Mahabharata Adhyaya 113
Drona ParvaAdhyaya 11367 Versesरण का दबाव बना हुआ; युधिष्ठिर पक्ष में क्षणिक आशंका, सात्यकि के आश्वासन से मनोबल पुनर्स्थापित।

Adhyaya 113

Adhyāya 113: Karṇa–Bhīma Śaravarṣa and the Battlefield Aftermath (कर्णभीमशरवर्षः)

Upa-parva: Karṇa–Bhīma Vimarda (Episode: Karṇa and Bhīma’s strategic engagement)

Dhṛtarāṣṭra addresses Saṃjaya with personal distress, acknowledging a prior mental posture of resignation yet asking what response remains appropriate and requesting a precise account of the warriors’ losses. Saṃjaya then narrates a fierce engagement between Karṇa and Bhīma: both unleash dense volleys likened to rainclouds. Bhīma’s named arrows strike Karṇa; Karṇa’s counter-volley saturates Bhīma. The surrounding Kaurava forces experience agitation and disarray as missiles fall in all directions; troops retreat in confusion, some interpreting the calamity as a divinely induced delusion. The narration expands into a panoramic depiction of the field: fallen elephants, horses, men; broken chariots and equipment; scattered weapons (arrows, spears, swords, axes, clubs) and ornaments (armlets, earrings, garlands), producing an image of the earth “adorned” in a grim, ironic sense. Observers among celestial and semi-divine beings are said to marvel at the superhuman intensity of the combat. The chapter closes by emphasizing the exceptional devastation produced by Karṇa and Bhīma’s clash and the resulting severe turmoil in the wider battle zone.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को सुनाते हैं—धर्मराज युधिष्ठिर के प्रेमपूर्ण, पर भीतर से आशंकित वचन सुनकर शिनिपुत्र सात्यकि उठ खड़ा होता है; वह अर्जुन की सुरक्षा और युद्ध-नीति पर राजा की चिंता को सीधे संबोधित करता है। → सात्यकि युधिष्ठिर के कथन को ‘न्याययुक्त, चित्र और फाल्गुनार्थे यशस्कर’ कहकर स्वीकारता है, पर साथ ही संकेत देता है कि ऐसे संकट-काल में राजा को उसे भी पार्थ के समान ही समझकर आदेश देना चाहिए। वह युद्धभूमि की व्यापकता का चित्र खींचता है—देव, असुर, मनुष्य, राक्षस, किन्नर, महोरग, स्थावर-जंगम तक अर्जुन के संग्राम में ‘नालं’ (असमर्थ) हैं—अर्थात अर्जुन की क्षमता पर संदेह व्यर्थ है। फिर भी वह आत्मसंरक्षण और अर्जुन तक पहुँचने/सहायता भेजने की व्यावहारिकता पर विचार कर, स्वयं-बुद्धि से उचित गमन/व्यवस्था का प्रस्ताव रखता है। → सात्यकि निर्णायक स्वर में भरोसा दिलाता है कि अर्जुन की रक्षा हेतु पर्याप्त रक्षक-समूह ‘समाहित’ हैं—केकय राजकुमार, घटोत्कच, विराट, द्रुपद, शिखण्डी, धृष्टकेतु, कुन्तिभोज आदि—और वह यह भी उद्घोष करता है कि द्रोणाचार्य और कृतवर्मा सेना सहित भी उसे दबा नहीं सकेंगे; साथ ही धृष्टद्युम्न का स्मरण होता है—अग्नि से प्रकट वह योद्धा, द्रोण-वध के लिए सुसज्जित, जैसे नियति का शस्त्र। → संवाद का निष्कर्ष युधिष्ठिर की आशंका को शमन करना है—अर्जुन के विषय में भय त्यागो; जहाँ सत्यपराक्रमी, महाधनुर्धर श्रीकृष्ण (अच्युत) साथ हैं, वहाँ कर्म की ‘व्याप्ति’ (विघ्न) नहीं। सात्यकि की वाणी राजा को नीति, धैर्य और भरोसे की ओर लौटाती है। → द्रोण-वध की दिशा में धृष्टद्युम्न का ‘अग्निज’ विधान और सात्यकि की सक्रिय भूमिका संकेत देती है कि अगला घटनाक्रम द्रोण के विरुद्ध निर्णायक चालों की ओर मुड़ेगा।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १०५ श्लोक हैं) निफमशा (0) अमन न एकादरशाधिकशततमोड< ध्याय: सात्यकि और युधिष्ठिरका संवाद संजय उवाच प्रीतियुक्ते च हृद्यं च मधुराक्षरमेव च । कालयुक्तं च चित्र च न्याय्यं यच्चापि भाषितुम्‌

Sanjaya disse: “Ó rei, as palavras de Dharmarāja eram cheias de afeição, agradáveis ao coração, compostas de sílabas doces, oportunas, de expressão marcante, dignas de serem ditas e firmadas na justiça. Ao ouvi-las, Sātyaki—o mais eminente entre os Śinis—respondeu a Yudhiṣṭhira desta maneira.”

