, उस समय युद्धका रूप और भी भयंकर हो गया। रथ-से-रथ और हाथी-से-हाथी भिड़ गये
اے प्रभو! جب سورج مغربی سمت ڈھلنے لگا تو جنگ پھر بھڑک اٹھی اور زیادہ ہولناک ہو گئی؛ رتھ رتھ سے اور ہاتھی ہاتھی سے گتھم گتھا ہو گئے۔
Verse 29
धृष्टद्युम्नो5थ पाज्चाल्य: सात्यकिश्न महारथ: । पीडयन्तौ भृशं सैन्यं शक्तितोमरवृष्टिभि:
تب پانچال کے شہزادے دھِرِشتدیومن اور مہارتھی ساتیہ کی—ان دونوں نے نیزوں اور برچھیوں کی بوچھاڑ سے کوروؤں کی فوج کو نہایت سخت اذیت پہنچانی شروع کی۔
Verse 30
शस्त्रैश्न बहुभी राजन् जध्नतुस्तावकान् रणे । ते हन्यमाना: समरे तावका भरतर्षभ
اے راجن! ان دونوں نے جنگ میں طرح طرح کے ہتھیاروں سے آپ کے لشکر کو کاٹنا شروع کیا۔ مگر اے بھرت شریشٹھ، لڑائی میں مارے جاتے ہوئے بھی آپ کے سپاہی جنگی حکمت اور نظم و ضبط کا سہارا لے کر میدان چھوڑ کر نہ بھاگے؛ اور آپ کے جانباز بھی رزمگاہ میں پورے جوش کے ساتھ دشمنوں کو گراتے رہے۔
Verse 31
आर्या युद्धे मतिं कृत्वा न त्यजन्ति सम संयुगम् यथोत्साहं तु समरे निजघ्नुस्तावका रणे
سنجے نے کہا—‘شریف اور نامور یودھا جنگ کا عزم باندھ کر برابر کی ٹکر کو نہیں چھوڑتے۔ اے راجن! اس معرکے میں حملہ آوروں کے پورے جوش کے مطابق آپ کے سپاہی میدان میں گرتے جا رہے تھے؛ پھر بھی وہ جنگی فہم کا سہارا لے کر بھاگے نہیں، اور آپ کے سورما بھی پورے ولولے سے دشمنوں کو گراتے رہے۔’
Verse 32
तत्राक्रन्दो महानासीत् तावकानां महात्मनाम् | वध्यतां समरे राजन् पार्षतेन महात्मना
اے راجن! جب عظیم النفس پارشت (دھِرِشتدیومن) جنگ میں آپ کے بلند ہمت یودھاؤں کو کاٹ رہا تھا، تب آپ کے لشکر میں ایک بڑا آہ و فغاں کا شور اٹھا۔
Verse 33
त॑ श्रुत्वा निनदं घोरं तावकानां महारथौ | विन्दानुविन्दावावन्त्यौ पार्षतं प्रत्युपस्थितौ
آپ کے لشکر کی وہ ہولناک فریاد سن کر، اونتی کے شہزادے—مہارتھی وِند اور اَنُوِند—پارشت پتر (دھِرِشتدیومن) کا مقابلہ کرنے کے لیے آگے بڑھے۔
Verse 34
तौ तस्य तुरगान् हत्वा त्वरमाणौ महारथौ । छादयामासतुरुभौ शरवर्षेण पार्षतम्
وہ دونوں تیز رفتار مہارَتھی اس کے گھوڑے مار کر پارشت کو تیروں کی بارش سے ڈھانپنے لگے۔
Verse 35
उन दोनों महारथियोंने बड़ी उतावलीके साथ धृष्टद्युम्नके घोड़ोंको मारकर उन्हें भी अपने बाणोंकी वर्षासे ढक दिया ।।
ان دونوں مہارَتھیوں نے بڑی عجلت سے دھِرِشتدیومن کے گھوڑے مار ڈالے اور اسے گھنے تیروں کی بارش سے ڈھانپ دیا۔ پھر مہابلی پانچال پُتر دھِرِشتدیومن فوراً اپنے رتھ سے کود پڑا اور بلندہمت ساتْیَکی کے رتھ پر تیزی سے سوار ہو گیا۔
Verse 36
ततो युधिष्ठिरो राजा महत्या सेनया वृतः । आवन्त्यौ समरे क्रुद्धावभ्ययात् स परंतपौ,तदनन्तर विशाल सेनासे घिरे हुए राजा युधिष्ठिरने शत्रुओंको तपानेवाले और क्रोधमें भरे हुए विन्द-अनुविन्दपर आक्रमण किया
اس کے بعد عظیم لشکر سے گھرا ہوا راجا یُدھِشٹھِر میدانِ جنگ میں غضب سے بھرے، دشمنوں کو تپانے والے اوَنتی کے دو شہزادوں—وِند اور اَنووِند—کی طرف بڑھا۔
Verse 37
