Adhyaya 228
Adi ParvaAdhyaya 22841 Verses

Adhyaya 228

Chapter Arc: जनमेजय का विस्मय—खाण्डव-दाह जैसे सर्वभक्षी अग्निकाण्ड में जहाँ अश्वसेन नाग और मय दानव के बचने का कारण बताया गया, वहीं ‘शार्कुक’ पक्षियों का सकुशल बच जाना कैसे हुआ? → वैशम्पायन शार्कुकों के ‘अग्निसम्मर्द’ में अविनाश का रहस्य खोलते हैं: मन्दपाल मुनि की तपस्या, यज्ञ-व्यवस्था में अग्नि की अनिवार्यता, और जरिता की अपत्य-स्नेहजन्य चिंता—इन सबके बीच यह प्रश्न तीखा होता जाता है कि अग्नि, जो सबको भस्म कर देता है, किन्हें और क्यों छोड़ देता है। → अग्नि के सर्वदेवात्मक स्वरूप का उद्घोष—‘त्वयि हव्यं च कव्यं च… त्वमेव दहनो देव…’—और उसी के साथ यह निर्णायक बोध कि अग्नि केवल विनाशक नहीं, यज्ञ-धर्म का आधार और लोक-धारण का स्तम्भ है; इसलिए उसके दाह और अदाह दोनों के पीछे धर्म-नियम और वर-प्रभाव काम करते हैं। → शार्कुकों के न जलने का कारण ‘यथाभूत’ रूप में स्थापित होता है—तप, वर, और धर्म-व्यवस्था के संरक्षण से वे अग्निकाण्ड में भी सुरक्षित रहे; साथ ही जरिता की मातृ-चिन्ता और संतति-रक्षा की कथा-धारा को आगे बढ़ाने का आधार बनता है। → जरिता की अपत्य-स्नेहयुक्त चिंता अब किस उपाय से संतानों की रक्षा/पुनर्मिलन को सुनिश्चित करेगी, और मन्दपाल की भूमिका किस दिशा में मुड़ेगी?

Shlokas

Verse 1

भ्च्प्स्ज्ल््स््ि ह्य #5््ाम्प्र् अष्टाविशर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: शार्कुकोपाख्यान--मन्दपाल मुनिके द्वारा जरिता- शार्डिकासे पुत्रोंकी उत्पत्ति और उन्हें बचानेके लिये मुनिका अग्निदेवकी स्तुति करना जनमेजय उवाच किमर्थ शार्कुकानग्निर्न ददाह तथागते । तस्मिन्‌ वने दहामाने ब्रद्मन्नेतत्‌ प्रचक्ष्य मे,जनमेजयने पूछा--ब्रह्मन्‌! इस प्रकार सारे वनके जलाये जानेपर भी अग्निदेवने उन चारों शार्ड्गकोंको क्यों दग्ध नहीं किया? यह मुझे बताइये

جنمیجَے نے پوچھا—اے برہمن! جب اگنی دیو وہاں آئے اور وہ جنگل جل رہا تھا، تو انہوں نے شارکُک پرندوں کو کیوں نہ جلایا؟ یہ بات مجھے بتائیے۔

Verse 2

अदाहे हाश्वसेनस्य दानवस्य मयस्य च । कारणं कीर्तित ब्रह्म॒ज्छार्इुकाणां न कीर्तितम्‌,विप्रवर! आपने अश्वसेन नाग तथा मयदानवके न जलनेका कारण तो बताया है; परंतु शाड्ड्गकोंके दग्ध न होनेका कारण नहीं कहा है

جنمیجَے نے کہا—اے برہمنِ برتر! آپ نے اشوسین ناگ اور مَیَ دانَو کے نہ جلنے کی وجہ تو بیان کی ہے، مگر شارکُکوں کے نہ دگدھ ہونے کا سبب نہیں بتایا۔

Verse 3

तदेतददभुतं ब्रह्मज्छा्डकाणामनामयम्‌ | कीर्तयस्वाग्निसम्मर्दे कथं ते न विनाशिता:,ब्रह्म! उस भयानक अग्निकाण्डमें उन शाड्र्गकोंका सकुशल बच जाना, यह बड़े आश्चर्यकी बात है। कृपया बताइये, उनका नाश कैसे नहीं हुआ?