Verse 2

धर्मराजस्य तद्‌ वाक्‍्यं निशम्य शिनिपुज्भव: । सात्यकिर्भरतश्रेष्ठ प्रत्युवाच युधिष्ठिरम्‌

Sanjaya disse: “Ó rei, tendo ouvido aquela declaração de Dharmarāja (Yudhiṣṭhira)—um discurso marcado por afeição, agradável à mente, doce na expressão, oportuno, de forma notável, digno de ser dito e firmado na justiça—Sātyaki, o mais eminente entre os Śinis, respondeu a Yudhiṣṭhira desta maneira, ó melhor dos Bhāratas.”

Verse 3

श्रुत॑ ते गदतो वाक्‍्यं सर्वमेतन्मयाच्युत । न्याययुक्त च चित्र च फाल्गुनार्थे यशस्करम्‌

Sātyaki disse: “Ó rei que jamais te afastas dos limites do decoro, ó Acyuta (Kṛṣṇa), ouvi por inteiro tudo o que disseste em auxílio de Phālguna (Arjuna). Tua fala é admirável, conforme à justiça e aumenta a glória de Phālguna.”

Verse 4

एवंविधे तथा काले मादृशं प्रेक्ष्य सम्मतम्‌ । वक्तुम्हसि राजेन्द्र यथा पार्थ तथैव माम्‌

Disse Sañjaya: “Em tal momento, ao veres diante de ti alguém querido e digno de confiança como eu, ó melhor dos reis, falaste-me exatamente como falarias a Pārtha (Arjuna). Tudo o que poderias dizer a Arjuna, disseste-o do mesmo modo a mim.”

Verse 5

न मे धनंजयस्यार्थे प्राणा रक्ष्या: कथंचन । त्वत्प्रयुक्तः पुनरहं कि न कुर्या महाहवे

Disse Sañjaya: “Pelo bem de Dhanañjaya (Arjuna), não tenho qualquer preocupação em preservar a minha própria vida. E, uma vez posto em movimento por tua ordem, ó Rei, o que não poderia eu realizar nesta grande batalha?”

Verse 6

लोकत्रयं योधयेयं सदेवासुरमानुषम्‌ । त्वत्प्रयुक्तो नरेन्द्रेह किमुतैतत्‌ सुदुर्बलम्‌

Disse Sañjaya: “Ó soberano, se assim ordenares, eu poderia guerrear contra os três mundos, com deuses, asuras e homens. Que grande coisa seria então enfrentar aqui este exército kaurava tão frágil?”

Verse 7

सुयोधनबल त्वद्य योधयिष्ये समन्तत: । विजेष्ये च रणे राजन्‌ सत्यमेतद्‌ ब्रवीमि ते

Disse Sañjaya: “Ó Rei, hoje percorrerei o campo de batalha por todos os lados e lutarei contra as forças de Suyodhana (Duryodhana). Também vencerei neste combate — esta é a verdade que te declaro.”

Verse 8

कुशल्यहं कुशलिनं समासाद्य धनंजयम्‌ | हते जयद्रथे राजन्‌ पुनरेष्यामि तेडन्तिकम्‌,“राजन! मैं कुशलपूर्वक रहकर सकुशल अर्जुनके पास पहुँच जाऊँगा और जयद्रथके मारे जानेपर उनके साथ ही आपके पास लौट आऊँगा

Disse Sañjaya: “Ó Rei, manter-me-ei em segurança e, encontrando Dhanañjaya (Arjuna) em bom estado, voltarei novamente à tua presença, uma vez que Jayadratha tenha sido morto.”

Verse 9

अवश्यं तु मया सर्व विज्ञाप्यस्त्वं नराधिप । वासुदेवस्य यद्‌ वाक्‍्यं फाल्गुनस्थ च धीमत:

Disse Sañjaya: Ó rei, é imperativo que eu te relate tudo—sobretudo as palavras proferidas por Vāsudeva (Śrī Kṛṣṇa) e pelo sábio Phālguna (Arjuna). Seu conselho, dado no contexto da guerra, tem peso moral e deve ser transmitido fielmente ao governante que carrega a responsabilidade pelo destino do reino.

Verse 10

दृढं त्वभिपरीतो5हमर्जुनेन पुनः पुन: । मध्ये सर्वस्य सैन्यस्थ वासुदेवस्य शृण्वत:

Disse Sañjaya: “Arjuna, repetidas vezes, cercou-me e apertou-me com dureza. Isso aconteceu enquanto eu estava no próprio meio de todo o exército, com Vāsudeva a ouvir.”