तथैव तव पुत्रो5पि सर्वोद्योगेन मारिष । विन्दानुविन्दौ समरे परिवार्यावतस्थिवान्
اے مارِش، اسی طرح تمہارا بیٹا بھی پوری کوشش کے ساتھ میدانِ جنگ میں وِند اور اَنووِند کو چاروں طرف سے گھیر کر ان کی حفاظت کے لیے کھڑا ہو گیا۔
Verse 38
अर्जुनश्वापि संक्रुद्धः क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभ: । अयोधयत संग्रामे वज़्रपाणिरिवासुरान्
کشتریوں میں سرفہرست ارجن بھی سخت غضب میں آ کر میدانِ جنگ میں کشتریوں سے یوں لڑنے لگا جیسے وجر دھاری اندر اسوروں سے لڑتا ہے۔
Verse 39
द्रोणस्तु समरे क्रुद्धः पुत्रस्य प्रियकृत् तव । व्यधमत् सर्वपज्चालांस्तूलराशिमिवानल:
آپ کے بیٹے کی خوشنودی کے لیے کوشاں درون آچار्य بھی میدانِ جنگ میں غضبناک ہو کر تمام پانچالوں کو یوں کچلنے لگے جیسے آگ روئی کے ڈھیر کو جلا ڈالتی ہے۔
Verse 40
दुर्योधनपुरोगास्तु पुत्रास्तव विशाम्पते । परिवार्य रणे भीष्म युयुधु: पाण्डवै: सह,प्रजानाथ! आपके दुर्योधन आदि पुत्र रणक्षेत्रमें भीष्मको घेरकर पाण्डवोंके साथ युद्ध करने लगे
اے رعایا کے مالک! دُریودھن کی قیادت میں آپ کے بیٹوں نے میدانِ جنگ میں بھیشم کو گھیر لیا اور پانڈوؤں کے ساتھ لڑنے لگے۔
Verse 41
ततो दुर्योधनो राजा लोहितायति भास्करे । अब्रवीत् तावकान् सर्वास्त्वरध्वमिति भारत,भारत! तदनन्तर जब सूर्यदेवपर संध्याकी लाली छाने लगी, तब राजा दुर्योधनने आपके सभी योद्धाओंसे कहा--जल्दी करो
اے بھارت! پھر جب سورج شام کے سرخ رنگ میں ڈھلنے لگا تو راجا دُریودھن نے آپ کی طرف کے تمام جنگجوؤں سے کہا: “جلدی کرو۔”
Verse 42
युध्यतां तु तथा तेषां कुर्वतां कर्म दुष्करम् । अस्तं गिरिमथारूढे अप्रकाशति भास्करे
وہ اسی طرح لڑتے ہوئے دشوار کارنامے دکھانے لگے؛ اسی اثنا میں سورج غروب کے پہاڑ پر چڑھ گیا اور اس کی روشنی معدوم ہو گئی۔
Verse 43
प्रावर्तत नदी घोरा शोणितौघतरड्रिणी । गोमायुगणसंकीर्णा क्षणेन क्षणदामुखे
شام کے دہانے پر، ایک ہی لمحے میں خون کے سیلاب کی موجوں سے بھری ایک ہولناک ندی بہہ نکلی، اور اس کے کناروں پر گیدڑوں کے غول جمع ہو گئے۔
Verse 44
शिवाभिरशिवाभ्ि श्व रुवद्धिरभैरवं रवम् । घोरमायोधन जज्ञे भूतसंघै: समाकुलम्,भैरव रव फैलानेवाली अमंगलमयी सियारिनों तथा भूतगणोंसे व्याप्त होकर वह युद्धका मैदान अत्यन्त भयानक हो गया
سنجے نے کہا—بدشگونی کی علامت گیدڑیوں کی ہولناک، ناشگون چیخوں اور بھوتوں کے جھنڈوں سے بھرا ہوا وہ میدانِ جنگ نہایت ہیبت ناک ہو گیا؛ ہر طرف خوف انگیز اور منحوس صدائیں گونجنے لگیں۔
Verse 45
राक्षसाश्ष पिशाचाश्न तथान्ये पिशिताशिन: । समन्ततो व्यदृश्यन्त शतशो5थ सहस्रश:,चारों ओर राक्षस, पिशाच तथा अन्य मांसाहारी जन्तु सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें दिखायी देने लगे
سنجے نے کہا—چاروں طرف راکشس، پِشाच اور دوسرے گوشت خور وجود سینکڑوں، پھر ہزاروں کی تعداد میں دکھائی دینے لگے۔
Verse 46
अर्जुनो5थ सुभशर्मादीन् राज्ञस्तान् सपदानुगान् | विजित्य पृतनामध्ये ययौ स्वशिबिरं प्रति