جنمیجَے نے کہا—اے برہمن! اس ہولناک آتش کدے میں شارکُکوں کا سلامت بچ جانا بڑا عجیب ہے۔ مہربانی فرما کر بیان کیجیے کہ آگ کے اس شدید ہنگامے میں وہ کیسے تباہ نہ ہوئے؟

Verse 4

वैशम्पायन उवाच यदर्थ शार्कईकानग्निर्न ददाह तथागते । तत्‌ ते सर्व प्रवक्ष्यामि यथाभूतमरिंदम,वैशम्पायनजी कहते हैं--शत्रुदमन जनमेजय! वैसे भयंकर अग्निकाण्डमें भी अग्निदेवने जिस कारणसे शाडूर्गकोंको दग्ध नहीं किया और जिस प्रकार वह घटना घटित हुई, वह सब मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो

وَیشَمپایَن نے کہا—اے دشمنوں کو دبانے والے! اُس ہولناک آتش زدگی کے واقع ہو جانے پر بھی اگنی دیو نے جس سبب سے شارکائیکوں کو نہ جلایا، اور وہ واقعہ جس طرح پیش آیا—وہ سب میں تمہیں بعینہٖ بیان کرتا ہوں۔ سنو۔

Verse 5

धर्मज्ञानां मुख्यतमस्तपस्वी संशितव्रत: । आसीन्महर्षि: श्रुत॒वान्‌ मन्दपाल इति श्रुत:,मन्दपाल नामसे विख्यात एक विद्दान्‌ महर्षि थे। वे धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ और कठोर व्रतका पालन करनेवाले तपस्वी थे

دھرم کے جاننے والوں میں سب سے برتر، تپسوی اور سخت نذروں میں ثابت قدم—مندپال نام کا ایک مہارشی تھا، جو اپنے علم کے سبب مشہور تھا۔

Verse 6

स मार्ममाश्रितो राजन्नृषीणामूर्ध्वरेतसाम्‌ । स्वाध्यायवान्‌ धर्मरतस्तपस्वी विजितेन्द्रिय:,राजन! वे ऊ्ध्वरेता मुनियोंके मार्ग (ब्रह्मचर्य)-का आश्रय लेकर सदा वेदोंके स्वाध्यायमें संलग्न और धर्मपालनमें तत्पर रहते थे। उन्होंने सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें कर लिया था और वे सदा तपस्यामें ही लगे रहते थे

اے راجن! اس نے اُردھوریتا رشیوں کے طریق—برہماچریہ—کا سہارا لیا تھا۔ وہ ویدی سْوادھیائے میں ہمہ وقت مشغول، دھرم کے عمل میں رَت؛ تپسوی اور حواس پر غالب تھا۔

Verse 7

स गत्वा तपस: पार देहमुत्सूज्य भारत । जगाम पितृलोकाय न लेभे तत्र तत्फलम्‌,भारत! वे अपनी तपस्याको पूरी करके शरीरका त्याग करनेपर पितृलोकमें गये; किंतु वहाँ उन्हें अपने तप एवं सत्कर्मोंका फल नहीं मिला

اے بھارت! تپسیا کی انتہا کو پہنچ کر اس نے جسم ترک کیا اور پِترلوک کو گیا؛ مگر وہاں اسے اسی تپسیا اور نیک اعمال کا پھل حاصل نہ ہوا۔

Verse 8

स लोकानफलान्‌ दृष्टवा तपसा निर्जितानपि । पप्रच्छ धर्मराजस्य समीपस्थान्‌ दिवौकस:,उन्होंने तपस्याद्वारा वशमें किये हुए लोकोंको भी निष्फल देखकर धर्मराजके पास बैठे हुए देवताओंसे पूछा

جب اس نے دیکھا کہ تپسیا سے جیتے ہوئے لوک بھی بےثمر ہیں تو اس نے دھرم راج کے قریب بیٹھے ہوئے دیوتاؤں سے سوال کیا۔