Verse 11

“अर्जुनने सारी सेनाके बीचमें भगवान्‌ श्रीकृष्णके सुनते हुए मुझे बारंबार कहकर दृढ़तापूर्वक बाँध लिया है ।।

Disse Sañjaya: No próprio meio de todo o exército, enquanto o bem-aventurado Śrī Kṛṣṇa escutava, Arjuna dirigiu-se a mim repetidas vezes e prendeu-me firmemente ao seu propósito. Ele dissera: “Mādhava, hoje, até que eu abata Jayadratha, deves, com vigilância inabalável e o melhor juízo na guerra, proteger o rei Yudhiṣṭhira.”

Verse 12

त्वयि चाहं महाबाहो प्रद्युम्ने वा महारथे । नृपं निक्षिप्य गच्छेयं निरपेक्षो जयद्रथम्‌

Disse Sañjaya: “Ó de braços poderosos, confiando em ti—ou em Pradyumna, o grande guerreiro de carro—eu poderia confiar-te o rei como quem deposita uma carga preciosa e, então, livre de preocupação, partir para enfrentar Jayadratha.”

Verse 13

जानीषे हि रणे द्रोणं रभसं श्रेष्ठमम्मतम्‌ । प्रतिज्ञा चापि ते नित्यं श्रुता द्रोणस्य माधव

“Mādhava, tu bem sabes quão impetuoso é, no campo de batalha, o mestre Droṇa, honrado pelos melhores entre os homens. E o voto que Droṇa firmou, também o ouves dia após dia, ó Mādhava.”

Verse 14

ग्रहणे धर्मराजस्य भारद्वाजोडपि गृध्यति । शक्तश्नापि रणे द्रोणो निग्रहीतुं युधिष्चिरम्‌,“'ट्रोणाचार्य भी धर्मराजको बंदी बनाना चाहते हैं और वे समरांगणमें राजा युधिष्ठिरको कैद करनेमें समर्थ भी हैं

Sañjaya disse: “Até mesmo o filho de Bhāradvāja (Droṇa) anseia por capturar Dharmarāja. Em batalha, Droṇa é de fato capaz de subjugar e aprisionar Yudhiṣṭhira.”

Verse 15

एवं त्वयि समाधाय धर्मराजं नरोत्तमम्‌ | अहमद्य गमिष्यामि सैन्धवस्य वधाय हि,'ऐसी अवस्थामें नरश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरकी रक्षाका सारा भार तुमपर ही रखकर आज मैं सिन्धुराजके वधके लिये जाऊँगा

“Assim, tendo confiado a ti a proteção de Dharmarāja Yudhiṣṭhira, o melhor dos homens, partirei hoje—de fato, para a morte de Saindhava.”

Verse 16

जयद्रथं च हत्वाहं द्रुतमेष्यामि माधव । धर्मराजं न चेद्‌ द्रोणो निगृह्लीयाद्‌ रणे बलात्‌

Sañjaya disse: “Ó Mādhava, após eu matar Jayadratha, voltarei depressa—desde que Droṇa não consiga, pela força no campo de batalha, agarrar Dharmarāja e levá-lo cativo.”

Verse 17

निगृहीते नरश्रेष्ठे भारद्वाजेन माधव । सैन्धवस्य वधो न स्थान्ममाप्रीतिस्तथा भवेत्‌

Sañjaya disse: “Ó Mādhava, se o mais eminente dos homens (Yudhiṣṭhira) for capturado por Bhāradvāja (Droṇa), então não será possível matar Saindhava (Jayadratha)—e, nesse caso, grande angústia será também a minha.”

Verse 18

एवंगते नरश्रेष्ठे पाण्डवे सत्यवादिनि । अस्माकं गमनं व्यक्त वन॑ प्रति भवेत्‌ पुन:,“यदि सत्यवादी नरश्रेष्ठ पाण्डुकुमार युधिष्ठिर इस प्रकार बंदी बनाये गये तो निश्चय ही हमें पुन: वनमें जाना पड़ेगा

Sañjaya disse: “Se as coisas chegarem a tal ponto que o melhor entre os Pāṇḍavas—Yudhiṣṭhira, célebre por sua veracidade—seja feito cativo, então é certo que teremos de voltar novamente à floresta.”

Verse 19

सो<5यं मम जयो व्यक्त व्यर्थ एव भविष्यति । यदि द्रोणो रणे क्रुद्धों निगृह्लीयाद्‌ युधिष्ठिरम्‌,“यदि द्रोणाचार्य रणक्षेत्रमें कुपित होकर युधिष्ठिरको कैद कर लेंगे तो मेरी यह विजय अवश्य ही व्यर्थ हो जायगी

Sañjaya disse: “Esta vitória minha tornar-se-á claramente vã, se Droṇa, enfurecido no campo de batalha, vier a capturar Yudhiṣṭhira e levá-lo cativo.”