سنجے نے کہا—پھر ارجن نے سُبھشرما وغیرہ اُن بادشاہوں کو اُن کے پیروکاروں سمیت میدانِ جنگ میں مغلوب کیا اور لشکر کے بیچ سے اپنے خیمہ گاہ کی طرف روانہ ہوا۔
Verse 47
तदनन्तर अर्जुन राजा दुर्योधनके पीछे चलनेवाले सुशर्मा आदिको सेनामें पराजित करके अपने शिविरको चले गये ।।
سنجے نے کہا—اس کے بعد بادشاہ ارجن نے دُریودھن کے پیچھے چلنے والے سُشَرما وغیرہ کو رَن میں شکست دے کر اپنے لشکرگاہ کی طرف رخ کیا۔ اور کوروکُل کے نندَن، بادشاہ یُدھشٹھِر بھی، دونوں بھائیوں نَکُل اور سَہدیو کے ساتھ، اپنی فوج کے حصار میں، رات کے وقت اپنے خیمہ گاہ میں پہنچے۔
Verse 48
भीमसेनो<पि राजेन्द्र दुर्योधनमुखान् रथान् । अवजित्य तत: संख्ये ययौ स्वशिबिरं प्रति,राजेन्द्र! तब भीमसेन भी दुर्योधन आदि रथियोंको युद्धमें जीतकर अपने शिविरको लौट गये
سنجے نے کہا—اے راجندر! تب بھیم سین نے بھی دُریودھن کی قیادت والے رتھیوں کو جنگ میں مغلوب کیا اور پھر میدانِ کارزار سے ہٹ کر اپنے لشکرگاہ کی طرف لوٹ گیا۔
Verse 49
दुर्योधनो5पि नृपति: परिवार्य महारणे । भीष्म॑ शान्तनवं तूर्ण प्रयात: शिबिरं प्रति,राजा दुर्योधन भी महायुद्धमें शान्तनुनन्दन भीष्मको घेरकर तुरंत ही अपने शिविरको लौट गया
سنجے نے کہا—مہا یُدھ میں راجا دُریودھن بھی شانتنو نندن بھیشم کو گھیر کر فوراً اپنے ہی لشکرگاہ کی طرف لوٹ گیا۔
Verse 50
दोणो द्रौणि: कृप: शल्य: कृतवर्मा च सात्वत: । परिवार्य चमूं सर्वा प्रययु: शिबिरं प्रति,द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा, कृपाचार्य, शल्य तथा यदुवंशी कृतवर्मा--ये सारी सेनाको घेरकर अपने शिविरकी ओर चल दिये
سنجے نے کہا—درون، درون کے بیٹے اشوتھاما، کرپ، شلیہ اور ساتوت ونش کے کِرت ورما—ان سب نے پوری فوج کو گھیر کر اپنی لشکرگاہ کی طرف کوچ کیا۔
Verse 51
तथैव सात्यकी राजन धृष्टय्रुम्नश्न पार्षत: । परिवार्य रणे योधान् ययतु: शिबिरं प्रति,राजन! इसी प्रकार सात्यकि और ट्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न भी युद्धमें अपने योद्धाओंको घेरकर शिविरकी ओर प्रस्थित हुए
سنجے نے کہا—اے راجن! اسی طرح ساتیکی اور پارشت (دروپد) کے بیٹے دھِرِشت دیومن بھی میدانِ جنگ میں اپنے یودھاؤں کو گھیر کر شِوِر کی طرف روانہ ہوئے۔
Verse 52
एवमेते महाराज तावका: पाण्डवै: सह । पर्यवर्तन्त सहिता निशाकाले परंतप,शत्रुओंको संताप देनेवाले महाराज! इस प्रकार रातके समय आपके योद्धा पाण्डवोंके साथ अपने-अपने शिविरमें लौट आये
سنجے نے کہا—اے دشمنوں کو تپانے والے مہاراج! اس طرح رات کے وقت آپ کے یودھا پانڈوؤں کے ساتھ مل کر اکٹھے ہی پلٹ آئے اور اپنے اپنے شِوِروں میں واپس جا پہنچے۔
Verse 53
ततः स्वशिबिरं गत्वा पाण्डवा: कुरवस्तथा । न्यवसन्त महाराज पूजयन्त: परस्परम्,महाराज! तत्पश्चात् पाण्डव तथा कौरव अपने शिविरमें जाकर आपसमें एक-दूसरेकी प्रशंसा करते हुए विश्राम करने लगे
سنجے نے کہا—اے مہاراج! پھر پانڈو اور کورو بھی اپنے اپنے شِوِروں میں جا کر ایک دوسرے کی عزت و ستائش کرتے ہوئے آرام کرنے لگے۔
Verse 54