Verse 9

मन्दपाल उवाच किमर्थमावृता लोका ममैते तपसार्जिता: । कि मया न कृतं तत्र यस्यैतत्‌ कर्मण: फलम्‌,मन्दपाल बोले--देवताओ! मेरी तपस्याद्वारा प्राप्त हुए ये लोक बंद क्‍यों हैं? (उपभोगके साधनोंसे शून्य क्यों हैं?) मैंने वहाँ कौन-सा सत्कर्म नहीं किया है, जिसका फल मुझे इस रूपमें मिला है

مندپال نے کہا—اے دیوتاؤ! میری تپسیا سے حاصل کیے ہوئے یہ لوک کیوں ڈھکے (مستور) ہیں؟ میں نے وہاں کون سا ایسا سَتکرم نہیں کیا کہ جس کا پھل مجھے اس صورت میں ملا ہے؟

Verse 10

तत्राहं तत्‌ करिष्यामि यदर्थमिदमावृतम्‌ । फलमेतस्य तपस: कथयध्वं दिवौकस:,जिसके लिये इस तपस्याका फल ढका हुआ है, मैं उस लोकमें जाकर वह कर्म करूँगा। आपलोग मुझसे उसको बताइये

جس سبب سے اس تپسیا کا پھل ڈھکا رکھا گیا ہے، میں وہاں جا کر وہی عمل کروں گا۔ اے آسمانی باسیوں! مجھے بتاؤ کہ اس تپسیا کا پھل کیا ہے۔

Verse 11

देवा ऊचु: ऋणिनो मानवा ब्रह्मन्‌ जायन्ते येन तच्छूणु । क्रियाभिन्रह्मचर्येण प्रजया च न संशय:,देवताओंने कहा--ब्रह्मन! मनुष्य जिस ऋणसे ऋणी होकर जन्म लेते हैं, उसे सुनिये। यज्ञकर्म, ब्रह्मचर्यपालन और प्रजाकी उत्पत्ति--इन तीनोंके लिये सभी मनुष्योंपर ऋण रहता है, इसमें संशय नहीं है। यज्ञ, तपस्या और वेदाध्ययनके द्वारा वह सारा ऋण दूर किया जाता है। आप तपस्वी और यज्ञकर्ता तो हैं ही, आपके कोई संतान नहीं है

دیوتاؤں نے کہا—اے برہمن! سنو، انسان کس قرض کے سبب قرض دار ہو کر جنم لیتے ہیں۔ یَجْن (قربانی کے فرائض)، برہماچریہ کی پابندی، اور اولاد کی پیدائش—ان تینوں کے باب میں سب انسانوں پر قرض ہوتا ہے؛ اس میں کوئی شک نہیں۔

Verse 12

तदपाक्रियते सर्व यज्ञेन तपसा श्रुतैः । तपस्वी यज्ञकृच्चासि न च ते विद्यते प्रजा,देवताओंने कहा--ब्रह्मन! मनुष्य जिस ऋणसे ऋणी होकर जन्म लेते हैं, उसे सुनिये। यज्ञकर्म, ब्रह्मचर्यपालन और प्रजाकी उत्पत्ति--इन तीनोंके लिये सभी मनुष्योंपर ऋण रहता है, इसमें संशय नहीं है। यज्ञ, तपस्या और वेदाध्ययनके द्वारा वह सारा ऋण दूर किया जाता है। आप तपस्वी और यज्ञकर्ता तो हैं ही, आपके कोई संतान नहीं है

وہ سارا قرض یَجْن، تپسیا اور ویدوں کے اَध्ययन سے اُتر جاتا ہے۔ تم تپسوی بھی ہو اور یَجْن کرنے والے بھی؛ مگر تمہاری کوئی اولاد نہیں۔