Verse 20

स त्वमद्य महाबाहो प्रियार्थ मम माधव । जयार्थ च यशो<र्थ च रक्ष राजानमाहवे

Sañjaya disse: “Portanto, ó Mādhava de braços poderosos, hoje—por consideração a mim, pela vitória e para aumentar a tua fama—protege o rei Yudhiṣṭhira no campo de batalha.”

Verse 21

स भवान्‌ मयि निक्षेपो निक्षिप्त: सव्यसाचिना । भारद्वाजाद भयं नित्यं मन्यमानेन वै प्रभो,'प्रभो! इस प्रकार द्रोणाचार्यसे निरन्तर भय मानते हुए सव्यसाची अर्जुनने आपको मेरे पास धरोहरके रूपमें रख छोड़ा है

Sañjaya disse: “Ó senhor, Arjuna, o arqueiro ambidestro, confiou-te a mim como um depósito, pois teme constantemente o filho de Bhāradvāja (Droṇa).”

Verse 22

तस्यापि च महाबाहो नित्यं पश्यामि संयुगे | नान्यं हि प्रतियोद्धारं रौक्मिणेयादृते प्रभो

Sañjaya disse: “Ó poderoso-armed, ó senhor, no calor do combate observo sempre isto: à parte Pradyumna, filho de Rukmiṇī, não vejo outro guerreiro que possa manter-se diante de Droṇācārya e enfrentá-lo como adversário.”

Verse 23

मां चापि मन्यते युद्धे भारद्वाजस्य धीमतः । सो<हं सम्भावनां चैतामाचार्यवचनं च तत्‌

Sañjaya disse: “Até a mim o sábio filho de Bhāradvāja considera importante nesta guerra. Por isso aceito tanto esta honra quanto aquelas palavras do mestre.”

Verse 24

आचार्यो लघुहस्तत्वादभेद्यकवचावृत:

Disse Sañjaya: O Ācārya, pela destreza de mãos rápidas e leves, estava coberto por uma armadura impenetrável; por isso, no campo de batalha, era difícil transpassá-lo.

Verse 25

यदि कार्ष्णिर्धनुष्पाणिरिह स्यान्मकरध्वज:

Disse Sañjaya: “Se Kārṣṇi—com o arco na mão—estivesse aqui, trazendo o estandarte marcado com o makara, o curso desta batalha não seria o mesmo.”

Verse 26

कुरु त्वमात्मनो गुप्तिं कस्ते गोप्ता गते मयि

Disse Sañjaya: “Cuida tu mesmo de resguardar tua vida e teu bem-estar; pois, quando eu me for, quem restará para te proteger?”

Verse 27

मा च ते भयमपद्यास्तु राजन्नर्जुनसम्भवम्‌

Disse Sañjaya: “Ó Rei, não deixes que o medo surja em ti por causa de Arjuna (e do que dele procede).”

Verse 28

ये च सौवीरका योधास्तथा सैन्धवपौरवा:

Disse Sañjaya: “E aqueles guerreiros da terra de Sauvīra, bem como os Saindhavas e os Pauravas…”

Verse 29

उदीच्या दाक्षिणात्याशक्षु ये चान्येडपि महारथा: । ये च कर्णमुखा राजन्‌ रथोदारा: प्रकीर्तिता:

Sañjaya disse: “Ó rei, os grandes guerreiros de carro vindos das regiões do norte e do sul—e outros ainda—, entre os quais Karṇa é o principal, todos afamados como nobres e eminentes mestres do carro, já foram devidamente mencionados.”

Verse 30

एतेड<र्जुनस्य क्रुद्धस्प कलां ना्हन्ति षोडशीम्‌ । 'राजन्‌! जो सौवीर, सिन्धु तथा पुरुदेशके योद्धा हैं, जो उत्तर और दक्षिणके निवासी एवं अन्य महारथी हैं तथा जो कर्ण आदि श्रेष्ठ रथी बताये गये हैं वे कुपित हुए अर्जुनकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं ।।

Sañjaya disse: “Ó rei, os guerreiros de Sauvīra, Sindhu e Purudeśa—os do norte e do sul, e outros grandes combatentes de carro—, mesmo os afamados como os primeiros entre os cocheiros, como Karṇa, não chegam sequer à décima sexta parte de Arjuna quando ele se enfurece. Ainda que a terra inteira, com deuses, asuras e homens—juntamente com rākṣasas, kinnaras e as poderosas raças de serpentes, e todos os seres móveis e imóveis—se erguesse para a batalha, mesmo unidos não poderiam enfrentar Arjuna no campo de guerra.”

Verse 31

सराक्षसगणा राजन्‌ सकिन्नरमहोरगा । जड़मा: स्थावरा: सर्वे नाल॑ पार्थस्य संयुगे

Sañjaya disse: “Ó rei, ainda que todos os seres—com hostes de rākṣasas, com kinnaras e as poderosas raças de serpentes—isto é, tudo o que se move e tudo o que é imóvel—se erguessem para a batalha, ainda assim não seriam suficientes para enfrentar Pārtha (Arjuna) no campo de guerra.”