रक्षां कृत्वा ततः शूरान्यस्य गुल्मान् यथाविधि । अपनीय च शल्यानि स्नात्वा च विविधैर्जलै:
سنجے نے کہا—اس کے بعد دونوں فریقوں کے شجاعوں نے چاروں طرف فوجی دستے مقرر کرکے دستور کے مطابق اپنے اپنے لشکرگاہوں کی حفاظت کا بندوبست کیا۔ پھر جسم میں پیوست تیروں کے شلّیہ نکالے اور طرح طرح کے پانی سے غسل کیا۔ جب سواستی واچن اور خیر و برکت کی دعائیں پڑھ دی گئیں تو بندِی و مغدھ ان کی مدح سرائی کرنے لگے؛ اور وہ نامور سورما گیتوں اور سازوں کی آوازوں کے بیچ کھیل تماشے اور تفریح میں مشغول ہو گئے۔
Verse 55
कृतस्वस्त्ययना: सर्वे संस्तूयन्तश्न वन्दिभि: । गीतवादित्रशब्देन व्यक्रीडन्त यशस्विन:
جب سب کے لیے سواستی واچن اور مَنگل کرم ادا ہو چکے، اور بندِی ان کی تعریف میں نغمے گا رہے تھے، تو وہ سب نامور سورما گیتوں اور سازوں کی آوازوں کے بیچ تفریح و کھیل میں مشغول ہو گئے۔
Verse 56
मुहूर्तादिव तत् सर्वमभवत् स्वर्गसंनिभम् । न हि युद्धकथां कांचित् तत्राकुर्वन् महारथा:,दो घड़ीतक वहाँका सब कुछ स्वर्गसदृश जान पड़ा। उस समय वहाँ महारथियोंने युद्धकी कोई बातचीत नहीं की
تھوڑی ہی دیر میں وہاں سب کچھ گویا جنت سا دکھائی دینے لگا۔ اس وقت وہاں مہارَتھیوں نے جنگ کی کوئی بات چیت نہ کی۔
Verse 57
ते प्रसुप्ते बले तत्र परिश्रान्तजने नृप । हस्त्यश्वबहुले रात्रौ प्रेक्षणीये बभूवतु:
اے نریش! ہاتھیوں اور گھوڑوں سے بھری ہوئی اُن دونوں فوجوں میں سب لوگ مشقت سے نہایت نڈھال تھے۔ رات کے وقت جب دونوں لشکر سو گئے تو وہ منظر دیکھنے کے لائق ہو گیا۔
Verse 85
इस प्रकार श्रीमह्याभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वरमें सातवें दिनके युद्धरे सम्बन्ध रखनेवाला पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ
یوں شری مہابھارت کے بھیشم پَرو کے ضمن میں، بھیشم وَدھ کے بیان میں، جنگ کے ساتویں دن کے حالات سے متعلق پچاسیواں باب اختتام کو پہنچا۔
Verse 86
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि सप्तमदिवसयुद्धावहारे षडशीतितमो<ध्याय:
یوں شری مہابھارت کے بھیشم پَرو میں، بھیشم وَدھ پَرو کے ضمن میں، ساتویں دن کی جنگ کے بیان میں چھیاسیواں ادھیائے ختم ہوا۔
A triage dilemma under simultaneous threats: Yudhiṣṭhira must allocate Bhīma to protect a vulnerable key ally (Ghaṭotkaca) while other fronts remain active, balancing protection, urgency, and limited attention.
Effective leadership is shown as inference-based decision-making: interpreting signals (sound, troop movement), identifying the highest-risk node, and acting quickly to prevent local danger from becoming systemic loss.
No explicit phalaśruti appears in this chapter; its meta-level function is descriptive and diagnostic—illustrating fog-of-war conditions and how dharma is operationalized through protective action and disciplined response.
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