Verse 13

त इमे प्रसवस्यार्थे तव लोका: समावृता: । प्रजायस्व ततो लोकानुपभोक्ष्यसि पुष्कलान्‌,अतः संतानके लिये ही आपके ये लोक ढके हुए हैं। इसलिये पहले संतान उत्पन्न कीजिये, फिर अपने प्रचुर पुण्यलोकोंका फल भोगियेगा

اسی لیے اولاد کے لیے تمہارے یہ لوک پردہ میں رکھے گئے ہیں۔ پس پہلے اولاد پیدا کرو؛ پھر تم اپنے فراواں پُنّیہ لوکوں کے ثمرات کو پوری طرح بھوگو گے۔

Verse 14

पुंनाम्नो नरकात्‌ पुत्रस्त्रायते पितरं श्रुति: । तस्मादपत्यसंताने यतस्व ब्रह्मसत्तम,श्रुतिका कथन है कि पुत्र 'पुत' नामक नरकसे पिताका उद्धार करता है। अतः विप्रवर! आप अपनी वंशपरम्पराको अविच्छिन्न बनानेका प्रयत्न कीजिये

شروتی کہتی ہے کہ بیٹا ‘پُں’ نامی نرک سے باپ کا اُدھار کرتا ہے۔ اس لیے، اے برہمنوں میں افضل، اولاد کے ذریعے اپنی نسل کی تسلسل کے لیے کوشش کرو۔

Verse 15

वैशम्पायन उवाच तच्छुत्वा मन्दपालस्तु वचस्तेषां दिवौकसाम्‌ । क्व नु शीघ्रमपत्यं स्याद्‌ बहुलं चेत्यचिन्तयत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! देवताओंका वह वचन सुनकर मन्दपालने बहुत सोचा-विचारा कि कहाँ जानेसे मुझे शीघ्र संतान होगी

وَیشَمپایَن نے کہا—اے جنمیجَے! دیوتاؤں کے وہ کلمات سن کر منڈپال نے گہرا غور کیا کہ کہاں جائے تو مجھے جلد اور بکثرت اولاد حاصل ہو۔

Verse 16

स चिन्तयन्नभ्यगच्छत्‌ सुबहुप्रसवान्‌ खगान्‌ । शार््धिकां शार््रिको भूत्वा जरितां समुपेयिवान्‌,यह सोचते हुए वे अधिक बच्चे देनेवाले पक्षियोंके यहाँ गये और शार्ज्रिक होकर जरिता नामवाली शार्डििकासे सम्बन्ध स्थापित किया

یوں سوچتے ہوئے وہ اُن پرندوں کے پاس گیا جو بکثرت بچے دیتے تھے۔ شاردھک (نر پرندہ) کی صورت اختیار کر کے وہ شاردھکا جریتہ کے قریب گیا اور اس سے ملاپ کیا۔

Verse 17

तस्यां पुत्रानजनयच्चतुरो ब्रह्म॒वादिन: । तानपास्य स तत्रैव जगाम लपितां प्रति

اس کے بطن سے اس نے چار بیٹے پیدا کیے، جو برہمی ودیا کے پابند تھے۔ اُن بیٹوں کو وہیں چھوڑ کر وہ اسی جگہ سے لپیتا کی طرف روانہ ہوا۔

Verse 18

तस्मिन्‌ गते महाभागे लपितां प्रति भारत

اے بھارت! جب وہ صاحبِ عظمت لپیتا کی طرف روانہ ہوا تو روایت اب لپیتا سے متعلق واقعات کی طرف مڑتی ہے۔

Verse 19

तेन त्यक्तानसंत्याज्यानृषीनण्डगतान्‌ वने,अंडेमें स्थित उन मुनियोंको यद्यपि मन्दपालने त्याग दिया था, तो भी वे त्यागने योग्य नहीं थे। अतः पुत्र-शोकसे पीड़ित हुई जरिताने खाण्डववनमें अपने पुत्रोंको नहीं छोड़ा। वह स्नेहसे विह्नल होकर अपनी तवृत्तिद्वारा उन नवजात शिशुओंका भरण-पोषण करती रही