Verse 32

एवं ज्ञात्वा महाराज व्येतु ते भीर्धनंजये । यत्र वीरौ महेष्वासौ कृष्णौ सत्यपराक्रमौ

Sañjaya disse: “Sabendo isto, ó grande rei, dissipe-se o teu temor quanto a Dhanañjaya; pois onde estão os dois Kṛṣṇas—esses heróis, poderosos arqueiros de valor comprovado—não há motivo para desespero.”

Verse 33

दैवं कृतास्त्रतां योगममर्षमपि चाहवे

Sañjaya disse: “Naquela batalha, houve uma convergência fatal: o domínio da arte das armas, a união estratégica disciplinada e até uma ira feroz e inflexível—tudo parecia surgir sob a pressão do destino.”

Verse 34

मयि चापि सहाये ते गच्छमानेड<र्जुनं प्रति

Sañjaya disse: “E quando partias em direção a Arjuna, levando-me também como teu assistente e ajudante…”

Verse 35

आचार्यो हि भृशं राजन्‌ निग्रहे तव गृध्यति

Sañjaya disse: “Ó rei, o Mestre está intensamente ávido por refrear-te—deseja conter teu curso e afastar-te do que julga nocivo ou impróprio.”

Verse 36

कुरुष्वाद्यात्मनो गुप्तिं कस्ते गोप्ता गते मयि

Sañjaya disse: “Providencia hoje tua própria proteção; quando eu tiver partido, quem será teu protetor?”

Verse 37

न हाहं त्वां महाराज अनिक्षिप्य महाहवे

Sañjaya disse: “Ó grande rei, nesta grande batalha eu não te deixarei para trás—não, de fato não te deixarei.”

Verse 38

एतद्विचार्य बहुशो बुद्धया बुद्धिमतां वर,“बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महाराज! अपनी बुद्धिसे इस विषयमें बहुत सोच-विचार करके आपको जो परम मंगलकारक कृत्य जान पड़े, उसके लिये मुझे आज्ञा दें!

Sañjaya disse: “Tendo refletido sobre isto, vez após vez, com teu próprio discernimento, ó melhor entre os sábios—ó grande rei—ordena-me hoje o rumo de ação que julgares supremamente auspicioso e benéfico.”

Verse 39

दृष्टवा श्रेय: परं बुद्धया ततो राजन्‌ प्रशाधि माम्‌,“बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महाराज! अपनी बुद्धिसे इस विषयमें बहुत सोच-विचार करके आपको जो परम मंगलकारक कृत्य जान पड़े, उसके लिये मुझे आज्ञा दें!

Sañjaya disse: “Tendo discernido com teu intelecto o que é supremamente benéfico, ó Rei, ordena-me. Após profunda reflexão, seja qual for o caminho que julgues ser o bem mais elevado—concede-me tua instrução para segui-lo.”

Verse 40

युधिछिर उवाच एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि माधव । नतुमे शुद्धयते भाव: श्वेताश्वं प्रति मारिष

Yudhiṣṭhira disse: “Assim é, ó de braços poderosos, exatamente como dizes, ó Mādhava. Contudo, venerável, meu íntimo não se purifica no que diz respeito a Śvetāśva.”

Verse 41

युधिष्ठिर बोले--महाबाहु माधव! तुम जैसा कहते हो, वही ठीक है। आर्य! श्वेतवाहन द्रोणाचार्यकी ओरसे मेरा हृदय शुद्ध (निश्चिन्त) नहीं हो रहा है ।।

Yudhiṣṭhira disse: “Mādhava de braços poderosos, o que dizes é de fato correto. Contudo, nobre, por causa de Droṇa, o mestre do carro branco, meu coração não se torna claro nem livre de inquietação. Empregarei o máximo esforço para minha própria proteção. Vai agora, com minha permissão, ao lugar para onde foi Dhanañjaya (Arjuna).”

Verse 42

आत्मसंरक्षणं संख्ये गमन॑ चार्जुनं प्रति । विचार्यतत्‌ स्वयं बुद्धया गमनं तत्र रोचय

Yudhiṣṭhira disse: “Considera, com teu próprio discernimento, qual caminho melhor serve à autopreservação nesta batalha—e também o caminho de ir ao encontro de Arjuna. Tendo refletido, escolhe a ida que ali te parecer correta.”

