यह सोपान ‘धर्म-विजय’ का द्वार है: साधक के भीतर ‘अहं-लंका’ (अभिमान, भय, काम-क्रोध) पर सेतु-बंध के द्वारा विवेक-मार्ग बनता है। यहाँ भक्ति केवल भाव नहीं रहती—वह संगठन, अनुशासन, और ‘नाम-सेतु’ बनकर जीव को भवसागर से पार उतारती है।
यह प्रकरण ‘धर्म-विजय’ का द्वार है जहाँ बाह्य सेतु-बंध भीतर के विवेक-मार्ग का रूपक बनता है। ‘अहं-लंका’ (अभिमान, भय, काम-क्रोध) तक पहुँचने के लिए साधक को नाम, कृपा और अनुशासन का पुल चाहिए—नील-नल का सेतु सामूहिक साधना/संगठन का प्रतीक है। जामवंत-उपदेश, हनुमान-उक्ति और राम-आदेश ‘साधना-त्रिवेणी’ हैं: (1) स्मृति-बल/अनुभव, (2) उत्साह-पराक्रम, (3) मर्यादा-नियमन। रामेश्वर-स्थापना शिव-विष्णु-ऐक्य दिखाती है—भक्ति में मत-भेद नहीं, लक्ष्य एक: परम-तत्त्व तक पहुँचने का सेतु। रावण-मंदोदरी संवाद नीति-शास्त्र का प्रवेश है: विवेक की अवहेलना और अहं का अंधत्व पतन को निश्चित करता है। समग्रतः यह ‘निर्णय और प्रवेश’ का चरण है—सेतु पार करना आत्म-शुद्धि के निर्णायक समर में उतरने की आन्तरिक प्रतिज्ञा।
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रामेश्वर-स्थापना के प्रसंग में तुलसी का संकेत स्पष्ट है: ‘जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं…’ तथा ‘जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि…’—अर्थात् रामेश्वर-दर्शन/सेवा से पाप-क्षय, शिव-राम-भक्ति की प्राप्ति, और ‘भवसागर’ से सुगमता का फल माना गया है; साथ ही ‘मम कृत सेतु… बिनु श्रम’—नाम-आश्रय से जीवन-यात्रा सुगम होने की लोक-परम्परा।
सेतु-बंध/रामेश्वर प्रसंग में प्रचलित सम्पुट: ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ (नाम-स्मरण), तथा शिव-समन्वय के लिए ‘राम रामाय नमः’ / ‘ॐ नमः शिवाय’ का युग्म-जप (स्थानीय परम्परानुसार) जोड़ा जाता है।
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