جنگل میں انڈوں کے اندر موجود اُن رِشی پُتروں کو منڈپال نے اگرچہ چھوڑ دیا تھا، مگر وہ حقیقت میں ترک کیے جانے کے لائق نہ تھے۔ اسی لیے اولاد کے غم سے نڈھال جریتا نے کھانڈوَ بن میں اپنے بیٹوں کو نہ چھوڑا۔ ماں کی محبت سے بے قرار ہو کر وہ اپنے ہی سہارے اُن نومولود بچوں کی پرورش کرتی رہی۔

Verse 20

न जहीौ पुत्रशोकार्ता जरिता खाण्डवे सुतान्‌ । बभार चैतान्‌ संजातान्‌ स्ववृत्त्या स्‍्नेहविप्लवा,अंडेमें स्थित उन मुनियोंको यद्यपि मन्दपालने त्याग दिया था, तो भी वे त्यागने योग्य नहीं थे। अतः पुत्र-शोकसे पीड़ित हुई जरिताने खाण्डववनमें अपने पुत्रोंको नहीं छोड़ा। वह स्नेहसे विह्नल होकर अपनी तवृत्तिद्वारा उन नवजात शिशुओंका भरण-पोषण करती रही

وَیشمپاین نے کہا—اولاد کے غم سے بے قرار جریتا نے کھانڈوَ بن میں اپنے بیٹوں کو نہیں چھوڑا۔ ماں کی محبت سے لرزتی ہوئی اس نے اپنے ہی سہارے اُن نومولودوں کو سنبھالا اور پالا؛ انہیں پرے پھینکا ہوا ماننے سے اس نے انکار کیا۔

Verse 21

ततोअग्निं खाण्डवं दग्धुमायान्तं दृष्टवानृषि: । मन्दपाल शक्षरंस्तस्मिन्‌ वने लपितया सह,उधर वनमें लपिताके साथ विचरते हुए मन्दपाल मुनिने अग्निदेवको खाण्डववनका दाह करनेके लिये आते देखा

پھر اسی جنگل میں لپیتا کے ساتھ گھومتے ہوئے رِشی منڈپال نے اگنی دیو کو کھانڈوَ بن کو جلانے کے ارادے سے آتے دیکھا۔

Verse 22

त॑ संकल्पं विदित्वाग्नेर्ज्ञात्वा पुत्रांक्ष बालकान्‌ । सोभितुष्टाव विप्रर्षिब्राह्माणो जातवेदसम्‌

وَیشمپاین نے کہا—اگنی کے اُس ارادے کو جان کر اور اُن بچوں کو اپنے ہی بیٹے پہچان کر، وہ برہمن—وِپروں میں برتر رِشی—خوش ہوا اور جاتَویدس (اگنی) کی ستائش کرنے لگا۔

Verse 23

मन्दपाल उवाच त्वमग्ने सर्वलोकानां मुखं त्वमसि हव्यवाट्‌,मन्दपालने कहा--अग्निदेव! आप सब लोकोंके मुख हैं, आप ही देवताओंको हविष्य पहुँचाते हैं

منڈپال نے کہا—“اے اگنی دیو! تم سبھی لوکوں کے مُنہ ہو؛ تم ہی ہویَوَاہ ہو—تمہارے ہی ذریعے آہوتیاں دیوتاؤں تک پہنچتی ہیں۔”

Verse 24

त्वमन्त: सर्वभूतानां गूढश्वरसि पावक । त्वामेकमाहु: कवयस्त्वामाहुस्त्रिविध पुन:,पावक! आप समस्त प्राणियोंके अन्तस्तलमें गूढ़-रूपसे विचरते हैं। विद्वान्‌ पुरुष आपको एक (द्वितीय ब्रह्मरूप) बताते हैं। फिर दिव्य, भौम और जठरानलरूपसे आपके त्रिविध स्वरूपका प्रतिपादन करते हैं

مانڈپال نے کہا— اے پاوَک (آگ)! تم تمام جانداروں کے باطن میں پوشیدہ طور پر حرکت کرتے ہو۔ رشی تمہیں ایک ہی، واحدِ اعلیٰ حقیقت کہتے ہیں؛ پھر بھی وہ تمہیں سہ گونہ بیان کرتے ہیں— آسمانی آگ، زمینی آگ، اور جانداروں کے جسم میں ہاضم آگ (جٹھراگنی)۔