Verse 43

मुझे युद्धमें अपनी रक्षा करनी चाहिये या अर्जुनके पास तुम्हें भेजना चाहिये। इन दोनों बातोंपर तुम स्वयं ही अपनी बुद्धिसे विचार करके वहाँ जाना ही पसंद करो ।।

Yudhiṣṭhira disse: “Devo julgar por meu próprio discernimento se, nesta guerra, devo assegurar minha proteção, ou enviar-te a Arjuna. Sobre esses dois caminhos, reflete tu mesmo com tua inteligência, escolhe o que considerares melhor e vai para lá. Portanto, prepara-te para partir ao lugar para onde foi Dhanañjaya (Arjuna); o poderosíssimo Bhīma também me protegerá.”

Verse 44

पार्षतश्न ससोदर्य: पार्थिवाश्व महाबला: । द्रौपदेयाश्व मां तात रक्षिष्यन्ति न संशय:,तात! भाइयोंसहित धृष्टद्युम्न, महाबली भूपालगण तथा द्रौपदीके पाँचों पुत्र मेरी रक्षा कर लेंगे; इसमें संशय नहीं है

Yudhiṣṭhira disse: “Ó querido, Dhṛṣṭadyumna da linhagem dos Pārṣatas, junto com seus irmãos, os reis poderosos e os cinco filhos de Draupadī, certamente me protegerão. Não há dúvida disso.”

Verse 45

केकया भ्रातर: पज्च राक्षसक्ष घटोत्कच: । विराटो द्रुपदश्चैव शिखण्डी च महारथ:

Yudhiṣṭhira disse: “Os cinco irmãos de Kekaya, e o rākṣasa Ghaṭotkaca; Virāṭa e Drupada também; e Śikhaṇḍin, o grande guerreiro de carro—todos eles, plenamente vigilantes, ó querido, certamente me protegerão. Não há dúvida.” No quadro ético da epopeia, as palavras de Yudhiṣṭhira refletem uma realeza responsável em meio à crise: ele não se apoia em mera esperança, mas em protetores disciplinados e comprometidos, afirmando solidariedade e dever (rakṣaṇa-dharma) no caos da guerra.

Verse 46

धृष्टकेतुश्न बलवान्‌ कुन्तिभोजश्न मातुल: । नकुल: सहदेवश्न पञ्चाला: सृज्जयास्तथा

Yudhiṣṭhira disse: “Dhṛṣṭaketu; o poderoso Kuntibhoja — nosso tio materno —; Nakula e Sahadeva; e também os Pañcālas e os Sṛñjayas.” Em meio à guerra, ele enumera líderes e clãs aliados, afirmando a força e a solidariedade dos que estão ligados por parentesco e por compromisso justo com a causa dos Pāṇḍavas.

Verse 47

न द्रोण: सह सैन्येन कृतवर्मा च संयुगे

Yudhiṣṭhira disse: “Nem Droṇa, mesmo com o seu exército, nem Kṛtavarmā no auge da batalha…” (A fala transmite uma avaliação tensa, moral e estratégica: até guerreiros célebres e suas forças são pesados diante da calamidade da guerra, onde a proeza por si só não garante um desfecho justo ou favorável.)

Verse 48

धृष्टय्युम्नश्व॒ समरे द्रोणं क़ुद्धं परंतप:

Yudhiṣṭhira disse: “E Dhṛṣṭadyumna, ó queimador de inimigos, enfrentou Droṇa no auge do combate, quando o preceptor se inflamava de ira.”

Verse 49

वारयिष्यति विक्रम्य वेलेव मकरालयम्‌ । शत्रुओंको संताप देनेवाला धृष्टद्युम्न समरांगणमें कुपित हुए द्रोणाचार्यको पराक्रम करके रोक लेगा। ठीक वैसे ही, जैसे तटकी भूमि समुद्रको आगे बढ़नेसे रोक देती है ।।

Disse Yudhiṣṭhira: “Avançando com valor, Dhṛṣṭadyumna—aquele que inflige aos inimigos uma ardente aflição—conterá no campo de batalha o irado Droṇācārya. Assim como a terra firme da praia refreia o mar e impede que ele avance em ímpeto, do mesmo modo ele deterá Droṇa onde quer que este se firme na luta: o matador dos heróis adversários, o filho de Pṛṣata.”

Verse 50

द्रोणो न सैन्यं बलवत्‌ क्रामेत्‌ तत्र कथंचन । जहाँ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला द्रुपदकुमार संग्रामभूमिमें खड़ा होगा, वहाँ मेरी प्रबल सेनापर द्रोणाचार्य किसी तरह आक्रमण नहीं कर सकते ।।

Disse Yudhiṣṭhira: “Droṇa não pode, de modo algum, avançar com força contra o exército naquele lugar. Pois onde estiver de pé no campo de batalha o filho de Drupada—o destruidor dos heróis inimigos—, ali Droṇācārya não poderá lançar ataque algum contra a minha poderosa hoste. Este nasceu do fogo do sacrifício justamente para a destruição de Droṇa.”