Verse 25

त्वामष्टधा कल्पयित्वा यज्ञवाहमकल्पयन्‌ । त्वया विश्वमिदं सृष्टं वदन्ति परमर्षय:,आपको ही पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा और यजमान--इन आठ मूर्तियोंमें विभक्त करके ज्ञानी पुरुषोंने आपको यज्ञवाहन बनाया है। महर्षि कहते हैं कि इस सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि आपने ही की है

تمہیں آٹھ صورتوں میں تصور کرکے داناؤں نے تمہیں یَجْن (قربانی) کا حامل و وسیلہ ٹھہرایا ہے۔ پرم رِشی کہتے ہیں کہ یہ سارا کائنات تم ہی کے ذریعے وجود میں آئی ہے۔

Verse 26

त्वदृते हि जगत्‌ कृत्स्नं सद्यो नश्येद्‌ हुताशन । तुभ्यं कृत्वा नमो विप्रा: स्वकर्मविजितां गतिम्‌

اے ہُتاشن! تمہارے بغیر یہ سارا جہان فوراً فنا ہو جائے۔ اسی لیے برہمن تمہیں نمسکار کرکے، اپنے ہی اعمال و فرائض کے ثواب سے حاصل ہونے والی مبارک منزل کو پاتے ہیں۔

Verse 27

त्वामग्ने जलदानाहुः खे विषक्तान्‌ सविद्युत:,अग्ने! आकाशगमें विद्युतकें साथ मेघोंकी जो घटा घिर आती है, उसे भी आपका ही स्वरूप कहते हैं

اے اگنی! آسمان میں معلق، بجلی سے چمکتے اور بارش برسانے والے بادلوں کو بھی لوگ تمہارا ہی روپ کہتے ہیں۔

Verse 28

दहन्ति सर्वभूतानि त्वत्तो निष्क्रम्य हेतय: । जातवेदस्त्वयैवेदं विश्व सृष्ट महाद्युते,प्रलयकालमें आपसे ही भयंकर ज्वालाएँ निकलकर सम्पूर्ण प्राणियोंको भस्म कर डालती हैं। महान्‌ तेजस्वी जातवेदा! आपसे ही यह सम्पूर्ण विश्व उत्पन्न हुआ है

قیامتِ صغری (پرلَے) کے وقت تم ہی سے نکلنے والی ہولناک شعلہ بار لہریں تمام جانداروں کو جلا کر راکھ کر دیتی ہیں۔ اے مہا دَیوتی جاتَویدس! اسی تمہارے ذریعے یہ پوری کائنات پیدا ہوئی ہے۔

Verse 29

तवैव कर्म विहितं भूतं सर्व चराचरम्‌ । त्वया55पो विहिता: पूर्व त्वयि सर्वमिदं जगत्‌,तथा आपके ही द्वारा कर्मोंका विधान किया गया है और सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति भी आपसे ही हुई है। आपसे ही पूर्वकालमें जलकी सृष्टि हुई है और आपमें ही यह सम्पूर्ण जगत्‌ प्रतिष्ठित है

اے پروردگار! عمل و کرم (کرما) کا قانون صرف آپ ہی نے مقرر کیا ہے، اور تمام متحرک و ساکن مخلوق کی پیدائش بھی آپ ہی سے ہوئی ہے۔ ازل کے زمانے میں پانی کی تخلیق آپ ہی نے کی، اور یہ سارا جہان آپ ہی میں قائم و مستقر ہے۔

Verse 30

त्वयि हव्यं च कव्यं च यथावत्‌ सम्प्रतिष्ठितम्‌ । त्वमेव दहनो देव त्वं धाता त्वं बृहस्पति:

آپ ہی میں ہویہ اور کویہ—یعنی دیوتاؤں کے لیے نذر کی گئی آہوتیاں اور پِتروں کے لیے ادا کیے گئے رسوم—اپنے اپنے طریقے کے مطابق مضبوطی سے قائم ہیں۔ اے دیو! آپ ہی دَہن کرنے والی آگ ہیں؛ آپ ہی دھاتا ہیں؛ اور آپ ہی برہسپتی ہیں۔

Verse 31

वैशम्पायन उवाच एवं स्तुतस्तदा तेन मन्दपालेन पावक:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! मन्दपाल मुनिके इस प्रकार स्तुति करनेपर अग्निदेव उन अमित-तेजस्वी महर्षिपर बहुत प्रसन्न हुए और प्रसन्नचित्त होकर उनसे बोले --'मैं आपके किस अभीष्ट कार्यकी सिद्धि करूँ?”

وَیشَمپایَن نے کہا—اے راجن! منڈپال مُنی کی اس طرح کی ستائش سے پاوَک (اگنی دیو) اُس بے اندازہ جلال والے مہارشی پر نہایت خوش ہوا۔ خوش دل ہو کر اس نے کہا—“بتاؤ، تمہارا کون سا مطلوب کام میں پورا کروں؟”

Verse 32

तुतोष तस्य नृपते मुनेरमिततेजस: । उवाच चैन प्रीतात्मा किमिष्टं करवाणि ते,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! मन्दपाल मुनिके इस प्रकार स्तुति करनेपर अग्निदेव उन अमित-तेजस्वी महर्षिपर बहुत प्रसन्न हुए और प्रसन्नचित्त होकर उनसे बोले --'मैं आपके किस अभीष्ट कार्यकी सिद्धि करूँ?”

وَیشَمپایَن نے کہا—اے نَرپ! اُس بے اندازہ جلال والے مُنی کی ستائش سے اگنی دیو نہایت خوش و مطمئن ہوا۔ خوش دل ہو کر اس نے اس سے کہا—“تمہارا کون سا مطلوب کام میں انجام دوں؟”

Verse 33

तमब्रवीन्मन्दपाल: प्राउ्जलिहव्यवाहनम्‌ । प्रदहन्‌ खाण्डवं दावं मम पुत्रान्‌ विसर्जय,तब मन्दपालने हाथ जोड़कर हव्यवाहन अग्निसे कहा--“भगवन्‌! आप खाण्डववनका दाह करते समय मेरे पुत्रोंको बचा दें”

تب منڈپال نے ہاتھ جوڑ کر ہویہ واہن (اگنی) سے کہا—“بھگون! جب آپ کھانڈوَ بن کو جلا رہے ہوں تو میرے بیٹوں کو چھوڑ دیجیے؛ انہیں بچا لیجیے۔”

Verse 34

तथेति तत्‌ प्रतिश्रुत्य भगवान्‌ हव्यवाहन: । खाण्डवे तेन कालेन प्रजज्वाल दिधक्षया,“बहुत अच्छा” कहकर भगवान्‌ हव्यवाहनने वैसा करनेकी प्रतिज्ञा की और उस समय खाण्डववनको जलानेके लिये वे प्रज्वलित हो उठे

“یوں ہی ہو” کہہ کر خدائی آگ (اگنی/ہویہ واہن) نے اس پر رضامندی اور وعدہ کیا؛ اور اسی وقت کھانڈوَ بن کو جلانے کے ارادے سے وہ بھڑک اٹھا۔

Verse 176

बालान्‌ स तानण्डगतान्‌ सह मात्रा मुनिर्वने । जरिताके गर्भसे चार ब्रह्मवादी पुत्रोंको मुनिने जन्म दिया। अंडेमें पड़े हुए उन बच्चोंको मातासहित वहीं छोड़कर वे मुनि वनमें लपिताके पास चले गये

جنگل میں مُنی نے جریتا کے رحم سے چار برہموادی (وید-نِشٹھ) بیٹے پیدا کیے۔ وہ بچے انڈوں کے اندر ہی بند تھے؛ انہیں ماں سمیت وہیں چھوڑ کر مُنی جنگل میں لپِتا کے پاس چلے گئے۔