Verse 51

विश्रब्धं गच्छ शैनेय मा कार्षीमयि सम्भ्रमम्‌ धृष्टय्युम्नो रणे क्रुद्धं द्रोणमावारयिष्यति

Disse Yudhiṣṭhira: “Vai sem temor, ó filho de Śini. Não te inquietes por minha causa. Dhṛṣṭadyumna, enfurecido na batalha, conterá Droṇa por completo.”

Verse 110

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें युधिष्िरवाक्यविषयक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ

Assim, no venerável Śrī Mahābhārata, dentro do Droṇa Parva, na seção do abate de Jayadratha, conclui-se o centésimo décimo capítulo, relativo às palavras de Yudhiṣṭhira.

Verse 111

इति श्रीमहा भारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि युधिष्ठिरसात्यकिवाक्ये एकादशाधिकशततमो<ध्याय:

Assim, no venerável Mahābhārata, dentro do Droṇa Parva, na seção referente ao abate de Jayadratha, conclui-se o centésimo décimo primeiro capítulo, conhecido como o diálogo entre Yudhiṣṭhira e Sātyaki.

Verse 233

पृष्ठतो नोत्सहे कर्तु त्वां वा त्यक्तुं महीपते । “अर्जुन मुझे भी बुद्धिमान्‌ द्रोणाचार्यका सामना करनेमें समर्थ योद्धा मानते हैं। महीपते! मैं अपने आचार्यकी इस सम्भावनाको तथा उनके उस आदेशको न तो पीछे ढकेल सकता हूँ और न आपको ही त्याग सकता हूँ

Sañjaya disse: Ó rei, não consigo me decidir a golpear pelas costas, nem posso abandonar-te. Preso pelo dever e pela lealdade, não posso afastar nem o freio moral contra um ato desonroso, nem a obrigação de permanecer ao lado do meu soberano nesta guerra.

Verse 243

उपलभ्य रणे क्रीडेदू यथा शकुनिना शिशु: । 'ट्रोणाचार्य अभेद्य कवचसे सुरक्षित हैं। वे शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेके कारण रणक्षेत्रमें अपने विपक्षीको पाकर उसी प्रकार क्रीड़ा करते हैं

Sañjaya disse: Protegido por uma armadura impenetrável, Droṇācārya—de mão veloz—encontra o adversário no campo de batalha e brinca com ele como se fosse um jogo, tal qual uma criança pequena brincando com um pássaro.

Verse 256

तस्मै त्वां विसूजेयं वै स त्वां रक्षेद्‌ यथार्जुन: । “यदि कामदेवके अवतार श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न यहाँ हाथमें धनुष लेकर खड़े होते तो उन्हें मैं आपको सौंप देता। वे अर्जुनके समान ही आपकी रक्षा कर सकते थे

Sañjaya disse: “De fato, eu te confiaria a ele, para que ele te protegesse assim como Arjuna protege.”

Verse 263

यः प्रतीयाद्‌ रणे द्रोणं यावद्‌ गच्छामि पाण्डवम्‌ | “आप पहले अपनी रक्षाकी व्यवस्था कीजिये। मेरे चले जानेपर कौन आपका संरक्षण करनेवाला है

Sañjaya disse: “Primeiro, deves providenciar a tua própria proteção. Depois que eu partir, quem te guardará? Quem se manterá diante de Droṇa na batalha enquanto eu vou até o Pāṇḍava, Arjuna, e retorno?”

Verse 276

नस जातु महाबाहुर्भारमुद्यम्य सीदति | “महाराज! आज आपके मनमें अर्जुनके लिये भय नहीं होना चाहिये। वे महाबाहु किसी कार्यभारको उठा लेनेपर कभी शिथिल नहीं होते हैं

Sañjaya disse: “Ó rei, hoje não deves deixar que o medo por Arjuna surja em tua mente. Aquele herói de braços poderosos, uma vez que assume o peso da ação, jamais vacila nem sucumbe sob ele.”

Verse 336

कृतज्ञतां दयां चैव भ्रातुस्त्वमनुचिन्तय । “आपके भाई अर्जुनमें जो दैवीशक्ति, अस्त्रविद्याकी निपुणता, योग, युद्धस्थलमें अमर्ष, कृतज्ञता और दया आदि सदगुण हैं उनका आप बारंबार चिन्तन कीजिये

Sañjaya disse: “Reflete, vez após vez, sobre as virtudes de teu irmão — sua gratidão e sua compaixão.”

Verse 343

द्रोणे चित्रास्त्रतां संख्ये राज॑स्त्वमनुचिन्तय । “राजन! मैं आपका सहायक रहा हूँ

Sañjaya disse: “Ó Rei, nesta batalha deves ponderar com cuidado sobre Drona e seu domínio das armas maravilhosas — sobre os extraordinários projéteis que ele empregará no combate.”