Verse 183

अपत्यस्नेहसंयुक्ता जरिता बह्गचिन्तयत्‌ । भारत! महाभाग मन्दपाल मुनिके लपिताके पास चले जानेपर संतानके प्रति स्नेहयुक्त जरिताको बड़ी चिन्ता हुई

اولاد کی محبت سے بندھی ہوئی جریتا سخت پریشان ہو گئی؛ مُنی ماندپال کے چلے جانے کے بعد اس کا دل بار بار بچوں کی خیریت ہی کی طرف پلٹتا رہا۔

Verse 223

पुत्रान्‌ प्रति वदन्‌ भीतो लोकपालं महौजसम्‌ । अग्निदेवके संकल्पको जानकर और अपने पुत्रोंकी बाल्यावस्थाका विचार करके ब्रह्मर्षि मन्दपाल भयभीत होकर महातेजस्वी लोकपाल अग्निसे अपने पुत्रोंकी रक्षाके लिये निवेदन करते हुए (ईश्वरकी भाँति) उनकी स्तुति करने लगे

اگنی دیو کے ارادے کو جان کر اور اپنے بیٹوں کی کمسنی کا خیال کر کے برہمرشی ماندپال خوف زدہ ہو اٹھا؛ تب وہ نہایت پرجلال لوک پال، اگنی کے حضور اپنے بیٹوں کی حفاظت کی عاجزانہ درخواست کرتا ہوا، خداوند کی مانند اس کی ستائش کرنے لگا۔

Verse 227

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आदिपव॑के अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें मयदानवकी रक्षाविषयक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ

یوں شری مہابھارت کے آدی پَرو کے ضمن میں مَیَدرشن پَرو میں، مَیَ دانَو کی حفاظت کے بیان پر مشتمل دو سو ستائیسواں اَدھیائے اختتام کو پہنچا۔

Verse 228

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि शार्ज़ुकोपाख्यानेडष्टाविंशत्यधिकद्धिशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपव॑के अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें शा्ड्ुकोपाख्यानविषयक दो सौ अद्वाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ

یوں شری مہابھارت کے آدی پَرو کے تحت مَیَدَرشَن پَرو میں شارنگَکوپاکھیان سے متعلق دو سو اٹھائیسواں ادھیائے اختتام کو پہنچا۔

Verse 266

गच्छन्ति सह पत्नीभि: सुतैरपि च शाश्वतीम्‌ । हुताशन! आपके बिना सम्पूर्ण जगत्‌ तत्काल नष्ट हो जायगा। ब्राह्मणलोग आपको नमस्कार करके अपनी पत्नियों और पुत्रोंके साथ कर्मानुसार प्राप्त की हुई सनातन गतिको प्राप्त होते हैं

وہ اپنی بیویوں کے ساتھ اور اپنے بیٹوں کے ساتھ بھی ابدی منزل کو پہنچتے ہیں۔ اے ہُتاشن! آپ کے بغیر سارا جہان پل بھر میں نیست و نابود ہو جائے۔ برہمن آپ کو نمسکار کرکے، بیوی بچوں سمیت، اپنے اعمال کے مطابق حاصل ہونے والی اس سناتن گتی کو پا لیتے ہیں۔

Verse 303

त्वमश्विनौ यमौ मित्र: सोमस्त्वमसि चानिल: । आपट्ीमें हव्य और कव्य यथावत्‌ प्रतिष्ठित हैं। देव! आप ही दग्ध करनेवाले अग्नि, धारण-पोषण करनेवाले धाता और बुद्धिके स्वामी बृहस्पति हैं। आप ही युगल अश्विनीकुमार, मित्र (सूर्य), चन्द्रमा और वायु हैं

آپ ہی اشوِنی کُماروں کا جوڑا ہیں، آپ ہی یمَین، مِتر، سوم اور اَنِل ہیں۔ اے دیو! ہویہ اور کَویہ—دونوں—آپ ہی میں یथावत قائم ہیں۔ آپ ہی جلانے والے اگنی، دھارن و پوشن کرنے والے دھاتا، اور عقل کے مالک برہسپتی ہیں۔