Verse 356

प्रतिज्ञामात्मनो रक्षन्‌ सत्यां कर्तु च भारत | “भरतवंशी नरेश! द्रोणाचार्य आपको कैद करनेकी बड़ी इच्छा रखते हैं। वे अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षा करते हुए उसे सत्य कर दिखाना चाहते हैं

Sañjaya disse: “Ó Bharata, decidido a resguardar o próprio voto e a torná-lo verdadeiro, Dronacharya está firmemente determinado a fazer-te prisioneiro. Ele busca sustentar a palavra empenhada e prová-la em meio a esta guerra.”

Verse 363

यस्याहं प्रत्ययात्‌ पार्थ गच्छेयं फाल्गुनं प्रति । “अब आप अपनी रक्षाका प्रबन्ध कीजिये। पार्थ! मेरे चले जानेपर कौन आपका रक्षक होगा, जिसपर विश्वास करके मैं अर्जुनके पास चला जाऊँ

Sañjaya disse: “Ó Pārtha, confiando em quem eu poderia partir e ir ao encontro de Phālguna (Arjuna)? Providencia tua própria proteção — quando eu tiver ido, quem será teu protetor, em quem eu possa confiar enquanto sigo para Arjuna?”

Verse 376

क्वचिद्‌ यास्यामि कौरव्य सत्यमेतद्‌ ब्रवीमि ते | “महाराज! कुरुनन्दन! मैं आपको इस महासमरमें किसी वीरके संरक्षणमें रखे बिना कहीं नहीं जाऊँगा; यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ

Sañjaya disse: “Ó Kauravya, digo-te a verdade: nesta grande batalha não irei a lugar algum em tempo algum; não te deixarei sem a proteção de um herói.”

Verse 463

एते समाहितास्तात रक्षिष्यन्ति न संशय: । तात! पाँच भाई केकयराजकुमार

Yudhiṣṭhira disse: “Meu filho, estes homens, atentos e serenos, hão de proteger-me—disso não há dúvida. Os cinco príncipes de Kaikeya, o rākṣasa Ghaṭotkaca, Virāṭa, Drupada, o grande guerreiro de carro Śikhaṇḍin, Dhṛṣṭaketu, meu poderoso tio materno Kuntibhoja (Purujit), Nakula e Sahadeva, juntamente com os Pāñcālas e a hoste de combatentes heroicos—todos eles, vigilantes, certamente se porão como minha guarda.”

Verse 476

समासादयितु शक्तो न च मां धर्षयिष्यति । सेनासहित द्रोणाचार्य तथा कृतवर्मा--ये युद्धस्थलमें मेरे पास नहीं पहुँच सकते और न मुझे परास्त ही कर सकेंगे

Yudhiṣṭhira declara com firme resolução: “Nem mesmo Droṇācārya, ainda que amparado por seu exército, e tampouco Kṛtavarmā, são capazes de se aproximar de mim no campo de batalha, nem poderão subjugar-me.”

Verse 503

कवची स शरी खड्गी धन्वी च वरभूषण: । यह धृष्टद्युम्न, द्रोणाचार्यका नाश करनेके लिये कवच, धनुष, बाण, खड्ग और श्रेष्ठ आभूषणोंके साथ अग्निसे प्रकट हुआ है

Yudhiṣṭhira disse: “Dhṛṣṭadyumna surgiu do fogo, revestido de armadura, trazendo flechas, espada e arco, ornado com excelentes adornos—manifestado para consumar a destruição de Droṇācārya.”

Verse 3236

न तत्र कर्मणो व्यापत्‌ कथज्चिदपि विद्यते । “महाराज! ऐसा जानकर अर्जुनके विषयमें आपका भय दूर हो जाना चाहिये। जहाँ सत्यपराक्रमी और महाथनुर्धर वीर श्रीकृष्ण एवं अर्जुन विद्यमान हैं वहाँ किसी प्रकार भी कार्यमें व्याघात नहीं हो सकता

Sañjaya disse: “Ó Rei, naquele lugar não pode surgir, de modo algum, qualquer impedimento à empreitada. Sabendo isto, deve cessar o teu temor a respeito de Arjuna; pois onde estão Śrī Kṛṣṇa e Arjuna—verazes no valor e poderosos arqueiros—nenhuma obra pode ser frustrada.”

Frequently Asked Questions

Dhṛtarāṣṭra confronts the dilemma of agency after catastrophe: whether resignation is sufficient or whether a ruler must still seek actionable understanding and responsibility even when outcomes appear irreversible.

The chapter illustrates that intense individual action can generate disproportionate collective consequences; ethically, it cautions that decisions and vows made under strong emotion may propagate harm beyond their intended targets.

No explicit phalaśruti is stated; the meta-commentary operates indirectly through Saṃjaya’s witness-style narration and the motif of astonishment, positioning the episode as a case study in how war magnifies both prowess and suffering.

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